सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 31–40
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 31–40
पृष्ठ 31
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हैं, उसे मित है, संसार में व्यापक है । देवता भी इसका उल्लंघन नहीं स्त्रियोंको करते । इसमें भीषण हानि आई हुई देखकर भगवान् भी उसके ष्टा करते रक्षणार्थ अवतार लेता है । धृति, क्षमा आदि सामान्यधर्म होते हैं; ति क्रोषी वे तो भिन्न सम्प्रदायोंमें भी मिल सकते हैं; पर ' वेद: स्मृतिः या स्थिर सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य अन्य लक्षणम् ' ( मनु ० २।१२ ) यह वेद, स्मृति, पुराण, इतिहास आदि में चल है । कहे हुए विशेष धर्म इसमें मुख्य हैं । इसमें ( १० ) इस धर्म में परिवर्तन नहीं होता, क्योंकि - ' धारणाद् लिए एक 2 धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः । यत् स्याद् धारणसंयुक्तं स धर्मं मूर्ख हो इति निश्चयः । ' ( महाभारत ) प्रजाको धारण करने से ' धर्म ' यह नाम ब्राह्मण होता है । यदि इस धर्म में परिवर्तन होजाए; तो धर्मीका स्वरूप ड़ता है परिवर्तित होजाए । अग्निका धर्म है उष्णता; तब उष्णता में परिवर्तन धर्म में हो जाने पर अग्नि नहीं रहती, भस्म हो जाती है; यह हम गत विविध निबन्धमें संकेत दे चुके हैं, अतः इस धर्म में परिवर्तन नहीं होता । यह अपनाकर सनातन है । हाँ, अग्निकी प्राप्तिकी प्रक्रियामें परिवर्तन हो - यह रियों को स्वाभाविक है । कभी अरणि - मन्थन से, कभी पत्थरों के संघट्टनसे, इसकी कभी दियासलाईसे, कमी बिजुलीके रूपसे अग्नि प्राप्त की जाती दूसरे है । इसप्रकार प्राप्तिकी प्रक्रिया के परिवर्तन करने पर भी वह अग्नि जनताको सृष्टिसे आज तक उष्ण ही रही और रहेगी भी । प्राचीन अग्नि-की प्राप्तिकी प्रक्रिया में यद्यपि परिश्रम होता था; तथापि उसमें सदा स्वराज्य था, स्वतन्त्रता थी । अर्वाचीन प्रक्रियाओं में यद्यपि परिश्रम अपरि कम पड़ता है, तथापि परतन्त्रता रहती है । बिजलीके इञ्जनमें CC - 0. Ankur Joshi Collection सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता ३१ थोड़ी त्रुटि आनेपर दीपमालावाली रात्रि में भी अन्धकार छा सकता है । सनातनधर्म ईश्वरीय धर्म है, उसमें परिवर्तन तब हो सकता है, जब उसके प्रवर्तक ईश्वर में परिवर्तन हो । पर जब ईश्वर अपरिणामी है; तब उसके धर्म में भी विपरिणाम कब हो सकता है? इसके सिद्धान्त तथा आचार - विचारोंकी विज्ञान- सिद्धता इस युगमें भी प्रमाणित हो चुकी है यह हम पञ्चम पुष्पमें विवृत कर चुके हैं । निष्कर्ष यह है कि यह अमर धर्म है । इस धर्मकी महत्ता बतानेकेलिए न हमारे पास समय है, न सुविधा; अतः हम यहीं रुकते हैं । इससे सिद्ध हुआ कि हमारे धर्मका नाम ' सनातनधर्म ' भी सनातन ही है । इसीके ही ' ॐ, गुरुकुल, मन्दिर, बलिदान, पण्डित आदि शब्द दूसरे समाज मी प्रयुक्त करते हैं । इसकी आरती ' जय जगदीश हरे ' भी दूसरोंने स्वीकार कर रखी है; इस प्रकारके सनातनधर्मका हमें अवश्य भक्त बनना चाहिये; उसके विद्रोहियोंके मुख - मुद्रण केलिए हमें यत्न करना चाहिए । इसकी सेवा से ही वह सनातन, पुराण- पुरुष भगवान् सन्तुष्ट होगा | आधुनिक धर्मामास तो प्रायः छल - चलसे मलिन हैं; उनमें जाना धर्मविरुद्ध ही है । इसके पूर्ण विद्वान् दूसरे धर्मो में नहीं जाते, उधर से इधर तो आते हैं अतः इसमें कुछ ' अतिशय ' सिद्ध होता है । जो दूसरे धर्मो में जाते भी हैं, वह उनकी चतुरता तथा छलके पाशमें बँधकर ही । कुछ उनमें संस्कृत - मापासे अन-भिज्ञता भी कारण होती है । हम उनके उन छलोंका रहस्य आगे के इस पुष्पकी पृष्ठसंख्या ३६ है । मूल्य ८ ) । डाकव्यय पृथक् । Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 32
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) पुष्पों में खोलेंगे । ' हिन्दुधर्म ' इसी सनातनधर्मका नाम है । ' हिन्दु ' शब्दकी वैदिकता एवं प्राचीनता के लिए पाठकगण ' श्री-सनातनधर्मालोक ' चतुर्थ पुष्प मँगावें । ' हिन्दुधर्म के आधारभूतशास्त्र ' बतलाकर आगे वेदस्वरूपका निरूपण किया जावेगा । ( ४ ) सनातन - हिन्दुधर्म के आधारभूत शास्त्र सनातन - हिन्दुधर्म सृष्टिके आदिसे आया हुआ भूमण्डलमें विख्यात धर्म है । इसे हम गत निबन्ध में दर्शा चुके हैं । इसके आधारभूत शास्त्रोंका जानना आवश्यक है । यहां संक्षेपसे इसपर कुछ निरूपण किया जाता है । हिन्दुधर्मका मूलस्रोत - वेद हिन्दुधर्मका मूलस्रोत वेद है, उसके बाद उपवेद, फिर वेदके अङ्ग तथा उपाङ्ग । इनमें वेदके दो भाग हैं - एक मन्त्रभाग, दूसरा ब्राह्मणभाग । मन्त्रमाग में संहिताएँ होती हैं और ब्राह्मण-भागमें ब्राह्मणग्रन्थ, आरण्यक तथा उपनिषदें । मन्त्रभागात्मक वेदके चार भेद हैं -१ ऋ, २ यजुः, ३ साम और ४ अथर्व । इन चारोंकी संहिताएँ ११३१ होती हैं । इनमें ऋग्वेदकी २१ संहिताएँ होती हैं, जिनमें आजकल ' वाकल ' और ' शाकल ' ये दो संहिताएँ मिलती हैं । वाष्कल में अष्टक, अध्यायादि क्रम है और शाकल में मण्डल, अनुवाक आदि । शेष संहिताएँ लुप्त हैं । यजुर्वेद की १०१ संहिताएँ हैं । यजुर्वेदके दो भेद माने जाते हैं -१ शुक्ल और २ रा कृष्ण । इनमें शुक्ल यजुर्वेदकी १५ संहिताएँ हैं, उनमें केवल दो संहिताएँ मिलती हैं- १ वाजसनेयी, सनातन हिन्दुधर्मके आधारभूत शास्त्र और श्री काएव । शेष लुप्त हैं I । कृष्ण यजुर्वेद की ८६ संहिताएँ हो । हैं, इनमें चार मिली हैं —१ तैत्तिरीय संहिता, २ मैत्राय ३ काठक और ४ थी कठकपिष्ठल । शेष लुप्त हैं । सामवेदकी १००५ संहिताएँ हैं । उनमें आजकल दो मिली हैं -१ कौथुम श्र २ री जैमिनि । कुछ भाग राणायनीय - संहिताका भी मिलता है । अथर्ववेदकी ६ संहिताएँ हैं । इनमें आजतक दो मिली हैं-१ शौनक तथा २ री पैप्पलाद । यह सब मन्त्रभाग है । मन्त्रभागकी जितनी संहिताएँ होती हैं, ब्राह्मणभाग भी उतन ही होता है क्योंकि शब्द और अर्थ का नित्य सम्बन्ध हुआ करते है । अतः आरण्यक और उपनिषदें भी उतनी ही होती है । श्रौतसूत्र भी उतने ही तथा गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र और प्रातिशाख्य भी उतने ही होते हैं । ब्राह्मणभाग में ऋग्वेद के ' ऐतरेय ' और ' कौशीतकि ' यह दो ब्राह्मण मिलते हैं । ' ऐतरेयोपनिषद् ' आदि १० उपनिषदे • मिलती हैं । इनमें यह गवेषणीय है कि किस संहिताका कौनसा ' ब्राह्मण है । ' ऐतरेय ' और ' कौशीतक ' दो आरण्यक मिलते हैं । ' प्राश्वलायन ' और ' शाङ्खायन ' यह दो श्रौतसूत्र तथा इसी नाम दो गृह्यसूत्र हैं । इसका ऋक्प्रातिशाख्य भी होता है । यजुर्वेद में शुक्ल यजुर्वेद के माध्यन्दिन ' शतपथ ब्राह्मण ' और " कार - शतपथ ' यह दो ब्राह्मण मिलते हैं । ' कावसंहिता ' न बृहदारण्यक ' यह आरण्यक मिलता है । ' कात्यायन ' नामक श्रौतसूत्र और ' पारस्करगृह्यसूत्र ' मिलता है । ' गौतम - धर्मसूत्र ' मिलता है । शुक्लयजुः प्रातिशाख्य तथा ईश, बृहदारण्यक, जाबाल, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 33
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सनातन हिन्दुधर्मके आधारभूत शास्त्र ३६ हवाएँ हो मुक्तिका आदि उपनिषदें मिलती हैं । मैत्रायणी कृष्णयजुर्वेदका ‘ तैत्तिरीय ब्राह्मण तथा आरण्यक मिलता है । की १००: ' संत्याषाढ ', ' हिरण्यकेशी ', ' बौधायन ' आदि सात श्रौतसूत्र तथा थुम श्र ' ' आपस्तम्ब ', ' मानव ' आदि सात गृह्यसूत्र और ' बोधायन ', मिलता है । ' आपस्तम्ब ' यह दो ' धर्मसूत्र ' मिलते हैं । ' मनुस्मृति ' धर्मशास्त्र मिली हैं- मिलता है और ' तैत्तिरीय प्रातिशाख्य ' भी । ' कठ ', ' तैत्तिरीय ', ' श्वेताश्वतर ', आदि ३२ उपनिषदें मिलती हैं । भी उतर सामवेद के ' ताण्ड्य ', ' षड्विंश ', मन्त्र ब्राह्मण ' आदि ब्राह्मण हुआ करत हैं । आरण्यक पृथक नहीं मिलता । ' केनोपनिषद् ' ' छान्दोग्य ' होती हैं । आदि १६ उपनिषदें होती हैं । ' द्राह्मायण ', ' लाट्यायन ', ' मशकसूत्र ’ शाख्य सी आदि ३ श्रौतसूत्र तथा ग्रोमिल ', ' खादिर ', ' जैमिनीय ' यह ३ कौशीतकि गृह्यसूत्र हैं । धर्मसूत्र नहीं मिलते । ' सामप्रातिशाख्य ' मिलता है । उपनिषदें अथर्ववेदका ' गोपथ ' ब्राह्मण मिलता है । यह ' पैंप्पलादसंहिता ' का कौनस का है । अन्य लुप्त हैं । आरण्यक नहीं मिलता । ' प्रश्न ', ' मुण्डक ', मलते हैं । ' माएडूक्य ' आदि ३१ उपनिषढ़ें हैं । ' वैखानसे ' एवं ' वाराह ' सी नामके गृह्यसूत्र मिलते हैं । धर्मसूत्र नहीं मिलता । ' अथर्व प्रातिशाख्य ' मिलता है । ' और उपवेद और अङ्ग हिता ' का जैसे वेद चार प्रकारका होता है, वैसे उपवेद भी - १ आयुर्वेद, ' नामक २ धनुर्वेद, ३ गान्धर्ववेद और ४ र्थ अर्थवेद | ' आयुर्वेद ' का सम्बन्ध धर्मसूत्र ' अथर्ववेदसे, ' धनुर्वेद ' का यजुर्वेदसे, ' गान्धर्ववेद ' का सामवेदसे जाबाल, और ' अर्थवेद'का ऋग्वेदसे सम्बन्ध होता है । आयुर्वेदादिकी CC - 0. Ankur Joshi Collection मी फिर बहुत सी संहिताएँ होती हैं, जैसे सुश्रुत चरक, भेल, काश्यप आदि । वेदके अङ्ग छः होते हैं- १ शिक्षा, २ कल्प, ३ व्याकरण, ४ निरुक्त, ५ छन्द और ६ ज्यौतिष । इनमें ऋग्वेद की पाणि-निशिक्षा, कृष्णयजुर्वेद की व्यासशिक्षा, शुक्लयजुर्वेद की याज्ञवल्क्य आदि २५ शिक्षाएँ हैं । सामवेद की १ गौतमी, २ लोमशी और ३ नारदी शिक्षाएँ हैं । अथर्ववेदकी माण्डूकी शिक्षा है । गृहासूत्र, श्रौतसूत्र आदि कल्प होते हैं । उनका निरूपण पहले हो चुका है । पृथक् भी कल्प मिलते हैं - १ नक्षत्रकल्प २ संहिताकल्प, ३ आङ्गिरसकल्प, ४ शान्तिकल्प, ५ वैतानकल्प आदि । कल्पमें बेदमन्त्रोंका विनियोग मिलता है । व्याकरण तथा प्रातिशाख्य भिन्न - भिन्न वेदोंके भिन्न - भिन्न हुआ करते थे । पाणिनिका व्याकरण यजुर्वेदसे सम्बद्ध प्रतीत होता है । इस प्रकार शाकल्य आदिके भी बहुत से व्याकरण थे । इसी प्रकार निरुक्त भी भिन्न - भिन्न संहिताओं के भिन्न - भिन्न थे । यास्क्रका निरुक्त ऋग्वेदकी वर्तमान में प्रचलित शाकलसंहिताका नहीं, किन्तु किसी अन्य संहिताका है क्योंकि निरुक्तमें व्याख्यात ऋकुमन्त्रोंका वर्तमान ऋग्वेदसंहितासे पूरा मेल नहीं दीखता । शाकपूणि आदिके भी निरुक्त थे, जिनका नाम इस निरुक्तमें ता है । छन्दः - शास्त्र भी भिन्न - भिन्न वेदोंके भिन्न - भिन्न हो सकते हैं, पिङ्गलादिमुनिप्रणीत छन्दोग्रन्थ कुछ मिलते भी हैं । ' उपनिदानसूत्र ' Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 34
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नामक सामवेदका छन्दोग्रन्थ उपलब्ध है । ज्यौतिषके भी भृगुसंहिता, बृहत्संहिता, सूर्यसिद्धान्त, सिद्धान्तशिरोमणि आदि मिलते हैं, पर इनमें किसका किस वेदसंहितासे सम्बन्ध है, यह पता नहीं लगता । यह वेदके अङ्ग हैं । वेदके उपाङ्ग चार हैं- ( १ ) पुराण, ( २ ) न्याय, ( ३ ) मीमांसा और ( ४ ) धर्मशास्त्र । पुराण से पुराण, उपपुराण, औपपुराण, तन्त्रशास्त्र, रामायण एवं महाभारत यह इतिहास गृहीत होते हैं । न्याय शब्दसे न्याय, वैशेषिक, साङ्ख्य, योग, ये दर्शन गृहीत होते हैं । मीमांसासे पूर्वमीमांसा ( मीमांसादर्शन, उसमें भी कर्ममीमांसा तथा दैवतमीमांसा ) और उत्तरमीमांसा ( वेदान्तदर्शन ) यह न्याय आदि छः दर्शन गृहीत होते हैं । धर्मशास्त्रसे धर्मसूत्र तथा स्मृतियां गृहीत होती हैं । इनमें प्रथम उपाङ्ग पुराण १८ होते हैं - ( १ ) ब्रह्म, ( २ ) पद्म, ( ३ ) विष्णु. ( ४ ) शिव या वायु. ( ५ ) लिङ्ग, ( ६ ) गरुड, ( ७ ) नारद, ( ८ ) भागवत, ( ६ ) अग्नि, ( १० ) स्कन्द, ( ११ ) भविष्य, ( १२ ) ब्रह्मवैवर्त, ( १३ ) मार्कण्डेय, ( १४ ) वामन, ( १५ ) वाराह, ( १६ मत्स्य, ( १७ ) कूर्म और ( १८ ) ब्रह्माण्ड । वेदके उपाङ्ग पुराणोंमें वेदके कठिन विषय ( १ ) समाधिभाषा, ( २ ) परकीया वा ( ३ ) लौकिकी भाषा एवं गाथा आदिसे बहुत सरल कर दिये गये हैं । पुराण-ज्ञान अनादि है, श्रीवेदव्यास उनके सम्पादक वा परिष्कारक हैं । रचना उनकी पौरुषेय है । पुराणों में वेद ' गागर में सागर ' की तरह समाये हुए हैं, इनमें वेदका सम्पूर्ण तत्त्व आ गया है । सनातन हिन्दुधर्मके आधारभूत शास्त्र उपपुराण मी १८ होते हैं - ( १ ) आदि - पुराण, ( २ ) नरसिंह पुराण, ( ३ ) स्कन्दपुराण, ( ४ ) शिवधर्मपुराण, ( ५ ) दुर्वासः पुराह ( ६ ) नारदीय - पुराण, ( ७ ) कपिलपुराण, ( ८ ) वामनपुराण, ( १ मद्देश्वरपुराण, ( १० ) औशनसपुराण, ( ११ ) ब्रह्माण्डपुराण, ( १ वरुणपुराण, ( १३ ) कालिकापुराण, ( १४ ) साम्त्रपुराण, ( १४ ) सौरपुराण, ( १६ ) पाराशरपुराण, ( १७ ) मारीचपुराण और ( १६ ) भास्करपुराण | पपुराण भी १८ होते हैं - ( १ ) सनत्कुमारपुराण, ( ) बृहन्नारदीयपुराण, ( ३ ) आदित्यपुराण, ( ४ ) मानवपुराण ( 2 ) नन्दिकेश्वरपुराण, ( ६ ) कौर्म, ( ७ ) भागवत, ( ८ ) वसिष्ठ, ( i ) भार्गव, ( १० ) मुद्गल, ( ११ ) कल्कि पुराण ( १२ ) देवीपुराण, ( १३ ) महाभागवत, ( १४ ) बृहद्धर्म, ( १५ ) परानन्द, ( १६ ) पशुपति, ( १७ ) हि तथा ( १८ ) हरिवंशपुराण । • पुराणों में तन्त्रग्रन्थों का भी समावेश हो जाता है । तन्त्रशास्त्रों भी वेदों के विषय विभिन्न अधिकारियोंके लिए बतलाये गये हैं । इनमें आचार, उपासना, ज्ञान, मन्त्र, हठ, लय आदि योग आयुर्वेद वाजीकरण आदिके गुप्त योग, भूतविद्या, रसायन ' आदि सभी विद्याएं और ज्यौतिषके रहस्य स्पष्ट किये गये हैं । तन्त्र के परोक्षरूपसे कहे गये कई तत्त्व अतिशयित गूढ हैं । उनकी परिभाषाओं के ज्ञानके बिना वे अश्लील प्रतीत होते हैं, परन्तु उनकी परिभाषाएं मेरुतन्त्र, महानिर्वाणतन्त्र, आगमसार, हठयोग प्रदीपिका आदिसे जाने बिना वे अश्लील प्रतीत होते हैं, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 35
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 1 नरसिंह किन्तु उनकी परिभाषा जानने पर अत्यन्त आनन्द आता है । सि: पुराए दत्तात्रेय, कुलार्णव, कालीतन्त्र आदि बहुतसे तन्त्रप्रन्थ होते हैं । ( वेदके उपाङ्गोंमें दूसरा भाग इतिहास है । इनमें मुख्यतः TE ) B ( रामायण, महाभारत लिये जाते हैं । इनमें ' रामायण ' आदिकवि . ( १ ) श्री वाल्मीकिकी आदिम मधुर रचना है, इसमें श्रीरामावतारका और ( १६ ) विवरण है । इसकी पद्यसंख्या २४ हजार है । दूसरा है ' महा-भारत ', यह एक लाख पद्योंका है । इसमें १८ पर्व हैं । इसमें राण, ( २ ) • हिन्दुधर्म के सभी विषय इतिहास द्वारा व्याख्यात कर दिये गये हैं । राण ( 2 ) वेदका तीसरा उपाङ्ग न्याय - मीमांसा होता है । इसमें ६ दर्शन सेष्ठ, ( 1 ) आ जाते हैं यह हम पहले बतला चुके हैं । इनमें १ सांख्यदर्शन श्रीकपिल मुनि से प्रणीत है । इसमें प्रकृति- पुरुषका वर्णन है । , ( १३ ) नति, ( १७ इस पर विज्ञानभिक्षुका भाष्य है । २ योगदर्शन - इसके कर्ता ) श्रीपतञ्जलिमुनि हैं । इस पर व्यासभाष्य है । इसमें योगकी न्त्र शाखमें ग्रन्थियाँ सुलझायी गयी हैं । ३ वैशेषिकदर्शन -- इसके प्रणेता श्रीकरणादमुनि हैं; प्रशस्तपादका माध्य है । इसमें संसारको छः ये हैं । भागों में विभक्त करके उसका विवरण किया गया है । ४ न्याय-दियोग दर्शन - इसमें १६ पदार्थोंका तत्त्वज्ञान विषय है । श्रीगौतम मुनि रसायन प्रणेता हैं । श्रीवात्स्यायन मुनिका इस पर भाष्य है । ५ मीमांसा-गये हैं । दर्शनके श्रीजैमिनिजी कर्ता हैं, वैदिक कर्मकाण्डकी मीमांसा इसका गूढ़ हैं । विषय है । भाष्य इस पर श्रीशबराचार्यका है । ६ वेदान्तदर्शन-होते I हैं, इसके कर्ता श्रीवेदव्यास हैं । इसमें जीव ब्रह्मकी अद्वैतता पर नागमसार विचार किया गया है । इस पर श्रीशङ्कराचार्य स्वामी, श्रीरामानुजा-होते हैं CC - 0. Ankur Joshi Collection सनातन हिन्दुधर्मकै आधारभूत शास्त्र ४३ चार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीवल्लभाचार्य श्रादिके माध्य मिलते हैं । अन्तिम वेदका उपाङ्ग है धर्मशास्त्र । इसमें धर्मसूत्र तथा स्मृतियाँ अन्तर्भूत होती हैं । इनमें १ गौतम, २ वसिष्ठ, ३ आप-स्तम्ब, ४ बोधायन आदि धर्मसूत्र मिलते हैं । स्मृतियाँ भी बहुत होती हैं, जितनी वेदसंहिताएँ हैं, उतने ही श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र तथा स्मृतियाँ होती हैं । धर्मके सूत्रण ( संक्षेप ) का नाम धर्मसूत्र है, वेदार्थके स्मरणका नाम स्मृति होता है । इनमें १ मनुस्मृति, २ वृद्धमनु, ३ अङ्गिरःस्मृति, ४ अत्रि, ५ आपस्तम्ब, ६ औशनस, ७ कात्यायन, ८ गोभिल ( प्रजापति ), ६ यम, १० बृहद्यम, ११ लघुविष्णु, १२ बृहद्विष्णु, १३ नारद, १४ शातातप, १५ हारीत, १६ वृद्धहारीत, १७ लघु - आश्वलायन, १८ शंख, १६ लिखित, २० शंख - लिखित, २१ याज्ञवल्क्य, २२ व्यास, २३ संवर्त, २४ अत्रिसंहिता, २५ दक्षस्मृति, २६ देवल, २७ बृहस्पति, २८ पराशर, २६ बृहत्पराशर, ३० कश्यपस्मृति, ३१ गौतमस्मृति, ३२ वृद्धगौतम, ३३ वसिष्ठस्मृति, ३४ पुलस्त्य, ३५ योगियाज्ञवल्क्य, ६६ व्याघ्रपाद, ३७ बोधायन, ३८ कपिल, ३६ विश्वामित्र, ४० शाण्डिल्य, ४१ कण्व, ४२ दाल्भ्य, ४३ मारद्वाज, ४४ मार्कण्डेय, * ४५ लौगाक्ष, आदि ६० स्मृतियाँ मिलती हैं । स्मृतियों में आचार, संस्कार, वर्णधर्म, वर्णसङ्करधर्म, स्त्रीधर्म, पुरुषधर्म, राजधर्म, प्रायश्चित्तादि बहुत विषय आये हैं । न्यायदर्शन. के भाष्यकार श्रीवात्स्यायन मुनिने लिखा है कि - ' यदि धर्मशास्त्र न हों, तो लोकव्यवहारका उच्छेद हो जाय ' यह ठीक है । विधि-Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 36
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदस्वरूपनिरूपण ४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) निषेध सब स्मृतियों से ज्ञात होते हैं । वेद, स्मृति एवं पुराणके विरोधमें वेद अधिक माननीय हैं । स्मृति और पुराणके विरोध में स्मृति अधिक माननीय है । पुराण प्रधानता से लोकवृत्तका प्रतिपादन करते हैं, लोकव्यवहारकी व्यबस्थापना उनका प्रधान विषय नहीं । लोकव्यवहारकी व्यवस्थापना धर्मशास्त्रका मुख्य विषय है । इस प्रकार यह सारा साहित्य मिलकर हिन्दुधर्मका आधार बनता है । ( ५ ) वेदस्वरूपनिरूपण ( ब्राह्मणभाग भी वेद है । ) हिन्दुधर्म - सनातनधर्मंका स्वरूप तथा प्राचीनता एवं महत्ताका निरूपण करके अब हम उसके मूल आधारका निरूपण करते हैं । उसका मूल आधार सम्पूर्ण वेद ही है, जैसेकि मनुजीने कहा है-' वेदोऽखिलो धर्ममूलम् ' ( २२६ ) पर जब तक उस वेदकी इयत्ताका निर्धारण न हो जावे; तब तक इस धर्मका पूर्णज्ञान कैसे हो सकता है? यदि केवल वर्तमान वेदकी चार पोथियोंको वेद माना जावे; तो उनमें हिन्दुधर्मके सभी सिद्धान्त उपलब्ध नहीं हो सकते । इसी कारण प्राचीन ऋषि - मुनियोंका सृष्टिके आरम्भ वैदिककाल से ही यह सिद्धान्त था कि ११३१ संहितात्मक मन्त्रभाग, तथा उतना ही ब्राह्मणभाग - जिसमें उपनिषद् तथा आरण्यक भी आजाते हैं - यह दोनों भाग मिलकर ही वेद हुआ करता है । इन दोनों भागोंसे एक - दूसरेकी पूर्ति होकर सम्पूर्ण धर्मका लक्षण बन जाता है ।. पर आजकल वेदका स्वरूप वा परिमाण कितना है - इस सम्बन्ध में बड़ी भ्रान्ति चालू है । आजकल आर्यसमाज के प्रचार लोग यह समझते हैं कि- “ ऋग्वेदसंहिता, यजुर्वेदसंहिता, सामवेद संहिता, अथर्ववेदसंहिता नामक जो चार पोथियाँ आजकल सर्व साधारणतया मिलती हैं - यही चार वेद हैं । अन्य काण्वसंहित आदि उपलब्ध तथा अनुपलब्ध उनकी ११२७ शाखाएँ हैं । वे के भ नहीं । इनसे भिन्न शतपथ ब्राह्मण आदि तथा उपनिषद् आरएस आदि जो ब्राह्मणभाग हैं - वह भी वेद नहीं । " पर इस मह च वास्तविकता नहीं । वास्तविकता यह है कि - ११३१ संहिता, उतने त्रा ब्राह्मण ( जिसमें उपनिषद् तथा आरण्यक भी सम्मिलित हैं ) यह ब्रा वेद हैं । उनमें ११३१ संहिता चार वेद हैं- इस विषय में हम कु ' हैं निरूपण ' वेदविषयमें भारी भूल, तथा ' श्रीपतञ्जलि एवं ' शन्नोदे मिष्टये ' मन्त्र, इन दो निबन्धों में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के चतुर्थ पुप्पो कर चुके हैं; कुछ अग्रिम पुष्प में करेंगे । अब इस पुष्पमें ह ( १ । ' ब्राह्मणभाग भी वेद है ' इस विषय पर विवेचना देंगे । इसे ग्रह सिद्धिसे हिन्दुधर्म सनातनधर्मके स्वरूपकी सिद्धि है । पाठक गय विषयको ध्यानसे देखें । हमारा यह निबन्ध अंशतः संस्कृत में लक्ष् दायक वेङ्कटेश्वर प्रेस कल्याण - बम्बई में प्रकाशित सायणभाष्यांपेत शत इस ब्राह्मणकी प्रस्तावना में भी छप चुका है । जैसे मन्त्रभाग बेदके होने से वेद है, वैसे ब्राह्मणभाग भी वेदके भाग होनेसे वेद है । पर इस वाच $ ‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' ४ थं पुष्पका मूल्य २ ) है, पाठक हमसे चारों सकते हैं । चारों पुष्पों का मूल्य ८ ) है । मँगानेका पता - श्रीनारायण इस न सारस्वतः, फर्स्ट बी. १६ लाजपतनगर, नई देहली १४, यह है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 37
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) प्रचार आजकल कई विद्वान् मन्त्रभागमात्रको वेद मानते हैं, ब्राह्मण-सामवेद भागको वेद नहीं मानते । हम उनका पक्ष भी देंगे और उसपर जकल सरे विवेचना भी देंगे । कावसंहि ( २ ) आजकल के कई अनुसन्धाताओंका विचार है कि -मन्त्र-हैं । वे के भागही केवल वेद है; ब्राह्मणभाग नहीं । इसमें दो प्रमाण वे देते आरए हैं 1 । ( क ) पहला प्रमाण अष्टाध्यायीका सूत्र है- ' छन्दो - ब्राह्मणानि इस मतरे च तद्विषयाणि । ( ४/२/६६ ), उनका यह अभिप्राय है कि यदि इवा, उतने ब्राह्मणभाग भी वेद होता; तो उक्त पाणिनिसूत्र में ' छन्दः’के ग्रहणसे हैं यह ब्राह्मणभागका भी स्वयं ग्रहण हो जाता; क्योंकि - छन्द वेदको कहते में हम ' हैं; तब ब्राह्मणभागको पृथक् क्यों कहा गया? पृथक् ग्रहणसे ही = ' शन्नोदेवं सिद्ध हुआ कि ब्राह्मणभाग वेद नहीं है । ( ख ) दूसरा प्रमाण है चतुर्थ पु गोपथका वचन - ' एवमिमे सर्वे वेदा निर्मिताः " ' सब्राह्मणाः । पुष्प में ( १।२११० ) । यदि ब्राह्मणभाग वेद होता; तो ' वेद ' शब्दसे उसका । इसी ग्रहण होजाता; फिर उससे पृथक् ' ब्राह्मण ' का ग्रहण क्यों किया पाठक गया? पृथक् कहनेसे यही सिद्ध होता है कि- ब्राह्मणभाग वेद नहीं । " ऊत में ल ( क ) इसपर यह स्मर्तव्य है कि- ' वेद ' वा ' छन्दः ' शब्द समु-पित शतप दायवाचक शब्द होता है | जैसेंकि- ' ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि ' ( ७ | १ | २ ) लग वेदके इस छान्दोग्यके वचन में, अथवा ' वेदानधीत्य वेदौ वा ' ( ३२ ) - है । पर इस मनुके पद्यमें I । इनमें वेद शब्द सब संहिताओं तथा ब्राह्मणों का वाचक है । नहीं तो ' ऋग्वेदसंहितामध्येमि ' ऐसा पाठ होता । क्योंकि हमसे चारों आजकलकी वेदकी पोथियाँ ' ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ' नारायण इस नामसे नहीं मिलतीं, किन्तु ऋग्वेदसंहिता, यजुर्वेदसंहिता, सामवेद-CC - 0. Ankur Joshi वेदस्वरूपनिरूपण 20 Collection Gujarat. संहिता, अथर्ववेदसंहिता- इस नामसे मिलती हैं । ( अ ) परन्तु समुदायवाचक शब्द श्रवयववाची भी हुआ करता है । जैसे कि महाभाष्य पस्पशाह्निकमें कहा है - समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता श्रवयवेष्वपि वर्तन्ते, पूर्वे पञ्चालाः, उत्तरे पञ्चालाः, घृतं भुक्तम्, ' तैलं भुक्तमित्यादि ' । ' घृत ' सारे समुदायका नाम है पर ' घी खाया ' से ' सारे संसारका घृत खाया ' अर्थ न होकर ' घीका अवयव खाया ' यह अर्थ होता है | यही वेदान्तदर्शनके ३ ३ ६ सूत्र के शाङ्करभाष्य-में भी कहा गया है - ' समुदायेषु हि प्रवृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि प्रवर्तमाना दृष्टाः पटग्रामादिषु ' इति । तब समुदायवाचक ' छन्द ' शब्द अथवा ' वेद ' शब्द अवयव-वाचक भी होजाने से केवल मन्त्रमागका भी वाचक होजाता है, केवल ब्राह्मणभागका भी, दोनोंका वाचक भी होजाता है । अब यह वक्ताको इच्छापर अवलम्बित है कि वह समुदायशब्दको अवयवपरक रखे, वा समुदायपरक । अवयववाचक रखनेपर भी उसकी समुदाय-वाचकता में क्षति नहीं पड़ती । जैसे कि - ' वाम्शसो: । ( ६४ | ८० ) इस पाणिनिसूत्रसे ' स्त्री ' शब्दके अम्में ' स्त्रियम, स्त्रीम् ' यह दो प्रयोग बनते हैं । अब यह प्रयोक्ताकी इच्छा पर है कि वह केवल ' स्त्रियम् ' लिखे, वा ' स्त्रीमू ' लिखे, वा दोनों लिखे । प्रयोग इसके दो ही रहेंगे । इस सिद्धान्त के अनुसार श्रीपाणिनिने ' छन्दो-ब्राह्मणानि च ' इस सूत्र में ' छन्द ' शब्दको केवल मन्त्रभागका वाचक रखा है । ( आ ) जैसे श्रीपाणिनिने यहाँ ' छन्द ' को केवल मन्त्रभागवाचक An eGangotri Initiative
पृष्ठ 38
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
85 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वदस्वरूपनिरूपण रखा है, वैसे ही उन्होंने ' मन्त्रे श्वेतवह ' - ( ३।२।७१ ) ' विजुपे छन्दसि ' ( ३२/७३ ) यहाँपर ' छन्दको केवल ब्राह्मणभागवाचक भी रखा है; क्योंकि - मन्त्रभागकी अनुवृत्ति तो ७१ सूत्र से आ ही रही है । फिर ७३ सूत्रमें ' छन्द ' ( वेद ) का नाम क्यों रखा? इसीसे वह ( छन्द ) स्पष्टतया ' ब्राह्मणभाग ' का वाचक हुआ; नहीं तो मन्त्रभाग भी वादी के अभिमतानुसार फिर ' छन्द ' ( वेद ) न रहेगा । इसी कारण इस सूत्रकी काशिका में कहा है- ' छन्दोग्रहणं ब्राह्मणार्थम् ' । स्वा ॰ दयानन्दजीने भी ' आख्यातिक ' ३२५ पृष्ठमें ऐसे ही माना है । ( इ ) इस प्रकारका पाणिनिका अन्य सूत्र भी है- जुष्टार्पि ' च च्छन्दसि ' ( ६।१।२८६ ) ' नित्यं मन्त्रे ' ( ६।१।२१० ) इस सूत्र में भी श्री पाणिनिने छन्द ' को केवल ब्राह्मणभागवाचक रखा है, क्योंकि अग्रिम ' नित्यं मन्त्रे ' सूत्रमें ' मन्त्रभाग'का नाम साक्षात् तो आ ही गया है । तब यदि ' छन्दो- त्राह्मण नि ' ( ४/२/६६ ) इस पाणिनिसूत्र में ' छन्द ' से पृथक् ' ब्राह्मण ' ग्रहण करनेपर ब्राह्मणभाग वाद के अनुसार वेद नहीं; तब हमारे बताये पाणिनिसूत्रमें भी ' छन्द ' से पृथक् ' मन्त्र ' ग्रहण करनेसे वादीके मतानुसार मन्त्रभाग भी वेद नहीं रहेगा । दोनों स्थान समान ही उत्तर रहेगा । फिर तो वादीके मत में ' अथर्ववेदे वेदे च बभूवर्षिः सुनिष्ठितः ' ( अनुशासन ० १०/३७ ) इस महाभारतके वचनमें भी वेदसे पृथक् गृहीत अथर्ववेद वेद नहीं रहेगा । क्या वादीको ऐसा स्वीकृत है? ( ई ) ' छन्दोत्राह्मणानि ' जैसा पाणिनिका अन्य सूत्र भी है-‘ तनादि - कृन ्मभ्य उः ' ( ३ || ७६ ), तनादि धातुओं में कुन धातु मी P CC - 0. Ankur Joshi Collection आती है, फिर भी श्रीपाणिनिने इस सूत्र में उसे तनादिसे पढ़ा है 1 । तो क्या वादीके अनुसार अब कृ धातु तनादि पृ नहीं रहेगी? पृथक् रखनेसे उसकी तनादिता नष्ट नहीं हो रही, कि विशेषता व्यक्त हो रही है । इसी प्रकार ' छन्दो ब्राह्मणानि च भी ' छन्द'से पृथक् पढ़े हुए ' ब्राह्मण'का छन्दस्त्व ( वेदत्व ) नष्ट नह हो रहा; किन्तु उसकी विशेषता व्यक्त करने के लिए उसे । पृथकर गया है । तभी तो उक्त - सूत्रकी काशिकावृत्ति में कहा गया है-‘ ब्राह्मणग्रहणं किम्, यात्रता छन्द एव तद् ' [ जब ब्राह्मण मी छन्द ( है; तब उसे पृथकू क्यों कहा गया? ] इस पर उत्तर दिया गय है— ' ब्राह्मण - विशेषप्रतिपत्त्यर्थम्, इह तद्विषयता मा भूद् - याज्ञवल्क्येर प्रोक्तानि ब्राह्मणानि याज्ञवल्कानि ' । ( उ ) उक्त ‘ ' छन्दो - ब्राह्मणानि ' सूत्र पर वैयाकरणमूर्धन्य श्रीकैयटरे • मी १ ३ | १० सूत्र के महाभाष्य- प्रदीपमें कहा है- ' गोबलीवर्दन्यायेर छन्दः शब्देन मन्त्राणां ग्रहणम्, यथा- ' जुष्टार्पिते च छन्दसि ' इि [ सूत्रे छन्दः पदेन ] ब्राह्मणानां ग्रहणम्, ' नित्यं मन्त्रे ' इति मन्त्र प्रहणात् छन्दोग्रहणेनैव तु ब्राह्मणानां ग्रहणे सिद्धे ब्राह्मण विशेष प्रतिपत्त्यर्थं पुनर्ब्राह्मणग्रहणं कृतम् । तेन याज्ञवल्कानि ब्राह्मणान इति तद्विषयता न भवति ' । इसका भाव यह है कि जैसे ' गावोदि समागताः, बलीवर्दोपि समागत: ' इस भिन्न वाक्य में कहने से बलीवर्द ' गो ' से भिन्न नहीं हो जाता, ' गो ' भी वैलको कहते हैं । * ‘ प्रकृत’में ‘ तनादिभ्यस्तथासोः ' यह सूत्र नहीं लगेगा ' – ऐसा प्रयोक ताना व्यर्थ है क्योंकि इसके लगनेपर भी कोई रूपहानि नहीं होती । ४ स ० ध ० Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 39
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५० ' बलीवर्द ' भी वैलको ॥ केवल विशेषता बतानेके लिए ' बलीवर्द ' को अलग कहा जाता है, क्योंकि बलीवदं बड़े बैल ( सांड ) को कहते हैं; ( अब पहले वाक्यमें ' गो ' शब्द सांडसे भिन्न साधारण बैल के लिए रहेगा ) वैसे ही ' छन्दो ब्राह्मणानि ' सूत्र में भी जान लेना चाहिये । इस विषय में एक न्याय है- ' विशेषवाचकपद - सन्निधाने सामान्यवाचकपदानां तद्विशेपातिरिक्तपरत्वम् '! सो सामान्य शब्द है यहां ' छन्द ' शब्द | वह दोनोंका नाम है; पर विशेष - वाचक शब्द-' ब्राह्मण ' जब यहां आया है; तब ' छन्द ' शब्द केवल यहां ( सर्वत्र नहीं; सर्वत्र तो ' छन्द ' शब्द मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंका वाचक रहेगा ) मन्त्रभाग - वाचक रहेगा; अन्यत्र दोनोंका वाचक । इससे हमारे पक्ष की कुछ भी हानि नहीं । ( ऊ ) उक्त स्थल पर श्रीनागेशभट्टने भी लिखा है- ' गोबलीवर्द-न्यायेन इति ब्राह्मणवसिष्ठ- न्यायस्य उपलक्षणम् ' अर्थात् – ' त्राह्मणा अपि श्रयाताः, वसिष्ठोपि आयात: ' ब्राह्मण भी आगये हैं, वसिष्ठजी भी आ गये हैं; इससे वसिष्ठजी ब्राह्मणोंसे भिन्न सिद्ध नहीं होते, किन्तु अन्य ब्राह्मणोंसे वसिष्ठजीकी विशेषता बतानेकेलिए उन्हें पृथक कहा जाता है, और ' वसिष्ठ ' से भिन्न गृहीत ' ब्राह्मण ' शब्द उक्त स्थल में वसिष्ठभिन्न ब्राह्मणवाचक होता है, अन्यत्र सर्वत्र नहीं; वैसे छन्दोव्राह्मणानि ' में भी ब्राह्मणभागकी विशेषता बताने के लिए उसे छन्दसे पृथक् कहा जाता है, छन्दोऽभावता बतानेकेलिए नहीं; नहीं तो पाणिनिके अन्य सूत्रोंसे विरोध प्राप्त होता है । ( ख ) इसी प्रकार ' सर्वे वेदा निर्मिताः... सब्राह्मणा: ' इस गोपथके CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण १६ वचन में स्पष्टता के लिए या विशेषताकेलिए ब्राह्मणको पृथक कहा गया है । जैसे कि - ' वेदमध्यापयेद् द्विजः । सकल्पं सरहस्यं च ' ( २।१४० ) इस मनुक्रे पद्यमें वेद होते हुए भी उपनिषद् ( रहस्य ) को वेदसे भिन्न कहा गया है । इसीलिए श्रीकुल्लू क्रमट्टने लिखा है-' वेदत्वेपि उपनिषदां प्राधान्यविवन्या पृथङ् निर्देशः । अथवा यहां ' रहस्य ' शब्द सामान्यार्थक हो, उपनिषत्परक न हो - तब इस पद्यको उदाहृत नहीं किया जा सकता । ( ऋ ) गोपथके वचनमें जैसे ' वेद ' शब्द केवल मन्त्रभागका वाचक देखा गया है, वैसे केवल ' ब्राह्मणभाग का वाचक भी होता है । जैसे कि निरुक्तमें तेरेभ्यो..मन्त्रान् सम्प्रादुः । उपदेशाय ग्लायन्तोऽबरे... इमं ग्रन्थं समाम्नासिपुर्दे च वेदाङ्गानि च ( १ | २०१२ ) यहां पर ' मन्त्र ' पहले आ जाने से पीछे कहा गया ' वेद ' शब्द ' ब्राह्मण माग ' वाचक है; जैसा कि - श्रोसामश्रमीजीने भी अपने ' निरुक्तालोचन ' ( पृ ० २५ ) में माना है । इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मणभाग भी वेद है । ( ३ ) जैसे कि श्रीयास्कने ' ओषधे! त्रायस्वैन ' ( यजुः वा. सं. ४१, तै. सं. १ २।१।१ ) इस मन्त्रको निरुक्त ( १ । १६ । ६ ) में ' आम्नाय ' कहा है, वैसे ही ' रोहात् प्रत्यवरोहश्चिकीर्पित: ' इस ब्राह्मणको भी ‘ आम्नाय ' ( ७ । २४ । ४ ) कहा है । आम्नाय वेदमें रूढ है, इसे आजकल के आर्यसमाजी विद्वान् भी मानते हैं; उसमें ' स्वरो नियत आम्नाये ' अस्यवाम ' शब्दस्य ' ( ५३२ १५६ ) यह महाभाष्यकार का प्रमाण भी देते हैं; तव ब्राह्मणभाग भी आम्नाय ( वेद ) हुआ । Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 40
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ब्राह्मणभाग भी वेद है यह शब्द उसकेलिए औपचारिक भी नहीं है, जैसा कि कई आग्रही लोग कहने का साहस करते हैं । श्रीयास्क समाम्नाय निघण्टुको कहते हैं, उस निघण्टुके शब्द मन्त्र और ब्राह्मण दोनों में मिलते हैं । कई निघण्टुके शब्द यदि ब्राह्मणभाग में नहीं मिलते; तो बहुत ऐसे शब्द भी हैं जो वर्तमान मन्त्रभागकी चार पोथियों में भी नहीं मिलते । ( ख ) इस प्रकार निरुक्त ( २ | ३ | १ ) में ' तेनेदं पूर्वं पुरुषेण सर्वम् ' इत्यपि निगमो भवति, ( ३६ ) इस कृष्णयजुर्वेदीय श्वेताश्वतरो-पनिषद् के वचनको भी निगम ( वेद ) माना है । उपनिषद् ब्राह्मणभाग अन्तर्गत होती हैं । तब ब्राह्मणभाग भी ' निगम ' ( वेद ) सिद्ध हुआ । ( ग ) आर्यसमाजके प्रवर्तक स्वा ० दजी निगम वेदको मानते हैं । जैसे कि - ' छन्दो- वेद - निगम - श्रुतीनां पर्यायवाचकत्वात् । " " एवं ' श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयः ' इति मनुस्मृतौ, ' इत्यपि निगमो भवति ' इति निरुक्त, श्रुतिर्वेदो मन्त्रश्च, निगमो वेदो मन्त्रश्च इति पर्यायौ स्तः, ( ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पृ ० ८० ) ' तथा व्याकरणेपि - ' मन्त्रे घस, ‘ छन्दसि लुङ् ’ ‘ वा षपूर्वस्य निगमे ' अत्रापि छन्दो - मन्त्र - निगमाः पर्यायवाचिनः सन्ति । एवं छन्द - आदीनां पर्यायसिद्ध र्यो भेदं व्रते, तद्वचनमप्रमाणमेवास्तीति विज्ञायते ' ( ऋ ० भा भू ० पृ ० ८० ) यहां स्वा ० द ० जीने निगम तथा छन्दको वेद मानकर उनकी भिन्नता कहने वालेको अप्रमाण माना है । इस प्रकार सत्यार्थप्रकाशके सप्तम समुल्लासके अन्त ( १२७ पृष्ठ ) में भी ' इत्यपि निगमो भवति ' CC - 0. Ankur Joshi Collection इस निरुक्तके प्रतीकको उद्धृत करके स्वामीजीने निरुक्तस्थ ' निगम का अर्थ ' वेद ' माना है । तब जब ' निगम ' शब्द कह कर श्रीवास् जोकि ब्राह्मणभाग तथा उपनिषद्को उदाहृत किया है - इससे वादिप्रतिवादिमान्य श्रीयास्कके मतमें भी ब्राह्मणभाग वैद फलित हुआ । अब वे निरुक्तके उदाहरण उधृत किये जाते हैं - ( क ) असेल श्चिज्जनिवतश्चकर्थं, ग्नास्त्वाकृन्तन्न पसोतन्वतम् ' इत्यपि निगमौ भवतः ( ३।२१।२ ) यहाँ निरुक्तकार ' अमेनान् ' इस ऋग्वेदसं ० ( ४।१।२६ ) मन्त्रको जैसे निगम ( वेदप्रमाण ) कहते हैं, वैसे ही ' ग्नास्त्या ( १ | ८ | ६ ) इस ताण्ड्यब्राह्मणको कण्डिकाको भी समानतासे है ' निगम ' ( वेदप्रमाण ) शब्दसे कहते हैं । ( ख ) ' पीयति त्वो- ' ' नेगे दे॒वा नेमेऽसुराः । इत्यपि निगमौ भवतः । ( ३।२०१५ ) यहाँ श्रीयाको ' पीयति ' ( १।१४७१२ ) इस ॠ ० सं ० के मन्त्रकी तरह ' नेमे देवाः इस मैत्रेयी ब्राह्मणके प्रमारणको भी ' निगम ' कहा है । ( ग ) ' नोपरस्य विष्कुर्यात् ' इत्यपि निगमो भवति ( ३२ ) इस ब्राह्मण को भी निगर ( वेद ) माना है । जो यहाँ यह व्याज करते हैं कि - ' यहाँ यज्ञविषयक होने से ब्राह्मणको वेद कहा गया है, यज्ञपरिभाषा से अन्यत्र ब्राह्मण भाग वेद नहीं होता ' यह तो गलत है । निरुक्त क्या कल्पसूत्र है । कि- उसमें यज्ञ के विनियोग हों? निरुक्तमें तो वेदके कठिन शब्दों का निर्वचनमात्र ही है । ' ग्नास्त्वा ' आदि विधियाँ यज्ञगत भी नहीं । अथवा हों भी; तो मन्त्रभाग- ब्राह्मणभाग दोनोंका विषय ही यह है; यह हम आगे कहेंगे- तो ब्राह्मणभाग भी सदा ही वेद हुआ ॥ Gujarat. An eGangotri Initiative