सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 151–160

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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२७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नोंमें ऐसा से छिपकर ही कुकृत्य करता है । वस्त्राने वहां यह लिखा है कि लिंग गिरा, और ब्रह्माण्डमें अन्धकार दमार्ग विनं हो गया । क्या किसी व्यक्तिकी भूत्रेन्द्रिय कटने पर संसारमें इस समय सूर्य - चन्द्र श्रादि पदार्थ लुप्त हो जाते हैं? वहां प्रतिपक्षियोंने भी शंकर न स्वयं दिखलाया है कि- ज्योतिलिंग तीन लोकोंको भस्म करनेमें सकीन प्रवृत्त था, और कालाग्नि की तरह भ्रमण कर रहा था । क्या लेसे ही ि एक निर्जीव मांस - खण्डमें यह घटना सम्भव हो सकती है? उन्हें पीछे जिस ग्रन्थ पर प्राक्षेप किया जाता है, उस ग्रन्थका पूर्वापर भी दिखाया है मानना ही पड़ता है, नहीं तो ' प्रभित्तिचित्रता ' का प्रसङ्ग हो लिंगका जाता है, प्रश्न भी उस पर नहीं बन सकता । लिंग गिरने पर ते हैं, यह भी शिव प्रसन्नचित्त रहे; उनमें कुछ भी विकृति नहीं आई! पा देते हैं । यदि यहां मूत्रेन्द्रिय इष्ट हो, और शिव यदि प्रतिपक्षीकी भांति कोई मनुष्य व्यक्ति हो; तो प्रतिपक्षीकी मूत्रेन्द्रियको कोई काट दे; क्या वह भी विकृत बना रहेगा? इससे स्पष्ट है कि - शिव की है मनुष्य नहीं थे, उनका ज्योतिलिंग भी उनकी सूत्रेन्द्रिय नहीं थी । हीं सोचत के पास जो कि कहा जाता हैं कि ' कटे हुए लिंग की अग्नि शान्त तु वस्त्राभ करनेकेलिए ऋषियोंकी प्रार्थनासे पार्वतीने अपनी योनि फैलाई, पुरुष तो तब वह लिंग पार्वती की योनिमें स्थित होकर शान्त हो गया । रणा होत उसीका आदर्श मन्दिरस्थ मूर्तिमें दिखलाया जाता है ' क्या यह जब व्यभिच माननेकी बात है? प्रतिपक्षीको किसी विशेष कारणवश भीले विरोधी व्यक्तिसे काटी हुई मूत्रेन्द्रियको क्या कभी उसकी स्त्री नहीं । अपनी योनिमें धारण करेगी? वस्तुतः तो ब्रह्माने ऋषियोंको मातृगण कहा था कि- गिरिजा देवीकी आराधना करके एक घट रख कर त्य अष्टदलाकार बनाकर श्रद्धासे शिव पूजन करो; तब तेजोमय लिंग शान्त हो जावेगा । योनि काररणका नाम है, प्रत्येक वस्तु ता, किंतु अपने कारण में शान्त वा लीन हो जाती है । उपद्रव करने वाला दारुवनको कथा २७१ प्राग्नेय तेज ही ज्योतिर्मय शिवलिंग था । शापसे जब वह ज्योतिर्मय लिंग गिर गया; तब सब स्थान ग्राग लग गई । ब्रह्मा-के कथनसे पृथ्वीकी अभिमानिनी देवता पार्वतीकी आराधना करने पर घट रख कर जब ऋषियोंने शिवका पूजन किया; तव आग्नेय - तेजोमय लिंग अपनी योनि कारण पृथिवी में शान्त वा लीन हो गया; क्योंकि अग्निका ग्राधार वा योनि ( कारण ) पृथिवी होती है, इसलिए पृथिवीकी मट्टी गिरानेसे अग्नि शान्त हो जाती है । यही अभिप्राय शिवपुराणकी ज्ञानसंहिता के ४२ अध्यायमें संक्षेपसे दिखलाया गया है, और विद्येश्वर - संहिता में इसका विस्तारसे वर्णन है । इससे स्पष्ट हो गया कि यहां लिंग, योनि आदि शब्दोंसे द्रष्ट नहीं, किन्तु पुराणको ब्रह्म तथा मायाका प्रतीक इष्ट है । लिंगका प्राकार प्रण्डाकार है, शिश्नाकार नहीं । वह परमेश्वर ( महादेव - महान् देव ) के ब्रह्माण्डकी संक्षिप्त मूर्ति है । वह ब्रह्माण्ड परमेश्वरसे सृष्टिके समय पृथक् हो जाने पर गर्म अवस्था में था, तथा चल था । बहुत समय तक गर्म पृथिवीसे ही बने हुए पर्वतोंके, इन्द्रके वज्र [ विद्यतु ] से काटे हुए पंखोंसे बने मेघों द्वारा जिनकी पार्वती - पर्वतको भूमि योनि - रूप थी, वर्षा आदि होने से वह गर्म एवं चल ब्रह्माण्ड ठंडा और स्थिर [ ठास ] हुआ । उसीका यहां ' तल्लिंगं चाग्निवत् सर्वं यद्ददाह पुरः स्थितम् ' ( १६ ) ' भूमौ सर्वत्र तद् यातं न कुत्रापि स्थिर हि तत् ' ( २० ) तल्लिंगं तज्जलेनाभिषेचयेत् परमर्षयः! शत-रुद्रियमन्त्रस्तु प्रोक्षितं शान्तिमाप्नुयात् ( शिव. कोटि - रुद्र. ३६ ) इत्यादि कथा व्याजसे स्मरण कराया गया है । वैदिक एवं पौराणिक आख्यानोंमें समाधि - भाषा आदि तीन भाषाओंोंके उपयोग होने से प्राध्यात्मिक, आधिदैविक तथा प्राधिभौति CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 152

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २७२ आदि अनेकों अर्थ, कई वैज्ञानिक - भाव तथा कई रहस्य हुमा करते हैं । पर ऐसी विशेषताओंोंको रहस्यज्ञ जान सकते हैं, शब्दार्थमात्र देखते रहने वालोंको इनसे वञ्चित रहना पड़ता है । शङ्करका पूजन अनादि चला आया है । यहां तो पार्वती योनिरूपा बनी, अर्थात् संसारके उत्पादक पञ्च तत्त्वोंकी मूर्ति-जिसमें पृथिवी प्रधान थी - का स्वरूप धारण किया, उसमें वह तेज: - गुञ्ज लीन होकर शान्त एवं स्थिर हो गया । आज भी गिरी हुई विद्य तुका तेजः- पुञ्ज पर्वत वा पृथिवीमें लीन होकर शान्त हो जाता है, इत्यादि उन कथाओ के अनेकों रहस्य निक-लते हैं; जो केवल ऊपरी अश्लीलतामें रमने वालोंको नसीब नहीं होते । जब वे भी कुछ उसके भीतर घुसते हैं; तब उनको भी कई रहस्य अचानक मिल जाते हैं; पर पहले से ही श्रद्धा होनेसे उनको उससे पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता । अब देखिये इसी प्रतिपक्षी डा. श्रीरामको इसी शिवलिंग पर जल चढ़ानेसे उसकी ऊष्माके शान्त होनेके उपहास में दिन - रात लगे होनेसे एक रहस्यको शिक्षा अचानक अवगत हो गई । ' वे अपने ' शिवलिंग पूजारहस्य ' ( प्र.सं. ) के पृ ० ६६-७० में लिखते हैं- ' मेरे भोले शिवलिंग पूजक भक्तो! जितना समय तुम शिव-लिंग पर पानी चढ़ाने में लगाते हो, उतना समय अपनी उपस्थे -न्द्रिय पर शीतल जलकी धारा छोड़ा करो, तो तुम्हारा शरीर दृढ बनेगा, ब्रह्मचर्य को साधना होगी; प्रमेह, स्वप्नदोष, शीघ्रपतनका नाश होगा । समस्त शरीर वा वीर्यकोषकी गरमी शान्त होगी । शरीर के समस्त रोग जल - चिकित्साके ' सिट्ज़- बाथ ' के अनुसार दूर हो कर चित्तमें स्फूर्ति उत्पन्न होगी । तुमने देखा होगा कि छोटे-छोटे बालकोंको भारतकी प्राचीन संस्कृतिमें पली हुई पुरानी मातायें अपने पैरों पर बिठलाकर उनकी उपस्थेन्द्रिय पर शीतल जलकी दारुवनको कथा २७३ धारा छोड़ती हैं, इससे उन बालक बालिकाओं के गर्भ गरमी वा रोग दूर होकर उनका शरीर फूलता चला ग्राता तककी । ऐसे बालक - बालिकाओंको कभी चेचक, खसरा, सूखा है । झाला, फोड़े - फुन्सी श्रादि रोग नहीं होते । शरीरका, मोती-विजातीय द्रव्य निकल कर उनकी काया सर्वथा निरोगी समस्त भ जाती है । जो नई रोशनीकी स्त्रियां ऐसा नहीं करती हैं, उनके बन बालक सदा रोगी बने रहते हैं । उसी विज्ञानके अनुसार यदि बड़ी उम्र के स्त्री - पुरुष भी इस क्रियाको करें, तो वह पूरण - स्वस्थ बन सकते हैं । इस विषय में विशेष ज्ञान प्राप्त करने के लिए जल चिकित्सा के ग्रन्थ देखे जा सकते हैं । यह है शिवलिंगपूजाके उपहासकर्ता डाक्टर श्री राम “ शिवलिंगपूजारहस्य'का अन्तिम निचोड़ | कौन कहता है कि-“ प्रतिपक्षीको यह रहस्य शिवलिंग की दारुक वनको पूजासे नहीं मिला, जिसमें यह लिखा था- ' तल्लिंगं चाग्निवत् सर्वं यद् ददाह पुरः स्थितम् । यत्र यत्र च तद् याति तत्र तत्र दहेत् पुनः ' ( कोटि रुद्रसं. १२ । १६ ) ' न कुत्रापि स्थिरं हि तत् ( २० ) ' तल्लि तज्जलेनाभिषेचयेत् परमर्षयः । शतरुद्रियमन्त्रैस्तु प्रोक्षितं शान्ति माप्नुयात् ' ( ३६ ) | यदि प्रतिपक्षी इस लिंग और योनि प च और भी अधिक घुस जावे, तो उसे और भी अधिक रहा ग्रा मिल जाये । वैज्ञानिक इसमें घुसकर यह रहस्य निकाल सकेग म कि- ग्रादिमें पृथ्वी गर्म थी और चमकदार ( ज्योतिर्मय ) थी, मे यह सूर्यमण्डलसे अलग हो गई थी । उस समय वह हिलती थी । क उसी के पर्वत भी बने । फिर उनकी गैसोंसे बादल वने । वेख प्र पृथिवी पर वर्षा करते रहे । इससे पृथ्वी जम गई और ठंडी हो । वु गई, तब वह प्राणियों के रहने लायक बनी । न स. १८ म CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 153

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२७३ २७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) र्भ तककी । जब प्रतिपक्षी स्वयं मानता है कि- ' न पद्माङ्का न चक्राका जाता है । वज्रांका यतः प्रजाः । लिंगांका च भगांका च तस्मान्माहे-मोती. श्वरी प्रजा । ' ( महा. अनु. १४ प्र. २३३ ) ' देव्याः कारणरूप-का समस्त नरोगी भावजनिता, सर्वा भगांकाः स्त्रियो, लिंगेनापि हरस्य सर्वपुरुषाः इन हैं, उनके प्रत्यक्षचिन्हाः कृताः । योऽन्यत् कारणमीश्वरात् प्रवदते देव्या सार यदि च यत्रांकितं, त्रैलोक्ये स चराचरं स तु पुमान् वाह्यो भवेद् रण - स्वस्व दुर्मतिः । ( २३४ ) ' पुलिंगं सर्वमीशानं स्त्रीलिंगं विद्धि चाप्युमाम् ' लिए जल द्वाभ्यां तनुभ्यां व्याप्तं हि चराचरमिदं जगत् ' ( २३५ ) ( जि पुलिंग हैं, वे सभी महादेव हैं, तथा जो स्त्रीलिंग हैं, वे सव पार-वती (? ) हैं । इन दोनों के शरीरसे सारा जगत् व्याप्त है ' ( शिव-श्री रामके लिंगपूजारहस्य पृ. १५-१६ ) ( शिवलिंग पूजापर्यालोचन ' ( पृ. १७-ता है कि १८ ) जब ऐसा है, तो एकदेशी रहस्य यह भी निकल सकता है जासे नहीं । कि यह सभी अंग उन महादेव तथा महादेवी के ग्रङ्ग हैं, उनपर यद्ददाह विद्वान् ब्रह्माजी के कथनानुसार जलकी धारा डालते रहने से वे अंग ' ( कोटि शान्त रहते हैं, नहीं तो उनमें गर्मी रह जानेसे वे इधर - उधर ' त भाग कर दूसरोंकी तथा अपनी हानि करते हैं, तब उस कथा नतं शान्दि पर उपहासकी क्या आवश्यकता? उनका दूरदृष्टिसे तात्पर्य देखना र. योनिय चाहिये । प्राचीन ऋषियोंसे प्रोक्त कथाएं अपनेमें कई रहस्य धिक रहस अन्तर्गभित किये हुए होती हैं । लेकिन जब कि महादेव - पार्वती कल सके मनुष्य नहीं; किन्तु देवता हैं, देवता भी नहीं, महान् देव हैं, पर-मर्य ) थी, मेश्वर हैं; तब उनमें यह लौकिक अङ्ग अर्थ करना उनपर उपहास इलती थी । करना प्रतिपक्षियोंकी अपनी दूरदर्शिता तथा अपना अज्ञान । वे उ प्रदर्शन है । जो इनका लौकिक मूत्रेन्द्रिय अर्थ करते हैं, वे दीर्घ-ठंडी हो बुद्धि ' यो योनि - योनि तिष्ठत्येकः ' ( श्वेताश्व. ४ । ११ ) ' योनिमेकं आससाद ' ( ऋ. ८ । २६ । २ ) इत्यादिमें योनिका अर्थ पर-मात्माको मूत्रेन्द्रिय करेंगे? सामान्यतया ' योनि ' शब्दका अर्थ CC - 0. Ankur Joshi दारुवनकी कथा २७५ उत्पत्तिस्थान है, जिससे उत्पन्न होकर संसार चालू होता वह ' योनि ' है । संसारके सभी स्थावर - जङ्गमोंकी उत्पत्ति है, शक्ति एवं पुरुषशक्तिके संयोगसे होती है । पदार्थ - विद्यासे स्त्री- तथा अनेक उपपत्तियोंसे यह सिद्ध है कि उस उस उत्पत्तिमें पुरुषशक्ति-रूप लिंग और स्त्रीशक्तिरूप योनिका संयोग स्वतः सिद्ध होता है । तब क्या स्थावर आादियोंके लिए ' योनि ' शब्द या जानेपर प्रतिपक्षी मानुषी स्त्रीकी मूत्रेन्द्रिय ले लेगा? यदि हां, तब तो सचमुच वह दीर्घबुद्धि होगा? क्या च्यूँटीको योनिको भी लज्जा-स्पद विचारसे देखेगा? गेहूँ जो ग्रादिके जिस भाग में अंकुर पैदा होता है, वह भाग अंकुरको योनि है; क्योंकि वह अंकुरकी उत्पत्तिका स्थान है? क्या प्रतिपक्षी वा अन्य ग्रार्यसमाजी उसको भी स्त्रीकी मूत्रेन्द्रिय समझकर उससे लज्जा समझेगा? ऐसी तो शतशः योनियोंको तथा वीजोंको प्रतिपक्षी नित्य खा जाता है, यह क्यों? उनसे शर्माता क्यों नहीं? फलतः संसारके स्थावर - जङ्गम, जड़ - चेतन सभीके कारण-भूत योनि - लिंग भिन्न - भिन्न प्रकारके होते हैं । उत्पत्तिका कारण होनेसे वे भी कहे तो योनि - लिंग ही जाते हैं, परन्तु इनमें न तो घृणा होती है, न लज्जा । केवल मनुष्योंके ग्रङ्गों आजकलके लोगोंको लज्जा होती है । पशुओं तथा स्थावरोंके लिंग - योनि में लज्जा वा घृणा नहीं होतो । इसके अनुसार देवयोनि भी मनुष्य - ग्राकारसे विलक्षण होती है । देवयोनि में मनुष्यकी भांति अपवित्रता नहीं होती । देव-तानों के पाञ्चभौतिक मानुषसदृश शरीर भी नहीं होते; प्रायः तेजस शरीर होते हैं । अतः उनके मनुष्यके समान श्रङ्ग भी नहीं होते; उनका संयोग भी मनुष्योंके समान नहीं होता । स्त्री - पुरुष देवताओं में भी अवश्य होते हैं, उनका संयोग भी Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 154

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 9 ) २७६ मनुष्यों जैसा नहीं होता । सामान्य अर्थ लेकर स्त्री - पुरुषोंकी कल्पना भी वहां प्रालङ्कारितासे हुआ करती है । परन्तु अङ्गी जैसे गेहूँ आदिमें स्त्री - पुरुष शक्तिकी कल्पना लज्जाका कारण नहीं, वैसे देवयोनि के अंगोंमें भी लज्जा नहीं होती । कुछ उदाहरण भी देख लीजिये । ' विष्ठा ' शब्द खाने-से अलग इसमें हुए असार - भागका नाम होता है, परन्तु वेदके अनुसार अग्निदेवकी विष्ठा है ( कृष्णयजुः तं. सं. १ । २ । १२ । ३ ) भस्म क्योंकि अग्निने भी काष्ठादि खाकर प्रसार भाग छोड़ा; पर उससे घृरणा नहीं होती, उससे हम बर्तन मांजते हैं । गोबर, गाय-की पुरीषसे भी घृणा नहीं होती, बल्कि उसको प्रायश्चित्तके लिए भी लिया जाता है, परन्तु मनुष्यकी विष्ठासे घृणा होती है । इसके अनुसार भी लिंग - योनि के व्यापक प्रथोंके अनुसार सोचा जावे; तो शिवलिंगपर जो आक्षेप किये जाते हैं; वे सभी निर्मूल सिद्ध हो जाते हैं । परकोय - स्त्रीका स्तनस्पर्शं बुरा समझा जाता है, पर प्रति-पक्षी भी गायके स्तनोंको निरन्तर छूते हैं, उनका दूध निकालते हैं । उनमें न लज्जित होते हैं, न अश्लीलता समझते हैं । मनुष्य-के मूत्रको वे घृणाको दृष्टिसे देखते हैं, पर गोमूत्रको नहीं । उसे पञ्चगव्यरूप में उपयुक्त भी किया जाता हैं, डाक्टर जी अपने रोगियोंको भी, सम्भव है - पिलाते हों । घोड़ेकी लीदसे लोग जमीनको लीपते हैं; श्रार्य - समाजियोंका परमात्मा तो घोड़ की लेंडी-लीसे यज्ञमें प्रतिपक्षीको भी तपाया करता ( स्वा. द.. का यजुर्वेद भाष्य ३७।६ ) । पुरुषके वीर्यकाः स्पर्श, घृणार्ह माना जाता है,. उसका खाना तो असभ्यता कही जाती है, परन्तु वहुत से लोग मुमुर्गी अंडों को ही चट कर जाते हैं, जिनमें मुर्गा - मुर्गीके रज-:. वीर्यः होते हैं । सम्भव, है डाक्टर जी अपने दुर्बल- रोगियों को भी ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat दारुवनकी कथा २७३ खिलाते हों । ' जलको परमात्माका ' रेत ' माना जाता प्रतिपक्षी भी प्रेमसे पीते हैं । इस प्रकार शिव - पार्वती है, और सृष्टिके माता - पिता हैं; तब उनके लिंग भग भी देवता है । अंग वा मनुष्यके अंगोंकी भांति घृणित वा उपहास्य मानुष " बल्कि संसारके पूजनीय हो जाते हैं । नहीं होते अपने वीर्य और रजको प्रतिपक्षी भी मुखसे नहीं छूते पर जब वही उनका रज - वीय पुत्ररूप होकर योनिके हो बाहर जाता है, तब उसी पुत्रात्मरूप बने हुए अपने रज - त्रीयंको प्रतिद्ध क्षी प्रेमसे छूते हैं; बल्कि चुम्बन भी करते हैं । अन्य पुरुषके रक वीर्यकी पुतली अपनी पत्नी बनी हुईका भी वे मुंह चूमते हैं । प्र अण्डकोषको छूकर वे अपने हाथकी शुद्धि करते होंगे, पर ब्रह अंडकोष ब्रह्माण्डको प्रतिपक्षी भी घृणायोग्य नहीं मानते होते. इस प्रकार वे अपने लिंग योनिको अस्पृश्य, अव्यवहार्य अथवा ह -- पूज्य मानते हैं; पर देवताओंके उन्हीं अंगों में अस्पृश्यता श्रव अव्यवहार्यता वा उपहास्यता नहीं होती, बल्कि वह वैदिकों स्पृश्य तथा पूज्य होते हैं । शिव देवता ही नहीं, महान् देव हैं, उनके भग - लिंग के मानुषी नहीं होते; किन्तु दिव्य एवं पूज्य होते हैं । उत्पत्ति कारणको लिंग कहा जाता है, सो सृष्टिकी उत्पत्तिका कार वही शिवलिंग है । ' अंगारलिंगोऽग्निः धूमलिंगोऽग्निः देनेसे मानुषी मांस- चर्मका लिंग नहीं माना जाता; वहां क चिह्न वाचक होता है, इस प्रकार शिवका ज्योतिर्मय लिंग मांस - चर्म के लिंग अर्थ वाला नहीं; किन्तु महान् देवके तंत्र शरीर वाला होनेसे ज्योतिर्मय चिह्न अर्थ वाला है । सो शिवलिंग ब्रह्माण्डका प्रतीक होनेसे उपास्य होता है । शेष लिंगकी प्रकृति, इसी प्रकार तो खीरेकी प्राकृति भी होती है An eGangotri Initiative

पृष्ठ 155

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२७३ ता है, देवता हूँ । भी मानु नहीं छूते होने के बाहर पंको प्रति पुरुषके क ते हैं । अपने पर ब्रह्मरे नते होगे । अथवा यता प्र ह वैदिक - लिंग को । उत्पत्ति तका कार ऽग्निः ' क वहां जि नय लिय देवके तं । सो | शेष नी होती है । २७८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) प्रतिपक्षी उसे खाते हैं; तो क्या अपना लिंग खाते हैं? पीपलके पत्तेकी, तथा पानके पत्तेकी प्राकृति योनिके समान मालूम होती है, तब प्रतिपक्षी पान खानेपर स्त्रीयोनि खाते हैं? वस्तुतः दया-नंदीय नियोगमय मस्तिष्क होने से प्रतिपक्षियोंको सर्वस्थान यही मूत्रेन्द्रिय दीखते रहते हैं - शायद इसी में सदा रमे रहने से इनको गौतम मुनिका सहस्रभगता शाप मिला हुआ है । शाप हटनेसे म-स्तिष्कका विकार दूर हो जाने पर फिर उन्हें सहस्रनेत्र हो जाने से ठीक - ठीक दीखने लगेगा । तब उन्हें ठीक समझ भी या सकेगी । हमने उनके मस्तिष्कको शुद्धयर्थ प्रयत्न तो किया है, दयानन्दीय नियोगका विकार दूर हो जानेपर फिर वे ठीक समझने लगेंगे । महानन्दाकी कथा | ( ग ) शेष है महानन्दाकी बात; उसपर भी प्रतिपक्षी सुने । वह शिवभक्ता थी, परन्तु थी वेश्या । शिव उसकी भक्ति तथा सत्यता यादिकी परीक्षार्थं गये । वहीं अन्त में शिववचन लिखा है-' सत्यं धर्मं च धैर्यं च भक्ति च मयि निश्चलाम् । परीक्षितुं त्वत्सकाशं वैश्यो भूत्वाऽहमागतः ' ( शतरुद्रसं. २६ । ५४ ) । पूर्व भी यही लिखा है - ' एकदा च गृहे तस्या वैश्यो भूत्वा शिवः स्वयम् । परीक्षितुं च तद्भावमाजगाम शुभो व्रती ' ( २६ । १३ ) । सो परीक्षार्थ विरुद्ध बातें भी करनी पड़ती हैं । उनके हाथमें महारत्नमय करण था, वेश्या उसे देखकर लोभ में ग्रा गई, और उसे उसने लेनेकी इच्छा प्रकट की । यही परीक्षाका अवसर था । शिवने कहा - ' ले लो, पर इसका मूल्य क्या दोगी ( २० )? यहां शिवजीने प्रतिपक्षीके अनुसार कोई फीस नहीं दी; उन्होंने तो उल्टा रत्नका मूल्य मांगा । वेश्याने कहा - ' दिनत्रयमहोरात्रं पत्नी तव भवाम्यहम् ' ( २२ ) ( मैं तीन दिन - रात केलिए तुम्हारी पत्नी बनूंगी ) । महानन्दाको कथा २७६ महादेवने यही उसकी पत्नी होने की परीक्षा लेनी थी । पत्नी का कार्य पातिव्रत्य हुआ करता है, सुख - दुःख की सहचरी, केवल भोगकेलिए पत्नी नहीं होती । सो पतिके मरने पर वह भी मरे, यह उसका उच्च दर्जे का लौकिक धर्म हुआ करता है, यही शंकरने देखना था । उस समय वे वैश्य थे । उन्होंने रत्नमय कंकरण तो दे ही दिया, एक लिंग भी सुरक्षित बना रखने के लिए दिया था ( २८ ) पत्नीत्वकी पहली साधारण परीक्षा थी पति के साथ इकट्ठे सोना । मैथुन तो उसकी परोक्षा व्यर्थ थी, क्यों कि कौन वेश्या भला मैथुनकी मनाही करे । यहां तो वास्तविक यह परीक्षा करनी थी कि यदि वह पत्नी बनती है; तो मरे पीछे सती होती है या नहीं । सो वह सुखपूर्वक सोगई- ' सा तेन सङ्गता रात्रौ वैश्येन विटर्धांमरणा । सुखं सुष्वाप पर्यङ्के मृदुतल्पोपशोभिते ' ( ३० ) यहां इकट्ठा शयन तो कहा है, पर मैथुन कहीं भी नहीं कहा । ' विटधर्मी ' का अर्थ है वर्तवर्मी; सो परीक्षामें घूर्तता करनी ही पड़ती है । वेश बदल लेना - यह यहां बूर्तताका लक्षण कहा है । वैसे तो ' रामा रमरणायोपेयते न धर्माय कृष्णजातीया ' ( निरुक्त १२ । १३ । २ ) इसके अनुसार यहां वैश्यका उससे रमरग भी हो जाता; तो वह कृष्ण ( शूद्र ) जातीयाकेलिए वैदयका कथञ्चित् ग्रभ्यनुज्ञात था; पर वह तो वहांपर हुआ नहीं । वह तो महादेवके मैथुनको सह भी नहीं सकती; वह तो प्रकृतिरूपा पार्वतीमें सामर्थ्य थी, अन्य स्त्रीमें नहीं । यह प्रतिपक्षी भी मानते हैं - ' पार्वतीं च विना नान्या लिङ्ग धारयितुं क्षमा ' ( मेरे लिङ्गको पार्वती के विना और कोई धारण नहीं कर सकता ' ( ' शिवलिंग पूजारहस्य ' पृ. २५-२६ ) यह हमारा किया हुआ अर्थ नहीं; प्रतिपक्षीका किया हुआ अर्थ है । जब ऐसा है; तो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 156

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २८० मानुषी वेश्या में वह सम्भव कैसे हो? यदि यहां लिंगका यह अर्थ नहीं; तब ' शिवलिंग ' में भी यह अर्थ नहीं ले सकते । यदि वहां यह अर्थ है; तो मानुषी - वेश्यामें भी शिव - मैथुन उपपन्न नहीं हो सकता । महादेवकी यह विशेषता थी कि - ' विकारहेतावपि विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीरा: ' ( कुमारसम्भव १ । ६ ९ ) । इस-लिए शिवपुराण में भी शिवको ' धीरः ' ( शतरुद्र. २६ । ४२ ) कहा है । यहां बारूद और आग इकट्ठे रहे, फिर भी फटे नहीं । यह सिधासव्रत होता है । जैसे दम्पती पहले तीन दिनों ( चतुर्थी-कर्मसे पूर्व ) वा अन्य विशेषव्रतोंमें इकट्ठे सोते हैं; और ब्रह्मचारी रहते हैं । पति - पत्नी बन जानेपर भी वे मैथुन नहीं करते, मैथुन • से रहित इकट्ठे सोते हैं । देखिये - पारस्करगृह्यसूत्र ( १ । ८ । * १६ ) । जैसे श्री सीता वनमें श्रीरामके साथ रात में इकट्ठी सोती हुई भी ' नियता ब्रह्मचारिणी ' ( २ । २७ । १३ ) श्रीवाल्मीकिके इन शब्दों में ब्रह्मचारिणी रहती थी, वैसे यहां पर भी समझ ' लेना चाहिये । जो इसे नहीं समझ वा मान सकते; वे स्वयं विकारी हैं । श्रीशिव पूर्णकाम थे, इसके अतिरिक्त पार्वती जैसी अलौ-किक - सुन्दरी उनकी पत्नी थी । तव उन्हें निम्नकोटिकी एक साधारण वेश्याकी कोई आवश्यकता भी नहीं थी; वहां तो केवल उसकी जन - प्रसिद्ध शिवभक्ति तथा सत्यताकी परीक्षा करनी थी । एतदर्थ वहां उनका प्राना हुआ; वेश्या - गमनार्थं नहीं प्रतिपक्षीके स्वामीके पास एक बालविधवा २३ वर्षकी युवति रमाबाई आकर टिकी थी । स्वामीने उसे समागमकी ' तिथि लिख भेजी थी । स्वामीने उसे दुशाला प्रादि भी भेंट ' महानन्दाकी कथा किया था । अब वे जिस ढंगसे वहां ब्रह्मचारी यहां पर भी प्रतिपक्षीको समझ लेना चाहिये । यदि रहे; ' व कहा जावे कि वे रमाबाईके साथ इकट्ठे तो नहीं सोये यह स्वामीकी दुर्बलेन्द्रियता समझनी पड़ेगी कि वैसा, तो उन्हें अपनेपर काबू पाने का विश्वास नहीं था; पर श्रद्ध करें क एवं संयतेन्द्रियचित्तको ऐसे अवसरोंपर कोई डर नहीं रह हमारे यहां तो ऐसे बहुतसे उदाहरण मिलते हैं; जहां साथ इकट्ठे सोते हुए भी पुरुष अविचल रहे । देखिये- " ज महाभारत के अनुशासनपर्व में प्रष्टावक्र के साथ एक से इस गई । उसकी कामेच्छा जानकर भी वे शान्त रहे - सो वैश भुजा तु ऋषि प्रीत्या नरर्षभ! निर्विकारमृषि चापि इस कुड्योपमं तदा ' ( १ ९ । ७६,८८, २०१२ ) कैसा याद जो वही आदर्श यहां वेश्या के साथ सोनेपर भी शिवका था । जल पास उर्वशी अप्सरा उसपर अनुरक्त होकर ग्राधीरातको । इस में आई थी; तथापि अर्जुन विकारी न हुए; नपुंसकताका ताथ ' से दिया शाप सहर्ष स्वीकार कर लिया । तड़ इस प्रकार प्रतिपक्षी यहां भी समझ ले । वेश्याने दग्ध सम्भव नहीं भी था । पहली रात में सोते ही शिवसेनद मुत्स संरक्षणार्थं दी हुई लिंगमूर्तिको शिवमायासे आग ल ( 38 और शिवने उसके प्रतीकाररूपमें जलने की तैयारी कर ' विव अब वह फालतू समय वहां कहां था? स्पष्ट है कि वहां ( ४२ की गुंजायश ही नहीं थी । प्रतिपक्षी भी स्वयं मानता है । करन शिवका लिङ्ग सदा ब्रह्मचर्य में रहता है- ' नित्येन ब्रह्मचर्येण ि बनी मुष्य यदास्थितम् । महयत्यस्य ( पूजयत्यस्य ) लोकश्च प्रियमे गया । ` त्मनः । लिंगमेवार्चयन्ति स्म यत्तदूर्ध्वं समास्थितम् ' ( महा तेना १६१ । १५-१७ ) । यहां प्रतिपक्षी अर्थ करता है - इसमें नि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 157

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 157 का मूल पृष्ठ
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२८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) रहे स्पष्ट शब्दोंमें बताया है कि- शिवजीका लिंग सीधा ऊपर खड़ा यदि यहां वह है और ब्रह्मचर्य में स्थित है ' ( ' शिवलिंग पूजारहस्य ' पृ ० १४ ) सोये, तो यहां प्रतिपक्षीने ' नित्यं ' शब्दका अर्थ छोड़ दिया, तब ' नित्य - वैसा करें ब्रह्मचारी शिवलिंगके ' मैथुनका अर्थ प्रतिपक्षी अपने विरुद्ध कैसे पर श्रि कर सकता है? | नहीं रह तब महादेवके ही प्रभावसे वहां अग्नि लग गई ( ३२ ) वहां जहां से लिंग भी जिसे महादेवने महानन्दाको रखनेकेलिए दिया था, खिये-जल गया । ' स्तम्भेन सह निर्दग्धं तल्लिंगं शकलीकृतम् ' ( ३५ ) एक सं इसपर महादेवने दूरका विचार किया कि इस मायिक कृत्रिम रहे -- " सोन वैश्यशरीरको जिसने वेश्याका स्पर्श किया था; जलाया जाय, पि चापि ।. इससे लोकदृष्टिमें प्रायश्चित्त भी हो जाय; और फिर यह वेश्या सात जो हमारे इस वैश्य - देहकी पत्नी बनी थी, यह भी उसके पीछे का था । जलती है या नहीं; यह इसकी सत्यता की परीक्षा भी हो जाय । रातको इस प्रकार शंकरने ' एका क्रिया द्वयर्थंकरी प्रसिद्धा ' न्यायको चरि-कताका तार्थं किया- ' दृष्ट्वा ह्यात्मसमं लिंगं दग्धं वैश्यपतिस्तदा । ज्ञातु तद्भावमन्तःस्थं मरणाय मतिं दघे ' ( ३६ ) ' शिवलिंगे तु निभिन्ने । वेश्या दग्धे मत्प्राण- वल्लभे । सत्यं वच्मि न सन्देहो नाहं जीवितु-शिवसेनद मुत्सहे ' ( ३८ ) ' चितां कारय मे भद्रे! प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् ' याग लग ( ३ ) उसे चिता बनानेकेलिए कहा, और वे चितामें घुस गये-वारी क " विवेश पश्यत्सु नरेषु धीरः सुकौतुको सङ्गति भावमिच्छुः ' कि वहां ( ४२ ) इससे सत्यव्रता वेश्या दु: खी हुई, और अपने धर्मको पूरा मानता है । करनेकेलिए वन्धुत्रोंको कहा कि - ' दिनत्रयमहं पत्नी वैश्यस्या-चर्येण ि मुष्य सम्मता । ( ४५ ) मैं तीन दिनकेलिए इस वैश्यकी पत्नी च प्रियमे बनी थी । मुझसे की हुई सावधानतासे यह शिवभक्त जल म् ' ( महा गया है, मैं भी पत्नीधर्मके कारण जलती हूँ - ' कर्मणा मत्कृ-- इसमें तेनाऽयं मृतो वैश्यः शिवव्रती । तस्मादहं प्रवेक्ष्यामि सहानेन महानन्दा की कथा हुताशनम् ( ४६ ) ' सत्ये सर्वं प्रतिष्टितम् ' ( ४८ ) । बन्धुयोंने २८३ बहुत निषेध किया; पर सत्यव्रता वह जलनेको तैयार होगई । ( ४ ९ ) । ' तां पतन्ती समिद्धेग्नी स्वपदार्पितमान साम । वारयामास विश्वा-त्मा प्रादुर्भूतः स वै शिवः ' ( ५१ ) तब विश्वात्मा ( परमात्मा ) शिवने प्रकट होकर उसे बचा लिया । परीक्षा हो गई; और वह फर्स्ट - डिवीजन में पास हो गई और फिर भी शिवचरणकमल का स्पर्श चाहा । कहां है यहां प्रतिपक्षिसम्मत व्यभिचार? व्यभिचारमय दयानन्दी - नियोगने अपने इन भक्तोंको ऐसा अपने से ग्रभिन्न वना दिया है कि - सर्वत्र इनको ' दिल्लीको छिछरोंका ख्वाब ' व्यभिचारके सपने प्राते हैं; इनकी पेटेन्ट नाकको सर्वत्र व्यभि-चारकी गन्ध श्राती है । मस्तिष्कको शुद्ध रखनेपर ही यह गम्भीर विषय समझमें आते हैं, अन्यथा नहीं । तब यहां स्पष्ट हो गया कि यह तो उस सत्य - निष्ठा में प्रसिद्ध वेश्या की सत्यनि-' ठताकी परीक्षा थी, वेश्यागमन नहीं । इस प्रकार पुराण में . अन्यत्र गण्डकी - वेश्याकी विष्णुद्वारा परीक्षा श्राई है । वे गण्डकी को मनवा गये कि - एक रात वह उनकी पत्नी रहेगी । वे बड़े सु-न्दर- पुरुषरूपमें प्राये थे । जब वे रातके ६-१० बजे आये, तो दे--खते ही देखते उन्हें गलित - कुष्ठ हो गया । तब वह वेश्या उसे रुई से दवाई लगाती रही । फिर रात्रिके २-३ बजे उस पुरुषको हैजा हो गया; तब वह वेश्या उस पुरुषके दस्त - उल्टियां साफ करती रही । फिर सूर्योदय से पूर्व उस पुरुषकी मृत्यु होगई; तब वह सम्बन्धियोंके निषेध करनेपर भी उसके साथ सती होने को तैयार हो गई, क्योंकि उसने कहा था कि- मैं एक रातकेलिए इसकी स्त्री बनी थी, मैंने इसकी रोगमें शुश्रूषा की; अब इसके -मरनेपर मेरा भी अनुमरण स्वाभाविक है । जब चितामें श्राग CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२८४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) दी गई; तो उसने देखा कि वह पूर्व मृतक पुरुष हँस रहा है । वह बड़े आश्चर्य में पड़ी, और पूछा कि तुम कौन हो? पहले सुन्दर थे, फिर गलितकुष्ठी बने, फिर हैजा के शिकार बने, फिर मर गये और अब हंस रहे हो । तब भगवान् ने अपने स्वरूपमें प्रकट होकर उसकी सत्यनिष्ठताकेलिए उसे दर्शन दिया और सद्गति दी । वही गण्डकी नदीरूपमें परिणत हुई । फलतः यहां वेश्याकी भी सत्यनिष्ठताकी परीक्षा अभिप्रेत है; और उन्हें शिक्षा दी है कि तुम एक रात्रिकेलिए भी जिसकी स्त्री बनी हो, उसका सर्वात्मना संरक्षण और शुश्रूषण करो; दूसरी और ध्यान न दो । सो किसी कथाका भी तात्पर्य मात्र लिया जाता है; पर प्रतिपक्षी लोग उधर ध्यान न मस्तिष्कको कामसंभृत सिद्ध करनेकेलिए जोंककी पूर्ण स्तनमें भी पीप ढूंढते रहते हैं । इससे उनका शोचनीय है | २२ | कौन पिता? | ( ३२ ) प्रश्न - ब्रह्मा, विष्णु, महादेव तीनों ' बाप होने का दावा करते हैं । बतावें कि वास्तव में बननेका दावा किसका सच्चा है? । २३ । देकर अपने भान्ति दुग्ध--चरित्र अवश्य एक दूसरे के तीनोंमें बाप उत्तर- कई बार इसपर प्रकाश डाला जा चुका है । मूल पदार्थ एक ही होता है, वही ग्रज, अविनाशी, निर्गुण, निर्वि--कार तथा सर्व व्यापी होता है । वही मूल पदार्थ अपनी शक्तिसे अनेक सगुणरूपों में लीलार्थ व्यक्त होता है । वे हैं सगुण रूप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर । श्रीमद्भागवत में कहा गया है - ' सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तैर्युक्तः परः पुरुष एक इहास्य धत्ते । स्थित्यादये हरिविरिञ्चिरेति संज्ञां श्रेयांसि तत्र खलु ' सत्त्वतनोर्नृणां स्युः ' ( १ । २ । २३ ) ( प्रकृति के तीन गुरण ' हैं;. कौन पिता? २८६ सत्त्व, रज और तम । ' प्रकृति स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्या न उस मायया ' ( गीता ४ । ६ ) के अनुसार अपनी प्रकृतिको स्दो ' नेति-करके संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके लिए एक परमात्मा हो ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन तीन संज्ञाग्रोको ि उसका करते हैं । ' गुणमय्या स्वशक्त्याऽस्य सर्गस्थित्यपयान् विम वासन पड़ता धत्से यदा स्वदृग् भूमन्! ब्रह्म - विष्णु- शिवाभिघाम् ' ( 512 किसी २३ ) ( हे प्रभो! अपनी गुणमयी शक्ति से इस जगत्को । सम्बन्ध स्थिति और प्रलय करने केलिए आप अनन्त एक - रस होनेपरः परम - ल ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि संज्ञाएं धारण कर लेते हैं । ) यहो सकता विष्णुपुराण में भी कही है- ' सृष्टिस्थित्यन्तकरणी ब्रह्मवि होता ह शिवात्मिकाम् । स संज्ञां याति भगवान् एक एव जनार्दन: ( और उ अंश २ । ६६ ) । वह रूप सगुणका भाव है गुरगाधिष्ठाता, वस्तुत: वे भी रूपोंको होते हैं । शिवपुराण रुद्रसं. सतीखण्डमें कहा है- ' कस्त्वं बो को ब्रह्मा तवैव परमात्मनः । श्रंशत्रयमिदं भिन्नं सृष्टि - स्थिर उन्न -कारणम् ' ( १ | ७२ ) चिन्तयस्वात्मानात्मानं स्वलीलामृत कि को वेद एकस्त्वं ब्रह्म सगुणा ह्यांशभूता वयं त्रयः ( ७३ ) शिरोग्री यम, व ' भेदेन यर्थकस्यैव वर्ष्मणः ( शरीरस्य ) । अंगानि ते त मुख्य मा तीन म तस्य भागत्रयं हर! ' ( ७४ ) इस प्रकार दशम प्रध्यायमें भीर भीत्रि कहा है- ' युवयोरन्तरं नैव तव रुद्रस्य किञ्चन ' ( १० । ६ ) ३ उनकी तश्चापि चैकत्वं वरतोपि तथैव च । लीलयापि महादिर मन अि सत्यं सत्यं न संशयः । रुद्रभक्तो नरो यस्तु तव ( ( वि विष्णोः ) करिष्यति । तस्य पुण्यं च निखिलं ध्रुवं भस्म भविष्यति ' योंको उधर वि त नरके पतनं तस्य ( ९ ) । ' त्वं ब्रह्मा त्वं च विष्णुः की विन ( मैत्र्युपनिषद् ५ । १, ४ । ४ ।१२-१३ ) की जय-परन्तु मूलरूपके अनिर्वचनीय, प्रचिनय एवं ग्राम्य दोनों पक्ष CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) २८६ म्भवाम्या न उसकी स्तुति हो सकती है, न पूजा वा उपासना । वहां पर तिको दोह ' नेति नेति ' ( बृहदारण्यक ४ ( ६ ) । ४ । २२ ) कहने के अतिरिक्त एक उसका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं हो सकता; न उसका ध्यान को वा सन्ध्या हो सकती है । न हमारे जीवनपर उसका कोई प्रभाव या वि पड़ता है, न हम उससे कुछ प्रार्थना ही कर सकते हैं । उस समय T ( 1 ) किसी मानुषी - गुण प्रेम - दयालुता प्रादिका हम उसके साथ गत्को सम्बन्ध नहीं कर सकते । कदाचित् वह युक्त - योगियोंके ज्ञानका स होनेपरः परम लक्ष्य तो हो सके, परन्तु वह किसीसे उपासनीय नहीं हो 1 ) यहो सकता । उपासनीय वह अपने विशिष्ट अर्थात् सगुण रूपमें ही गीं ब्रह्मवि होता है । मनुष्य के हृदयमें उसके जिस रूप केलिए भक्ति, पूजा र्दन: ( और उपासना है, वह उसका विशिष्ट एवं सगुण रूप ही है; और वह रूप वेदादि - शास्त्रोंमें अनेक रूपोंमें पूजा जाता है । उन्हीं भो रूपको देवता कहते हैं । " कस्त्वं को सृष्टि स्थिर - उन्हींमें कई हो जाते हैं अंगी; और कई अंग होते हैं । उन्हीं-लाघृत कि को वेदपुराणादिमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, अग्नि, वायु, सूर्य, इन्द्र, शिरोग्री यम, वरुण आदि कहा जाता है । इनमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रको न ते त मुख्य माना जाता है । तीन गुण सर्व व्याप्त होनेसे देव भी न्यायमें भी तीन मुख्य माने जाते हैं । उन्हीं का वर्णन करनेवाले पुराणादि भी त्रिगुणात्मक होते हैं । फिर भक्त भी त्रिगुणात्मक होने से २०६ ) उनकी अपने नुकूल एक देवमें रुचि हुआ करती है । लेकिन महाविर वैष्णोः ) मन अस्थिर होनेसे कभी वह इधर जाना चाहता है, कभी विष्यति ' । उधर । तब उसका हाल चमगादड़ जैसा हो सकता है, जो पक्षि-यों को विजय में कहता था- मैं पक्षी हूँ, मेरे पंख हैं, और पशुओं-को विजयमें कहता था - मैं पशु हूँ, मेरे दान्त हैं । कई बार दोनों की जय - पराजय में वह दोनों प्रोर ग्राता - जाता था; पर फिर • अगम्य दोनों पक्षोंने उसका बहिष्कार कर दिया । CC - 0. Ankur Joshi कौन पिता? २८७ इस कारण एक पुराणमें एक देवको बड़ा बताया जाया है, और दूसरेको छोटा । एक देवकी स्तुति तथा दूसरे देवकी निन्दा प्राती है । जो उच्च ज्ञान रखता होगा, वह तो इसमें श्रद्वैतता-का, तीनोंके प्रभेदका तात्पर्य ले लेगा । वह किसीकी स्तुति तथा दूसरेकी निन्दाको श्रर्थवाद, केवल प्रवर्तक- निवर्तक समझेगा । मध्यम ज्ञानवाला तीनमें किसी एकको अपना उपास्य चुन लेगा, दूसरेकी ओर दृष्टिपात भी न करेगा; और ग्रथम ज्ञान वाला अपने देवसे इतर देवकी अपने पुराण में निन्दा देखकर उसे ग्रहण न करेगा; और अधमाधम व्यक्ति केवल निन्दावाक्यों-को लेकर शिवभक्तके श्रागे विष्णुके पुराण में प्रोक्त शिवके निन्दक वाक्योंको सुनाकर उसको उससे च्युत करेगा; और विष्णु भक्त के सामने शिवके पुराण में कहे विष्णु - निन्दक पद्यों-को सुनाकर उससे उसको च्युत करेगा; और उन दोनों पुराणों-को सर्वसाधारण में परस्पर विरुद्ध दिखला कर उनकी इतस्ततः निन्दा फैलाता फिरेगा, और स्वयं ' इतो भ्रष्टः ततो नष्टः र होता हुआ अपने नवीन- सम्प्रदायके सब्जबाग दिखाकर उन लोगों को उसमें फंसाने की चेष्टा करके अपने पैसे खरे करनेकी चेष्टा करेगा । सो प्रतिपक्षीको जानना चाहिये कि - शिवके पुराण में यदि शिवको पिता तथा ब्रह्मा, विष्णु श्रादिको पुत्र कहा गया है, उसमें प्राश्चर्यजनक कोई बात नहीं । यह तीनों स्वयम्भू हैं, किसी ने किसीको किसी स्त्रीसे पैदा नहीं किया । कोई किसी के मुखसे प्रकट हुआ, कोई किसीके माथे से कोई किसकी नाभिके पद्म से । सो यहां ' पिता - पुत्र ' शब्द लाक्षणिक हैं, वास्तविक नहीं । कवि नामक अङ्गिराका लड़का शिशु वचपन में अपने वाप - दादोंको स्वदृष्ट मन्त्र पढ़ायां करता था । पढ़ाते हुए उन्हें कहता था-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) २८८ पुत्रो! पढ़ो, समझो | देखिये इस पर मनुस्मृति - ' प्रध्यापयामास पितृन् शिशुरांगिरसः कविः । पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परि--गृह्य तान् ' ( २ । १५१ ) इससे उसके पितरोंको क्रोध आया कि-हम पितरोंको यह पुत्र कैसे कहता है? यह कथा ' ताण्ड्य महा-ब्राह्मण ' में भी आई है- ' स ( शिशुः ) पितृन् पुत्रका इत्यामन्त्रयत ' ( १३ । ३ ) अतः प्रक्षिप्त भी नहीं; जैसा कि आर्यसमाजी श्री-तुलसीरामस्वामीने अपनी मनुस्मृतिकी टीकामें उसे प्रक्षिप्त श्लो-कोंमें रख दिया है । उन्होंने देवतानोंसे ' पुत्रकाः ' कहने के प्रौचि-त्यपर पूछा । इसपर देवताओंोंने कहा कि इसने आप लोगोंको ' पुत्र ' ठीक कहा है । ' देवाश्चैतान् समेत्योचुर्न्याय्यं वः शिशुरुक्त-वान् ' ( २ । १५२ ) ' अज्ञं हि बालमित्याहुः, पितेत्येव तु मन्त्रदम् ' ( १५३ ) । फिर देवताओंोंने इसे स्पष्ट किया- ' न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः । यो वै युवाऽप्यधीयानः तं देवाः स्थविरं विदुः ' ( १५६ ) ' स्वधर्मस्य च शासिता | बालोपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ' ( १५७ ) । अर्थात् जो उस विषय में अज्ञानी है, वह वृद्ध होनेपर भी बालक है, और ज्ञानी, बालक होनेपर भी पिता है । पुस्तकोंमें आता है- ' बालानां सुखबोधाय, बालानां सुखबुद्धये, वालधीवृद्धिसिद्धये ' सो यहां उस विषयके अनभिज्ञको चाहे वह १०० वर्षका भी हो, बालक कहा गया है । मनुस्मृति ( २ । १३५ ) में दश वर्षके ब्राह्मरणको वर्णोच्चता के कारण पिता और १०० वर्षके राजाको वर्णनिम्नता के कारण ' पुत्र ' बताया गया है । ऋ. सं. में मन्त्र आया है- ' यः ता विजा-नात् स पितु: पिताऽसत् ( १ । १६४ । १६ ) अर्थात् विद्वान् पुत्र अपने पिताका भी पिता है । पिताका पिता कैसे? यहां भी वहा तात्पर्य है । प्रतिपक्षी के प्रक्षेप्य पद्य यह हैं- ' कुतस्त्वमागतो वत्स! " कौन पिता? ( शिव. वायव्य २ । ३४ । २२ ) यहां विष्णुने ब्रह्माको है । तब रजोगुणी ब्रह्मा क्रोधमें आकर बोले- ' वत्सेति पुत्र ब्रूषे प्रपञ्चो यस्य मे कृति: ' ( ३४ । २३-२४ ) । मां कु कहते हो, मैंने तो सभीको पैदा किया है । विष्णुने मुझे पुत्र को नपि ममैवांशाद् अवतीर्णः ' ( २६ ) तवापि जनकं कहा- ' भवा साक्षाद् वमवमन्यसे ' ( २८ ) तुम भी मेरे अंशसे अवतीर्ण हुए हो; म क मुझ पिताको भी तुम अपमानित करते हो '! क इस विवादका अन्त महादेवको इन दोनोंसे बड़ा ( पिता ) करनेमें हुआ । ‘ ब्रह्मा सस्मार पितरं भगवन्तं त्रिलोचनम् ' ( शिर ७। १ । ११ । २१ ) यहां शङ्करको ब्रह्माका पिता कहा है । प्राणेश्वरो रुद्रो ' ‘ “ प्रादुरासीत् प्रभोर्मुखात् ' ( १२ । २६ ) यह रुद्रकी ब्रह्माके मुखसे उत्पत्ति बताई है । ' मां विद्धि परमात्मान तव पुत्रत्वमागतम् ' ( १ । १२ । ३८ ) यहां रुद्रने ब्रह्माको पिता कहा है । ' वत्स! वत्स! विघे! विष्णो! मायया पर माहिती ( ७ । २ । ३५ । ७१ ) यहां महादेवने ब्रह्मा और विष को अपना लड़का बताया है । इन सबका रहस्य वही है, पूर्व कहा जा चुका है । जो ज्ञान देने वाला होगा, वही पिता कहा जावेगा, चाहे वह छोटा भी हो । एतदादि स्थलों में पिता-पुत्र शब्द लाक्षणिक, प्रौपचारिक हैं । पुराण में कथा आई है कि शिव - पार्वती विवाहमें प्राचार्यने पूछा कि अपने पिता, दादा, प दादा का नाम बताइये । शिवने कहा कि मेरे पिता ब्रह्मा हैं । ष्णु दादा हैं; और पड़दादा सबका मैं हूँ, सब हँसने लगे । इ सबका रहस्य यह है कि यह तीनों एक हैं, जैसा कि - श्रीमद्भार वतमें कहा है - ' सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तैर्युक्तः परः पुत एक इहास्य धत्ते, स्थित्यादये हरिविरञ्चिहरे तिसंज्ञाः श्रेयांसि त स.प्र. १ ९ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative