सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 71–80
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 71–80
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११६ ( ग ) स.प्र. ४३ - ' कुलीन है अर्थात्, जो - जो इस प्रकार उसका इम यथावत् संस्कार में मान्य हैं, इसलिए ४४ पृष्ट तब संगत हो में निषेध जिसमें उपनिषद् श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) पृष्ठमें स्वामीजीने कहा है- ' हमारा मत वेद वेदमें करने और छोड़ने की शिक्षा की है, उस-करना – छोड़ना मानते हैं । जिसलिए वेद हमको हमारा मत वेद है ' ( ३ समु. ) । यह स्वामीका सकता है, जब सभी संहिता तथा ब्राह्मणभाग और आरण्यक भी सम्मिलित हैं- वेद माना स्वामी के • जावे । नहीं तो स्वामीजी अपनी मान्य चार वेद- पोथियोंसे सभी नहीं तो विधि - निषेध ( करना छोड़ना ) नहीं दिखला सकते । न्त्रभागमें स्वामीजीने ( ६ ) तासे भी ( २२ ब्राह्मणभागको अवेद सिद्ध करनेकेलिए ऋग्वेदादि-नी उनके भाष्यभूमिकामें स्वा॰दयानन्दजी से दिया हुआ अन्तिम हेतु है-' मनुष्यबुद्धिरचितत्वाच्च ' । परन्तु ब्राह्मणभाग में वह मनुष्य - बुद्धि क्या बनाई | है; और मन्त्रमागमें क्या मनुष्य - बुद्धि नहीं; यह स्वामीजी सिद्ध ' यह नहीं कर सके । इस कारण उनका यह हेतु साध्य होने से हेत्वाभास हृतियों- सिद्ध हो गया । ' पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मण कल्पेषु ' ( पा. ) इस सूत्रमें की मानी ब्राह्मणभाग को ऋषिप्रोक तो कहा है, ऋषिकृत नहीं कहा । प्रोक्ता बन्ध्या तो तो जैसे उकसूत्रमें ब्राह्मणकी कही गई है, वैसे ही ' तेन प्रोक्तम् ' इस में हैं । पाणिनिसूत्र के भाष्य में मन्त्रभागको भी ' ऋपिप्रोक्त ' बताया गया है । न्य बहुत ' आख्या प्रवचनात् ' ( मीमांसा १११।३० ) इस जैमिनिसूत्र से भी सुलभ मन्त्र ब्राह्मण दोनों को ही ' प्रोक्त ' बताया गया है, ' निर्मित ' नहीं; दसिद्ध जैसे — ' काठकम्, माध्यन्दिनीयम्, शाकलम् ' इत्यादि । इस प्रकार ब्राह्मणभागको मनुष्यबुद्धिरचित बताना अपना अज्ञान प्रकट CC - 0. Ankur Joshi स्वा.द.के शेष हेतुओंकी समीक्षा ११७ करना है । इस प्रकार स्वा. द. जीसे कहे हुए छहों हेतुथोंके निराकृत हो जानेसे ब्राह्मणभाग भी मन्त्रभागकी भांति स्पष्ट वेद सिद्ध हो गया । ( २३ ) यह कहना कि - ' ऋग्वेदादिके ( ७ ) साथ ' वेद ' शब्द ' संहिता ' शब्दका प्रयोग होता है, ' शतपथादि ब्राह्मण ' के साथ नहीं वा; अतः ब्राह्मणभाग वेद नहीं, यह भी ठीक नहीं; नहीं तो फिर श्रायुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, अर्थवेद, सर्पवेद, पिशाच - वेद, पुराणवेद इनके साथ भी ' वेद ' शब्द लगा हुआ है, सुश्रुतसंहिता चरक संहिता, भेल - संहिता, हारीत - संहिता इनके साथ ' संहिता ' शब्द लगता है, इन्हें भी प्रतिपक्षियों को बेद मानना पड़ेगा, पर नहीं माना जाता; तब ' वेद ' शब्दवाच्यता ही केवल वेदत्व - प्रयोजक नहीं हुआ करती । मन्त्रभागमें ही ‘ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ' ( यजुः ( ३१।७ ) यहां ऋक् श्रादिके साथ ' वेद ' शब्द कहीं नहीं लगाया गया, निरुक्तकारने भी कहीं नहीं लगाया । मन्त्रभाग में जहां ' वेद ' शब्द आया है, वहां ऋगादि नाम नहीं; तव क्या ऋकू आदि वेद न होंगे? इन्हीं ऋगादिको पहले शाकल्य, माध्यान्दिन, कौथुम, शौनक - संहिता कहा जाता था, तब वेदशब्दके साथ न होने से क्या यह वेद नहीं रहेंगे? यदि इनके साथ ' संहिता ' शब्द होने से प्रतिपक्षी इन्हें वेद मानें; तो काठक - संहिता, मैत्रायणी - संहिता आदिको भी उन्हें वेद मानना पड़ेगा । जबकि प्राचीन लोग ब्राह्मणभागको भी मन्त्रभागकी भांति ' ऋषि ' कहते हैं, वेदका Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालौक ( ६ ) प्रमाण देना हो तो ब्राह्मणभागका प्रमाण देते हैं; और इसे आम्नाय श्रुति आदि शब्दोंसे कहते हैं: तो यह ( ब्राह्मणभाग ) वेद सिद्ध हो हो गया । ( 5 ) ( २४ ) स्वा. दयानन्द आदि जो ' ब्राह्मणभाग ' को ' भाग ' शब्द-वाच्य कहते हैं; इससे भी वह ' वेद ' सिद्ध होता है । ' भाग ' का ' भांगी ' भी अवश्य हुआ करता है । ब्राह्मणभागका भागी ' मन्त्रभाग ' नहीं बन सकता; क्योंकि उस मन्त्रभागको भी तो ' भाग ' बुलाया जाता है । जैसे कि स्वा. द. जीके ही यह शब्द हैं- १ वेद मन्त्रभाग और त्राह्मण व्याख्याभाग है ' ( स.प्र. ७ पृ. १२७ ), २ चारों वेदों ( ईश्वरप्रणीत - संहिता मन्त्रभाग ( स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश सं. १ स.प्र. प्र. ३८३ ) । ३ ' महाभाष्यकारेण मन्त्रभागस्यैव वेदसंज्ञां मत्वा ' ( ऋ.मा.भू. पृ. ८६ ) । ४ ‘ अतो नात्र मन्त्रभागे हि इतिहासलेशोपि ’ ( ऋ.मा.भू. पृ. ८१-८० ) इन स्थलों में स्वामीने मन्त्रभाग शब्द रखा है । अब ' ब्राह्मणभाग ' शब्द उनसे प्रयुक्त देखिये -१ फिर ब्राह्मणभागको भी ( ऋ.भा.भू. ८१ ) । २ ' जिसमें जगत्की उत्पत्ति श्रादिका वर्णन है, उस ब्राह्मणभागका नाम पुराण है ' ( पृ. ८४ ) । ३ किन - ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' इति कात्यायनोक्तेर्ब्राह्मण-भागस्यापि वेदसंज्ञा कुतो न स्वीक्रियते ' ( ऋ.भा.भू. पृ. ८० ) इससे मन्त्र और ब्राह्मण दोनों भाग ही सिद्ध हुए । इसीलिए १ अमरकोपमें ' वेदमेदे गुह्यवादे मन्त्रः ' ( ३।३।१६७ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द.के शेप हेतुओं की समीक्षा ११६ और २ मेदिनी - कोषमें ‘ मन्त्रो वेद - विशेषे ( भेदे, भागे ) स्यात् ' यहाँ मन्त्रभागको भी वेदका भेद, विशेष अर्थात वेदका भाग ही कहा है । इसी प्रकार ३ ‘ ब्राह्मणं ब्रह्मसंघाते वेदभागे नपुंसकम् ' इस अमरकोष ( २ | ४ | ८६ ) के पद्यकी रामाश्रमी टीकामें उद्धृत इस मेदिनी - कोषके प्रमाण में ' ब्राह्मण ' को भी वेदका भाग ही कहा है । इसी प्रकार ४ ' त्रिकाण्डशेष ' कोषके नानार्थ - वर्गके ' मन्त्राऽन्य-( अतिरिक्त ) वेदे विप्रौघे क्लीवं, ना ब्राह्मणो द्विजे ' ( ३ | ३ | ११५ ) यहाँ ब्राह्मणभागको मन्त्रसे अतिरिक्त वेद बताया है । ५ शङ्कर मिश्रकृत वैशेषिक - सूत्र के उपस्कार ( ६ ११२ ) में लिखा । है - ' ब्राह्मणमिह वेदभागः । ६ न्यायविस्तरकारिकामें लिखा है-' मन्त्रश्च ब्राह्मणं चेति द्वौ भागौ ' । जो कि श्रीतुलसीराम - स्वामीने अपने ' ऋगादिभाष्यभूमिकेन्दूपराग ' में इस वचनको अमान्य माना है उसका कारण यह है कि इससे उनका पक्ष कटता है; तब ऐसे व्याज न करें; तो फिर अपने पक्षको कैसे बचावें? इस प्रकार मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनों ' भाग ' सिद्ध हुए, और ' भागी ' हुआ वेद । अर्थात् दोनों भाग मिलकर ही वेद होता है तब यदि भाग होने पर भी मन्त्रभाग वेद है । इसमें प्रतिपक्षियोंका कोई विवाद नहीं; तब ब्राह्मणभाग भाग होनेपर भी निर्विवाद ही वेद सिद्ध होगया, क्योंकि - ' समुदायशब्द अवयववाचक भी, और अवयव समुदाय-वाचक भी हुआ करता है । जो कि अर्वाचीन लोग ब्राह्मणभागको वेदभिन्न सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं, उसमें कारण यह है कि - ब्राह्मणभाग से सनातनः Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मातोक ( ६ ) १२० धर्मंके बहुतसे सिद्धान्त सिद्ध होते हैं । वे सिद्धान्त कहीं वैदिक न त्यहाँ । बन जायें, इससे वेदमार्गको संकुचित करने के लिए अर्वाचीनोंका यह ही कहा प्रयत्न है । जो कि ब्राह्मणभाग में याज्ञिक - पश्वालम्भ देखकर कई कम् ' इस उससे अपनी जान छुड़ाना चाहते हैं; वह तो सूत्ररूपसे मन्त्रभागमें धृत इस भी है । वहाँ जैसा अर्थ किया जावेगा; वही अर्थ ब्राह्मणभाग में भी कहा है । किया जा सकता है । वस्तुतः याज्ञिक पशु, व्रीहि आदिका हुआ त्राऽन्य- करता है, जैसे कि महाभारत में कहा है ' श्रूयते हि पुराकाले नृणां २५ ) यहाँ व्रीहिमयः पशुः । येनायजन्त यज्वानः पुण्यलोकपरायणाः ' ( अनुशासन-पर्वं ११५।५६ ) तब उपचारसे ही वहाँ वध, रक्त आदि शब्दका लिखा प्रयोग होता है - इस विषयपर आगे निबन्ध देखिये । गायके वेदके है- मत में - स्वामीने अतः न्य माना होगा है; तब प्रकार ( - ' भागी ' ' अन्य ' होने से साक्षात् उसका ग्रहण कभी नहीं होता । इस बात से डरकर ब्राह्मणभागको वेदत्वसे हटाना अन्याय्य । उन्हें वेदत्वसे हटाने से शास्त्रों में अनुपपत्तियाँ उत्पन्न होंगी । ( ह ) २५ ) वस्तुतः जैसे स्वामीजीने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में शत-पथके प्रमाणसे ऋग्वेदादि - मन्त्रभागको परमात्माका निःश्वास माना यदि है, वैसे ही उसी प्रमाणके अन्तिम अंश में ब्राह्मणभागको भी विवाद परमात्माका ही निःश्वास माना गया है । वह शतपथ ब्राह्मरणका होगया, प्रमाण यह है- ' अरे अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यद् नमुदाय. ऋग्वेदो यजुर्वेदः, सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः, इतिहासः, पुराणं, विद्या, उपनिषदः, श्लोकाः, सूत्राणि, अनुव्याख्यानानि अस्यैव एतानि ' करने का ( १४ | ५ | ४ | १० ) यहाँ ऋगादि - रूपसे मन्त्रभाग चार प्रकारका कहा सनातन ' CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द.के शेष हेतुयोंकी समीक्षा १२१ है । आगे इतिहास आदि - रूपसे आठ प्रकारका ब्राह्मणभाग इष्ट है । गोबलीवर्द - न्यायसे उसे भिन्न तथा भिन्न नामसे कहा गया है । दोनों को ही परमात्माका निःश्वास माना गया है । इसीलिए तैत्तिरीयारण्यक ( ८ प्र. २ अनु. ) के सायणमाप्य ( पूना - संस्करण पू. ५६३ ) में कहा है- " वेदो हि मन्त्र ब्राह्मणभेदेन द्विविधः । ब्राह्मणं च अष्टधा भिन्नम् । तद्भेदास्तु वाजसनेयिभिः ( शतपथेन ) आम्नायन्ते- ' इतिहासः, पुराणं, विद्या, उपनिषदः, श्लोका इत्यादि । ” आगे श्रीसायणाचार्यने ब्राह्मणभागसे उनके उदाहरण दिये हैं । तब इस अन्तिम अंशको ' भ्रमोच्छेदन ' में न मानना, वा उसे वेदविरुद्ध बताना स्वा ० द ० का दुस्साहस है । केवल अपने अशुद्ध पक्षकी रक्षार्थ है; उसका व्याजसे अधिक मूल्य नहीं । स्वा ० शङ्कराचार्यने भी बृहदारण्यक उपनिषद् में ' अरे अस्य महतो - ' इस कण्डिकाकी व्याख्या करते हुए यही माना है । ' किं तन्निश्वसितमिव ततो जातम्? उच्यते, यद् ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः, चतुर्विधं मन्त्रजातम् । इतिहास इति - उर्वशी -पुरूरवसोः संवादादिः ' उर्वशी हाप्सराः । ( शत. ११ | ५ | १ | १ ) इत्यादि ब्राह्मणमेव । पुराणम् - असद् ' वा इदमप्रे आसीत् ' ( तै. उ. २२६१ ) इत्यादिः । एवमष्टविधं ब्राह्मणम् । एवं मन्त्र ब्राह्मणयोरेव ग्रहणम् । नियतरचनावतो विद्यमानस्यैव अभिव्यक्तिः, पुरुषनिःश्वासवत् । न च पुरुष - बुद्धिप्रयत्नपूर्वकः । अतः प्रमाणनिरपेक्ष एव स्वार्थे । तस्माद् यत् तेनोक्तम् तत् तथैव प्रतिपत्तव्यम् ' । ( २६ ) आर्यसमाजके श्रीछुट्टनलाल स्वामीने स्वा ० द ० जीके केवल Gujarat. An eGangotri Initiative
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१२३ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वेदविरुद्ध कहने से अपने पक्षकी दुर्बलता मात्र प्रकाशित हो जाने से इस शतपथके प्रमाणसे अपनी जान छूटती न देखकर ' वेद - प्रकाश ' पत्रमें इसपर विचित्र कल्पना की है । वे कहते हैं कि - ' उक्त शतपथ - वचन में श्लोक, सूत्र आदियों को भी परमात्माका निःश्वास बताया गया है । तब तो नास्तिकोंके श्लोक वा सूत्र आदि भी परमात्मा के निःश्वास सिद्ध हो जाने से वे वेद एवं प्रमाण हो जाएंगे । अतः उक्त वचनका यह अर्थ नहीं । इसका यह अर्थ है कि ऋग आदि तो उस महाभूत ( परमात्मा ) के निःश्वास हैं; पर इतिहास, पुराण, श्लोक, सूत्र आदि तो ' एतानि अस्यैव निश्वसितानि ' इस ' वचन में ' अस्यैव ' से ' जीवात्मा ' का अभिप्राय है । वे जीवोक्त होने से पौरुषेय हैं, अतः परतः प्रमाण हैं ' । यह कल्पना याठ भेदवाले ब्राह्मणभाग के अज्ञानके ही कारण है । वस्तुतः उक्त वचनमें नास्तिकादियोंके श्लोक, सूत्र आदि इष्ट नहीं; जब वे नास्तिक ईश्वरको ही नहीं मानते; तब उनके श्लोक ईश्वरके निःश्वास ही कैसे हो जाएंगे? किन्तु ब्राह्मणभाग के ही वे लोकादि इष्ट हैं । उनका प्राकरणिक अर्थ श्रीसायण तथा आचार्य शङ्करके बचनसे हम दिखला चुके हैं । तब उस महाभूत परमात्मा के श्वासरूप होनेसे ब्राह्मणभाग भी अपौरुषेय अतः स्वतः प्रमाण वेद सिद्ध हुआ । यहाँ जीवपरक अर्थ करना तो अशुद्ध है । क्योंकि - ' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यद् ऋग्वेद: - ' यहाँ पर ' इदम् ' शब्दसे उपक्रम है और ' प्रस्यैव एतानि ' यहाँ ' इदम् ' शब्दसे ही CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा. दु. के शेष हेतु की समीक्षा १२३ उपसंहार है | ' तत्र उपक्रम - उपसंहार दोनोंकी एकता अनिवार्य होनेसे ‘ अस्य ' इस ‘ इदम् शब्दसे बोध्य महाभूत परमात्मा ही है । इसी लिए इसकी दृढताकेलिए ‘ अस्यैव ' इस उपसंहार में ' एव ' पद दिया है । जीवका तो यहाँ कोई प्रकरण ही नहीं, तब उसका ग्रहण यहाँ हो ही कैसे सकता है? हाँ, यदि ऋग्वेदादि - मन्त्र मागके प्रकट " - कर्ताकेलिए ‘ तस्य ' इस प्रकार परोक्षवाची ' तद् ' शब्दय ग्रहण होता; और पुराणादि - ब्राह्मणभाग के प्रकटकर्ता के लिए ' अस्य ' इस ' इदम् ' शब्दका प्रयोग होता; तब तो कथञ्चित् उक्त - पक्षको भ सिद्धि थी; पर अब ऐसी बात नहीं । दोनों ही स्थलों में समान उा ' इदम् ' शब्द एकका ही ग्राहक है । इसीलिए इससे पूंव ' अयं च लोकः, परश्च लोकः, सर्वाणि भूतानि अस्यैव एतानि सर्वाण का निःश्वसितानि ' यह कहा है । क्या सब भूतों तथा इहलोक एवं कर परलोकोंको जीव ही बनाता है? नहीं । तत्र ' वेद - प्रकाश ' पत्रम प्रोह कथन ठीक नहीं । कट इस प्रकार जब ऋगादि चार प्रकार के मन्त्र और आठ प्रकार के ब्राह्मण यह दोनों ही परमात्मा के निश्वासरूप हैं, दोनों आविर्भाव प्रकार समान ही कहा गया है; तब अपौरुषेयता तथ ब्राह्म ईश्वरोक्तता भी दोनोंकी तुल्य ही सिद्ध हुई । वेदता तथा वह यास्त्र ब्राह्म प्रमाणता भी दोनोंकी समान ही सिद्ध हुई । यह शतपथका वचर स्वा.दयानन्दजीको भी अभिमत है । तभी तो उन्होंने इ तब चाहि ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाके १० वें पृष्ठमें अपने पक्षकी पुष्ट्यर्थ उद्धृ किन्त किया है, परन्तु ' इसका अन्तिम अंश जो इतिहासः, पुराणप Gujarat. An eGangotri Initiative
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१२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) होनेसे इत्यादि था, उसे स्वामीजीने अपने पक्ष के खण्डित होनेके डरसे जनताकी आंख में नहीं आने दिया; इसीकारण ही उसे छिपाया, इसी. पद दिया नहीं लिखा । स्वामीजीने स्वयं ऋ.भा.भू.के ८२-८३ पृष्ठमें ' पुराण-का इतिहास ' शब्दसे ब्राह्मणभागको ही गृहीत किया है । पर यहां अपने पक्षके ग्रहण प्रभाग के खण्डनके भयसे इसे छिपा लिया कि - ब्राह्मणभाग भी कहीं परमात्माका • निश्वास सिद्ध न हो जावे । शब्दा नए ' अ ' ब्राह्मणभाग भी परमात्मासे उत्पन्न हुआ, इस विषयमें मन्त्र-उक्त पक्षकी भागकी मी साक्षी है - ' ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह । समान उच्छिष्टाज्जज्ञिरे ' ( अथर्ववेदसं. ११/७/२४ ) यहां पर पुराण ' ' शब्दसे ' अयंच ' ' ब्राह्मणभाग ' का ग्रहण है; जैसे कि श्री सायणाचार्य एवं स्वा.शङ्कराचार्य सर्वा का वचन दिया जा चुका है । स्वा. द. भी पुराणसे ब्राह्मणको गृहीत - हलोक एवं करते हैं, यह भी कहा जा चुका है । तब ' भ्रमोच्छेदन ' में स्वामीजी से काश ' पत्रका प्रोक्त. उक्त शतपथ वचनके अन्तिम अंशकी वेदविरुद्धता भी कट गई । आठ प्रकार ( 1 ) दोनों ( २७ ) कई व्यक्तियोंका विचार है कि - ' बहुमक्तिवादीनि हि पेयता त ब्राह्मणानि भवन्ति ' ( निरु. ७१२४।६ ) यह ब्राह्मणभागकेलिए कहकर तथा स्व यास्कमुनिने ब्राह्मणभागको अनादरकी दृष्टिसे देखा है, कि-थका वच ब्राह्मणमें भक्तिवाद अर्थवाद बहुत है; अतः वह माननीय नहीं; उन्होंने तब उसे वेद कैसे माना जा सकता है? ' इस पर यह जानना व्यर्थ उद् चाहिए कि वह वचन ब्राह्मणभागकी अप्रमाणता नहीं बताता; पुराणप किन्तु इसका यह आशय है कि ब्राह्मणभाग में अर्थवादसे एकको CC - 0. Ankur Joshi अन्यदीय हेतुओं की समीक्षा १२१ बहुत अर्थों में बताया जाता है; तब मन्त्रभाग में ' उस शब्दका यह अर्थ है, वह नहीं ' सो इसमें अपना मनचाहा श्रर्थं न करके जैसा कि प्रतिपक्षिगण किया करते हैं- प्रकरण आदिसे विशेष अर्थ जान लेना चाहिये यह आशय है । प्रकरण आदि छोड़नेपर केवल अपने अर्थमात्र के आग्रहमें तो विनिगमनाविरह होगा । इससे ब्राह्मणभागकी अप्रमाणता क्या हुई? श्रीयास्क तो ब्राह्मणभागको इतने आदरकी दृष्टिसे देखते हैं कि अपनी कही हुई बातकी सत्यता सिद्ध करने के लिए उसमें ब्राह्मणभागका प्रमाण देते हैं । बल्कि मन्त्रभागकी सार्थकता साधनार्थे मी वे ब्राह्मणभागका प्रमाण देते हैं - यह मन्त्रभाग के सार्थक्य - प्रकरण में स्पष्ट है । इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मणभाग में श्रीयास्ककी अनादर - दृष्टि नहीं । यह कहना कि यास्क ब्राह्मणका उद्धरण ' ब्राह्मण ' नामसे ही देते हैं, वेद नामसे नहीं, यह भी ठीक नहीं । हम पहले बता चुके हैं कि वे वेदवाची निगमशब्द से जैसे मन्त्रभागको उदाहृत करते हैं, वैसे ही ब्राह्मण-भागको भी । यदि कहीं ' ब्राह्मणं ' शब्द रखते ही हैं, वहां ' ऋकू ' शब्द मी रखते हैं, उसके साथ भी ' वेद ' शब्द नहीं रखते । जैसे ' ब्राह्मणं ' यह नाम कहते हैं, वैसे ' मन्त्रः ' नाम भी कहते हैं; जैसे-' मन्त्रवर्णा ब्राह्मणवादाश्च ' ( २।१६।३ ) तो वहां ' वेदः ' न कहने से मन्त्रभाग भी यास्कके मत में अवेद हो जावेगा? जो इसपर प्रतिपक्षियों का उत्तर होगा; वही हमारा ' ब्राह्मण ' शब्द पर । ( १० ) ( २८ ) श्रीसामश्रमी यादि कई अर्वाचीन विद्वानों का विचार है Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कि- ' ब्राह्मणभागकी वेदता सूत्रकालसे शुरू हुई है; उससे पूर्व नहीं थी ' । उक्त व्याजका कारण यह है कि उन्होंने जहां - तहां उछल - कूद करके भी प्राचीन ग्रन्थों में ब्राह्मणभागकी अवेदता कहीं भी नहीं पाई, तब यह व्याज जारी किया । वे सूत्रकाल से पूर्व वेदकाल मानते हैं; तो मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदने यदि अपनी वेदता नहीं बताई, सूत्रकारों ने ही मन्त्र - त्राह्मणकी वेदता प्रसृत की; तब वह वेदता केवल मन्त्रभाग की कैसे होगी? ब्राह्मणभाग की कैसे न होगी? मन्त्रभागने भी अपने मन्त्रोंमें ऋग् श्रादियोंको ' वेद ' शब्दले नहीं लिखा । इस प्रकार ब्राह्मणभागने भी अपनी वेदता नहीं दिखलाई । तब यदि वेदत्व होगा तो दोनों का ही होगा । नहीं तो मन्त्रभाग भी वेद न रहेगा । क्योंकि सूत्रकालमें दोनों को इकट्ठा बेद कहा गया है । ' एकयोगनिर्दिष्टानां सह वा प्रवृत्तिः सह वा निवृत्तिः ' यह एक प्रसिद्ध न्याय है । तत्र यदि वेदत्वकी प्रवृत्ति होगी तो दोनों की होगी; वेदत्वकी निवृत्ति होगी तो दोनोंकी होगी । यह दोनों ही भाग इतरेतराश्रित हैं । जैसे सूत्रकाल में ब्राह्मणभागकी वेदता कही गई है, वैसे ही मन्त्र मागकी भी । इससे स्पष्ट है कि दोनों की वेदसंज्ञा समकालिक है । जो कि ब्राह्मणभागके कालको मन्त्रभागके काल से बहुत पीछे का कहा जाता है; यह तो पाश्चात्य विद्वानोंकी कल्पना है । वे तो ऋग्वेद - संहिताके मण्डलों को भी भिन्न - भिन्न कालोंमें बना हुआ मानते हैं । प्रथम और दशम मण्डलको अत्यन्त अर्वाचीन मानते हैं । यदि हम उनकी कल्पना मार्ने; तो मन्त्रभागको भी पौरुषेय अन्य विद्वानोके हेतुओकी समीक्षा १२० तथा अर्वाचीन मानना पड़ेगा । यदि मन्त्रभाग पहले से ही था समाधि - द्वारा उसके मण्डल आदिकी प्राप्ति भिन्न - भिन्न काल में हुई । यह उसका आशय माना जावे; तो शब्द और अर्थके नित्य सम्बन्ध । होनेसे मन्यभागका द्यर्थरूप ब्राह्मणभाग भी उसीके समानकाल में ही था. यह स्वतः सिद्ध है । केवल समाधि द्वारा उसकी प्राप्ति पीछे हुई । ऐसा इसे मी मानना पड़ेगा । तब इसकी अर्वाचीनता भी कट गई । यदि स्वा ० दब्जी भी ब्राह्मणभागकी चेद्रताको सूत्रकालसे प्रवृत् हुआ मानते तो वे सूत्रग्रन्थों द्वारा ही ब्राह्मणभागको अवेद सिद्ध करनेका प्रयत्न न करते । जैसाकि उन्होंने ' भ्रमोच्छेदन ' के १४ पृष्ठमें कहा है-' क्या आप ( राजा शिवप्रसाद ) जैसा कात्यायनको आप्त मानते हैं, वैसा पाणिनि आदि ऋषियोंको प्राप्त नहीं मानते? जो कमी आप्त मानते हो, तो पाणिनि आदि आप्तों की प्रतिज्ञा से विरुद्ध कात्यायन ऋषि क्यों लिखते? जो कहो कि हम इस वचनको कात्यायनका ही मानेंगे; तो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि - थाप पाणिनि यदि अनेक ऋषियोंके लेखका तिरस्कार कर एकको आाप्त कैसे मान सकते हो? और जो उन [ पाणिनि आदि ] को भी आत मानते हो; तो ' मन्त्रसंहिता ही वेद है ' उनके इस वचनको मानका तद्विरुद्ध ' ब्राह्मणकी वेद - संज्ञा के प्रतिपादक वचनको क्यों नहीं छोड़ देते? ' इस स्वामीजीके उद्धरण से स्पष्ट है कि स्वामीजी ब्राह्मणभागकी वेदता पुराणकाल से जारी हुई मानते थे, ' सूत्रकालमें ब्राह्मणभागकी वेद - संज्ञा थी ही नहीं ' - ऐसा स्वामीका आशय है । पर आज के श्रीसामश्रमी आदि तो ब्राह्मणभागकी वेदता सूत्रकालसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १२० मानते हैं । तब यह दोनों ही मत परस्पर विरुद्ध और गलत में हुई, सिद्ध हुए त्य सम्बन्ध यदि उनकी यह कल्पना मान ली जावे; कि - त्राह्मणभाग में ही था- सूत्रकाल से ही वेद नामसे कहा गया- इससे पूर्व नहीं था; तो पीछे हुई प्रष्टव्य है कि - ब्राह्मणभागका काल सूत्रकालसे प्राचीन है व अ कट गई । चीन? यदि कहें कि अर्वाचीन, तो इससे तो उन्हींका खण्डन लसे प्रवृत होगा । नहीं तो सूत्रकार अपने से पीछेके ब्राह्मणभागको वेद कैसे तद्ध करने कह सकते थे? यदि वे प्रतिपक्षी ब्राह्मणभाग के कालको सूत्रकालसे कहा है- प्राचीन मार्ने; तो प्रष्टव्य है कि - सूत्रकालसे प्राक्काल कौन - सा था? मानते हैं, स्मृतिकाल तो प्राकाल हो नहीं सकता; क्योंकि उन ( प्रतिपक्षियों ) जो कमी के मत में स्मृतिकाल सूत्रकालसे अर्वाचीन है । परिशेषसे वेदकाल सेविरुद्ध ही सूत्रकाल से उनके मत में प्राचीन होगा । तब यदि ब्राह्मणभागका वचनको काल वेदकालमें ही सिद्ध हुआ; तो ब्राह्मणभाग स्वतः ही वेद सिद्ध कि - शा हुआ; नहीं तो ब्राह्मणभागका काल वेद - कालमें कैसे माना जावे? कैसे यदि प्रतिपक्षी मन्त्रभाग के कालको पूर्व मानें; और ब्राह्मण-भी आप भाग के कालको अर्वाचीन मानें, तो जैसे मन्त्रभागने अपनी वेदता को मानकर स्वयं नहीं कही; किन्तु ब्राह्मणभागने ही उसकी वेदता प्रसिद्ध की क्यों नहीं है - इस कारण मन्त्रभाग वेद माना जाता है; वैसे ही ब्राह्मणभागने = स्वामीजी मी अपनी वेदता स्वयं नहीं कहीं; किन्तु सूत्रग्रन्थोंने ही मन्त्र सूत्रकालमें और ब्राह्मण दोनोंको ही वेद बताया है । तब दोनोंकी वेदता आशय है । • वास्तविक और समकालीन ही सिद्ध हुई । सूत्रकालसे और प्रष्टव्य यह है कि - सूत्रकालीन विद्वान् पारिपनि, कात्या-CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द. के वेदके उदाहरण १२६ यन, पतञ्जलि आदि; तथा पडूदर्शनकार गोतम, जैमिनि आदि, और गृह्यसूत्रकार एवं श्रौतसूत्रकार मुनि अपने उपजीवक स्वा दयानन्द तथा श्रीसत्यत्रत- सामश्रमीकी अपेक्षा वेदादि विषयमें मूर्ख थे, या अधिक विद्वान्? यदि अधिक विद्वान् थे; तो उनका मत क्यों न माना जावे? वे तो ब्राह्मणभागको वेद मानते ही हैं, यह हम दिखला चुके हैं । तब प्रतिपक्षी ही उनको वेद न मानते हुए कैसे आप्त हो सकते हैं? इससे स्पष्ट है कि वे स्वार्थी हैं, क्योंकि इससे उन्हें अपने विरुद्ध सनातनधर्मके सिद्धान्तोंको वैदिक मानना पड़ जाता है और उनका बना - बनाया महल गिर पड़ता है । इससे उन्होंने ब्राह्मणभागकी अवेदताकी कथा चालू की । वस्तुतः ' सूत्रकाल से ब्राह्मणभागकी वेदता प्रवृत्त हुई'- यह मत सर्वथा गलत है । यदि ब्राह्मणभाग वेद न होता तो उसमें ' छन्दसि, निगमे ' आदि कहकर होनेवाले व्याकरण - सूत्रों के कार्य न दीखते, परन्तु दीखते हैं, इससे संहिताओं ( शाखाओं ) तथा ब्राह्मणभागकी वेदता वास्तविक ही है । क्या कोई ' धृष्ट सिद्ध कर सकता है कि सूत्रकालसे ही ब्राह्मणभागमें छान्दस कार्य प्रवृत्त हुए; पहले वे उनमें नहीं थे । ( २६ ) यहां हम ' सामासिक ' ' अष्टाध्यायी सूत्रोंके कई उदाहरण नहीं मिलते | स्वामीजी Gujarat स eGangotri ०० Initiative ( ११ ) स्वा. दयानन्दजीसे अपने ' आख्यातिक ' - माध्य ' आदि ग्रन्थों में दिये हुए छान्दस-दिखलाते हैं, जो स्वा. द. सम्मत वेदोंमें चांरों वेदोंके ग्रन्थोंको अपूर्ण वा प्रक्षेपयुक्त
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१३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नहीं मानते । तब उनसे माने हुए वेदोंके पूर्ण एवं प्रक्षिप्तता - रहित होने पर भी यदि स्वामीजीसे दिये हुए वैदिक - सूत्रोंके उदाहरण उनके माने हुए चार वेदों में नहीं मिलते, इससे स्पष्ट सिद्ध होगा कि वेदोंकी सीमा केवल प्रचलित चार पोथियां ही नहीं, किन्तु वैदिक समस्त संहिताएँ तथा समस्त ब्राह्मण वेद हैं । उनमें बहुत सी संहिताएँ तथा ब्राह्मण लुप्त हैं । जो वे सूत्रकार्य इन वर्तमान संहिता वा ब्राह्मणों में नहीं मिलते, वे लुप्त संहिता वा ब्राह्मणों में होंगे, यह अनुमान कर लेना पड़ेगा । इससे ब्राह्मणभाग भी स्वतः वेद सिद्ध होगा । अब हम स्वा. दयानन्दजीके वे उदाहरण उद्धृत करते हैं-१ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाके ३८० पृष्ठमें ' उपसंवादाशङ्कयोश्च ' ( ३/४/८ ) इस वैदिक - सूत्रका उदाहरण स्वामीजीने भी ' नेज्जिह्मायन्तो नरकं पताम ' यह दिया है; वह उनके माने वेद में नहीं, किन्तु ऋकूपरिशिष्ट ( ८ अष्टक, ६ अध्याय, २ वर्गके अन्त में है तो परिशिष्ट मी वेद हुआ । २ ' आख्यातिक ' में स्वामीजी से दिया हुआ ' बहुलं छन्दसि ' ( ३२८८ ) इस वैदिकसूत्रका उदाहरण ‘ मातृहा सप्तमं नरकं विशेत् ' मन्त्रभाग में न होकर ब्राह्मणभाग में है । ३ इस प्रकार ' हनस्तश्चित् स्त्रियां छन्दसि ' ( वा. ३ | १ | १०८ ) का आख्यातिक ( २६४ पृष्ठ ) में उदाहरण ' आस्यै त्वा ब्रह्महत्यायें चतुर्थं प्रतिपद्यते ' यह दिया है । वह भी स्वामीजीके माने वेदमें नहीं किन्तु ब्राह्मणभाग में है । ४ ' छन्दसि निष्ट ' ( ३ | १ | १२३ ) का उदाहरण ' निष्टक् चिन्वीत CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.द.के वेदके उदाहरण १३१ पशुकामः ' यह दिया गया है, वह मन्त्रभाग में नहीं, किन्तु ब्राह्मण-भागमें है बल्कि छान्दस ' निष्ट ' शब्द भी स्वा.द. - सम्मत छन्द ( वेदकी चार पोथियों ) में नहीं मिलता । ५ ' बहुलं तरिण ( संज्ञाछन्दसो:) ( बा. ३ || ८ ) का उदाहरण ' या ब्राह्मणी सुरापी भवति, नैनां देवाः पतिलोकं नयन्ति ' ( आख्या. ३१० पृ. ) दिया गया है, पर वह उनके इष्ट वेदमें नहीं । उनका अपना इष्ट वेद ऋग्वेदसंहिता आदि संहिताकी पोथियाँ हैं - इसमें ये न प्रक्षेप मानते हैं; न न्यूनता । तव इनमें उक्त छान्दस - सूत्रोंके उदाहरण वा शब्द न मिलने से वेदको सीमा स्वतः बढ़ानी पड़ेगी, उनकी सत्ता शेष वेदसंहिताओं तथा ब्राह्मणों में जो इस समय लुप्त हैं- माननी पड़ेगी । ६ ' विजुपे छन्दसि ' ( ३ | २ | ७४ ) यहाँ आख्यातिक ( ३२५ पृष्ठ ) में स्वाद जीने कहा है- ' यहाँ छन्दो- ग्रहण ब्राह्मणविषयकेलिये भी है ' यदि ऐसा है; तो ब्राह्मणभाग भी वेद सिद्ध हो ही गया; क्योंकि-स्वामीजी छन्द वेदको मानते हैं - पहले उनका ऐसा प्रमाण दिया ही जा चुका है । ७ ' भावलक्षणे ' तोसुन् ' ( ३ । ४ । १६ ) ( आख्या ० पृ ० ३६३ ) इसका वैदिक उदाहरण ' काममाविजनितोः सम्भवाम ' यह वेदका दिया गया है; यह कृ. य. तैत्तिरीयसंहिता ( २।५१११५ ) के ब्राह्मणभाग में है; तब कृष्णयजुर्वेद तथा उसका ब्राह्मणभाग भी वेद सिद्ध हुआ; जिसे आर्यसमाजी वेद नहीं मानते । = ' अन्ये-भ्योपि दृश्यते ' ( ३।३।१३० ( ३६० पृष्ठ ) का ' सुदोहनामकृणोद् ब्रह्मणे गाम् ' यह वैदिक उदाहरण दिया है; पर यह भी उनसे मानी चार वेद - पोथियों में नहीं मिलता, किन्तु ब्राह्मणभाग में है । यही Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १३१ १३२ स्वामीके अष्टाध्यायीभाष्य में भी है । उदाहरण छन्द ६ इसप्रकार ' आख्या. ' ३६४ पृष्ठमें ' क्त्वापि छन्दसि ' ( ११।३८ ) दसोः ) का वैदिक उदाहरण ‘ कृष्णं वासो यजमानं परिधापयित्वा ' यह देवाः ब्राह्मणभागका ही उनके यित्वा ' शब्द ही चार भी वेद हुआ । तव छन्दके उदाहरण चिदकी वेदको मानते हैं; तथा वेद सिद्ध हुए । ने ' सामासिक ' हिरण्या दक्षिणा ' ४ ) में भी है ' ' छन्दसि च ' ( ५ | दिया गया है; चारों वेद - पोथियों में ' परिधाप-नहीं । तब वेदकी सीमा बढ़ जानेसे ब्राह्मणभाग श्रीपाणिनि आदि वेदके पूर्ण ज्ञाता थे; वे जब ब्राह्मणभाग के भी देते हैं; और छन्द स्वामीजी तो ब्राह्मणभाग तथा शेष ११२७ संहिताएँ यह भी १० ' छन्दसि च ' ( ६ | ३ | १२६ ) का उदाहरण स्वामी-( ५८ पृष्ठ ) में ' आग्नेयमष्टाकपालं निर्वपेत् ' ' अ यह दिया है । यह ब्राह्मणभागका है । ११ ४ | १४२ ) का उदाहरण वहीं ( ३६ पृष्ठमें ) ' पत्रदन्त--कि- मालभेत, उभयदतमालभेत ' यह ब्राह्मणभागका ही दिया है । इससे दिया हमारे मतकी पुष्टि है । ११ ' अव्ययार्थ ' के २१ पृष्ठमें स्वामीने ' तवै-तुमर्थे छन्दसि ' इस छान्दस - प्रत्ययका ' ब्राह्मणेन न म्लेच्छित वें, ख्या ० नापभाषितवै ' यह शतपथब्राह्मणका उदाहरण दिया है । एतदादिक वाम ' १५ ) के उदाहरण स्वा ० दयानन्द- सम्मत वेदकी चार पोथियों में नहीं हैं; गभी किन्तु उनसे भिन्न ११२७ संहिताओं में हैं; वा लुप्त अलुप्त ब्राह्मणों में अन्ये- हैं । इससे स्वा ० द ० जीके अनुसार भी सभी संहिताएँ तथा ब्राह्मण वेद सिद्ध हुए । मानी ( ३० ) कई आधुनिक आर्यसमाजी गण अपने इस पक्ष में यही विघात देखकर अपने बचाव के लिए स्वामीकी इन पुस्तकोंको उनसे CC - 0. Ankur Joshi स्वा.द. के चेदके उदाहरण १३३ बनाया हुआ नहीं मानते; उन्हें चाहिये वे इन पुस्तकोंसे स्वा ० दयानन्दजीका नाम मिटा दें । जब तक उनपर स्वामीका नाम है; तब तक उत्तरदायित्व भी उन्हीं का रहेगा । वे अष्टाध्यायीके माध्यको स्वा ० दयानन्दजीका मानते हैं । उसमें भी यही बात है । डाक्टर रघुवीर तथा आर्यसमाजके विद्वान् श्रीब्रह्मदत्तजी जिज्ञासुने उसका संस्कार किया है । टिप्पणी में उन वैदिक उदाहरणोंको जिज्ञासुजीने ढूंढकर लिखा है कि कहांके हैं । उनमें सभी इन चार पोथियोंके नहीं, कई कृष्णयजुर्वेदके हैं: कई अन्य संहिताओं वा ब्राह्मणभाग-के हैं । कई उनमें मिले ही नहीं कि कहांके हैं । उसके लिए जिज्ञासुजीने लिखा है कि- ' अनुपलब्धमूलमिदम् ' । इन सब बातों की संगति तब भलीभांति लग जाती है, जब ११३१ संहिताओं को तथा ब्राह्मणभागको वेद मान लिया जाय । इससे हमारा ही पक्ष सिद्ध होता है | विस्तारभयसे हम सभी उदाहरण नहीं दे सकते, स्थाली-पुलाकन्याय से स्वामीके अष्टाध्यायीभाष्यसे कुछ उद्धरण देते हैं-( क ) ' मन्त्रे घस - जनिभ्यो तेः ' ( राष्टान ० ) यहाँ स्वामीजीने ' मन्त्रे ' का अर्थ लिखा है ' वेदविषये ' । इसका उदाहरण ' अक्षत ' यह दिया है, यह ऐतरेय ब्राह्मण ( ७/१४/५ ) में है, मन्त्रभागमें सर्वथा नहीं । तब ब्राह्मणभाग भी ' वेद ' सिद्ध हुआ । यदि ब्राह्मणभाग वेद नहीं, तब ' प्रज्ञत ' उदाहरण किस वेदसंहितामें है- यह बताना पड़ेगा? ( ख ) उत्सर्गश्छन्दसि ' ( ३।२।१७१ ) इस वार्तिक के ' छन्दसि ' का अर्थ स्वामीजीने ' वेदे ' लिखा है । उसका उदाहरण ' सेदि: ' दिया है । यह वेदकी चार पोथियोंमें नहीं; किन्तु शतपथब्राह्मण ( ७।३।१।२३ ) और Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) तैत्तिरीयारण्यक ( ४।२२।१ ) में है । ( ग ) ' णेश्छन्दसि ' ( ३।२।१३७ ) यहाँ ' छन्दसि ' का अर्थ स्वामी-जीने ' वेदविषये ' लिखा है । उसका उदाहरण ' धारविष्णुः ' यह शाङ्खायन आरण्यकमें ( १२/२/७ ) है । ( घ ) ' बहुलं छन्दसि ' ( शरा ) यहाँ स्वामीने ' छन्दसि'का ' वेदविषये ' अर्थ लिखा है । इसमें का ‘ मातृहा ' यह उदाहरण चारों वेदसंहिताओं में नहीं, किन्तु छान्दोग्य - उपनिषद् ( ७ । १५/२३ ) में है । ( ङ ) ' ईदूतौ च सप्तम्यर्थे ' - ( १११११८ ) इसके लिए वहाँ लिखा गया है- ' छन्दोविषयमिदं सूत्रम् ' । इसका उदाहरण ' मामकी तनू इति ' यह दिया गया है । यह उन्हें वर्तमान वेदसंहिताओं में नहीं मिला । इसकेलिए वहाँ टिप्पणी में लिखा गया है - ' संहितासु ब्राह्मणेषु च गवेपणीयमिदं वचः ' ( च ) ‘ या खर्वेण पिवति ' ( २३६२ ) ( तै ० सं ० २५ | १ ) । ( छ ) चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ' ( २२३२६२ ) ' छन्दः शब्देन मन्त्र-भागस्य मूलवेदस्य ग्रहणं भवति, ब्राह्मण - शब्देन ऐतरेयादि - व्याख्यानानाम् ' । कारकीयके ३२-३३ पृष्ठमें भी स्वामीने इस सूत्र के लिए लिखा है-पूर्व - सूत्रोंमें ' ब्राह्मण ' शब्द से ऐतरेय आदि वेद- व्याख्यानोंका ग्रहण होता है, और यहाँ ' छन्दः ' शब्दसे वेदोंका ग्रहण होता है, इसलिए इस सूत्र में ' छन्द ' ग्रहण किया है ' । यह स्वामीजीके शब्द हमारे पक्षके पोषक हैं, उस ' छन्द के बहुतसे उदाहरण हम ब्राह्मणभाग से दिखला चुके हैं । ( ज ) ' भाषायां ' ( २ । ३ । ६६ ) के लिए लिखा है- ' वेदादितरग्रन्थेषु ' | ' बहुलं छन्दसि ' ( २ | ४ | ३६ ) वैदिक - प्रयोगेषु । इसके उदाहरण प्रघसः, प्रादः ' यह किसी स्वा. द. के वेदके उदाहरण १३२ वेदमें नहीं मिले । ( झ ) ' नोनयति ( ३ । १ । ५१ ) छन्दस्यनुवर्तते ऐलयीः, अर्दयीत् - इति वेदे ' इसकेलिए टिप्पणीमें लिखा है-‘ अनुपलब्धमूलमिदम् ं । यह स्वा ० द ० जीके हमने थोड़ेसे वेदके रा हरण संगृहीत किये हैं; इनमें कई ब्राह्मणग्रन्थोंके, कई उपनिषदोर कई श्रारण्यकोंके कई वर्तमान वेदकी ४ संहिताओं से भिन्न संहिताओं के हैं । ' भाषा'का कोई भी उदाहरण ब्राह्मणभागका नहीं । कई उदाहरण किसी वैदिक वर्तमान - प्रन्थ में मिले ही नहीं; इससे सिद्ध हो र है कि - ब्राह्मणभाग वेद है, आरण्यक उपनिषदे बेद हैं । सभी वेदसंहि वेद हैं । अनुपलब्ध ब्राह्मण और संहिता वेद हैं । ब्राह्मणभाग भार ( लौकिक ) नहीं । इससे सनातनधर्मके पक्षकी सिद्धि तथा श्रार्यसमा एतद्विषयक पक्षकी निराधारता सिद्ध होगई । यदि कई आर्यसमाजी कहें कि ' स्वा. दयानन्दजी यहां कदाचि भूल कर गये हों कि वैदिक सूत्रोंका वैदिक उदाहरण दिखलार चाहते हुए भूलसे अन्य संहिता वा ब्राह्मणभाग के उदाहरण वैठे हों ' - – इस पर कथन यह है कि क्या वे सभी स्थलों में भू कर गये? यदि ऐसा हो; तो वे अनाप्त तथा अप्रमाण सिद्ध हुए तव वेद - विषयक उनका पक्ष भी अनाप्त एवम् अप्रमाण सिद्ध हुना अथवा मान लीजिये कि वे इन स्थलोंमें भूल ही गये; तो फि क्या हुआ । उनके अनुयायी इन उदाहरणोंको वेदकी अपनी च पोथियों में दिखलायें, यह उन्हें चैलेंज है, इससे सभी ११ ॥ संहिताएँ; तथा ब्राह्मणभाग वेद सिद्ध हो ही गये; क्योंकि उनमें स वैदिक कार्य दीख रहे हैं; तब वे वेद ही हुए । वेद न होनेपर उनमें CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative