सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 41–50
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 41–50
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१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) स्वा.द.की ६ युक्रियोंकी समीक्षा ( घ ) श्री सायणाचार्यने भी निरुक्तस्थ ' निगम ' शब्द के लिए अपने ' ऋग्वेदभाष्योपोद्घात ' में यही कहा है- ' निगमशब्दो वेदवाची । यास्केन तत्र तत्र ' अपि निगमो भवति ' इत्येवं वेद - वाक्यानामवता-रितत्वात् ' । तब ब्राह्मणभाग स्वान्दव्जी तथा यास्क के अनुसार वेद सिद्ध हुआ । ( ङ ) ‘ बभूथाततन्थजगृभ्यवत्रर्थेति निगमे ' ( ७१२/६४ ) इस पाणिनिके सूत्र में भी निगम वेदवाचक सर्वसम्मत है । ' निगम ' शव्दको लौकिक अन्य शास्त्रोंका बोधक भी यदि कोई मानें, तो उन्हें ' बभूथ ' आदि प्रयोग लोक में भी दिखलाने पड़ेंगे । फिर तो ' निगमे ' यह कहना भी व्यर्थ होगा; क्योंकि श्रीपाणिनि शास्त्रगत प्रयोगोंकी ही तो सिद्धि कर रहे हैं । विशेष शब्द रखने से ' निगम ' शब्द वेद - वाची है | तब ' निगम ' शब्द से ब्राह्मणभाग भी यत्र - तत्र उदाहृत होनेसे वह वेद सिद्ध हुआ । ( ४ ) वैदिककालसे लेकर आर्य समाज प्रवर्तक स्वा ० दयानन्दजी-से पूर्व तक ब्राह्मणभाग भी मन्त्रभागकी भांति वेद माना जाता रहा; पर इससे स्वा ० द ० जीके कई सिद्धान्तों में भङ्ग आता था; तब उन्होंने वेदकी सीमाको घटाने के लिए ब्राह्मणभागको वेदभिन्न सिद्ध करनेकेलिए अपनी ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में वेदसंज्ञाविचार प्रकरण में निम्न युक्तियाँ दीं । -स्वा. द. की छः युक्तियोंकी समीक्षा ' न ब्राह्मणानां वेदसंज्ञा भवितुमर्हति कुतः? पुराणेतिहाससंज्ञक-त्वात् १, वेदव्याख्यानात् २, ऋषिभिरुक्तत्वात् ३, अनीश्वरोक्तत्वात् ४, कात्या-यनभिन्नैऋ पिभिर्वेदसंज्ञायामस्वीकृतत्वात् ५, मनुष्यबुद्धिरचितत्वाच्च ' - ६, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. यह छः हेतु स्वा ० द ० जीने ब्राह्मणभागकी अवेदतामें दिये हैं, और उनका विवरण ८१ पृष्ठ से ८७ पृष्ट तक दिया है । यदि इसपर विचार न किया जाय; तो हमारा यह ' श्रीसनातनधर्मालोक ' पूर्ण रहेगा; क्योंकि – सनातनधर्मका मुख्य विषय है वेदस्वरूपनिरूपण, और विधिभाग प्रायः ब्राह्मणभागमें है, तदनुसार हम इसपर विचार करते हैं । [ १ ] ( ५ ) ब्राह्मणभागकी अवेदतामें पहला हेतु ' पुराणेतिहाससंशक-वात् ' दिया गया है कि- ' ब्राह्मणभाग पुराण वा इतिहास माना जाता है; अतः वह वेद नहीं ' । ऋ.मा.भू. के ८४-८५ पृष्ठोंमें इसपर न्याय-दर्शन तथा उसके वात्स्यायन भाष्यका प्रमाण दिया गया है; पर वह प्रयासमात्र है; क्योंकि न्यायके सूत्रकार श्रीगोतम तथा माध्यकार श्रीवात्स्यायन दोनों ही ब्राह्मणभागको वेद मानते हैं; और वे दोनों ही पुराण- इतिहासको ब्राह्मणभागसे भिन्न मानते हैं । जैसेकि -' तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तभ्यः ' ( २३३११५७ ) इस सूत्र से श्रीगोतमने वेदकी प्रमाणताको दृढ करने के लिए स्थूणानिखनन-न्याय से शंका की है । इस सूत्र द्वारा वेदपर अनृत व्याघात, पुनरुक्क तीन दोष लगाये गये हैं । इसपर श्रीवात्स्यायनमुनिद्वारा श्रीगोतम-मुनिके अनुकूल उद्धरण क्रमसे ब्राह्मणभागके दिये गये हैं-१. पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत, । २. उदिते होतव्यम् ' ( ऐतना ० ५।५।२६ ) श्यावोस्याहुतिमभ्यवहरति य उदिते जुहोति ' । ३. ' त्रिः स्थूणा ( खंभे को मजबूती से पृथ्वी में गाडने केलिए उसपर चोट मारनी पड़ती है, जिससे वह मज़बूत हो जाय -यही स्थूण निखनन - न्याय है । An eGangotri Initiative
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स्वा. द. की ६ युक्तियोंकी समीक्षा १६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) प्रथमामन्वाह् त्रिरुत्तमाम् ' ( ऐत ० १।३।१३, शतपथ ११२ ११४, गो-पथ २३।११ ) यह तीनों वचन ब्राह्मणभाग के हैं । जो लोग ब्राह्मणभागको अर्थवाद ( स्तुतिमात्र ) से वेद मानें, वस्तुतः नहीं; उन्हें इधर दृष्टि डालनी चाहिये । ऐसा होता; तो वेद-के खण्डनके लिए उद्धरण ब्राह्मणभागका न दिया जाता । स्वा ० दयानन्दजीके लिखे हुए विधवाविवाहके निषेधका खण्डन किसी विधवाविवाहाग्रही आर्यसमाजीने करना हो; और वह उसमें खण्डनार्थ उद्धरण दे किसी सनातनधर्मी के वाक्यका; तब क्या यह उचित हो सकता है? पर वेदकी आलोचनार्थ जय उसमें ब्राह्मणभागका प्रमाण उक्त दोनों मुनियों द्वारा दिया गया है, इससे स्पष्ट है कि-ब्राह्मणभाग वस्तुतः ही वेद है, अर्थवादसे वा उपचारसे नहीं । क्योंकि यह न्याय नहीं हो सकता कि खण्डन करना हो वेदका, महिमा दिखानी हो वेदकी; उसमें उसका उद्धरण न देकर उद्धरण दिया जाय ब्राह्मणभागका । वेदके उद्धरणस्थल में श्रीगोतम तथा श्रीवात्स्यायन - द्वारा वेद के उदाहरण में ब्राह्मणभाग के उद्धरण देना ब्राह्मणभागको वेद बताता है । क्योंकि हम पूर्व कह चुके हैं कि-वेद समुदायवाचक शब्द है । वह मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभाग दोनों-का नाम है | समुदायवाचक शब्द अवयववाची भी हुआ करते हैं, यह भी हम पहले भाष्यकारके वचनसे सिद्ध कर चुके हैं । तब उसका उद्धरण देने के लिए दोनोंमें चाहे मन्त्रभाग हो, वा ब्राह्मण-भाग - एक का उद्धरण दे देने से अपनी इष्टपूर्ति हो जाया करती है । तदनुसार ही श्रीवात्स्यायनने वेदको उदाहृत करने के लिए ब्राह्मण-CC - 0. Ankur Joshi Collection भागको उदाहृत किया । केबल माष्यकार श्रीवात्स्यायनको ही इष्ट नहीं; सूत्रकार श्रीगोतम - मुनिको भी यही इष्ट है । तभी उन्होंने पुत्रेष्टिकी अनृतताके उत्तरमें ‘ न, कर्म - कर्तृ साधनवैगुण्यात् ' ( २ । १ । १३ यह सूत्र बनाया । ' उदिते होतव्यम् ' इस व्याघातके उत्तर में ' अभ्यु पेत्य कालभेदे दोषवचनात् ' ( २ । १ । ५६ ) यह सूत्र बनाया । 'ि प्रथमां ' इस पुनरुक्तके उत्तर में ' अनुवादोपपत्तेश्च ' ( २ | १ | ६० ) वह सूत्र बनाया । कोई भी आधुनिक विद्वान् इनसे भिन्न मन्त्रभागा यहाँ कोई वचन ही नहीं दे सका । तो जब न्याय के वादि - प्रतिवादि सम्मत सूत्रकार एवं भाष्यकार दोनों ही ब्राह्मणभागको वेद मान्ने हैं; तब उन्हींको अपने पक्षवाला बताना यह जनताको गुमराह करना है । प्रत्युत स्वा ० द ० जीके प्रमाणभूत श्रीवात्स्यायनने मन्त्रभाग औ ब्राह्मणभागको समकक्ष माना है, और पुराण - इतिहासको स्पष्ट ब्राह्मणभागसे भिन्न माना है । देखिये उनका वचन - । ४ । १६ सूत्रका भाष्य करते हुए वे कहते हैं- ' अन्यो मन्त्र - त्राह्मणस्य विषय अन्यश्व इतिहासपुराणधर्मशास्त्राणाम् ' यहाँ उन्होंने मन्त्रभाग ब्राह्मणभागको समान माना हैं; पुराण- इतिहासको उनसे भिन्न माना है । मन्त्र - ब्राह्मण तथा पुराण - इतिहासको अपने - अपने विषय में अधि प्रमाण माना है । जैसाकि उसीके आगे वे कहते हैं— ' यज्ञो मन्त्र ब्राह्मणस्य, लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थाप धर्मशास्त्रस्य विषयः । तत्र एकेन न सर्व व्यवस्थाप्यते इति यथा विषयमेतानि प्रमाणानि इन्द्रियादिवदिति ' । Gujarat. An eGangotri Initiative
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२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) स्वा.द. के ६ हेतुओंकी समीक्षा २६ इसमें श्रीवात्स्यायनने ब्राह्मणभागको पुराण - इतिहास से भिन्न ही माना है । उसी स्थल पर इससे अधिक मी स्पष्टता कर दी कि ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते ' यहाँ ब्राह्मणभाग द्वारा इतिहास - पुराणको प्रमाण सिद्ध किया है । यदि ब्राह्मणभाग ही पुराण - इतिहास होता; तो श्रीवात्स्यायन उसीसे उस ( पुराणादि ) की प्रमाणता कैसे सिद्ध करते । साक्षी और अभियुक्त दोनों समान नहीं हो जाते । जब ऐसा है; श्रीगोतम तथा वात्स्यायन दोनों ही ब्राह्मणभागको पुराण - इतिहास से भिन्न बताते हैं, मन्त्र-ब्राह्मण दोनोंको समकक्ष ( वेद ) मानते हैं; तब उन्हीं मुनियों के वचनसे ब्राह्मणभागकी अवेदता तथा पुराणेतिहासता बताना यह एक बड़ा दुस्साहस है; अविद्वान् जनताकी आँखों में दिन - दहाड़े धूल झोंकना है । ( ६ ) जो कि कई महाशय ( श्रीतुलसीराम - स्वामी आदि ) उक्त न्यायसूत्रमें शब्दका प्रामाण्याप्रामाण्य विषय दिखाकर ' शब्द आप्त-वचनका नाम है ' यह कहकर ' ब्राह्मणभाग ही यहाँ आप्तवचन है; उसीकी प्रमाणतासिद्धि यहाँ की गई है, यहाँ कोई वेदकी चर्चा भी नहीं है- ' यह कहते हैं यह तो व्यर्थ है । क्योंकि उनके मत में ब्राह्मणभाग परतः - प्रमाण होनेसे मन्त्रभागकी ही सबसे पूर्व सिद्धि दिखलानी उचित है; नहीं तो फिर न्यायके मत में ब्राह्मणभाग ही शब्द हो जावेगा, मन्त्रभाग नहीं । तव मन्त्रभाग तथा स्मृति आदिकी प्रमाणता भी ब्राह्मणभाग - मूलक ही होगी, और ब्राह्मणभाग स्वतः-प्रमाण हो जावेगा, मन्त्रभाग परतः - प्रमाण हो जावेगा । क्या यह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वादियोंको स्वीकार है? वस्तुतः न्यायकारने वेदको ही शब्द माना है । ' यजुर्वेदभाष्य-विवरणभूमिका ' ( प्रथम सं ० ) में श्रीब्रह्मदत्तजी जिज्ञासुने २२ पृष्ठमें-वैशेषिकदर्शन ( १ | १ | ३ ) के टीकाकार श्रीशङ्करमिश्रका उपस्कार उक्त न्यायसूत्र पर उद्धृत किया है- ' तदिति अनुपकान्तमपि प्रसिद्धि-सिद्धतया ईश्वरं परामृशति । यथा - ' तदप्रानाग्यमनृतव्याचातपुन-रुक्तभ्यः ' इति गौतमीये सूत्रे तच्छब्देनानुपक्रान्तोपि चेदः परामृश्यते ' ( उपस्कार पृ ० ७ ) । इससे भी हमारी ही बात सिद्ध हुई कि - श्री गोतमको यहाँ ' शब्द ' से ' वेद ' इष्ट है । स्वा ० द ० जीने मी स ० प्र ० ३ समु ०, ३३ पृष्ठपर ' आप्तोपदेशः शब्दः ' ( ११७ ) इस सूत्र की व्याख्या करते हुए लिखा है- ' पूर्ण आप्त परमेश्वरके उपदेश वेद हैं, उन्हींको शब्द प्रमाण जानो ' । उसी शब्द ( वेद ) की परीक्षाके प्रकरण-में उक्त न्यायसूत्र हैं । उसके मन्त्र और ब्राह्मण दो भाग हैं; उनमें एक अवयव ब्राह्मणभागके उदाहरण दे देने पर न्यायके सिद्धान्त वेद- प्रामाण्य की सिद्धि हो ही गई । इसीलिए उक्त सूत्रकी वृत्ति में भो ' दृष्टार्थकव्यतिरिक्तस्य वेदस्य प्रामाण्यम् ' यह विषय दिखलाया है; तभी भाष्यकार वात्स्यायनने भी इस प्रकरण के उपसंहारमें मी ' वेद ' शब्द ही लिखा है । इसीलिए विश्वनाथ - कृत वृत्ति में उक्त सूत्रकी अवतरणिकामें कहा गया है - ' अदृष्टार्थक - वेदस्य प्रामाण्यं परीक्षितुं पूर्वपक्षयति - तदप्रामाण्यमिति ' । इस प्रकार अन्यत्र भी वेदान्त आदि दर्शनों में शब्द ' वा ' आगम ' से वेद ही इष्ट होता है । वेदके दो भाग समान होनेसे उसमें एक उदाहृत किया जा An eGangotri Initiative
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६० श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) सकता है । तब ब्राह्मणभाग वेद सिद्ध हो ही गया । ( ख ) जोकि - ‘ भास्करप्रकाश ' में कहा गया है कि- ' यहां शब्द -प्रमाण की परीक्षा प्रारम्भ हुई है और शब्द- प्रमाणान्तर्गत वेद, स्मृति आदि समस्त आप्तोक्त सत्यशास्त्र हैं । न केवल वेद ही शब्द - प्रमाण है । इससे गौतम सूत्रोंके उदाहरणोंमें ब्राह्मण-वाक्यके उदाहरणसे क्या हानि है? ' यहां श्रीतुलसीरामजीने अपने पक्षकी दुर्बलता प्रकट की है । परीक्षा मूल वस्तुकी होती है, क्योंकि अन्य ग्रन्थोंकी मान्यता तो वेदानुकूलता से ही होती है । तब अन्य ग्रन्थोंकी परीक्षाका इसमें क्या अवसर? नहीं तो यहां गोतम वा वात्स्यायन, स्मृतिका भी वर्णन करते, पर नहीं किया; इससे स्पष्ट है कि - सूत्रकार एवं भाष्यकार यहां शब्द से वेदको ही लेते हैं, कि-उन्हींकी प्रमाणतासे अन्य ग्रन्थोंकी अनुकूलता होने पर स्वयं मान्यता हो जावेगी । तब गौणमुख्ययोर्मुख्ये ' कार्य सम्प्रत्ययः ' इस न्यायसे यहां वेदकी परीक्षा ही है; उसमें ब्राह्मणभाग उद्धृत करने से वह स्पष्ट वेद सिद्ध होगया । यह न्यायदर्शनके प्रमाण ब्राह्मण - भागको वेद न मानने वालोंको बहुत व्याकुल करते हैं 1 श्री तुलसीराम - स्वामीने भी स्वयं ' वेदप्रकाश ' पत्र ( अप्रेल १११५ पृ ० ८२ ) में ' वेदोंका महत्त्व ' यह शीर्षक देकर लिखा था-' न्यायशास्त्र के आचार्य गौतममुनि जो आन्वीक्षिकी तर्क - विद्या के श्राचार्य थे, उन्होंने वेदों पर आई वा आनेवाली तीन शङ्काओं का प्रौढतासे निवारण किया | उन्होंने पूर्वपक्ष कर सन्देह उठाये कि-, तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तेभ्यः ' इत्यादि । फिर आगे उन्होंने CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा. द. के ६ हेतुओंकी समीक्षा तीनों उत्तरसूत्र लिखकर वात्स्यायन भाष्य के अनुसार समाधा किया । इस प्रकार उनका अपना पक्ष अपने से ही कट गया । स्वाभ जी को भी यहां ' शब्द ' से वेद ही इष्ट है यह हम दिखला ही हैं । उसी शब्द की परीक्षा का यह प्रकरण है । ( ग ) जोकि ऋ ० मा ० भू ० में स्वामीजीने ' प्रमाणं शब्दो यथा है विभागश्च ब्राह्मण - वाक्यानां त्रिविधः ' ( पृ ० ८४ ) यह वात्स्यायनमा उद्धृत करके लिखा है- ' अयमभिप्रायः, ब्राह्मणग्रन्यशब्दा लौकि एव न वैदिकाः ' यहां तो स्पष्ट स्वामीजीका छल ही है । क्योंकि - ' प्रम शब्दो यथा लोके ' यहां तक २२११६ सूत्रका भाष्य समाप्त । गया । आगे ' विभागश्च ब्राह्मणवाक्यानां त्रिविधः ' यह तो ६१ सूत्रकी अवतरणिका है । स्वा ० दव्जीने इन दोनों वाक्यों इकट्ठा लिखकर या तो साधारण जनवञ्चना की है, या वे भ्रममें पड़ गये हैं । अतः उनसे दिखलाया हुआ अभिप्राय: निर्मूल ही है । यहां स्वामीने ब्राह्मणभागको लौकिक दिखलाकरः वेदसे भिन्न सिद्ध करना चाहा है; परं उनको यह अभिप्राय ि नहीं होता । यदि लोकका दृष्टान्त देकर मन्त्रभागकी पुष्टि की जावे, क्या मन्त्रभाग भी लौकिक बन जावेगा? वेद नहीं रहेगा! भिद्यते लौकिकाद्वाक्याद् वैदिकं वाक्यं प्रेक्षापूर्व कारिपुरुषप्र त्वेन ' ( ४ | १ | ६० ) क्या इस श्रीवात्स्यायन के वचनसे स्वामी बैं वाक्यको भी लौकिक मान लेंगे? श्रीयास्कमुनिने निरुक्त ( १ । १६ । ४-७ - ९ ) में कौत्सके मतके खएड़न के समय मन्त्रभागकी सार्थक Gujarat. An eGangotri Initiative
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६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) लौकिक दृष्टान्त ही दिये हैं; तो क्या उनके मत में इसी मान्ति मन्त्रभाग भी लौकिक एवं श्रवेद सिद्ध हो जायगा? यदि ब्राह्मणभाग लौकिक होता, तो उसमें छान्दस कार्य न होते; पर होते हैं; यह हम आगे दिखलाएंगे; तब वह लौकिक न हुआ । ' प्रमाणं शब्दो यथा लोके ' इस वात्स्यायन - वचनका यह अर्थ है कि - शब्द- ( वेद ) प्रमाण है, जैसे लौकिक शब्द प्रमाण होता है ॥ इसी तरह श्रीया ने कहा है- ' अर्थवन्तः शब्द - सामान्यात् ' ( नि ० १ १६ १ ) यहां दुर्गाचार्यने लिखा है ' य एव गोशब्दो लोके स्वरसंस्कारयुक्तः; स एव मन्त्रेष्वपि । इससे वेदकी लौकिकता नहीं हो जाती । उसके आगे श्रीवात्स्यायनने अगले सूत्रकी अवतरणिका दी है कि ब्राह्मणभाग के वाक्य तीन प्रकार के होते हैं । इससे ब्राह्मणभागकी शब्द ( वेद ) ता स्पष्ट है । ' प्रमाणं शब्दो यथा लोके ' इस वचन में ' यथा ' शब्द उपमा - वाचक है । यह वाक्यगत श्रौती उपमा है । उपमा भिन्न वस्तुयोंकी समानधर्मता में ही हुआ करती है । ' चन्द्रवन्मुखम् ' यहाँ उपमान -उपमेय दोनों भिन्न हैं । इसीलिए काव्यप्रकाशमें कहा है- ' साधर्म्यमुपमा भेदे ' ( १० उल्लास ) तब लौकिक - प्रामाण्यकी उपमासे ब्राह्मणभाग लोकसे भिन्न सिद्ध है । नहीं तो जब चल रहा है वेदका प्रकरण; तब उसमें ब्राह्मणभागका वर्णन अप्रकृत हो जावेगा । इस कारण यहां स्वामीजीका इष्ट अर्थ नहीं है । श्रीगोतममुनिने २ | १ | ६२ सूत्रमें विधि अर्थवाद, और अनुवाद यह तीन ब्राह्मणभाग के भेद बताये । फिर ६३ सूत्र में CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वाद के ६ हेतुओं की समीक्षा ६३ विधिका ६४ सूत्र अर्थवादका, ६५ सूत्र में अनुवादका लक्षण बताया. इनके माध्यमें - ' अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम: ' यह विधिका, ' सर्वजिता व देवाः सर्वमजयन् ' यह अर्थवादका, ' एतेन अनिष्ट्वाऽ न्येन यजते गर्ते पतति ' यह अनुवादका उदाहरण बताया । फिर ६५ सूत्र के भाष्य में श्रीवात्स्यायनने इन ब्राह्मण वाक्यों की सार्थकता बताने के लिए लौकिक विधि, अर्थवाद, अनुवादके उदाहरण क्रमशः- १ ' ओदनं पचेत, २ आयुर्वर्चः प्रतिमानं चान्ने प्रतिष्ठितम् ३ पचतु पचतु भवान् ' यह उदाहरण दिये । ब्राह्मण-भाग तीन भेदोंकी सार्थकता के लिए लौकिक तीन उदाहरण देनेसे भाष्यकार ब्राह्मणभागको लौकिक नहीं मानते यह स्पष्ट व्यक्त हो रहा है । फिर वे उन ब्राह्मणवाक्योंको अपने मुखसे मी वेद - वाक्य कहते हैं, यह पाठक देखें । ब्राह्मणवाक्यों तथा लौकिक वाक्योंके उदाहरणोंका सामञ्जस्य करते हुए वादि - प्रतिवादिमान्य वहीं श्री वात्स्यायनमुनि कहते हैं - ' यथा लौकिके वाक्ये [ ' ओदनं पचेते-त्यादिपूर्वोक्त ] विभागेन अर्थग्रहणात् प्रमाणत्वम् एवं वेदवाक्या-नामपि [ पूर्वोक्तानाम् ' अग्निहोत्रं जुहुयाद् ' इत्यादि त्राह्मणवाक्या-नामपि ] विभागेनअर्थग्रहणात् प्रमाणत्वं भवितुमर्हति ' ( २।१।६५ ) ' आलोक ' पाठकोंने देख लिया कि यहाँ ब्राह्मणभागको कितना स्पष्ट रूपसे वेद कहा गया है । यदि ब्राह्मणभाग लौकिक होता; तो उसके उदाहरणोंके समन्वयार्थ लौकिक, भिन्न उदाहरणोंकी आवश्यकता कोई नहीं थी । यहाँ जितने भी लौकिक वाक्य श्रीवात्स्यायनने उदाहृत किये हैं; उनमें ब्राह्मणभागका एक भी नहीं । वेदवाक्य जो उदृष्टत किये Gujarat. An eGangotri Initiative
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६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) गये हैं; उनमें मन्त्रभागका एक नहीं, सभी ब्राह्मणभागके हैं । उसी ब्राह्मण के प्रकरण में ' एवं वेदवाक्यानामपि विभागेनार्थ - ग्रहणात् प्रमाण-त्वं भवितुमर्हति ' इस प्रकार वेदवाक्यके नामसे उपसंहार करनेसे उपक्रम तथा उपसंहारकी एकता प्रसिद्ध होनेसे न्यायसूत्रकार तथा भाष्यकार दोनोंके अनुसार ब्राह्मणभाग वेद ही सिद्ध हुआ । तब अपना पक्ष सिद्ध करनेकेलिए स्वा ० द ० जीका न्यायसूत्रभाष्यों का उद्धरण देना - यह साधारण जनता के वचनार्थ ही है । न्यायके विद्वान् पाठक ऋ ० मा ० भू ० के ८४-८५ पृष्ठोंको स्वयं देखकर यह जान सकते हैं । यदि लौकिक उदाहरणोंको दिखलाकर ब्राह्मणभागको प्रमाण सिद्ध करने से उसे वेदसे भिन्न माना जावे; तो निरुक्तमें श्रीयास्क-द्वारा कौत्सके मत के खण्डनावसरमें लौकिक उदाहरणों को देकर मन्त्रभागकी प्रमाणता सिद्ध करनेसे फिर मन्त्रभाग भी वेद नहीं रहेंगा । इस प्रकार ' मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यम् ' ( २।१।६८ ) इस न्यायसूत्रसे लौकिक आयुर्वेदके दृष्टान्तद्वारा वेदकी प्रमाणता सिद्ध करनेपर वेद भी लौकिक ( वेद ) हो जायगा; पर आक्षेप्ताओं-को.मी यह इष्ट नहीं । तब इस समूचे प्रकरण में वेदके नामसे उपसंहार करने से ब्राह्मणभाग वेद सिद्ध हो ही गया । ( ७ ) जो कि - स्वा ० द ० जीने ऋ. मा.भू. ८५ पृष्ठमें ' न चतुष्ट्-मैतिह्य- ' ( २ २ १ ) इस न्यायसूत्रको तथा उसपर ' न चत्वार्येव प्रमारणानि, किं तर्हि? ऐतिह्यादीन्यपि प्रमारणानि । इस वात्स्यायन-माष्यको उद्धृत करके, फिर वात्स्यायनप्रोक्त- ' इति ह् चुरिति CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अनिर्दिष्टप्रबक्तृकं प्रबादपारम्पर्य मैतिह्यम् ' यह ऐतिह्यका ला करके फिर लिखा है- ' अनेन प्रमाणेनापि इतिहासादिना उधृत ' मिर्ब्राह्मणान्येव गृह्यन्ते, नान्यदिति ' यहाँ उन्होंने बड़ा साहस ि है । इस प्रमाणमें सूत्र वा माष्य में कोई ब्राह्मणभागकी चर्चा • नहीं, न कोई ब्राह्मणभागका प्रकरण है । तब ' इस प्रमाण में ब्राह्मण इतिहास - ग्रन्थ माना गया है, वेद नहीं ' यह कहना स्वामीजीका स घा भ्रान्ति बतलाता है, यह विद्वान् पाठक स्वयं देखें 1 । इससे स्पष्ट साहा जाता है कि - संन्यासीजी अपने अशुद्ध भी पक्षको सिद्ध करने लिए प्राचीन ग्रन्थोंकी वाणी से कितना बलात्कार करते थे । इस यह स्पष्ट होगया कि - ब्राह्मणभागकी पुराण - इतिहास संज्ञा नहीं । जिससे वह वेद न होवे । उक्त संज्ञा हो भी सही; फिर भी उसे वेदत्वमें कोई क्षति नहीं पड़ती । एक संज्ञा दूसरी संज्ञाका कर दे - यह कोई अनिवार्य नहीं । यहाँ कोई ' आकडारादेका ( १ | ४ | १ ) इस पाणिनिसूत्रका अधिकार नहीं कि -दो संज्ञाएँ न ' सर्के । ऋचा, यजु आदिकी मन्त्रभाग भी संज्ञा है, वेद - संज्ञा है, ऋग्वेदादि संज्ञा भी है ही । तब क्या दो - तीन संज्ञाओंसे वेद न रहेंगे? ( ८ ) ऋ.भा.भू. के ८१ पृष्ठमें स्वा. द. जीने लिखा है-ब्राह्मणग्रन्थेषु मनुष्याणां नामलेखपूर्वका लौकिका इतिहासाः स न चैवं मन्त्रभागे ' इससे उन्होंने ब्राह्मणभागमें इतिहास । उसकी अवेदता मानी है । यह भी व्यर्थ है । मन्त्रभाग में भी से इतिहास तथा नाम हैं - यह हम भिन्न पुष्पमें बताएंगे । य ५ स ० ६० Gujarat. An eGangotri Initiative
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६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कालदर भागमें जो इतिहास हैं, वे मन्त्रभागमें कहे हुए इतिहासकी ही व्याख्या हैं, सादिना स्वतन्त्र नहीं; क्योंकि स्वा.द. मी ब्राह्मणभागको मन्त्रभागकी व्याख्या साहस ि कहते हैं । व्याख्या मूलकी बातके स्पष्टीकरणार्थं ही तो होती है । की चर्चा जैसे कि - ऋ. सं. ( १०।१५ ) में पुरूरवा - उर्वशीका संवादरूप इतिहास में ब्राह्मण है, इसे शतपथ ब्राह्मण ( ११ । ५ । १ ) ने स्पष्ट कर दिया है । जीका साहा ऋ. सं. ( १।११७।१३ ) में च्यवन ऋषिका इतिहास संक्षेपसे ससे पष्ट शतपथब्राह्मण है । ( ४/१/५ ) ने उसे स्पष्ट कर दिया है । ऋ. सं. सद्ध करने ( १।११७ / २२ ) में दधीचिके अश्व के सिर लगानेका इतिहास थे । इस शतपथना. ( १४।१।१।१८-२४ ) ने उसे स्पष्ट कर दिया है । है । बल्कि वह ज्ञानहीं । ब्राह्मणभाग उस - उस इतिहासको देकर उसमें मन्त्रभागकी साक्षी र भी उसे दे देता है – ' तस्माद् एतद् ऋषिणा अभ्यनूक्तम् ' ( १२ | ७ | ३ | ४, संज्ञाका १४ | १ | १ | २५, १४ | ५ | ५ | १६ ) इत्यादि । ऋ.सं. में शौन: - शेपाख्यान का जिस क्रमसे आया है, उसी क्रम से ऐतरेयत्राह्मणके अन्त में भी संज्ञाएँ आया है । तब उक्त आक्षेप भी हठात् ही किया गया है । यदि वेद - संज्ञा मन्त्रभागस्थ इतिहासों को अर्थवाद वा यौगिक वा केवल श्राख्यान ज्ञाओं - वा भविष्यद् रूपसे माना जावे; तब ब्राह्मणभाग में भी वैसा ही माना जा सकता है । मीमांसादर्शन में ब्राह्मणभागके इतिहासको भी है- शब्द - समानतामात्र एवं यौगिक ही माना है, देखिये - ' बवर: हासाः स प्रावाहरिकामयत ' ( तै. ७११/१०/२ ) इस ब्राह्मणवाक्यपर ' परंतु नहास श्र श्रुतिसामान्यमात्रम् ' ( मी. १ । १ । ३१ ) यह सूत्र । तैत्तिरीय संहितान्तर्गत में भी ब्राह्मणभागमें प्रोक्न बबरको वह सूत्र पुरुषविशेष न सिद्ध करके एंगे । उसे व - ब शब्द करनेवाला ' वायु ' बता रहा है और ' प्रावाहणि’से CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द.के ६ हेतुओंकी समीक्षा ६७ उसे ' प्रवाहरणका लड़का ' न बताकर ' प्रवहणशील ' अर्थवाला बता रहा है । तब ब्राह्मणभाग के अवेदत्वमें युक्ति उसमें इतिहास होनेकी निरस्त होगई । ( १ ) आगे स्वामीजीको ' त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद् देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् ' ( यजुः ३२६२ ) इस मन्त्र-भागमें इतिहासकी स्वयं शंका हुई । पर ' चतुर्थे जमदग्निऋषिः ' इस शतपथके प्रमाणसे स्वामीजीने जमदग्निका अर्थ ' ख ' कर डाला, परन्तु ' आंख ' यह गौरा अर्थ है; क्योंकि वेदमें आध्यात्मिक आधिभौतिक और आधिदैविक यह तीन भी भाव कहीं - कहीं होते हैं । तब उसका ऋषिविशेष अर्थ भी नहीं हटाया जा सकता । नहीं तो फिर वेदमें ' तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।... यजुस्तस्मादजायत ' ( यजुः ३१।७ ) इत्यादि मन्त्रोंमें ऋग्वेदादिका जो इतिहास बताया जाता है उसे मी गलत मानना पड़ेगा । फिर तो शतपथ ब्राह्मणानुसार ' त्रयो वेदा एतेएव वागेव ऋग्वेदः, मनो यजुर्वेदः, प्राणः सामवेदः, ( १४ | ४ | ३ | १२ ) ऋग्वेदादिका भी केवल वाणी, मन और प्राण ही अर्थ करना पड़ेगा । तब क्या स्वा. द. जी वा उनके अनुयायी ऋमाभू में किये हुए उक्त मन्त्रके - ' तस्माद् यज्ञात्-सच्चिदानन्दादिलक्षणात् पूर्णात् पुरुषाद् ऋग्वेदादयश्चत्वारो वेदाः प्रकाशिता इति वेद्यम् ' इस अपने अर्थको अशुद्ध माननेकी उदारता दिखावेंगे? यदि नहीं तब ' त्र्यायुषं जमदग्नेः ' इत्यादि मन्त्रों में भी जमदग्नि आदिका ऋषिविशेष अर्थ भी नहीं हटाया जा सकता, क्योंकि ब्राह्मणभाग की शैली ही ऐसी है कि इसमें श्रर्थवादसे Gujarat. An eGangotri Initiative
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६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) एक शब्द के अनेक अर्थ बताये जाते हैं । जैसे कि इसमें निरुक्तकार भी साक्षी देते हैं - ' बहुमक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति, अग्नि-वैश्वानरः, संवत्सरो वैश्वानरः, ब्राह्मणो वैश्वानरः ' ( ७ | २४ | ६ ) । ब्राह्मणभागमें कई पदोंका ' आयुर्वै घृतम् ' ( तै. सं. राश २२ ) की भांति माहात्म्य भी बताया जाता है; तब क्या वेदमें ' घृत ' का अर्थ ' आयु ' कर दिया जायगा? तब तो ' तेजो वै ब्रह्मवर्चसं गायत्री ' ( शतपथना. २२५२५ ) गायत्रीका भी वेदमें ' तेज ' अर्थ हो जावे । ' आत्मा वै अग्निः ' ( शत. ७१३ | १ | २ ) आत्माका अर्थ सर्वत्र अग्नि कर दिया जावे । यदि नहीं किया जाता, तो यहां भी वैसा ही समझना चाहिये | जमदग्नि ऋषिको चक्षुः- स्थानीय माना गया है । जैसे — ' अन्नं वै प्राणाः ' में ' अन्न'को प्राण माना गया है. प्रारणका पर्यायवाचक नहीं; वैसे ही जमदग्नि ऋषि मी चक्षुः की मांति श्रेष्ठ थे, चक्षुका पर्यायवाचक नहीं? इससे जमदग्निका अभाव नहीं हो जाता, नहीं तो घृतको मी आयुसे भिन्न न माना जावे; अन्नको भी प्राणों से भिन्न न माना जावे । पर ऐसा है नहीं? कार्यकारणभाव आदि सम्बन्धोंका अभेद व्यवहार प्रसिद्ध ही है । प्रकृत में भी ऐसा ही समझना चाहिये । ' त्र्यायुषं ' मन्त्रका स्वा - द.जीने यह अर्थ किया है- ' हे जगदीश्वर! भवत्कृपया नोऽस्माकं जमदग्निसंज्ञकस्य चक्षुषः, कश्यपाख्यस्य प्राणस्य च, त्र्यायुषं — त्रिगुणमर्थात् त्रीणि शतानि वर्षाणि यावत्, तावदायुरस्तु । देवेषु विद्वत्सु यद् विद्याप्रभावयुक्त ' त्रिगुणमायुर्भवति; तन्नो अस्तु ' ( पृ. ८१ ) इस यजुर्वेदकी कण्डिकासे स्वामीजीने कैसा स्वा. द. को ६ युक्तियोंकी समीक्षा बलात्कार किया है? चतुर्थपाद से सम्बद्ध ' नः अस्तु ' का सम्म उन्होंने पूर्वार्धंसे बलात् बना डाला । केवल वेद से इतिहास हटाने लिए ही यह कृत्रिम कल्पना की गई । स्वा. द. जीने यहां ' देव अर्थ विद्वान् * निर्मूलतासे कर डाला । यदि ऐसा अर्थ ठीक है श्री स्वामीजीने विद्वानोंकी ३०० वा बनावट से ४०० वर्षकी आयु मा है; तो प्रष्टव्य है कि स्वामीजी स्वयं तथा उनके अनुयायी स दर्शनानन्द, पूर्णानन्द, तुलसीराम स्वामी आदि विद्वान् थे । नहीं? यदि थे, तो उनकी ३००-४०० वर्षकी आयु क्यों न हुई विद्वान् न होने पर उन्हें उनके सिद्धान्तानुसार ' शूद्र ' मान पड़ेगा । या फिर ' देव ' का अर्थ ' विद्वान ' अशुद्ध मानना पड़ेगा ' सेयमुभयतः स्पाशा रज्जुः ' । इस मन्त्रमें जिन विद्वानोंकी ३००-४०० वर्षकी आयु गई है, वे विद्वान इस मन्त्र से पूर्व थे या पीछे हुए? यदि पूर्व तो यह मन्त्र पीछेका हो गया; क्योंकि - ' इतिहास जिसका है । उसके जन्मके पश्चात् लिखा जाता है; वह ग्रन्थ भी उसके जना पश्चात् होता है ' ( स. प्र. ७ समु. पृ. १२७ ) ऐसा स्वामीजीका स है । यदि वे मन्त्रभागसे पीछे हुए; तो मन्त्रभाग में भी भविष्यव इतिहास सिद्ध हो गया । तब इतिहास आने से. ब्राह्मणभाग वेदमिन्न कैसे हो जावेगा? ( ख ) वा. द. जीने ' अग्ने! देवेषु प्रवोचः ' ( ऋ. १२७१४ ) मर # देवताका अर्थ विद्वान् नहीं होता, यह जाननेके लिए ' श्रीसनात धर्मालोक ' का चतुर्थ पुष्प हमसे मंगावें । मूल्य ५ ) । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) का अर्थ ऐसे लिखा है, ' अग्ने! - अनन्त विद्यामय जगदीश्वर! देवेषु - सृष्ट्यादौ जातेषु पुण्यात्मसु श्रग्निवाय्वादित्याङ्गिरस्सु मनुष्येषु प्रवोचः - प्रोक्तवान् ' । यहां प्रष्टव्य है कि यह अर्थ शुद्ध है या अशुद्ध? यदि अशुद्ध; तो स्वा. द. जी अशुद्ध अर्थ करने वाले सिद्ध हो गये । तब उनके किये अर्थमात्र से मन्त्रभागसे इतिहास नहीं हटाया जा सकता । यदि उक्त अर्थ ठीक माना जावे, तो मन्त्रभागमें भी भविष्य का इतिहास सिद्ध हो गया । तव उसके परिवर्तनकी क्या आवश्यकता? ब्राह्मणभागमें भी वैसा ही मान लेना चाहिये । उत्तररामचरितमें कहा गया है-" लौकिकानां हि साधूनामर्थं वागनुवर्तते । ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोनुधावति ” ( १।५० ) । [ लौकिक पुरुषों की वारणी तो उस पदार्थ बनने के बाद चलती है; पर आदिम ऋषियों ( वेदों ) की वाणी पहले निकलती हैः तद्वाणी- प्रोक्त पदार्थ पीछे अपने समयपर उत्पन्न होता रहता है ] वेद सर्वज्ञ भगवान्की वाणी है । सर्वज्ञकी दृष्टिमें भूत, भविष्यत् वर्तमानकाल समान होते हैं । इसके अतिरिक्त वेदमें जिन ऋषि वा देवताओं श्रादिका वर्णन है, वे प्रत्येक कल्प वा मन्वन्तर वा युगमें प्रवाहरूपसे वैसे ही उत्पन्न होते रहते हैं, जैसेकि बेदमें प्रोक्ल सूर्य, पृथिवी आदि । ऋषियोंकी एक विशेष जाति समझ लेनी चाहिये । इसके अतिरिक्त वेदवर्णित देव वा ऋषि आध्यात्मिक, आधि-भौतिक, वा आधिदैविकरूप तीनों दशाओं में रहने से भी नित्य माने जाते हैं । जैसे- ' सप्तऋषयः प्रतिहिताः शरीरे ' ( यजुः ३४।५५ ) यहाँ सात प्राणरूप अध्यात्म ऋषि बताये गये हैं । आकाशस्थ स्वा.द. के ६ हेतुओं की समीक्षा ७१ सप्तर्षिमण्डलमें वे आधिदैविक रूपसे हैं । इतिहाससूचित विश्वा-मित्र आदि वही सात ऋषि आधिभौतिक हैं । इस प्रकार आग्नेय प्राण भी देवता हैं, तारामण्डलमें भी इन्द्र आदि देवता हैं । मनुष्य शरीर में भी सूक्ष्मरूप देवता हैं । दिव्य लोकोंमें रहनेवाले शरीरी चेतन देव भी देवता हैं । इस प्रकार सौम्य प्रारण भी पितर हैं, उनके आधार पर होनेवाली ऋतुएँ भी पितर हैं । प्रतिशरीर में रहनेवाले सन्तानोत्पादक भाव भी पितर हैं । शरीर त्यागके बाद सूक्ष्म शरीरसे चन्द्र आदि लोकोंमें जाने वाले जीव मी पितर होते हैं । और फिर इन सबके आपस में सम्बन्ध हुआ करते हैं । इससे वेदमें इनके वर्णनसे वेद अनित्य वा आदिमान नहीं हो जाते । नहीं तो फिर महाप्रलय श्रादिमं वेदोंके भी अध्ययन - अध्यापनादि विच्छिन्न होनेसे तिरोभूत होजानेपर फिर अन्य कल्पमें प्रकट होनेपर उनको भी इसी हेतुसे अनित्य मानना पड़ेगा; पर वादी भी ऐसा नहीं मानते । तब इतिहास से वेदकी नित्यता कट नहीं जाती । ( ग ) इस विषय में हम स्वा. द. जीका एक स्पष्ट प्रमाण भी देते हैं | स्वामीने इसी प्रकरण ( पृ ० ८२-८३ ) में लिखा है- ' तमितिहासश्च " पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्च अनुव्यचलन् ' ( अथर्व ० १५३०११ ) ' इतिहासस्य च वै स पुराणस्य च प्रियं धाम भवति ' ( अथर्व ० १५ | ३० | ४ ) एतैः प्रमाणैः ब्राह्मणग्रन्थानामेव ग्रहणं जायते, न श्रीमद्भाग-वतादीनाम् ' । यहाँ प्रष्टव्य है कि यदि यहाँ ' इतिहास - पुराण ' शब्द-से ब्राह्मण प्रन्थोंका ही ग्रहण है; तो यह मन्त्र ब्राह्मणभागके बननेके बाद बना? या उससे पूर्व? इसमें जो स्वामीजीका उत्तर होगा वही CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) स्वा.द. क ६ हतुओ की समीक्षा ब्राह्मणभाग के इतिहासका भी हो जायेगा । नहीं तो उन्हें मन्त्रभागको भी वेदत्वसे पृथक् करना पड़ेगा । क्योंकि परमात्माने इतिहासादि - युक्त ब्राह्मण-भागका अपने मन्त्रभागमें उल्लेख कर दिया - यह मन्त्रभागमें स्वयं इतिहास गया । यदि स्वामी भविष्यद् विचार करके ऐसा नहीं मानते; तो ब्राह्मणभागका ' पुराणेतिहास - संज्ञकत्वात् ' यह अवेदत्वमें दिया हेतु कट गया । ( घ ) आश्वलायनगृह्यसूत्र ( अ. ३ पञ्चयज्ञप्रकरण ) में ' ऋचो यजू ंषि सामानि, अथर्वाङ्गिरसो, ब्राह्मणानि, ' इतिहास - पुराणानि ’ इसमें पुराण - इतिहास ब्राह्मण मागसे पृथकू रखे गये हैं । तैत्तिरी-यारण्यक ( २ प्र. ६ अनु. २ मं. ) में ' ब्राह्मणानि, इतिहासान्, पुराणानि ' यहाँ भी इतिहास - पुराणोंको ब्राह्मणभागसे पृथक् कहा गया है । गोपथब्राह्मणमें- ' सर्वे वेदा निर्मिता: सब्राह्मणाः, सेति-हासाः, सपुराणाः ' ( १।२।१० ) यहाँ भी ब्राह्मणभागसे इतिहास - पुराण पृथक् कहे गये हैं, न्यायदर्शनका प्रमाण इस विषय में पूर्व दिया ही जा चुका है; तब ' पुराणेतिहाससंज्ञकत्वाद् ' यह ब्राह्मणभागकी वेदतामें स्वा. द. जीसे कहा हुआ हेतु निराकृत होगया, क्योंकि ब्राह्मणमाग पुराण - इतिहाससे भिन्न सिद्ध होगया । ( २ ) ( १० ) जो कि ऋमाभू - के ८६ पृष्ठमें स्वामीजीने ' वेदव्या-ख्यानाद ' ब्राह्मणानि तु वेद- व्याख्यानान्येव सन्ति, नैव वेदाख्यानि-इति ' यह ब्राह्मणभागकी अवेदतामें हेतु दिया है; उसपर भी विचार कर लेना चाहिये । यह कैसी निस्सार युक्ति है कि- परमात्मा-से कही हुई अपने ही वचनोंकी व्याख्या भी वेद न हो! सोचने बात है कि - स्वा. द. जीने मूल ऋ.भा.भू. संस्कृत में लिखी उसकी स्वयं हिन्दी व्याख्या भी लिखी है; तब वह क्या हि व्याख्या ‘ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' नहीं रहेगी? तो क्या फिर । ' कुरान ' वा ' बायबल ' हो जायगी! तब तो वेदके मूल का रहनेवा ही वैदिक रहेगा; उसका अर्थज्ञाता तो वैदिक नहीं रहेगा! वेदके भाग मन्त्रकी व्याख्याको अवेद माना जावे तो एक म दूसरे मन्त्रमें कही गईं व्याख्या भी, जिसके लिए निरुक्तकार कहाँ क हैं— ' तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ' ( ३ २२, २।१२।१ इत्यादि उस मन्त्रको अवेद कर देनेवाली होगी, जैसे कि - ' परिषद्यं ह्यर रेक्णो नित्यस्य रायः पतयः स्याम । न शेषोऽग्ने! अन्यजातम अचेतानस्य ' ( ऋ. सं. ७ | ४ | ७ ) इस मन्त्रकी व्याख्या देखिये ह मन्त्रमें ' न हि ग्रभाय अरणः सुशेवोन्योदर्यो मनसा मन्तवाउ । आ नो वाजी अभीषाड् एतु नव्यः ' ( ७ । ४ । ८ ) । इस प्रकार आि होत्रमृषिर्निषीदन् देवापिर्देवसुमतिं चिकित्वान् ।... अपो दिन असृजद् वर्ष्यामि ' ( ऋ. १०१६८५ ) इस मन्त्रको व्याख्या देखि अग्रिम मन्त्र में - ' यद् देवापिः शन्तनवे पुरोहितो होत्राय कृपयन् अदीध्येत् । देवश्रुतिं वृष्टिवनिं रराणो ' ( ऋ. १०१६८ और देखिये –ऋ. १०।१६।१ में ' यदा शुतं कृणवो जातवेदः अथेमेनं प्रहिणुतात् पितृभ्यः ' यह कहा है, इसीका अनुवाद इस अग्रिम मन्त्र में ' शृतं यदा करसि जातवेदः! अथेमेनं परिवर पितृभ्यः ' ( १०।१६।२ ) यह कहा है; तब क्या यह मन्त्र वेद CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative