सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 411–420

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 411–420

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८०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ८०१ किन्तु ' उत्तमाङ्ग ' माना जाता है, इसमें सारा संसार सम्मत है, न लें, वैसे ब्राह्मण दोषादियुक्त होता हुआ भी उत्तम है, उसके मारने जोपाँव पर सारा संसार भी मर जायगा । उसकी सर्व श्रेष्ठता का प्रमाण यह है कि उस मुखभागके काट देने पर पाद आदि सभी अङ्ग विषय गुर्दा और व्यर्थ हो जाते हैं! चलनसाधन - पांव आदिके कटने दिस्पृष्ट- पर कार्य में तो कुछ रुकावट हो सकती है, पर जीवन नष्ट नहीं २०७ ) में होता, यही उनका मुखसे घटिया होनेका प्रत्यक्ष प्रमाण है, मुख कतली जीवनका साधन होनेसे सर्वश्रेष्ठ है । तभी मुख -स्वरूप तथा मुखसे तिपक्षी उत्पन्न ब्राह्मणके अपराध करने पर भी उसका तिरस्कार तो भले ब तक ही हो, पर उसे मारा नहीं जाता, क्योंकि उसके मारनेसे सभी गया मरते हैं । इसी आशय से मनुजीने कहा है- ' न जातु ब्राह्मणं वस्तुको हन्यात् सर्वपापेष्वपि स्थितम् । राष्ट्रादेनं वहिष्कुर्यात् समग्रधन-नहीं मक्षतम् ' ( ८ | २८० ) । इसमें कोई पक्षपात भी नहीं । मुख वा सिरके पागल होनेपर भी उसे मारने पर सब मरेंगे । मुखकी सर्व-और श्रेष्ठताका कारण यह भी है कि जहां वह आंख, कान, नाक, उत्पन्न जीभ, त्वचा आदि ज्ञानेन्द्रियोंका केन्द्र है, वहां कर्मेन्द्रियोंमें उत्पन्न • प्रमुख वाक् भी उसीमें है, जिससे संसारका सारा व्यवहार उनपर चलता है । पांव केवल कर्मेन्द्रिय है, वह चलता है, उसमें न अशुद्ध कोई ज्ञान है, न अन्य कर्म, न स्वतन्त्रता, अतः वह उस मुखका प्रन्थ निम्नतम - सेवक है, अतः तदधीन है । नादि- ' ' मनुस्मृति ' में तो ब्राह्मणकी श्रेष्ठता मुखोत्पत्तिके कारण ता, ही मानी गई है, और मुखको अतिपवित्र माना गया है । जैसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वर्णव्यवस्था जन्मना ८०३ कि ' उत्तमाङ्गोद्भवाद् ज्यैष्ठ्यात्... सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः ' ( १ | ६३ ), ‘ तस्मान्मेध्यतमं त्वस्य मुखमुक्तं, स्वयंभुवा ' ( १/६२ ) ' ऊर्ध्वं नाभेर्यानि खानि तानि मेध्यानि सर्वशः ' ( ५।१३२ ) । तब इसमें वादिप्रतिवादिमान्य - श्रीमनुजीकी बात न मानकर ऐकदेशिक दृष्टिवाले प्रतिपक्षीकी बात कैसे मानी जा सकती है? फलतः मुख - श्रंग अशुद्ध नहीं, उसकी अन्तःस्थित लार आदि भी शुद्ध नहीं । ' महाभाष्य ' ( प्रत्याहारान्हिक ) में एक वार्तिक आया है — ' नाव्यपवृक्तस्य श्रवयवस्य तद्विधिर्यथा द्रव्येषु ' ( अभिन्न - अवयव भिन्न - अवयव जैसा नहीं माना जाता ) । इसपर भाष्यकारने दृष्टान्त दिया है- ' मांसं न विक्रेतव्यम्, तैलं न विक्रेतव्यम्, परम् अव्यपवृक्तं गावः सर्पपाश्च विक्रीयन्ते ' यह वचन उक्त - बात पर प्रकाश करता है । बल्कि लार आदि होनेपर भी जैसे मुख सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, वैसे ही ब्राह्मण सदोष होने पर भी अन्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ होता है । पांव गुणयुक्त होकर भी निम्न माना जाता है । मुख से जहां लार पैदा होती है, वहां उपदेश भी पैदा होता है, शब्द भी । मुखकी लारको भले ही अवर माना जाय, तथापि मुखसे निकला हुआ वचन मध्यम-कोटि है, उससे उत्पन्न उपदेश उत्तम कोटि है । इसी प्रकार परमात्माके मुखसे उत्पन्न ( मुखादग्निरजायत ) अग्निदेव सर्वश्रेष्ठ, मनुष्य - ब्राह्मण मध्यम, पर भूलोकमें मनुष्योंमें सर्वश्रेष्ठ, उस मुखसे उत्पन्न अज ( देखिए कृष्णयजुर्वेद तै ० सं ० ) अवर है, तब उससे उत्पन्न ब्राह्मणकी, लारके समान प्रतिपक्षिप्रोक्त श्रधमवा An eGangotri Initiative

पृष्ठ 412

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८०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सिद्ध न हुई । मुखमें लार हो सकती है, पर मुख लार नहीं । ब्राह्मणकी मुखसे उत्पत्ति बतलाई गई है, लारसे नहीं । ६ पू ० – ' उरुभाग भी आगे पीछे दोनों भागों में अशुद्ध ही है, आगे मूत्रक्लिन्न और पीछे मलक्लिन्न रहता है, उससे पैदा हुआ ( वैश्य ) भी कभी शुद्ध नहीं माना जाना चाहिये । इस तरह से मुख और ऊरुके मलिन भाग होनेसे मुखज और ऊरुज मलिन-ही होंगे, निर्मल नहीं । ' ६ उ ० – प्रतिपक्षी पहले ब्राह्मणको मुखज़ - ता के कारण निकृष्ट सिद्ध करना चाहता था, हमने उसका समाधान तो कर दिया, अव उससे प्रोक्तं वैश्य की निकृष्टताका समाधान किया जाता है । मूत्रेन्द्रिय तथा गुदेन्द्रिय ऊरुसे भिन्न संकीर्ण अंग हैं, अत: वे तो अन्त्यज - स्थानीय हैं । वे स्थान भी अन्त्यजकी भांति अस्पृश्य ही हैं, पर ऊरु तो असङ्कर अंग, अतएव शुद्ध अंग हैं । हां, मुख तथा बाहुकी अपेक्षा अवर अवश्य है, परन्तु पादज-शुद्रकी अपेक्षा अवर नहीं । जब ऊरु असङ्कीर्ण अंग है, तो वह ऊरु मलमूत्र - क्लिन नहीं हो सकता । मल गिरकर कभी भी ऊरु पर नहीं पड़ता, मूत्र भी । हां, पांव पर मूत्रादिके छींटे गिरनेकी आशङ्का रहती है, अतः पाद तो अशुद्ध हो सकता है, ऊरु नहीं । वस्तुतः पाद भी निम्न तो है और अशुद्ध भी, पर अस्पृश्य नहीं । इसी प्रकार शूद्र भी निम्न तथा अशुद्ध तो है, पर अस्पृश्य नहीं, किन्तु स्पृश्य है । हाँ, अपानादि - सङ्करस्थानीय अन्त्यज आदि तो जलसे स्नात होने पर भी अवश्य अस्पृश्य हैं, पर CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( घ ) 50x ०६ ऊरुके शुद्ध ( सङ्कीर्ण ) अंग होनेसे प्रतिपक्ष- प्रोक्त मलिनता हट गयी, अतः वैश्य भी स्वतः निकृष्ट नहीं । उसकी और शुद्र १० पू ० – यदि बाहुज ( क्षत्रिय ) बाहुमूलमें से पैदा हुए हों, द्वारा संस की तो वे भी प्रस्वेद - क्लिन्न स्थानसे पैदा होनेके ही हैं । " १० उ ० — बाहु कोई अस्पृश्य ( सङ्कर ) अंग उद्गम - स्थान भी नहीं । हाँ, बगल तो वैसी हो शरीर कारण निकृष्ट करनेकी संसार नि नहीं, पसीनेका उसीको व सकती है, अवश्य सङ्कीर्ण - अंग है, अतः कुछ अस्पृश्य है, पर बाहु असङ्कीर्ण परमात्मा अंग होनेसे स्पृश्य है, इस प्रकार बाहुज ( क्षत्रिय ) भी । क्षत्रियका कारण प जानता ह भुजा वा छाती से जन्म बतलाया गया है, बगलसे नहीं । उसकी धू ११ पू ० – “ रह गये वेचारे पादज, मनुष्य - अंगमें पाद ही | इससे वह एक ऐसी जगह है, जिसे लोग अपना सेव्य और आश्रयणीय ले समझ मानते हैं । ' त्वत्पादमूलं शरणं प्रपद्ये ' कहकर चरणोंमें ही प्रणाम उसकी स किया जाता है, चरणधूलिको ही ब्राह्मणादि सभी मस्तक पर है कि धारण करते हैं, चरणोदक ही दिया जाता है, मुखोदक और अपना ऊरूदक कभी नहीं । चरणोंको धो - धोकर पीते हुए लाखों आदमी मुखके ग्र देखे गये हैं, परन्तु घिस - घिसकर दाँतोंसे मैल इकट्ठा करके इस उसीको पानी से कुल्ला करके उसे मुखामृत बनाकर पीता एक भी अशुद्ध आदमी आजतक न देखा गया है और न सुना गया है । उस पवित्र पादसे पैदा हुआ ( शूद्र ) अपवित्र माना जाय — यह सभी की व्यासकी बुद्धिके बाहरकी बात है । " पवित्र ११ उ ० — प्रतिपक्षीने इतना प्रयत्न ब्राह्मणको न्यून करने बाता Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 413

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ३ ) ८०१ उसकी और शुद्रको उच्च सिद्ध करनेकेलिए किया है । जिस मुखको संसार श्रेष्ठ और वन्दनीय मानता है, जिस मुखसे सारे हुए हों, द्वारा शरीरकी शोभा वा जीवन है, उस मुखको वह अपवित्र सिद्ध निकृष्ट ठरनेकी असफल चेष्टा करता है, और जिस पाँवको सारा संसार निम्न मानता है, प्रकृतिने भी जिसको निम्न पद दिया है, नीनेका सीको वह पवित्र सिद्ध करना चाहता है । गुरु वा पिता, - वह परमात्माके चरणोंकी जो कि सेवा की जाती है, उसमें हम नी कारण पहले बतला चुके हैं कि आराधकको आराध्य सर्वोपरि यका | जानता है, उसके निम्न भागसे भी अपने आपको निम्न मानकर उसकी धूलि भी लेता है, उसका चरणोदक भी लेता है, पर दही इससे वह उसके चरणको उसके मुखसे श्रेष्ठ वा पवित्र नहीं णीय | समझ लेता, किन्तु उसके निम्न अंगसे भी अपनेको निम्न मानकर रणाम । उसकी सेवा करता है । वह उसके मुखको तो इतना उच्च मानता क पर है कि अपनी पहुँच वहाँ तक नहीं पाता; और उसका ग्रहण करना और | अपना अविनय वा धृष्टता मानता है, पर पुष्पमालाको उसी दमी मुखके ग्रीवाभागमें उसके सम्मानार्थ डालता है । इसके अतिरिक्त जो विष्णुके पादसे उत्पन्न हो, वह सभी भी अशुद्ध हो, यह भी आवश्यक नहीं । ' यह पवित्र है, यह अपवित्र उस है - इसमें शास्त्रका ही प्रामाण्य होता है, कोरे तर्कका नहीं । - यह सभी की हिंसा करनेवाले एवं मांसभक्षी भी शेरका तो चमड़ा पवित्र मानकर ' सिंहासन ' बन जाता है, वा उसे शरीर पर ओढ़ा बाता है, पर अहिंसक और क्षमाशील एवं तृणभक्षी भी गघेका CC - 0. Ankur Joshi ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( घ ) ८०७ Collection Gujarat. चमड़ा अपवित्र एवम् अव्यवहार्य ही माना जाता है । केवल शुद्रको शास्त्रने अशुद्ध माना है, विष्णुपादोत्पन्न गंगाको तथा पृथिवीको कहीं भी अशुद्ध नहीं कहा गया, पर पुरीपवाली पृथिवी भी, कुत्तेके मूत्र वा मद्यके बिन्दुसे मिश्रित गंगाजल भी, पवित्र नहीं रहता । " मुख पवित्र है, पर उससे पृथक हुआ थूक, लार, आँखका मल, नाकका मल, कानका मल पवित्र नहीं माने जाते, पर उस मुखसे उत्पन्न ब्राह्मण पवित्र माना जाता है, मुखके श्वासरूप वेदोंको शुद्ध माना जाता है । शुक्र शोणित मल हैं, पर तदुत्पन्न पुत्र सबको प्रिय होता है, उसका मुंह चूमा जाता है । गायका मुख अपवित्र होता है, पर गोमय, गोमूत्र अपवित्र नहीं माने जाते, गोदुग्ध अपवित्र नहीं । कौवेकी विष्ठा अपवित्र हैं, पर तदुत्पन्न पीपल वा बड़का वृक्ष पवित्र माना जाता है । कृमिकी लार अपवित्र है, पर तदुत्पन्न रेशम पवित्र माना जाता है । पङ्क ( कीचड़ ) अपवित्र है, पर उससे उत्पन्न पङ्कज ( कमल ) पवित्र हैं । इस प्रकार किसी पदार्थकी शुद्धाऽशुद्धतामें आगमका ही प्रामाण्य है, थोथी युक्तियों का नहीं । इसीलिए श्रीव्यासजीने ' महाभारत ' में पादोत्पन्न शूद्रको अशुद्ध मानकर उसके अन्न के खानेका निषेध लिखा है, और परमात्माके निःश्वासभूत वेदमें भी शुद्रका अनधिकार बतलाया है— ' शूद्राणामथ यो भुङ्क्ते स मुङ्क्ते.. पृथिवीमलम् ' ( अनुशासनपर्व १३५।५-६ ), ' शूद्रान्नवर्जनं धर्मः ' ( अनु ० १४१/३८ ), An eGangotri Initiative

पृष्ठ 414

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. 1 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 505 ' मन्त्रः शूद्र े न विद्यते ' ( शान्तिपर्व ६०/३७ ), ' न च तां ( रुक्मिणीं ) प्राप्तवान् मूढः ( शिशुपालः ) शूद्रो वेदश्रुतीमिव ' ( सभापर्व ४५।१६ ) । पर यह ध्यान रखना चाहिए कि पाँव यद्यपि ऊपरके अंगों की अपेक्षा निम्न है, अशुद्ध भी है, अतएव तदुत्पन्न शूद्र भी, तथापि पाँव तथा पाँवसे उत्पन्न शूद्रवरणे द्विजोंकी अपेक्षा निम्न वा अशुद्ध होने पर भी अस्पृश्य तो नहीं है, क्योंकि वह असङ्कीर्ण-अंग है, पर सङ्कीर्ण - अंग, जैसे बगल, गुदा, लिग आदि अस्पृश्य हैं, वैसे ही चाण्डाल आदि अन्त्यज भी वर्ण - साङ्कयँवश अस्पृश्य होते हैं । इसी अस्पृश्यता के कारण वर्ण - व्यवस्थाके उक्त मन्त्रमें स्पृश्योंमें अन्त्यजोंकी गणना नहीं की गई, क्योंकि वर्णको तो परमात्मा उत्पन्न करता है, प्रतिलोम - वर्णसङ्कर ( अन्त्यज़ ) को चातुर्वण्यँ ही एक - दूसरेकी सङ्करतासे पैदा करते हैं । सङ्कीर्ण - अंग शुद्ध किये जाते हुए भी अस्पृश्य ही रहते हैं । चार वर्ण असङ्कीर्ण - अंग होनेसे सङ्कीर्णो अन्त्यजोंकी अपेक्षा बहुत उत्तम हैं । अपान आदि अंग हमारे मलको बाहर डालकर श्रनेसे हमारे हिताधायक होते हुए भी, जलसे संशोधित होकर भी स्पर्श करने पर हमें अशुद्ध ही करनेवाले होते हैं, वैसे अन्त्यज भी । इस कारण अन्त्यज से स्पृष्ट होकर भी हमें अपनी शुद्धि करनी ही पड़ती है । परमात्माने वेद अग्नि आदि चार को दिये । इन्हें हम देवता, और आर्यसमाजी ऋषि - मनुष्य मानते हैं; इनमें एक भी स्त्री, शुद्र वा अन्त्यज नहीं । मन्त्रद्रष्टाओं में भी कोई शूद्र-CC - 0. Ankur Joshi ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( घ ) ८०६ Collection Gujarat. अन्त्यज ऋषि नहीं, कक्षीवान् शूद्र नहीं था, जैसा कि कहते हैं; इस विषयमें तृतीय पुष्प देखना चाहिए । तब वेदस्रष्टा परमात्मा शूद्रादिको कभी ब्राह्मणसदृश मानदाता नहीं हो सकता । मुखोदक अप्रयोज्य होनेसे तथा चरणोदक प्रयोज्य. होनेसे मुखकी अपवित्रता तथा पादकी उत्तमता नहीं हो जाती । + मुख तो शास्त्रीय - दृष्टिमें तथा लौकिक - व्यवहारमें भी उत्तम है, अतः इसे ' उत्तमांग ' कहा जाता है । पादको शुद्ध माननेवाले जल मुखसे पीना बन्द करके पैरोंसे पीना शुरू करदें, बा जलको मुखसे उच्छिष्ट करके भीतर न डालें, किन्तु सदा पाद-धूलिधूसरित ही जल पीयें, क्योंकि वे मुखोदकको शुद्ध और पादोदकको शुद्ध मानते हैं । अशुद्ध मुखको अशुद्ध जूता पहनायें, शुद्ध पाँवको शुद्ध पगड़ी । यदि वे कभी भी पादोदक नहीं पीते, किन्तु सदा मुखोदक ही पीते हैं, तो उनका अपना कथन उनके अपने - आपसे ही निरस्त हो गया । वस्तुतः इन तुच्छ - युक्तियोंमें कोई दम नहीं । मुखसे शब्द उत्पन्न होता है, उपदेश भी. गाली भी, लार भी । इसी प्रकार मुखसे अग्नि भी, ब्राह्मण भी तथा अज ( बकरा ) भी पैदा होता है, सो बकरा लारस्थानीय है, अग्नि, वेद - शब्दस्थानीय है और ब्राह्मण मुखोत्पन्न - उपदेशस्थानीय है, इसलिए उपदेशादि - कार्य भी ब्राह्मणके जिम्मे दिया जाता है. पाँवकेलिए नहीं । फलतः प्रतिपक्षीका यह तर्क कुतर्कमात्र है, उसके पक्षका साफल्यापादक नहीं An eGangotri Initiative

पृष्ठ 415

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 590 १२ पू०- - वेदोंमें या अन्यत्र यह लिखा नहीं मिला कि जो प्रथम ब्राह्मण - शूद्रादि मुख - पादादिसे उत्पन्न हुए, उनके नाम क्या थे, और उनकी वंश - परम्परा कैसे चली? यह सब मिथुन पैदा हुए थे या अकेले ही? मिथुन थे, तो उनका विवाह किसने कराया? विवाह विना की सन्तान अप्रामाणिक - सन्तान है— | इत्यादि अनेक विचार वर्णोंकी निरर्थक कल्पनाको निस्सार बना "ने देते हैं । " T १२ उ. - जब वर्णों की मुख- पादादिसे उत्पत्ति मान ली गई, तब आगे कोई कठिनाई नहीं रही । वेद कोई इतिहासका ग्रन्थ नहीं, जो यह सब लेखा - जोखा रखे । इतिहासमें भी यह सम्पूर्ण नहीं हो सकता कि सभीके नाम भी लिखे जायं । हां, , | पुराण- इतिहास इस विषय में संकेत देते हैं— उनके देखनेसे यह सब शङ्काएँ मिट सकती हैं । ' वायुपुराण ' में लिखा है - ' मिथुनानां महस्रं तु सोऽसृजद् वै मुखात् तदा । सहस्रमन्यद् वक्षस्तो न्द ' । मिथुनानां ससर्ज ह । सृष्ट्वा सहस्रमन्यत्तु द्वन्द्वानामूरुतः पुनः । र पयां सहस्रमन्यत्तु मिथुनानां ससर्ज ह ' ( ८ । ३७-४० ) । इस T श्कार ' विष्णुपुराण ' ( प्रथमांश ६।२१ ) में भी कहा है । I यही बात ' वैखानसधर्मप्रश्न ' में और भी स्पष्ट की गई है-ब्रह्मणो मुखाद् उद्भूता ब्राह्मणा ब्राह्मण्यश्च बभूवुः । तेषां गोत्रोत्पन्नाद् ब्राह्मण्यामसगोत्रायां विधिना समन्त्रकं गृहीतायां E:क दातो ब्राह्मणः शुद्धो भवेत् ' ( ३ | ११ | ३ ), तस्माद् अधो बाहुभ्या-युत्पन्नाद् क्षत्रियात् क्षत्रियायां विधिवज्जातः क्षत्रियः शुद्धः ' ( ५ ), CC - 0. Ankur Joshi ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( घ ) 511 " Collection Gujarat अधस्ताद् ऊरुभ्यामुत्पन्नाद् वैश्याद् वैश्यायां तथा वैश्यः शुद्धः ' ( ८ ), ' अथ पयामुत्पन्नात् शूद्रात् शूद्रायां न्यायेन शुद्रः शुद्धः ' ( ३ | १२ | १ ), ' तेषामेव सङ्करेण उत्पन्नाः सर्वे अनुलोमाद्याः सङ्कराः ' ( ३ | १२ | ३ ), ' शूद्राद् ब्राह्मण्यां चण्डालः, सीसकालायसाभरणो वर्धावद्धकण्ठः, कक्षे झल्लरीयुक्तः, यतस्ततश्चरन्, सर्वकर्म-वहिष्कृतः, पूर्वाहे ग्रामादौ वीथ्यामन्यत्रापि मलानि अपकृत्य बहिरपोहयति, प्रामाद् वहिदू रे स्वजातीयैर्निवसेत् । मध्यान्हात् परं ग्रामे न विशत्ययम्, विशेच्चेद् राज्ञा वव्यः ' ( ३ | १४ | ७-८-६ ) इत्यादि । उक्त - मिथुन सृष्टिके आदिमें उत्पन्न हुए, श्रतः श्रमैथुनयोनि होनेसे - यदि उनका वैध - विवाह न भी कराया गया हो, तब भी इनके स्वभावतः परमात्मा द्वारा मिथुन ( पति - पत्नीका जोड़ा ) किये जानेसे कोई दोष नहीं । फिर इनकी सन्तान मैथुन - योनि होनेसे उनकी संस्कारादि व्यवस्था वेद - सूत्रादिके अनुसार हुई । शुद्रोंका वेदादिमें अधिकार न होनेसे उनकी विवाहादि व्यवस्था अनादिसिद्ध - पुराणोंके मन्त्रादिके अनुसार हुई । इससे वर्णोंकी कल्पना निस्सार नहीं हो सकती । १३ पू. – ' वर्णाभिमानने आज हिन्दुजाति को छिन्न - भिन्न कर रखा है । हमारे वर्णाभिमान और अज्ञान की क्रूर वेदी पर ६ करोड़ हिन्दुओंका बलिदान हुआ और वह मुसलमान बन हिन्दुजाविकी दुर्दशा कर रहे हैं । ' १३ उ. - यह श्राक्षेप गलत है । इसी वर्णाश्रम व्यवस्थासे यह . An eGangotri Initiative

पृष्ठ 416

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८१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( घ ) 513 भारतवर्ष सुरक्षित रहा है और रहेगा भी । वर्णाश्रमसे हीन किये जाने पर यह इतना भी न रहेगा । वर्णाश्रमहीन - जातियां लुम हो गयीं । वहुतों का पता ही नहीं लगता । कईयों का इतिहास नाम - शेष ही मिलता है, पर सृष्टिके आरम्भसे आ रही हुई हिन्दुजातिकी क्षीणता इसी वर्णाश्रमकी विशेषता रही है । यदि वर्णाश्रमहीनता ही अविरोधका कारण हो; तो यूरोपियन जो लाखों - करोड़ों का बलिदान दे - ले चुके, तथा रूसी जापानी आदि तथा शिया - सुन्नी आदि मुसलमान इनके परस्पर विरोध न होते, अतः यह सब तुच्छ - युक्तियां हैं । मुसलमान आदि जातियां गरीब होनेसे, लुटेरी तथा सदाचारी होनेसे दूसरों की बहू-वेटियोंके सतीत्वको हरण करनेमें तत्पर रहती हैं । अपनी संख्याकी वृद्धिके लोभी भी होनेसे यह लांग किसी को जबर्दस्ती किसी को लोभ आदिमें फँसाते हैं । क्या ये लोग एक - दूसरेको नहीं काटते? देखिये इनका इतिहास । जबतक हिन्दु वर्णाश्रमाभिमानी था, किसी मुसलमान आदि की शक्ति नहीं रही कि भारतवर्षको देख भी सके, पर जबसे वर्णाश्रमधर्मके पालनमें यहां शिथिलता घाई, बौद्धोंके अनर्गल अहिंसावादकी ओर यहाँ प्रवृत्ति हुई, और अपने ही शास्त्रों वा धर्मके खण्डनमें शूरवीरता जारी करके अपने ही लोगोंको नपुंसक बनाया जाने लगा, अपने ही देशमें उन विदेशी - जातियों का सम्मान होने लगा, अपने ही लोगोंकी सुविधाएँ छीनकर वा उन्हें न देकर उन्हीं वैदेशिक जातियोंकी मनमानी बातें मानी जाने लगीं, अपने धर्मका उत्साह छुड़वाकर धमनिरपेक्षता-में अपने लोगोंको प्रवृत्त करने की चेष्टाएँ की जाने लगीं, तभीसे उन लोगोंके दुःसाहस भी बढ़ गये हैं और उनकी इस देशमें स्थिरता भी कर दी गई है । वर्तमान देशभंग भी राजनीतिके कारण हुआ है — इसमें प्राचीन वर्णाश्रम व्यवस्था कारण नहीं । अब इसी वर्णाश्रम व्यवस्थाको भंग करनेकेलिए श्राजका शासन भी प्रोत्साहन दे रहा है । इसके परिणामस्वरूप ही हमें यह डर लग रहा है कि कहीं सारा भारत ही पाकिस्तान न बना • दिया जाय । यहीं की वहीन- जातियों को भी स्वयं ही प्रोत्साहित करके. वर्णाभिमानिनी - हिन्दुजातिके साथ लड़वानेकी भूमिका बांधकर इसी खण्ड- देशके पुनः खण्ड - खण्ड किये जानेकी तैयारियां करके इस देशको अपनी ही फूटका अखाड़ा बनाया जा रहा है, देखें - ऊँट किस करवट बैठता है? वस्तुतः ऐसी थोथी- युक्तियां वर्णव्यवस्थाको काटने में समर्थ नहीं । यह ' वर्णविद्वेष ही ऐसी युक्तियों को बलात् मस्तिष्कसे निकलवाता है । इन युक्तियों में कोई दम नहीं - यह शास्त्रज्ञ विद्वान् जान सकते हैं । ऐसी युक्तियोंसे भारत के ' नादान - दोस्त ' भारतीयोंकी ही हानि करने जा रहे हैं - यह इन युक्तिके आविष्कारकों ही नहीं भूलना चाहिये । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 417

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 13 ८१४ ( १६ ) ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ङ ) -( क़्या वर्णव्यवस्था गुण - कर्मणा है? ) [ ३ ] १ पूर्वपक्ष - ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' इस मन्त्रमें पञ्चमी के बिभक्तिका अर्थ नहीं, किन्तु प्रथमाका है । यहां मनुष्य - समाज-रण की एक व्यक्तिके शरीरके साथ तुलना करते हुए समाज के आदर्श-का संघटनका निर्देश किया गया है कि- ब्राह्मण मुखके समान होता है, उसमें ५ ज्ञानेन्द्रियां हैं, और कर्मेन्द्रियोंमें प्रमुख एक बाणी है । ना सारे अंगोंमें सबसे अधिक स्वार्थरहित और तपस्वी, सर्दीमें भी नंगा रहनेवाला, अपने अन्दर स्वादु - पदार्थ डालनेपर भी काकी अपनेलिए कुछ न रखकर सारे शरीरमें बांट देनेवाला - अंग मुख | - है, इस प्रकार जो सम्पूर्ण ज्ञानका संग्रह करके वाणी द्वारा यासी उसका प्रचार करते हैं, तपस्वी और निःस्वार्थ हैं - वे ब्राह्मण हैं । नह जिनके अन्दर यह गुण नहीं पाये जाते, वे ब्राह्मण कहलाने के न्ता अधिकारी नहीं । इस प्रकार वर - व्यवस्था गुण - कर्मणा है, जन्मना न नहीं । ' ( सिद्धान्त - वर्णव्यवस्थाक ) की १ उत्तरपक्ष — वेदादि सभी शास्त्रोंमें ' जन्मना वर्णः ', ' गुणकर्मणा सम्मानः ' यह सिद्धान्त देखा गया है, पर आज के युगके कई व्यक्ति वर्ण - व्यवस्थाको केवल ' गुण - कर्मणा ' बतलाते हैं, वस्तुतः यह ठीक नहीं । ऐसा होनेसे बड़ी विशृङ्खलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं । गुण तथा कर्मोंके चल एवं परिवर्तनशील होनेसे फिर वर्णं भी चल और परिवर्तनशील बने रहेंगे । इस प्रकार CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat क्या वर्णव्यवस्था गुणकर्मणा है? 518 वर्ण - व्यवस्था न होकर वर्ण - अव्यवस्था हो जायगी । ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' में यदि यह अर्थ किया जाय कि ' ज्ञानका संग्रह करके वाणी द्वारा उसका प्रचार करनेवाले, तपस्वी और स्वार्थ - रहित ही ब्राह्मण हो सकते हैं ', तो उपनिषद्-के अजातशत्रु आदि क्षत्रिय, ब्राह्मणोंको भी वाणांसे ब्रह्मविद्या देनेवाले. ब्राह्मण मान लिये जाने चाहियें! पर वे क्षत्रिय ही कहे गये हैं, ब्राह्मण नहीं । अतः यह अर्थ जन्मना वर्ण में तो ठीक है, गुण-कर्मणामें नहीं, क्योंकि उसमें अतिव्याप्ति हो जाती है, तभी तो वाढ़ीसे मान्य ‘ वज्रसूचिकोपनिषद् ' में भी कहा गया है— ' ज्ञानं ब्राह्मण इति चेत्, तन्न— क्षत्रियादयोऽपि परमार्थदर्शिनोऽभिज्ञा बद्दवः सन्ति, तस्मान्न ज्ञानं ब्राह्मणः । तहि कर्म त्राह्मण इति चेत्, तन्न-सर्वेषां कर्मणां ’ · ‘ साधर्म्यदर्शनात् कर्माभिप्रेरिताः सन्तो जनाः क्रियाः कुर्वन्ति, तस्मान्न कर्म ब्राह्मणः - इति । ' ' ब्राह्मणोस्य मुख-मासीत् ' का वास्तविक अर्थ तो मुखसे उत्पत्तिका पञ्चम्यन्त हो है, प्रथमान्त नहीं है, देखिये गत निबन्ध । वादीके प्रथमाविभक्तिके अर्थों में भी सनातनधर्मके पक्ष में हानि नहीं पड़ती । मान भी लिया जाय कि ' इस ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' मन्त्रमें एक व्यक्तिके शरीरके अङ्गोंके साथ ब्राह्मणादि वर्णोंकी तुलना है ', पर इसमें जन्मना वर्णव्यवस्था- सिद्धान्तमें हानि नहीं पड़ती । इस सिद्धान्तमें उस जात - ब्राह्मणको अपने कर्मों का निषेध तो है नहीं, अतः वह भी अपने नियत - कर्मों को करेगा । मुख, बाहु, ऊरु, पाद अङ्ग जन्मसे ही उत्पन्न होते हैं, . An eGangotri Initiative

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सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 418 का मूल पृष्ठ
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८१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) गुण - कर्म से नहीं । जन्ममूलक ही उनका यह यह नाम हुआ करता है, गुण - कर्मसे यह नामकरण नहीं । जन्मसे शुरू करके भस्मता तक उनका यही नाम हुआ करता है, चाहे मुख मुखवाला कार्य करे वा न करे । जैसे फिर भी उसे पहचाननेकी उसका नाम यौवनमें भी करते हुए भी होने पर भी पादकी जगह मुख बाल्यमें जन्मके समय निरक्षर शब्द करता है, मुख ही कहा जाता है, तब आँखों में अक्षर आदि शक्ति नहीं होती, जो उसका कर्म है; फिर भी ' नेत्र ' हुआ करता है । इस प्रकार वृद्धावस्था में भी । रोगविशेष होने पर मुखादि श्रङ्ग मुखादि वाला कार्य न मुखादि ही कहे जाते हैं, पादादि नहीं । मुखमें मूर्खता उसे पाद नहीं कहा जाता, वा मुखको बहांसे काटकर और पादको वहांसे काटकर मुखके स्थान में नहीं रखा जाता । वैसा करने पर अव्यवस्था उत्पन्न होगी । २ पूर्व पक्ष - ' बाहू राजन्यः कृतः । यहां क्षत्रियोंकी बाहुसे तुलना की गई है । भुजाओंका काम सारे शरीरकी बाह्य और आन्तरिक चक्रमणोंसे रक्षा करना है, मारनेकेलिए उपस्थित-शत्रुको यही रोकते हैं । पैरमें वा कहीं अन्यत्र कांटा लगजावे; तो यही निकालती हैं । सबसे अधिक फुर्तीलापन इनमें है, इसी तरह राष्ट्रकी आन्तरिक - बाह्य शत्रुओंके आक्रमणसे रक्षक क्रिया-शील क्षत्रिय हैं । वेदमें ( ऋ. १०६६/८ ) क्षत्रियोंके गुणोंका वर्णन करते हुए कहा है- ' क्षत्रिय उत्तम व्रतधारी, परोपकारमय जीवन वाले, यज्ञोंसे शोभा वाले, अग्निहोत्र करने वाले, सत्यका सेवन करने वाले, द्रोहरहित होकर पापके नाश करने वाले होते हैं ' । CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ङ ) ८१६ 510 २ उ ० - बाल्यावस्थामें बाहुमें रक्षण की शक्ति नहीं होती, बार्ध-क्यमें भी । यौवनमें भी बाहुमें दुर्बलतावश रक्षरणशक्ति न होने पर जंघ भी उसका नाम ' बाहु ’ ही रहता है । इसी प्रकार ऊरु, कमर तथा अपे पांव भी बाल्य तथा वार्धक्य में अपनी शक्तिको धारण नहीं करते, दुर्बलतावश यौवनमें भी । फिर भी इन्हें यथापूर्व उह दूस और पाद ही कहा जाता है, इस प्रकार निरक्षर भी ब्राह्मण, प्रक बालक और वृद्धके अथवा दुर्बलशक्तिवाले मुखकी तरह ब्राह्मण कर ही रहता । जैसे नेत्र आदिसे युक्त मुखके शिथिल होनेपर भी उध उनके स्थानमें सबल भी बाहु, ऊरु वा पादको नहीं रखा जाता, वैसे ही ब्राह्मण ं निरक्षरतामें भी ब्राह्मण ही रहता है । उसके जैस स्थानको साक्षर - शूद्र भी नहीं ले सकता । उस ब्राह्मणका पुत्र वा बन्धु ही वहाँ रखा जा सकता है, इसी तरह क्षत्रिय निर्वल होने तप पर भी क्षत्रिय ही माना जाता है । " धृतव्रताः क्षत्रिया यज्ञनिष्कृतः ' ( ऋ ०१० ६६८ ) का यदि वैश् ' क्षत्रिय उत्तम व्रतधारी, यज्ञमय, यज्ञोंके कारण ' शोभावाले, जा अग्निहोत्र करनेवाले, सत्यसेवन करनेवाले, द्रोहरहित, पापको जा नाश करनेकेलिए कार्य करनेवाले होते हैं ', यह अर्थ किया जाय वस्त तो ' गुण - कर्मणा वर्णव्यवस्था ' - सिद्धान्त में यहां ब्राह्मणमें अति-व्याप्ति हो जायगी । यह लक्षण ब्राह्मणका भी हो जायगा । फिर हो ब्राह्मण - क्षत्रियमें भेद न रहेगा । जन्मना वर्ण - व्यवस्था - पक्षमें तो कोई हानि नहीं । ऐसे गुण - कर्म वाले भी युधिष्ठिर जन्मवश क्षत्रिय वैस उत्प ही कहे गये, ब्राह्मण कहीं भी नहीं । फि Gujarat An eGango pitative

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दाम श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 519 ३ पू ० – ' ऊरू तदस्य यद् वैश्यः ' शरीरमें मध्यभाग- पेटसे - वार्ध- जंघा तकके भागसे वैश्यकी तुलना है । यह भाग अन्य अङ्गों की परर अपेक्षा अधिक भोगप्रिय है, अन्न आदिका संचय करता है । तथा भोजनका परिपाक करके अन्य अङ्गों में भेजता है । एक स्थानसे नहीं दूसरे स्थान तक जंघाओंके बिना जाना असम्भव है । इस अरु ब्राह्मण प्रकार जो अत्युच्च - ज्ञान से युक्त नहीं होते, किन्तु धन - संग्रह , करके शेष वर्णों में ब्राह्मण पर भी उधर जाते हैं, वे जाता, ( ख ) ' पद्भयां जैसे सब अङ्गों की I सुत्र वा की सेवा करते हैं, विभक्त कर देते हैं, जो व्यापारकेलिए इधर-वैश्य होते हैं । शूद्रो अजायत ' पैरोंसे शूद्रोंकी उपमा है । पैर सेवा करते हैं, इसी प्रकार जो प्रेमसे समाज ' तपसे शूद्रम् ' ( यजुर्वेद ) जो तपस्वी हैं, क्योंकि हो तपके बिना कोई वास्तविक सेवा नहीं कर सकता, वे शूद्र हैं । " ३ उ ० – - ' जो व्यापारादिकेलिए इधर - उधर जाते हैं, वे यदि वैश्य कहलाते हैं ' यह जो ' ऊरू तदस्य यद् वैश्यः ' का अर्थ किया - वाले, जाता है, यह भी ठीक नहीं हो सकता । ऊरु तो कहीं नहीं आते आपको जाते, पैर ही आते - जाते हैं, फिर तो शुद्र ही वैश्य हो जायेंगे? जाय वस्तुतः यहां ऊरुसे वैश्यकी उत्पत्तिका अर्थ ही शास्त्रीय है । अति- ( ख ) ' पद्भयां शुद्रो अजायत ' का उक्त अर्थ भी ठीक नहीं फिर हो सकता । जब यहां ' पद्भ्याम् अजायत ' यह पञ्चमी तथा में तो उत्पत्ति अर्थ प्रत्यक्ष है, तब वह अर्थ क्यों नहीं किया जाता? त्रिय वैसा अर्थ करनेमें डर क्या है? यही डर है कि वर्णव्यवस्था फिर जन्मना हो जायगी । इससे वर्णव्यवस्था जन्मसे ही सिद्ध CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ङ ) ८१६ होती है । ' पद्धयां शुद्रो, ब्राह्मणोस्य मुखं ' इन दोनों पञ्चमी - प्रथमा विभक्तियों को जोड़नेसे वेदने निर्देश किया है कि सारे मन्त्रका दोनों विभक्तियों में अर्थ करो । सो पञ्चमीका अर्थ तो हमारा इष्टापादक तथा वादीके पक्षका खण्डक है ही, इसलिए वादी इसे हटानेकेलिए एड़ीसेचोटी - तकका पसीना निकालते हैं, प्रथमा अर्थ करनेमें भी हमारे पक्षमें कोई हानि नहीं आती - इसे हम आगे बतला रहे हैं । यहां ' पद्भयां ' में उपमाका कोई स्पष्ट वा अस्पष्ट सम्वन्ध ही नहीं । ' तपसे शुद्र ' का ' तपस्वी ' अर्थ नहीं है । यदि ऐसा अर्थ हो, तो वादीके अनुसार शुद्र भी ब्राह्मण होगा, क्योंकि बादी ब्राह्मणकेलिए भी कहते हैं- ' जो तपस्वी हैं, वे ही सच्चे ब्राह्मण हैं ', अतः दोनों स्थानों में अव्याप्ति- श्रतिव्याप्ति दोप हो जायगा, ब्राह्मण शूद्र और शूद्र ब्राह्मण हो जायेंगे । ' तपसे ' का अर्थ यहां ' कृच्छ्र - कर्म ' है । इसका यही अर्थं आधुनिक सुधारक भी करते हैं । ' वर्णव्यवस्थाका वैदिक रूप ' ( पृ. १० ) में उसके दादिमान्य-लेखक लिखते हैं- ' ( तपसे ) श्रम अथवा मेहनत से साध्य पशुओं को उत्पन्न तथा सब प्रकारके शिल्पकारी आदि ' कठिन कार्य करनेकेलिए ' शूद्र ' को । ' यह लिखकर वे लिखते हैं- ' मन्त्रमें आये हुए ' तपसे शूद्र ' पदका अर्थ जो मैंने ' श्रमसाध्य पदार्थों की उत्पत्ति तथा कठिन कामोंके करनेकेलिए शुद्र ' किया है, यह अर्थ नया नहीं, क्योंकि स्वामी दयानन्दजीने ' दुःखसे उत्पन्न होनेवाले सेवनकेलिए शुद्रको ' और श्रीशिवशङ्करजी Gujarat. An eGangotri Initiative

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८२० श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) काव्यतीर्थने ' परिश्रमी और कठिन कार्य करनेवाले शूद्रको ' तथा स्वामी वेदानन्दजीने ' कठिन कर्मके अनुष्ठानकेलिए शुद्रको ' यही अर्थ किये हैं ( पृ. ११ ) । ४ पू ० –'ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' की मध्यकालीन भाष्यकारोंने जो यह व्याख्या की है कि यहां ' ब्राह्मणः ' का अर्थ ' ब्राह्मणत्व-जातिविशिष्टः पुरुषः ' और ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' का अर्थ ' अस्य ब्रह्मरणः मुखाद् ब्राह्मण उत्पन्नः ' अर्थात् ब्रह्माके मुखसे ब्राह्मणत्वजातिविशिष्ट पुरुष उत्पन्न हुआ, यह अशुद्ध है, क्योंकि ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् ' यह मन्त्र अपनेसे पूर्व ' यत् पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू-पादा उच्येते ' इसके उत्तर में है, जिसमें प्रश्न किया गया है कि ' विराट् - पुरुषकी विद्वानोंने किस प्रकार की कल्पना की? उसका मुख कौन - सा है? बाहु कौन - से हैं? उसकी जङ्घा और पैर कौन-से कहे जाते हैं? यहां यह प्रश्न नहीं है कि ' ब्रह्मा के मुखसे कौन पैदा हुए? ब्रह्माकी बाहुओं और जङ्घाओंसे कौन पैदा हुए? ” किन्तु यह है कि ' उस विराट् पुरुषका मुख कौनसा था? बाहुएँ कौनसी थीं? जङ्घा और पैर कौनसे कहे जाते हैं? इसका यह उत्तर देना कि ' ब्राह्मणजातिविशिष्ट पुरुष इसके मुखसे उत्पन्न हुआ, क्षत्रिय इसकी बाहुओंसे उत्पन्न हुए, वैश्य इसकी जङ्घाओं और शूद्र पैरोंसे उत्पन्न हुए ' ' आम्रान् पृष्टः कोविदारान् श्राचष्टे ’ इस संस्कृत - कहावत को चरितार्थ करना है । ' मुख कौनसा है? ' इसका यह उत्तर देना कि ' ब्राह्मण ब्रह्माके मुखसे उत्पन्न हुआ ' CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ङ ) ८२२ ८२१ सर्वथा असङ्गत है । अतः इसका उपरिनिर्दिष्ट समाजशास्त्र ' मूलतत्त्वोंका निर्देशक तथा परस्पर सहयोगका उपदेश करनेवाला के भवन्ति अर्थ ही वास्तविक है ' । मैं भी ४ उ ० — ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् में उत्पत्तिपक्ष मानने से प्रश्न एक ‘ यत्पुरुषं व्यदधुः... मुखं किमस्यासीत् किं बाहू ' इस प्रश्न - मन्त्र-की सङ्गति नहीं बैठती ', यह तर्क भी निस्सार है । ' अस्य प्रकृतस्य वैश्यः त परमात्मनो मुखं - मुखाद् ब्राह्मण आसीत् सञ्जातः, उत्पन्नः । ' यहां इस प्रका पर ' सुपां च सुपो भवन्ति ' ( ७ | १ | १ ( ३६ ) इस महाभाष्यस्थ - वार्तिक यहां भ से तथा ' प्रजापतिर्हि मुखतः त्रिवृतं निरमिमीत... ब्राह्मणो ७१1१ मनुष्याणाम्.. मुखतो हि असृज्यन्त ' ( ७ | १ | १ ( ४ ) इस कृष्णयजुर्वेद ( ताण्ड्य ( तै. सं. ) की एवं ' ब्राह्मणो मनुष्याणाम् ' ' मुखतो हि सृष्टः ' ( ६।१।६ ) इस ‘ ताण्डच - महाब्राह्मरण ' की साक्षीसे ' मुख ' का ‘ मुखात् ’ ' पद्म यह पञ्चमी अर्थ है । इस प्रकार प्रश्नमन्त्रमें भी ' मुखं किमस्यासीत् ' प्रश्नमन्द यहां भी यही अर्थ है कि ' अस्य - परमात्मनो मुखं - मुखात् ईशस्य किमासीत् — किमुत्पन्नम्? ' ' आसीत् ' का ' उत्पन्न ' अर्थ करनेमें आख्या ' साक्षी ' नाभ्या आसीदन्तरिक्षम् ' ( यजु. ३१।१३ ) इस मन्त्रकी है । अव पाठक देख रहे हैं कि प्रश्नमन्त्र एवम् उत्तरमन्त्रकी सङ्गति ( पद्भयाम लग गई या नहीं? इस प्रकार ' बाहू राजन्यः कृतः ' में भी अर्थ है- ' अस्य- आदिमें परमेश्वरस्य वाहू— बाहुभ्याम् ' राजन्यः - क्षत्रियः, कृतः- भी प उत्पन्नः । ' पूर्ववत् ‘ बाहुभ्यां राजन्यो मनुष्याणां ' ( ७ | १ | १ ( ४ ) ' ब्राह्मण इस कृष्णयजुर्वेद ( तै.सं. ) की तथा ' राजन्यो मनुष्यः, बाहुभ्यां हि ठीक ही Gujarat. An eGangotri Initiative