सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 181–190

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ३२८ पद्य मिलते हैं । वह रति ( आनन्द ) उस काली स्त्री क्षयेन्नित्यें इस तरहके उससे क्रूरता कैसे हुई? क्या प्रतिपक्षीका गोमांसभ को मिली प्रक्षेपकी , यह प्रसन्नता वा धुन में यह नहीं सोच सकता? । अर्थ होता मस्तिष्क तब!! अब प्रतिपक्षी इसका वास्तविक तात्पर्यं सुने और समझे– सुधार गया । ' कृष्णवर्णाका श्रर्थ है ' शूद्र - वर्णवाली स्त्री ' । सत्त्वगुरणका वर्णं शुक्ल और रजोगुणका रक्त और सत्त्व- रजके मिश्रणका पीत ' तथा वन तमोगुणका वर्णं - कृष्ण माना गया है । यह वर्ग - गुरण क्रमशः धर्मा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्णोंमें माने गये हैं । सो शूद्रासे (? ) सि द्विन धर्मार्थ तो विवाह नहीं कर सकता; किन्तु कामार्थं कर बनाकर दा सकता है; क्योंकि - शूद्रका यज्ञादि- धर्मकर्ममें अधिकार नहीं! महाभाष्यमें कहा है- ' दशपुरुषानुकं यस्य शूद्रा न विद्य ेरन्, स प्रश्न नात सोमं पिबेत् ' ( ४। १ । ३ ) इसका अर्थ यह है कि - जिस पुरुष ह इकतीस की दस पीढ़ियों में शूद्रा स्त्रियां न रही हों; वह यज्ञ करे । प्रमारण का सर्वाङ्गी तो इसपर बहुत हैं, पर यहां उनके देनेका स्थान नहीं । ' तस्मा-सर्वाङ्गीन शूद्र यज्ञेऽनवक्लृप्त: ' ( कृ. य. तै. सं. ७ । १ । १ । ४-६ ) आदि स्मृतिका है । वैदिक प्रमाण बहुत - से हैं, इस विषय में ' आलोक'का श्य और ६ ठा किश्त में रवां के पुष्प देखिये । सो शूद्राको धर्मार्थ न लेकर कामार्थं लिया जाता है । जैसे कि - मनुस्मृतिमें कहा है- ' कामतस्तु प्रवृत्तानामिमाः तु ॥ स्युः क्रमशो वराः ' ( ३ । १२ ) यहाँ भिन्नवरर्णा स्त्रीको कामार्थं धर्मकृत्य से लेना कहा है, उसमें शूद्रा भी कही है ( ३ । १३ ) स्नानादि, उपवास रख वसिष्ठस्मृतिमें उक्त वचनसे पूर्व कहा है - ' नाग्नि चित्वा उसे उनसे रामामुपेयात् ' ( १८ । १५ ) अर्थात् अग्निहोत्र करके रामा शिवपुरा ( शूद्रा ) का गमन न करे । ' शूद्रा ' को ' रामा ' क्यों कहा जाता तिसे ) प है; इसपर वसिष्ठजीने वही प्रतिपक्षीसे उद्धृत वचन लिखा है कि-यः ] यथा ‘ कृष्णवर्णा’– इत्यादि । ' कृष्णवर्णा ' का अर्थ है शूद्र जातीया । आदिमें शूद्रमें तमोगुण ' जन्मना ' होता है । और प्रतिपक्षीके अनुसार CC - 0. Ankur Joshi Collection कृष्णावरणका अर्थ ३२ ९ ' कर्मणा ' होता है । तमोगुरण काले रंगका होता है, इस पर हम संकेत दे चुके हैं । सांख्यमें प्रकृतिके तीन गुण दिखलाये हैं- ' अजामेकां ल! हित - शुक्ल कृष्णाम् ' ( सांख्य तत्त्वकौमुदी १ सांख्यप्रवचन-भाष्य १ । ६६ ) । इसमें लोहित ( लाल रंग ) से रजोगुण शुक्ल ( सफेद रंग ) से सत्त्वगुण और कृष्ण ( काले ) रंगसे तमोगुण लिया जाता है । सो प्रकृति संसारका तिरङ्गा - कण्डा है । महा-भारत ( शान्तिपर्व ) में कहा है- ' ब्राह्मणानां सितो ( शुक्लो ) वर्ग:, क्षत्रियाणां तु लोहितः । वैश्यानां पीतको वर्णः, शूद्राणा-असित: ( कृष्णः ) तथा ' ( १८८।५ ) यहां तो यह स्पष्ट कर दिया गया है कि शूद्रका काला रङ्ग माना गया है । श्रीमद्भा-गवत में भी ' अङ्घ्रिचित - कृष्णवर्णः ' ( २।१।३७ ) में ' कृष्णवर्ण ' पादज ( शूद्र ) का रखा गया है । देवीभागवतमें लिखा है - ' श्वेत-वर्णं तथा सत्त्वं { ३ । ८ । ४ ) ' रक्तवरण रजः प्रोक्तं ' ( ३ । ८ । ६ ) ' कृष्णवणं तमः प्रोक्तम् ' ( ३ । ८ । ९ ) सो शूद्राके वेदाधिकार सर्वथा न होने से उसे ' धर्मपत्नी ' नहीं बनाया जाता । यही यहां तात्पर्य है ' काले रङ्ग वाली स्त्री ' अयं भले ही हो, पर तात्पयं : यह नहीं । 3 • न. केवल यह बात श्रीवसिष्ठने लिखी है, किन्तु वादि - प्रति-बादिमान्य - निरुक्तका श्रीयास्कने भी लिखी है । देखिये- ' अग्नि चिल्वा न रामामुपेयात् ' इसपर श्रीयास्कमुनि कारण बतातें हैं + ' रामा रमणाय उपेयते, न धर्माय, कृष्णजातीया ' ( १२ । १३. २ ) देखिये वही वसिष्ठ - जैसे शब्द हैं न? ' इस पर श्रीदुर्गा-चार्य ने अपनी वृत्ति में लिखा है- रामा इति शूद्रा उच्यते ' इस पर वे कारण बताते हैं - ' सा हि रमणाय एव उपेयते, रमणार्थमेव सा, न् धर्माय ' । वसिष्ठने ‘ कृष्णवर्णा ' लिखा था, श्रीयास्कने ' कृष्ण-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 182

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३३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जातीया ' लिखा । सो इससे यहां सूचित हो रहा है कि यहां पर जाति वा वर्ण शब्द समानार्थक हैं । शूद्रका वैदिकयज्ञमें निषेध होनेसे उस शूद्र जातीयाके साथ भीरमरणका यज्ञ - कर्मके बाद निषेध किया है । यह धार्मिक कारण है । वैज्ञानिक - कारण यह है कि- देवताओंकी शूद्रोंके यज्ञसे तृप्तिका अभाव तथा उनकी निस्तेजस्कता होती है । देखो प्रतिपक्षियोंसे बहुत मान्यतावश उद्धृत किया जाता हुआ भविष्य-पुराणस्थित मिश्र देशके शूद्रोंका इतिहास, जिन्होंने अपने उद्धा-रक कश्यपजीके स्वगंग मनके बाद उनकी इच्छा के विरुद्ध बनावटी ब्राह्मण बनकर यज्ञ करने शुरू किये थे; इससे इन्द्रदेवताने अपनी तथा अन्यदेवताओंकी तृप्ति न होने से अपनी ( देवताओंकी ) निस्तेजस्कता दिखलाई थी । देखिये - भविष्य पुराण ( ३।४।२० । ७४-७७ ); अथवा ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाका तृतीय पुष्प । इससे शूद्रका वैदिक यज्ञोंमें अनधिकार दिखलाया गया है । ' सर्वेषा शूद्रामप्येके मन्त्रवर्जम् ' ( १।४।११ ) पारस्कर-गृह्यसूत्रके इस सूत्रमें सभी टीकाकारोंने निरुक्तका उक्त पाठ उद्धृत किया है । हम यहां हरिहरभाष्यसे कुछ पाठ -उद्धृत करते हैं — ' शूद्राया धर्मकार्येष्वनधिकारात् । कुतो नाधिकार इति चेतु? रामा रमणाय उपेयते न धर्माय कृष्णजातीया, इति निरुक्तकार यास्काचार्याः ' इति वचनात् । अतो रमणार्थं शूद्रापरिणयनं... तस्मात् शूद्रापरिणयनं भोगार्थमिच्छया कुर्वतो न शास्त्राप्ति-क्रम: ' । इस प्रकार जयराम, गदाधर, कर्काचार्य: यादि सभी अपने भाष्यों में यही वचन लिखा है । प्रतिपक्षी भले ही अज्ञान-वश वादि - प्रतिवादि - मान्य श्रीयास्कको प्रमाणः न माने, जैसा कि अनभिज्ञतावश उसने ' अवतार - रहस्य ' ( पृ. १३६ पं. २०-२६ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection कृष्णावरणका तात्पर्य में हमसे लिखे यास्कवचन पर आक्रमण कर दिया ३३ । ३३ बात निर्मूलन हुई । है, पर यह किस सम सो यहां काले रंग की स्त्री इष्ट न होकर ' तमोगुरणा यह श्रथं इष्ट है । ‘ पत्युर्नो यज्ञ - संयोगे ' ( ४ । १ । ३३ ) इस शूद्रा पाणि स्त्री '. । निसूत्रसे यज्ञादि धर्म - कर्मार्थं मुख्यतया ' पत्नी ' होती है । द्वय उससे जब चाहे, विषयक्रीड़ा नहीं हो सकती । उसके लिए काल नियत होता है, उस ऋतुकाल में भी कई रात्रियां ऋतुः प | आदि वर्जित होते हैं । द्विज स्त्रीपर सारे कार्यों तथा वंशका दन आदि दारामदार होनेसे उससे विषय क्रीड़ा प्रतिसमय उत्पा न हो. मान सकनेसें उसे ‘ रामा ' न कहकर ' धर्मपत्नी ' कहा जाता है; परन्तु विषयो लोग रहे नहीं सकते; तब वे कृष्णजातीया रामा अर्थात् शूद्रा ले लिया करते हैं । उसके लिए कोई नियम नहीं रहता । हां, g अग्निहोत्र करने के तुरन्त बाद उससे भी क्रीड़ा निषिद्ध है । शेष रहा गोरे - रगकी स्त्रीसे प्रेम तथां काली से प्रेम; इसपर तौं प्रतिपक्षी अपने स्वा. द. जीके एक वेदमन्त्रका भाष्य देख ते यथ जिसे स्वाः कर्मानन्दजीने प्रार्यसमाज छोड़ने तथा जैन बननेके समय लिखे हुए ' स्वा. दयानन्द और उनको वेदभाष्य ' इस ट्रैक्ट में उद्धृत करके उलाहना दिया था कि- फिर स्वामीजोने मद्रासको ( काली ) ' स्त्रियों के लिए क्या प्रबन्ध किया है, जो कि गोरी स्त्रियों को केवल अपने साथ सुलानेका पक्षपात करतें हैं; और कालीका नाम तक नहीं लेते । यह एक पक्षपात है ' । आशा है प्रतिपक्षी इधर ध्यान दे देंगे । ' संसारके पौराणिक - विद्वानोंसे ३१ प्रश्न ' इस क्षुद्र - पुस्तिका के किये हुए प्राक्षेपात्मक ३१ प्रश्नोंका सर्वाङ्गीण समाघांन पूर्ण कर दिया गया है । यह प्रश्न केवल एकके किये नहीं, यहीं प्रश्न इस संस्थाके सभी उपदेशक लोग किया करते हैं, और Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 183

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श्री सनातनधर्मालोकः ( ७ ) ३३ ॥ १८३३२ किया भी करते थे । ऐसे कुतकं प्रायः पूर्वकी ग्रार्य-है, पर यह किसी समय में से दुहे गये हैं । सनातनधर्मियोंको ' पौरा-समाज क्षुद्र - पुस्तिका भारी भूल है । सनातनधर्मकी स्थिति तो यह है-' शूद्रा स्त्री कि ' कहना विरोधो यत्र दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु इस पाणि. ' श्रुतिस्मृतिपुराणानां द्वयोर्द्वधे स्मृतिर्वरा ' ( ११४ ) वेद व्यास स्मृतिके इस वचनके अनु-है | अतः सारसनातनधर्मी वेद, स्मृति तथा पुराणों के परस्पर - विरोध में लिए ऋतु वेदको ही प्रमाण मानते हैं । स्मृति तथा पुराण के विरोध में स्मृ-त्रियां पर्व तिको ही प्रमारण मानते हैं । तीनों के अविरोधमें तीनोंको प्रमाण का उत्पा मानते हैं । यहो बात ‘ श्रीदेवीभागवत ' में भी कही गई है - ' श्रुति-समय न हो स्मृती उभे नेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम् । एतत् त्रयोक्त एव स्याद् घर्मो इन्तु विषयो नान्यत्र कुत्रचित् । ( ११ । १ । २१ ) विरोधो यत्र तु भवेत् त्रयाणां र्थात् शूद्रा g परस्परम् । श्रुतिस्तत्र प्रमाणं स्याद् द्वयोर्द्वधे स्मृतिर्वरा ' ( २२ ) ड़ता । हां, श्रुतिद्वैधं भवेद् यत्र तत्र धर्मो उभी स्मृती । स्मृतिद्वैधं तु यत्र है । स्याद् विषयः कल्प्यतां पृथक् ( २३ ) पुराणेषु क्वचिचैव तन्त्रदृष्टं म; इसपर यथातथम् । धर्मं वदन्ति तं धर्मं गृह्णीयान्न कथञ्चन ( २४ ) वेदा-विरोधि चेत् तन्त्रं तत् प्रमाणं न संशयः । प्रत्यक्ष - श्रुतिरुद्धं यत् न बननेके तत् प्रमाणं भवेन्नचं ( २५ ) ' सर्वथा वेद एवासी धर्ममामा-इस ट्रैक्ट णः । तेनाविरुद्धं यत् किञ्चित् तत् प्रमाणं न चाऽन्यथा ' मद्रासकी ( २६ ) इस प्रकार पुराण भी स्मृति एवं श्रतिको अपने से बड़ा स्त्रियों कालीका मानता है, सनातनधर्मी भी ऐसा ही मानते हैं; तब सनातनधर्मी प्रतिपक्षी केवल ‘ पौराणिक ' कैसे कहे जा सकते हैं? इस हिसाब से तो फिर प्रतिपक्षियों को भी ' दयानन्दी ' कहा जा सकता है; क्योंकि-वे दयानन्दजीके मतानुसार वेदार्थं करते हैं; क्या उन्हें यह -पुस्तिका. स्वीकृत है? प्रतिपक्षी अपने ' ट्रैक्ट ' के बीचमें तो ' सनातनधर्मी ' धान यहाँ हीं, शब्द लिखता है, फिर वह बाहर ' पौराणिक ' क्यों लिखता है? केवल पौराणिक न होते हुए भी हमने प्रतिपक्षीसे कि CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराण निन्दित (? ) ३३३ पुराण - सम्बद्ध प्रश्नोंका उत्तर दे दिया है; प्राशा है - प्रतिपक्षी प्रागेसे ध्यान रखेगा । यह भी प्रतिपक्षीको ध्यान रखना चाहिये कि जिसने जो विरुद्ध कार्य किया; उसके उल्लेखसे पुराण कैसे खराब हो जाएंगे; जब तक पुराण उन विरुद्ध कार्योंका समर्थन न करें । जब वे उनका सम-र्थन नहीं करते, तत्र उनपर दोष देना कैसा? प्रतिपक्षियों को इन सब बातों पर विचार करके उन्हींके मान्य ' श्रीदेवी भागवत ' के वचनके अनुसार राक्षस बनाने वाले ग्रसत्य व्यवहारको न करते हुए पूर्वापर - प्रकरणको देखकर तभी पुराणोंपर लेखनी चलानी चाहिये - यह हमारा उन्हें सत्परामर्श है । आगे उनकी इच्छा । पुराण निन्दित (? ) ( ४४ ) श्राक्षेप - ( क ) ' ज्योतिर्विदों ह्यथर्वाण: कीराः पौराण-पाठकाः । श्राद्ध यज्ञे महादाने वरणीयाः कदाचन ' ( अत्रिस्मृति ३५३ ) ज्योतिषी, अथर्ववेदीय कीर ( तोते की तरह उपदेश देने वाले ) तथा पुराण पढ़ने वाले ब्राह्मणोंको यज्ञ, दान और श्राद्ध-में नहीं बुलाना चाहिये । ‘ श्राद्ध े च पितरो घोरं दानं चैत्र तु ' निष्फलंम् । यज्ञे च फलहानिः स्यात् तस्मात् तान् परिवर्जयेत् ' ( ३८४ ) श्राद्ध में इन्हें बुलाने वालेके पितर घोर नरकमें जाते हैं, दानका फल निष्फल होता है, और यज्ञमें फल भी नष्ट होता है ) । ख [ ] ' वेदैविहीनाश्च पठन्ति शास्त्रं शास्त्रेण हीनाश्च पुराणपाठाः । पुराणहीनाः कृषिणो भवन्ति, भ्रष्टास्ततो भागवता * भवन्ति ' ( अत्रि. ३८२ ) जो लोग वेद नहीं पढ़ सकते, वे शास्त्र पढ़ते हैं । जो शास्त्रों को नहीं पढ़ सकते वे पुराणोंको पढ़ते हैं । जो पुराण भी नहीं पढ़ सकते, वे खेती करते हैं । श्रौर जो महा-भ्रष्ट खेती भी नहीं कर सकते, वे भागवत बांचते ( और पेट Gujarat. An eGangotri Initiative *

पृष्ठ 184

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३३४ पालते ) फिरते हैं ' । इन प्रमाणोंसे स्पष्ट है कि भागवतादि कोई उत्तम ग्रन्थ नहीं । इनकी रचना घोर पाखण्डी पुराण मानव जातिको लूटने - खाने के लिए की थी । इन पुराणों लोगोंने का पूर्ण बहिष्कार करना चाहिये, ( शिवलिंग-तथा पुराणपाठकों पूजारहस्य पृ. ३८, ३६ ) । ( क ) पहले श्लोक में ' कदाचन वरणीयाः ' तो लिखा है; ' न परिहार- वरणीयाः ' तो लिखा नहीं; तब तो इसका अर्थ यह हुआ कि- इन्हें कभी बुलाओ; अन्य योग्य न मिले, तो इन्हें बुलाओ-तात्पर्यं हुआ । तब ' इन्हें न बुलाओ ' यह प्रतिपक्षीने अर्थ कहां यह निकाल लिया? मालूम होता है कि -- प्रतिपक्षीको स्वयं ज्ञान से, केवल भाषा - टीकाएँ पढ़कर अपना काम निकालता है । नहीं यदि अग्रिम - श्लोकके कारण उन्हें बुलानेकी मनाही की है; तो उसमें ' अथर्वाण: ' भी लिखा गया है; तब प्रतिपक्षीको प्रथर्व-1 ' वेदी ब्राह्मरणको बुलानेका भी निषेध करना चाहिये । यदि वह इस लिखनेसे उस पद्यको प्रक्षिप्त समझता है; तब प्रक्षिप्त क्या इसलिए लिखता है कि चलो, पुराणकी निन्दा

श्लोकको

तो इससे होती है न? ' अप्यात्मनो विनाशं न गणयति खलः । प्रायो मस्तकनाशे समरमुखे नृत्यति कबन्धः ' । पर - व्यसनहृष्टः प्रतिपक्षीकी अन्य घूर्तता देखिये- द्वितीयपादस्थित ' कीरा: '. शब्द द्वितीयपादस्थित विशेष्य ' पौराणपाठकाः का ही विशेषण था; पर उसने चालाकी करके उसे प्रथमपादके " अथर्वाणः से " सम्बद्ध कर दिया । ' अथर्वारणः ' विशेष्य है ' कीराः विशेषण, तो ' विशेषण विशेष्यसे पहले रहा करता है; नहीं तो ' अनुवाद्यमनु-क्त्वैव न, विधेयमुदीरयेत् ' इस न्यायसे " अविमृष्टविधेयांश ' द्वेष हो जाया करता है; ' तब ' कीरा ' की r ' अथर्वाणः से विशेषता कैसे हो सकती है? 1. The g CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराण निन्दित (? ) ३३५ यदि प्रतिपक्षी कहे कि - ' कीरा: ' विशेष्य है, और ' विशेषण है, इसलिए ' अथर्ववेदी कीर ' यह उसने अर्थ प्रथर्वाण: तो यहां ' अथर्वन् ' शब्दको प्ररण प्रत्यय होकर ' आथर्वणा किया है; यह पाठ होना चाहिये था, पर नहीं है; अतः प्रतिपक्षीका : कीरा ' प्रयास निष्फल है । और फिर प्रतिपक्षी के इस प्रथसे यह कीर, यजुर्वेदीय कीर, और सामवेदीय कीर तो अच्छे ऋग्वेदीय , पर प्रथ वेदीय कीर खराब; इसमें कोई विनिगमना नहीं रह जाती ॥ अतः प्रतिपक्षीका अर्थं तथा अन्वय सर्वथा गलत है । प इ वस्तुत: यहां ' कीराः ' पद विशेष्य ' पौराणपाठकाः विशेषण है; अब अर्थ यह हुआ कि केवल तोते - रटन्त वाले बो I पुराण- पाठक हैं; अर्थात् तोते की तरह रटकर पुराणोंके श्लोक म तो बोल देते हैं; पर प्रतिपक्षीकी भांति उनका तात्पर्य नहीं जानते; वा नहीं समझ पाते; वे दान, यज्ञ, श्राद्धादिमें वर्जनीय हैं । अव प्रतिपक्षी बतावे कि इसमें पुराणकी क्या निन्दा हुई? गंत यह तो पुराणों के अर्थ ( तात्पर्य ) से कोरे प्रतिपक्षी जैसे व्यक्ति. की निन्दा हुई । ! - शेष है ' अथर्वाणः ' शब्द; उसका भाव यह है कि प्रभिचार क्रिया, जादू - टोने करने वालें । अथर्व वेदका यह विषय ' माना वह जीत है । ' अथर्वाण: ' इस बहुवचनसे जादू - टोने की क्रिया है पढ़ करने वालोंकी निन्दा की गई है । जो किसी राष्ट्र आि पा हिंतंकी दृष्टिसे राष्ट्र- शत्रुनोंके विरुद्ध अभिचार आदि किये बाते हैं जैसे कल्पना कर लीजिये कि कोई भारतके प्रङ्गा नि करने वाले भारतराष्ट्र के शत्रु मिष्टर जिन्ना प्रादिकी लं लिए अभिचारक्रिया करता है, जैसे कि उन दिनों कई व्यक्ति चें की थीं, वह तो प्रयुक्त नहीं; पर अपनी वैयक्तिक स्वा सिद्धिकेलिए जादू - टोना करके किसी के प्राण हरण करने के Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 185

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ). ३३५ ३३६ र ' अथर्वाण हैं, यह भाव है । इसी कारण कई लोग अथर्ववेदक र्य किया वर्जनीय वेद ) में गिनती नहीं करते । उसकी वेदता वे पृथक् रूपसे है. त्रयी ( हैं देखिये इसपर कौटलीय अर्थशास्त्र आदि । ज्योति-णा: कीराः सिद्ध करते, समानधर्मों पक्षीका निन्दा ' गणिकागरणको निजपञ्चाङ्ग - निदर्श-से ऋग्वेदोप यह faint कावुभौ । जनमानसमोहकारिणौ तो विधिना वित्तहरौ विनि-पर मिती ' आदि कारणोंसे है; अथवा भविष्यत् घटित होना घटनासे रह जाती प्रथ पहले बताकर वे ईश्वरके दर्बारकी एक चोरी - सी करते हैं-। [ 1 इस कारणसे है । पाठकाः वैसे तो आगे प्रत्रिस्मृतिके ३८५ पद्यमें वैद्यकी भी चन्दा का त वाले बो आई है, चित्रकारीकी भी निन्दा आई है ' कदाचित् डाक्टर-पोंके श्लोक | महाशय ने अपनी निन्दा डरसे उसे उद्धृत न किया हो; यहां तात्पर्य नही अपनी स्वार्थसिद्धिमें बाधा ग्रानेसे उसे प्रक्षिप्त समझा हो-दमें वर्जनीय जैसा कि प्रतिपक्षियोंकी यह शैली है । वस्तुतः यह लोग व्यक्ति-निन्दा हुई! गत लाभमें यदि लगे रहें; तो निन्दित हैं । यदि परोपकारके जैसे व्यक्तियों. लिए करें; तो ठीक है । यही यहां तात्पर्य है । ( क ) भागवतकी निन्दा (? ) क- अभिचार! ( ख ) अब आगे के प्राक्षिप्त पद्यपर भी प्रतिपक्षी सुने - । विषय ' माना वह उसका अर्थ लिखता है - ' जो वेद नहीं पढ़ सकते, वे शास्त्र की क्रिया को पढ़ते हैं ' । इसका भाव यह हुआ कि वेद कठिन तथा चिरकाल-राष्ट्र पाठ्य हैं; इसलिए सर्वसाधारण लोग उन्हें पढ़ना नहीं चाहते, किये जाने और शास्त्र ( दर्शन ) उनसे सुगम हैं । इससे क्या प्रतिपक्षी दार्श अङ्ग - प निकोंकी निन्दा समझेगा? यदि नहीं; तब ' जो शास्त्र नहीं पढ़ दिकी मू सकते, वे पुराणों को पढ़ते हैं इस प्रतिपक्षीसे किये अर्थसे कई व्यक्ि पुराणोंकी भी निन्दा तो न हुई । हां, पुराण दर्शनों की अपेक्षा क्तिक स्वार सुगम हैं - यह सिद्ध हुआ । उनमें इतिहास आदि आनेसे सर्र-करने सतावश सर्वसाधारणोंको वेदार्थका ज्ञान तथा वृत्ति प्राप्त हो I CC - 0. Ankur Joshi Collection भागवत की निन्दा ( 3 ) जाती है; अतः दर्शनज्ञानसे हीन लोग पुराण पढ़ा करते हैं- यह तो पुराणोंकी प्रशंसा हुई । ' अक्के. चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वत व्रजेत् ' घरके कोनेमें ही शहद मिल जाए; तो फिर पहाड़में उसके लिए क्यों जाए? । इस सुगमतासे पुराणोंकी निन्दा कहां हुई? उल्टा उनसे साधारण - लोगोंको उपाख्यानोंसे गम्भीर वेदार्थका ज्ञान हो गया । अब जो लोग उन सुगम पुराणोंको भो कठिन समझकर नहीं पढ़ सकते, वे खेती करते हैं, क्यों कि उसमें संस्कृत पढ़ने का परिश्रम नहीं, मस्तिष्कका व्यय नहीं । इसमें तो किसी पक्ष वालेकी विमति नहीं, पर खेती करनेसे उनका भाषाविषयक अज्ञान अवश्य सिद्ध हुआ, क्योंकि- प्रायः सुगम - भाषा वाले पुराणोंको भी वे न पढ़ सके । अव आगे प्रतिपक्षी अर्थ लिखता है - ' जो महाभ्रष्ट खेती भी नहीं कर सकते, वे भागवत वांचते - फिरते हैं, और पेट पालते हैं ' । अब ' आलोक ' पाठक देखें कि यह प्रतिपक्षीका कितना गलत अर्थ है? जब कि - ' पुराणपाठाः ' से श्रीमद्भागवतके वांचने वाले भी आगये, क्योंकि - ' श्रीमद्भागवत ' भी पुराण ही है; तब उनका अलग नाम कैसे श्राया? । क्या भागवत, पुराण नहीं? यह तो पुनरुक्ति दोष या पड़ा । अव प्रतिपक्षीको शक्ति नहीं कि इसमें फड़फड़ा सके । अथवा उसीका किया ही अर्थ मान लिया जाए कि - ' भागवत बांचने वाले उससे भी भ्रष्ट हैं, तो इसका यह अर्थ हुआ कि पुराणोंके ज्ञानकी पेक्षा खेती भी सुगम है । पर खेती भी कुछ कठिन है, उसका हर एकको ज्ञान नहीं हो सकता; पर उतने भी ज्ञान न रखने वाले फिर भागवत बांचने वाले बन जाते सघ २२ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 186

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३३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) हैं ' । इसका यह तात्पर्यं निकला कि - पुराण कुछ कठिन हैं, पर खेती उनसे सुगम है, और खेतीसे सुगम है - भागवतपुराणका बांचना । अब ' आलोक ' के विद्वान् पाठक सोचें कि क्या यह बात ठीक है? कभी नहीं । भागवत पुराणकी भाषा बड़ी कठिन है । इसमें वेदका, दर्शनोंका, तथा साहित्यिक रस- अलङ्कारोंका पदे-पदे समावेश है । जब तक कोई वेद, दर्शनों तथा अन्य पुराणों का अभ्यासी नहीं होगा; वह भागवत में चल ही नहीं सकता । इसका ' वह ज्ञान - प्रकरणं, वह वेदों द्वारा भगवान्की स्तुति, वह कपिलमुनिका माताके प्रति उपदेश एवं अन्यान्य प्रकरण इतने गम्भीर हैं कि- कोई सामान्य पण्डित तो उसमें प्रवृत्ति ही नहीं कर सकता । यह एक बड़ा प्रसिद्ध श्लोक है-: ' घनञ्जये हाटक - संपरीक्षा, रणे सदा शस्त्रभृतां परीक्षा । विपत्तिकाले गृहिणी- परीक्षा, विद्यावतां भागवते परीक्षा ' अर्थात: सोनेके खरे - खोटेकी परीक्षा अग्निमें होती है । शस्त्रधारियोंके, खरे - खोटे होनेकी परीक्षा युद्ध में होती है । घर वाली के खरे - खोटे होनेकी परीक्षा प्रापत्तिकालमें होती है, और विद्वानोंके खरे - खोटे होनेकी परीक्षा श्रीमद्भागवतमें होती है । इसका तात्पर्य यह निकला कि- श्रीमद्भागवतमें जिसकी बाध गति है; वह सचमुच विद्वान् है । यह बात सर्वथा ठीक है । ... में यदि भूल नहीं करता; तो यह भी कह सकता हूँ किन्ने प्रतिपक्षी तो इसके ' जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरत: ' इस प्रथम-श्लोकका अर्थ भी ठीक - ठीक नहीं कर सकते । ग्रागेके उसके प्रकरणोंमें भी नहीं चल सकते । तभी तो श्रीमद्भागवतके ‘ यस्या-भागवत की निन्दा (? ) * -त्मबुद्धिः कुरणपे त्रिधातुके... इस पद्यका अर्थ करना भी उन्हें भ आता, हम उसमें प्रतिपक्षियोंका आदर्श पूर्व दिखा चुके प्रतिपक्षीका - ' जो खेती भी नहीं कर सकते, वे भ्रष्ट है । त बांचते - फिरते हैं. यह अर्थ कर देना कितना असङ्गत है? भाग ' यदि प्रतिपक्षी कहे कि - " नहीं । हमारा ऐसा । भाषाज्ञान विषयक अभिप्राय नहीं, भागवतकी संस्कृत तथा विषय ही गम्भीर हैं, हमारां तो पेट भरने से अभिप्राय है । तभी अवस् हमने लिखा है- ' जो खेती नहीं कर सकते, वे भागवत और पेट पालते - फिरते हैं ' । यदि पेट पालने की बात है, तब वांचते वादीके अनुसार वेद पढ़ना भी फिर पेट पालने के लिए हमा दर्शनोंका पढ़ना भी पेट पालने के लिए हुआ । फिर यदि के भरना ही है, तो वे कठिन विषयोंमें क्यों जाएंगे? सभी सेतो क्यों नहीं कर लेते? । फिर श्रीमद्भागवत भी तो कुछ सुबन नहीं है; उसका पढ़ना ' नाकों चने चबाना ' है । ' यदि प्रतिपक्ष कहे कि नहीं, इसका तो अर्थ यह हैं कि जो सब कामरि असफल हो जाते हैं, वे भागवत पुराण पढ़ते हैं । यह भी ठे नहीं । पहले हम बता चुके हैं कि यह बड़ा कठिन पुराण है, अन्य कार्य नहीं कर सकते, वे इसे भी नहीं पढ़ वा बांच सकते । अथवा यदि यह भाव हो कि - ' ऊपर वाले तो मान - प्रतिष्ठा क घन पाते हैं; पर भागवत बांचने वाले लोग सब ओर से भ्रष्ट होते हैं ' यह भाव भी ठीक नहीं; क्यों कि - भागवत पढ़ने तथा वांस वालों की बड़ी मान - प्रतिष्ठा तथा उन्हें पुष्कल अर्थकी प्राप्ति हो है; अतः प्रतिपक्षी के ‘ भागवताः ' के ' भागवत - पुराण - परक ' हरे अ गलत हैं । . तब हमसेही पूछा जायगा कि- ' भ्रष्टास्ततो भागवता भवनि का वास्तविक अर्थ वा तात्पर्य क्या है? तो इसपर हम वह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 187

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३४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) भी हैं कि यहां ' भागवताः ' का अर्थ ' भागवत पुराण'के बांचने वाले चुके उन्हें नह महीं; क्योंकि – ' पुराणपाठा: ' इस पूर्व - पाठमें पुराणोंके पढ़ने हैं । बालों का नाम था जानेसे भागवत पुराणके पाठक भी स्वयं भ्रष्ट भागा है? । गृहीत हो गये । पृथक् ग्रहण व्यर्थ हो जाता है । तो प्रतिपक्षीको श्रीमद्भागवत पुराणसे घृणा वा चिढ़ होने से सुझमें T विषय भाषाज्ञान झाया है; और उसे उसने स्वतः प्रमाण मान लिया है, व स्तुतः श्रव यहां यह अर्थ नहीं । तव ' भ्रष्टास्ततो भागवता भवन्ति'का अर्थ । तभी हो यह है कि जो और कुछ नहीं कर सकते, वे भगवान्का गवतांच आडम्बररूपसे नाममात्र लेकर जिससे लोगोंकी उनपर श्रद्धा के है, तब जो जाय, और वे उन्हें धन देने लगें; अपना पेट पाला करते हैं, लिए हुआ । ऐसा कार्य बहुत ही सुगम होता है । फिर यदि पेट ? सभी सेती ऐसे लोग सभी सम्प्रदायोंमें मिलते हैं, उन्हींकी यह निन्दा कुछ सुगम । यहां भागवत पुराण वा उसके ज्ञाताओं की कोई चर्चा नहीं, यदि प्रतिपक्षी किंतु ' बगुला - भक्तों ' का अर्थ है । वैसे तो नास्तिक भी वेदके सब कामो बनाने वालोंकेलिए कह दिया करते हैं - त्रयो वेदस्य कर्तारी यह भी ठीक भण्ड - धूर्तनिशाचराः । जरी तुर्फरीत्यादि पण्डितानां वचः स्मृ-पुराण है, त॑म् । त॑त॒श्चं जीवन पायो ब्राह्मणविहितस्त्विह ' । इससे उनकी बांच सकते । बात ठीक नहीं हो जाती । वैसे ही प्रतिपक्षी के कहने मात्रसे पुराण न - प्रतिष्ठा क पखिण्डि - प्रणीत नहीं हो जाते । पुराण तो वेदकी भांति परमा-से भ्रष्ट होते । त्मासे उत्पन्न हुए हैं - ‘ ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा तथा वा उच्छिष्टाज्जज्ञिरे ' ( अर्थवं. ११ । ७ । २४ ) । इसलिए वेबमें पुराणों सह । प्राप्ति हो का नाम भी आया है- ' तमितिहासञ्च पुराणं च गाथाश्च नाराश--परक ' सर्व सौरच धेनुव्यचलन् ' ( अथर्व. १५ । ६ । १० ) । इसी आशयसे पुराणका यह वचन आया है - ' पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथम वता भवनि ब्रह्मणा स्मृतम् । नन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः, हम बच्चे ( मत्स्यपु. ५३ । ३ ) । उन्हीं परम्परागत श्रनादि - मुरारणोंका CC - 0. Ankur Joshi Collection फलित ज्योतिष पर प्राक्षेप ३४१ श्रीव्यासजीने प्रवचन वा सम्पादन किया । जहां ' कर्ता ' शब्द है, वहां भी ' कृ ' धातुके अनेकार्थक तथा प्रवचनकर्ता श्रथं प्रसिद्ध होनेसे वहां ' प्रवक्ता ' अर्थ है; अतः पुराणोंकी निन्दा करना अपनी वेद - शास्त्रानभिज्ञताका नग्न प्रदर्शन करना है । जो कि प्रन्तमें वादीने पुराण- पाठकोंकी पूर्ण - वहिष्कार करने की ' शिवलिङ्ग - पूजारहस्य ' में प्रेरणा की है, उसे मानकर अब प्रायं समाजियोंको दोष - दृष्टि रखकर पुराण पाठक बने हुए डा. श्रीराम तथा श्रीशिवपूजन सिंह तथा अन्य प्रार्यसमाजियोंका बहिष्कार करना चाहिये; क्योंकि अपने स्वामीके अनुसार विष- ' सम्पृक्त - अन्न ' का सेवन करने वाले उनके सङ्गसे प्रार्यसमाजी भी विषसम्पर्ककै फलसे नहीं बच सकेंगे । ' पुराणादिविषयक - ग्राक्षेपोंके परिहारमें पहला आक्षेप श्री-तुलसीराम - स्वामीका ' वेदप्रकाश ' से फलित ज्योतिषपर और दूसरा भी उन्हींका पुराणपर आक्षेप दिया गया था; अब अन्त में भी उन्हींके फलित - ज्योतिप तथा पुराणोंपर आक्षेप उद्धृतकर तथा उनका परिहार करके यह महानिबन्ध उपसंहृत किया जायगा । फलित ज्योतिषपर प्राक्षेप । ( ४५ ) आक्षेप - ( क ) अर्जुनका गरुड़वर्ग था और द्रौपदीका वर्ग था सर्प । शीघ्रबोधानुसार इनकी मैत्री नहीं होनी चाहिये थी; पर हुई; अतः फलित ज्योतिष झूठा है । ( ख ) रामचन्द्रजी की जन्म राशि कर्क और सीताकी प्रसिद्ध राशि कुम्भ से तदन्तर्गत नक्षत्रोंमें रामचन्द्रजीका देवगण, सीता-जीका राक्षसगण था, मैत्री कैसे हुई? । ' देवराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देव - रक्षसोः ' इस शीघ्रबोधके अनुसार कलह होना चाहिये था । जब सीता राक्षसगरण थी; तब उसकी साक्षात् - राक्षस रावणसे प्रीति क्यों न हुई? । Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३४२ ( ग ) कृष्णजीका देवगरण था, और राधाका राक्षस गण; तब परस्पर प्रीति कैसे हुई? ( घ ) राम तथा सीताकी राशि तुला- कुम्भ होने से नवम. शत्रुनवात्मज हैं; इससे अपत्य - हानि होनी चाहिये थी; पञ्चम पर नहीं हुई । इससे जो विवाहसे पूर्वं सगाई करनेके समय गरण, वर्ग, राशि - मेलन आदि हैं, यह फलित ज्योतिष के झूठे स्वयं ही झूठे हैं ( श्रीछुट्टनलाल स्वामी ' वेद - प्रकाश ' ( ७ । होनेसे २ पृ ० ३६-३७ ) फलित ज्यो-परिहार- ( क ) केवल वर्गसे प्रीतिका विचार तिष में कभी नहीं किया जाता । यह तो सामान्यशास्त्र है, इसके बाधक होते हैं । लिखा है - ' न वर्ण - वर्गों न गणो न योनिर्द्विर्द्वादशं वाऽथ षडष्टकं वा । तारावरुद्धं नवपञ्चकं वा मैत्री यदा स्यात् शुभदो विवाह: ' इसका भाव यह है कि - वर्ग, वर्ण, गण आदि साधारण बातें हैं; राशियोंके स्वामियोंकी मित्रता होने पर इन की शत्रुता भी बाधित हो जाती है । सो अर्जुनकी मेषराशि होती है, इसका स्वामी ' मेषवृश्चिकयोर्भीमः ' मंगल होता है । द्रौपदीकी राशि है मीन । उसका स्वामी- ' स्यान्मीन - धनुषोर्जीवः ' बृहस्पति है । सो ' रवीन्द्र - भौमगुरवः स्वस्मिन् मित्राणि चत्वारः ' इन दोनोंकी मित्रता है । स्वामियोंकी मित्रता होनेसे वर्गविरोध बाधित हुआ, अर्जुन द्रौपदीकी मैत्री ठीक हो गई । ( ख ) रामजीकी राशि तुला है, कर्क नहीं, और चित्रानक्षत्र है; सीताकी कुम्भ है, और शतभिषानक्षत्र है; तब ' कृत्तिका च मघाश्लेषा विशाखा शततारका । चित्रा ज्येष्ठा धनिष्ठा च मूलं रक्षोगणः स्मृतः ' दोनोंका समान - गण होनेसे ' स्वगणे परमा प्रीतिर्मध्यमा देवमर्त्ययोः । मर्त्य - राक्षसयोमृत्युः कलहो देवरक्ष-सोः । ' ( शीघ्र - बोध ) । ' निजनिजगणमध्ये प्रीतिरत्युत्तमा स्यात् ' CC - 0. Ankur Joshi Collection फलित ज्योतिष पर प्राक्षेप ३४३ ( मुहूर्तचिन्ता विवा. प्र. ३० ) के अनुसार बड़ी प्रीति हुई । श्रीरामसे विवाह हो चुका; तब समान भी गणवाले भिन्न ज रावणसे उसकी प्रीति कैसे हो सकती थी? यह प्रीति तो ११ व्यक्ति वालों के यहां सम्भव है । शेष रही रावणकी साक्षात् राक्षसता पि सो सीता साक्षात् तो राक्षसी थी नहीं; तब परम - प्रीति उसने उसकी कैसे होती? यहां तो संज्ञामात्रता थी । क्या व्याकरण ' नदी ' को आप सचमुच नदी मान लेंगे? तब तो ' है गङ्ग ' अम्वार्थ नद्यो ह्रस्वः ' ( पा. ७ । ३ । १०७ ) से नदीको ह्रस्व हो ' हे गङ्ग ' बन जाना चाहिये, पर नहीं बनता । व्याकरण तो ‘ स्थली ' की — जिसमें पानीकी बूंद भी नहीं, ' नदी ' संज्ञा सो यह पारिभाषिक - संज्ञाएं अपने लौकिक - प्रथोंमें नहीं जातीं । ( ग ) कृष्णजीकी मिथुन राशि है । मिथुनका स्वामी बुध है । ‘ वुधः कथ्यामिथुनयो: ' । राधाजीकी राशि तुला है, तुलार स्वामी शुक्र है - ' शुक्रो वृषतुलाभृतः ' । सो ' ज्ञ ( बुध ) शुक्रि राहवः इनकी मित्रता होनेसे राधा - कृष्ण की भी बड़ी प्रीति हुई ( घ ) नवम - पञ्चममें जानना चाहिये कि - ' वरस्य पञ्च कन्या, कन्याया नवमे वरः । एतत् त्रिकोणकं ग्राह्यं पुत्रः ज सुखावहम् ' सो तुला राशि के श्रीरामसे कुम्भराशिकी बेट पञ्चम थी, और सीता से राम नवम थे; अतः ग्राह्य होनेसे व से अपत्यहानि सिद्ध न हुई । ग ( ४६ ) प्राक्षेप - ग्रहों में जब चन्द्रमा वैश्य वर्णका माना न है, तब उसका पुत्र बुध शूद्र वर्णका कैसे हुआ? सनातनधर्मी हि बुध जैसे शूद्रको और राहु - शनैश्चर जैसे म्लेच्छ ग्रहोंको हुए अपने आपको नीचोपासनासे कैसे बचा सकते हैं? ( श्रीर भा का रामजी - नवग्रहसमीक्षा में ) Gujarat. An eGangotri Initiative

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३४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३४३ हुई प्रत्यु ० - ग्रहों की वैश्य शूद्र, म्लेच्छ आदि संज्ञा वैसी वर्ण-भिन्न । sura स्थाके लिए नहीं, किन्तु ज्योतिषके विज्ञानानुसार शुभाशुभ व्यक्ति तो ११ जाननेकेलिए यह संज्ञामात्र है । जैसे - व्याकरणमें ' स्थली ' की त् - राक्षसता प नदी - संज्ञा उसके जलमय अर्थको बतानेकेलिए नहीं; किन्तु वहां -प्रीति उससे म्आणनद्याः ' ( पा.७ | ३ | ११२ ) इस कार्य के लिए है, वैसे यहां-व्याकरणरी पर भी समझ लें । ' हे गङ्ग ग्रहोंको केवल शूद्रादि - संज्ञा ही नहीं कही गई, वल्कि स्त्री-ह्रस्व होकर पुरुष नपुंसक संज्ञा भी कही गई है । चन्द्रमा तथा शुक्र स्त्री - संज्ञक । व्याकरण कहे गये हैं; बुध और शनि नपुंसक कहे जाते हैं । शेष पुरुष ग्रह कहे ' संज्ञा गये हैं । इससे वें सचमुच ही स्त्री नपुंसक नहीं हो जाते । नहीं नों नहीं तो स्त्री - ग्रह चन्द्रमासे वृंहस्पतिकी पत्नी में बुध कैसे हुश्रा? क्या अक्षेप्ता दो - स्त्रियोंके संयोगसे पुत्रोत्पत्ति मानते हैं? यदि वामी बुध है- सचमुच नपुंसक है, तब उसका इलामें पुरूरवा पुत्र हो कैसे T है, तुलाइ हुम्री? जैसे व्याकरणंमें स्त्री - वाचक भी ' कलत्र ' शब्द नपुंसके-घ ) शुक्र मैं होता है, और ' दार ' पुंलिंग में । व्यवहारमें जड़ भीं प्रापः बड़ी प्रीति हुई ( जल ) स्त्रीलिंगमें उस कार्य के लिए माना गया है । वस्तुतः वैसे वरस्य पञ् नहीं; वैसे यहां पर भी समझना चाहिए । इस प्रकार ग्रहोंकी ह्यं पुत्रपौ जलचर, वनचर आदि संज्ञा भी कही गई है । यह सब फल-राशिकी बेटी विशेषके बताने के लिए है, वास्तव में वैसा बतानेकेलिए नहीं । होनेसे वास्तविकं वर्ण - व्यवस्थामै तो चन्द्रवंशसे क्षत्रियोंकी उत्पत्ति कही गई है । चन्द्रसे बुध, बुधसे पुरूरवा । वहां इनका वैश्य - शूद्रत्व कामाना नहीं बताया गया । नातनधर्मी वस्तुतः ज्योतिषमें जो कि ग्रहों की ब्राह्मण - शूद्रादिकता कही - ग्रहोंको गई हैं, वहां यह भी रहस्य है कि उससे उन - उनं वर्णोंकी ला-हैं? ( श्री भादिहोता है, जैसे गुरु - शुक्र ब्राह्मणों के अधिष्ठाता हैं । जिस वर्ष-का राजा शुक्र या गुरु हो; उस वर्ष ब्राह्मण सुखी होते हैं । इस CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंपर देव निन्दा (? ) ३४५ प्रकार सूर्य - भौमके राजत्व में क्षत्रिय, चन्द्रमें वैश्य, बुध में शूद्र, शनैश्चर में म्लेच्छ, राहु - केतुमें ग्रन्त्यज । इनके राजत्वमें वर्णोंके उत्थान - पतन वा सुख - दुःख होते हैं यही वहां इन हाता है । इस प्रकार बुध - शनि यदि नपुंसकों के अधिष्ठाता रहस्य होनेसे उन्हें ही लाभप्रद हैं । ११ वां शनि म्लेच्छसे लाभ कराता है, और ११ वां गुरु ब्राह्मणसे । सनातनधर्मी इनकी देवता होने से पूजा करते हैं, इसलिए वेदमें भी ' शं नो दिविचरा ग्रहाः ' ( अथर्व-वेदसं. १६ | ६ | ७ ) इनसे कल्याणकी प्रार्थना है । उसपर प्राक्षेप करते हुए प्रतिपक्षी अवैदिक सिद्ध हुए । पुराणोंमें देवताओंकी निन्दा ( 2 ) ( ४७ ) आक्षेप - पुराण भ्रम जालमें फंसाने वाले हैं । जैसे कि - पद्म - पुराणमें स्पष्ट लिखा है- ' व्यामोहाय चराचरस्य जगतश्चैते जल्पन्ति पुराणागमाः, तां तामेव हि देवतां परत्रिकां (? ) कल्पावधि 1 | सिद्धान्ते पुनरेक एव भगवान् विष्णुः सम-स्तागमाः, व्यापारेषु विवेचनं व्यतिकरं नित्येषु निश्चीयते ' अर्थात् जितने पुराण हैं, सब मनुष्यको भ्रममें डालने वाले हैं, उनमें अनेक देव ठहराये गये हैं, एक ईश्वरका निश्चय नहीं - होता! केवल एक भगवान् विष्णु पूज्य हैं । हे पौराणिक-भक्तो! जब ऐसा है; तो तुम्हें भ्रमसे बचाने वाला श्रार्यसमाज से अतिरिक्त और कौन है "? ( भा. प्र. ३ समु. ) ( ४८ ) आक्षेप - पद्मपुराणमें शिवकी स्तुति में कहा है- ' विष्णु-दर्शनमात्रेण शिव - द्रोहः प्रजायते । शिवद्रोहान्न सन्देहो नरकं याति दारुणम् । तस्माद्वै विष्णुनामापि न वक्तव्यं कदाचन ' : ( जब लोग. विष्णुका दर्शन करते हैं; तब महादेव क्रुद्ध होता है, और उससे मनुष्य महानरकमें जाते हैं । अतः विष्णुका नाम · कभी न लेना चाहिये । ) ( भास्कर प्र. ३. य समु. ) । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 190

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३४६ श्रीसनातन धर्मालोक ( ७ ) ( ४६ ) आक्षेप - उसी पुराण में ये श्लोक हैं- ' यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मा रुद्रादिदेवतैः । समं सर्वेनिरीक्षेत स पाषण्डी भवेत्सदा । किमत्र बहुनोक्तेन ब्राह्मणा येऽप्यत्र ष्णवाः । न स्प्रष्टव्या न द्रष्ट व्या न वक्तव्याः कदाचन ' ( उत्तर खण्ड २६३ । ६-११ ) ( जो कहते हैं ब्रह्मा, महादेव आदि नारायणके समान हैं; सो पाखण्डी है । ऐसों को कभी न छूना और न देखना, न बोलना ) ( भास्कर-प्र. ३ समु., शिवलिंग पूजा - रहस्य पृ. २१ ) ( ५० ) प्राक्षेप - भागवत में लिखा है- ' भवव्रतधरा ये च ये च तान् समनुव्रताः । पाषण्डिनस्ते भवन्तु सच्छास्त्रपरिपन्थिनः । मुमुक्षवो घोररूपान् हित्वा भूतपतीनथ । नारायणकलाः शान्ता भजन्ति नसूयवः ' ( जो शिवके भक्त हैं; सो पाखण्डी और सच्चे शास्त्रके वैरी हैं, इसलिए जो मोक्षकी इच्छा वाले हैं; वे भयानक वेष भूतोंके स्वामी ( महादेव ) को छोड़ें, और नारायण की शान्त - कलाओंकी पूजा करें । ( श्रीतुलसीरामस्वामी ) ( ५१ ) आक्षेप - ' वैष्णवः पुरुषो यस्तु शिवब्रह्मादिदैवतान् । प्रणमेदर्चयेद्वापि विष्ठायां जायते कृमि: ' ( वृद्धहारीत ८ । २६१ ) जो विष्णुका उपासक भूलकर भी ब्रह्मा व शिवकी अर्चना करता है - वह मरकर पाखाने का कीड़ा बनेगा । ( शिवलिंग पूजा-रहस्य पृ. २१-२२ ) । ( ५२ ) आक्षेप - ' येऽन्यं देवं परत्वेन वदन्त्यज्ञानमोहिताः । नारायणाज्जगन्नाथात् ते वै पाषण्डिनो नराः ' ( पद्मपुराण ) ( जो लोग किसी दूसरे देवताको नारायणसे बड़ा करके मानते हैं; सो श्रज्ञानी, पाखण्डी हैं ) । इसीमें परस्पर विरोध देखो - ' एष देवो महादेव विज्ञेयस्तु महेश्वरः । नत स्मात् परमं किञ्चित् पदं समधिगम्यते । ' ( महादेवको महान् ईश्वर जानना चाहिये, यह मृत समझो कि — उससे कोई बड़ा है । ) फिर इससे विरुद्ध देखो-CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणों में देव निन्दा (? ) ' वासुदेवं परित्यज्य येऽन्यं देवमुपासते । तृषितो जाह्नवीतीरे खनति दुर्मतिः ' ( विष्णुको छोड़कर जो दूसरे देवको सो उस मूर्खके समान हैं कि जो गङ्गा के तीर प्यासा मानते बैठा? कुंद्रा खोदता है । इस प्रकार शिव श्रादिकी निन्दा हैं । इस परस्पर विरोधसे पुराणोंके कर्ता भी भिन्न पुराण - भिन्न क व । होते हैं ( भास्कर - प्रकाश ) मित्र का उत्तरपक्ष - ( ४७ ) पुराण एवं ग्रागम अनेक देवता व्या पूज्यता बताकर जगत्को मोहमें डालने वाले हैं, सिद्धान्तमें । ही विष्णु पूजनीय है ' यह वचन विष्णुदेवता की प्रशंसाका ए वाद है, पद्मपुराण भी तो पुराण है; वह पुराणोंकी निन्दा क्या अपनी भी निन्दा करता है? वस्तुतः इस सबका पर्यवक अपने इष्टदेवकी स्तुति में है । ' स ब्रह्मा, स शिवः, सेन्द्र..... एव विष्णुः ' ( १।८ ) कैवल्योपनिषद् के इस प्रमाणसे सभी देव एक हैं, नाम - रूपका भेद है, जिसकी जिस नाम - रूप में है, वह उसीको पूजे - ग्रह इसमें तात्पर्य है, वेदों में भी अनेक दे ताओं की पूजा है, इसे हम पहले बता चुके हैं, यही पद्मपुराण वचन में ' पुराण- श्रागमाः ' के ' ग्रागम ' शब्दसे सूचित है । तब क भी वेदभी प्रतिपक्षी के अनुसार अमान्य हो जावेंगे? श्रार्यसमाज उत्तर नहीं दे सकती; वह तो केवल तोड़ - मरोड़कर अर्थं बद पड़ जानती है । इसका उत्तर तो सनातनधर्म देगा । वह यह भक्त अपने इष्टदेवको ही सर्वदेवात्मक समझे । उसीकी पूर सर्वदेवपूजा समझे । तस्म ( ४८ ) पहले ही कहा जा चुका है कि - पुराणोंके ऐसे क अर्थवाद हैं, विधिवाक्य नहीं । इस प्रकारके वचन ए विचारवाले, भेददर्शी, अल्पमति मनुष्योंके अपनी कुल परम कहा प्राप्त उपास्य देवसें अनन्य भक्तिकेलिए हैं । तात्त्विक शब्द Gujarat. An eGangotri Initiative