सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 161–170

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 161–170

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २५ ॥ २६० पुत्र स्खलुः सस्वतनोनृ णां स्युः ' ( १ । २ । २३ ) कैवल्योपनिषद्में भी ति मां कु कहाँ है - ' से ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः स एव विष्णुः ( १।८ ) के पुत्रों एक अन्य भी गम्भीर कारण है । वह यह है कि - कल्पोंके कहा- ' भा भिन्न - भिन्न होनेसे गुणोंकी विषमता के कारण कभी सृष्टिकर्ता क्षाद्मा वा प्रधान शिव होते हैं ( यह शिव पुराण में स्पष्ट है ), किसी हुए हो कल्पमें ब्रह्मा प्रधान होते हैं, और किसी कल्प में विष्णु । कल्पमें आदि - कारण होगा, वही मुख्य होगा, वही पिता कहा-वेगा । शेष दो उसके अधीन, एवं गौरण होनेसे पुत्र कहावेंगे । नम् ' ( शिव ) इस कल्पभेद - व्यवस्था में प्रतिपक्षिप्रोक्त कोई भी विरोध नहीं रह हा है । पाता । यह केवल हम ही नहीं कहते, देखिये - पुराण स्वयं कहता २६ ) यह है - त्रयस्ते ' ( ब्रह्म - विष्णु - रुद्राः ) कारणात्मानो जाताः साक्षा-परमात्मान महेश्वरात् । चराचरस्य विश्वस्य सर्गस्थित्यन्त हेतवः ' ( शिव. को वायवीयसं. पू. १३ । १३ ) ' लब्ध्वा सर्वात्मना तस्य प्रसादात् मायया परमेष्ठिनः । ब्रह्मनारायणौ पूर्वं रुद्रः कल्पान्तरेऽसृजत् ' ( १३ । १७ ) और विष्णु क यहां रुद्र - द्वारा एक कल्प में ब्रह्मा और विष्णुका उत्पन्न करना ही है, कहा है । ' कल्पान्तरे पुनर्ब्रह्मा रुद्र विष्णू जगन्मयः ' ( १८ ) यहां ह अन्य कल्पमें ब्रह्मा द्वारा रुद्र और विष्णुकी उत्पत्ति कही गई लों में पिज्ञा है । ' विष्णुश्च भगवान् रुद्रं ब्रह्माणमसृजत् पुनः ' ( १३ । १८ ) आई है कि यहां किसी कल्पमें विष्णुद्वारा रुद्र और ब्रह्माकी उत्पत्ति बताई दादा, प गई है । ' पद्म ' भविष्यति सुतः कल्पे तव पितामहः ' ( रुद्रसं. सृष्टि-ह्मा है, कि ९ । ६४ ). यहां पर पाद्म- कल्प में ब्रह्माको विष्णुका लड़का लगे । बताया गया है । श्रीमद्भारू.. ' नारायणं पुनव्रं ह्मा, ब्रह्माणं च पुनर्भुवः । एवं कल्पेषु - कल्पेषु : परः पुस ब्रह्म - विष्णुमहेश्वराः ' ( १ ९ ) परस्परेण जायन्ते परस्परहितैषिणः । श्रेयांसि ता तत्तत्कल्पान्तवृत्तान्तमधिकृत्य महर्षिभिः ( २० ) प्रभावः कथ्यते तेषां परस्परसमुद्भवात् ' ( १३ । २१ ) ' प्रजापतिश्च विष्णुश्च रुद्रावती CC - 0. Ankur Joshi Collection कौन पिता? २६१ परस्परम् । सृष्टौ परस्परस्याङ्गाद् इति प्रागपि शुश्रम ' ( १३ । ७ ) इन पद्योंसे प्रतिपक्षीका पुराणखण्डनात्मक पक्ष सर्वथा चूर्ण हो जाता है, पर यह लोग ( प्रतिपक्षी ) भी दयनीय हैं, संस्कृतका पूर्ण-ज्ञान इन्हें होता नहीं, बहुश्रु त यह होते नहीं; वेद - पुराणकी सम-न्वयात्मक दृष्टि उनसे कोसों दूर रहती है । केवल पूर्वापरप्रकरण-विरहित कई तीव्र मालूम होने वाली बातें अपनी नोटबुकमें नोट कर लेते हैं; और अपने पेट भरने के लिए छोटे - छोटे ट्रेक्ट अवोध जनतामें बाँट कर उसको गुमराह करनेका पाप कमा रहे होते हैं; और भ्रान्तों में होहल्ला हो जानेसे अपनी स्तुति समझ लेते हैं । वह स्तुति भी इन्हें मिलती नहीं । एक कविने क्या हो ठीक कहा है- ' प्रद्यापि दुर्निवारं स्तुति - कन्या वहति कौमारम् । सङ्ख्यो न रोचते साऽसन्तस्तस्यं न रोचन्ते ' ( स्तुति नाम वाली कन्या अभी तक भी क्वारी है । सत् - पुरुष उसे पसन्द नहीं करते और वह असत् पुरुषों को पसन्द नहीं करती । इसलिए वह अभी भी कुमारी हो है । ) देवता एक दूसरेके उत्पादक होते हैं - इस विषयमें प्रतिपक्षी निरुक्तका प्रमाण भी देख ले । उसमें लिखा है- " अपि वा देवध = र्मेण इतरेतरजन्मानौ स्याताम् इतरेतर - प्रकृती ' ( ११ । २३ । ४ ) अर्थात् देवताश्रम एक धर्म यह भी होता है कि एक - दूसरेको वे पंढर करते हैं । यह बहुत स्पष्ट वचन है; इस विषयमें यह वेद - वचन भी निरुक्तने प्रमाणित किया है- ' प्रदितेर्दक्षो प्रजायत, दक्षाद्व-द्वितिः परि ' ( ऋ. १० । ७२ । ४ ) । निरुक्तने बताया है- देवधर्मं-वश देवता एक - दूसरे को भी पैदा करते हैं । दक्षसे अदिति पैदा हुई, और वह उसकी पुत्री हुई, और प्रदितिसे दक्ष पैदा हुआ, वह उसका पुत्र माता जाता है । वृक्षसे बीज पैदा होता है, बीज से वृक्षाः । इस प्रकार वेदभाष्य रूप पुराणों में भी समझा जा सकता Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 162

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २६२ पिता वही पुत्र बन जाता है - ' स पिता स पुत्र: " है । वही प्रतिपक्षी बहुश्रुत बन इन सबको ( ऋ. १ । ८६ । १० ) यदि को छोड़कर सना-निष्पक्ष - दृष्टिकोण से पढ़े, तो वह आर्यसमाज तनधर्मी बन जाए । पर वृत्ति और उससे मानकी प्राप्तिकी आशा बीचमें बाधक बन जाते हैं । फलतः जिस कल्पमें ब्रह्मादियों में जो देव बड़ा होता है, उस पुराण उसीकी शेष दोकी अपेक्षा महत्ता ( पितृता ) कल्पका बताता है; जैसे सृष्टि पञ्चभूतात्मक होती है । जिस भूत में प्रलय होता है; प्रलयान्त में सृष्टिकी आदिमें फिर उसी भूतसे अन्य भूतों-की उत्पत्ति बताई जाती है; इसलिए पहले कहीं श्राकाशपूर्विका सृष्टि आती है, और कहीं अग्निपूर्विका, कहीं जलपूर्विका । इसी प्रकार इस त्रिगुणात्मक - सृष्टिमें जिस गुरणवाले देवतात्व में प्रलय होता है, सृष्टिको प्रादिमें फिर वही देवता बड़ा बनकर उप-स्थित होता है । इन बातोंका यदि प्रतिपक्षी सम्यक् विचार कर ले; तो उसे अल्पज्ञ - लोगोंको गुमराह करनेकी आवश्यकता न पड़े । अब वह समझ गया होगा कि तीनों देवोंमें किसका बाप बननेका दावा सच्चा है? पुराण में प्रतिपक्षियोंसे किये जाते हुए सभी प्राक्षेपोंके परिहार हैं; पर उन्हें पूर्ण पढ़नेसे वे स्फुरित होते हैं । पूर्वापर- प्रकरण छोड़ देने से अथवा अदूरदर्शितावश उनसे भ्रम बढ़ जाता है । प्रतिपक्षी यही करके अपना पेट भर रहे हैं! प्रतिपक्षीको सदाकेलिए यह भी याद रख लेना चाहिये कि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव तीनों अपने - अपने स्थानमें बड़े हैं । किसीका परस्पर अंगांगिभाव वास्तवमें नहीं । आपसमें कोई विरोध भी नहीं । जहां परस्पर अंगांगिभाव प्रभात होता ही; वहां वह उनके अंशोंका समझना चाहिये । वे भी ब्रह्मा, विष्णु, महादेव कहे जाते CC - 0. Ankur Joshi Collection पिता कौन? २ ९ ३ हैं | साहित्य के उच्च - ग्रन्थ: काव्यप्रकाश में एक प्रश्न श्राता जबकि रस स्वप्रकाश तथा आत्ममात्रविश्रान्त, वेद्यान्तरस्पर्शन है कि एवं प्रखण्ड माना जाता है; तब एक समयमें दूसरेके न या सकने न तो परस्पर - अंगांगिभाव हो सकता है, न परस्पर विरोध फिर रसोंका परस्पर विरोध कैसे दीखता है? इसपर । उत्तर दिया गया है कि यह ठीक है । जहांपर रसोंका वहां विरोध दीखे, वहां रसोंका विरोध न होकर रसके स्थायिभावों- परसर का विरोध समझना चाहिये । उन स्थायिभावोंको भी ' रस ' बह जाता है । इसी प्रकार ' रसो वे स: ' ( तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्मा-नन्दवल्ली २, सप्तम अनुवाक, तैत्तिरीयारण्यक ८।२७ रसस्वरूप परमात्माके विषय में भी समझना चाहिये । जैसे रस अखण्ड होता हुआ भी नौ भैद रखता है, वैसे ही रसस्वरूप परमात्मा अखण्ड होता हुआ भी ब्रह्मा, विष्णु, महे यह तीन सगुणरूप रखता । अद्वैततावश तीनों एक है । श्रात्ममात्रविश्रान्त होनेसे इनका परस्पर अंगांगिभाव वा विरो नहीं हो सकता; तब जो कहीं वैसा आभास हो; वहां इनके उन्हीं नामों वाले अंशोंका ही तथात्व जानना चाहिये । भी उसी नामसे कहा जाता है । इनमें पुराणका हो संबै देखिये- ' मूल - रुद्रस्यांशभूतो रुद्रनामा द्वितीयकः । सोपि पूज्योति सर्वेषां मूल - रुद्रस्य का कथा? ' ( देवीभागवत ५ । १ । २६ ) । शिवपुराण रुद्रसं. खण्ड १ में भी कहा है- ' महाप्रलयकृद् छ विश्वात्मा ( मम शिवस्य ) हृदयोद्भवः ' ( १० । ५७ ) । वस्तु मूलरूपमें एक होनेसे शिव - विष्णु आदि में कोई भेद नहीं । " शिवस्य हृदयं विष्णुर्विष्णोश्च हृदयं शिवः । एकमूर्तिस्वरे देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा: ' ( पद्मपुराण भूमिखण्ड ७१ २१-२ * यो हरिः स शिवः साक्षाद् यः शिवः स स्वयं हरिः । एतयोर Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 163

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२६१ २६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) है कि मातिष्ठन् नरकाय भवेन्नरः ' ( देवीभाग. ३ । ६ । ५५ ) ' गुणेभ्यः रस्पर्शसून क्षोभमाणेभ्यस्त्रयो देवा विजज्ञिरे । एका मूर्तिस्त्रयो भागा ब्रह्म-प्रा - सकनेसे विष्णु - महेश्वराः ' ( मत्स्यपु. ३ । १६ ) इससे प्रतिपक्षोकी सब द - विरोध । शङ्खानोंका समाधान हो गया । २३ । सपर वहां तामस - ग्रास्त्र (? ) परसर -थायिभावों ( ३३ ) प्रश्न- पद्मपुराण में न्याय, वैशेषिक, सांख्य इनको ' रस ' कहा तथा मत्स्य, कूर्म, लिंग शिव, स्कन्द, अग्नि आदि पुराणोंको नषद् ब्रह्मा- नरक में ले जाने वाले तामस - शास्त्र बताया है । हेतु वा प्रमाणसे = 1२10 पुराणके इस दावेको सिद्ध करें । २४ । / उत्तर— पुराणोंके विषय में प्रतिपक्षीको यह श्लोक इष्ट मालूम है, वैसे ही होता हैं - ' पुराणानि च वक्ष्यामि तामसानि यथाक्रमात् । मात्स्यं कौमं तथा लैंग, शैवं, स्कान्दं तथैव च । श्राग्नेयं च षडेतानि ष्णु, महेश एक है । तामसानि निबोध मे ' ( पद्म उत्तर. २३६ । १६-१७ ) इन पुराणों-वा विरोध को तामस बताया है । ' वैष्णवं नारदीयं च तथा भागवतं वहां इनके शुभम् । गारुडं च तथा पाद्म वाराहं शुभदर्शने! सात्त्विकानि ये । पुराणानि विज्ञेयानि शुभानि वै ' [ १७-१६ ] यह सात्त्विक - पुराण ही संकेत बताये गये हैं । ' भविष्यं वामनं ब्राह्म राजसानि निबोध मे [ २० ] पूज्योति यह राजस - पुराण बताये गये हैं । इसी प्रकार कई दर्शनों को १ । २६ ) । तामस बताया है । यकृद् इस विषय में हम अग्रिम प्रश्नके उत्तर में प्रकाश डालने वाले

। वस्तुत हैं । वस्तुतः एतदादिक अर्थवाद - वाक्य हैं । वहीं पर [ ६ । २३६ ॥

भेद नहीं । ३-४ ] पाशुपतदर्शन [ ३ ] चार्वाकदर्शन [ ५ ] बौद्धदर्शन [ ५ ], कमूर्तिस्त्र मीमांसादर्शन [ ११ ] को भी तामस बताया गया है । प्रतिपक्षी २१-२१ इन्हें छोड़कर इनपर दया कर दी है । चार्वाकदर्शन, तथा बौद्ध-एतयोद दर्शनको तो प्रतिपक्षी भी स्वयं तामस मानता ही होगा । शेष CC - 0. Ankur Joshi Collection तामस शास्त्र? २६५ सांख्यको निरीश्वरदर्शन माना जाता है - ईश्वरासिद्धेः ' [ १ । २ ] । चाहे कई लोग इसका समाधान कर भी दिया करते हैं । मीमांसादर्शनमें कर्मप्रधानतावश ईश्वर गौण हो गया है, इन कारणों से वहां निन्दार्थवादसे तामसता कही गई है, तभी तो उक्त पुराण में कहा है - ' निरीश्वरेण बाबेन कृतं शास्त्रं महत्तरम् ' [ पद्म ६ । २३६ । १२ ] । शेष हैं न्याय - वैशेषिक ग्रादि, इनमें खण्डन- मण्डन तो खूब है; पर वास्तविक अन्तिम लक्ष्य भगवद्-भक्ति वरित नहीं की गई; इस कारण यहां उनका भी निन्द्रा-थंवाद है । जहांसे प्रतिपक्षीने यह प्राक्षेप उठाया है, वहीं यह पाठ है, जिसे या तो उसने देखा नहीं, अथवा अपनी गुरुसम्प्र-दायपरम्परावश उसे छिपा दिया है । वह यह है- ' तामसानि च शास्त्राणि समाचक्ष्व ममानघ! संप्रोक्तानि च यैविप्रेभंगवद्भक्ति-वजितै: ' [ उत्तर. २३६ । १ ] सो इनके भगवद्भक्ति - वर्जित होनेसे उन्हें तामस कहा गया है । ऊहापोह तो खून हो, परन्तु वास्तविक भगवद्भक्ति न हो, उसमें तामसता स्पष् मायावादको भी इसी विवक्षावश ग्रसच्छास्त्र एवं तामर्स कहा गया है, क्योंकि उसमें जीव - ब्रह्मके पारमार्थिक प्रभेदवश उपास्य - उपासकता न हो सकनेसे भगवद्भक्तिको अवकाश नहीं रहता । सो यह तुरीयावस्था वा परमहंसावस्थाकेलिए पार-मार्थिक होता हुआ भी प्रादिम कोटिमें उपासना छुड़ा देने से चित्तशुद्धि नहीं होने देता । दूसरा - ' ब्रह्म ेति सत्यमखिलं नहि किञ्चिदन्यत्, तस्मान्न मे सखि! परापरभेद - बुद्धिः । जारे तथा निजवरे सदृशोनुरागो व्यर्थं किमर्थमस्तीति कदर्थयन्ति ' साधारण लोगोंके लिए इन व्यावहारिक - हानियोंको भी करने वाला होता है, यही कारण उसके निन्दार्थवादका है । आशा है - इन हेतुत्रोंसे ' प्रतिपक्षीको इनकी निन्दाका रहस्य ज्ञात होगया होगा । शेष है Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 164

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२६६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) ऊपर कहे पुराणोंकी निन्दाका प्रश्न; सो पद्मपुराण में जिस देव-को ' भगवान् ' बताया गया है, उससे भिन्न परिगणित पुराणों में उस भगवान्की भक्ति न होनेसे एकनिष्ठता के लिए उन्हें भगवद्-भक्तिवजित मानकर उन्हें तामस बताया गया है । एक देवमें निष्ठा रखो, यही इन वचनोंका परमार्थ है । शेष निन्दा प्रादि कई वार कहे हुए ' नहि निन्दा निन्द्य निन्दितुं प्रवर्तते कितु विधेयं स्तोतुम् ' - इस न्यायसे अर्थवादमात्र है, इस विषयमें शेष अग्रिम प्रश्न के उत्तरमें कहा जायगा । २४ । शिवपुराण तामस [? ] [ ३४ ] प्रश्न- जब कि शिवपुराण तामस व नरकमें लेजाने वाला पुराण हैं, और शिवजी भी उसी के अनुसार व्यभिचारके प्रचारक देवता होनेसे भक्तोंको नरकमें लेजाने वाले हैं, तो फिर ऐसे तामसी - देवताके बहिष्कारकी व्यवस्था सनातनी विद्वान् क्यों नहीं करते? । २५ । उत्तर - पूर्वपक्षी गालियां देनेका अभ्यासी है । उसकी शास्त्रदृष्टि नहीं मालूम देती । पुराने आर्यसमाजो ट्रैक्ट देखकर उन्हीं बातोंको गन्दे - ढंगसे दोहरा रहा है । उसे ज्ञान होना चाहिये कि वेदके दो भाग होते हैं १ मन्त्र और २ ब्राह्मण [ यह दोनों वेद होते हैं । इस विषयमें ' आलोक ' का छठा पुष्प देखना चाहिये ] ब्राह्मण - भागका दूसरा नाम पुराण भी होता है - यह स्वा. द. जी भी मानते हैं । पुराण इन दोनोंके भाष्य हैं । इनमें ब्राह्मणे - भागके अर्थवादोंका अधिक अनुसरण किया गया है । ब्राह्मण विधि और विधिस्तावक अर्थवाद हुआ करते हैं । पुराण में भी गुरणवाद तथा भूतार्थवाद बहुत हैं । प्रर्थवादमें प्रत्येक शब्दका अर्थ नहीं देखा जाता; उसका तात्पर्यमात्र लिया जाता है । उसमें प्रशंसार्थवाद ग्रंर्थात् रोचक वचन और निन्दार्थवाद अर्थात् CC - 0. Ankur Joshi Collection II .शिवपुराणं तामस (? ) भयानक वचन भी हुआ करते हैं; अतः उनका तात्पर्यमात्र जाता है । उसे बच्चे वा अल्पश्रुत नहीं समझ पाते । तो सबकी गति होती है, पर व्यङ्ग्यार्थमें सबकी नहीं वाच्याय । " ' गंगायां घोषः ' में वाच्यार्थ देखनेपर उसमें विरोध पड़ता है, क्योंकि - प्रवाह विशेषपर मकान वा बस्ती मालूम सकती । तब विदग्ध व्यक्ति जब उसका तट अर्थ करके ठहर नहीं उसका शीतत्व - पावनत्वमें तात्पर्य बताता है, तब अल्पश्रुतको फिर कुछ समझ आ जाती है । सो उक्त पुराण के वचनका रहस्य में! समझना चाहिये, वह बहुश्रुतको समझ आ सकता है- पर. तो नहीं । शिव प्रलयके देवता होनेसे तमोगुणके अधिष्ठाता हैं- ' रखो. जुषे जन्मनि, सत्त्ववृत्तये स्थितौ प्रजानां प्रलये तमः स [ कादम्बरी १ ] इसमें प्रजा के पालक विष्णुको सत्त्वगुणी, उत्पा दक ब्रह्माको रजोगुणी, प्रलयकर्ता महादेवको तमोगुणघारी का है । देवीभागवत में भी कहा है- ' त्रिविधः पुरुषः प्रोक्तः सात्त्विको राजसस्तथा । तामसस्तु महाराज! ब्रह्मविष्णुशिवादिषु [ ५ । १ । ४५ ] । शिव के स्तुति करने वाले पुराण में भी ' रजसाधि ष्ठितः स्रष्टा रुद्रस्तामस उच्यते ' [ लिंग. १ । ६६ । ३ ] में रुद्रवो तामस कहा है । इसी कारण विष्णु - सम्बन्धी पुराणको भी सात्त्विक, तथा ब्रह्म - सम्बन्धीको राजस, तथा शिवसम्बन्धी पुरा को भी तामस कहा गया है, सो जो देव जिसकी प्रकृति के अनुकू हो, वह उसको लाभप्रद होता है । विषके कीड़ेको विप भी लाभप्रद होता है, अमृत हानिप्रद । पद्मपुराण विष्णु - सम्बन्यां होनेसे उस गुणसे विरुद्ध तमोगुणवालेकी निन्दा करे, यह स्वा भाविक है । इसलिए भी निन्दार्थवाद रखना पड़ता है कि उस प्रकृति वाला पुरुष उस देवमें स्थिर रहे । इतस्ततः गमनागमन Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 165

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२६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २६ मात्र करने वाला कहीं का भी नहीं रहता । यहां शिव - पुराणकी देखा व्यभिचारवश नरक - प्रदता नहीं कहीं गई, किन्तु तमोगुण-वाच्याथमे वशात् । वह भी केवल भयानक प्रर्थवादमात्र है । शिवका कहीं व्यभिचार बताया भी नहीं गया; शिवपरमात्मा के लिए कुछ घ मालूम व्यभिचार है भी नहीं । व्यभिचार नियोगमय - मस्तिष्क होने ठहर नहीं प्रतिपक्षीको सभी जगह व्यभिचार मालूम होता है । परमात्माकी करके फिर कोई परकीया होती ही नहीं; न शिवको कहीं नरक में ले जाने श्रतको भी वाला कहा है । प्रतिपक्षी ' उपानद्गृढपादस्य ननु चर्मावृतैव भूः ' रहस्य भी न्यायसे सभीको वैसा समझते हैं, उन्हें उचित है कि - गुणग्राही T है - श्रय. बनें । ' न चात्रातीव कर्तव्यं दोषदृष्टिपरं मनः । दोषो ह्यविद्य-मानोपि तच्चित्तानां प्रकाशते ' । हो शिवका पुराण, और वह हैं - ' खो- शिवको व्यभिचारी कहे - यह भी कभी हो सकता है? प्रति-तमः स्कू पक्षीकी अपनी बुद्धि हो व्यभिचारिणी है । तमोगुणीका यदि न्गी, उत्पा वहिष्कार करना चाहिये; तो प्रतिपक्षी निद्राका भी बहिष्कार घारी कहा कर दे; निद्राको उपासना क्यों करता है? क्योंकि वह तमोगुरण-सात्त्विको का रूप है । समयपर जो भय, शोक, विषाद करता है; वह 9. ' [ ५ । इनको क्यों अवलम्बित करता है? रात्रिकां वह बहिष्कार क्यों ' रजसादि- नहीं करता, वह भी तमांगुणा है । शूद्र भी तमोगुणी होता है, में रुद्रको इनका भी वहिष्कार करा दे । वस्तुतः सभी गुण समयपर को भी आवश्यक हैं । गुरोंके विषय में यह याद रखना चाहिये कि -बन्धी प्राप " सत्त्व, रज, तम यह तीन गुण होते हैं । यह अकेले अकेले कभी नहीं अनुकूल रह सकते । सत्त्व लघु एवं प्रकाशक होता है, रजोगुण उपष्टम्भक विष भी तथा चल होता है । तमोगुण प्रवरंक और गुरु होता है ( साङ्ख्य--सम्बन्धी कारिका. १३ ) ‘ सत्त्व एवं तम स्वयं अक्रिय होते हैं, कोई कार्य यह स्वा नहीं कर सकते; अतः अपनी प्रवृत्ति के लिए उन्हें चालक रजोगुण-कि उम मनागमन की आवश्यकता होती है । रजको भी यदिः सत्त्व, तम न मिलें; CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवपुराण तामस (? ) २६६ तो वह भी अकेला कुछ कार्य नहीं कर सकता है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि - एकमें भी तीनों गुणोंकी श्रावश्यकता होती है । तभी उनमें भी कार्य जनकता होती है । दियेमें तीन वस्तुएं होती हैं, बत्ती, तेल श्रीर ज्वाला - यह तीनों परस्पर-विरुद्ध हैं, इन्हींके योगसे प्रकाश होता है । अथवा एक ही शरीर में वात, पित्त, कफ होते हैं, यह तीनों परस्परविरोधी हैं; तथापि यह साम्यावस्थामें आकर शरीर धारण करते हैं, वैसे ही उक्त तीनों गुण परस्पर विरुद्ध होनेपर भी शरीरमें स्थित होकर अन्योन्याश्रित, ग्रन्योन्यजनक, ग्रन्योन्यसहचर अर्थात् अविना-भाववृत्ति वाले होते हैं । ( सांख्यतत्त्वकौमुदी ११. का. ) । इसपर देवीभागवतका प्रमाण भी देखिये-' अन्योन्यमिथुनाः ( सहचराः ) सर्वे, सर्वे सर्वत्र गामिनः । रजसो मिथुने सत्त्वं, सत्त्वस्य मिथुने रजः । तमसश्चापि मिथुते ते सत्त्वरजसी उभे । उभयोः सत्त्वरजसोमिथुनं तम उच्यते । नैषामादिः संप्रयोगो वियोगो वोपलभ्यते ' ( ३।८ ) यह पद्य हमें सांख्यसे देवीभागवतके नामसे मिले हैं । देवीभागवत में हमें यह पद्य मिले हैं- ' एकं सत्त्वं न भवति रजश्चकं तम-स्तथा । सहैवाश्रित्य वर्तन्ते गुरणा मिथुनर्घामणः ' ( शा ४२ ) रजो विना न सत्त्वं स्याद् रजः सत्त्वं विना क्वचित् । तमो विना न चैवैते वर्तन्ते पुरुषर्षभ! ( ४३ ) तमस्ताभ्यां विहीनं तु केवलं न कदाचन । सर्वै मिथुनधर्माणो गुणाः कार्यान्तरेषु वै ( ४४ ) अन्योन्यसंश्रिताः सर्वे तिष्ठन्ति न वियोषिताः । अन्योन्यजनका-श्चैव यतः प्रसवधर्मिरणः ( ४५ ) ‘ सत्त्वं कदाचिच्च रजस्तमसी जनयत्युत । कदाचित्तु रजः सत्तमसी जनयत्यपि ( ४६ ) कदाचित्तु तमः सत्वरजसी जन-यत्युभे । जनयन्त्येवमन्योन्यं मृत्पिण्डश्च घटं यथा ( ४७ ) भाव Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 166

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३०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) इन श्लोकोंका भी वही है कि अकेला एक गुरण कहीं भी नहीं रहता । ' सत्त्वं तु केवलं नैव कुत्रापि परिलक्ष्यते । मिश्रीभावात्तु-तेषां वै मिश्रत्वं प्रतिभाति वै ' ( ३ । ६ । ५ ) जब ऐसा है, तो शिवमें यदि तम है; तो शेष दो गुरण भी स्वतः ही हुए । दुर्गासप्तशती दुर्गाकी स्तावक पुस्तक है । उसमें देवीकी प्रशसा है । मार्कण्डेयपुराणादिसे वह संगृहीत है । उसमें उसे ' देवी तामसी तत्र वेधसा ' ( ९ । ६६ ) ' तामसी ' कहा गया है- ' निद्रा-रूपेण संस्थिता ' ( ५। २३ ) उसे तामस - निद्रारूप में कहा है । ' ' सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि! ' ( ११ । ११ ) यहां देवीको विनाशंकशक्ति जो तमोगुरणका ही रूप है, कहा गया है ' । तो क्या तमोगुणधारिणी होनेसे उसकी निन्दा हो जावेगी? नहीं; तमोगुण भी एक प्रावश्यक वस्तु है । यदि भगवान् तमो--गुरणका अवलम्बन न करे; तो सृष्टिका प्रलय कैसे करे? प्रलय. न हो; तो सृष्टिमें पुनर्जन्मरूप नवीनता कैसे उत्पन्न हो? जो शिव तमोगुण से डरते हैं; उन्हें सोचना चाहिये कि -क्या परमात्माके कोषमें सोना ही सोना है; लोहा - सीसा सर्वथा नहीं? क्या उसमें मधु ही मधु है; विष नहीं? क्या उसका कोष अपूर्ण है? उसमें सुख ही सुख है, दुःख नहीं? क्या प्रकाश है, अन्धकार नहीं? यदि वह स्मृति देता है; तो विस्मृति नहीं देता? क्या उसके राज्यमें पुण्यं ही पुण्य है, पाप नहीं? क्या वैद्यके पास हड्डीके जोड़नेका ही यन्त्र होता है, तोड़नेका नहीं? लोहेकी तलवार के बचाव केलिए लोहेकी ढाल आगे की जाती है । प्रकाशसे प्राप्त हुए प्रायासको शान्त करने केलिए वह अपने पास स्थित अन्धकारको हमें देता है । फलतः महान् देव, गुण अपने पास रखता हुआ भी उनके वश-' नहीं होता; किन्तु गुरण ही उसके वशमें होते हैं, वह गुरंगों का CC - 0. Ankur Joshi Collection शिवपुराणं तामसं (? ) ३१ अधिष्ठाता होता है । सो तमोगुण भी वह तमोगुणी नाशार्थ अवलम्बित करता है, क्योंकि कांटेसे कांटा ि दे है । ( पद्मपु. उत्तर. २३५ । २८-३९ -४० ) । इससे उन दे देवताओंने अनायास ही जीत लिया ( २३५ | ६२-६३ परम तमोगुण रखने से सत्त्वगुण यादि उसके हट नहीं जाते ) । के हम दुर्गासप्तशती में प्रशंसित भी देवीका तमोगुणावलम् । का " तामसी ' होना बता ही चुके हैं; उससे वहां उसकी निन्द प्रतिप नहीं होती; वल्कि उसमें सत्त्वगुरण भी साथ रहता है । दुर्गा शतीके ‘ वैकृतिक - रहस्य ' में बताया है - ' त्रिगुणा तामसी, मन्थेन सात्त्विकी या त्रिधोदिता ' ( १ ) यहां तामसीमें सत्त्वगुण ( ७ म सात्त्विकीमें भी तमोगुण रहना बताया है । दैत्योंके नाशादी है । व तमोगुणमें महाकालीका रूप धारण करती है । इसी तमोगु “ शिव भी तमोगुणके अवलम्बनसे दैत्योंको तथा प्रलय श मात्मा मृत्यु देते हैं । पुराण प्रक्षेप्ता के स्वा. द. जीने ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' ' सुई बहिष्क द्याविषय ' ( पृ ० १२६ ) में ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' मन्त्रका मात्मा रमाका करते हुए ' अस्य पुरुषस्य मुख्यगुणेभ्यः किमुत्पन्नमासीत् । परमात्मा के मुख्यगुण ( सत्त्वगुरण ) से ब्राह्मणकी उत्पत्ति लाई है । [ स्य पुरुषस्य ] पादौ अर्थात् मूर्खत्वादिनी ( ३ ) किमुत्पन्नं वर्तते ' ( पृ ० १२६ ) यहां परमात्माके नीचगुणों | मरण - ऋ - गुरण ) से शूद्रकी उत्पत्ति कही है; इसे आगे स्वामीने सह कर फेंक दिया है - ' अस्य पुरुषस्य ये विद्यादयो मुख्य - गुणाः, तेभ्यो कृष्ण ' उत्पन्नो भवति '... [ अस्य पुरुषस्य ] जडबुद्धित्वा श्रीकृष्ण -शूद्रः जायते - इति वेद्यम् ' ( पृ ० १२७ ) यह कहकर स्वा. उत्त महादेव - परमात्मामें सत्त्वके साथ तमोगुण भी बताया है । विष्णुलों तमोगुणसे शूद्रकी उत्पत्ति बताई; तब ही ( ६३ “ परमात्माके Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ३०२ तमोगुणी तमोगुणधारी, शूद्रोत्पादक, सृष्टिके प्रलयकारक, प्रतिपक्षियों कांटा परमात्माकी अपनी स्त्री न होने से दूसरोंकी स्त्रियों के ससे ि अनुसार में व्यापक होनेसे, प्रतिपक्षी के अनुसार व्यभिचारी अपने उन नरक देने वाला मानकर अपने कथनके अनुसार उस-२। ६२-६३ ) । परमात्माको व्यवस्था क्यों नहीं करता? । जो वह उत्तर इस-हीं जाते । के बहिष्कारको यहां भी वही उत्तर हो जायगा । दोषदृष्टि रखनेपर मोगुणावलम् का देगा; उसकी प्रतिपक्षीका सर्वत्र पतन ही पतन होगा; यह वह जान रखे । निन्दा हता है । इसी प्रकार स.प्र. में स्वामीने ' मन्पुरसि ' ( यजुः १ ९ । ९ ) तामसी मन्त्रका अर्थ करते हुए लिखा है- ' आप दुष्टोंपर क्रोधकारी हैं में सत्त्वगुण ७ म समु. पृ. ११२ ) इससे उस परमात्मामें ' क्रोध ' भी बताया त्योंके नाना है । वह ( क्रोध ) सत्त्वगुरणका तो फल नहीं; अन्ततः उसे रजोगुण-है । इसी तमोगुणका ही फल मानना पड़ेगा, तो जब प्रतिपक्षीके भी पर-प्रलय में श मारमा रजोगुण - तमोगुण भी हैं - तो शिव - परमात्मामें यदि पुराणने तमोगुण का अधिष्ठातृत्व लिख दिया है; उससे उसके भूमिका ' ' बहिष्कारकी चर्चा क्यों? मालूम होता है - प्रतिपक्षी अपने पर-सीत् ' मन्त्रका मात्माका बहिष्कार कर चुका है, अब पुराण से भी उस परमा-त्माका बहिष्कार कराना चाहता है । २५ । उत्पन्नमासीत् की उत्पत्ति श्रीकृष्ण काले बालके अवतार! मूर्खत्वादिनी ( ३५ ) प्रश्न- महाभारत ( श्रादि १६६ ) में लिखा है- ' नारा-के नीचगुण । यण - ऋषिने अपने सरमेंसे १ सफेद और १ काला बाल उखाड़-चामीने सर कर फेंका । उन्हींसे - क्रमशः रोहिणीसे बलराम तथा देवकी से गाः, तेम्पो कृष्ण हुए । तो नास्यण ऋषिके सरके काले बालके अवतारों बुद्धित्वादि श्रीकृष्ण को ईश्वरेखाच्यवतार कैसे माना जा सकता है? रक्षा हकर स्वा. उत्तर - महाभारत आदि पर्व में लिखा है- ' अनुग्रहार्थ भूतानां 7 बताया है । विष्णुलोक - नमस्कृतः वसुदेवात्तु देवोऽयं प्रादुर्भूतो तब ( ६१०१-१० ) यहाँ श्री कृष्णको विष्णुको महायशाः अवतार कहा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पौराणिक प्राक्षेपोंका परिहार ३०३ गया है । विष्णु महाभारत ग्रादिके अनुसार ईश्वर हैं । वही नारायण हैं । देखो मनुस्मृति- ' श्रापो नारा इति प्रोक्ता श्रापो नर- सूनवः । ता यदस्यायनं प्रोक्तं तेन नारायणः स्मृतः ' ( १ । १० ) । महाभारत भी नारायणको ईश्वर बतलाता है । देखिये-' सचापि केशौ हरिरुद्वबर्ह शुक्लमेकमपरं चापि कृष्णम् ' ( १६६ । ३२ ) सो हरि महाभारतादिमें ईश्वर होनेसे उन्हींके अंश केशसे प्रकट होनेसे श्रीकृष्ण ईश्वरावतार सिद्ध हुए । इस-लिए वहां ' नारायणमप्रमेयम् । श्रनन्तमव्यक्तमजं पुराणं सनातनं विश्वमनन्तरूपम् ' ( १६ । ३१ ) नारायणको अनन्त, अज यादि विशेषरणोंसे ईश्वर कहा है । अङ्ग अङ्गीका होता है, उससे पृथक् नहीं होता । तब प्रतिपक्षीका ग्राक्षेप व्यर्थ है । पाठकोंने देखा है कि- प्रतिपक्षी अपनी गुरुपरम्पराकी प्रकृतिसे आगे - पीछेके पाठको कैसे छिपा दिया करता है! यह है वैदिक प्रकाशन (? ) और सत्य भाषण ( 1 ) ॥२६ ॥

मुर्दे से सन्तान (? ) ( ३६ ) प्रश्न- राजा व्युषिताश्व बे - प्रौलाद मर गया, तो रानीने उसके विके साथ सोकर ७ लड़के पैदा किये थे ( महा. आदि. १२० प्र. ) क्या मुर्दोंसे भोग करके श्रीलाद पैदा करनेकी विधि अब भी सनातनधर्ममें चालू है? ॥ २७ ॥

उत्तर - प्रतिपक्षीकी एक प्रकृति पूर्वसे चालू है कि- पूर्वापर छोड़ दिया करता है कि जिससे साधारण जनता भ्रममें पड़े अब सुनिये वह छोड़ा गया हुआ, पाठ - ' विलपन्त्यां पुनः पुनः । तं शवं संपरिष्वज्य, वाकू किलान्तहिताऽब्रवीत् ' । ( १२१ । ३३ ) ( जब रानी शवको आलिंगन करके रो रही थी, तो प्रकाश-वाणी हुई ) ' उत्तिष्ठ भेद्रे! गच्छ त्वं ददानीह वरं तव! " जन-यिष्याम्यपत्यानि त्वय्यहं चारुहासिनि! ' ( ३४ ) अर्थात् मैं तुममें An eGangotri Initiative

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३०४ श्रीसनातनधर्मा लोक ( ७ ) सन्तान पैदा करूंगा । ' आत्मकीये वरारोहे! शयनीये चतुर्द-. शीम् । अष्टमीं वा ऋतुस्नाता संविशेथा मया सह ' ( ३५ ) यह शव के आत्माने कहा था, शव भला कैसे बोले? रानीने वह बात पूरी की ( ३६ ) । ' सा तेन सुषुवे देवी शवेन भरतर्षभ! ' ( ३७ ): यहां उस शवमें प्राप्त आत्मासे मनोयोग द्वारा रानीने ७ लड़के. पैदा किये । यह कथा कहकर कुन्तीने उपसंहार करते हुए पतिसे कहा कि- शापवश शवकल्प आप भी इस प्रकार मुझसे मनोबलद्वारा सन्तान उत्पन्न करें-- ' तथा त्वमपि मय्येवं मनसा भरतर्षभ! शक्तो जनयितुं पुत्रान् तपोयोगबलान्वित: ' ( १२१ । ३८ ) यहां पर मनोबलद्वारा सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति उसीकी बताई गई है, जो तपोबल एवं योगबलसे युक्त हो । तपोबलकी शक्ति मनु-स्मृतिके इस पद्यमें देखिये- ' यद् दुस्तरं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुष्करम् । सर्वं तत् तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् । ( ११ । ( २३८ ) यहां तपस्याकी बड़ी जबर्दस्त शक्ति बतलाई गई है । योगबलमें क्या शक्ति होती है यह जानना हो तो प्रतिपक्षी ' योगदर्शन ' के विभूतिपादका अध्ययन करे । मनोबलकी शक्ति प्रतिपक्षीने जाननी हो, तो ' योगदर्शन ' व्यासभाष्य ( ४ । १० ) को देखे, जहां मनोबलद्वारा अगस्त्यका समुद्रपान बताया है । स्वा. द. के अनुसार क्रियात्मक और अनुभवसिद्ध योगशास्त्रकी बात कभी असत्य नहीं हो सकती । देखो - श्रीमद्दयानंद प्रकाश ( पृ. ४६५ ) कई आत्माओंमें ऐसी शक्ति होती है कि वे शवमें फिर भी पहुँच जाते हैं, इसमें स्वा. शङ्कराचार्यका श्रमरुकके शवो में प्रवेश और फिर अपने आत्महीन शरीर में पुनः प्रवेश प्रसिद्ध हैं । तव कुन्तीको पाण्डुने कहा कि - व्युषिताश्व तो दिव्यशक्ति वाला था, जो शवमें फिर पहुँचकर दिव्यबलसे रानी में गर्भ कर शवसे सन्तान (? ) ३०५ देता था, पर मैं ऐसा नहीं । देखिये पाण्डुके शब्द - ' एवमेतत् कुन्ति! व्युषिताश्वश्चकार वै । यथा त्वयोक्तं कल्याणि पु प्रसीद अमरोपमः ' ( १२२ । २ ) इसका अर्थ श्रीसात! १ लिखा है कि - ठीक ही है, व्युषिताश्वने ऐसा ही किया वलेकरने कि- वह देववत् थे ' । सो देवताओंके पास तो अणिमा था, क्यों आदि अष्टसिद्धियां होती हैं, अतः वे मनुष्योंसे बढ़कर, महिरा ना हैं । इनमें वे ' प्राप्ति ' नामक ऐश्वयंसे मनोवल द्वारा अपने हुआ मनो करते रथकी प्राप्ति कर सकते थे । इसलिए व्युषिताश्वकेलिए लिखा है. ' व्युषिताश्वस्ततो राजन्! अति मर्त्यान् श्ररोचत ' ( १२१ । ‘ मर्त्यान् अति ' ‘ मनुष्योंको प्रतिक्रान्त करने वाला ' यह उ १० ) लिए कहे हुए शब्द हमारी बातकी सत्यता में साक्षी हैं । इसके अतिरिक्त ग्रात्माके स्थूलशरीरसे विनिर्मुक्त होनेपर विभुत-वश बड़ी शक्ति बढ़ जाती है । जैसे कि -घड़में पड़े हुए दीये ल प्रकाश उतना नहीं होता, जितना घड़े से बाहर ठहरे हुएका । भ I सो जब उसकी यह विशेषता महाभारतने स्वयं लिख दी है, तब प्र उसे छिपाकर अपना मनमाना पाठ उपस्थित करके उसपर उ आक्षेप कर देना - यह प्रतिपक्षीकी दुष्प्रकृति है - यह ' आलोक पाठकोंने अनुभव कर ली होगी; इसका कारण केवल पुराए-साहित्यसे अकारण द्वेष ही है । अन्य यह भी बात है कि- व्युषिताश्व मर कर मुक्त हो गया क हो; तो मुक्त आत्मा में भी बड़ी शक्ति हो जाती है । छान्दोष उ उपनिषद् में मुक्त - पुरुषोंके लिए लिखा है- ' ये एते ब्रह्मलोके ' तेषां सर्वे च लोका आत्ताः सर्वे च कामा सर्वाच लोकानाप्नोति, सर्वार्थश्च कामान् ' ( ८ । १२ । ६ ) व इसको स्वा.दाजीने ऋभांभू में अर्थ इस प्रकार लिखा है - च घ सं. घ. २० CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 169

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३०५ ३०६ वमेतत् होते हैं, वे ब्रह्मलोक ( परमेश्वर ) को प्राप्त हो कल्याणि मुक्त पुरुष प्रश्रयसे रहते हैं 1 । इसी कारण उनका आना - जाना सब सात! २ उसीके होता है । उनके लिए कहीं रुकावट नहीं रहती । या था वलेकरने लोक उनके - लोकान्तरोंमें सब काम [ कामनाएँ ] पूर्ण हो जाते हैं । कोई काम प्रपूर्ण निमा,, महिमा क्यों नहीं रहता ' ( शताब्दी सं. पू. ४६३ ) हुआ करते जब ऐसा है; तब मुक्त व्युषिताश्वने शवमें पहुँचकर बिलखती अपने मनो. हुई स्त्रीको यदि सन्तान भी दे दी; तब इसमें आश्चर्यकी कोई नए लिखा है । बात नहीं रहती । ब्रह्मपुरमें रहने वालेकी सभी इच्छाएँ पूर्ण २१ । १० । होना बताते हुए उक्त उपनिषद्ने कहा है- एतत् सत्यं ब्रह्मपुरम् यह उसके श्रस्मिन् कामा: समाहिताः । ' ( ८1१।५ ) ' अथ यदि स्त्री - लोक-नी है । इसके कामो भवति, सङ्कल्पादेव अस्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति । तेन स्त्री-पर विभुत्व. लोकेन सम्पन्नो महीयते ' ( ८ । २ । ६ ) ' यं यमन्तमभिकामो हुए दीयेा भवति, यं कामं कामयते, सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति ' ( १० ) जब हुएका इस प्रकार मुक्तात्मामें शक्ति है; तब मुक्त व्युषिताश्वने शव में ख दी है, तब प्रवेश करके अपनी इच्छा - शक्ति से अपनी स्त्रीके लोक - पुत्र करके उसपर उत्पन्न कर दिये हों; तब इसमें उपहास प्रकट करना अपनी ' आलोक शास्त्रानभिज्ञता बताना है । २७ ।. वल पुराए- अर्जुनसे अर्जुनी, नारदसे नारवी । ( ३७ ) प्रश्न - पद्मपुराण ( पातालं खण्ड ७४-७५ ) में अर्जुन-मुक्त हो गया को अर्जुनी तथा नारदको नारदी ( स्त्रियां ) बना कर कृष्णका छान्दोग्य उनके साथ भोग करना - क्या यह आचरण वेदानुकूल था? लोके... । २८ । कामा उत्तर - प्रतिपक्षीको यह पद्य इष्ट प्रतीत होते हैं - ' तस्याः ।१२।१ पारिंग गृहीत्वैव सर्वक्रीडावनान्तरे । यथाकामं रहो रेमे महा-लखा है- ' योगेश्वरो विभुः ' ( ७४ । १२ ) ' रेमे वर्ष प्रमाणेन तत्र चैव द्विजो-तम! ( ७५ । ४२ ) यहां उन स्त्रियोंकी अपनी ही इच्छासे, श्री-CC - 0. Ankur Joshi Collection नारदसे नारदी ३०७ कृष्ण - द्वारा उनसे रमण श्राया है । वहीं श्रीकृष्णको भी स्त्री-स्वरूप वाला कहा है- ' ताभिः सह गतस्तत्र यत्र कृष्णः सनातनः । केवलं सच्चिदानन्दः स्वयं योषिन्मयः प्रभुः ' ( ७५ । ४० ) इसीके आगे भगवान् श्रीकृष्णने भी इसी बातको स्पष्ट कर दिया है-' ग्रहं च वासुदेवाल्यो नित्यं कामकलात्मकः । सत्यं योषित्स्वरूपोऽहं योपिच्चाहं सनातनी ' ( ७५ । ४५ ) । श्रव प्रतिपक्षी बताये कि-स्त्रीका स्त्रीके साथ रमण क्या प्रतिपक्षीका मनचाहा भोग हो सकता है? यहां ' रेमे ' में ' रम् ' धातु है । ' रमु ' धातुका क्रीडा अर्थ होता है, अब यहां वेदविरुद्धता क्या है- यह प्रतिपक्षीने नहीं बताया? ' विभुः ' आदि शब्दसे श्रीकृष्णको परमात्मा ' वताया गया है । परमात्मा सब पुरुषों तथा सभी स्त्रियोंमें अब भी रम रहा है । क्या वह प्रतिपक्षीके अनुसार वेदविरुद्ध श्राचरण कर रहा है? यदि प्रतिपक्षी उसका स्त्रियोंमें रमण पसन्द नहीं करते; तो प्रतिपक्षी उसे अपनी स्त्रियोंके अन्दरसे तथा श्रृङ्गोंसे निकाल दें । यह तो गोलोकके वृन्दावनका वृत्त है, वहां मर्त्यलोकका कानून लागू भी नहीं हो सकता । लोकान्तर [ जन्मान्तर ] में जब एक पुरुष कर्मवश स्त्री वन जाता है, तब उसका धन्यपुरुषसे संयोग भी हो जाता है, चाहे वह पूर्वजन्ममें उसका मित्र वा पिता वा माता वा बहन वा भ्राता रहा हो; उसमें कोई भी कुछ दोष नहीं मानता । तब एक अवतारसे उसका संयोग हो जावे, तो इसमें वेदका कौनसा वचन बाघक हो सकता है? यहां भी अन्यलोकमें जन्मान्तरका वृत्त है । सारा स्त्री - पुरुषात्मक जगत् उसी परमात्माका विवर्त है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है, परन्तु वह ' तस्मादेकाकी न रमते ( शत. १४ । ४ । २।४ ) इस • न्यायसे अपनी ही अन्य मूर्तियोंको बना देता हैं । जैसे कि श्री-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 170

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३०८ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) मद्भागवत में भी प्रतिपक्षीका प्रिय यह पद्य आया है - ' रेमे रमेशो व्रज - सुन्दरीभिर्यथाऽर्भकः स्वप्रतिविम्बविभ्रमः ' ( १० । ३३ । १७ ) । इसमें अन्य स्त्रियोंको भगवान् कृष्णका प्रतिबिम्ब बताया है । यह उसके अपने प्रतिबिम्बसे क्रीडामात्र होती है, जैसे कि बच्चा अपनी परछाईसे क्रीडा करता है । इसके अतिरिक्त भिन्न लोकान्तरमें जानेसे जन्मका भी जब परिवर्तन हो गया, योनिका भी परिवर्तन हो गया, जो भी वहां जाता है, वहां स्त्री हो जाता है; केवल भगवान् ही वहां पुरुष हैं, वे भी योषिद्- ( स्त्री ) रूप । जब उसका पुरुषत्वसे स्त्रीत्व हो गया, फिर जब उसकी स्वयं क्रीडा की इच्छा भी हो गई; फिर वेदके उपनिषद्भाग ' छान्दोग्य ' के ' न कांचन परिहरेत् ' ( २ । १३ ) इसके एकदेशी अयंका भी समन्वय हो जाता है कि-अपनी बहुत - सी स्त्रियोंमें जो भी कोई समागमाथिनी हो, उस · का प्रत्याख्यान न करे, यह एक व्रत है । तब इसमें कौन सा वेद-मन्त्र निषेधक रह जाता है? मान लीजिये - प्रतिपक्षीके मान्य • कोई व्यक्ति भिन्न लोक में जाकर कर्मानुसार स्त्री बन गये, और यहां प्राकर प्रतिपक्षीकी स्त्री आ बने, तब प्रतिपक्षीकी उस कामिनीभूत मान्यसे क्रीड़ा किस वेदमन्त्रसे विरुद्ध होगी? किसी-की माता, किसीका पिता, वा बहिन जन्मान्तरमें उस पुरुषके -जन्मान्तरमें स्त्री बन जाएं; तो उससे स्त्री - व्यवहार हो सकेगा, “ वा कोई वेदनिषेध होगा? तब तो आपकी ही स्त्री जन्मान्तर में • अन्य पुरुषकी स्त्री हो जावे; तब क्या प्रतिपक्षी वा उसका वेद उसे व्यभिचारिणी करार देगा? मनुस्मृति में लिखा है- ' द्विषा कृत्वात्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभ-वत् । अर्धेन नारी, तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ' ( ११३२ ) यहां - ब्रह्माने अपने ही दो भाग करके स्त्री - पुरुष बना दिये । शतपथमें CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक आक्षेपोंका परिहार लिखा है -: आत्मैव इदमग्र आसीत् पुरुषविधः ( १४ । ४ १ ) आदि में केवल परमात्मा ही था । ' सवै नंव रेमे । १२ एकाकी न रमते । स द्वितीयमंच्छन् । सह एतावान्, तस्म स्त्रीपुमा सौ परिष्वक्तौ । स इममात्मानं द्वेधा श्रपातयत् स, पद पतिश्च पत्नी च अभवताम् ' ( १४ । ४ । २ । ४ ) । ' पतिरेर । स आसीत् ' ( यजुः १३ । ४ ) वह पति है, शेष उसकी सब पहिला हैं । वह सबमें रम रहा है । वह कानूनसे बरी है- शुद्ध अपापविद्ध है ' ( यजुः ४० । ८ ) कोई भी पाप मानुषी - दृष्टिको ग से उसे विद्ध नहीं कर सकता । ' स - न साधुना कमरणा भूग नो एव असाधुना कनीयान्, एष भूताधिपतिः ' ( शत. १४१३ ) डर २ । २४, बृहदार. ६ । ४ । २२-२३, तै. ब्रा. ३ । १२ । ६७ का इसी वचतका अनुवाद श्रीमद्भागवतमें यह आया है- ' नहा कर हि द्वितीयस्य ब्रह्मणः परमात्मनः । कर्मभिर्वर्धते तेजो हसते च मज़ रवेः ' ( १० । ७४ । ४ ) सो उसे किसी भी प्रकारका कर्म नहीं कर सकता । शेष कानून, मर्यादाएं केवल कर्मयोनि - मनुद के लिए व्यवस्था स्थापनार्थ हैं । इस प्रकार सूक्ष्मदृष्टि डालने प्रतिपक्षीको प्राशा हैं कुछ समझ प्रजायंगी । परन्तु दोष है-mer रखने से तो उसे दोषके सिवाय कुछ भी नहीं सूझेगा । २८ ।: ११ ब्रह्माजी के असुर । ( ३८ ) प्रश्न- भागवत ( ३ । २० ) में लिखा है- ' ब्रह्माई असुर पैदा किये । वे ब्रह्माकी खूबसूरतीपर मोहित होकर पापवासना मिटानेकों ब्रह्मां के ऊपर चढ़ गये । ब्रह्माजी हुए विष्णुकी शरण में गये । क्या ऐसा कमजोर भी ईश्वर सकता है, जिससे असुरोंने भोग किया हो, जो उनसे रक्षा न कर सका हो । २६ । प्रति उत्तर TLAR - असुरोंको ब्रह्माने अपने जघनसे पैदा किया. ( शरी Gujarat. An eGangotri Initiative