सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 421–430

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 421–430

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८२२ श्रीसनातनधर्मालोक ६ ) ८२१ सृष्टः ' ( ६ | १ | ८ ) इस ‘ ताण्ड्यब्राह्मण'की साक्षीसे ' सुपां च सुपो शास्त्र के भवन्ति ' से ‘ भ्याम्’को ‘ औ ' हुआ । इस प्रकार प्रश्नमन्त्र ' किं बाहू ’ नेवाला में भी ' बाहू — बाहुभ्यां किमासीत् किमुत्पन्नम्? ' यही अर्थ होकर प्रश्न एवं उत्तर दोनों की सङ्गति हो गई । इसी तरह ‘ ऊरू तदस्य यद् वैश्यः ' का भी अर्थ है कि ' यद् -मन्त्र-वैश्यः तद् अस्य ऊरू ——– ऊरुभ्याम्, अजायत इत्युत्तरेणानुषङ्गः । ' कृतस्य इस प्रकार प्रश्नमन्त्रमें भी ' किमूरू - ऊरुभ्यां किमासीत् - किं जातम् ' यहां यहां भी पूर्ववत् ‘ मध्यतः... वैश्यो मनुष्याणां ' ( कृष्णयजुर्वेद वार्तिक ह्मणो ७ | १ | १ ( ५ ), ' स मध्यत एव असृजत ', वैश्यो मनुष्याणाम् ’ जुर्वेद ( ताण्ड्य ६।१।६ ) इन साक्षियोंसे ' सुपां च सुपो भवन्ति ' से ' भ्याम् ’ सृष्टः ' को ' औ ' हुआ । खात् ' ' पद्भ्यां शूद्रो जायत ' में तो पञ्चमी प्रत्यक्ष है ही । इसके सीत् ' प्रश्नमन्त्र की योजना यह है - ' ऊरू- पादौ किम् उच्येते - अस्य मुखात् ईशस्य ऊरुभ्यां, पादौ पादाभ्यां च किमुच्येते - कौ उत्पन्नौ करने में आख्यायेते । ' कृष्णयजुर्वेदमें ' स पत्तः ( पादाभ्यां ) निरमिमीत, की है । शूद्रो मनुष्याणाम् ' ( ७ | १ | १ ( ६ ) तथा ' ताण्ड्य ब्राह्मण ' में ' स पत्त सङ्गति ( पयाम् ) एव असृजत, शूद्रो मनुष्यः " ( ६ १ १० ) इसकी साक्षी स्पष्ट है । इसके आगे मन्त्रों में भी ' चन्द्रमा मनसो जात: ' अस्य- आदिमें ' मनसः, चक्षोः, श्रोत्राद्, मुखादग्निरजायत ' इत्यादिमें तः- मी पञ्चमी तथा उत्पत्ति अर्थ प्रत्यक्ष है, उनके अनुरोधसे ( 8 ) ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' आदिमें भी पञ्चमी तथा उत्पत्ति अर्थं यहि ठीक ही है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ब्राह्मणोस्य मुखमासीत ( उ ) ८२३ स्वामी दयानन्दजीने भी अपने उक्त मन्त्रके अर्थ में प्रश्न-उत्तर दोनोंमें पञ्चमी - विभक्तिका ही अर्थ किया है । देखिये- ' मुखं किम् - अस्य पुरुषस्य मुखं मुख्यगुणेभ्यः किमुत्पन्नमासीत् ' पादा उच्येते - पादौ अर्थात् मूर्खत्वादि - नीचगुणैः किमुत्पन्नं वर्तते ' ( १० ) मुखं मुख्यगुणास्तेभ्यो ब्राह्मण उत्पन्नो भवति ।... पद्धयां - पादेन्द्रिय-नीचत्वमर्थाज्जड - बुद्धित्वादिगुणेभ्यः शूद्रः सेवा - गुणविशिष्टः अजायत - जायते ' ( ऋ.भा.भू. पू. १४१-१४२ ) । हां, यह अर्थ उनका जहां स्वकल्पित है, वहां अयुक्त भी है । गुणोंसे द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती । ' सत्यार्थप्रकाश ' में स्वामीजीने स्वयं लिखा है- ' गुणसे द्रव्य कभी नहीं वन सकता । जैसे रूपसे अग्नि और रससे जल नहीं बन सकता ' ( १३ समु. पृ. ३०० ) । तत्र मुखके गुणोंसे द्रव्य - त्राह्मणकी उत्पत्ति कहां ठीक हुई? अस्तु! इतना होनेपर भी प्रश्न - उत्तर में स्वा. दु.जीने हमारे अनुसार पञ्चमी मान ही ली । पाठकोंने देख लिया कि उत्पत्ति - अर्थ में प्रश्न एवं उत्तर - मन्त्रका सामन्जस्य हो गया । इसलिए श्रीसायणाचार्यने भी स्पष्ट लिखा है- ' इयं च मुखादिभ्यो ब्राह्मणानामुत्पत्तिः सप्तमकाण्डे ' स मुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत ' इत्यादी स्पष्टमाम्नाता । अतः प्रश्नोत्तरे उभे अपि तत्परत्वेनैव योजनीये ' ( तैत्तिरीयारण्यक ३।१२।५ ) । सो वादीके आचार्यकी व्याख्यासे वहां प्रश्नमन्त्र तथा उत्तर - मन्त्रमें पञ्चमीविभक्ति तथा उत्पत्ति - अर्थसे हमारे पक्षकी पुष्टि ही सिद्ध हुई । उनका गुणोंका अर्थ उनके अपने कथनसे ही प्रयुक्त सिद्ध होनेसे, मुखादिसे ब्राह्मणादिकी उत्पत्ति- अर्थ सिद्ध हो An eGangotri Initiative

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८२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) जानेसे वर्णव्यवस्था भी उत्पत्तिमूलक ही सिद्ध हुई । अथवा ' तुष्यतु वादी ' न्याय से ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' में पञ्चमी न मानकर प्रथमा विभक्ति भी मानें, तो भी तो हमारा ही उत्पत्ति अर्थवाला पक्ष सिद्ध होता है । ' आयुघृताद् जायते ' यह पञ्चमीमें कहना हो, तो ' आयुषृतम् ' यह प्रथमासे भी कहा जाता है । इसका कारण यह है कि कार्य - कारणका अभेद भी माना जाता है । घृत कारण है, आयु कार्य है, तथापि यहाँ प्रथमा भी पञ्चमीके ही अर्थको बतलानेवाली होती है । इसी प्रकार ' ब्राह्मणो मुखाद् आसीत् के स्थानमें कार्य - कारणके अभेद-वश ' ब्राह्मणो मुखमासीत् ' भी कहा जा सकता है । अर्थ वही पञ्चमीका निकलता है । इसके अतिरिक्त यह सृष्टि - सूक्त है, स्वा. द. जीने भी ऋभाभू. में इस सूक्तमें ' सृष्ट्यु त्पत्ति ' विषय ही माना है । अतः यहाँ ' ब्राह्मणोस्य मुखं ' में ' अस्य ' का अर्थ ' परमेश्वरस्य ' है, ' मनुष्यसमाजस्य ' नहीं, अन्यथा पहले वेदोंकी उत्पत्ति भी बतलाई गई है, फिर वेद भी मनुष्योत्पादित हो जायंगे । ऋग्वेदसंहिता ' ' में ' मुखं किमस्यासीत् ' तथा ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( १० / ६०१११-१२ ) मन्त्रोंसे पूर्व ही ' तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः ' तथा ' तस्मादश्वा अजायन्त ' ( १०६० / ६-१० ) ये मन्त्र हैं । यदि पिछले ( ११-१२ ) मन्त्रोंमें मनुष्यसमाजसे ब्राह्मणादिकी उत्पत्ति मानी जायगी, तो पहले के दो ( ६।१० ) मन्त्रोंमें कही वेदों तथा पशुओंकी सृष्टि भी मनुष्यकर्तृक हो जायगी, जो कि प्रतिपक्ष को भी अनिष्ट होगी, CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्था जन्मना ८२५ ८२ अतः यहाँ हमारा ही पक्ष ठीक है । बल्कि आदिम संहिता में ऋग्वेदके ‘ तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत: ( ६।१० ) मन्त्रोंके पञ्चमी तथा उत्पत्ति - अर्थंके साहचर्यसे उसके आगे ( ११।१२ ) संख्याबाले उस ‘ मुखं किमस्यासीत् ’ ‘ ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' मन्त्रोंका भी पञ्चमी कर श्रर्थ ही स्पष्टतासे सिद्ध हो गया । वेदकी साक्षीको कोई बदल नहीं का चल सकता । अथ ५ पू ० – ' ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र- ये शब्द भी वर्ण-व्यवस्थाका गुण - कर्मसे होना सूचित करते हैं । उदाहरणार्थ— प्रच प्रश्न ब्राह्मण - शब्द ‘ ब्रह्मन् ’ शब्दसे ' तदधीते तद् वेद ' ( अष्टाध्यायी ४ | २ | ५६ ) केति के अनुसार ‘ अण ' प्रत्यय करने पर बनता है । ' ब्रह्मन् ' शब्दके अर्थं सङ्ग परमेश्वर और वेदके होते हैं, अतः ब्राह्मणका अर्थ परमेश्वरको शा जाननेवाला और वेदको जानने वा उसका विशेष अध्ययन करनेवाला - यह सर्वथा स्पष्ट है । पण्डितप्रवर वैद्य श्रीश्यामनारायण-करत चतुर्वेदीने ' सन्ध्याभाष्यम् ' में लिखा है - ' ब्राह्मणान् अभ्यावर्ते ते इसी मे द्रविणं यच्छन्तु, ते मे ब्राह्मणवर्चसम् ' ( अथर्व १० | ५ | ४१ ) इस ब्राह्म वेदमन्त्रकी व्याख्यांमें ठीक ही लिखा है कि ' ब्रह्म - वेदं शुद्धं चैतन्यं वतल वा वेत्ति अधीते वा. ' तदधीते तद्वेद ' ( पाणिनिसूत्र ४/२/५६ ) इत्यण् ' तप ( सन्ध्याभाष्यम् पृ. २३७ ) । श्रीसायणने ' ब्राह्मणा वेदविदः वेदार्थ- सत्य तत्पराः ' यह अर्थ ब्राह्मणका लिखा है । ' ब्राह्मणा ये मनीषिणः ' लब्ज ( ऋ ० १ । १६४ । ४५ ) इस मन्त्र में भी यही भाव है । ' अनूचानो त्राह्मणो युक्त आसीत् ' ( ऋ ० ८५८१ ) में भी अनूचान - वेदपाठीको ब्राह्मण कहा है । इसीलिए वेदमें ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि ' ( ईशोप ० ) - व्याप Gujarat. An eGangotri Initiative

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८२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ८२१ मैं कर्मकी प्रशंसा आई है । हिता ( ख ) ब्राह्मणकी तरह क्षत्रिय शब्द भी गुणसूचक है, क्योंकि तथा उसका अर्थ ' क्षत अर्थात् आक्रमण वा आपत्तिसे त्राण वा रक्षा वाले करनेका है । इसी अर्थको लेकर आधुनिक कविकुलशिरोमणि-मी कालिदासने ' रघुवंश ' में कहा है कि ' क्षतात् किल त्रायत इत्युदग्रः, नहीं क्षत्त्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः । ' ( सर्ग २ ) अर्थात् क्षत वा आपत्ति अथवा आक्रमणसे रक्षा करनेके कारण वीरकेलिए क्षत्रिय शब्द - प्रचलित है । ' महाभारत ' शान्तिपर्व अ ० १०६ में भरद्वाजके र्य- प्रश्नके उत्तरमें भृगुने वर्णव्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए क्षत्रिय-५६ ) केलिए यही वतलाया है कि - " क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययन-अर्थ सङ्गतः । दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते । ” ( म ० मा ० को शान्तिपर्व १८६।४ ) अर्थात् जो वेदाध्ययनसे युक्त होकर आक्रमण व्ययन एवं आपत्तियोंसे समाज तथा राष्ट्रकी रक्षाका शक्तियुक्तं कार्य यण- ते करत । और दानादिमें तत्पर रहता है, वह क्षत्रिय कहलाता है । इसी प्रसङ्गमें ‘ ब्राह्मणः केन भवति ' अर्थात् किन गुणोंसे मनुष्य तन्यं इस ब्राह्मण बनता है, इस भरद्वाज के प्रश्नका उत्तर देते हुए भृगुने वतलाया है कि — " सत्यं दानमथाद्रोहः आनृशंस्यं त्रपा घृणा । चरण् ' दार्थ- तपश्च दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः । " ( १८६।१ ) अर्थात् चिणः ' सत्य, दान, अद्रोह, ( अहिंसा ), अक्रूरता, बुरे कार्योंके करने में चानो लब्जा, दया और तप जहाँ दिखाई दें उसे ब्राह्मण कहा जाता है । 1-ठीको वैश्य शब्द भी ' विश प्रवेशे ' इस धातुसे बनता है । जो प ० ) - व्यापारादिकेलिए एक - स्थानसे दूसरे स्थानमें प्रवेश करे, इस CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत ( ङ ) ८२७ अर्थका वाचक होनेके कारण गुणसूचक है । ' महाभारत ' शान्ति-पर्वके उपर्युक्त प्रकरणमें भृगुने वैश्यके विषय में शब्दार्थका निर्देश करते हुए कहा है कि – “ विशत्याशु पशुभ्यश्च कृप्यादानरतिः शुचिः । वेदाध्ययनसम्पन्नः स वैश्य इति संज्ञितः । " अर्थात् जो वेदाध्ययनसम्पन्न होकर व्यापारकेलिए इधर - वघर जाता, पशु-रक्षण वा कृषि आदि करता तथा पवित्र है, वह वैश्य कहलाता है । शूद्र शब्द भी गुणवाचक ही है, जो ' शु आशु द्रवति ' अथवा ' शुचा द्रवति ' इन व्युत्पत्तियोंके अनुसार बनता है, जिसका अर्थ सेवाकेलिए शीघ्र इधर - उधर दौड़नेवाला तथा ' वेदादि - शास्त्रोंका ज्ञान मुझे मन्दबुद्धिताके कारण प्राप्त नहीं हो सका ' इस शोकसे द्रवित होनेवाला होता है । ' महाभारत ' के उपर्युक्त प्रकरणमें शूद्रके विषयमें यही बतलाया गया है कि- ' सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वैकर्मकरोऽशुचिः । त्यक्तवेदत्वनाचारः स शूद्र इति संज्ञितः ॥ ' अर्थात् शूद्र वह कहलाता है, जो सर्व प्रकार के ( निषिद्ध - पदार्थोंके भी ) भक्षण में तत्पर है, सब प्रकारके काम करनेवाला है, अपवित्र है, वेदका जिसने स्वयं परित्याग कर दिया है, तथा जो उच्च - आचरणसम्पन्न नहीं है । इस प्रकार यदि इस विषयमें जो स्पष्ट - प्रमाण वेदादि सत्य-शास्त्रों में पाये जाते हैं, उनका विस्तृत विवेचन न किया जाय, तो भी इन शब्दोंके ही आधार पर यह बात निस्सन्देह कही जा सकती है कि वेदादि - सत्यशास्त्रप्रतिपादित वर्णव्यवस्थाका आधार गुण - कर्म - स्वभावपर है । Gujarat. An eGangotri Initiative

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८२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ३ ) ५ उ ० — इस पर हमारा वक्तव्य है कि श्रीपाणिनिका ' तदधी तद् वेद ' ( पा ० ४ । २ । ५६ ) यह सामान्य सूत्र है । यह ‘ वैयाकरणः ’ आदि अन्य शब्दों पर चरितार्थ हो जाता है, ' ब्राह्मण ' के लिए तो श्रीपाणिनिने विशेष - सूत्र बनाया है - ' ब्राह्मोऽजातौ ' ( पा ० ६ । ४ । १७१ ) । यहाँ योगविभाग किया जाता है— ' ब्राह्मः ' इति टिलुप्तो निपात्यते अनपत्ये अणि ' अर्थात् ' ब्रह्मन् ' शब्दका यदि सन्तान अर्थ इष्ट न हो, वह सामान्य अर्थमें हो, जैसेकि वादीने उसका अर्थ किया है- ' ब्रह्म अधीते वेद वा ' तो इस सामान्य अर्थमें अरण - प्रत्ययमें ' ब्रह्मन् ' की ' टि ' का लोप करदो, पूर्वको वृद्धि तो होगी ही । इस अर्थ में ' ब्राह्मः ' बनेगा, ' ब्राह्मणः ' नहीं । यहाँ अपत्य एवं जाति श्रर्थ न होनेसे ' टि ' का लोप होगया । अब दूसरा विभाग है- ' अजातौ ', ' अपत्ये जातौ सत्या-मपि टिलोपो वक्तव्यः ' अर्थात् सन्तान अर्थ तो हो, पर जाति अर्थ न हो, तो भी ' टि ' का लोप कर दो । इसका उदाहरण है— ' ब्राह्मो नारदः ' ब्रह्माका लड़का नारद । यहाँ अपत्य अर्थ तो है, पर जाति अर्थ न होनेसे यहाँ भी ' टि ' का लोप होगया । अब इस सूत्रका प्रसज्यप्रतिषेधवाला अर्थ यह है— ' अपत्ये जातौ सत्यां ब्रह्मणः टिलोपो न स्यात् ' अर्थात् ' ब्रह्मन् ' शब्दके आगे ' ण ' प्रत्यय हो, उसका अपत्य अर्थ हो और ' जाति ' वाच्य हो, तो ब्रह्मन्की ' टि ' का लोप न होगा । जैसे— ' ब्रह्मणो-ऽपत्यं जातिः ब्राह्मणः । ' ब्रह्माका मुख भी प्रधान अंग होनेसे ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण उसका अपत्य एवं जाति ही ब्राह्मण CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्था जन्मना ८३० सिद्ध होता है । ' ब्राह्मी ओषधि: ' में ' जाति ' अर्थ तो सम्भव है पर अपत्य अर्थ नहीं, अतः यहाँ भी ' टि ' का जाता है । इस वेदांगके सूत्रसे वेदस्थित ' ब्राह्मण ' शब्दके , मनुस लोप ही हो ( २॥४ या च जातिवाचक २।१७ सिद्ध होने पर गुण - कर्मका यहाँ कोई सम्बन्ध ही नहीं रहा । पढ़ना अर्थ शब्दके अधीन होता है और शब्द शब्दशास्त्र तथा कोपके । इस सूत्रका अर्थ चाहे ' सिद्धान्तकौमुदी ' में देखें, चाहे ‘ काशिका ’ नुसार में, चाहे ' महाभाष्य ' में, चाहे स्वामी दयानन्दजीके ' ( पृ ० १६५ ) में, सबमें यही अर्थ मिलेगा । अब पाणिनिको न मानकर श्रीश्यामनारायणजीको वा अधिक विद्वान् मानें, तो पहले उन्हें ' अष्टाध्यायी ' स्त्रैणताद्धित ' जाय असत यदि वादी होनेस श्रीसायरणको यह य पर हरताल फेर देनी पड़ेगी, पाणिनिके तथा अष्टाध्यायी के गीत गाने बन्द कर देने पड़ेंगे । उस अर्थ में तो ' ब्राह्मः ' बनेगा, ' ब्राह्मण: ' नहीं । पाणिनिका व्याकरण मुख्य वेदांग है, अतः वेदकी व्याख्या: दे उसी के अनुसार न्याय्य है । वादिसम्मत- अर्थ करने पर शास्त्रविरोध तथा लोकविरोध भी होगा । यह कैसे - इस पर पाठक ध्यान दें । जब ' ब्रह्म ' - वेदको ब्राह्म क्षत्रि जो पढ़ता है, वही ' ब्राह्मण ' माना जाय, तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, नहीं वैश्य तीनोंका वेदाध्ययन आचार्यकुलमें होता है, उसका ज्ञान भी चाहि और परमेश्वरका ज्ञान भी जब उसी वेदसे होगा— ' नाऽवेदविद् मनुते तं बृहन्तम् ' तो वे सभी ब्राह्मण होंगे, वर्ण एक ही हो पिण जायगा । फिर क्षत्रिय वैश्यवर्णके न होनेसे तीनों वर्णोंका विदन Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 425

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वर्णव्यवस्था जन्मना ८३० ८३१ है, भिक्षाभेद ( २/४६ ), आचमन - भेद ( २२६२ ), दण्डभेद हो G मनुसम्मत ) चर्मभेद ( २४१ ) इत्यादि ' यद्यस्य विहितं चर्म यत् सूत्र ( २४५, या च मेखला । यो दण्डो यच्च वसनं तत्तदस्य व्रतेष्वप ' ( मनु ० चिक २।१७४ ) भेद निर्विषय हो जायंगे । जव द्विजोंकेलिए वेदका रहा । पढ़ना - जानना अनिवार्य है, आवश्यक है. तब सभीके वादिजना-पके । नुसार ब्राह्मण होनेसे क्षत्रिय, वैश्य न होनेसे, एक बर्णं हो शिका ' जायगा । फिर चातुर्वर्ण्य की शास्त्रसम्मत सत्ता न रहनेसे शास्त्र द्धित ' असत्य सिद्ध होंगे वा शास्त्रविरोध होगा, पर लोकमें चार वर्ण वादी होनेसे उनको केवल ब्राह्मण कहने पर लोकविरोध होगा, अतः यह युक्ति वा निर्वचन शास्त्रविरुद्ध होनेसे सर्वत्र ग्राह्य नहीं । ताल श्रीसायरणने जो ' ब्राह्मणा वेदविदः, वेदार्थतत्पराः ' यह लिखा चन्द है, उसमें यह जानना चाहिए कि ' ब्राह्मणाः ' कोई कठिन शब्द नहीं । तो था नहीं कि सायरगाचार्य अपने भाष्यमें उसका पर्यायवाचक भी देने बैठते, यह ‘ वेदविदः ' वेदार्थतत्पराः ' तो ' ब्राह्मरण'का विशेषण है, पर्यायवाचक नहीं । अर्थ यह होगा कि ' वेद जाननेवाले रो ब्राह्मण । ' यह नहीं कि जो वेद जाने, वह ब्राह्मण, फिर तो को क्षत्रिय, वैश्यको वेदाधिकार वा वेदका जानना - पढ़ना आवश्यक त्रिय, नहीं होगा । इस प्रकार सायरणभाष्य में अन्यत्र भी समझ लेना न भी चाहिए । दविदु वस्तुतः ' ब्राह्मणा ये मनीषिणः ' इस मन्त्रमें ' मनी -हो पिणः ' विशेषण है और ' ब्राह्मणाः ' है विशेष्य, जैसे कि - ' एतद् विदन्तो ' विद्वांसो ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः ' ( मनु. ४ ६१ ) इस मनुके CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat पद्यमें; ' इस विशेषण से भी जन्मना वर्णव्यवस्था सिद्ध होती है । यहां मनीपी - ब्राह्मणोंको ही चारों वाणियोंका ज्ञान बतलाकर अमनीपी ( अविद्वान् ) ब्राह्मण भी सिद्ध कर दिये गये हैं । यदि केवल विद्वान्का नाम ही ब्राह्मण होता, तो उसका ' विद्वान ' विशेषण व्यर्थ होता, क्योंकि विशेषण सदा व्यभिचार प्रसक्त होने पर ही हुआ करता है, अव्यभिचारमें विशेपण नहीं हुआ करता, क्योंकि ' सम्भव - व्यभिचाराभ्यां स्वाद विशेषणमर्थवत् । ' ' अश्वत्थामा हतो नरः ' इसमें ' नरः ' विशेषण क्यों लगाया गया? इसलिए कि वहां वैसा विशेषण न लगाने पर ' अ-श्वत्थामा गजमें व्यभिचार पड़ता, उसका भी ग्रहण हो जाता । उक्ततर्कोपस्थापक वादी लोग अपने साथ ' मनुष्यः ' विशेषण क्यों नहीं लगाते? इसलिए कि उस विशेषणके न लगाने में भी किसी अमनुष्यमें व्यभिचार नहीं पड़ता । श्रतः सिद्ध हो गया कि विशेषण की सार्थकता व्यभिचार एवं सम्भवमें ही हुआ करती है, अव्यभिचार तथा असम्भवमें नहीं । श्रव्यभिचार तथा असम्भवमें विशेषण देने पर उसकी व्यर्थता हो जाती है, परन्तु ' ब्राह्मणा ये मनीषिणः ' में ' मनीषी ' विशेषण देनेसे ' अमनीषी ब्राह्मण ', ' विद्वांसं ब्राह्मणं ' ( अ ० १३ | ३ | १ ) में ' विद्वांस ' विशेषण देनेसे ‘ अविद्वान् ब्राह्मण ', ' गुणवतो ब्राह्मणान् भोजयेत् ' ( मानवगृ ० १ | १६ | १ ) यहां पर ब्राह्मणका ' गुणवान् ' विशेषण ' देने से ' गुणहीन - ब्राह्मण ', ' अनूचानो ब्राह्मणः ' ( ऋ ०५८।१ ) में ' अनूचान ' विशेषणसे ' अननूचान - ब्राह्मण ', ' सुत्राह्मणः ' ( महा-. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 426

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८३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) भाष्य २/२/१८ में ) कहने से ' कुत्राह्मण ' भी सिद्ध हो गये । तभी तो महाभाष्य में ' कुब्राह्मणः, दुर्ब्राह्मण: ' ( २/२/१८ ) भी कहा है । ' ब्राह्मणे चाऽननूचाने ' ( २।२४२ ) यहां मनुजीने ' अननूचान ' को भी ' ब्राह्मरण ' कहा है । इनसे वर्णव्यवस्था गुण- कर्मसे कटकर जन्मना ' ' सिद्ध हो जाती है । तभी तो ‘ तस्मान्न ब्राह्मणः सर्वस्येव क्षत्रियस्य पुरोधां कामयेत, नो एव क्षत्रियः सर्वमिव ब्राह्मणं पुरो दधीत ' ( ४ | १ | ४ | ५ ) इस ' शतपथब्राह्मण ' के वचनमें सर्वमिव ब्राह्मणं ' से सुकृती तथा दुष्कृती दोनों प्रकारके ब्राह्मण सिद्ध होते हैं । ' तपःश्रुताभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव सः ' ( २/२६ ) इस ' महाभाष्य ' के उद्धरण में तथा ‘ दुर्ब्राह्मणः ’, कुब्राह्मणः ' ( २।२।१८ ) इस महाभाष्यके उदाहरणों-में भी तप और श्रुतसे हीनको भी ' ब्राह्मण ' माना गया है । ' वैडालव्रतिके द्विजे ' ( मनु ० ४।१६१ ), ' हैतुकान् वकवृत्तींश्च ' ( ४३० ), ' न वक्त्रतिके विप्रे नावेदविदि ' ( ४। १६२ ) इन मनुजीके वचनोंमें कुत्सित - गुणवाले भी ब्राह्मण माने गये हैं, जिनकी व्यवस्था गुण - कर्मसे न होकर ' जन्म ' से वनती है, तब ब्राह्मणादि वर्णव्यवस्था भी जन्मसे ही सिद्ध हो जाती है । ' गुण - कर्मणा वर्णः ' सिद्धान्त में ' असद् ब्राह्मण ' शब्दका भी अत्यन्त अभाव होना चाहिए, क्योंकि उसमें असम्भव होगा, और ' सद् - त्राह्मरणः ' शब्दका भी अत्यन्ताभाव होना चाहिए, क्योंकि उसमें व्यर्थता होगी । इस प्रकार ' सत् - शूद्र ' का भी अत्यन्ताभाव होना चाहिए, ' असत् शूद्र ' का भी । पर दोनों CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्था जन्मना ८३४ ८३३ प्रकारके शब्द मिलनेसे वर्णैव्यबस्था जन्मना ही हो जाती है । गया ' तपः श्रुतं च योनिश्च त्रयं ब्राह्मण - कारकम् । तपःश्रुताभ्यां यो कम हीनो जाति - ब्राह्मण एव सः ' ( २२६ ) इस ' महाभाष्य ' के वचनमें ब्राह्मणत्वमें तीन कारण - ( तप, अध्ययन, योनि - त्राह्मणसे है, ब्राह्मणीमें जन्म ) बतलाये गये हैं । इन तीनोंमें तप तथा अध्य-यन तो अब्राह्मणमें भी सम्भव हैं, अतः ये दो कारण तो मुख्य कम सिद्ध न हुए, व्यभिचारी ही हुए; परन्तु योनि श्रब्राह्मणमें असम्भव है । तब ब्राह्मणत्वका मुख्य - अव्यभिचारी कारण ( स्वरूप ) उस योनि ( जन्म ) सिद्ध हुआ, तप और श्रुत उसके अलङ्कारक— उत उत्कर्ष मात्रा धायक सिद्ध हुए, स्वरूपाधायक नहीं, अतः ' विद्या-तपोभ्यां भूतात्मा शुध्यति ' ( ५ १०६ ) इस मनु वचन में विद्या और तपको आत्माका संस्कारक - अलङ्कारक कहा है, स्वरूप नहीं । स्वरूपाधायक कारण योनि ही सिद्ध हुआ । लक्षण में स्वरूप ही ना कहना पड़ता है— उत्कर्ष - अपकर्ष नहीं । रत्नके लक्षण में ' कीटा- ग नुवेधादिरहितत्व ' नहीं कहना पड़ता, वह तो रत्नके उत्कर्षापकर्ष में त सहायक हो सकता है, स्वरूप निर्माण में नहीं । इसीलिए ' महा- न भाष्य ' में ' त्रीणि यस्यावदातानि योनिर्विद्या च कर्म च । " दि ब्राह्मणाय यस्य लक्षणम् ' ( ४ | १ | ४८ ) में योनि से ब्राह्मणत्व और I विद्या एवं कर्मसे ब्राह्मणकी अग्रयता - श्रेष्ठता ही सिद्ध हुई, क सत्ता नहीं । तव ' अनूचानो ब्राह्मणो युक्त आसीत् ' ( ऋ ० ८ | ५८ | १ ), ‘ ब्राह्मणा ये मनीषिणः ' ( ऋ ० १।१६४ ( ४५ ) आदिका समाधान हो Gujarat. An eGginative

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८३४ श्रीसनातनधर्मा लोक ( ६ ) ८३३ गया । हिन्दुधर्म वर्ण - व्यवस्थाको जन्मसे मानता है और गुण-है । कर्मको उसका उपस्कारक - सम्मानप्रदाता मानता है, तब यो ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि ' ( ईशोप ० ) में कर्मकी जो प्रशंसा आई चन है, वह ठीक है । गुण - कर्म भी यदि जन्म के साथ हों, तो से सोना और सुगन्ध हो जाता है । तब जो इस विषय में अध्य- कर्मसे वर्णों के प्रमाण दिये जाते हैं; वे उन कर्मोंकी प्रशंसार्थ हैं मुख्य कि - वर्णको अपना कर्म भी करना चाहिये । उस कर्मके करनेसे भव उस वर्णकी प्रशंसा होगी, न करनेसे निन्दा - होगी; इससे उसका रूप ) उत्कर्षापकर्ष ही होगा; वर्णपरिवर्तन नहीं । महाभारतका क- सिद्धान्तपक्ष ( देखो भिन्न - भिन्न गुणकर्मस्वभाव वाले पाण्डवों विद्या- आदिको ) जन्मना वर्णव्यवस्थाका है, यह ४ थे पुष्पमें देखें । विद्या ( ख ) यदि क्षतत्राण से क्षत्रिय माने जाय, तो द्रोणाचार्य भी ह्रीं । क्षत्रिय होंगे, कृपाचार्य भी, अश्वत्थामा भी; पर वे ब्राह्मण कहे गये । यदि वे क्षतत्राण - कर्ता नहीं थे, तो दुर्योधनादि- कौरव टा-तथा धृतराष्ट्रादि भी क्षतत्रारणकर्ता नहीं थे, तब वे भी क्षत्रिय न होंगे । जो कि रघुवंशका ' क्षत्रात् किल त्रायते ' यह श्लोक सहा-| ' ' " दिया जाता है; तो दिलीप क्षतत्राण नहीं कर सके; तो क्या वे और क्षत्रिय नहीं रहे । क्षतत्राण न करनेवालेको ' उपक्रोश मलीमस ' तो कहा है, निन्दित तो किया है, अक्षत्रिय नहीं कहा । तब ' युद्धे चाप्यपलायनम् ' ( गी. १८ | १३ ) से विरुद्ध कर्ण - श्रादिके युद्धसे भागने वाले युधिष्ठिर क्षत्रिय न रहेंगे । वस्तुतः ' राजन्य ' भी जाति-Chor शब्द है, क्षत्रिय भी, जैसे कि ' चत्राद् घः ' ( पा ० ४ | १ | १३८ ) और CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ङ ) ८३१ ' राजश्वशुराद् यत् ' ( ४ | १ | १३७ ) यहाँ पर दोनोंमें ' जाती एव इति वक्तव्यम् ' से जाति - अर्थ में ही यह शब्द बनते हैं, अन्य अर्थमें तो ' क्षात्रिः ' तथा ' राजनः ' ही बनते हैं. ' क्षत्रियः, राजन्यः ' नहीं । इस पर स्वामी दयानन्दजीने स्त्रैणताद्धित ' ' ( पृष्ठ ४१-४२. ) में कहा है ' राजन्यः ' जो क्षत्रिय [ जातिवाला ] हो, नहीं तो ' राजनः ' । ' क्षत्रियः ' यहाँ भी जाति ही समझनी चाहिए, जहाँ जाति न हो, वहाँ ' क्षात्रिः । ” ‘ शुद्रा चामहत् - पूर्वा जाति: ' इस वार्तिकले शुद्र भी जाति - शब्द प्रतिफलित होता है । ' वृषली ' भी जातिका ही उदाहरण है । देखिये ४ । १ । ६३ पाणिनिसूत्रका उदाहरण । स्वामी दयानन्दजीने ' ब्राह्मणी ' को भी ' जातेरस्त्रीविषयाद् ' ( पा ० ४ | १ | ६३ ) से जाति - अर्थ में ' डी ' किया है । यहाँ उनकी भूल रही है. यहाँ जाति - श्रर्थमें शार्ङ्गरवादिगण में पठित होनेसे उसे ' ङीन ' ( ४ | १ | ७३ ) करना चाहिए । पर जाति- अर्थ में ' ब्राह्मणी ' की सिद्धि उनके मत में भी सिद्ध हो जानेसे गुण - कर्मो का यहाँ नाम भी न रहा । जब ब्राह्मण जाति सिद्ध होगई, तब उस जातिके व्यक्तियोंमें गुण तथा दोष दोनोंका समावेश हो जाता है । जैसे कि गो - जाति है, किसीने कहा - ' गाय लाओ ', तो अच्छी गाय भी लाई जा सकती है, लंगड़ी - लूली भी । इसका उदाहरण ' महाभाष्य ' के पस्पशान्हिकमें भी देखिये- वहाँ ' अ इ उ ण ' पर प्रश्न था कि यदि इष्ट - वर्णोंके ज्ञानकेलिए ही यह अक्षर पढ़े गये हैं, तो दीर्घ-प्लुत आदि - आदि गुणोंवाले अक्षर भी पढ़ने चाहिएँ, इसपर Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 428

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८३६ श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) उत्तर दिया गया कि — ' आकृत्युपदेशात् सिद्धम् ' अर्थात् जातिपक्ष होनेसे इस प्रकारके गुण उसमें स्वयं गृहीत हो जाते हैं । तब प्रश्न हुआ कि यदि जातिमें गुण गृहीत हो सकते हैं, तो दोष भी गृहीत हो सकते हैं, तब जातिपक्ष में संवृत आदि दोषोंका भी ग्रहण हो जायगा, उनको हटानेकेलिए कहो ' संवृतादीनां प्रतिषेधः ' । इससे सिद्ध हुआ कि जातिमें गुण और दोष दोनों गृहीत हुआ करते हैं । न गुणोंसे उस व्यक्तिकी जाति उससे भिन्न बड़ी हो जाती है, और न दोषोंसे उसकी भिन्न, निम्न जाति हो जाती है, इसलिए ' न्यायदर्शन ' के ' सम्भवतोऽर्थस्य ' ( १२/१३ ) सूत्रमें ' व्रात्योऽपि ब्राह्मणः ' और ' मनुस्मृति में ' व्रात्यात्तु जायते विप्रात् ( ब्राह्मणात् ) ' ( १०/२१ ), ' राजन्याद् व्रात्यात् ' ( १०/२२ ) ' वैश्यात्तु जायते ब्रात्यात् ' ( १०।२३ ) व्रात्य - ब्राह्मण, व्रात्य - क्षत्रिय, व्रात्य वैश्य कहे गये हैं । व्रात्य उसे कहते हैं, जिसका उपनयन अपनी अवधिमें न हुआ हो, अतः विद्यादि - सद्गुण सञ्चित न किये होनेसे स्वकर्मपतित हो । इतना होने पर भी जब वे ब्रात्य अपने - अपने वर्णवाले ही माने गये हैं, तब वर्ण - व्यवस्था तो जन्मसे ही सिद्ध होगई । हाँ, सम्मान गुण - कर्मेंसे रहा । उस व्रात्य - त्राह्मणको यज्ञमें न बुलाया जायगा । इन शास्त्रीय - निर्देशों-से सिद्ध होता है कि वर्ण - व्यवस्था जन्मसे होती है, जन्म होनेसे ही जाति मानी जाती है और उस जातिमें गुण - दोष दोनोंका समावेश हो जाता है, तो जाति में भी वे दोनों ( गुणी. एवं दोषी ) बराबर होगये । हाँ, वे गुण - दोषसे बढ़िया घटिया, CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्था जन्मना उत्तम - अधम सिद्ध होगये । उनको ' सुब्राह्मणः ', ' कुत्राह्राण: ' इसी-लिए कहा जाता है कि ब्राह्मण तो जाति है, वह कु - सु दोनों में सञ्चयका और श्र बराबर रहती है, हाँ ' सु ' से उसका जन - सम्मान होगा, ' कु ' से दुर्दशा उसका वह सम्मान नहीं रहेगा । इसलिए कहीं - कहीं शास्त्रों में इससे सि ' जाति'की निन्दा आई है कि वह अच्छे - बुरेको वरावर कर दिया करती है, जैसे — ' आहूतेषु विहंगमेषु मशको नायान् पुरो वा फिर उच्च वि वार्यते ’ · ‘ धिक् सामान्यमचेतसं प्रभुमिवाऽनामृष्टतत्त्वान्तरम्' आई है. ( काव्यप्रकाश, दशम - उल्लास के अन्तमें ) इस जातिकी निन्दा उनका ही सिद्ध हो जाता है कि चाहे उत्कृष्टगुण - कर्मा हो, चाहे निकृष्ट- लिखी गुण - कर्मा, वह अपनी ही ब्राह्मणादि - जातिवाला है, भिन्न जाति जो वाला नहीं । करना यदि कोई क्षत्रियादि उत्तम विद्या पढ़कर ब्राह्मण बन गया, प्रणेता तो ब्राह्मणोंमें साधारण होगया, उसकी पूछ - ताछ भी न होगी । दि यदि वह उत्तम - विद्यावाला क्षत्रियादि अपने वर्ण में बना रहा, व्युत्पत्त तो उसकी प्रशंसा होगी इसकी बहादुरी है । समय पर वीणा महो आदिका लोहा सोनेसे भी मंहगा विकता है, पर रहता वह बल्कि व लोहा ही है । यदि किसी क्षत्रियादि ने भी उत्तम विद्या प्राप्त शूद्र क कर ली, तो उसके ब्राह्मण वननेका प्रश्न भी नहीं आता, क्योंकि धातुमें ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्यको आचार्यकुलमें विद्या तो बराबर ही पढ़नी का है । तब विद्या दिसे क्षत्रियादिकी ब्राह्मणता कैसे प्रसक्त ' श्रमिक हो सकती है? आशा है - पाठकोंने इसे सम्यक् - रूपसे समझ वादीक लिया होगा । सनातनधर्म तत्तद् - वर्णको अपने - अपने गुण - कर्म के ६ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 429

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८३७ ५३८ ' इसी सञ्चयका निषेध नहीं दोनों और अपने - अपने ' कु ' से दुर्दशा दिखलाता है । इससे सिद्ध हो रहा बरकर वा उच्चता बतलाई पुरो फिर विद्वत्ता आदि श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) करता, वल्कि वही तदर्थ प्रेरणा करता है । वके कर्मोंको न करनेवालोंकी परलोकमें देखिये इसपर ' मनुस्मृति ' ( १२।७०-७१-७२ ) । है कि शास्त्रोंमें जो कि ब्राह्मणोंकी प्रशंसा है, वह जन्मसे ब्राह्मण - वर्ण में उत्पन्न होकर प्राप्त करके स्वस्वकर्म में संलग्न होनेवालोंकी न्तरम् ' श्राई है, क्षत्रियादि - वर में उत्पन्न होकर उत्तम गुण - कर्मोसे वहाँ न्दा उनका ब्राह्मण हो जाना वा उससे उनकी प्रशंसा कहीं नहीं निकृष्ट- लिखी गई । -जाति जो कि वादी शुद्र - शब्द की व्युत्पत्तिसे अपना पक्ष सिद्ध करना चाहता है; ' वर्णव्यवस्थाका वैदिकरूप ' ( पृ ० १० ) में उसके प्रणेता वादिमान्य यार्यसमाजी लेखक महाशयने ' शुचा द्रवति ' गया, गी । आदि शुद्रवर्णंकी व्युत्पत्तिको भी काटा है और कहा है- ' यह रहा, व्युत्पत्ति व्यभिचारी भी है, क्योंकि इसकी व्याप्ति दूसरे वणाँमै वीणा मी हो जाती है, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य भी शोक - ग्रस्त होते हैं, T वह बल्कि वह श्राजकलके शूद्रों से भी अधिक ' ( पृ ० १३ ) । सो ' तपसे प्राप्त शूद्र'का भाव है — श्रमिक, श्रमशील । ' श्रमु तपसि खेदे च ' इस योंकि धातुमें ' श्रम ' का अर्थ ' तपः ' लिखा है, सो श्रम और तपके ढ़नी एकार्थक होनेसे ‘ तपसे'का अर्थ है ' श्रमाय ' । इसी कारण शूद्रको सक्त ' श्रमिक ' कहते हैं । यहाँ तपस्याका कोई तात्पर्य नहीं । अतः इसक वादीकी पक्षसिद्धि इससे कुछ भी नहीं । ६ पू ० ~~ ‘ उपह्वरे गिरीणां सङ्गमे च नदीनाम् । धिया विप्रो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat वर्णव्यवस्था जन्मना ८३६ अजायत || ' अर्थात् पर्वतोंकी उपत्यकाओं और नदियोंके सङ्गम इत्यादि स्थानों पर रहकर वेदाध्ययन और ध्यानाभ्यास आदि करके ( धिया ) बुद्धि और शुभ कर्म से मनुष्य ब्राह्मरण बन जाता है । ' घी ' के बुद्धि और कर्म ये दो अर्थ ' निघण्टु ' में पाये जाते हैं । अतः इस वेदमन्त्रके आदेशानुसार शुद्ध पवित्र सूक्ष्मवृद्धि तथा वेदाध्ययन, अध्यापन, यज्ञ करना, कराना इत्यादि शुभ कर्मोंसे कोई भी मनुष्य ब्राह्मण बन सकता है । ६ उ ० — ‘ उपह्वरे गिरीणाम् घिया विप्रो श्रजायत ' ( यजु ० २६ | १५ ) यह मन्त्र देकर ' धिया - बुद्धि और गुण - कर्मसे मनुष्य ब्राह्मण वन जाता है ' यह थे जो किया जाता है, वह भाष्य-कारोंसे विरुद्ध है । ' विप्रः ' का निघण्टुमें ' मेघावी ' थें त्राता है, त्राह्मण नहीं । वेदके भाष्यकार सर्वत्र ' विप्रः ' का मेवावी ही अर्थ करते हैं, ' ब्राह्मण ' नहीं । यजुर्वेदके प्रकृत - मन्त्रमें यज्ञप्रकरण-वश ' सोम ' का अर्थ है, देवता भी सोम है । ऋ ० सं ० ( ६२८ ) मन्त्रमें इन्द्र - देवता होनेसे ' इन्द्र ' का अर्थ है । आर्यसमाज-प्रकाशित - यजुर्वेद में भी इस मन्त्रका देवता ' विद्वान् ' है, सो यहाँ ' विप्रः ' का अर्थ विद्वान् है, ' ब्राह्मण ' नहीं । यदि ' विप्र'का मनुस्मृति प्रसिद्ध - ' ब्राह्मण ' अर्थ वेदमें माना जाय, तो ' अथर्ववेद'-के ब्रात्यकाण्डमें भी ' ब्रात्य ' का मनुस्मृति - प्रसिद्ध मूर्ख - ब्राह्मण अर्थ करके, मूर्ख - ब्राह्मणका सत्कार करके जन्मसिद्ध - वर्णव्यवस्था मान लेनी चाहिए । यहाँ स्वतन्त्र अर्थ यह है कि पहाड़ोंके एकान्त - प्रदेशमें तथा गङ्गा - यमुना आदि नदियोंके सङ्गमक्षेत्रमें . An eGangotri Initiative

पृष्ठ 430

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८४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) रहनेसे प्राप्त हुई तीब्र - बुद्धिसे पुरुष विप्र - विद्यावान् - ' विद्यया याति विप्रत्वं ' अर्थात् विद्वान् हो जाता है । बुद्धि सभी वर्णोंके-लिए अनिवार्य होती है, केवल ब्राह्मणोंकेलिए नहीं, क्षत्रिय बुद्धिसे ही सेना - व्यूह - निर्माण, सेनासञ्चालन -कौशल करता है । वैश्य वुद्धिसे ही वाणिज्य करता है । शूद्रादि, शिल्पनिर्माण भी बुद्धिसे करते हैं । अतः यहाँ ' ब्राह्मण ' अर्थ करना असङ्गत है । अथवा इसमें यह जानना चाहिये कि - ' विद्यया याति विप्रत्व ' यह बात ' जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः ' के लिए है क्योंकि - यह उसीका उत्तरार्ध है । देखिये अत्रिस्मृति ( ११८ ) जो वह जन्म - ब्राह्मण पर्ववादि एकान्तप्रदेश, तथा गङ्गा - यमुना आदिमें रहनेसे सुन्दर उक्त प्रदेशोंके माहात्म्यसे विद्या प्राप्त करके ' विप्र ' पदका अधिकारी हो जाता है । सो यह ' विप्र ' शब्द कभी अब्राह्मणके लिए नहीं आता; किन्तु ब्राह्मणकेलिए ही आता है; तब इससे गुण - कर्मणा वर्णव्यवस्थाकी कुछ भी सिद्धि नहीं; किन्तु जन्म-ब्राह्मणके अलङ्कारक गङ्गा - यमुना - सङ्गम आदि सूचित किये गये हैं । ७ पू ० - ब्राह्मणादि - शब्द मूलमें जातिवाचक नहीं हैं, वे गुणवाचक हैं । महाभाष्यकार - पतञ्जलिने यह निर्णय दिया है कि ' त एते शब्दा गुणवाचकाः, न जातिवाचकाः । ' ' ब्राह्मणादि शब्द जातिवाचक हैं ' ऐसी कल्पना हमारी ऋषिकल्पनाको मान्य नहीं थी, इससे यह प्रतीत होता है । यद्यपि आजकल ब्राह्मणादि शब्द जातिवाचक हो चुके हैं, परन्तु वास्तवमें यह कल्पना CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्था जन्मना 581 ८४२ निराधार ही है । ७ उ ० — यह कहना ही सर्वथा निराधार एवं भ्रामक है । मद्दा- कहत भाष्यकारके आशय को विना समझे उसे विकृतरूप दे डाला हो गया है । ' महाभाष्य'का पाठ इस प्रकार है - ' अथवा गुण शब्दा गुणसमुदायेषु वर्तन्ते - ब्राह्मणः, क्षत्रियो, वैश्यः, शुद्र इति हुए, ‘ तपः श्रुतं च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मण्यकारकम् । तपः श्रुताभ्यां यो उसे हीनो जातिब्राह्मण एव सः ' । तथा गौरः, शुच्याचारः, पिङ्गलः, योनि कपिलकेश इत्येतानप्यभ्यन्तरान् ब्राह्मण्ये कुर्वन्ति । समुदा लक्षर च वृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि वर्तन्ते । तद्यथा - ' तैलं भुक्तं, घृतं भुक्तम्, शुक्लो नीलः । एवमयं समुदाये प्रवृत्तो ब्राह्मणशब्दोऽ वेदा वयवेष्वपि वर्तते - जातिहीने गुणहीने च । गुणहीने तावत्- हुए, ' अब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठन् मूत्रयति । ' जातिहीने सन्देहाद् दुरुपदेशाञ्च ब्राह्मणशब्दो वर्तते । ' यह पाठ २२२२१२६ में तथा ५।१ २ ।११५ में लिय है । यहां ' त एते गुणवाचकाः शब्दा, न जातिवाचकाः ' ऐसा पाठ कोई कहीं भी नहीं है 1 । ' न जातिवाचकाः ' वह वादीके अपने शब्द हैं, नहीं ' महाभाष्य ' के नहीं । भाव यह है कि ' महाभाष्य ' ने ब्राह्मणादि कहाव मुख्य ब्राह्मणको लेकर उसे गुणसमुदायवाचक माना है, उसमें नहीं में भाष्यकारने ' जाति ' को भी गुण में शामिल किया है । भाष्यका अपन यह तात्पर्य है कि तप, श्रुत ( वेदाध्ययन ) तथा योनि ( ब्राह्मणसे कर ब्राह्मणी - पत्नीमें जन्म ) यह ब्राह्मण बनानेवाले हैं । जिसमें तप प्रकार और श्रुत नहीं, केवल योनि है, वह ' जातिब्राह्मण ' है । इसमें घ वाढ़ी की कोई इष्टसिद्धि नहीं, क्योंकि भाष्यकारने तप और श्रुत ' शङ्क Gujarat. An eGangotri Initiative