सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 61–70

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 61–70

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६ ६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) छन्द ‘ मन्त्रे ' यह वेदके भिन्न - भिन्न भागके नाम हैं । इससे सामान्यतया एकदेशी नामसे दोनों का ग्रहण नहीं हो सकता । जैसे ' वेद ' यह लेखा है । समुदित नाम है - यह ऋग्वेद, यजुर्वेदादि सबका ग्रहण करवा यामाहा लेता है; पर केवल ' यजुर्वेद ' यह एकदेशी नाम है, इससे शेष बनाया है, ऋग्वेदादिका ग्रहण नहीं होता; इस प्रकार प्रकृतमें भी समझना तं छन्दसि चाहिये । ‘ छन्दसि ' ' वेदे ' ' निगमे ' इन समुदित शब्दों से तो दोनों है; अतः भागों - मन्त्र- ब्राह्मणोंका ग्रहण हो जाता है । इसीलिए ही पहले के B खा जाऊ सूत्र में ' ब्राह्मणे ' की विद्यमानता में भी ' छन्दसि ' का ग्रहण किया है; यह विधि क्योंकि २ | ३ | ६० सूत्र केवल ब्राह्मणमें विधानार्थं बनाया गया है, यी जाता दोनों भागों में विधानार्थं नहीं बनाया गया । यदि ' चतुर्थ्यर्थे बहुलं पर चाहिए छन्दसि ' ( २ | ३ | ६२ ) इसके ' छन्दसि ' पदसे वादियोंके मतानुसार करने के केवल मन्त्रभाग इष्ट है, ब्राह्मणभाग नहीं; तो इस सूत्र के छान्दस वार्तिकके उदाहरणमें भाष्यकारने ' या खर्वेण पिबति ' इस तैत्तिरीय-संहिता ( २५२११७ ) के ब्राह्मणको उदाहृत क्यों किया? ब्राह्मणको मन्त्रभागने उदाहृत करने से ब्राह्मणभाग भाष्यकारको छन्द ( वेद ) इष्ट है— वा ब्राह्मण । यह स्पष्ट है । हैं । वे चाहते हैं ण्विन् करते हैं, ब्राह्मणभागमें नहीं । इस प्रकार ' जनिता मन्त्रे ' ( ६ | ४ | ५३ ) गमे ' कहते श्रादिमें भी । इसी कारण ' छन्दसि ' न कहकर ' मन्त्रे ' कहते हैं । निरुकर्मे नहीं छन्द कौत्सने भी केवल मन्त्रभागका खण्डन करना था, ब्राह्मणभागका नहीं; २१३२६० ) अतः ' अनर्थका वेदाः ' न कहकर ' अनर्थका मन्त्राः ' ( १।१५।२ ) कहा । हारण भांग इससे स्पष्ट है कि – ' वेद ' या ' छन्द ' समुदायवाचक शब्द है । मन्त्रभाग कहते हैं । वा ब्राह्मणभाग यह उस वेदके भिन्न - भिन्न भाग हैं । दोनों भाग मिलकर मन्त्रभाग भागी वेद बनता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द.के ४ हेतुकी समीक्षा १७ जो कि ऋमाभू.के ३७७ पृष्टमें स्वाद जीने इसपर यह किया है कि- ' माप्यकारेण छन्दोवन्मत्वा व्याज ब्राह्मणानामुदाहरणानि प्रयुक्तानि; अन्यथा ब्राह्मणग्रन्थस्य प्रकृतत्वात् छन्दोग्रहणमनर्थकं स्यादिति ' [ भाष्यकारने ब्राह्मणको वेदकी तरह मानकर उदाहरण दिये हैं, नहीं तो ' ब्राह्मणे ' की अनुवृत्ति आनेसे ' छन्द उसके ' ग्रहण व्यर्थ हो जाता ] यह असंगत है । भाष्यकारने ग्राह्मणको वेदकी तरह नहीं माना, किन्तु वेद माना है, यह हम सिद्ध कर ही चुके हैं । * जब पाणिनि मन्त्र ब्राह्मण दोनों भागोंमें कोई कार्य करना चाहते हैं; तब वे ‘ मन्त्रे ’ वा ‘ ब्राह्मणे ’ पृथक् - पृथक् न कहकर ' छन्दसि ' कहते हैं, जैसे-' चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ' ( २/२६२ ) इस कारण महाभाष्यमें वार्तिकके उदाहरणमें ' या खर्वेण पिबति ' यह तैत्तिरीयसंहिता इसी ब्राह्मणका उदाहरण दिया । ' चतुर्थी ' यह योगविभाग तो भाष्यकारने - स्थित लाघवार्थ किया है, वह भी ' छन्द ' केलिए ही किया है । इस प्रकार ' ऋग्वेदं भगवोध्येमि ' ( ७ | १ | २ ) इस छान्दोग्यके वाक्यमें ऋग्वेदादिशब्द मन्त्रभाग- ब्राह्मणभाग दोनों भागों केलिए ही हैं; क्योंकि आजकलके ऋग्वेदादि भी ' ऋग्वेद ' श्रादि नहीं; किन्तु ऋग्वेदसंहिता ' ' श्रादि ही हैं, छान्दोग्यके वाक्यमें ' ऋग्वेदसंहितां भगवोऽध्येमि ' नहीं आया । इस प्रकार पाणिनि कहीं केवल मन्त्रभाग को भी ' छन्द ' कहते हैं, जैसे कि – ' छन्दोत्राहाणानि च तद्विषयाणि ' ( ४/२/६ ) यहां ' छन्द ' से केवल मन्त्रभाग इष्ट है । उसमें कारण है - ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता श्रवयवेष्वपि वर्तन्ते ' यह न्याय, जिसे हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं । इसी प्रकारका अन्य उदाहरण - ' एवमिमे सर्वे वेदा निर्मिताः... सत्राह्मणाः ’ ( १।२।१० ) इस गोपथके प्रमाणमें ब्राह्मणभागके पृथक् कहने से वेदशब्द मन्त्रभागमात्र ( ११३१ संहिताओं ) का वाचक है । Gujarat ७. An स ० eGangotri ६० Initiative

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६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) जो विधियां * ' छन्दसि ' कहकर पाणिनि वेद में करते हैं: वे दोनों ही मन्त्र और ब्राह्मणमें होती हैं, केवल मन्त्रभागमें नहीं । ' सुपां सुलुक् ' ( ७ | १ | ३१ ) इस छान्दससूत्र से [ क्योंकि यहां ' क्त्वापि छन्दसि ' ( ७ | १ | ३८ ) से ' छन्दसि ' की अनुवृत्ति आ रही है ] जैसे ' सविता प्रथमेऽहन् ' ( यजुर्वेदवा.सं. ३६।६ ) इस मन्त्रमें ' ङि'का लुक् हुआ है; वैसे ही ' यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषः ( शत. १४ | ६ | ८ | ३ ) इस ब्राह्मणमें भी अनङ्वाले ' अक्षि ' शब्दमें ढिका लुक् हुआ है । दोनों ही स्थान छान्दसता होनेसे ' न ङिसम्बुद्ध्यो: ' ( २८ ) से न कालो हुआ । इसीलिए दीक्षितादियोंने लिखा है- ' ङौ तु छन्दस्युदाहरणम् ' । ( १७ ) इसी प्रकार ' प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् ' ( ७ | २८ ) इस आकारका प्रत्युंद।हरण जैसे कि भाषा ( लोक ) से भिन्न मन्त्रभागमें * इस प्रकार श्रीपाणिनि केवल ब्राह्मणभागको भी ' छन्द ' कहते हैं, जैसे - ' जुष्टार्पिते च छन्दसि ' ( ६।१।२०६ ) इसमें श्रीपाणिनिने जुष्ट शब्द को ' छन्द ' में विकल्प से श्राद्युदात्त कहा है, फिर ' नित्यं मन्त्रे ' ( ६।१।२१० ) से मन्त्रभागमें नित्य । तब इस पूर्वके साथके सूत्रमें स्थित ' छन्दसि ' यह केवल ब्राह्मणभागके लिए रखा है - यह स्पष्ट हो गया । इसी प्रकार ' मन्त्रे श्वेतवह ' ( ३ | २ | ७१ ) सूत्रके मन्त्रकी अनुवृत्ति आनेपर भी विजुपे छन्दसि ' ( ३ । ३ । ७३ ) में ' छन्द ' का ग्रहण केवल ब्राह्मण भागके लिए कहा है । इसीलिए यहां काशिका में कहा है- ' छन्दोग्रहणं ब्राह्मणार्थस् ' । इसमें कारण पूर्वोक ही है कि छन्द, वेद, निगम, श्राम्नाय श्रादि शब्द समुदायवाची हैं । समुदायवाचक - शब्द भाष्यकारोक्त पूर्वोक्त न्यायसे कहीं श्रवयववाचक भी होते हैं । अब यह वक्ता की इच्छा पर अवलम्बित है कि वह समुदाय-वाचक शब्दको समुदायपरक रखे वा अवयवपरक । समुदायरूपसे उसे उदाहृत करे वा श्रवयव - रूपसे । . . स्वा. द. की युक्तिकी समीक्षा १० ' युव॰सुराम ' – ( यजुःवा.सं. २०।७६ ) इत्यादि में दीखता है; वैसे! ' युवं वै ब्रह्माणौ मिषजौ ' ( शत. ८ | २ | १ | ३, ५ | ५ | ४ | २५ ) ' युवति भी निष्कुरुतम् ' ( ऐ.ब्रा. २।२८ ) इस ब्राह्मणभागमें भी दीखता है, तो वादीके अनुसार भाषा होनेसे ब्राह्मणमें भी ' युवा ' बनता । सम जैसे ‘ व्यवहिताश्च ' ( १,४।८२ ) यह वैदिक सूत्र ' आ मन्द्रैरिन्द् प्रय अ हरिभिर्याहि ' ( ऋ. ३ । ४ । १ ) इस मन्त्रभागमें प्रवृत्त होता है; वैसे । ब्रा ' समिध ँ सोम्य आहर, उप स्वा नेप्ये ' ( छान्दो. ४ | ४ | ५ ) झ तब ब्राह्मणभाग - उपनिषदादिमें भी प्रवृत्त होता है - जैसे ' व्यत्यये बहुलम् ' ( ३ | १ | ८५ ) यह वैदिक सूत्र मन्त्रभागमें प्रवृत्त होता है, वैसे द्दी ब्राह्मणभागान्तर्गत आरण्यकमें भी । जैसे- ' आपः पुनन्तु पृथिव स है; पृथिवी पूता पुनातु माम् । पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्म पूता पुनातु माझ् क्व ( तैत्तिरीयारण्यक १०।२३ ) यहां ' ब्रह्मणस्पतिः ' ' सु ' हुआ है; अथवा ' सुपां सुलुक् ' ( ७११।३६ ) ' ब्रह्म पूता ' में ' पूतं ' के स्थान लिङ्ग - व्यत्यय है । ब्राह्मणान्तर्गत होनेसे ' वेद ' है । ' आरण्यकं च यह महाभारत शान्तिपर्व तथा १ १ २६५ में कि ब्राह्मणभाग वेदवत् नहीं, किन्तु साक्षात् वेद कहीं वेदकी भांति नहीं माना, किन्तु वेद माना है । यह अम्के स्थान लि इस छान्दससूत्र से उपनिषद्, आरण्य भव वेदेभ्यः ' ( ३४३ | १३ || भव है । इससे स्पष्ट है मा है । श्रीपाणिनिने से भा बन ( १८ ) इस प्रकार छान्दस कार्य जबकि ब्राह्मणभाग में मी होते वह हैं; तब वह स्पष्ट वेद सिद्ध हो ही गया । यहां कई कहते हैं कि- अन * इस विषय में स्पष्टता ' श्रीसनातन धर्मालोक ' के चतुर्थ पुष्पके ' वेदविस में भारी भूल ' तथा वेदस्वरूपनिरूपण में देखें । इसका मू ० ५ ) है । नही CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) है; वैसे ' छान्दस कई कार्य तो गृह्यसूत्रों में भी दीखते हैं, पाणिनिसूत्रों में - ' युवति भी, पुराण - इतिहासमें भी दीखते हैं, वहां ' आर्षोऽयं प्रयोगः ' यह हैन समाधान करना पड़ता है । इसप्रकार काव्यों में भी यत्र - तत्र छान्दस II प्रयोग दीखते हैं; फिर भी पाणिनिसूत्र, पुराण- इतिहास, काव्य मन्द्रैरिन्द्र आदि वेद नहीं हो जाते; किन्तु वेदाङ्ग ही कहे जाते हैं; वैसे ही है; वैसे ब्राह्मणभाग के छान्दस प्रयोगों के लिए भी समझ लेना चाहिये; ४५ ) इस तब ब्राह्मणभागको भी लौकिक ही समझना ठीक है ' । ' व्यत्यये इस पर उत्तर यह है कि- पाणिनि आदिके सूत्रों वा गृह्य-..सूत्रों के लिए तो ' छन्दोवत् सूत्राणि भवन्ति ' यह परिभाषा बनी हुई न्तु पृथिवी है; इससे वे छन्दोवत् हैं, छन्द नहीं; अतः उनमें छान्दस कार्य भी नातु मा क्वचित होते हैं, सर्वत्र नहीं । इस प्रकार पुराण - इतिहास आदिके के स्थान लिए भी ' छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति ' यह भाष्यकारका कथन बना हुआ ससूत्रसे । है; अतः वे वेद नहीं, यह स्पष्ट हो गया । परन्तु ' छन्दोवत् सूत्राणि आरएक भवन्ति, छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति ' की भांति ' छन्दोवद् ब्राह्मणानि ३४३ | १३ || भवन्ति ' यह कहीं भी परिभाषा नहीं देखी गई कि उन्हें भी वेदवत् से स्पष्ट है । माना जावे; क्योंकि वे साक्षात् ही वेद हैं । कहीं नदी आदि संज्ञाकी यानिने उसे भांति ब्राह्मणभागके लिए भी वेदका संज्ञासूत्र वा परिभाषासूत्र न बनाने से ब्राह्मणभाग श्रातिदेशिक वेद नहीं; किन्तु साक्षात् वेद है । भी होते वह आयुर्वेदादिकी तरह उपवेद भी नहीं; क्योंकि उसमें उसका हैं कि- अन्तर्भाव नहीं, वह वेद है । उस ब्राह्मणभागमें पुराण- इतिहासकी भांति छान्दसप्रयोग क्वाचित्क ' वेदविषा है । नहीं हैं, किन्तु ' मन्त्रे ' को छोड़कर ' छन्दसि ' ' निगमे ' शब्दले कहे हुए . सभी CC - 0. Ankur Joshi स्वा.द. के अर्थ हेतुकी समीक्षा १०१ Collection Gujarat. वैदिक श्रादेश ब्राह्मणभागमें दीखते हैं । पाणिनिसूत्रोंके ' भाषायां ' के प्रत्यु-दाहरण जैसे मन्त्रभाग के दिये जाते हैं: वैसे ' ब्राह्मणभाग के भी । बल्कि — ' मन्त्रे घसहर ' ( २ | ४ | ८० ) इस चिल लुकू करनेवाले सूत्र के मन्त्रविषयक होनेपर भी इस सूत्र के जन् धातुके उदाहरणमें मन्त्रके उपलक्षणसे ' अज्ञत वा अस्य दन्ताः ' यह ऐतरेयब्राह्मणका उदाहरण भी दिया गया है । इसी प्रकार निरुक्तमें भी मन्त्रभागकी सार्थकता सिद्ध करने के लिए बनाये गये पूर्वपक्षमें ' अथापि जानन्तं सम्प्रेध्यति ' यह कहकर ' अग्नये समिध्यमानाय अनुब्रूहि ' ( शत. ११३२२३ ) यह ब्राह्मणभागका प्रमाण भी मन्त्रभागके स्थान दे दिया । तब यह बिना पक्षपातका चश्मा चढ़ाये कौन कह सकता है कि ब्राह्मणभागमें स्तुतिले ' वेद ' शब्दका प्रयोग है? इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मणभाग में वेदत्यका व्यवहार अर्थवाद नहीं, न ही पारिभाषिक है, न ही पारिषद कृति है और न ही ऐकदेशिक है; न ही अर्वाचीन है; किन्तु मन्त्रभाग जबसे वेद है, ब्राह्मणभाग भी तभीसे वेद है, प्राचीन है, सार्वत्रिक है और वास्तविक है । ( १६ ) यदि द्वितीया ब्राह्मणे ' ( २ | ३ | ६० ) सूत्रमें स्वा. द. जीका यह अभिप्राय हो कि - ' ब्राह्मणे ' कहने से भी दोनों भागोंके वेद होनेसे सदा दोनों में समान विधि हो । इस प्रकार ' मन्त्रे ' कहने से भी दोनों भागों में समान कार्य हो ' तो यह अभिप्राय ठीक नहीं । यह नाम तो केवल भिन्न - भिन्न भागों के हैं; अतः ऐकदेशिक हैं । ऐकदेशिक नामका कार्य सामान्यतया सार्वदेशिकता में नहीं होता । ऋगादि चार स्वा. द. जीके मतमें भी वेद हैं । तब क्या इन सबमें भी सदा An eGangotri Initiative

पृष्ठ 64

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१०२ श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) समान ही विधि होती है? या ' चारों वेदोंमें सभी विधियां समान हों; नहीं तो वेदता न होगी ' क्या यह व्याप्ति स्वामीजी मान सकते हैं? यदि ऐसा हो; तब यजुर्वेद सामवेद में अनुस्वार को र, श, ष, स, ह अक्षर परे होनेपर हो जाता है; परन्तु ऋग्वेद, अथर्ववेदमें नहीं । तब क्या यजुर्वेद सामवेद वा शेष दोनों, वेद न रहेंगे? ' देवसुम्नयोर्यजुषि काठके ' ( ७.४।३८ ) यह यजुर्वेदको कठशाखा में श्राकार- विधायकसूत्र है; पर यह ऋग्वेदको कठशाखामें नहीं होता । ‘ प्रकृत्यान्तः - पादम् ’ ( ६ | १ | ११५ ) ' यजुष्युरः ' ( ६ | १ | ११७ ) यह प्रकृतिभाव ऋग्वेद, यजुर्वेदसे भिन्न वेदमें नहीं होता । इस प्रकार ' ऋचि तु तु घ ' ( ६ | ३ | १३३ ) ' ऋचि त्रेरुत्तर ' ( वा. ६ | १ | ३४ ) इत्यादि में ऋकू आदि शब्द सामिप्राय हैं । वे विधियां ऋचासे भिन्न मन्त्रमें नहीं होतीं । ' ड'को वैदिक ' ल ' ऋग्वेदसे भिन्न वेद में नहीं होता; तब क्या समान विधि न होने से यजुः आदि वेद न रहेंगे? यदि ऐसा नहीं; तो मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनोंके मध्य में समान विधि न होनेसे ब्राह्मणभाग भी वेदसे भिन्न नहीं हो जाता । एकदेशी नाम के सबबसे दोनोंमें समान विधि कैसे हो? जैसे ऋक्, यजुः आदि ना मन्त्रभागके एकदेशी हैं; और उनमें भिन्न - भिन्न विधि भी दीखती है; वैसे ही ' मन्त्र, ब्राह्मण ' यह नाम भी एकदेशी हैं, जैसे कि निरुक्तमें ' अथापि इदमन्तरेण मन्त्रेष्वर्थप्रत्ययो न विद्यते ' ( १।१५ / १ ) ' यदि मन्त्रार्थ -प्रत्यायनाय, अनर्थकं भवतीति कौत्सः, अनर्थका हि मन्त्राः ' ( १ | १५ | २ ) यहां वेदका नाम न कहकर उसके एकदेशी मन्त्रभागका नाम लिया है; क्योंकि निरुक्तका मन्त्रभागसे अधिक सम्बन्ध है । अतः CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द. के अर्थ हेतुकी समीक्षा मन्त्र - ब्राह्मणमें भी कभी - कभी भिन्न - भिन्न विधियां भी होती है । ह इससे एक भागकी अवेदता नहीं हो जाती । वि यदि स्वा॰द॰जीके त ñ के अनुसार २ । ३ । ६० सूत्र में ' ब्राह्मणे ' । प | २ ३ | ६२ सूत्रमें ‘ छन्दसि ' कहनेसे ब्राह्मणभागको छन्द ि भिन्न माना जावे; तो उसी तर्कके अनुसार ' मन्त्रे श्वेतवह ' ( ३२ ) इस ७१ सूत्रमें मन्त्रभागके तथा ' विजुपे छन्दसि ' ( ३ | २ | ७३ )! स ७३ सूत्रमें छन्दके ग्रहणसे मन्त्रभागको भी वेदसे भिन्न मानना पदे ॥ यज्ञ तब तो ‘ मन्त्रे सोमाश्व ' ( ६ | ३ | १३१ ) से ' मन्त्र ' की अनुवृत्तिमें इस तु नु घ ' ( ६ | ३ | १३३ ) यहां ऋग्वेद भी मन्त्रभागसे भिन्न हो क्या यह स्वामीजीको इष्ट है? यदि नहीं, तब उनकी युक्ति कार है | कार प्रल स्वामीजी ने लिखा है- ' यच्चोक्तं छन्दोमन्त्रयोर्भेदोस्ति, ' प्रमा सङ्गतम्, कुतः? छन्दो - वेद - निगम - मन्त्र - श्रुतीनां पर्यायवाचकत भवि ( ऋभाभू. पू. ७ ९ ) ' छन्दांसि वेदा मन्त्राश्चेति पर्यायौ ' ( पृ. ७१ ) † होता ' व्याकरणेपि ‘ मन्त्रेघस ’ ‘ छन्दसि लुङ् ' ' वा षपूर्वस्य निगमे ' छ रहित “ छन्दो - मन्त्र - निगमाः पर्यायवाचिनः सन्ति, एवं छन्द - आदीनां मन्त्रे ' सिद्धेर्यो भेदं ब्रूते, तद्वचनमप्रमाणमेवास्ति इति विज्ञायते ( पू. निर्विष इन स्थलोंमें स्वा.द.जीने ' छन्द ' और ' मन्त्र ' को पर्यायवाचक मा ' ढल तब पाणिनिने उक्त ३।२।७१-७३ सूत्रोंमें मन्त्र और छन्द भिन्न - भि वा. सं. रखे? यदि ऐसा करनेसे भी मन्त्रभागका वेदत्व खण्डित नहीं होन तस्यै ख ब्राह्मण और छन्दके भिन्न - भिन्न कहने से भी ब्राह्मणभागका वेदत्व सकेगी नहीं होता । जब स्वामीजी ' छन्द ' का अर्थ ' वेद ' मानते हैं । " Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) होती है हमसे बताये गये सूत्रोंमें छन्दले ब्राह्मणभाग गृहीत कि— श्रीपाणिनि भी है; तो स्पष्ट हो गया पारिभाषिकता ब्राह्मणभागको छन्द ( वेद ) मानते हैं । यहां कोई ' ब्राह्मणे '? भी नहीं है कि इस पक्ष में एकदेशिता हो । छन्द विद ( २० ) जो कि - श्री तुलसीराम - स्वामीने ' मवाना ' जुष्टार्पिते च छन्दसि - शास्त्रार्थ ' में ह ' ( ३२ ) सूत्रों ' ( ६१ २०६ ) ' नित्यं मन्त्रे ' ( ६।१।२१० ) ३२/७३ )! के लिए व्याज किया है कि - ' मन्त्र ' शब्द छन्दोबद्धतारहित मानना प यजुओंका वाचक रहे, छन्द शब्द गायत्री आदि छन्दोबद्ध वृत्ति में इसलिए ' जुष्टार्पिते च छन्दसि ' ' नित्यं मन्त्रे ' में भिन्न मन्त्रोंका । हो हैं ' यह व्याज तो व्यर्थ ही है । वेदकी - भिन्न पद ' छन्द ' संज्ञा छन्दोबद्धताके युक्ति से ' कारण से नहीं है, किन्तु ' छादनात् छन्दः ' ( निरुक्क कारण है कि वह अन्य प्रमाणोंको ७११२/२ ) के प्रलयकाल में अर्थोक ढक दिया करता है, वा दो छादन कर देता है । पहले अर्थ में प्रमाण यवाचकत ' प्रमाणं परमं श्रुतिः ' ( मनु. २1१३ ) है; दूसरे में प्रमाण ' भूतं भव्यं - पृ. ७१ ) भविष्यश्च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति ' ( मनु. १२/६७ ) है । यजुर्वेदमें ' होता यक्षद् वनस्पतिमभि ' ( २११४६-४७ ) निगमें ' रहित हैं; उनमें ' जुष्ट, अर्पित यह दो मन्त्र ही छन्द-दीनां मन्त्रे ' ( २ | ५ | १० ) ' मन्त्रे ' शब्द आते ही नहीं । तब ' नित्यं यते ( पू. निर्विषय श्वेतवह ' ( ३ | २ | ७१ ) आदि सूत्र निरर्थक वा हो जायेंगे । ' छन्द ' शब्दका ' पद्य ' अर्थ माना जावे चाचक म ' ढश्छन्दसि ' ( ४ | ४ | १०६ ) आदि विधियां, तो भिन्न - भिन वा. सं. २२/२२ ) इस गद्य ' सभेयो युवास्य ' ( यजु: -में न सकेंगी । फिर ' या खर्येण पित नहीं होक तस्यै खर्व: ' इस ब्राह्मणाद्यमें भी छान्दस वेदत्व से सकेगी चतुर्थी ( वा. २ | ३ | ६२ ) न हो । इस प्रकार तो ' मन्त्रे ' पदघटित सूत्र छन्दोबद्ध नते हैं, " मन्त्रोंमें भी न CC - 0. Ankur Joshi स्वा. द. के श्म हेतुकी समीक्षा १०५ लग सकेंगे | तब यह कथन तु. रा.स्वामीका अपने पक्ष के बचाव व्याजमात्र ही सिद्ध हुआ । के लिए ( ५ ) ( २१ ) ब्राह्मणभाग के अवेदत्वमें दिये हुए कात्यायनभिन्नै ऋषिभिर्वेद - संज्ञायामस्वीकृतत्वात् -', तो ( कात्यायनाद् ) श्रन्यैर्ऋपि-भिरग्रहीतत्वात् (? ) ' इस भाभू के ८७ पृष्ठस्थ पञ्चम कि कात्यायनसे भिन्न किसी भी मुनिने हेतुपर मी ब्राह्मणभागको वेद नहीं माना, इसपर भी अब विचार किया जाता है।-१ - त्राह्मणभागकी वेदतामें कात्यायनकी सानी स्वयं स्वामीजी ने मान ही ली है । २-३ न्यायशास्त्रके सूत्रकारतथा भाष्यकार ४-५-६ अष्टाध्यायीके सूत्रकार, वार्तिककार तथा महाभाष्यकारकीसाक्षी हम बता चुके ही हैं । अव अन्य ग्रन्थोंकी साक्षी मी उपस्थित है । 11 १- ' तच्चोदकेषु मन्त्राख्या ' ( २।१।३२ ) मीमांसादर्शनके वेदके एकदेश मन्त्रभागका इस सूत्र में इसमें लक्षण है; ' शेषे ब्राह्मणशब्दः ' ( २ | १ | ३३ ) मन्त्रभाग से अवशिष्ट वेदके एकदेश ब्राह्मणका है । इससे जैमिनिमुनिके मत में दोनों लक्षण कहा भाग वेद सिद्ध हुए, नहीं तो शेष पद व्यर्थ होगा । ' नलचम्पू'का शेष ' उत्तरमीमांसा ' नहीं सकती । इस प्रकार ब्राह्मणभाग भी वेदसे अन्यका हो विषय में स्पष्टता आगे शेष नहीं; इस होगी । ८- नैमिनिसूत्रोंके विख्यात व्याख्याता श्रीशबरस्वामीने लिखा है - ' मन्त्राश्च ब्राह्मणं च वेदः । तत्र मन्त्रलक्षणे भी उक्त परिशेष-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सिद्धत्वाद् ब्राह्मणलक्षणमवचनीयम् । मन्त्रलक्षणवचनेनैव सिद्धम् ' ( मीमांसा २ | १ | ३३ ) । ६ अथवेवेदीय कौशिकसूत्रमें भी लिखा है-' आम्नायः पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च ' ( १ ३ ) यह स्पष्ट वचन है । १० – बोधायनीयगृह्यसूत्रमें भी लिखा है - ' मन्त्र- ब्राह्मणं वेद इत्याचक्षते ' ' मन्त्र - ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' ( २।६।२-३, ३।२।६३ ) । ११ यही आपस्तम्बश्रौतसूत्र ( २४।१।३१ ) में, १२ यही ' सत्याषाढश्रौतसूत्र ' ( १ | १ | ७ ) में तथा १३ शुक्लयजुः प्रतिशाख्यके प्रतिज्ञासूत्र ( १ करिड ० २ सू ० ) में, १४ बोधायनधर्मसूत्र ( २/६/७ ) में तथा १५ तन्त्रवार्तिक ( १ । ३ । १० ) में आया है । १६ सर्वानुक्रमणिकावृत्तिकी भूमिका में षड्गुरुशिष्यने भी कहा है- ' मन्त्रत्राह्मणयोराहुर्वेदशब्दं महर्षयः । १७ श्रीसायणाचार्यने भी ऋग्वेद भाष्योपोद्घात में कहा है- ' मन्त्र-ब्राह्मणात्मकत्वं तावद् वेदस्य अदुष्टं लक्षणम् ' । सामवेदभाष्यकी उपक्रमणिका में उसने लिखा है- ' ननु मन्त्रवेदयोः को विशेष इत्युच्यते, मन्त्रब्राह्मणसमष्टिर्वेदः ' । १८ श्रीयास्कके प्रमाण दिये ही ' जा चुके हैं । १६ श्राचार्य शङ्करस्वामीने वेदान्तदर्शन ( ३।१।५ ) के भाष्य में लिखा है - ' वैदिकसंयोगदर्शनात्'- ' - श्रद्धा वा आपः वेदमें उन्होंने ब्राह्मणभागको उदाहृत किया है । इस प्रकार १२३ ३३ सूत्रके भाष्यमें भी । २०. ' स्याद् वा आम्नायधर्मित्वात् छन्दसि नियमः ( १४ ) वाजसनेयिप्रातिशाख्यसूत्र के व्याख्यानके अवसर पर उवटने लिखा है — ' आम्नायो - वेदः ' यह कहकर उसने ' ब्राह्मणं विध्यर्थंवादरूपम्, मन्त्रस्तु कर्माङ्गभूतद्रव्यदेवतास्मारक: ' इस प्रकार दोनोंकों " ही CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द. के श्म हेतुकी समीक्षा १ आम्नाय माना है । २१ ‘ प्रस्थानभेद’कार श्रीमधुसूदनने भी कहा वा है - ' धर्मब्रह्मप्रतिपादकमपौरुषेयं प्रमाणवाक्यं वेदः । स च मन्त्र ब्रा ब्राह्राणात्मकः ’ । २२ ‘ साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बभूवुः । तेऽवरेच्य मन्त्रान् सम्प्रादुः, अवरे इमं प्रन्थं समाम्नासिषुर्वेदं च वेदाङ्गानि वा इस पर श्रीसत्यव्रतसामश्रमीने ' निरुक्तालोचन ' के २५ पृष्ठमें कहा भे है — ‘ यतोऽत्र ‘ मन्त्रान् सम्प्रादुः ' इति कथनानन्तरमेव पुनरुक्तं ' वि च ' ' इति, अतो ज्ञायते - नेह वेदशब्देन मन्त्राणां बोधोऽपितु तदतिरिक्त धम मां ब्राह्मणानामेव ' इससे भी उक्त पक्षकी पुष्टि हो गई । मान २३. ' उदितेऽनुदिते चैव समयाध्युषिते तथा । सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकी श्रुतिः ' ( मनु. २।१५ ) यहां श्रीमनुजीने भी श्री ऐतरेयादिब्राह्मणभाग ( २६ ) मात्र में उपलब्ध उदितादि - होमको प्रक ' वैदिक - श्रुति ' कहकर ब्राह्मणभागको वेद माना है । इस प्रकार टीक ' राज्ञश्च दद्युरुद्धारमितीयं वैदिकी श्रुतिः ' ( ७१६७ ) यह श्रुति ब्राह्मण- हैं, भाग में सुलभ है, मन्त्रभाग में नहीं । स्वा. दयानन्दजी मनुस्मृतिको मान सृष्टिकी आदिमें बना हुआ मान गये हैं । जैसे कि -- ' यह मनुस्मृति भट्ट जो सृष्टिकी आदि में हुई है; उसका प्रमाण है ' ( सत्यार्थ. ११ समु ब्राह्म भी का आरम्भ १७२ पृष्ठ ) । जबकि स्वामीजीके मत में मनुस्मृति सृष्टिदे श्रारम्भमें बनी हुई सिद्ध है; और उसी मनुस्मृति में ब्राह्मणभागको वेदो शाख नामसे व्यवहृत किया गया है; तो ब्राह्मणभाग में वेदत्वव्यवहार सृष्टिकी पद्य मेघा श्रादिमें सिद्ध हुआ । मनुस्मृतिके प्रवक्ता भृगुजी भी सृष्टिकी आदि । थे, यह मनुस्मृति ( १।३५ ) में ही स्पष्ट है । पठेत २४. ' वेदोखिलो धर्ममूलं ' ( २२६ ) यहां प्राचीन भाष्यकार Gujarat. An eGangotri Initiative

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105 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) स्वा.द. के श्म हेतुकी समीक्षा १०६ वादिगणमान्य श्रीमेधातिथिने लिखा है - ' वेदशब्देन ऋग्यजुः सामानि भी कहा ब्राह्मणसहितानि उच्यन्ते... स देदो बहुधा भिन्नः सहस्रवर्त्मा च मन्त्र सामवेदः सात्यमुनिर।णायनीयादिभेदेन, एकशतमध्वर्यूणां काठक-वाजसनेयकादिभेदेन, एकविंशतिर्बाह्वृच्या आश्वलायनैतरेयादि-ङ्गानि च भेदेन । नवधा आथर्वणं मोदक - पैप्पलादकादिभेदेन ' ।... स वेदो क विशिष्टः शब्दराशिरपौरुषेयो मन्त्रब्राह्मणाख्योऽनेकशाखाभेदभिन्नो रुक्तं ' वैद धर्मस्य मूलम् ' यहां पर स्पष्ट ही दोनों मन्त्र - त्राह्मण भागोंको वेद दतिरिक्त ई । माना गया है । ( ख ) ' एकदेशं तु वेदस्य ' ( २/१४१ ) इस मनुपद्यकी व्याख्या में था वर्तते श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है - ' वेदस्य एकदेशं मन्त्रं ब्राह्मणं च ' । इसी जीने भी द- होमको प्रकार ही मेधातिथि, राघवानन्द, नन्दन, रामचन्द्र आदि टीकाकारोंने लिखा है । इससे वे मन्त्रभागको भी वेदका भाग हो मानते इस प्रकार हैं, पूर्ण वेद नहीं मानते, ब्राह्मणभागको भी । दोनोंको मिलकर ही पूर्ण वेद ब्राह्मए । मानते हैं । ( ग ) ' वेदः कृत्स्नोधिगन्तव्यः ' ( २ १६५ ) यहां कुल्लूक-नुस्मृतिको भट्टने लिखा है - ' समप्रवेदो मन्त्र ब्राह्मणात्मक सोपनिषत्कः ' यहांपर मनुस्मृति ब्राह्मणके साथ उपनिषत्को भी पूर्ण वेद माना है । श्रीमेधातिथिने ११ समु भी लिखा है- ' वेदशब्दो मन्त्र- ब्राह्मणवाक्य - समुदायात्मिकां ति सृष्टि को वेद शाखामाचष्टे ' । ( घ ) ' अत ऊर्ध्वं तु छन्दांसि ' ( ४६८ ) इस मनु-सृष्टिकी पद्य में कुल्लूकने लिखा है - ' छन्दांसि - मन्त्र ब्राह्मणात्मकं - वेदम् ' । मेघातिथिंने लिखा है - ' मन्त्रब्राह्मण- वाक्य समुदायात्मकान् वेदान् आदिमें पठेत् ' । भाष्यकार २५. ' छन्दसि अर्थान् बुद्ध्वा ' ( ३ | १ ) इस काठकगृह्यसूत्रमें CC - 0. Ankur Joshi देवपालने लिखा है - ' छन्दसि वेदे ऋग्यजुःसामलक्षण - मन्त्रब्राह्मणार्थ-वादनामधेयभेदयुक्ते ' । यहां भी वही बात कही है । २६ विध्यर्थ-वादवचनविनियोगात् ' ( २।१।६१ ) इस न्यायदर्शन के सूत्रकी वृत्ति में श्रीविश्वनाथपञ्चाननने लिखा है- ' वेदे वाक्य विभागं दर्शयति, मन्त्र-ब्राह्मणभेदाद् द्विधा वेदः । तत्र ब्राह्मणस्य अयं विभागः यहां मी ब्राह्मणभागको वेद कहा है । २७ शुक्रनीति ( जिसे खा. द. जीने स.प्र. छठे समुल्लास के अन्त में प्रमाणित किया है ) में कहा है- ' मन्त्र-ब्राह्मणयोर्वेदनाम प्रोक्तमृगादिपु ' ( ४.२७५ ) यहां भी ब्राह्मणभागको मन्त्रभागके समान ही वेद माना है । आर्यसमाजी ' सर्गश्च प्रति-सर्गश्च ' इस पुराणके श्लोक को - जो पुराणोंके लक्षणको बताता है-उपस्थित करते हुए डरते हैं, पर शुक्रनीतिमें स्थित उसी श्लोकको प्रमाण मानते हैं, इससे शुक्रनीतिका मान आर्यसमाजियों के मत में बहुत है - यह सिद्ध होता है । धव उसीकी ब्राह्मणभाग के विषय में यह सम्मति भी आर्यसमाजी आदि देखें । २८. ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ' ( ६।१११ ) इस वैशेषिक दर्शन के सूत्रके भाष्यमें ' स्वर्गकामो यजेत ' इस ब्राह्मणमाग के वाक्यको वेदके नामसे कहने से कणादमुनिके मतमें भी ब्राह्मणभाग वेद सिद्ध हुआ । २६. याज्ञवल्क्य - स्मृतिके प्रायश्चित्तप्रकरण ( ५२४६ ) में मिताक्षरामें कहा है- ' मन्त्रब्राह्मणात्मकं वेदम् ' । उसीके श्राद्धप्रकरणमें ' वेदार्थवित् ' ( २१६ ) श्लोककी मिताक्षरामें लिखा है- ' मन्त्र-ब्राह्मणयोरर्थं वेत्तीति वेदार्थवित् । ३० श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ' ( वेदान्त. २/१/२७ ) इत्यादि में बहुत स्थलोंमें श्रुतिके प्रमाण में Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ब्राह्मणभाग तथा उसके उपनिषद्भागको उधृत किया गया है । ' श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयः ' ( २।१० ) इस मनुप्रमाणसे श्रुति वेदको कहते हैं । तब उपनिषद् आदि वेद हुए । ३१ ‘ वेदोखिलो धर्ममूलं ' ( २।६ ) इस मनुवचनसे तथा ' श्रुति-प्रमाणो धर्मः स्यात् ' ( महाभारत वनपर्व २०६।४१ ) इस श्रीव्यासके वचनसे सारे वेदको धर्ममूलक बताया गया है । धर्मका लक्षण है ' चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः ' ( मीमांसा ११११२ ) । ' विहितकर्मजन्यो धर्मः ' ( तर्कसंग्रह - गुणनिरूपण में ) । ' स्वर्गकामो यजेत, अहरहः सन्ध्यामुपासीत, अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत ' इत्यादि विधिवाक्य ही चोदना होती हैं । मन्त्रमागमें तो ' कुर्यात्, क्रियेत, कर्तव्यं, मवेत्, स्याद् इति पञ्चमम् । एतत् स्यात् सर्ववेदेषु नियतं विधि-लक्षणम् ' ( मीमांसा- ४ | ३ | ३ ) इन विधियोंकी सत्ता ही नहीं है, प्रायः वहां उपासना दीखती है । विधियोंकी ब्राह्मणभाग में ही सत्ता है । तब मन्त्रभागमें विधियोंके अभावसे ' वेदोऽखिलो धर्ममूलम् ' ( मनु. रा ६ ) ‘ एतत् स्यात् सर्ववेदेषु नियतं विधिलक्षणम् ' ( मीमां.-४ | ३ | ३ ) ' श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः । प्रेत्य चानुत्तमां गतिम् ' ( मनु. २६ ) यह प्राचीन वचन निर्विषय होजाएंगे -- यदि ब्राह्मण मागको वेद न माना जाय । इस कारण ' धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ' ( २।१३ ) इस मनुके पद्यमें ' श्रुति ' शब्दसे वेदके भाग ब्राह्मणका ही ग्रहण है, क्योंकि - धर्म ( विधि ) उसीमें ही है । इससे मी ब्राह्मणभाग वेद सिद्ध हुआ । ३२ मीमांसादर्शनको साक्षात् वेदका व्यवस्थापक माना जाता स्वा.द. की श्महेतुकी समीक्षा " है । उसमें ‘ अथातो धर्मजिज्ञासा ' ( १ । १ । १ ) सूत्र से शुरू करके ‘ अन्वाहार्ये च दर्शनात् ' ( १२ । ४ । ४२ ) सूत्रतक १२ अध्याय हैं । उनमें ३ रे, ६ ठे, १० वें अध्यायके आठ - आठ पाद है; शेष अध्यायोंमें चार - चार । इस प्रकार ६० पादोंके दर्शन में प्राय: १०० अधिकरण हैं । इनमें प्रायः ब्राह्मणभागके वाक्य ही उदाहृत किये गये हैं । मन्त्रभागके वाक्य तो वहां पर अत्यन्त न्यून हैं । मीमांसादर्शनमें पौरुषेय कहे जाने वाले स्मृति, इतिहास आदिको नहीं है, किन्तु पौहपेय वेद - वाक्योंका ही उसमें विचार किया गया । है । यदि ब्राह्मणभाग वेद न होता; तो ' मीमांसा नाम वेद - विचार! य ‘ एवं वेद - वाक्यान्येव एभिर्व्याख्यास्यन्ते ' ( मीमां. शावर. १ । १ । १ ॥ यह परिभाषाएं न होतीं । इससे स्पष्ट है कि -- ब्राह्मणभाग वेद ही है । उत्तरमीमांसा ( वेदान्तदर्शन ) तो प्रायः ब्राह्मणभाग –उपनिषत्के गं ही प्रमाण तथा उद्धरण देती है । इस प्रकार ब्राह्मणभाग वेद सिद्ध हुआ, नहीं तो वेद - व्यवस्थाके प्रकाशनार्थ ब्राह्मणभागका अबलम्बर प्रव करने वाले दार्शनिक मुनि प्रमत्त माने जावें । अतः स्पष्ट है ि द्वा मीमांसामें भी ब्राह्मणभागको श्रातिदेशिकतासे वेद नहीं कहा गया गय किन्तु वास्तविकतासे ।.पचासों स्थलोंपर ब्राह्मणोंको वेद कहर आतिदेशिकता वा औपचारिकता नहीं हो जाती । पश ( क ) ' आम्नायस्य क्रियार्थत्वात् ' ( १/२/१ ) इस मीमांसासूत्रो देश अर्थवादात्मक़ - न्नाह्मणभागको ' आम्नाय ' माना गया है । अर्थवा इस प्रधानतासे ब्राह्मणभागका विषय है । यदि उसे वेद न माना जाये तो उसे अधिकृत करके किया हुआ वेद - मीमांसा में प्रश्न भा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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११२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) शुरू करके कलाप हो जावे । उसके उत्तरपक्षमें उसकी वेदता खण्डित न्याय हैं । नहीं की गई, किन्तु प्रश्नोंका उत्तर दे दिया गया है । ( ख ) ११२ । ६ हैं; शेष सूत्रके माध्यमें श्रीशवराचार्यने अर्थवादको वेदका ही माग नमें प्रायः माना है । इस प्रकार ' औदुम्बरो यूपो भवति ' ( १२/१६ ) इस उदाह सूत्रके भाष्य में कहे हुए विधिवद् निगद अर्थवादोंको ११२ २० नून हैं । सूत्रके भाष्यमें ‘ तद्वद् वेदे भविष्यति ' इस प्रकार ‘ वैदे ' शब्दसे आदिको कहा गया है । ( ग ) वेदे व्यक्तम संवादः -- ऊर्जोऽवरुद्ध्यै इत्यप्रसिद्धं किया गया वचनम्, ऊर्ग वा उदुम्बरः, इति हेतुत्वं च अप्रसिद्धम् ' ( मी. १।२।२१ ) द- विचार यहां पर ' वेदे ' कह कर ब्राह्मणभागको ही उदाहृत किया है । र. १११११ ) 2 ( घ ) ' शूर्पेण जुहोति, तेन हि अन्न क्रियते - सत्यमेवं लोके, विधा-वेद ही यिष्यते तु वचनेन वेदे ' ( १।२।२६ ) यहां भी ब्राह्मणको वेद कहा उपनिषत्के गया है । ( ङ ) ' उक्त ' हि समाम्नायै दमर्थ्यम् ' ( १ । ४ । १ ) यहां पर वेद सिद्ध विध्यर्थत्रादयुक्त - ब्राह्मणको समाम्नाय कहा गया है । ( च ) इस अवलम्वन प्रकार ' …….तत्सामर्थ्यं समाम्नाये ' ( १।४।१७ ) यहां पर ' वैश्वानरं = पष्ट है । द्वादशकपालं निर्वपेत् ' इस ब्राह्मणवाक्यको समाम्नाय कहा गया है । कहा गया ( छ ) वस्त्वेकेषां तत्र प्राक् श्रुतिर्गुणार्था ' ( ३६ २० ) यहां ' आग्नेयं पशुमालभते ' इस ब्राह्मणभागको ' श्रुति ' कहा है । ' श्रुतितो व्यप-मांसासूत्र देशाच्चे ' ( ४ | ४ | ३४ ) इस सूत्र में ' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ' । अथवा इस ब्राह्मणको ' श्रुति ' माना है । ( ज ) कर्तुर्वा श्रुतिसंयोगात् ' ( ६।१।५ ) माना जा यहां ब्राह्मणभागके विधिवाक्योंको ' श्रुति ' शब्दसे कहा है । ( झ ) नश्न इस प्रकार साङ्ख्यदर्शनमें भी ' श्रुतिरपि प्रधानकार्यत्वस्य ' ( ५।१२ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection ' स्वा.दं.के श्म हेतुकी समीक्षा ११३ यहां ' अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम ' इस ब्राह्मणभाग- उपनिषद् को श्री श्रुति माना गया है । ( ञ ) ' अपि वा वेदनिर्देशाद् अपशूद्राणां प्रतीयेत ' ( मी. ६।११३:) इस सूत्र में ' वेदे हि त्रयाणां निर्देशा भवति - वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत, ग्रीष्मे राजन्यं, वर्षासु वैश्यम् ' ( ६ ११३३ ) इस ब्राह्मणमागके वचनको वेद - वचन माना गया है । ( ट ) विधौ तु वेद - संयोगात ( ६।१२६ ) यहां ' माषान्मे पचत ' इस त्राह्मणभागको वेदशब्दसे कहा गया है । ( ठ ) ' आम्नाय वचनं तद्वन् ' ( ११/२/११ ) यहां ' यदेवाध्वर्युः करोति ' इस ब्राह्मणको चाम्नाय वचन माना गया है । ( ड ) ‘ आम्नाय - वचनाच्च ' ( १२/४/३२ ) इस मीमांसादर्शन के सूत्र में ‘ यो वै सत्रे बहूनां यजमानानां गृहपतिः ' इस ब्राह्मणवचनको आम्नाय माना गया है । ( ढ ) ३ । ४ । २८ सूत्रमें ' पौण्डरीकेऽश्वसहस्र ं दक्षिणा, ज्योतिष्टोमे गौश्च अश्वश्च ' यह वैदिक अश्वप्रतिग्रह बताया गया है, यह मन्त्रभागमें नहीं, किन्तु ब्राह्मणभाग में है । ३३. जो कि स्वा.दयानन्दजीने ब्राह्मणभाग के वेदत्वका निषेध किया है; वह भी ब्राह्मणभागके वेद होने में प्रमाण है । उनसे प्रष्टव्य है कि आपने जो ब्राह्मणभागकी वेदता निषिद्ध की है । वह उसकी वेदताकी प्राप्तिमें की है, या अप्राप्तिमें? यदि अप्राप्तिमें, तो यह ठीक नहीं; प्राप्ति होनेपर ही निषेध हुआ करता है ' प्राप्तौ सत्यां निषेधात् ' । नहीं तो स्वामीने गृह्यसूत्र - मनुस्मृति आदियों की वेदता भी खण्डित क्यों नहीं की? यदि प्राप्ति होने पर ही स्वार्म ने ब्राह्मणभागकी वेदता निषिद्ध की है; तो प्रष्टव्य है कि वह प्राप्ति Gujarat. ८ An स eGangotri ० प ० Initiative

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११४ श्रीसनातनधर्मा लोक ( ६ ) स्वा.द. के श्म हेतुकी समीक्षा ११३ उनको कहां से प्राप्त हुई? यदि लोकव्यवहार ही वहां कारण कहा जावे; तो वह व्यवहार प्राचीन है या अर्वाचीन? यदि कहें अर्वाचीन; तो यह व्यर्थ है; इसमें कोई प्रमाण नहीं । उसकी प्राचीनता हम सिद्ध कर ही चुके हैं । यदि वह व्यवहार प्राचीन वा पारम्परिक है; तो स्वामीका पक्ष खण्डित हो गया । यदि कहा जावे कि - आपस्तम्ब - कात्यायनादिने ' मन्त्र - ब्राह्मणयो-र्वेदनामधेयम् ' इस वाक्यसे वह व्यवहार चलाया; तो यह भी ठीक नहीं । इस वाक्य में यह नहीं कहा कि मन्त्र और ब्राह्मणका वेद नाम होवे; बल्कि यहां यह कहा है कि दोनों वेद हैं । अर्थात् प्राचीन-काल से ऐसा है, हमने कोई नया व्यवहार नहीं चलाया । यदि स्वा.द.जी वा उनका कोई अनुयायी यह बात न माने; तो मन्त्रभाग में भी वेदव्यवहार अर्वाचीन रहेगा; क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मणको उक्त वाक्यमें इकट्ठा कहा है । यह न्याय प्रसिद्ध है - ' एकयोगनिर्दिष्टानां सह वा प्रवृत्तिः, सह वा निवृत्तिः ' ' सन्नियोगशिष्टानामन्यतराभावे उभयो-रप्यभावः ' अर्थात् इकट्ठे हुओंकी प्रवृत्ति भी इकट्ठी होती है, निवृत्ति भी इकट्ठी । इससे सिद्ध हुआ कि - वैदिककाल से प्रारम्भ करके आर्यसमाज के प्रवतक स्वा. दयानन्दजीसे पूर्वकालतक ब्राह्मण-भागको भी मन्त्रभागकी भांति वेद माना जाता रहा; परन्तु स्वा.द. जीके ही कालसे सनातनधर्मको संकुचित करनेके लिए ब्राह्मणभागकी वेदताकी कथा शुरू की गई; अतः यही व्यवहार अर्वाचीन एवं अमाननीय सिद्ध हुआ । ३४. स्वा.दयानन्दजीके अधीन ईश्वरके मत में भी ब्राह्मणभाग CC - 0. Ankur Joshi Collection वेद है | स्वामीजी सत्यार्थप्रकाशके २५ पृष्ठमें कहते हैं - ' कुलीन शूद्र उसको मन्त्रसंहिता छोड़के सब शास्त्र पढाव ' | इस प्रकार उन्होंने अपनी संस्कारविधिमैं उपनयन और वेदारम्भ संस्कारमें भी शूद्रको अधिकार नहीं दिया । फिर स्वामीजीने स.प्र. ४४ पृष्ठ शूद्रोंको भी वेदाधिकार कहा है । पहले शूद्रोंका मन्त्रभाग में निषेव । सूचित करके और यहां पर वेद में शूद्राधिकार बताने से स्वामाकं अधीन ईश्वरको भी यहां वेद ब्राह्मणभाग ही इष्ट हुआ । नहीं तो Earn क्या शक्ति है कि स्वामीजीके अनुसार मन्त्रभाग में अनधिकृत शूद्रको मन्त्रमागका अधिकार दे; अन्यथा तो स्वामीजीने जैसे ईश्वरको साकारता से हटा दिया, वैसे वे निराकारतासे मी हटाकर उसका अस्तित्व भी नष्ट कर सकते हैं । इससे भी उनके ईश्वरको वेद ब्राह्मणभाग ही इष्ट है । ( ख ) स्वा.दयानन्दजीने वैदिक ( वेदमन्त्रोंवाली ) सन्ध्या बनाई है । उसमें का ' ओं भूः पुनातु शिरसि ' यह मन्त्र ' वाक वाकू ' यह मन्त्र ' भूः भुवः, ओं स्वः, महः जनः ' यह सप्त व्याहृतियों-वाला मन्त्र स्वा.दयानन्दजीसे माने हुए वेद में नहीं | तब उनकी मानी हुई सन्ध्या वैदिक कैसे हुई? इससे स्पष्ट है कि उक्त सन्ध्या तो वैदिक है, पर उक्त मन्त्र अन्य संहिता वा ब्राह्मणभागमें हैं । आर्यसमाज सम्मत वेद तो छपे हुए मिलते ही हैं. पर अन्य बहुत सी संहिताएँ तथा बहुतसे ब्राह्मण लुप्त हैं; उन्हीं में वे मन्त्र सुलभ हैं । इस प्रकार भी संहिता और वहा मिलकर ही वेद सिद्ध हुए । Gujarat. An eGangotri Initiative