सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 481–488
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 481–488
पृष्ठ 481
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३८ श्रीसनातनधर्मालांक ( ६ ) पद छिपा देते हैं । कभी दो पदोंको एक पद कर देते हैं, कभी एक पदकों दो पद कर देते हैं । कभी चतुर्थीको तृतीया कर देते हैं । जितने ' छल ' हैं; उन्हें करनेकेलिए वे सदा तैयार रहते हैं यहाँ भी वही लीला है । यहाँ ' अस्यते ' चतुर्थ्यन्त एक । जिसका अर्थ है- ' वाणप्रक्षेप्त्रे '; यहाँ उससे ' नमः ' का योग पद था, था । दूसरे ' नमः ' का योग ' प्रतिहितायै ' ( प्रेपितायै इषवे ) इस पदसे था ( वेद में इषु शब्द स्त्री - लिंग में भी आता है ), पर वादीने ' अस्य ते ' इस प्रकार दो पद कर दिये, और अर्थ किया— ' इस तेरेलिए ' । भिन्न - विभक्तिक पदोंका एक ही विभक्तिका अर्थ कर दिया! यह है वेदके अङ्गोंको छुरीसे काटना । यहाँ भी रुद्र प्रथमान्त विशेष्य है; अतः वादीके अनुसार ही ' नमस्ते ' का एकपदत्व खण्डित होगया । पृ. १७ में ' स्त्रियों को नमस्ते ' बताते हुए वादीने ' नमस्ते घोषिणीभ्यः नमस्ते - केशिनीभ्यः ' ( अ. ११/२/३१ ) प्रमाण दिया है, पर यह रुद्रकी सेनाओं को नमस्कार है, वहीं अन्तमें कहा है-' नमस्ते देव! सेनाभ्यः ' ' हे देव! ते - तव सेनाभ्यो नमः ' । यहां बहुवचनमें भी ' नमस्ते ' नहीं, किन्तु एकवचनमें है । इस विषय में स्पष्टता १-२ पुष्प में देखें । पृ. १८ छोटी - छोटी बालिकाओं केलिए ' नमस्ते ' दिखलाते हुए वादीने ' नमस्ते जायमानायै जातायै उत ते नमः ' ( अ. १०।१०।१ ) मन्त्रको उद्धृत किया है । पर यहाँ गायका वर्णन है, इसलिए उत्तरार्ध में ' वालेभ्यः, शफेभ्यः रूपाय अघ्न्ये! ते नमः ' CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नमस्ते प्रदीप ' का निर्वाप ६३३ कहा है । ' अन्य ' यह निघण्टु श्रादिके अनुसार गायका नाम है, कुमारीका नहीं? अतः यहाँ ' हे श्रन्ये! ' जायमानायें ते तुभ्यं नमः, जातायै उत ते नमः ' यह अन्यय स्पष्ट है । पर वादीने जातायें - उन लड़कियोंका भी ' नमः ते अन्नादि से सत्कार करो ' यह अर्थ करके वेदमें यहाँ ' ते ' शब्द निरर्थक कर दिया । और उससे विरुद्ध ' जायमानायै नमस्ते ' यहाँ ' नमस्ते'को एक पद मान लेना दुराग्रह है । यहाँ ' अघ्न्ये! ' यह प्रथमान्त - विशेष्य होनेसे ' नमस्ते'को एक पद बताना वादीकी ही पूर्वोक्त परिभाषा से कट गया । पृ. २६ पूर्वपक्ष - ' पं ० कालूरामजीने यह लिखा है- मनु महाराजने ' नमस्तेका खण्डन करके अभिवादनका विधान किया है - ' अभिवादन - शीलस्य ' ( २।१२१ ) । यदि नमस्ते विधेय होता, तो व्याकरण आदिमें भी अभिवादन न किया जाता । ( उत्तर ) मनुमें नमस्तेका खण्डन कहीं पर नहीं है, किन्तु अभिवादनका विधान किया है जो कि - नमस्तेका पर्यायवाचक ही है । ' स ० — यह अशुद्ध है, नमस्ते अभिवादनार्थक पद किसी भी कोष वा निघण्टु वा व्याकरणमें नहीं । हां, ' नमः ' तो है । पू ० - वेदने तो नमस्तेका ही विधान किया है, अतः सर्व-प्रथम वेदको ही स्थान देना उचित है । स ० I यह गलत है । वेदमें कहीं नहीं लिखा कि - ' नमस्ते ' इति कथनीयम् ' । वेदमें तो ' नमः, नमो वः, वन्दे ' आदि लिखा है, आप लोग उन्हें क्यों नहीं प्रयुक्त करते? Gujarat An eGangotri Initiative
पृष्ठ 482
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' नमस्ते - प्रदीप ' का निर्वाप ६४१ ६४० पू ० — मनुमहाराजके अभिवादन लिखनेसे ' नमस्ते ' का खण्डन यदि होता; तो नमस्कार, प्रणाम, जय राम, नमो-नारायण, राम - राम आदिका भी खण्डन होगया; क्योंकि - उक्त शब्दों में से किसी शब्दका विधान मनुमें नहीं । स ० I नमः, प्रणाम, नमस्कार शब्द अभिवादनार्थक हैं; तब मनुस्मृति में उनका खण्डन नहीं । पर ' नमस्ते ' यह वादीका इष्ट एक - पद कहीं भी अभिवादनार्थक नहीं माना गया; तब उसका खण्डन होगया । राम - राम आदि कहना तो अपने इष्टदेवका कीर्तन है; वह अभिवादनार्थक नहीं; तब भिन्न - विषय होने से उसका बाध नहीं । इष्टदेव - कीर्तन दोनों ओर से हो सकता है, पर अभिवादन दोनों पक्षोंसे नहीं होता, किन्तु एक पक्षसे ही; अतः भिन्न - विषय होनेसे यहाँ उनका बाध नहीं । पृ. ३१ पू ० — ' ब्रह्मन्! अतिथिर्नमस्यः, नमस्तेस्तु ब्रह्मन्! ' ( कठ. ११६ ) हे ब्रह्मवित् विद्वान्!... ( नमस्यः ) विशेषतया अभि-वादनके योग्य हो; अंतः आपको नमस्ते यह सत्कारवाचक शब्द हो ' । उ ० — यहां पर ' आपको ' किस पदका अर्थ है? जब वह ' नमस्य ' - ' नमः ' के योग्य बताया गया है, ' नमस्ते - योग्य ' उसे नहीं बताया गया; तब उसे ' नमः ' का प्रयोग होगा । हां, यदि कदाचित् ' नमस्त्यः ' होता; तब तो उसे कहा हुआ ' नमस्ते ' कदाचित् एकपद होता; पर अब ' नमः ' के योग्य होनेसे उसे ' नमः ' का कथन ही न्याय्य हैं, तब वहां ' ते नमः अस्तु ' ऐसा छेद होने पर ' नमः ' पद ही 1 CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. सिद्ध होने पर ' नमस्ते ' दो पद सिद्ध होजानेपर वादीसे सम्मत ' नमस्ते ' की एकपदता कट गई । यहां भी विशेष्यके प्रथमान्त होनेसे वादीका पक्ष ' उष्ट्र - लगुड ' - न्यायसे कट गया । वादीके शेष - प्रमाणोंका उत्तर पूर्ववत् है; और ' नमो ज्येष्टाय ' आदिका उत्तर प्रथम - द्वितीय पुष्पमें पाठकगण देख लें कि - यहाँ ' नमः ' है, नमस्ते नहीं, तब उसका एक पदत्व खण्डित होगया । ' नमस्ते ' को एक पद बनानेका स्वामीजीका हार्दिक आशय यह है कि इसमें ' ते ' बड़ेका अप्रतिष्ठासूचक है; उसीको हटानेके-लिए उन्हें यह पापड़ बेलने पड़े; पर एक - पदत्व पक्ष निराधार तथा पूर्वोक्त - रीतिसे असत्य है, अतः उससे बड़ेकी अप्रतिष्ठा बनी ही रहेगी । तव स्वा ० रामेश्वरानन्दजी के ' नमस्ते - प्रदीप ' का निर्वाप ( बुझना होगया । द्विपदतापक्ष में ' ते ' के विषय में १-२ पुष्पमें देखें । इति पूज्य श्री पं ० शीतललाल शर्म - श्रीगौरीदेवी - तनुजनुषा, मुलतान-स्थ - स ० ध ० संस्कृतकालेजभूतपूर्वाध्यक्षेण, देहली ( दरीबा - कलाँ ) स्थ-संस्कृतमहाविद्यालयाध्यक्षेण, ' विद्यावागीश ' ' विद्याभूषण ' श्रीदीनानाथ-शर्मशास्त्रिसारस्वत- ' विद्यानिघिना ' प्रणीतस्य ' श्रीसनातनधर्मालोक ' संस्कृत-महाग्रन्थस्य हिन्दी - प्रन्थमालायां षष्ठसुमनो विकासः सम्पूर्णः । इस पुष्पसे पहले के पाँच पुष्पोंको मँगाकर पाठक अपना सेट पूरा कर लें | सप्तमपुष्पके मँगानेकेलिए एक वर्षसे पहले पत्र व्यवहार करनेका कष्ट न करें; हाँ, उसकी सहायतार्थ अर्थराशिको अभीसे प्रेषित करना प्रारम्भ कर सकते हैं, जिससे उसकी तैयारी शीघ्र हो सके । An eGangotri Initiative
पृष्ठ 483
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* ' श्रीसनातनधर्मालोक' ग्रन्थमालाका परिचय प्रणेता - पं ० दीनानाथशास्त्री सारस्वत विद्यावागीश , । इस ग्रन्थमालाको १००० ) देनेवाले इसके संरक्षक माने जाते हैं, उनका चित्र छपता है, प्रत्येक प्रकाशनमें उनका नाम ५०० ) प्रदाता इसके सम्मान्य- सहायक, २५० ) दाता छपता है, मान्य- सहायक और १०० ) देनेवाले साधारण सहायक माने जाते हैं । प्रथम द्वितीय पुष्प - ( परिवर्धित - द्वितीयावृत्ति ) श्राजकल ' नमस्ते'-शब्दके प्रचारक इसका वैदिक होनेका दावा करते हैं । हमने प्रथम दो-पुष्पों में इस विषय पर विस्तीर्ण विचार दिया है । ' नमस्ते ' विषयक ट्रैक्ट हमें जितने मिल सके, उन पर ग्रालोचना भी कर दी है । साढ़े तीन सौ पृष्ठोंकी सजिल्द एवं सुन्दर इस पुस्तकका मूल्य ४ ) रु ० । तृतीय पुष्प — इसमें स्त्री - शूद्रोंके वेदाधिकार पर विचार करते हुए ' यथेमां वाचं कल्याण ' मन्त्रके वर्तमान प्रचलित ' अर्थकी आलोचना फरके उसका वास्तविक अर्थ तथा हारीतकी ब्रह्मवादिनी, ' गोभिलसूत्र ' के यज्ञोपवीतिनीं ' पदका रहस्य, ' दुहिता मे पण्डिता जायेत ', ' वेदं परन्यै प्रदाय वाचयेत् ', ' ब्रह्मचर्येण कन्या, पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ' श्रादि बहुतसे प्रमाणों के वास्तविक अर्थ बताकर, ऐतरेय - महिदास, कवष - ऐलूष, कक्षीवान, सत्यकाम जाबाल, सूत, वाल्मीकि, शवरी आदि शुद्ध थे वा शूद्र- इस पर विचार किया गया है । सजिल्द पुस्तकका मूल्य ३ ॥ ) चतुर्थ पुष्प - इसमें हिन्दु - शब्दकी वैदिकता, वेद - विषयमें भारी भूल, महाभाष्यकारके मतमें वेदका स्वरूप, वर्ण - व्यवस्था गुण - कर्म से है, वा जन्मसे, डा ० भगवान्दास के मतपर विचार, मृतकभाद्ध तथा पितरोंका टाईम टेबल, ब्राह्मण भोजन वैदिक बा अवैदिक, मूर्तिपूजा एवं CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रन्थमाला - परिचय १४३ श्रवतारवादका रहस्य, क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं, नवग्रहोंके प्रचलित मन्त्रोंका ग्रहोंसे सम्बन्ध कैसे है, ग्रहण और उसका सूतक अनेकों विषयों पर बड़े सुन्दर विचार दिये गये हैं । ५०० पृष्ठसे इत्यादि पृष्ठकी सजिल्द एवं सुन्दर इस पुस्तकका अधिक मूल्य ६ ) । पञ्चम पुष्प – इसमें हिन्दुधर्मके मुख्य विषय चोटी- जनेऊ, १६ संस्कार, सन्ध्याके सभी श्रङ्ग, मालाकी मणियोंकी १०८ संख्या यशका वैज्ञानिक महत्त्व क्या है— इत्यादि अनेकों क्यों?, करके, प्रातः से रात्रि - शयन तकके श्राचारोंकी विषयों पर विचार इसके बाद दीपमाला वैज्ञानिकता बताई गई है । , होली आदि वर्षके प्रसिद्ध - वाके वैज्ञानिक- रहस्य बताकर, श्रीगणेशका वैदिक देवत्व तथा श्रीमद्दीघरके ‘ गणानां त्वा ’ मन्त्रके माध्य पर - जिसपर प्रतिपक्षियोंकी श्रोरसे घोर - शोर मचाया जाता हे - विचार करके, श्रोङ्कारका महत्त्व बताया गया है । इसमें विषय हैं । इस सुन्दर एवं सजिल्द साढ़े नौ सौ पृष्ठकी पुस्तकका १२५ मूल्य १० ) षष्ठ पुष्प - इसमें हिन्दुधर्मके विविध विषय ६५० पृष्ठों में युक्ति-प्रमाण द्वारा साधित किये गये हैं? इसमें सनातन धर्म तथा वेदका स्वरूप दिखलाते हुए ब्राह्मणभागके श्रवेदत्व पर किये जानेवाले तकों पर युक्ति - प्रमाण द्वारा विचार करके, वेदाधिकारिविचार, ' मन्दिरोंमे अन्त्यज-प्रवेश पर वैदिक - दृष्टि ' दिखलाकर ' ढोल गँवार शूद्र पशु नारी ' मानसकी इस प्रसिद्ध चौपाईके विविध अर्थ तथा उनकी आलोचना की गई है । फिर ' क्या प्राचीन - भारतमें गोवध होता था ' इस विषय पर १६ विषयोंमें विचार किया गया है । इसके बाद ' क्या पुराणोंमें वेद- विरुद्ध अंश है? ' इस पर विचारते हुए वृन्दाका पतिव्रतभङ्ग, चन्द्रमाका गुरुपत्नीगमन, अगस्त्यका समुद्रपान, बीसे ' पुरुष, पुरुषसे स्त्री ' यादि बहुतसे विषयों पर विचार कर श्रीकृष्णके बाल्यचरित्र एवं राधा - कृष्णके परस्पर - सम्बन्ध तथा कुब्जा आदि के विषय में पूर्ण - मीमांसा की गई है, पुराणोंकी शङ्किन-कथाओं पर प्रत्यक्ष श्रखवारी घएँ भी सचित्र दी गई हैं । इसके बाद Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 484
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६४४. श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 29 सैद्धान्तिक चर्चा में वर्ण - व्यवस्था के विषय में ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' के अर्थ पर किये जाते हुए तर्कों पर विचार करते हुए ' क्या ब्राह्मणादिवर्ण वा जाति नहीं ' – इस पर तथा ' चातुर्वण्र्य मया सृष्ट गुणकर्मविभागशः ' इस विषय पर भी विचार दिया गया है । परिशिष्ट में ' नमस्ते ' के एक-पदत्वकी श्रालोचना भी दी गई है । सजिल्द इस ग्रन्थका मूल्य १० ) अग्रिम पुष्पमें वेद - स्वरूपपर विचार, क्या वेदके शब्द यौगिक हैं, वेदार्थविधानके साधन, वेदमन्त्रार्थहत्या - इन विषयों पर विचार करके, वर्ण - व्यवस्था - विषयमें दिये जाते हुए प्रमाणों पर विचार, नियोग और: मैथुन, पराशर- मत्स्यगन्धासमागम, विधवाविवाह, सायण और विधवा-विवाह, सीताकी विवाहावस्था, द्रौपदीका एक पति वा पाँच ' श्रादि विविध विषयों पर विचार होगा । सहायक शीघ्र अपनी सहायता भेजें, जिससे अग्रिम पुष्प शीघ्र विकसित हो सके । सहायता ' आलोक ' प्रणेता पं. दीनानाथशर्मा शास्त्री सारस्वत, विद्यावागीश, प्रिंसिपल संस्कृत महाविद्यालय, दरीवाकलां देहली ६- इस पतेसे भेजने का कष्ट करें । पुस्तकोंके मँगाने वा सर्वविध पत्रव्यवहारका पता -नारायणशर्मा ' राजीव ' सारस्वत शास्त्री फर्स्ट बी. १६ लाजपतनगर ( नई देहली - १४ ) 93-60 CC - 0. Ankur Joshi Collection: Coefat. An eGangotri Initiative.
पृष्ठ 485
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 486
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 487
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 488
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
CCO Ankur Joshi Collection Gujarat ArteGangotri Initiative