सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 11–20

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 11–20

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ग ) तो उन्हें अपने होगी । कई बातें पूर्वके पृष्ठोंमें छूट गई थीं; हमने श्रागेके चित कपृष्ठों में टिप्पणी में, उनका निर्देश कर दिया है, एतदर्थं पाठकों वा को भी प्रतिपक्षियोंको ४२५, ५०६, ६१०-११, ६३२-३३-३४, ६६७-६८, ६ ९ ३ - ९ ४, ८२२ इन पृष्ठोंको भी अवश्य देख लेना चाहिए । जहां को सशोधन लिखा हुआ है, तदनुसार पहले संशोधन करके फिर सर्वपुस्तकको क्रमसे पढ़ना शुरू करना चाहिए, उसमें मनोयोग देना पोराप्रावश्यक है ।: से उप प्रतिपक्षी लोग तो मकान गिराने वाले मज़दूरोंकी भाँति पुराणादि प्राचीन साहित्यके भवनों को गिरानेमें लगे हुए हैं, पर क्षिप्त पुरुमने उनः छिद्रोंको हटाकर उस भवनंका नूतनोद्धार करना हैं । र - प्रकरसीका ही सभी कुछ क्रमसे रखकर उसे हमने मजबूती से फिट - जा करना है । जोकि प्रतिपक्षियोंने पुराणका पूर्वापर काटकर उसमें के आगे छद्र कर दिये थे; उन ' छिद्रोंको हमने दूर करके नये मसालेंसे खा गयहाँ दृढता कर दी है । वेद क प्राक्षे इस बार इस पुष्पके प्रकाशनमें प्र ससम्बन्धी बहुतसी बाधाएँ काशित पूरा जानेसे आशातीत विलम्ब हो गया है; एतदर्थ हमें अनेकों पत्र क- सिप्रायें, हम यथाशक्ति उन्हें सान्त्वना देते रहे । इसपर भी जब देरी का होतो देखी, तब हमने पूर्व प्रसको छोड़कर शेष सामग्री अन्य प्रस में दे दी, नहीं तो और भी अधिक विलम्ब हो जाता । ' जितनी और उतनी खर ' इस लोकोक्तिके अनुसार पाठकोंके लिए कुछ वान्तर नाम ही हुआ है । हमारे सामनें कई नई श्राक्षेपकं पुस्तकें श्राई कभी मने इसमें उनकी आलोचना भी साथ कर दी है, फिर मालूम नेमें कहीं, कितना समय लग जाता; क्योंकि नये पुष्पके प्रकाशनमें भी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ( घ ) द्रव्यं साहाय्यकी अपेक्षा होनेसे उसके जुटाने में काफ़ी समय बीत जाता है । पाठक इस ग्रन्थमालाका प्रचार करें । जतनी शीघ्र इसमें सहयोग देकर गत पुष्पों के बिकवाने तथा नये पुष्पके विकास में प्रयत्न किया जावेगा, उतनी शीघ्र इस ग्रन्थमालाकी पूर्ति होगी । • इस ग्रन्थमाला के सभी २० पुष्प हैं । कम से कम १४-१५ पुष्प भी विकसित हो जाएं; तो सनातनधर्मपर होती हुई शङ्काप्रवाहरूप दुर्गन्ध्र ही मिट जावे । गुणानुरागी विद्वानों तथा सेठोंको इसमें - अपनी सहायता देकर इसके प्रकाशनमें सक्रिय सहयोग स्वयं भी देना चाहिए, दूसरे समर्थ लोगोंसे भी सहायता दिलवानी चाहिये 1 यह सदाकेलिए याद रखें कि इस ग्रन्थमालाका जो कुछ द्रव्य सहायता - रूपसे तथा पुस्तकोंके विकने से श्रांता है, वह सब इसी के पुष्पोंके प्रकाशित करनेमें लगाया जाता है । उसका एक भी पैसा हम अपने काममें नहीं लगाते । हमारा यही ध्येय है कि यह ग्रन्थमाला शीघ्रसे शीघ्र प्रकाशित हो जाय । गत वार जो योजना सोची थी; उससे सप्तम पुष्प बहुत बड़ा हो जाता, इस लिए हमें अष्टम पुष्प भी साथ छपाना पड़ा । सनातनधर्म में यद्यपि प्राचीन साहित्य तो पर्याप्त है, पर उसके खण्डनार्थं जो अर्वाचीनों द्वारा कुत्सित - साहित्यकी सृष्टि हो रही . है; उसके मुकाबिलेमें सनातनधर्मी साहित्यकी सृष्टि उतनी नहीं हो रही यह हमारे यहाँ एक भारी त्रुटि है । श्रीपं ० कालूरामजी शास्त्रीने काफी साहित्य लिखा । श्रीपं ० भीमसेन जीने साहित्य तो थोड़ा लिखा, परन्तु ' ब्राह्मणसर्वस्व ' द्वारा सनातनधर्मकी भारी An eGangotri Initiative

पृष्ठ 12

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( } ) सेवा की । इसके बाद उनके लड़के श्री ब्रह्मदेवजी मिश्रने तथा श्रीपं ० अखिलानन्दजी कविरत्नने पर्याप्त सनातनधर्मी साहित्यकी सृष्टि की । पर यह लोग देवता बनने के लोग से स्वर्ग में चल दिये । इसके बाद सध ० साहित्यसृष्टिका कार्य पं ० श्रीमाधवाचार्य-जी शास्त्रीने सम्भाला है परन्तु उपदेशोंके लिए देश - विदेशमें घूमते हुए उन्हें भी बहुत अवसर नहीं मिलता । हमने भी सनातन-धर्मी साहित्यकी सृष्टि प्रारम्भ तो कर रखी है; परन्तु अध्यापन हमारा बहुत समय ले जाता है । यदि हमें वृत्तिसे निश्चिन्त कर दिया जाता । स्थान हमें विशाल दिलवा दिया जाता, तो हम अकेले ही प्रेतिपक्षियों के खण्डका साहित्यको खोखला कर देते । पर सनातनधर्मियोंके आलस्य से इतनी देरी हो रही है । पाठकगरणं ध्यानसे तथा धैयसे प्रतिप्रक्षियोंके प्रक्षेप तथा उनका समाधान इस पुष्प में पढ़ें । आक्षेपों को देखते हुए एक्द्रम घबडा न जाएँ । यह प्राक्षेप पूर्वापर छिपाने से अल्पश्रुतोंको बड़े उद्ध जनोय मालूम होते हैं, और प्रतिपक्षी उन्हें स ० छ ० के दुर्गपर ' बमबारी ' मानते हैं; पर पूर्वापर - प्रकरणके प्रकट करते ही वे बर्मक गोले न रहकर घास - फुसकी गेन्द्रे ही रह जाती हैं । यहें पुष्प धार्मिक जनता को लिए बहुत उपादेय रहेगा । -इस पुष्पमें । जगद्गुरुशंकराचार्यं ग्रनन्तश्री स्वा ॰ कृष्णवो-घाश्रमजी महाराज पूर्वको भान्ति सहायक बने हैं । ज ० गु ० शे ० श्रीशारदा पीठाधीश्वर श्री १००८ श्रीग्रभिनर्वसच्चिदानन्दतीर्थं जी महाराज, ज ० गु ० रामानुजाचार्य अनन्तश्रीअनिरुद्धाचार्यजी महाराज भी यथापूर्व सहायक वन हैं । दण्डिस्वामी श्री १०८ TET -CC - 0. Ankur Joshi Collection ( च ) - परमानन्दजी सरस्वती एम ० ए ० महाराज भी इस पुष्पसे सहायव बने हैं । इस ग्रन्थमालाको वे ध्यान से देखकर उसपर सत्पराम महा भी देते रहते हैं । उत्त महामण्डलेश्वर स्वामी १००८ श्री स्वामी गङ्ग श्वरानन्द जी राज महाराज भी इस पुष्पसे सहायक बने हैं । आागेकेलिए भी उन्होंने साह अपनी सहायताका आश्वासन दिया है । श्रीमन्निगमागमसार्वभोर विन श्री १०८ स्वामी विद्यानन्दजी महाराज वैकुण्ठाश्रम डाकौर में - अर्थ इसमें सहायक बने हैं । ब्रह्मचारी श्रीकृष्णशर्माजी भी इस पुष्परे गये सहायक बने हैं, उन्होंने जिस प्रमका इस ग्रन्थमालामें परिचय दिया है, उससे हमें बहुत प्रोत्साहन प्राप्त हुआ हैं । सहायता देक भी फिर भी ग्रन्थका मूल्य देते हैं । आत्मकरके श्रीपं ० पद्मनाभ-राव जी प्राचार्य भी इस पुष्पमें सहायक बने हैं । दक्षिण अमेरिका बाद के श्री पं ० लोकनाथजी प्रार्थिक संकट होते हुए भी इस बार विच भी पूर्व की भान्ति सहायक बनने से नहीं चूके । वे हमारे ग्रन्थ भी मंगाते हैं, अमेरिकामें उन्हें बेचते हैं । किसीको हमारे ग्रन्थ अमूल्य वह देते हैं, और किसी को प्राघे मूल्य में 1 ऐसे सज्जन इस ग्रन्थमाला वार के प्रारण हैं । इसी प्रकार सेठ श्रीझाँगीराम- छबीलदासजी भी इस वते ग्रन्थमाला के प्रारण हैं, प्रत्येक पुष्पमें वे सहायक बनते हैं । इनके राय प्रेरक श्रीतेजभानजी ग्रोवर तथा पं ० बालमुकुन्द जी ज्योतिषी पं ० उदा नन्दकिशोर जी शास्त्री हैं; जो स्वयं भी यथाशक्ति सहायता करते जात रहते हैं । इस बार मानसमहारथी श्रीप्रयागदासजी तथा पं ० भगवानदास दिनेशकुमारजी भी सहायक बने हैं । इस बार महामण्डलेश्वर स्वामी श्री १०८ नृसिंहगिरि जी Gujarat: An eGangotri Initiative

पृष्ठ 13

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( छ ) सहायव महाराज सस्थापक श्रीविश्वनाथसंस्कृतमहाविद्यालय तथा उनके = पराम उत्तराधिकारी महामण्डलेश्वर श्री १०८ स्वा ० महेशानन्दजी महां-नन्द ज राज भी इस ग्रन्थमालाके दक्षिण बाहु बने हैं । उन्होंने अपने उन्होंने साहाय्यद्रव्य तथा नाम- प्रकाशन की आज्ञा तक नहीं दी । हम सभी विना उनके प्रदेशके नाम- प्रकाशनके अपराधी बने हैं । ग्रन्य कौर भी अर्थदाताभी वहुतसे बने हैं; उनके नाम बाहरी टाईटल पर दे दिये पुष्प गये हैं । परिचय इन सबको धन्यवाद देते हुए हम अन्य महोदयों को भी देरित करते हैं कि आप भी इस ग्रन्थमालामें अपनी शुद्ध कमाई द्मनाभ- का भांग दें, जिससे यह महाग्रन्थ शीघ्र ही पूर्ण हो जाय । इसके मेरिका वाद इसे विषयानुसार पृथक - पृथक ग्रन्थों में प्रकाशित करने का विचार है । स बार अव एक अन्य वात केहे बिना इसमें अपूर्णता रह जायगी, नाथ भी ' वह यह कि — ' आलोक ' - ग्रन्थमालक संरक्षक अभी तक एक ही अमूल्य महोदय कलकत्ताके श्रीमुरारिलाल जी मेहता बने थे । इस थमाला वार रायसाहब चौधरी श्री प्रतापसिंह जी रईस बर्बला संरक्षक भी इस वाते हैं । ग्राम हमारी जन्मभूमि शुजाबाद ( मुलतान ) के रईस 1 इनके रायबहादुर चौं ० श्रीनारायणसिंह जी के सुपुत्र हैं । आप षी पं ० उदार - विचारोंके पूर्ण - धार्मिक हैं । सेठ साहूकारोंमें कई दोष देखे T करते.. जाते हैं, पर हर्ष हैं कि — ग्रॉप उन दोषोंसे उन्मुक्त एवं ईमानदार व्यक्ति हैं । आपकी विहाँ पर अपार सम्पत्ति थी, वह पश्चिमी पाकिस्तान में श्री जानिके कारण वहीं छूट जाने से रिजी आपकी बड़ी हानि हुई है । आप वहाँ भी सनातन - धर्मपाठशाला CC - 0. Ankur Joshi ( ज ) के प्रजिडेण्ट थे । प्रामने बढी प्रसन्नता से इस ग्रन्थमालांकी संरक्षकता स्वीकृत करके जनदृष्टि में हमारी जन्मभूमिको गौरवान्वित किया है । इसी प्रकार अन्य महोदय भी संरक्षक बनकर ग्रन्थमालाकी सहायता करेंगे यह हम आशा करते हैं । संरक्षकका १००० ) रु ० नियत है । संरक्षकका चित्र छपता है, तथा प्रत्येक प्रकाशनमें नाम भी छपता है । संमान्य सहायकका ५०० ), मान्य सहायकका ३५० ) तथा साधारण सहायकका १०० ) नियत है । प्रेरकोंको इधर ध्यान देना चाहिए । श्रमूल्य कोई भी न ले । यह ध्यान रहे कि – हमें इस ग्रन्थमालाको जो भी सहायता वा मूल्य प्राप्त होता है, वह सव प्रागेके पुष्पोके प्रकाशनार्थ जमा कर लिया जाता है । उसका एक पेक्षा भी हम अपने काम में नहीं लगाते श्रतः कोई भी महोदय इन ग्रन्थों को बिना मूल्य न ले । यदि कोई महोदय अधिक सहायता न भी कर सकें; तो ग्रन्थका -मूल्य अवश्य दें, और इस ग्रन्थमालाके प्रचार तथा बिकवानेमें अवश्य सहायक बनें; इससे अग्रिम पुष्पके प्रकाशनका अवसर ' मिल जाता है । हम जो मोटे - मोटे पुष्प प्रकाशित कर रहे है; उनका एकमात्र कारण यह है कि यह ग्रन्थमाला जो संस्कृत मूलग्रन्थ ' श्रीसनातनधर्मलोक ' का हिन्दी. व्याख्या - भाग है— शीघ्र पूर्ण हो जावे, जिससे आगे विषयानुसार ग्रन्थ प्रकाशित ॐ कराये जावें । उसका मूल्य देखकर भी नहीं डर जाना चाहिए, कारण यह है कि - हमारे पास स्थान न होनेसे हमें ग्रन्थकी Collection Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 14

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( झ ) थोड़ी प्रतियां छपवानी पड़ती हैं, उससे घाटा रहनेके कारण हमें १०० पृष्ठके पीछे एक रुपया रखना पड़ता है, फिर जिल्द भी बंघवानी पड़ती है । जब लोगों का पान - तमाखू चाट यादि में ही भारी खर्च हो जाता है, तब इस ग्रन्थमालाको मूल्यसे खरीदना भी इसकी सहायता करना है । यह सभी ग्राहकों अनुग्राहक़ोंको यादे रख लेना चाहिए । on अधिकारी विद्वानोंसे प्रार्थना है कि यदि विचारमें कुछ त्रुटि रह गई हो, जिसका रह जाना- असम्भव नहीं, तौ उसकी सूचना दे दिया करें, जिससे “ प्राग्गे ध्यान रखा जा सके । किसो - प्रश्नके उत्तरमें किसी विद्वानुको, हमसे अच्छी, सुरू मालूम पड़े, तो उसे भी वे हमें सूचित कर दिया करें । निवेदक दीनानाथ शर्मा, शास्त्री- सारस्वतः विद्यावागीश विजयदशमी सब २०१६ [ प्रिंसिपल संस्कृत महाविद्यालय, द रीवा केला! रामदल देहली ६ एं क CC - 0. Ankur Joshi Collection .. श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) के सम्बन्ध में विद्वानों के भाव ( १ ) आपने यह ग्रन्थरत्न अत्यन्त परिश्रम से लिखा सनातनधर्मावलम्बियोंके लिए तो बहुत ही उपयोगी है । मुझे तो ज्ञानार्जुनमें इससे बहुत सहायता मिलती है । यह ग्रन्थमाला आपका प्रगाढ पाण्डित्य, बहुदर्शिता तथा सनातनधर्मा-नुरागिताका जीता - जागता उदाहरण प्रस्तुत कर रही है ( श्री रामेश्वर शास्त्री मुख्याध्यापक स ० ध ० संस्कृत महाविद्यालय, मारवाड म डंदा । ( २ ) सर्वशास्त्रनिरणात, पंण्डिताग्रगण्य, मानास्पद..... ' आलोक ' देखकर यही धारणा है कि आप मनुष्य रूप से ईश्वर का अवतार हैं, जो धर्मको रक्षा कर रहे है । मैं ८५ वर्षके होते हुए करुणावरुणालय प्रभुसे अनेकवार प्रार्थना करता हूँ कि श्रापकी आयु सौ वर्ष से अधिक करें, जो भावी सन्तानों को धर्मपथपर चलाने का युत्व करते रहें, स्वस्थ बने रहें ( श्रीभुवनेश्वर झा वैद्य, सभापति घर्मसंघ पो ० बल्लीपुर ( जि ० दरभङ्गा ) । __ ” ( ३ ) [ ' सिद्धान्त ' पत्रमें प्राचीन भारतमें गोवध, एक लेख निकला था, उसमें लेखक ने वैसे आक्षेप करने वाले पाश्चात्य एवं पौरस्त्य लेखकोके प्रमाणोंका संग्रह किया था । उसपर कुछ ' द्वानीके विचार ' सिद्धान्त ' के आरम्भिक वर्षोंमें प्रकाशित हुए थे, पर लेखकको उनसे सन्तोष नहीं हुआ । लेखक धर्मभीरु था । उसने सोचा कि — मैंने जो लेख लिखा, उस पर पण्डितोंने ठीक उत्तर नहीं दिया, उससे मुझे कहीं पाप न लगे?. लेखकने उस समस्या को सुलझानेके लिए ' आलोक ' - प्रणेता Gujarat. Ane Gangotri Initiative

पृष्ठ 15

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( ट ) विद्यावागीशजीको तदर्थं प्र ेरणा की । विद्यावागीशजीने उसपर लिखा, और ' आलोक ' ( ६ ) में उसे दिया । अब उसपर उक्त लेखक के शब्द देखिये । प्र ० ] ' श्रीमान् विद्यावागीशजी मैंने ' श्रालोक ' ( ६ ) श्राद्यो-पान्त पढ़ा । ' सिद्धान्त ' वनारस में प्रकाशित मेरे ' प्राचान भारत में गोवध ' लेख में प्रकाशित केवल एक शङ्काका उत्तर छोड़कर आपने सभी शंकायोंका इतना सुन्दर उत्तर दिया है कि - जिसका उत्तर देने में काशी के धुरन्धर विद्वानों के छक्के छूट गये । कई वेदवाचस्पतियों के पास मैंने रजिस्ट्री पत्र भेजे, पर उत्तर न आया । धन्य है आपकी प्रतिभा एवं पाण्डित्यको । आापका गवेषणापूर्ण अध्ययन, एक - एक वातका कई प्रकार से उत्तर देना शतमुखसे स्तुत्य है । बृहदारण्यकके ' प्रौक्षेण वा आर्षभेण वा ' के आगे - पीछे को काण्डकानोंकी संगति बैठाकर बड़ा ही विद्वत्तापूर्ण श्रर्थं किया है । याज्ञवल्क्य स्मृतिके ' महोक्षं वा महाजं वा ' को मिताक्षरा टीका के ' लोकविद्विष्टम् ' आदि पर मुझे महांन् भ्रम था, उसका भी निरसन हो गया । ' पञ्चकोटिगवां माँस ' आदिकी बड़ी ही सुन्दर रिसर्च की है । वादी के ग्राक्षेपात्मक अर्थको असम्भव सिद्ध करके आगे - पीछेके

श्लोकोंको लिखकर सामञ्जस्य बैठा दिया है । प्रत्येक बात की

सिद्धि में कई - कई वेदमन्त्र भी दिखाये । ऋग्वेदके जिन मन्त्रों

पर मुझे शंका थी, सायरणभाष्य के तथा निरुक्तके प्रमाणसे बढ़ी सुन्दर विवेचना दी । शूलगव प्रकरण, गोधनपर विचार, कलौ पञ्च विवर्जयेत् ' ग्रादि पर बड़ा ही सुन्दर विचार चलाया गया है । २५ – २६ वर्षं पूर्वं ब्रह्मवैवर्तपुराणको राधा को लेकर ' अभ्युदय ' सम्पादक पं ० श्रीकृष्णकान्त मालवीयने लगभग दो वर्ष तक हो - हल्ला मचा रखा था । उसका कई शास्त्री तथा CC - 0. Ankur Joshi Collection ( द ) सामने शास्त्रार्थ - महारथी सन्तोषपूर्ण शङ्का - समाधान न कर सके, मेरे की बात है । परन्तु उसपर आपकी विशद विवेचना गया सराहनीय है । ' उत्तम्भयन्, शब्द का बड़ा ही विद्वत्तापूर्ण श्रर्थ किया है । अगस्त्य के समुद्रपान पर भी बहुत अच्छा लिखा है । स प्र ० रूपी स्वा ० द ० के लिङ्ग से कई प्रार्यसमाजी बच्चे निकलने का वड़ा सुन्दर हास्य किया गया है । छुवाछूतके ऊपर कई तर्कोंका उत्तर तथा ' ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी ' का बड़ा ही गवेषरणापूर्ण उत्तर दिया गया है । शेक्सपीयर बड़ा काम देता है । वर्णव्यस्थामें धर्मदेवजी तथा श्रो स्वा ० भगवदाचार्यं ग्रादिके तर्कोंका दिया गया है । " ( इन्दुशेखरसिंह राठौर अध्यापक, परसदा ( ४ ) एक श्रार्यसमाजी विद्वान् की सम्मति-' आपके द्वारा लिखित ' सनातनधर्मालोक ' देख रहा हूँ । यद्यपि आपके और हमारे विचारोंमें नाटकका प्रमाण सिद्धान्तालङ्कार मुहतोड़ उत्तर सीतापुर ) । को आजकल मैं ' पदे पदे मतभेद है, तथापि यह स्वीकार करने में कुछ भी विप्रतिपत्ति नहीं है, कि-श्रापके निबन्ध पर्याप्त गवेषणात्मक एवं नई उद्भावनाओं से हैं । विशेषतः ' प्राचीन भारत में गोवध ' विषयक आपके समाधान युक्त मुझे बहुत पसन्द आये । इसके आगे का ७ वां भाग कब तक प्रकाशित हो रहा है? भवदीय - भवानीलाल भारतीय एम ० ए ० सिद्धान्तवाचस्पति ( सदस्य सार्वदेशिक ग्रार्यप्रतिनिधि सभा दिल्ली ) रातानाड़ा, जोधपुर ) । ( ५ ) पूज्यपाद पण्डित जी ' सनातनधर्मालोक ' का छठा पुष्प देखा । उससे बहुत सीखने को मिला । श्री-हनुमान प्रसाद पोद्दार, ' कल्याण ' सम्पादक ) ( ६ ) पूज्य शास्त्री जी, आपका लिखा ' श्रीसनातनधर्मा-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 16

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( ड ) लोक ' पहला से छठा सुमन तक हमें प्राप्त हुआ है । ७ व सुमनका प्रतीक्षा कर रहा हूं । ' श्रीसनातनधर्मालोक ' पढकर हमारे दिल में यह बात आता है कि - सनातन धर्म का कोई एक महान शक्ति आपके रूप में प्रकट हो कर धर्म का रक्षा कर रहा है..... ( चन्द्रमोहन सिंह मेरेसोर्ख, उचगायना सूरिनाम ( दक्षिण अमेरिका ) । ( 7 ) …………….Your writings are very commencing and satisfactory. It is the very beat among all the Pandits who have contributed their writings in defence of SanatanDharma. I pray to God to give you long life and understanding that you may always educate your people towords_Sanatan Dharm ( श्री H, P. तिवारी Plamyra village, East comje Berbice, British Guiana,, ( ८ ) ' आलोक ' का छठा सुमन देखकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई । मैं आपके इन ग्रन्थों को पढ़कर अत्यन्त आनन्द - विभोर हो जाता हूँ । इनसे पूर्व ऐसा परिश्रम नहीं देखा गया । धार्मिक विषयों पर यह पहला महान् परिश्रम है ।...... ( श्रीदामोदर शास्त्रः संस्कृताध्यापक रामजस हाईस्कूल, देहली ) । ( e ) आपका लेखकों में प्रथम स्थान है, यह सभी धार्मिक विद्वानों का कथन है । आपके सभी लेख अत्यन्त महत्त्वपूर्ण, वैज्ञानिक एवं तर्क- पूर्ण होते हैं, जिससे सभी प्रकार के लोगों को संतुष्टि प्राप्त होतो है । आपका परिश्रम प्रशंसनीय और अनु-करणीय है । " आपके द्वारा रचित ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के सभी ग्रन्थों का अवलोकन किया । इसमें आपने हिन्दुधर्म समन्वित सुन्दर-सुन्दर आवश्यक विषयोंको देकर हिन्दु जाति का महान् लाभ किया है । आपके सनातनधर्मालोकका मननपूर्वक अध्ययन CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) पुराण - सम्बन्धी आक्षेपोंका परिहार । १. मङ्गलाचरणम् । ' ॐ निषुसीद गणपते! गणेषु त्वामाहुविप्रतमं कवीनाम् । न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे, महामकं मघवञ्चित्रमर्च ' । ( ऋ.सं. १०।११२१६ ' ॐ तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' ( कृष्ण य ० मैत्रायणीसं ० राहा १।६ ) ' ॐ शं नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा । शं नो मृत्युर्धूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजस: ' ( प्रथर्व शौ. सं १६१० ) ' ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः । ( अथर्ववेद सं ० ११।७।२४ ) ' तमितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्च अनुष्यचलन् । ' ( अथर्व ० १५०६ | ११ | ' इतिहासस्य च वैसपुराणस्य च गाथानाञ्च नाराशंसीनाञ्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद । ' ( अथर्व ० १५।६।१२ ) ' पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरञ्च वक्त्रेभ्यो वेदा-' स्तस्य विनिर्गताः । '. ( मत्स्य पुराण ५३ । ३ )

श्रीसनातनधमी कीऽऽलोकोयं संप्रकाशते ।

तमांस्यनेन दूरे स्युर्धर्ममार्गः स्फुटो भवेत् ॥ १ ॥

पूर्व पञ्चाप ( मुल्तान ) वास्तव्य इदानों देहलीं श्रितः ।

इमं ग्रन्थं विनिमीति श्रीदीनानाथनामकः ॥ २ ॥

सारस्वतस्य तस्याऽयं प्रयत्नः शास्त्रिणो महान् ।

साफल्यमेतु पूतिञ्च भगवत्कृपया ध्रुवम् ॥ ३ ॥

स. ध. १ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 17

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२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २. पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन । ' यानि अनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि ' ( तै. उ. १।११।२ ) ' तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्यं कार्यं व्यवस्थितौ ' ( भ.गी. १६१२४ ) ' इतिहास - पुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् । बिभेत्यल्प ताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' ( महा. आदि. १११६४ ) ' इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेद: ' ( न्यायदर्शन ४ | १ | ६२ ) आजकल आर्यसमाजी वा सुधारक लोग पुराणों को कई प्रकारसे कलङ्कित करनेमें लगे हुए हैं । इसमें उन्होंने कई लाभ सोच रखे हैं । पहला तो यह है कि - प्राजकल ऐसी पुस्तकों के प्रकाशनसे दोष - दर्शन - प्रिय अर्वाचीन जनतामें उनकी शीघ्र बिक्री हो जानेसे उनकी उदरदरीकी पूर्तिका साधन - घन उन्हें प्राप्त हो जाता है । दूसरा- इससे संस्कृतका परिनिष्ठित ज्ञान न ' रखने वाले अविद्वान् ग्राक्षेपकों का नाम क्रान्तिप्रिय जनता में यत्र-त प्रसिद्ध हो जाता है । तीसरा- इस विषयकें लिखने से पर-प्रत्यय - नेय बुद्धि तथा स्वयं पुस्तक देखने तथा समाधान सोचने-में आलसी जनता पर शीघ्र प्रभाव भी पड़ जाता है, जिससे वह प्रक्षेप्ता के सम्प्रदायकी भक्त बन जाती है । चौथा - उप-देशकता केलिए बुलावे: आते हैं, भेंट - किराया आदि भी मिल जाता है, अपने परिवार पोषणार्थं धनसंग्रह हो जाता है । पांचवां लाभ - उनके मत में सनातनधर्मका खण्डन हो जाता है, खण्डन ही उनका जीवन होता है । वे खण्डन बन्द कर दें, तो उनके समाज मृतप्राय हो जाते हैं । यह लोग जिना कुचरित्रोंको अवलम्बन करके पुराणोंको कलङ्कित करने की चेष्टा किया करते हैं, उनसे वे स्वयं मुक्त पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन ३ नहीं होते, परन्तु लोक दृष्टिमें अपने - आपको दूधका धुला सिद्ध करनेकेलिए अपने पूर्वजोंको कलङ्कित करनेमें कमर कसा करते । यह लोग पौराणिक सुचरित्रोंकी सर्वथा उपेक्षा करके पुराणों में प्रापाततः दीख रहे कुचरित्रोंको जनताके सामने बड़े संरम्भसे रखकर पुराणों को खराब सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं । वस्तुतः दोषमात्र देखने वाले इन लोगोंकी हार्दिक अभिलाषा यह रहती है कि हमें भी ऐसे प्राचरणोंके करनेमें खुली छूट मिल जाए । जब इन्हें कहा जाता है कि- अरे भाई! वेदादि - शास्त्रोंमें प्रक्षिप्त कर्मोंके निषेध होनेपर भी जिस - जिसने जैसा जैसा किया, वह पुराण - इतिहास में लिख दिया गया; इतने मात्रसे वह हमारे लिए कर्तव्य सिद्ध नहीं हो जाता । विधि अथवा आज्ञा अन्य बात होती है, किसी व्यक्तिने जो किया, उसे पुरा-खादिमें लिख दिया गया, यह अन्य बात होती है । इस कारण मनुजोने भी लिखा है- ' न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथंचन ' ( ४ । ११ ) अर्थात् - लोकचरित्र का अवलम्बन नहीं कर लेना चाहिये । पुराणोंने जिनके जैसे - जैसे चरित्र थे, वैसे ही प्रकाशित कर दिये । इससे पुराण क्यों खराब हो गये? पुराणों में स्वार्थी-अधर्मी दुर्योधन का चरित्र भी है, उससे विरुद्ध परोपकारी, पूर्ण-धर्मात्मा युधिष्ठिरका चरित्र भी है । उनमें पितृभक्त श्रीरामका भी वर्णन है, पिताको जेलखानेमें डालनेवाले कंसका भी । कुम्भकर्ण-के समान मांसभक्षियों का भी वर्णन उनमें है, वाताम्बुपणीशन ( वायु - जल - पत्ते खानेवाले ) मुनियोंका भी । घ्र व जैसे भक्त-बालकों की कथा भी है, असमञ्जस - जैसे बच्चों को नदीमें डाल आने वाले बालकोंकी कथा भी उनमें है । सावित्री के समान पतिव्रताओंका भी पुराणोंमें उपाख्यान है, शूर्पणखाके समान CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 18

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४ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) कुलटा- विधवाओं का भी । जहां नल - युधिष्ठिर आदिकी पौराणिक इतिहासने धार्मिकता तथा वीरताकी पराकाष्ठा दिखलाई है, वहीं उनके दौर्बल्यसे प्रयुक्त जुआ खेलने का व्यसन भी बताया गया है । जहां पौरा रिक इतिहास में ब्राह्मणको ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है, उसी में चारों वेदोंके ज्ञाता, कुकर्मी - ब्राह्मण रावणका भी, सुचरित्र -क्षत्रिय रामद्वारा वध भी तो बतलाया गया है । यदि ऐसा है, तो इसमें पुराणों का क्या अपराध हुआ? जिस व्यक्तिके चरित्रमें जैसे गुरण - दोष थे; वैसे ही पुराणोंम बता दिये गये; क्योंकि-शास्त्रोंमें लिखा है ' शत्रोरपि गुणा वाच्या दोषा वाच्या गुरोरपि '! ' शत्रोरपि गुरंगा ग्राह्या गुरोस्त्याज्यास्तु दुर्गुरगाः ( शुक्रनीति ३१६५ ) शत्रुके गुरंगों को भी ले लो, गुरुके दोषोंको भी छोड़ दो । इससे तो पुराणोंका सत्य में पक्षपात सिद्ध हुना तथा निष्पक्षता भी; तब तुम इससे पुराणोंको ही कंसे निन्दित करते हो? जब प्रतिपक्षियोंका इस उत्तरसे पराजय तथा मुंह फोका हो जाता है; तब वे अपने प्रश्नकी शैलीको कुछ बदल देते हैं; और कहते हैं — नहीं नहीं । हमारे पुराने पूर्वजों में कुछ भी दोष नहीं थे; पुराणोंने ही उनमें कलङ्क लगाये हैं । इसपर हम उन्हें पूछते हैं कि - उस - उस व्यक्तिका इतिहास प्रापने कहांसे सुना है? यदि पुराणसे; तो मानना पड़ेगा कि - जिसका जैसा चरित्र था, पुराणने उसे वैसे लिख दिया, नहीं तो पुराण- इतिहास से अतिरिक्त आपके पास क्या प्रमाण है कि जिससे आप उस व्यक्तिकी सत्ता ही सिद्ध कर सकें । यदि अन्य कोई प्रमाण नहीं; तब अन्त में आपको स्वयं मानना पड़ेगा कि - पुराणोंने उन-में दोष नहीं लगाये, किन्तु उनका जैसा चरित्र था, पुराणोंने उसे वैसे ही लिख दिया; नहीं तो पुराणोंको उनपर दोष लगाने पौराणिक चरित्रपर्यालोचन में क्या लाभ था? जीवन - चरित्रमें जो दोष हों, चाहे गुण हो उनको वैसा लिख देना - यह उनका सत्यप्रेम सिद्ध करता है । जैसे, गांधीजी के जीवनचरित्र में उनके कई दोष दिखलाये गये है उससे वह आत्मकथा ही क्या खराब हो जायगी? नहीं, बल्लि इससे जनताने गांधीजीको सत्यवादी माना और उनका इससे सम्मान हुआ । हां, काव्य - नाटक में जिनका उद्देश्य जनतापर उस चरित्र के अनुसरणका प्रोत्साहन देना है उनमें केव नायकके गुरण ही दिखलाये जाते हैं, दोष नहीं । परन्तु पुराण तो प्रत्येकका जीवन - घरित्र दिखलाते हैं; उनमें उनके चाहे दोष हों चाहे गुण; वे दिखला दिये जाते हैं । इसमें तो पुराणों की सत्यता सिद्ध हो जाती है । यह तो स्वा. दं. के जीवनचरित्रों में किया जाता है कि उनमें दोष छिपा दिये जाते हैं, और गुरण बहुत बढ़ा - चढ़ा कर अर्थवादरूपमें दिखायें जाते हैं । स्वामीके पूर्वचरित्रोंमें जी कुछ उनके दोष दिखलाये भी गये थे, अर्वाचीन चरित्रकारोंने उनमें वे दोष छिपा दिये हैं, इसीका नाम हुआ करता है असत्यता! शेष रहे ऋषि - मुनियोंके दोष, अथवा पुराणकथित कर्म प्रतिपक्षियों के अनुसार पापकर्म; उसमें प्रतिपक्षियोंकी संकुचित तथा अल्पश्रुत बुद्धिका ही यह अपराध है कि उसमें यह स्थूल भी पुराणका विषय प्रवेश नहीं कर सकता, इसमें पुराणका दोष नहीं । प्रतिपक्षी, यह याद रखें कि कई इस प्रकारके कर्म होते हैं, जो एक देशके लिए, एक कालकेलिए, एक पात्रकेलिए, एक योनि-केलिए, एक जातिकेलिए, एक श्राश्रमकेलिए, एक प्रायुकेलिए, एक अवस्था में, एक कुलमें, एक शाखा में, और शक्तिविशेष में दोष या पाप होते हैं; वे ही कर्म दूसरे देशकेलिए, दूसरे कालकेलिए, दूसरे पात्रकेलिए, दूसरी योनि के लिए, दूसरी जातिकेलिए, दूसरे श्राश्रमकेलिए, दूसरी श्रायुकेलिए, दूसरी अवस्थामें, दूसरे कुलमें, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) गुरण हो दूसरी शाखा में और शक्तिविशेषमें दोष नहीं होते; इसीलिए महा-करता है भारत शान्तिपर्व में कहा है- ' स एव धर्मः, सोऽधर्मो देशकाले ये गये है । प्रतिष्ठितः । प्रादानमनृतं हिंसा धर्मो ह्यावस्थिकः स्मृतः । डीं, बल्लि ( ३६ । ११ ) इसमें विशेष देश - काल श्रादिमें धर्मको भी अधर्म का इससे और धर्म को भी धर्म कहा गया है । जनतापर इसमें हिंसा - विषय में यह जानना चाहिये कि शास्त्रीय में केवल.. हिंसा हिंसा हुआ करती है, शास्त्रसे x अननुशिष्ट हिंसा हिंसा पुराणतो हुआ करती है । इस विषय में वेदान्तदर्शन ( ३।१।२५ ) सूत्रका दोष शांङ्करभाष्य देखना चाहिये । वह यह है- ' यत्पुनरुक्तं पशु-सत्यता हिंसा दियोगांद् अशुद्धमाध्वरिकं कर्म तस्य श्रनिष्टमपि फलमव-या जाती कल्पते - इति तत् परिह्रियते । न । शास्त्रहेतुत्वाद् धर्माधर्म-ढ़ा - चढ़ा विज्ञानस्य । श्रयं धर्मः, श्रयंम् श्रधर्मः - इति शास्त्रमेवः विज्ञानेः जी कारणम् । अतीन्द्रियत्वात् तयोरनियतदेश - काल निमित्तत्वाच्च! त्रकारों यस्मिन् देशे, काले, निमित्त च यो धर्मोनुष्ठीयते, सएव देश - काल-त्यता! निमित्तान्तरेषु धर्मो भवति । तेन शास्त्राद ऋते धर्माधर्मविज्ञानं न त कर्म कस्यचिदिति । ( जिस देश, काल, निमित्तमें, जो धर्म होता है, संकुचित वही अन्य देश, काल, निमित्तमें अधर्म बन जाता है. अतः यह थूल भी धर्म है या अधर्म है, इसे मानुषी बुद्धि नहीं बता सकती; किन्तु ष नहीं । शास्त्र ही यह बात बताएगा ) शास्त्रांच्च हसानुग्रहाद्यात्मको ज्योतिष्टोमो धर्म इत्यवधारितः । स कथुमशुद्ध इति शक्यते होते हैं, वक्तुम्? ननु ‘ न हिस्यात् सर्वा - भूतानि ' इतिशास्त्रमेव भूतविषयां योनि हिंसाम् अधर्मं इत्यवगमयति? बाढम्; उत्सर्गस्तु सः । अपवादः के लिए, ‘ अग्नीषोमीयं पशुमालभेतेति । उत्सर्गापवादयोश्च व्यवस्थित-. विषयत्वम् । तस्माद् विशुद्धं कर्म वैदिकम् । शिष्टैरनुष्ठीयमान-केलिए, त्वाद् अनिन्द्यत्वाच्च ' । " दूसरे कुल में, इस सूत्र का श्रीवल्लभाचार्य गोस्वामी के अतिरिक्त श्री: पौराणिक चरित्र पर्यालोचन ७ रामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य आदि समस्त भाष्यकारोंने यही अर्थ किया है । इसी विषय में प्राचार्य शङ्करने अन्यत्र की है- ' उपस्थितविपाकत्वं च कर्मणो देश - काल - निमित्तोपनि- भी स्पष्टता पाताद् भवति । यानि च एकस्य कर्मरणो विपाचकानि देश - काल-निमित्तानि तानि एव अन्यस्यापि न नियन्तुं शक्यन्ते । यतो विरुद्धफलान्यपि कर्माणि भवन्ति । शास्त्रमपि ग्रस्य कर्मण इदं फलं भवति - इत्येतावति पर्यवसितम्, न देशकालनिमित्तविशेष-मपि सकीर्तयति । साधन - वीर्यं विशेषात्तु प्रतीन्द्रिया शक्ति राविर्भवति 1 तत्प्रतिवद्धा च परस्य तिष्ठति कस्यचित् शाङ्कर ३ । ४ । ५१ ) इसमे भी यही सिद्ध किया ' ( वेदान्त-देश - काल - निमित्त विशेषमें धर्म - प्रधमं परिवर्तित गया है कि हैं । किसी में साधन - विशेष तथा वीर्यं हो जाया करते शक्ति प्रकट हो जाया करती है कि उसे विशेषसे ऐसी प्रतीन्द्रिय भी हानि नहीं होती; और उस अधर्म आदि से कुछ तब सभी दूसरेकी हो जाती है । जब ऐसा है; को एक लाठी से नहीं हांका जा सकता, यह पुराण-के पर्यालोचकोंको याद रखना चाहिये । यह यहां हिंसा हिंसा विषय में कहा गया है; असत्य विषयमें श्रागे कहा जाएगा अव देशविशेषमें एक ही कर्मका तारतम्य देखिये । · यह रीति है कि उसमें पुरुष परस्त्रियों - विलायत में करते हैं । जो स्त्री जिस भी अन्य का हाथ पकड़कर नाचा करे, यदि वह पुरुष निषेध कर दे; पुरुषको तो वह नाचनेकेलिए पसन्द जाता है । नाचनेकी भूमि इतनी चिकनी बड़ा असभ्य माना नाचनेके समय पावोंके रखी जाती है कि-सलती फिसलने की आशङ्का रहती है । तब फि-स्त्रीको पुरुष और फिसलते हुए पुरुषको स्त्री अपनेपर ले लेती है, या वे एक - दूसरेके ऊपर गिर जाते हैं । अब कहिये कि भारत में ऐसा करना क्या सभ्यता है वा असभ्यता? अब यह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) एक ही कर्म भिन्न - भिन्न देशमें सभ्यता तथा असभ्यता बना । मान लीजिये कि अंग्रेजोंकी कृपासे जैसे अंग्रेजी भाषा भारतीयों-की कुलभाषा हो गई; कोट, बूंट, हैट, पैंट, कालर, टाई, करजन-फैशन आदि उनकी वेश भूषा भी हमारी सभ्यताकी सामग्री बन गई । अब हमारी स्त्रियोंका पर्दा घूँघट भी चला गया । अपनी स्त्रियोंका अभ्य पुरुषोंके साथ किसी पिकटिंग- श्रान्दोलन में भेजना भी अब लज्जाजनक नहीं माना जाता । श्रब तो उससे भी बढ़कर क्लबों में अन्य स्त्रियोंके साथ करमर्दनकी भी सभ्यता हो गई है । हमारे कुलीन घरोंकी लड़कियां अब सभामें नाचने भी लग गई हैं । इस प्रकार क्रमश: अन्य स्त्रियोंका हाथ पकड़कर पुरुषोंका उनके साथ नाचना भी सभ्यता होजावे; तब वर्तमान प्रालोचकोंकी दृष्टिमें यह दोषरूप भी भावी सन्तानों की दृष्टि में गुरण हो जावेगा 1 जब वही भावी सन्तानें ग्रापसे लिखे हुए अन्य -की स्त्रीके साथ नाचनेमें घृणा - सूचक इतिहास पढ़ेंगी; तब आप -की नासमझी और अपनी सभ्यता मानेंगी । " यूरोप में किसी सभ्य के आनेपर अपने हैटके उतारनेसें अभि-वादन मोता जाता है, पर हमारे देशमें किसीकी मृत्यु होनेपर उसके सम्बन्धी के आगे शोकप्रकाशनार्थ अपनी टोपी उतारी जाती है । हमारी सभ्यता में खड़े होकर पेशाब करते हुए ब्राह्मणोंको ' अब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठत् मूत्रयति ' ( नसूत्रके महा-भाष्य में ) ' अब्राह्मण ' कहा जाता था, पर यूरोप में खड़े होकर पेशाव और द्वित्रैश्च कर्गले पश्चाद् गुदं संशोधयेद् बुधः । न करेण स्पृशेन्नी र यदीच्छेच्छुभमात्मनः ' ' नग्नः टीतटबे स्नायाद ' ( टुडे, स्मृति ) आदि विधियां की जाती हैं, हमारे देशी लोग इन विधियों के करने में गौरव समझते हैं । उत्तर प्रदेश वा पूर्व में दूसरेकी रसोईमें घुसना महान् अप-पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन राघ है, पर पंजाब में ऐसा करनेमें कोई अपराध नहीं । भारत गलेको तर करने के लिए दूधका प्रयोग किया जाता है; पर यूरो में इस अवसर पर ब्राण्डी ( मद्य ) का उपयोग किया जाता है । यहाँ तो मद्यके उपयोगसे मस्ती वा बेहोशी होती है, वहां इस चेतनता होती है । दक्षिण- देशमें मामा वा बुझाकी लड़की के विवाह करना ठीक माना जाता है, पर हमारे देशमें ठीक नह माना जाता । दक्षिण, ( मलावार ) प्रदेश में कई निम्न जाति वालोंमें अपनी नवविवाहित पत्नीको प्रथम रात्रिमें ब्राह्मणां दिया जाता है, इससे स्त्री पतिव्रता मानी जाती हैं, पर हमा देशमें नहीं । इससे सिद्ध होता है कि भिन्न - भिन्न देशमें एकही कर्म एक स्था पर दोष होता है, और दूसरे स्थान पर गुण । एक स्थान प का सभ्यता, श्रीर दूसरे स्थान पर असभ्यता । एकं स्थान पर पाप ता दूसरे स्थान पर · पुण्य माना जाता है । इसीलिए श्रीमद्भागवत का भी कहा गया है- ' क्वचिद् गुरंगोपि दोषः स्याद् दोषोपि विधि सं गुणः । गुणदोषार्थनियम: ( गुरणदोषका नियामक शास्त्र है उ तद्भिदामेव बाधते ' ( ११।२१।१६ ) । इसमें उदाहरणोंकी का अ नहीं है । इसलिए बोधायन - धर्मसूत्रमें भी कहा है- ' तत्र तत्र था प्रामाण्यमेव स्यात् ' ( १ । २ । ६ ) । तव कहिये कि क्या को गुण - दोषका एक ही पूर्ण लक्षरण बना सकता है? यदि बना ब्रा भी सही; तब उसका अपवादशास्त्र अवश्य बनाना पड़ेगा कन अतः लौकिक कुत्सित तथा प्रकुत्सित कर्मों की एक व्यवस्था ना था हो सकती । सभी लोग अपने अनुकूल कर्मोंको सुकर्म मानते हैं वि इस कारण लौकिक कर्मीको देश, काल, समाज आदि भेद अप सुकर्म - कुकर्म कहा जा सकता है । एक विशेष देश में सुकर्म मा सा · जाता हुआ वो किया जाता हुधा कर्म दूसरे देश वा समान ब CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative