सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 471–480
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 471–480
पृष्ठ 471
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१७ ६१८ श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) नय उदास था । मैंने कहा आप लोगोंने जो कहा वह तो सत्य ही ठी निकला । उन्होंने कहा कि यह मर तो गया पर हम इसको नहीं ला ले जा सकेंगे; क्योंकि विष्णुके दूत आगये और वे ही इसे लेगये । ते मैंने उत्सुकता से पूछा कि ऐसा क्यों हुआ? तब उन्होंने कहा कि इसकी लाश तुलसी के पौधे में जा गिरी जो यहाँ खड़ी है, उसको तुलसी- स्पर्श हो जानेसे हमारा अधिकार हट गया और विष्णुके दूत आकर गये । दो दिन बाद उस गाड़ीवान के रिश्तेदारोंको मालूम पड़ा; तब उस स्थान पर लाश लेने गये तो लाशमें सड़ान्द कर भी उत्पन्न नहीं हुई थी, ज्योंकी त्यों लाश पड़ी हुई थी और उस लाशको जानवर भी नहीं लगे थे । इसलिए मैं उस समयसे ही न गलेमें तुलसीकी कण्ठी रखने लगा हूँ । म ( 1 ) पुराणों में कई हजारों वर्षकी आयु । १५०० डेढ़ हजार वर्ष पुराना कछुआ - ( वीर अर्जुन ६ जुलाई ५७ ) क लन्दन ८ जुलाई । पन्द्रह - सौ वर्ष पुराना एक कछुआ मंचूरिया एक चिड़ियाघर को भेंट किया गया है । १४ मन वजनका यह जन्तु ७ फीट ३ इंच लम्बा ॥ २ फीट ऊँचा है । यह उत्तरी चीन के न यांगणन द्वीपमें मछुओंको मिला और वे उसे पकड़ कर लाए । ( १० ) ज्योतिष विद्याका अद्भुत चमत्कार । ( साप्ताहिक धर्मयुग, बम्बई ७ जून सन् १६५३ पृष्ठ १३ में ' एक दिन की बात ' में मानकौर देवी ( अमृतसर ) अपने जीवन में घटी घटना इस प्रकार लिखती हैं ) - ' पिताजी पाठ - पूजा में बहुत रुचि रखते थे । व्यवसाय उनका ज्योतिष था, उसमें वह बहुत CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनायें 818 दक्ष थे । जितने मेरे पिताजी सीधे स्वभावके तथा प्रभु - भक्त थे, उतनी मेरी माँ कर्कशा स्वभाववाली तथा नास्तिक थीं । एक दिन माँ तथा पिताजी में मेरे विवाह पर झगड़ा हो रहा था और पिताजी माँ को समझा रहे थे कि लड़की की किस्मत में शादीका बहुत बुरा प्रभाव है; परन्तु माँ मेरे पिताजीको बहुत बुरा कह रही थीं । दिन बीतते गये । पाँच साल इसी तरह कलह में निकल गये । जब भी मेरी माँ पिताजी से मेरी शादी की बावत कहतीं, तब ही मेरे पिताजी कह देते कि शादीका फल बहुत ही बुरा है । मेरी माँ उन्हें कोसती और ज्योतिषको बुरा भला कहती । आखिर शादीका दिन आगया, बड़ी धूमधाम हुई । पानीकी जगह दूधका प्रयोग किया गया । जब मैं डोलीमें बैठी, तो खूब रोई । माँ भी रोई पर वह प्रसन्न थी । पिताजी मुझे समझाने लगे - वेटी, अभी घण्टे भरमें तुम्हें वापिस जाना है, तुम क्यों व्यर्थमें रोती हो? अभी मेरी डोली वाजारके दूसरे मोड़ पर मुड़ी ही थी कि पीछेसे एक साँड दूसरे साँसे हारा हुआ भागता आया और एकदम मेरे पतिसे भिड़ गया । मेरे पति एकदम गिर पड़े और गिरते ही उनके प्राण - पखेरू उड़ गये । मेरी डोली उसी रास्तेसे अपने घर वापिस आ गई । इन सब कार्योंको लगभग आधा घण्टा लगा और पिताजीके वाक्य विल्कुल ही ठीक निकले । उस दिनसे पिताजीने ज्योतिष-व्यवसाय बन्द कर दिया और वाकी आयु प्रभु - भक्ति में व्यतीत की और ठीक सात वर्ष बाद प्राण त्याग दिये ' । Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 472
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( ११ ) तीर्थोंमें कामवासनाका अन्त हो जाता है । ( वीर - अर्जुन देहली २१-३-१६५५ ) विराटनगर १६ मार्च । मलाकू - पर्वत पर चढ़नेवाले फ्रांसीसी पर्वतारोही दलके सदस्यों-ने बताया कि १७ हजार फीट ऊँचा चढ़ने पर कामवासना लुप्त-प्राय हो जाती है । इन सदस्योंके कथनानुसार इसी कारण से संसारसे विरक्त होकर साधु बननेवाले हिन्दु - गृहस्थ तप करने-केलिए हिमालयके हिमाच्छादित प्रदेशको चुनते थे । इस प्रदेशमें पहुँचने पर समाधिकेलिए आवश्यक एकान्तके अतिरिक्त काम-वासना समाप्त हो जाती है । किन्तु नीचे आनेपर उन्होंने बताया कि ज्योंही व्यक्ति यहांके वातावरणमें समरस हो जाता है यह वासनाएँ पुनः जागृत हो जाती हैं । इन सदस्योंका कहना है कि हिन्दु साधु - मुनियोंको यह रहस्य ज्ञात था, इसलिए वह संसारसे विरक्त होनेवाले लोगोंको यहाँ जानेकी सलाह देते थे । ( १२ ) साधुने गाड़ी अपनी शक्तिसे रोक दी । ( नवभारतटाइम्स ता ० ६ सितम्बर १ ९ ५८ ) मारवाड़ जंक्शन । हाल ही में यहां एक विचित्र घटना घटी, जिसकी चर्चा हर व्यक्ति के मुँह पर है । बताया जाता है कि उदयपुरको जानेवाली एक गाड़ीके सैकेण्ड - क्लासके एक यात्रीसे एक साधुने आठ आने मांगे । यात्रीके इनकार करनेपर उक्त साधुने घोषणा करदी कि जब तक यह यात्री मुझे आठ आने नहीं दे देता; गाड़ी नहीं चल सकती । उसके बाद ड्राइवरके काफी प्रयास करनेपर भी उक्त ट्रेन नहीं चली, तब स्टेशन मास्टर वा गार्डने उक्त यात्रीसे आठ CC - 0. Ankur Joshi Collection ६२२ प्रत्यक्ष घटनायें २१ आने दिलाये और साधुसे प्रार्थना की कि वह गाड़ी चलने दे । हुआ, तब साधुके कहने पर गाड़ी चली । ( १३ ) पीपल काटनेका दण्ढ । ( मुसलमान मिस्त्रीने पीपल काटनेका प्रत्यक्ष फल, क्या पिलखुवाके पास की बात है कि एक गांवमें एक सायं गया लड़के पाया? ) मुना प राजपूतने अपना पीपल २०० ) रु ० में दलवीरखाँ बढ़ईको बेचा और उसका साझी था इसाकखाँ बढ़ई । यह घटना सईदखाँ - मिस्त्री पिलखुवा की देखी हुई है । जब काटनेका नम्बर आया तो रात्रि को दलवीरखाँ बढ़ईको स्वप्न हुआ - जिसमें पीपलने उससे कहा कि लखन तू मुझे अपना समझकर छोड़ दे, काट मत, और जो तुझे १०० ) भवन रु ० देने हैं, वह रुपये मय मुनाफेके तुझे मिलेंगे, मेरी जड़में सोना प्रजा रक्खा है ले ले । वह प्रातःकाल चुपचाप पीपल के पास गया और मिल जड़ को खोदकर देखा तो उसमें वास्तवमें सोने की सलाख नहीं निकली, जिसे वह चुपचाप घर में ले आया और साभी -इसाक है । को नहीं सुनाया । जब पीपल कटनेका नम्बर आया तो सलाख जिस मिल जाने पर भी वह और उसका साझी इसाक उसे काटने जा जयप्र पहुँचे । उन्होंने सैकड़ों वृक्ष काटे होंगे पर आज जब उन्होंने इस काटनेकेलिए पीपल पर कुल्हाड़ी चलाई. तो वह यह देखकर श्राश्चर्यचकित हो गये कि कुल्हाड़ी के लगते ही पीपलमेंसे एकदम खूनके फव्वारे छूटे और आस - पास में खड़े सभीके कपड़े खूनमें भीज गये । बढ़ईके एक ही लड़का था और वह पहले दिन बिल्कुल ठीक था, पर ज्योंही पीपल पर कुल्हाड़ा लगना प्रारम्भ मुज Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 473
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २१ हुआ, त्योंही उसका लड़का वीमार हो गया और देखते - देखते दे । सायं तक मर गया । श्रव तो सारे घर में रोना - पीटना शुरू हो गया । उसकी बढ़इन स्त्रीने बड़ी जोरसे सबको सुनाकर कहा कि लड़के को इस जालिम - बापने मारा है । इसको जब पीपलने मय-T? ) मुनाफेके रुपये दे दिये थे तो इसने पीपल क्यों काटा? इस घटना-पूतने से सबको बड़ा आश्चर्य हुआ । सका ( १४ ) भूतसे परेशान ( मकानसे भूत भगानेकेलिए सीमेंट मँगाया ) ( ' वीर - अर्जुन ' देहली ता ० २२ फरवरी सन् १६५५ पृष्ठ ५ ) लखनऊ २० फरवरी । ' उ. प्र. सरकार जिला बलियाके एक oc ) भवनसे भूतको भगानेकेलिए सीमेंट भेज रही है । यह भवन प्रजासमाजवादी नेता जयप्रकाशनारायणको सम्पत्ति दानमें और मिला था, परन्तु उनके सेवक इस भवनमें अभी तक प्रवेश ख नहीं कर सके, क्योंकि यह चर्चा है कि इस भवनमें भूतका निवास नाक है । कथित भूतको भगानेकेलिए गांवमें एक यज्ञ भी किया गया, ख जिसकी अध्यक्षता जयप्रकाशनारायणने की । इसके बाद जा जयप्रकाशनारायणने चन्द्रभान गुप्तसे एक भेंट की और कहा कि ने इस भवन के निर्माण के लिए वह सीमेंट दें, क्योंकि सम्भवतः भूत कर नये बनाये गये मकानमें रहना न करे और वहांसे चला जाये ' । म ( १५ ) त्रिशूलकी विज्ञानको चुनौती । ( वजरङ्ग पाक्षिक २६ फरवरी १६५६ अङ्क २३ पृष्ठ ८ ) हन मुजफ्फरपुरके श्रीशिवमंदिरका त्रिशूल गत दो वर्षोंसे समय-भ CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनाएँ ६२३ समय पर कई दिनों तक हिला करता है । मन्दिरकी छत पर भगवान् शंकर की सीमेंटकी बनी हुई मूर्तिके आगे जो त्रिशूल है वह लोहेका है और इसपर चमकीला रंग चढ़ा दिया गया है । जनवरी सन १६५४ में यह त्रिशूल कई दिनों तक दिन-रात हिलता रहा और इसे देखनेकेलिए १ लाखसे अधिक नर-नारी आये । बिहारके एक मन्त्री श्रीमहेशप्रसाद सिंह और विहारके अनेक उच्चाधिकारी तथा अनेक इञ्जीनियर और कई वैज्ञानिकोंने इस त्रिशुलको देखा और इसके हिलनेके कारणका अनुसन्धान किया, किन्तु उन सबको सफलता नहीं मिली । यह धार्मिक - त्रिशूल विज्ञानको चुनौती दे रहा है । ( १६ ) मैंने सनातनधर्मंकी शरण और श्रीकृष्ण - नामका जप क्यों ग्रहण किया? अभी उस दिन पिलखुवा हमारे स्थान पर सुप्रसिद्ध सनातन-धर्मी राजा महाराज वरौली, महाराज गभाना आदि राजागरण पधारे थे । महाराज बरौलीके साथ में श्रीस्वामी सर्वदानन्द परिव्राजक एम. ए. एल एल. वी. भूतपूर्व डिप्टी कलेक्टर थे, आप रात्रिको हमारे स्थान पर ठहरे । आपने अपनी जबानी अपनी कहानी इस प्रकार सुनाई— ' मैं कट्टर आर्यसमाजी रह चुका हूँ और दस वर्ष तक आर्य-समाजकी सेवा कर चुका हूँ और कई वर्ष तक कट्टर - कांग्रेसी भी रहा हूँ, और गांधीजीके आश्रम में कई वर्ष तक रहा हूँ । मेरा गांधीजी से बड़ा घरका - सा सम्बन्ध था । कांग्रेसके बड़े - बड़े नेता मेरा मान करते हैं । परन्तु मैं अब आर्यसमाजी - लोगों की Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 474
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) इस बातको कि श्रीकृष्ण मनुष्य हैं - नहीं मानता और न मैं गांधीजीके अनुसार ' श्रीकृष्ण काल्पनिक हैं ' इस बात में विश्वास करता हूँ । मैं आज श्रीकृष्णको परब्रह्म मानता हूँ और श्रीकृष्ण-भजन करनेमें और ' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' मन्त्रका जप करनेमें संकोच नहीं, वरन् गौरवका अनुभव करता हूँ । आर्यसमाजी वा कांग्रेसी होकर भी मेरे जीवनमें ऐसा एकदम परिवर्तन क्यों हुआ, उसका एकमात्र कारण हैं मेरे आंखों देखी अद्भुत आश्चर्यजनक घटनायें, जिनका उत्तर मुझे आर्यसमाज न दे सका और मुझे बरबस सनातनधर्म और श्रीकृष्णकी शरण में आना पड़ा । घटना इस प्रकार से है-मेरे पूज्य पिता बड़े ही कट्टर - आस्तिक सनातनधर्मी मूर्तिपूजक थे, पर मैं अँग्रेजी पढ़नेके कारण आर्यसमाजी बन गया और विदेशों में भी गया और कांग्रेसी बन वर्षों गांधीजीके आश्रम में भी रहा और गांधीजीसे मेरा बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध रहा । आश्रममें रहकर मैंने सब बातें देखीं जिन्हें मैं बताना उचित नहीं समझता । मैं डिप्टी कलक्टर भी वर्षों रह चुका हूँ । जबकि मैं कट्टर आर्यसमाजी था श्रीकृष्णको मनुष्य मानता था श्रीकृष्णके भजनको व्यर्थ समझता था, तो एक दिन रात्रि में सोती बार स्वप्न में क्या देखता हूँ कि मेरे सामने महर्षि नारदजी महाराज खड़े हैं और मुझे ' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' मन्त्र जपने को कह रहे हैं । मुझे इस अद्भुत घटनासे बड़ा आश्चर्य हुआ और भगवान् - श्रीकृष्णकी ओर मेरा ध्यान आकर्षित हुआ । CC - 0. Ankur Joshi प्रत्यक्ष घटनायें एक बार जबकि मैं चित्रकूट में गया मैं १२ कोस की पैदल यात्रा की । घूमते -भूख से व्याकुल हो गया और रास्ता भी रहा था कि अब कहां जाऊँ, क्या करूँ, २५ पु घटना हुआ था, तो एक दिन बताया घूमते मैं थक गया और शंकरा भूल गया । मैं सोच कर लि तो इतनेमें मुझे सामने सम्बन एक वयोवृद्ध तपस्वी जटाजूटधारी साधु धूनी रमाये बैठे दिखलाई रखते पड़े । मैं थका हुआ था ही, मैं उनके पास जाकर बैठ सन् १ गया । और उन्होंने वहीं बैठे - बैठे मुझे जो बातें मेरे साथ घटी - बताई, जिन्हें जिसक सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ और साथ ही मुझे भूखा जानकर इ उन्होंने मुझे खिचड़ी बनाकर खिलाई । जो स्वाद मुझे उस खिचड़ी सोहन में आया ऐसा जीवन में आजतक स्वाद नहीं आया । मैं रात्रिको १०० उन्हीं महात्माजीके पास सो गया । सुबह प्रातःकाल उठकर जो . आंख खोलकर देखता हूँ कि न तो वह रात्रिवाला जंगल है, न धूनी है, न धूनी रमानेवाले साधु बाबा हैं । मैं एकदम १२ कोस दूरी पर श्रीगंगाके किनारे बैठा हूँ । यह देखकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा । मैंने पुराणोंकी बातोंको सत्यरूपमें पाया । आर्यसमाज के श्रीनारायणस्वामीजी के पास जाकर उनके सामने रक्खीं, तो उनके पास इन बातोंका सन्तोषजनक उत्तर नहीं पाया । और भी जीवनमें अनेकों आश्चर्यजनक घटनायें देखी, जिनके कारण विवश हो मुझे अपना हठ छोड़ श्रीकृष्णको परमात्मा मान श्रीकृष्ण - शरण में आना पड़ा । मैं श्रीकृष्णकी गीताका पाठ करता हूँ और प्रतिवर्ष श्रीबदरीनारायणकी यात्रा करने जाता हूँ और बद्रीनाथजीका दर्शन कर शान्तिका अनुभव करता हूँ । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 475
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १७ ) परकाया प्रवेशकी बात । २५ पुराणोंमें परकायाप्रवेश सम्वन्धी अनेकों श्राश्चर्यजनक घटनायें आती हैं, जिन्हें पढ़कर आर्यसमाजी आदि गप्पबाजी बताया करते हैं और हँसी में उड़ाया करते हैं । जगद्गुरु भगवान्-र शंकराचार्यजी महाराजने एक राजा के मृतक - शरीर में प्रवेश कर लिया था — इसे भारतका बच्चा - बच्चा जानता है । इसी च सम्बन्धकी एक बिल्कुल सत्य घटना आलोक ' ' - पाठकोंके सामने रखते हैं । यह घटना ' त्यागी - ब्राह्मण ' मासिक मेरठ ( जनवरी सन् १६५८ पृष्ठ ४२ ) और ' नवभारत टाइम्स ' ( ३ जून १६५८ ) में और ' कल्याण ' ( अक्तूबर सन् १६५८ पृष्ठ १२८३ ) में छपी है । जिसका सार इस प्रकार है-इस घटना की जाँच राजस्थानके गंगानगर स्थित सेठ र सोहनलाल मैमोरियल - संस्थानके निर्देशक श्री एच. एन. बनर्जीने १०० आदमियोंके साथ रसूलपुरमें जाकर की थी, और हमारे ↑ । दूसरेकीआत्मावाला पास उन्होंने पत्र के साथ लड़केका चित्र भेजते हुए लिखा था कि हम वहाँ पर गये थे और ग्रामवासियों-के हस्ताक्षर कराये थे, तथा बहुतसे व्यक्तियों-के बयान भी लिये हैं, और उनके बयान टेव रिकार्डर पर रिकार्ड भी किये हैं, यह सब सामग्री हमारे कार्या-लयमें सुरक्षित है । घटना इस प्रकारसे है— CC - 0. Ankur Joshi Collection लड़का प्रत्यक्ष घटनायें ६२७ एक बारात मौजे केन्दुकी से ग्राम निर्माणा जि ० मुजफ्फर-नगर जा रही थी । इस बारात में एक व्यक्ति शोभाराम श्रायु-लगभग २४ वर्षे, त्यागी ब्राह्मण ग्राम बहेड़ी जिं ο मुजफ्फरनगर रेलवे - स्टेशन रोहानाकलाँको अपना रथ हाँक्कर ले जा रहा था । वह रथसे गिरा, रथका पहिया उसकी गर्दन पर से उतरा । नाक -मुँहसे रक्त बहने लगा । बेहोशी की दशा में उसे रोहाना मिलके अस्पताल ले जाया गया । यहाँ पर रातके ११ बजे वह मर गया । उसी स्थान पर उसका दाहसंस्कार कर दिया गया । उसी रातको ग्राम रसूलपुर ( जाटान ) जि ० मुजफ्फरनगर जो कि ग्राम बहेड़ी से चार मीलके फासले पर है, एक जाटका बच्चा चेचककी बीमारीसे गुजर गया । बच्चेकी आयु लगभग एक वर्ष थी । वच्चा सहसा रातके ४ वजे ( मरनेके ३-४ घंटे पश्चात् ) जी उठा । किन्तु उस बालकने इस समयके पश्चात् माँका दूध पीना छोड़ दिया । बालकका नाम जसवीर था । बिल्कुल ठीक हो जाने पर बालकमें विचित्र परिवर्तन आ गया । उसने उस घरमें खाना - पीना बन्द कर दिया और वह अपनेको ब्राह्मण बतलाने लगा । उसने कहा कि मैं रसूलपुरसे २२ मीलकी दूरी पर स्थित बहेड़ी नामक गाँवके शंकरलाल त्यागीका लड़का हूँ । उस लड़केकी माँ उसे लेकर अपने मायके जा रही थी ( ग्राम परईमें ) मार्गमें वह स्थान पड़ता था जहाँ पर उपर्युक्त घटना ( युवकके रथके द्वारा मरना ) घटी थी । वहांसे दो रास्ते जाते थे, एक ग्राम बहेड़ीको और दूसरा ग्राम परईको । लड़केने कहा Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 476
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कि मैं यहाँ रथसे गिरा था, हमारे घरका रास्ता तो उधर ( बहेड़ी ग्राम की ओर संकेत करके कहा ) को है । माँ बच्चेकी बात पर ध्यान न देते हुए उसका हाथ पकड़ ग्राम परईकी ओर चल दी । मार्च सन १६५८ की बात है कि केनको - आपरेटिव सोसायटीका कामदार जगन्नाथप्रसाद ( बहेड़ी निवासी ) एक दिन ग्राम रसूलपुर जाटान गया । वहीं जाटनीका लड़का जसवीर जिसकी आयु अब ५-६ वर्षकी हो चुकी है बच्चों में खेल रहा था । उसने पुकारा ' अरे श्री जगन्नाथ '!!! जगन्नाथने चौकन्ना होकर इधर - उधर देखा । कोई परिचित व्यक्ति दिखाई न पड़ा और वह चल पड़ा । लड़केने पुनः पुकारा जगन्नाथ! यहाँ सुन । उसने जगन्नाथसे राम - राम करके कहा — मुझे बहेड़ी ले चल । जगन्नाथने कहा— तू किसका लड़का है? उस लड़केने प्रारम्भसे लेकर अन्त तक अर्थात् रथसे गिरकर मरने तककी घटना सुनाई । जगन्नाथने चर्य पूछा- फिर तू यहाँ कैसे आया? लड़के ने कहा फिर गिरकर मरनेके बाद मुझे और कोई जगह न मिली । यह शरीर खाली देख इसमें आगया । श्रीजगन्नाथने यह पूरी घटना बहेड़ी जाकर ग्रामवालोंको सुनाई । लड़केके ताऊ- चाचा आदि सम्बन्धी गाँव - रसूलपुर गये । लड़केने उन सबको पहचाना और नाम लेकर राम - राम किया । लड़केके सम्बन्धियोंने उससे अनेक प्रश्न किये, जिनके उसने सन्तोषजनक उत्तर दिये । उन ग्रामीणोंमेंसे एक व्यक्तिने जो कि उसी रथमें सवार था और CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनायें -२६ रथसे गिरनेके पश्चात् लड़केको रथमें लिटाया और सिर अपनी गोदमें रख रहा था — कहा मेरा नाम बतला । लड़के ने कहा-नाम भूल गया, किन्तु इतना याद है कि तुमने मुझे गोद में लिटाये रक्खा था । वे उस लड़केको लेकर बहेड़ी ग्राम चले । रोहाना मिल्स स्टेशन पर आकर लड़केसे आगे - आगे चलनेको कहा गया । लड़का सीधा अपने घर पहुँचा । सवके यथोचित नाम लेकर राम - राम किया; और यह भी जिद की कि मैं यहीं रहूँगा । वह बच्चा आज भी जाटनीके घरकी रोटी नहीं खाता । उसके खानेका प्रबन्ध एक पड़ोसिन ब्राह्मणीके यहाँ है । उसने जीवित होनेके पश्चात् उस जाटनी ( अपनी मौजूदा माँ ) का दूध भी कभी नहीं पिया ' । यह घटना ' कल्याण ' के इस घटनाके लेखक रामस्वरूप शर्मा -जी को जिला कांग्रेस कमेटी मुजफ्फरनगरके उपाध्यक्ष, भ्रष्टाचार-निवारक समिति के सदस्य और डिस्ट्रिक्ट कोआपरेटिव बैंक मुजफ्फरनगरके डाइरेक्टर चौ ० काशीराम त्यागीकी सुनाई हुई है, इससे बढ़कर प्रमाण और क्या चाहिये? पूर्व हम स्वा. शं. का संकेत कर चुके हैं । मण्डनमिश्रके शास्त्रार्थ में पराजित हो जानेके बाद जब उनकी स्त्री भारतीने शास्त्रार्थकेलिए कहा, तब आचार्यने शास्त्रार्थमें उसे भी पराजित कर दिया । उसके कामशास्त्र - सम्वन्धी प्रश्न कहा कि मैं इस विषयको नहीं जानता । बाद बता दूँगा; तब उन्होंने मृतक - राजा अपने आत्माका प्रवेश कराके उस विषयका को पराजित कर दिया । इस प्रकारकी पूर्वपीठिका में भी आती है, अतः इस बात अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना है । Gujarat. An ५६ eGangotri स ० ध ० Initiative करने पर आचार्यने फिर भी एक मासके अमरुकके शरीरमें ज्ञान करके भारती-घटना मुद्राराक्षसकी पर सन्देह करना
पृष्ठ 477
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १८ ) रहस्यमय चम्मच । ( ११ ) श्राकाशसे मूर्ति । बाबा गोपालदास - नामक सिद्धयोगी महाराजने नई-दिल्ली में सेठ श्रीजुगलकिशोर - विरलाजीसे एक ताम्बेकी चमची मँगवाकर, श्रीविरलाजीके हाथमें देकर उन्हें सूर्यकी तरफको मुख करके खड़ा कर - मन्त्र बोलकर अपनी सिद्धिके चमत्कारसे ताम्बेसे सोनेमें परिणत कर दिया था, जो विरला - मन्दिर में सुरक्षित रखी हुई है, उसे हमें ( रामशरणदासको ) मन्दिरके प्रमुख पुजारी पं ० रामनिवासजीने दिखलाया । उसे देखकर हम आश्चर्य चकित हुए । यह वह रहस्यमय चम्मच है जिसे बड़े - बड़े वैज्ञानिक वा अंग्रेज देखकर आश्चर्य चकित होते हैं; और दाँतों तले अंगुली दबाते हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection सिद्ध - सन्त वन्शीवाले बाबाने अन्तरिक्षसे जो श्रीनर्मदेश्वरकी प्रतिमा मँगाकर मुझे दी थी; उसे ता ० ५ अप्रैल सन् १ ९ ५८ को शास्त्रार्थ - महारथी पं ० दीनानाथजी शास्त्रीने हापुड़ में देखा । चित्रमें हम ( रामशरणदास ) प्रतिमा दिखा रहे हैं; पासमें विद्यावागीश श्रीपं ० दीनानाथजी शास्त्री सारस्वत, विद्यावागीश तथा पं ० श्रीमदनमोहनजी शास्त्री ' मधुर ' कथावाचक और शिवकुमार गोयल ' विशारद ' खड़े हैं । अन्य भी इस प्रकार की चहुतसी घटनाएँ हैं; पर स्थानाभावसे नहीं दी जा सकीं । उपसंहार [ ' श्रालोक ' - पाठकों ने देख लिया कि जो पुराणों की बातें कल तक ' गप्प '. समझी जाती थीं, अब वे ठीक हो रही हैं । अब तो रूसवालोंने एक कुत्तेकी गर्दन के साथ दूसरे कुत्तेकी गर्दन जोड़ दी । मरे हुओको वे जीवित कर रहे हैं, चन्द्रलोकमें राकेर्टोको पहुँचा रहे हैं । इस प्रकार अमेरिका तथा रूसवाले उपग्रह बना रहे हैं; जो आकाश में चक्कर लगाते हैं; श्रव Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 478
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) विश्वामित्रकी वह देवसृष्टि - जिसका उसने निर्माण किया था, श्रीगणेशजी के सिरपर हाथी के मस्तकका जोड़ना, त्रिशङ्कुका सीधा स्वर्गलोक में जाना, ध्रुवका तारापथमें जा पहुँचना - यह सब बातें अब संशयका विषय नहीं रहीं । इन बातोंको प्रत्यक्ष देखकर पुराणोंकी तो सत्यता सिद्ध हो जायगी; और पुराणों को ' गप्प ' बतानेवाले वर्तमान- वादियोंके मुख फीके पड़ेगे । पर हमें डर है कि मनुष्यों द्वारा इन बातोंको होता देखकर कहीं नास्तिकता न फैल जाए, अस्तु श्रच दूसरा परिशिष्ट निबन्ध देकर ' आलोक ' के छठे-पुष्पको बहुत बड़ा हो जानेसे इम रोकते हैं, श्रागे सप्तम- पुष्पके प्रकाशन की आशा लेकर पाठकों से विदा लेते हैं । वे ग्रभीसे सप्तम - पुष्पके १०० ) रु ० के सहायक तथा ग्राहक बनना बनाना शुरू कर दें, जिससे सप्तम- पुष्पके प्रकाशन में देरी न लगे । ' श्रालोक - प्रणेता ' । ] ( २४ ) ' नमस्ते - प्रदीप ' का निर्वाप । ( क्या ' नमस्ते ' एक पद है? ) ( प्रथम द्वितीय पुष्पका परिशिष्ट ) हम घरौंडा - गुरुकुलके स्वा. रामेश्वरानन्दजीके ' नमस्ते - प्रदीप ' की आलोचना १-२ पुष्पमें * ४३ पृष्ठसे ६६ पृष्ठ तक कर चुके हैं; कुछ यहां भी थोड़ा स्थान मिल जानेसे कर देते हैं । उनकी बातें प्रायः एक - जैसी हैं, अतः उनका पृथक् - पृथक् विचार न करके स्थालीपुलाक न्यायसे दिङ्मात्र विचार देते हैं । पाठक शेष उनके तर्कोंका समाधान १–२ सुमनमें देखें । भूमिका पृ.२ पं. १६-१८ में श्रीधर्मवीरशास्त्रीका यह प्रश्नोत्तर है— ( प्र. ) नमस्तेका क्या अर्थ है । ( उ. ) जो ' नमः ' का अर्थ है, * पाटक १-२ पुष्पों ( परिवर्धित - द्वितीयावृत्ति ) को हमसे मँगा लें, मूल्य ४ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection नमस्ते प्रदीप ' का निर्वाप ६३३ वही नमस्तेका है, क्योंकि - नमस्ते की प्रकृति ' नमः ' है । यहां स्वामीजीसे प्रष्टव्य है कि क्या आप ऐसा मानते हैं? यदि हां; तो यहां किस व्याकरण, वा निघण्टु, वा कोष, वा किस प्राचीनका प्रमाण है? यदि ' नमस्ते ' की प्रकृति ' नमः ' है, तो ' ते ' कहांसे आया है? क्या यह कोई प्रत्यय है - यदि हां; तो किस वेदाङ्ग - व्याकरणके किस सूत्रसे हुआ? उस एक - पदमें प्रकृति वा धातु क्या है? ' ते ' प्रत्यय न होनेपर दो पद सिद्ध हुए । पृ. ४ ' दिव्यो गन्धर्वो... एक एव नंमस्यः... दिव्य देव! नमस्ते अस्तु ' ( अ. २ | २ | १ ) अलौकिक वेदवाणीधारक... एक ही नमस्कार करने योग्य है । नमस्ते यह सत्कारवाचक पद हो ' । समीक्षा - यदि ' नमस्ते ' एक पद है; तो यहां वेदने ' नमस्यः ' क्यों कहा है- वादी के अनुसार ' नमस्त्यः ' क्यों नहीं कहा? ' नमस्ते अस्तु ' में ' ते नमः अस्तु ' यह अन्वय है । यहां दिव्य - देवको सम्बोधित करनेसे उसकेलिए सर्वनामका प्रयोग अपेक्षित है, वह यहां है ' ते ' ( तुभ्यं ), परन्तु ' नमस्ते हो ' इस वादीके अर्थमें ' युष्मद् ' सर्वनाम कहां है? ' नमस्ते ' यह सत्कार - वाचक पद यह मन्त्र के किस शब्दका अर्थ है? ' नमस्ते ' यह सत्कारवाचक एक - पद किस व्याकरणके किस सूत्र वा गरणपाठ वा उदाहरण में है? किस कोष वा निघण्टुमें है? ' नमोवरिवश्चित्रङः क्यच् ' ( पा. ३ | १ | १६ ) इससे ' नमस् ' को पूजामें क्यच् करके उसे यत् ( पा. ३ | १ | ६७ ) प्रत्यय करके अल्लोप - यलोप करके ' नमस्कारयोग्य ' अर्थ में ' नमस्यः ' -बनता है, अथवा ' अर्हति ' अर्थ में छान्दस यत् ( पा. ५ | १ | ६७ ) होता Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 479
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) है | पर ' नमस्ते - योग्य ' अर्थ में ' नमस्ते ' प्रकृति से किस सूत्रसे क्या-क्या प्रत्यय, किस - किस सूत्रसे होता है? और ' नमस्ते ' पदमें तद्धिती प्रत्यय है वा कृदन्ती? यदि यह अव्युत्पन्न - पद है; तो ' सर्वाणि नामानि आख्यातजानि ' इस नैरुक्त - सिद्धान्तसे विरुद्ध हुआ । यदि यह रूढ पद है, तो रूढि लोकप्रसिद्धिमें होती है, तब यह लोकप्रसिद्धि कब हुई, और किसने इसे रूढ किया? यदि वैदिककालसे यह रूढि है; तो किसी वेदाङ्गने उसे स्मरण क्यों नहीं किया? यदि आजकलकी आपकी रूढि है; तब वह अवैदिक तथा अर्वाचीन होनेसे खण्डित सिद्ध हुई । इसके अतिरिक्त ' दिव्यदेव! नमस्ते अस्तु ' यहां सम्वोधनमें प्रथमा है; तब ' पशुपते! नमस्ते ' ( पृ. ७ ) इस वादीसे दिये प्रमाणकी तरह ' जहां पर विशेष्य प्रथमान्त हो; वहां पर ' नमस्ते ' ' नम: - ते'के योगसे सिद्ध होता है ' ( पृ. २० ) इस वादीकी परिभाषानुसार यहांके ' नमस्ते ' में भी दो पद सिद्ध हो जानेसे वादीकी अभिमत एकपता उसी से ही खण्डित हो गई । जब उस दिव्यदेवको वेद ' नमस्य ' ' नमः ' के योग्य बतलाता है, तब वेद उसे ' नमस्ते ' कैसे कहेगा? इस प्रकार स्वा. रामेश्वरानन्दजी की ' नमस्ते ' की एकपदता सर्वथा खण्डित हो गई । पृ. ५ ' स्वधितिस्ते पिता नमस्ते अस्तु ' ( यजुः ३ ( ६३ ) यहां छुरेको नमस्कार कहा जा रहा है, यह चूड़ाकरण - संस्कारविधिमें आर्यसमाज की मूर्तिपूजा है । क्योंकि -' देवमूर्ति कभी न पूजें, पूजें छुरा जो नाइयों का । यही हाल संस्कारविधिमें आर्यसमाजी भाइयों का ' ॥ CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नमस्ते प्रदीप का निर्वाप इसमें भी ' ते नमः अस्तु ' यह अन्वय है; परन्तु वादी श्रर्थ करता है - पिता - उत्पादक हो, इसलिए ' ते नमस्ते ' तुम्हारे लिए नमस्ते यह सत्कारवाचक शब्द हो ' । समीक्षा — मन्त्रमें ' ते ' यह षष्ठी है, जिसका ' पिता ' से सम्बन्ध है कि- ' ऐ छुरे, वज्र तेरा पिता है, तुझे नमस्कार हो ' । पर यादीने ' नमस्ते ' को एक पद सिद्ध करनेकेलिए उस ' ते ' को ' नमस्ते ' के साथ जोड़ा है, यह श्रुतिसे बलात्कार है । यहां प्रश्न है कि- ' ते ' में क्या विभक्ति है? यदि चतुर्थी, तो किस सूत्रसे? यदि ' नमः-स्वस्ति ' से, तो उसमें तो ' नमस्ते ' नहीं । यदि अन्य सूत्रसे; तो फिर ' नमः ' में भी उसीसे हो जाएगी, ' नमः स्वस्ति ' में उसका रखना व्यथे है; पर जब श्रीपाणिनिने जानबूझ कर रखा है; तो इससे सिद्ध है कि- ' नमस्ते ' एक पद नहीं, किन्तु दो ही हैं । इसके अतिरिक्त ' शिवो नामासि. नमस्तेस्तु ' यहाँ विशेष्य प्रथमान्त है; तब वादीकी पृ. २० की पूर्वप्रोक्त - परिभाषानुसार दो पद सिद्ध होनेसे वादीका पक्ष कट गया । पं. ८-६ ' नमस्ते अस्तु भगवः ' ( यजुः १६५२ ) हे ईश्वर! नमस्ते यह आदरवाचक शब्द हों । स ० --- यहां ' यह ' ' नमस्ते ' शब्द किसे कहा जा रहा है? यदि • ईश्वरको; तो संबोध्यमानका किसी सर्वनामसे परामर्श होता है । यहां कौनसा सर्वनाम है? यदि ' ते ' है, तो ' नमस्ते ' की एकपदता कट गई । यदि यहां सर्वनाम नहीं है; तो न्यूनपद दोष हो गया । हमारे मतमें ' ते ' पृथक् पद होने से यहां न्यूनपद दोष नहीं । वहां है-Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 480
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( 4 ) भगवः! ' ते नमः अस्तु ' वह छेद वादीने ' पशुपते! नमस्ते ' ( पृ. ७ ) . ' नमस्ते गन्धर्व! ' ( पृ. १८ ) की तरह क्यों नहीं किया? पृ. ६ पं. १४ ' नमस्ते मृत्यो! चक्षुषे नमः ' ( ०८२४ ) मृत्यो! प्रभो! चक्षुषे - सबके द्रष्टा श्रापकेलिए ( नमः नमस्ते ) पुनः-पुनः नमस्ते हो ' समीक्षा — यहाँपर ' आपके लिए ' यह किस पदका अर्थ है? ' पुनः पुनः नमस्ते हो ' यह किस पदका अर्थ है, जबकि मन्त्र में ' नमस्ते ' दो - बार नहीं? ' नमः ' का सम्बन्ध - ' नमः प्राणाय तेऽकरम ' इस अग्रिम पादसे है, पर वादीने उससे सम्बद्ध पदको पूर्व पादमें छलसे जोड़ दिया । वस्तुतः यहाँ अन्वय है - ' हे मृत्यो! ते - तव चक्षुषे नमः, ते - तव प्राणाय नमोऽकरम् ' । इधर जब ' मृत्यो ' यह सम्बोधन - प्रथमान्त विशेष्य है; तब वादीके पृ. ७ पं. ६-८में स्थित ' पशुपते! नमस्ते ' ( ऋ. ११२६ ) तथा पृ. १८ पं. १२-१३-१४ स्थित ' नमस्ते गन्धर्व! ' ( अ. १४/२/३४ ) की भांति ' ते नमः ' छेद हुआ । और पृ. २० के अनुसार पद सिद्ध हुए । पृ. ६-७ ' नमस्ते रुद्र कृण्मः सहस्राक्षाय अमर्त्य! ' ( अ. ११।२।१३ ) यहाँ पर यह अन्वय है - ' हे अमत्यें! रुद्र! सहस्रा-चाय ते - तुभ्यं नमः ' ' तुझ सहस्राक्षको हे रुद्र! नमस्कार ' यह अर्थ है; पर वादीने ' असंख्य देखनेकी शक्तियोंवाले प्रभो! ' यह सम्बोधनका अर्थं कैसे कर लिया? ' आपकेलिए ' यह शब्द कहाँ-से लिया? ' नमस्ते यह शब्द करते हैं ' में ' यह शब्द ' कहांसे लिया? ऐसा होनेपर ' नमस्ते ' इति शब्द कृएमः ' ऐसा होता । CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नमस्ते - प्रदीप ' का निर्वाप ६३७ पर ऐसा नहीं । इधर ‘ रुद्र! ' यह सम्बोधन - प्रथमान्त विशेष्य है, तब बादोकी ही पूर्व - प्रोक्त परिभाषानुसार ' नमस्ते ' दो पद हो जानेसे एकपद - पक्ष उष्ट्रलगुड - न्यायसे कट गया, उष्ट्रेणैव उह्यमा-न लगुडेन तत्प्रहारः ' । पृ. ६ ' नमस्ते अधिवाकाय परावाकाय ते नमः ' ( अ. ६।१३।२ ) यहाँ पर ‘ परावाकाय ते नमः ' की भांति पूर्वमें भी ' अधिवाकाय ते नमः ' अन्वय है; तब इससे बिरुद्ध! ते नमः- नमस्ते ' तुझ ब्राह्मण के लिए नमस्ते शब्द पुनः पुनः हो ' यह वादीका अर्थ अशुद्ध सिद्ध हुआ । दोनों स्थान ' ते ' चतुथ्येन्त - विशेष्य है, और अधि-वाकाय, परावाकाय ' विशेषण हैं । जब उक्त मन्त्रमें ' नमस्ते ' दो बार नहीं; तब ' पुनः पुनः नमस्ते हो ' यह वादीका अर्थ अशुद्ध सिद्ध हुआ । और यहाँ पर ' मृत्यो! ' सम्बुद्धि - प्रथमान्त विशेष्य होनेसे वादीकी ही पूर्वोद्धृत परिभाषा से ' नमस्ते ' की एकपदता कट गई । और फिर वादी के ( पृ. २० ) के अनुसार चतुर्थ्यन्त ‘ परावाकाय'के साथ फिर चतुर्थ्यन्त ' ते ' कैसे आया? यदि आया है, तो वैसे ' नमस्ते ' में भी ' नमः - ते ' दो पद और ' ते ' ' चतुर्थ्यन्त ' हुआ? पृ. १६ ' नमस्ते रुद्रास्यते नमः ' ( अ. ६६०१३ ) हे रुद्र! अस्य .ते - इस तेरेलिए नमः नमस्ते - यह शब्द पुनः पुनः प्रयुक्त हो ' । • नमस्तेको एक पद सिद्ध करनेकेलिए स्वा. रामे जी कई छल करते हैं । कभी ' ते ' इस षष्ठी - पदको बलात् चतुर्थीका बनाकर उसे ' नमस्ते ' से जोड़ देते हैं; और कभी मन्त्र के आदिम वा अग्रिम Gujarat. An eGangotri Initiative