श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मालोक ७
7 Shri Sanatana Dharma Lok Vol-7 By Devnath Sharma Shastri 1962- Sanatan Dharmalok Karyalay · 510 पृष्ठ · 51 खण्ड
In English
Sanatana Dharmalok Volume 7
This book is the seventh volume of a series titled Shri Sanatana Dharmalok, written by Pandit Dinanath Sharma Shastri. It contains critical and logical discussions regarding the Puranas, history, and Vedas to address misconceptions and criticisms found in ancient literature.
This book answers
- What are the critical views on puranas and history in sanatana dharma?
- How can one resolve doubts regarding the vedas and ancient scriptures?
- What is the scholarly critique of historical texts in hindu tradition?
विषय सूची
- IIIIIIIIIII IIIII - 1 nkur Joshi Collection Gujarati An eGangotri nitiative CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative CC - 0. Ankur… 1–10
- ग ) तो उन्हें अपने होगी । कई बातें पूर्वके पृष्ठोंमें छूट गई थीं; हमने श्रागेके चित कपृष्ठों में टिप्पणी में, उनका निर्देश कर दिया है, एतदर्थं पाठकों वा… 11–20
- १० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) । भारत सदा सुकर्म नहीं रहता । बहुत क्या कहा जाय; उसी देश तथा पर यूरो समाज में वही कर्म भिन्न कालमें कुकर्म हो जाया करता है… 21–30
- ३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जयन्ति स्वर्गमुत्तमम् । धर्म्याः पापानि कुर्वारणा गच्छन्ति परमां गतिम् ' ( ३३ ) इसका श्री सातवलेकर - कृत अर्थ यह है - '… 31–40
- ५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) तो मेरा समागम होगा ' । संस्कृतपत्र यह है - ' ग्रहमप्यत्र पञ्चवि -शतिदिनानि (? ) स्थातुमिच्छामि, एतदन्तराले समये ऋत्रागमि-ष्यति… 41–50
- ७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पुत्रीको तीसरी तामस प्रकृति को ' कन्या ' । इस चार प्रकारकी प्रकृतिसे चार प्रकार की सृष्टि हुई… 51–60
- ६० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) सद्ध हो मानकर • वस्तुस्थिति को समझने का प्रयत्न करना चाहिये । यह है एकदेशीमत भी विचारणीय है… 61–70
- १०५ ११० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ज्योतिलि विध्वंसक, हस्तलिंगधृक्की चर्चा चारों वेदोंमें कहीं नहीं है के लेख ( श्रीकुशवाहा ' शिवलिंगपूजा - पर्यालोचन'में ).… 71–80
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १३० देवको ही सबसे बड़ा बताया गया है, एकको बड़ा बतानेसे दूसरा अपने आप छोटा बनाकर निन्दित कर दिया जाता है… 81–90
- १५० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) १४ बुद्धिमानोंको ये पत्थरके शिवलिंग नहीं पूजने चाहियें - यह ज्य सम पुराणका स्पष्ट आदेश है… 91–100
- १७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) कैसे है । इसमें एक - दो उदाहरण देख लेने चाहियें । श्रीपरशुराम अवतार थे… 101–110
- १५ १६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जनवञ्चनाको दिखलाया गया, और सिद्ध किया गया कि ब्रह्माने सः । पुर तो राधाका त्यका बा चार कैसा को मारा ( पृ. २६ ) में क्षी… 111–120
- २१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) गालियां सुनाई हैं; जिससे स. प्र. की तोंद भर गई; श्रीर प्रति-रण ( ब्रह्मा पक्षीकी क्षुद्रपुस्तिकाओंों की भी… 121–130
- शिवपुराराट्री में- शिवसे " सकलस्तन वाशिराकार कारंत परः । श्रि प्रत्वात् तर.. लिंगे नारा यान्ये देवता-लिया होगा । नहीं । स. समान है… 131–140
- २५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नोंकी वह खण्डित हो गया । कर्म स्था भी अस्तु! परमात्मा अंगी है, और देवता अंग । अंगीकी पूजा अपने स अंगके विना नहीं हो सकती… 141–150
- २७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नोंमें ऐसा से छिपकर ही कुकृत्य करता है । वस्त्राने वहां यह लिखा है कि लिंग गिरा, और ब्रह्माण्डमें अन्धकार दमार्ग विनं हो गया… 151–160
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २५ । २६० पुत्र स्खलुः सस्वतनोनृ णां स्युः ' ( १ । २ । २३ ) कैवल्योपनिषद्में भी ति मां कु कहाँ है - ' से ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः स… 161–170
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) ३१० १४ २० । २३ ) जघनसे पैदा होनेसे वे जघन्य हुए । तब वे फिर रेमे | ४ | १२ ३ | - इसमें कोई ग्रनुपपन्नता नहीं… 171–180
- श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ३२८ पद्य मिलते हैं । वह रति ( आनन्द ) उस काली स्त्री क्षयेन्नित्यें इस तरहके उससे क्रूरता कैसे हुई? क्या प्रतिपक्षीका गोमांसभ को… 181–190
- श्रीमानधर्मालोक ( ७ ) ३४८ शिव वा विष्णु एकही परमेश्वरके नाम - रूपके भेदसे शक्ति-ह्नवीतीरे विशेष हैं । पर यह विचार उच्चकोटि का है… 191–200
- श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ३६८ कोई हुई ही नहीं । कामक्रीडा तो प्रतिपक्षी उद्देश्य प कामक्रीड़ा यहां में बसती है, जहां - तहां उसे कामक्रीडा ही केही दिल -… 201–210
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३५७ ३८८ ११ । १८-१६ ] इन वचनों में तपस्वी ऋषि-' यवनों ' पर तमाः ' [ सूत्रस्थान त्रिकालदर्शी एवं अव्यवहित - दृष्टि कहा है । वहीं है… 211–220
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४०८ जनक दर्शनीय! हम लोगोंने अपनी अल्पशक्तिसे सोमवल्ली ग्रादि की यो ग्रोषधियोंका वायो उत्तम रस सम्पादन किया है यह सब प्राप-यरण… 221–230
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४२७ क्या उसको ४२८ से अविमृष्टविधेयांश - दोष उपस्थित होता । ता हो जाने नहीं; और हो भी नहीं सकता; क्योंकि - पार्वती लिखा अतः यहां यह… 231–240
- श्रीसनातनधर्मालोक - ( ७ ) ४४७ ४४८ ९ ) विलक्षण बेटे - पृष्ठ २२ - २३ ) प्रतिपक्षीका यह जन. - ( क ) छुआछूत न माने वाला प्रतिपक्षी शरीरकी मैल निरुक्कानुसार… 241–250
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ४६८ वैराणि क्यों परस्पर विरुद्धता कर रहा है? यथा तव ' निर्दे समाज - लेखक कोई पुस्तक बनाकर मृतक स्वा. द. को रहता है; पुस्तक समर्पित… 251–260
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) -पक्षमें नि YER उपासनासे होता है, केवल अभिधा-तथा व्यञ्जनावृत्तिकी करने वालों, तथा केवल खण्डनात्मक दृष्टि-तो उस वृत्तिकी उपासना को… 261–270
- श्रीसनातनधर्मालोक( ७ ) ५०८ यथाऽऽलि सो यहां यह तात्पर्य है कि - मट्टी - जलसे भी अपनी शुद्धि २४ करो, और अर्थ -शुद्धि भी रखो । ग्रमानत में खयानत मत करो… 271–280
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १२८ चंसं गायत्री जो कि पूर्वपक्षी काल ( समय ) और सूर्यका लड़का T? । ' आत्मा यमको करते हैं, सो काल जड है… 281–290
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५४७ ५४८ डरते; तथापि निश्चय जानो कि वह अधर्माचरण के अवसर धीरे घसे - धीरे नहीं तुम्हारे सुखके मूलोंको काटता चला जाता है… 291–300
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५६७ ५६८ का इतना भोज्यं च यद्वा दुश्चरितं मम । सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां चं रिश्चन्द्रके प्रतिग्रह ं, स्वाहा ' इत्यादि उद्दे श्यसे… 301–310
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ५८७ 855 नहीं किया ' राजा दृष्ट्रा तु दर्पण न गत्वा न ननाम पजाः समा. को भी नमस्कार नके बाबू भी साधारण भक्तोंसे भगवान्का यह पद्य… 311–320
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६०७ ६०८ गो सन्देह निवृत्त कर सकते हैं 1 । यदि वेदके ही सभी शब्द बनाये - महिमासे अपना हैं, वेदसे भिन्न नहीं; तो ' आर्यसमाज, दयानन्द… 321–330
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६२७ ६२८ " दृष्ट्वैव ' कर्मा ' आया है, उसी के बलसे वह स्त्रीभावके गुणसे भी सद्यः भूषित ( उपरिचर स हो गई… 331–340
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६४७ ६४५ दारसंग्रहे । भ्रातृभिश्चिन्त्यमानानां ते हि नो दिवसा ' में भी कहा पादेषु नूतने… 341–350
- श्री सनातनधर्मालीक ( ७ ) ६६५ ६६८ मीमांसासे ' जो कि कई व्यक्ति ' अध्यात्मरामायण ' ' वाल्मीकि रामायण ’ ताकी छठा की कई अन्य ग्रन्तः - साक्षी तथा ‘ कल्कि -… 351–360
- ६५७ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ६८८ द्वारा चुराई रामकी ( विवाह १५ वर्षके अनुसार ) बयालीसकी और श्री-उसे मार- सीताकी ( विवाहमें छः वर्ष के अनुसार ) तैंतीस… 361–370
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७०७ ७०८ ममता भी बढ़ती है । तब पूर्वके संयम के अभ्यास से स्त्री-इसकी स्व- | परस्पर दिनोंमें भी पति संयम कर सकता है… 371–380
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) 025 ७२७ कहा था कि - ' मा मां नरेन्द्र त्वमधर्मभाज प्रदेशके अनुसार जंचता धर्मोऽयम शिष्टदृष्टः… 381–390
- exer हम यथाधिकार | इस प्रोर हमारे जनताको अपनो दिया है । श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) पहनते हैं । सब शास्त्रोंका मूल वेद ही हैं… 391–400
- ७६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७६७ • वैदिक शब्दोंकी प्राप्ति कहांसे होगी? वस्तुतः वे शब्द इन चार म्नाताः ' वेदपोथियों से भिन्न लुप्त, प्रलुप्त वेदसंहिता तथा… 401–410
- ७८७ 955 श्रीसनातन धर्मलोक ( ७ ) ८, टीका फिर तो व्याकरण पर प्रश्न करनेके समय श्रष्टाध्यायीमें जी. न कर स्वा. द. जोने उस मैथिलपर महाभाष्य में प्रश्न कर… 411–420
- ८०७ 505 श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) रह जायगी । [ संस्क ' वेदसंज्ञाविमर्श ' के द्वितीय अंशमें स्वा. " श्रीकरपात्रीजीसे का संशो. ‘ ब्राह्मणभागको वेदता '… 421–430
- ८२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८२७ सायरण ने ‘ आशा छोड़के ' तथा ' ' बाकी पुरुषों में से ' यह अर्थ नहीं " ' दूसरे किया था, पर स्वामीने वेदके विरुद्ध अनर्गल… 431–440
- ८४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८८७ ( पृ. २७१ ) संन्यासीको वित्तैषणाका ५ समु ० पृ ० ७८-७९ में स्वामीने इसका त्याग अर्थ कहा लिखा है है-… 441–450
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८६८ ८६७ मपत्य स्याद् बहुलं चेत्यचिन्तयत् ( १ । २३१ । १५ ) स चिन्तयन् ने भी अभ्यगच्छत् सुबहुप्रसवान् खगान्… 451–460
- दद श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) थी । उसे वायुने एक रूपमें किया । अतः उसके पति भी १० रूपों की एक समष्टि थी, तभी वहां उन्हें ' एकनाम्नः प्रचेतसः ' कहा गया है… 461–470
- श्रोसनातनधर्मालोक ( ७ ) २०७ ६०८ उन्हें यह उपाधियाँ तो न दिलवा सकता । दीने रहने पर तो वादी को राक्षस कैसे बतावे? वह अपने पुराण भला अपने अनुक्कूलों वैसे… 471–480
- ७ ६२८ ' श्रीसनातनधर्मालांक ( ७ ) - ) २०६ - २१० ' श्री शंकराचार्य निश्चित प्रच्छन्न बौद्ध थे, इस विषयमें इसी पुष्पके १०३ – १०७ पृष्ठमें देखें… 481–490
- ६४८ श्रीसनानधर्मालोक ( ७ ) मानने वाले विद्यार्थीजी नियोग ' को वेश्याकर्म ' मान लें 1 वहाँ यह मत दंत्योंका दिखलाया गया है… 491–500
- ६६७ श्रीसनातनधर्मालाक ( ७ ) दाँ ६६८ दाँत जो लोग पुराण में ग्राई मनुष्योंके बड़े आकार वाले होनेकी वाले बातें गप्प बताते हैं, उन्हें इस शक्तिमय - समयके आकार… 501–510