सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 21–30

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 21 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) । भारत सदा सुकर्म नहीं रहता । बहुत क्या कहा जाय; उसी देश तथा पर यूरो समाज में वही कर्म भिन्न कालमें कुकर्म हो जाया करता है । अतः जाता है । यह प्रसिद्ध है कि- ' देशभेदात् कालभेदात् पुंभेदाद् अन्यथाऽन्यथा । वहां इस विपर्यस्यति शास्त्रार्थो धर्मभेदास्ततोऽभवन् ' देश, काल वा पुरुष-लड़की के भेदसे शास्त्रका अर्थ भी परिवर्तित हो जाता है; इसलिए घर्म-ठीक नह का भेद हो जाता है । नजाति ' अब कालकी परीक्षा कीजिये । एक कालमें जो बात गुरण वा ब्राह्मणा दोष समझी जाती है, वही अन्य कालमें दोष वा गुरण बन जाती रहमा है । इस पर यह समझिये सृष्टिके प्रारम्भसे ग्राज से कुछ वर्षं पूर्व तक चाण्डाल आदि अन्त्यजोंके स्पर्शमें दोष माना जाता था; एक स्था परन्तु आजकल स्पर्श तो छोड़िये, ग्राज भंगीकी लडकीसे विवाह स्थान प कर लेने पर ' हिन्दी - मिलाप ' ' वीर अर्जुन ' आदि सुधारक पत्रों में पाप त ' आदर्श विवाह ' शीर्षक छप जाता है । सन् १६२८ में इस प्रकार द्भागवत का संकल्प हमने ' सूर्योदय ' में दिया था; इससे हमारे मित्र प्रार्थ-विधि समाजी श्रीधुरेन्द्रजी शास्त्री ( स्वामी श्रीघ्रं वानन्द सरस्वती ) हमें स्त्र ही उलाहना दे गये थे; पर अब तो वे भी वैसे विवाहोंको सम्भवतः की क अच्छा समझते हैं । प्राचीन काल में सवर्ण विवाह ठीक माना जाता न - तत्र द था । तब असवरंग विवाह, ब्राह्मणका अन्य जातिवालोंके साथ क्या को निकृष्ट माना जाता हुआ भी स्वीकृत किया जाता था, परन्तु दि बना ब्राह्मणका शूद्रा के साथ तथा अधम- वर्गका उच्च वर्णवाली पड़ेगा कन्या के साथ प्रतिलोम विवाह तो अत्यन्त निन्दित माना जाता वस्था ना था । पर ग्राज तो उच्च वर्णवालेका ' भङ्गी ' की लड़कीके साथ नानते हैं विवाहः आदर्श विवाह माना जाता है । श्री गांधीजी जैसे वेश्यका दिभेद अपने लड़के देवीदासका ब्राह्मण ( श्री राजाजी ) की लड़की के कर्म मा साथ प्रतिलोम विवाह, श्री जवाहरलाल - ब्राह्मण द्वारा अपनी समान वैश्य साथ तथा अपनी लड़की का पारसी से प्रतिलोम पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन ११ विवाह भी नेता बनाने वाला माना जाता है । किसी समय मुसलमान और ईसाईयोंको नहीं छुा जाता था । इस विषय में स्वा. द. जोके १८७५ ई ० में प्रकाशित ' सत्यार्थ-प्रकाश ' की साक्षी देखिये- ' मुसलमान वा अंग्रेजसे में दोष मानते हैं । मुसलमान और अंग्रेज जो भले प्रादमी हैं; उनसे तो त गिनना, और वेश्यादिकोमें छूत न मानना, यह केवल युक्तिशून्य बात है ' । ( यह स्वा. श्रद्धानन्दप्रणीत ' आदिम सत्यार्थ प्रकाश ' में देखें ) । श्रव द्वितीय स. प्र. में भी देखें- ' भला जो महाभ्रष्ट म्लेच्छकुलोत्पन्न वेश्या श्रादिके समागमसे आचार भ्रष्ट धर्म - हीन नहीं होते; किन्तु देश - देशान्तर [ विलायत, अरब आदि ] म्लेंच्छकुलोत्पन्न पुरुषोंके साथ समागममें सूत और बोष मानते हैं, यह केवल मूर्खता की बात नहीं तो क्या है? " ( दशम पृष्ठ १६५ ), परन्तु वे ही ईसाई - मुसलमान यादि ग्रब हुए जाते हैं । इनका स्पर्श जारी होनेपर भी उनके साथ खाने - पीनेका व्यवहार नहीं था, पर ग्राजकल उनके साथ खाना - पीना पिपीलि-का - गति न्यायसे जारी है, विशेषकर राजकीय अधिकारियोंमें तथा वर्तमान लीडरों में तो है ही । ग्राज मुसलमानोंसे बनाई हुई डबलरोटी, बिस्कुट, सोडा प्रादि का उपयोग सभ्यतामें माना जाता है । ऐसा होनेपर भी ईसाई - मुसलमानकी लड़कियोंके साथ विवाह अनुचित माना जाता था, पर प्राज श्यामकुमारी नेहरू-सदृश ब्राह्मरिगयोंका जमीलनां मुसलमानसे, अरुणा जैसी ब्राह्म-रियोंका ' प्रासफअलीसे तथा डा ० ग्रम्बेदकर अन्त्यज से एवं श्री-इन्द्र जैसे क्षत्रियोंसे ब्राह्मणियोंका विवाह गौरवास्पद माना जाता है । स्त्रियोंका पहले पर्दे में रहना अच्छा माना जाता था, और बेपर्दगी बेशर्मी मानी जाता थी; पर श्रव वेपदंगी सभ्यता मानी जाती है; और पर्देको घृणाकी दृष्टि से देखा जाता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 22

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 22 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) अब विचारिये - जब एक ही वस्तु अथवा एक ही व्यवहार एक समय में दोष हुप्रा; और दूसरे समयमें गुरण होगया; जैसेकि -श्रीमद्भागवत में - ' क्वचिद् गुणोपि दोषः स्याद् - दोषोपि विधिना गुणः । गुणदोषार्थं नियमस्तद्- भिदामेव बाधते । ( ११।२१।१६ ) तब पुराण - इतिहासमें हमारे पूर्वजोंपर दोष ही लगाये हैं - यह प्रतिपक्षी कैसे कह सकते हैं? तब शायद वही व्यवहार ग्राह्य माना गया हो । महाभारत द्वारा पता लगता है कि पूर्व समय में काम भाव न होनेसे विवाहविधि नहीं हुआ करती थी । स्त्रियाँ सौधों की भान्ति और पुरुष बैलोंकी भान्ति नग्न रहा करते 1 पुरुष जिस किसी स्त्रीको अपनी पत्नी बना सकते थे; तब यह धर्म माना जाता था; कालक्रमसे जब कामभाव बढ़ गया, और अव्यवस्था होने लगी; तब विवाहविधिकी व्यवस्था नियमित की गई । तब स्वच्छन्द - विहार प्रधर्म माना जाने लगा । - ' अनावृताः किल पुरा स्त्रिय आसन् वरानने! कामाचारविहा-रिप्यः स्वतन्त्राश्चारुहासिनि! ' ( आदि. १२२ । ४ ) तासां व्युःच्चरमाणानां कौमारात् सुभगे! पतीत् । नाऽधर्मोऽभूद् वरारोहे! स.हि घर्मंस्तदाऽभवत् ' ( ५ ) उसके बाद उस पूर्व - व्यवहार का ऋषियों द्वारा निषेध कर दिया गया । वहां यह नियम किया गया- ' व्युच्चरन्त्याः पति नार्या श्रद्यप्रभृति पातकम् । भ्रणहत्या-समं घोरं भविष्यत्यसुखावहम् ' ( १२२ । १८ ) पतिव्रतामेतदेव. भविता पातकं भुवि ' ( १६ ) । तब प्रतिपक्षी उस समयको ग्राजके दृष्टिकोण से कैसे तोल सकते हैं? । --इस प्रकार पहले अन्त्यजोंका देवमन्दिरों में प्रवेश किस, दृष्टिसे देखा जाता था, और अब किस दृष्टिसे देखा जाता है, इत्यादि बातोंपर जब दृष्टि डाली जावे; और यह सब घटनाएं यदि इति-हासमें आ पड़ें; तब यदि भावी सन्तानें देवमन्दिरोंमें अछूतोंका पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन १३ घुसाना भले ही अच्छा मानें, पर जिस काल में वैसा करना निषिद्ध था; तब उसे गुरण कैसे माना जा सकता था? वही इतिहासकी घटनाएं सदा एक कालसे नहीं तोली जा सकती. क्योंकि भिन्न- काल में कई भेद हो जाया करते हैं । आजकल कई स्त्री - पुरुष विवाह हो जानेपर भी ' तलाक ' दे देना धर्म मानते हैं । कई व्यक्ति आजकल विवाह ठीक न मान कर जिस किसी भी स्त्रीको मन लगने तक अपनी पत्नी बनाये रखना चाहते हैं । इसी प्रकार स्त्रियाँ पुरुषकों । कई मित्र अपन स्त्रियोंको एक दूसरेको रतिकेलिए देते हैं; आपके मतमें यह अधर्म भी उनके मत में ठीक है - इस प्रकार भिन्न - भिन्न काल में दृष्टि कोणकी विभिन्नताका अनुमान कर लेना चाहिये । इसलि खि मीमांसादर्शन ( १ । १ । १ सूत्र ) के शावर भाष्य में भी लिख म है -- “ धर्मं प्रति हि विप्रतिपन्ना बहुविदः । केचिद् अभ्यं धर्ममाहु केचिद् अन्यम् I । सोऽयमविचायं प्रवर्तमानः कञ्चिदेव उपाददान विहन्येत, अनर्थं च ऋच्छेत् । तस्माद् धर्मो जिज्ञासितव्य: ' । इस आ कारण ' महाभारत - शान्तिपर्व में भी कहा है ' अधर्मरूपो धर्मो कश्चिदस्ति नराधिप! धर्मश्चाऽधर्मरूपोस्ति तंच्च ज्ञेयं विपश्चित ( ३३ । ३२ ) ( कोई धर्म भी अधर्म बनजाता है, और अधर्म धर्म बन जाता हैं. 1 ' अब पात्र लीजिये । - एक पुरुष ऐसा होता है कि उसे संखि भी वाजीकरणका काम देता है, दूसरा ऐसा होता है कि सखि उसे यमद्वारमें भेजनेका साधन होता है । एक है बीमार व्यि घी उसे तपेदिक्क कर देता है । एक है स्वस्थ, घी उसे बलव ' तेषु बनाता है । ध्रुव देखिये - एक ही घी तथा विष - धतूरा आदि श्री स्वि कारिभेदसे एककेलिए दोष हो जाता है, और एककेलिए गुए ' तद एक पूर्ण - स्वस्थ पुरुष बहुत अपथ्य सेवन करने पर भी हानि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 23

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 23 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३ १४ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) करना प्राप्त नहीं होता; एक साधारण स्वास्थ्य वाला व्यक्ति थोड़ा ही-? वही अपथ्यका सेवन करनेपर रोगी हो जाता है । एक सबल पुरुष सकतीं; एक ही दिन कई बार मैथुन करने पर भी क्षीण नहीं होता; दूसरा दुर्बल व्यक्ति एक बार मैथुन करने पर उठने लायक तलाक भी नहीं रहता; कई इस प्रकारके पुरुष होते हैं कि साँप वा ' दे बिच्छू उन्हं काटे, फिर भी उनपर उसके विषका प्रभाव नमान नहीं पड़ता जैसे -- नल कर्कोटक नागके काटने से भी विषकी पीड़ा-बनाये को प्राप्त नहीं हुआ, केवल कुछ काला हो गया ( महाभारत में अपनी यह वनपर्व ६६ । १६ ) । धतूरा एवं प्राक खानेपर भी कइयोंका कुछ नहीं बिगड़ता । मद्यपान करनेपर भी कइयोंपर उसका इसलि प्रभाव नहीं पड़ता । कई स्वयं विष खा लें, या कोई उन्हें विष भी लिख खिला दे, फिर भी उनपर उसका दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, जैसे-धर्ममाहु महादेव जी । परन्तु थोड़ी सामर्थ्य वाला उनका अनुकरण उपादान करता हुआ अपने आपको साँप वा बिच्छू से कटवा ले, धतूरा, वा विषं खा ले; क्या वह मरने वा बेहोश होने वा पीड़ासे अपने-नः । इस आपको बचा सकेगा? पश्चि धर्मो तब कहिये कि - क्या एक ही वस्तु सब स्थान समान हुई? धर्म यदि नहीं तो सिद्ध हुआ कि अलौकिक सामर्थ्य वाले हमारे पूर्वजों केलिए कोई प्रतीत हो रहा कुकर्म भी अपना फल देने में समर्थ न हुआ, और हम साधारणोंको वह समूल नष्ट कर सकता से संखि है । इस कारण ' श्रापस्तम्बधर्मसूत्र ' में कहा है-कसंख हृष्टो धर्म - व्यतिक्रमः साहसं च पूर्वेषाम् ' ( २ । १३ । ७ ) नारव्य ( पूर्व लोगोंका धर्मका उल्लंघन तथा साहस भी देखा गया नादि से बलब ‘ तेषां तेजोविशेषेण प्रत्यवायो न विद्यतें ' ( ८ ) ( उनको विशेष हैं ) श्री के कारण उनको उससे पाप वा हानि नहीं होती तेज-लिए गुण ' तदन्वीक्ष्य प्रयुञ्जानः ) । नीहाि सीदत्यवर: ' ( ना. ध. सू. २ । १३ । ६ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन १५ ( उसे देखकर अनुकरण करने वाला श्राजका व्यक्ति दुःख उठाता है ) । यह एक प्राचीन धर्मसूत्रकी बात उपेक्षणीय नहीं । यही बात श्रीमद्भागवतपुराण में भी कही है-' धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् । तेजीयसां न दोषाय वह्न ेः सर्वभुजो यथा ' ( १० । ३३ । ३० ) ( सामर्थ्यवान् तेजस्वी पूर्व लोगोंका वर्मोल्लंघन तथा साहस भी देखा गया है; पर उन्हें उससे कुछ भी दोष नहीं होता । अग्नि सभी कुछ खा लेती है; इससे वह दूषित नहीं हो जाती, किन्तु दूषित वस्तुका दोष निकाल देती है ) ' नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः । विनश्यत्याचरन् मोढ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम् ' ( ३१ ) ( पर समर्थ पुरुष वैसा मनसे भी न करे; वह मूढतासे यदि वैसा करेगा; तो हानि उठा बैठेगा । रुद्र हलाहल विष पान करते हुए भी नहीं मरे, वही विष उनकेलिए अमृत बन बैठा ) । वेदान्तदर्शन ( १1३1३३ सूत्र ) के भाष्यमें भी कहा है- ' ऋषी-णामपि मन्त्रब्राह्मणदर्शिनां सामय्यं नास्मदीयेन सामर्थेन उपमातुं युक्तम् । तस्मात् समूलमितिहासपुराणम् ' ( पुराने ऋषियोंकी सामर्थ्यको अपनी सामर्थ्यसे नहीं तोलना चाहिये ) यदि आप हरे रंगकी ऐनक पहरें; तो प्रापको सब हरा - हरा दीखेगा; परन्तु धर्मके विषयमें यह बात नहीं हो सकती । बल्कि यह कहा जा सकता है कि- प्रतिपक्षी - जैसे संकुचितबुद्धि वाले लोग धर्म - अधर्मका लक्षण ही नहीं बना सकते । तभी तो महा-भारत ( वनपर्व ) में कहा है- ' धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायांम् ' ( ३१३ | ११७ ) ( धर्मका तत्त्व रहस्यपूर्ण होता है ) । बोघायन-धर्मसूत्रमें भी कहा है- ' बहुद्वारस्य धर्मस्य सूक्ष्मा दुरनुगों गतिः ' ( १ । १ । १३ ) ( धर्मके बहुत द्वार हैं; अतः धर्मकी सूक्ष्म और दुर्ज्ञेय गति है ) । महाभारतमें कहा है- ' बहुधा दृश्यते धर्मः सूक्ष्म Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 24

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 24 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२०१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) एव द्विजोत्तम! नतु तत्त्वेन भगवन्! धर्मं वेत्सीति मे मतिः ' ( वज्रपर्व २०६ १४२ ) ( धर्म सूक्ष्म होता है, उसे आप वास्तविकता-से नहीं जानते ) । धर्मका एक - एक सामान्य लक्षरण बनानेपर भी आपका वह लक्षण सर्वत्र चरितार्थं नहीं हो सकता, उसका अपवादस्थल मानना ही पड़ेगा । कुछ विचारिये - सत्य बोलना धर्म है, और असत्य बोलना पाप; इस सिद्धान्तको ही ले लीजिये । एक गाय कहीं दौड़ती जा रही है । कुछ समय बाद हमें एक वधिक ( कसाई ) मिलता है, वह हमसे पूछता है कि क्या आपने इधरसे गायको जाना देखा है? यदि हम उसमें सच बोलते हैं कि- हां - हां, इधर से गाय जा रही है; तब इससे गोवध होता है । वहां सत्य भी अधर्म होता है, और असत्य भाषण भी धर्म; क्योंकि - ' न तत्त्ववचनं सत्यं नाश्तत्त्ववचनं मृषा । यद् भूतहितमत्यन्तं तत् सत्यमिति धारणा ' । ( सच बोलनेका नाम सत्य नहीं होता; झूठ बोलनेका नाम प्रसत्य नहीं होता । जिसमें प्राणियोंका अत्यन्त हित हो; वह असत्य भी सत्य है ) । इसलिए कहा गया है- ' सत्यं भूतहितं प्रोक्त न यथार्थाभिभाषणम् ' ( सत्य प्राणिहितका नाम होता है, सच बोलनेका नाम सत्य नहीं ) । महाभारत - शान्तिपर्वमें भी कहा है - ' सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् । यद् भूत-हितमत्यन्तमेतत् सत्यं मतं मम ' । ' सत्यस्य वचनं साधु न सत्यादु विद्यते परम् । • भवेत्सत्यं न वक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् । यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं वाप्यनृतं भवेत् । सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ' ( १०६ । ४-५ ) ' अकूज़नेन चेन्मोक्षो नावकूजेत् कथंचन । अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्क रन् वाऽप्यक्त-जनात् । श्र ेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् । ( १०६ । १५ ) ' सत्यस्य वचनं श्र ेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् । यद् भूतहितम-पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन १७ त्यन्तमेतत् सत्यं ब्रवीम्यहम् ' ( शान्ति २८७ । १६ ) -- यदि भगवान् श्रीकृष्ण निरपराध भी द्रोणाचार्यको मरवाने के लिए युधिष्ठिर - द्वारा असत्य न बुलवाते; तब पापी दुर्योधन के राज्यकी स्थिरता होजानेसे पापका साम्राज्य बढ़ता । उस समय ' असत्यभीषण भी सत्यधर्म होगया - ' स भवाँस्त्रातुः नो द्रोणात् सत्यज्ज्यायोऽनृतं वचः । अनृतं जीवितस्यार्थे वदन् न स्पृश्यतेऽनृतैः, ( महा. द्रोण. १ ९ ० । ४७ ) । जब प्रतर्दन राजा बौतहव्यं नामक एक क्षत्रियको मारने आया; तब वह भयवश ऋषियोंके आश्रम में या छिपा । प्रतर्दन भी उसे ढूढता हुना, आश्रममें ग्रांगया । पूछनेपर भृगु मुनिने कहा- यहाँ कोई क्षेत्रिय नहीं है, सभी ब्राह्मण ब्राह्मण ' हैं हैं ' नेहास्ति क्षत्रियः कश्चित् सर्वे हीमे द्विजातयः ” ( महा. अनु. ३४ । ५३ ) यह सुन प्रतर्दन लौट गया । यहां मुनियोंने असत्य कहा था; शास्त्रकारोंने उसे भी ठीक माना: है । मनुजीने कहा है- ' शूद्रविट् क्षत्त्रविप्रारणा यत्रो ( सत्योक्तौ ) भवेद् वधः । तत्र वक्तव्यमनृतं तद्धि स॒त्य॑द्ि विशिष्यते ' ( ८ । १०४ ) । पद्मपुराण सृष्टिखण्डमें भी कहा हैं । ‘ उक्त्वानृतं भवेदु यत्र प्राणिनां प्राणरक्षणम्ः । अनृतं तत्र सत्य स्यात् सत्यमप्यनृतं भवेत् ( १५ । ३ ९ २ ) । महाभारत में असत्य की युक्तता के विषय में कहा है- प्राणात्यये विवाहे च वक्तव्यमनृत भवेत् । अर्थस्य रक्षणार्थीय परेषां धर्मकारणात् ' ( शान्तिः १०। १६ ), न नर्म - युक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषुः राजन विवाहःकाले ।! प्रारणात्यये - सर्वधनापहारे पञ्चानृतान्याहुरपात-काति ' ( ' आदिपर्व ५२ । १६ ) यह सत्यं असत्य पर विचार हुआ । इस प्रकार उदारता गुरण हैं, परन्तु वही उदारता शिखा काटने मं यज्ञोपवीत नः पहिनने में ) । ईसाई -मुसलमानोंके ' साथ ' खानेमें दोष है । चोडी अधर्म है, परन्तु दूसरेको मारनेकेलिए CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 25

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 25 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) - अपने पास विष रखे हुए पुरुषके घरसे उस विषकी चोरी कर लेना भी धर्म है । स्वतन्त्रता जीवन है, पर वह यदि विद्यार्थियों-को दे दी जाय; तो हानि होगी । दान पुण्य - जनक है; पर वही अत्याचारी, ठग, जुआरी, चोर, डाकू तथा अपने धर्मके खण्डन करने वालेको दिया जाए; तो हानि करने वाला होता है । क्रोध धर्म है; यदि प्राततायीमें अक्रोध किया जाय; तब उसका आततायित्व बढ़ जावेगा । अतः अधर्म नहीं होता । लोभ दोष गुरण हो जाता है । काम दोष है, है । श्रुति भी ' स्वर्गकामो यजेत ' ती है, ऋतुकालमें अपनी स्त्रीसे परन्तु दुष्टों के निग्रहमें वह गुरण अवतार होता है । धर्म के लिए क्रोध करनेपर भी है, पर मुमुक्षुमें मुक्तिका लोभ पर स्वर्ग - प्राप्तिको कामना धर्म कह कर उसका अनुमोदन कर-काम भी गुण है । क्रोध दोष है, होता है, तभी तो भगवान्का क्षमा धर्म है, यदि वही अपनी स्त्रीके व्यभिचार देखनेपर भी रखी जाय तब प्रागे सर्वनाश होगा, अतः वह इस अवसरपर प्र-धर्म होगी । वही क्षमा चोर, डाकू, घातक, निरन्तर हानिप्रदको की जावे; तो पापरूप होगी । इस प्रकार अवस्थाभेदसे, पात्रभेद-से घृति आदि सभी साधारण धर्म किसीके लिए अधर्म होजायेंगे. और किसी के लिए धर्म, यह स्वयं घटा लेना चाहिये । जैसे यति दमके अवलम्बनसे अपना लक्ष्य सिद्ध कर सकता है, परन्तु राजा शत्रुकी जयचिन्ताको छोड़ कर दमयुक्त होकर विफलताके प्रति-रिक्त राज्यसे च्युन भी हो सकता है । इसप्रकार स्पष्ट है कि-लक्ष्यकी उच्चता - नीचतासे ही गुरण - दोष हुआ करता 1 लक्ष्य-की नीचतासे उत्तमसे भी उत्तम धर्म बक़वृत्ति वा विडालवृत्ति में परिणत होकर दोष हो जाता है । ऊपरी - दृष्टिसे दीख रहा अधर्म भी लक्ष्यकी उच्चतासे धर्म हो जाता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक चरित्रपर्यालोचन १६ एक पतिव्रता वृन्दाका - जिसके सतीत्वके प्रभावसे उसका पति मर नहीं सकता था, यदि उसका सतीत्वभङ्ग न किया जाता; तब उसके दुष्ट पतिकी कृपासे सभी पतिव्रताओंका सती-त्व भङ्ग हो जाता । उसमें एकका सतीत्वभङ्गरूप ग्रवर्म भी लक्ष्यकी उच्चतासे धर्म हो गया । इसलिए महाभारत में कहा है-" निकृत्या ( छलेन ) निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चयः । नहि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या पापमुच्यते ' ( वनपर्व ५२ । २२ ) ( छलीको छलसे मारना पाप नहीं ) । वृन्दाकी कथासे यह सिद्ध है कि जहां व्यष्टिकी हानि करने पर भी समष्टिका लाभ हो; वहां व्यष्टिकी हानि कर देना पाप नहीं । कोई पुरुष निरपराध पुरुषोंको तलवारसे काटता हुआ चला आ रहा है, उस एकको फांसी देना - मार देना धर्म है । यदि उसे न मारा जावे; श्रथवा वह हमारे काबूमें न आवे; तब उस-के निकटके सहायक वा प्रिय सम्बन्धीको प्रत्यक्ष वा परोक्षरूप से वा परम्परारूपसे प्रवल दण्डसे दण्डित न किया जावे; जिससे वह निर्बल हो जाए, तब वह पुरुष सैंकड़ों पुरुषोंको मार डालेगा । उसको दण्ड देने से सैंकड़ों पुरुषोंकी रक्षा होगी । उसमें एकको हानि पहुँचानेका अभिप्राय नहीं रहता; किन्तु दूसरे सैकड़ों पुरुषोंकी रक्षामें तात्पर्य होता है । इसी प्रकार वृन्दाकी कथामें भी प्रक्षेप्ताओं को याद रखना चाहिये । इसी नीतिसे श्रीवामनने बलि - राजाको बांधा था; मोहिनीरूपमें विष्णुने दैत्योंसे अमृत छीना था । कहने का यह निष्कर्ष है कि - धर्म - अधर्मकी, मीमांसा कठिन वा सूक्ष्म हुआ करती है । उसको साधारण वा अपठित लोग अथवा पठित भी एक संप्रदायविशेषके पक्षपाती, निन्दाधर्मी, दोषैकदृष्टि पुरुष नहीं जान सकते । वे शास्त्रीय सामान्य - कर्मोको Gujarat Gui. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 26

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 26 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) धर्म मानते हैं । ' मा हिस्यात् सर्वा भूतानि, ' गां मा हिसी, ( यजु: वा ० सं ० १३ । ४३ ) ' न सत्याद् अधिको धर्मः ' ' अहिंसा परमो धर्मः ' इत्यादि सामान्यधर्मोंको वे धर्म जानते हैं; पर यही विधियां कभी दुःख करने वाली भी हो जाती हैं । ' मा हिस्यात् सर्वाभूतानि ' इस वचनको पूरा करते हुए पृथ्वीराज से युद्धमें फिर - फिर छोड़ा हुआ शहाबुद्दीन महमूदग़ोरी पृथ्वीराज के नाशका कारण बनकर सारे भारतको ही दास्य - शृङ्खलामें बांधने वाला बना । यही दशा हुई घरमें आये हुए अलाउद्दीन वादशाहको छोड़ देने वाले राना भीमसिंहकी । वह स्वयं उसीसे पकड़ लिया गया । जसवन्तसिंह राजाने औरंगजेव सदृश सांप को दूध पिलाते ' हुए उसका फल प्राप्त कर लिया; स्वयं ही वह उस सांपसे काटा गया । परन्तु शिवाजी आदिने तो ' अहिंसा परमो धर्म: ' इस मर्यादाको अतिक्रान्त करके ' ग्रार्जवं हि कुटिलेषु न नोति: ' ( नैषधचरित ५ । १०३ ) यह प्राचरण करके कि-कुटिल लोगों में सरलता नीतिविरुद्ध होती है, ठीक ही व्यवहार किया । इस कारण शास्त्रीय सामान्यकर्म भी सदा ही धर्म नहीं रहते, किन्तु देश - काल की अनुकुलतासे ही उनकी व्यवस्था करती है । ' यतोऽभ्युदयनःश्र यससिद्धिः स धर्म: ' ( वैशेषिकदर्शन १ । १ । २ ) इस धर्म - लक्षणको तुनासे सब कृत्य प्रकृत्य विधियोंकी परीक्षा करके तभी ' यह धर्म है, यह श्रधर्म " यह निर्णय देना ठीक होता है । प्रापातदृष्टि ( सरस - रीनिगाह ) से ' धर्म ' ' देखकर ' यह अधर्म ' है ' प्रथवा श्रापात दृष्टिसे धर्म ' देखकर ' यह धर्म है ' यह कहना कभी ठीक नहीं हो जाता । इससे उल्टा अपनी ही अनभिज्ञता अथवा अबहुश्रुतताका बोध होता है । परन्तु शास्त्रीय विधायक - निषेधक वाक्य उत्सर्ग ( सामान्यशास्त्र ) पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन २१ अपवाद ( विशेषशास्त्र ) न्यायसे गौरव - लाघक्का तारतम्य, तथ समष्टि व्यष्टिका हित - अहित निर्णीत करकेही उनकी व्यवस्था लगानी चाहिये । जिस कार्य में वैयक्तिकता में एककी हानि रूप अधर्म भी हो, परन्तु उसके द्वारा समष्टिका लाभरूप धर्म हो वह कार्य निर्दोष हुआ करता है । इसी कारण ही धर्म की गति ' सूक्ष्म ' मानी गई है । महाभारतमें कहा है-' श्र ुतिप्रमाणो धर्मोऽयमिति वृद्धानुशासनम् ' । सूक्ष्मा गतिि धर्मस्य बहुशाखा ह्यनन्तिका । ( २०६ । २ ) प्रारणान्तिके विवाह च वक्तव्यमनृतं भवेत् । अनृतेन भवेत् सत्यं सत्येनैवाऽनृतं भवेत् । ( ३ ) यद् भूतहितमत्यन्तं तत् सत्यमिति धारणा । विपर्ययकृतोऽधमः पश्य धर्मस्य सूक्ष्मताम् ' ( २०६ । ४ वनपर्व ) । ( धर्म की गति सूक्ष्म होती है, उसकी अनन्त शाखाएं होती हैं । कभी असत्य से भी सत्य हो जाता है, और सत्यसे भी असत्य । जिससे अधिक प्राणियों का हित है, वह सत्य है, इससे विपरीत असत्य है । यह धर्म की सूक्ष्मता है ) । श्रीमद्भागवतमें भी कहा है- ' स्वे - स्वेऽधि -कारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः । विपर्ययस्तु दोषः स्याद उभयोरेष निश्चयः ' ( ११ । २१ । २ ) ' देशका लादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम! गुरण - दोषो विधीयेते नियमार्थं हि कर्म-णाम् ' ( ७ ) । श्रीदेवीभागवत में भी कहा है- ' सत्यं न सत्यं खलु यत्र हिंसा, दयान्वितं चानृतमेव सत्यम् । हितं नराणां भवतीह येन, तदेव सत्यं न तथाऽन्यैव ( ३ ११ । ३५ ) । इस प्रकारकी व्यवस्था करने में असमर्थ, श्रापातज्ञानधारी, पर - प्रत्ययनेयबुद्धि वाली जनतामें धूर्त प्रतिपक्षी पुराणग्रन्थ-विरुद्ध अपना दुष्प्रभाव डालनेकी चेष्टा किया करते हैं । सनातनधर्मी उसमें उत्तर देते हैं; पर उत्तरके सूक्ष्म होनेसे साधा-ररंग जनताके हृदयपर उतना प्रभाव नहीं पड़ता । उसमें कारण CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 27

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 27 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) यह है कि - ' ताजमहल ' के गिरानेके लिए ४-८ श्राने लेने वाला मजदूर भी काफ़ी हो जाता है; परन्तु उसके निर्मारणार्थ बड़े-बड़े शिल्पियोंकी आवश्यकता पड़ती है, परन्तु उन शिल्पियोंसे बनाया हुआ उसका नक़शा भी साधारण जनताके मस्तिष्कमें नहीं घुस सकता । इसलिए धर्म - अधर्म के विषय में महाभारत ( वनपर्व ) में कहा है- ' धर्म ' यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुवर्त्म तत् । श्रविरोधात्तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम! ' ( वनपर्व १३१ । ११ ) विरोधिषु महोपाल! निश्चित्य गुरु- लाघवम् । न बाघा विद्यते यत्र तं धर्मं समुपाचरेत् ( १२ ) । गुरु- लाघवमादाय धर्मा-धर्मविनिश्चये । यतो भूयस्ततो राजन्! कुरुष्व धर्म निश्चयम् । ( १३ ) ( एक धर्म जो दूसरे धर्म को बाधित करे, वह धर्म न होकर कुमार्ग होता है । धर्मो में देखो कि- गौरव लाघव किसमें है? जिसमें गौरव हो; उस धर्मको करे । कुछ और भी विवेचना इसमें देखनी चाहिये- दूसरेकी कन्या के साथ मैथुन कर लेना पाप माना जाता है, और अपनी बहिन के साथ विवाह कर लेना भी पाप है; परन्तु श्राप पुरोहित-आचार्य आदि द्वारा वेदमन्त्रोंसे विवाहविधि पूर्ण हो जानेपर उस दूसरेकी लड़कीको मैथुनके लिए - एकान्त में ले जाते हैं; जो विवाहसे पूर्व प्रापकी बहिन के समान थी । कन्या वहीकी वही रही; उसमें बाहरी दृष्टिसे तिलमात्र भी अन्तर नहीं आया । पहले आपका उससे मैथुन पाप था; पर अब वही मैथुन वैध होगया । यदि प्रतिपक्षी इसी एक ही नियम को रखें कि दूसरे-की कन्या के साथ मैथुन पाप है; तब वे ग्रामरण ब्रह्मचारी ही रहें । अपने पिताको भी वे पापी मानें जिसने दूसरे की कन्यामें प्रतिपक्षियोंको पैदा किया । परन्तु जब प्रतिपक्षी वेदमन्त्रों में इतनी शक्ति मानते हैं कि - किसीकी कन्याको वे अपनी पत्नी CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन २३ बना सकते हैं, तब वेदमन्त्रोंके बनाने वाले परमात्मा, उसके अवतारों और उनके प्रकटकर्ता या स्वामी देवताओं में भी शक्ति है कि वे किसी भी स्त्रीको अपनी पत्नी बना सकते हैं । बल्कि परमात्मा तो उनमें निवास ही करता है । सोम, गन्धवं, अग्नि आदि देवता भी कन्याग्रोंमें रहा करते हैं; तब उन्हें पत्नी बना लेने वाले देवताओं में पाप नहीं माना जासकता । अब योनि लीजिये-- एक योनिकेलिए जो पाप होता है, वह अन्य योनिके लिए नहीं होता । बैल अपनी बहिन गायको गर्भ-वती कर दे, पाप नहीं माना जाता; श्राप उस गायको भी पापी न मानकर उसकी निन्दा न करके उसे पूजनीय ही मानते हैं । यह नहीं कहते कि यह गाय अपने पिता वा भाईसे गर्भवती हुई है, यह व्यभिचारिणी है, हम इसकी पूजा क्यों करें? यदि ऐसा है; तब सिद्ध हुआ कि भिन्न - भिन्न योनिमें समान नियम लागू नहीं होते; तब वह मानुषी नियम प्राप देव - योनियोंमें कैसे लागू करते हैं; उनके पापित्व वा व्यभिचारित्वका फतवा कैसे देते हैं? मनुष्ययोनिको ही ले लीजिये । शतपथ ब्राह्मण ( १४ । ४ । २ । ५ ) तथा मनुस्मृति ( १ । ३२ ) के अनुसार परमात्माने अपने दो भाग स्त्री - पुरुष बनाये । यह दोनों में धुनसे उत्पन्न नहीं हुए । इस प्रकार दयानन्दियोंके मत में भी स. प्र. अष्टम समुल्लास ( पृ. १३६ ) के अनुसार परमात्माने प्रत्येक जातिके दो युवा-जोड़े बना दिये । अव कहिये कि एककी सन्तान होनेसे वे दोनों प्रापसमें भाई - बहिन हुए या नहीं? एक ही माता के गर्भसे एक समय में पुत्र - पुत्री इकट्ठे हो जाया करते हैं, वे आपस में बहन - भाई होते हैं वा स्त्री - पुरुष? ' तब कहिये कि -प्रादिम स्त्री-पुरुषोंने भाई - बहन होते हुए भी मंथुनसे संसारको कैसे ' बढ़ाया? ' क्या वे व्यभिचारी थे? तब तो उनसे उत्पन्न Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 28

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 28 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) सारा संसार भी व्यभिचारज हुआ! फिर आप भी अपनी बहिन से मधुन वैध क्यों नहीं मान लेते? । आप इसमें कहेंगे कि आदिम स्त्री - पुरुष मंथुनोत्पन्न नहीं थे, जैसे कि स. प्र.८ समु. १३८ पृ. में स्वीकृत किया गया है । हम भाई - बहिन दोनों, माता - पिताके मथुनसे उत्पन्न हैं; अतः मैथुन - योनि तथा अमैथुन-योनिकी मर्यादाएं समान नहीं हुआ करतीं । " यदि ऐसा है तो योनि - देवयोनि तथा श्रमैथुनिक आदिम मनुष्ययोनि के लिए समान मर्यादा न होने से पुराणोंमें उन्हीं अम थुनिकों-का वर्णन होनेसे प्रतिपक्षी उनपर अंगुलि कैसे उठा सकते हैं? । देवताओं तथा मैथुन योनिकों का मैथुन वास्तविक नहीं हुआ करता; किन्तु मनोबलद्वारा मानसिक ही; तब मानसिक मनमें भला धर्म हानिकी चिल्लाहट कैसे की जाती है? इस-लिए वायुदेवने अञ्जनाको कहा था - ' न त्वां हिंसामि ( तव धमं भङ्ग न करोमि ) सुश्रोणि! मा भूत् ते मनसो भयम् । मनसास्मि गतो यत् त्वां परिष्वज्य यशस्विनि! वीर्यवान् बुद्धि-सम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति ' ( वा मी. ४ । ६६ । १७-१८ ) । इस प्रकार मानना पड़ेगा कि देवयोनि तथा श्रम थुनिक मनुष्य-योनिके लिए जिनका पुराणोंमें वृत्त बताया गया है - व्यवस्था अन्य होगी और मैथुनिक मनुष्ययोनिके लिए अन्य । मनुष्यों में भी सब वर्णोंकी व्यवस्था भिन्न - भिन्न हुआ करती है । ब्राह्मणका यज्ञ कराना, पढ़ाना और प्रतिग्रह ( दान लेना ) कर्म हैं, ब्राह्मणोंसे भिन्नोंका यह कम नहीं । द्विजोंका वेद पढ़ना धर्म है, और शुद्र आदियोंका अधर्म है । इस प्रकार पशुयोनिमें भी आपस में भिन्न - भिन्न धर्म हुआ करते हैं— ' मूत्र-पुरीषं गवां पवित्रतया परिगृह्यते, तदेव जात्यन्तरे परिवर्ज्यंते ' ( वेदान्त. शाङ्कर. २ । ३ । ४८ ) ( गायका गोबर - मूत्र पवित्र पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन २१ माना जाता है; ग्रन्य जातियोंका छोड़ा जाता है । ) इस सिद्ध है कि जो एकके लिए धर्म अथवा ग्राह्य हुआ करता है वह दूसरेकेलिए धर्मं वा अग्राह्य हुआ करता है । अव जातिको लीजिये । - हिन्दुजातिमें चाचा, मामा, बुझाई लड़की के साथ विवाह अधर्म माना जाता है, परन्तु मुसलमान जाति में वह धर्म है । दक्षिण में तो हिन्दुजातिमें भी मामा व बुनाकी लड़कीके साथ विवाह अधर्म नहीं माना जाता । हमारे जाति में शिखा - जनेऊ आदिका न रखना अधर्म माना जाता है । मुसलमान एक - दूसरेके जूठे पात्रोंमें खाते हैं, जल भी पीते परन्तु हिन्दु उसे घृणित मानते हैं । एक ही बात एक स्थान घा और दूसरे स्थान धर्म हुई । अव कहिये कि - श्राप एक ही विशे लक्षण अधर्म का और एक ही धर्म का क्या कभी सारे संसा के लिए बना सकते हैं? " द अथवा भिन्न जाति छोड़िये, समान जाति ही लीजिये समान जातिके धर्म - अधर्म क्या समान होते हैं? कभी भी नहीं । भ आप हिन्दुजातिको ही देखें । इसमें आर्यसमाज - सम्प्रदा म अशक्त - पुरुषकी स्त्रीका ( स. प्र. ४ पृ ० ७३ ), दीर्घरोगी पुरुषवं ज स्त्रीका ( स.प्र. पृ. ७४ ) पांच - छः वर्षसे अधिक परदेशमें रह वाले पुरुषकी स्त्रीका ( स. प्र. पू. ७३ ) दूसरे पुरुष द्वार मैथुन करवाकर दो सन्तानें अपनेको और दो सन्तानें दूसरे य दिलवाना धर्म मानता है, पर सनातनधर्म इस शास्त्रसे अस र मर्थित कल्पित - विधानको धर्म नहीं मानता । जब वे समाजी इस व्यभिचारको नियोगनामक धर्म कहते हैं; तब पुराणोंमें भी समझें कि वहां भी व्यभिचार नहीं है, किन्तु अं नियोग - नामक धर्म समझें । कलियुग में उसका निषेध होने त आर्यसमाजियों के मत में उसके धर्मं होने पर भी आजका व CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 29

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 29 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) उसमें इष्टापत्ति न होने से आजकल वह आचरण के योग्य नहीं । तब प्रक्षेप्ता आर्यसमाजियों के अनुसार भी पुराणोंमें व्यभि-चारदोष खण्डित हो गया । यह व्यभिचार है, या व्यभिचार नहीं; धर्म है या अधर्म है - इसमें शास्त्रीय परिभाषा ही प्रमाण होती है । द्विजों में विधवा के साथ विवाह, चाण्डालीके साथ विवाह, शिखा काट देना, यज्ञोपवीतका न पहनना सनातनधर्म-आर्यसमाज दोनोंके मतमें अधर्म है, लेकिन सुधारक इन बातों को धर्म मानते हैं । एक ही सनातनधर्म में कोई भस्मधारण धर्म मानता है, दूसरा चंदन धारण करना । वह वह अपने से विपरीत दूसरे के कार्यको अधर्म मानता है । एक ही श्रार्यसमाज में किसी समय मांसपार्टी और घासपार्टी यह दोनों पार्टियां एक - दूसरेकी प्रति-द्वन्द्वनी थीं; और अपनी - अपनी भक्ष्य वस्तुको प्रदुष्ट मानती थीं । ब सभीका इतिहास, महाभारत के समान; लिखा जावे तब भावी सन्तानें इनमें किसीके शुभ माने हुए कार्यको भी अधर्म मानेंगी, और किसीके प्रधर्म माने हुए कार्यको भी धर्म मानेंगी । जातपातको सभी प्राचीन लोग धर्म मानते हैं; पर जातपात -तोड़ - मण्डल तथा उनके समर्थक उसे अधर्म मानते हैं । यह हाल है एक हिन्दुजातिका । इस प्रकार मुसलमान आदि जाति-योंमें भी जानना चाहिये । फलतः पुराण में भी इस प्रकार दृष्टिको रखने से आज पुराणों की कोई वात किसीको अभद्र दीखती है, दूसरेको भद्र । अव सूक्ष्म - जातियों में विचार कीजिये । देवता, मनुष्य, ऋषि यह भिन्न - भिन्न जाति हुआ करती हैं । ( देखिये ' आलोक'का तृतीय पुष्प ' वेदकी ऋषिकाएं ' मं ) । मनुष्यों में भी कोई योगी, वा मुनि होता है; कोई उससे भिन्न साधारण । क्या आप इन CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन २६ साधारण - प्रसाधाररण दोनोंके समानधर्म कह सकते हैं? योगियों द्वारा ऋषि, मुनियादि तपस्वियों द्वारा कोई पाप हो भी गया हो; वह पाप उनको जला नहीं सकता; बल्कि वे ही अपनी तपस्या-से उस पाप वा उसके फलको जला दिया करते हैं । देखिये इस-पर मनुस्मृति - ' यत्कििञ्चदेनः कुर्वन्ति मनोवाङ्मूतिभिर्जनाः । तत् सर्वं निर्दहन्त्याशु तपसंव तपोधनाः ' ( ११।२४१ ) ' वेदाभ्यासो-ऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा । नाशयन्त्याशु पापानि महापातक-जान्यपि ' ( ११ । २४५ ) “ यथैवस्तेजसा वह्निः प्राप्तं निर्दहति क्षरणात् । तथा ज्ञानाग्निना पापं सवं दहति वेदवित् ' ( ११ । २४६ ) । भगवद्गीता में भी कहा है - ' अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पाप-कृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं ( पाप ) संतरिष्यसि ' ( ४ | ३६ ) यथंधांसि समिद्धोग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन! ज्ञानाग्निः सर्व-कर्मारिण भस्मसात् कुरुते तथा ' ( ४ । ३७ ) जव मुनि श्रादि इस प्रकार हो गये हुए पापको भी जला डालते है; उनको फिर भी पापी कहते हुए प्रतिपक्षी क्या स्वयं पापी बनना नहीं चाहते? अब कहिये कि क्या ग्राप साधारण - पुरुषों तथा ऋषि - मुनि-योगियोंकी समानता कदापि कर सकते हैं? यदि नहीं; तब जब उनके साधारण लोगों वाले सीमित अधिकार नहीं हुआ करते; उनमें देवताओंका कहना ही क्या है? तव फिर उनपर प्रत्या-लोचना करने वाले अनधिकार चर्चा के कारण शोचनीय हैं । आप किसी पुरुषको मार दें; या अग्निदेव किसी पुरुषको जला दे, विद्यतु ( इन्द्रदेव ) किसीके प्रारण हर ले, जलदेव वरुण किसीको डुबा दे; वायुदेव बहुत शीतल होकर किसीको डबलनि-मोनिया द्वारा मार दें; तब क्या श्रापको और इन देवोंको समान फन मिलेगा? 1 | मनुम तो वैसा करनेसे पापी माना जावेगा; पर इन्द्र, अग्नि, वरुण यादि देवता पापी नहीं माने जावेंगे । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 30

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) आप किसी पर - स्त्री के गुप्ताङ्गको हाथसे छू लें, सूर्य भी अपने करों ( हाथों, किरणों ) से उसे छुए; आप तो उसमें पापी माने जावेंगे, सूर्य देव नहीं । ग्राप किसी परस्त्रीसे मैथुन कर लें, आप व्यभिचारी माने जावेंगे, परन्तु आपकी वा स्त्रियोंकी गुप्तेन्द्रिय में ठहरा हुआ, और उसे प्रवृत्त कर रहा हुआ, अथवा उसमें ध्यापक परमात्मा कभी भी व्यभिचारी नहीं माना जावेगा । आप किसीका उपकार कर दें; श्रापको पुण्य होगा, परन्तु वरुणदेव किसी के खेतको जलसे बढ़ाकर उसका उपकार कर दे; अग्निदेव किसीके भोजनको पकाकर उसकी तृप्ति में सहायक होकर उसका उपकार कर दे; वायुदेव किसीका स्वास्थ्य वा पोषरण करके उसका उपकार कर दे; इससे वरुण, अग्नि, वायु, आदि देवोंको पुण्य नहीं हो जाता । इससे सिद्ध है कि देवता, ऋषि - मुनि आपकी दृष्टिसे अधर्म करते हुए पापी नहीं, पुण्य करते हुए भी पुण्यफलभागी नहीं; क्योंकि - ' वे भोगयोनि होनेसे शास्त्रोक्त विधि - निषेघसे परे होते हैं । इसलिए कहा है- ' निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतां को विधि: को निषेधः? ' अथवा प्रत्यालोचना करने वाले यही विचारें कि - ' वे गला फाड़ फाड़कर पुराणों में ' व्यभिचार - व्यभिचार ' जो चिल्लाया करते हैं; उसमें यह विचारणीय है कि यह व्यभिचार है और यह व्यभिचार नहीं; इसमें आपके पास प्रमारण क्या है? आप दूसरेकी कन्या - अपनी स्त्रीसे होते हुए अपने मैथुनको व्यभिचार नहीं मानते; पर अपनी कन्या वा दूसरेकी स्त्रीसे दूसरे द्वारा हुए मैथुनको व्यभिचार मानते हैं; यह क्यों? यदि आप यहां शास्त्र-की दुहाई दें कि शास्त्र ग्रन्यकी लड़की परन्तु अब विवाहसे हुई अपनी स्त्रीसे मैथुन की आज्ञा देता हैं; यतः विधि होनेसे वह धर्मं है । परस्त्रीसे शास्त्र मैथुनका निषेध करता है; अतः पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन निषेधवश वह अधर्म है । तब संन्यासी यदि किसी लड़की से विवा कर ले; और अपनी स्त्री बनी हुई उससे मैथुन करे; तो वा ग्राप इसे धर्म मानेंगे! शास्त्र ऋतुकालगामीको ब्रह्मचारी कहत है; तब ऋतुकालसे भिन्न स्वस्त्रीगमन करने वाले आप को व्यभिचारी मानेंगे? । स्पष्ट है कि - एतदादिक व्यवस्था बहुश्रुतकी समझ में नहीं आ सकतीं; तब देवता, योग ऋषि, मुनियोंके लिए इन विषयों में शास्त्रीय विधि - निषेध न हो से वह कर्म न धर्म माना जा सकता है, न अधर्म । श्रर्थात् व्यभिचार - प्रव्यभिचार कुछ भी नहीं कहा जा सकता | साध ध रर पुरुषोंके लिए उस विषय में शास्त्रीय निषेध होनेसे उन ( लिए वह कर्म अधर्म वा व्यभिचार होता है; पर साधारण विधि न निषेधोंसे ऊँचे उठे हुए ऋषि, मुनि, तथा स्त्रियोंमें सूक्ष्मरूपं मा व्यापक देवता दोषबन्धनकी सीमामें नहीं आ सकते; तब वैस घा वर्णन करने वाले पुराण भी दूषित नहीं किये जा सकते — य स्व सूक्ष्मदृष्टिसे विचारणीय है । कहने का यह निष्कर्ष है कि जो पुराणोंको दूषित करनेवा हो हैं, उन्होंने दोषारोपण एक काला चश्मा अपनी आंखों पर चह रखा है । तब उन्हें पुराण में दोष - कालिमाके विना अन्य व दीखे? हाँ, आप हमारी कही कसौटी को अपने पास रखें; त अ प्राप पुरारणकी अपने मत के अनुसार कुत्सितसे कुत्सित कथा व्या देखें; स्वयं ही उसकी परीक्षा हो जावेगी । ग्रापको इस देव काल, पात्र में जो दोष प्रतीत होगा, वही उस देश, उस काल हिन उस स्थान, उस योनि, उस जाति में, और उस अधिकारी में दो हर नहीं प्रतीत होगा । इसलिए महाभारत ( शान्तिपर्व ) में सप खुल कहा है- ' भवत्यधर्मो धर्मो हि धर्माधर्मो उभावपि । कारणाद् देश उन कालस्य देशकालः स तादृश: । ( ७८३२ ) मैत्राः क्रूराणि कुर्वन्तं कह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative