सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 191–200

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 191–200

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श्रीमानधर्मालोक ( ७ ) ३४८ शिव वा विष्णु एकही परमेश्वरके नाम - रूपके भेदसे शक्ति-ह्नवीतीरे विशेष हैं । पर यह विचार उच्चकोटि का है । इस प्रकारके उच्च-मानते विचारके मर्म जानने वाले सभी अधिकारी नहीं होते, किन्तु सा बैठा हु थोड़े ही होते हैं; जो उच्च - कोटिके सर्वदर्शी वा दूरदर्शी वा श्रभेद-पुराण क यादके ज्ञाता हैं, उनकेलिए पद्मपुराणका यह वचन नहीं । श्रधि-न - भिन्न ि कारियोंके भेदसे कर्तव्य कर्मोंके अनेक प्रकार शक्तिके मुताबिक व्यवस्थित होते हैं । जैसे एक साधारण पुरुष प्रान्ताधीश वा -देवताओ जिलाधीश वा एक न्यायाधीशका नौकर है, उसका यह कर्तव्य सिद्धान्त में ए है कि वह अपने स्वामी को ही सर्वाध्यक्ष जाने । उसीको सन्तुष्ट प्रशंसाका प्रदे करके वा उसकी सेवा करके ही वह सफ़ल हो सकता है । यदि की निन्दा वह साधारण - भृत्य अपने स्वामीसे अतिरिक्त अन्य अफसर बका पर्यव सेवा करनेका मनसे भी विचार करेगा; तो उसकी अपने अफ़सर-की सेवामें कुछ त्रुटि प्रावेगी ही । तब उसके स्वामीकी कृपादृष्टि सभी उसमें कुछ न्यून हो जाएगी । दूसरे अफ़सरकी कृपादृष्टि भी राम - रूप में उसमें शीघ्रतासे नहीं होगी कि - यह अपने पूर्व - स्वामीकी ही अनेक सेवा जब अनन्यभावसे न कर सका; तत्र मुझ - दूसरेकी सेवा ही डी पद्मपुराणं • अनन्यभावसे यह कैसे कर सकेगा? अतः दूसरे स्वामीकी कृपादृष्टि है । तब भी उसपर नहीं रहेगी । इस प्रकार दोनोंकी ही कृपादृष्टि न समाज पड़ने से, वह जिन - जिन दुःखोंको उठावेगा, वह उसके लिए अर्थ द ' नरक ' ( न्यरकं नीचैर्गमनं ( निरु. १ । ११ । १ ) होगा । उसकेलिए । वह यह भी यह वाद कहा जा सकता है- ' अन्यदर्शनमात्रेण स्वामि-उसीकी पू द्रोहः प्रजायते । स्वामिद्रोहान्न सन्देहो दुःखमाप्नोति दारुणम् तस्माद्वं अन्यनामापि नादर्तव्यं कदाचन ' ॥ के ऐसे क वचन एक श्रीभगवद्गीता में भगवान् ने भी अपने भक्तोंकेलिए यह कुल परम्पर कहा है- ' अनन्याश्चिन्तयन्तो माम् ' ( ६ । २२ ) इसमें ' अनन्याः ’ सात्त्विक ह शब्द भी इसी वातको बताता है । इसी तरह ' मां च योऽव्यभि-CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंमें देव - निन्दा (? ) ३४६ चारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान् समतीत्येतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ' ( १४ | २६ ) ' प्रव्यभिचारेण भक्तियोगेन ' का उल्टा ' सव्यभिचार - भक्तियोग ' होता है, वह है ' दूसरेके पास जाना ' । भव्यभिचार - भक्तियोग ' का अर्थ है- ' अनन्यभक्ति ' अर्थात् श्री-कृष्णकी ही भक्ति । निष्कष यह है कि - जैसे कि सावाररण भृत्य अपने स्वामी-की अनन्य सेवा से ही उत्तरोत्तर उन्नति करता है, वैसे अनेक स्वामियोंकी सेवार्थं चेष्टासे उन्नति प्राप्त नहीं हो सकती । जैसे यहां ग्रन्य - स्वामीकी निन्दाका अभिप्राय नहीं, किन्तु अल्पमति-सेवककी उन्नतिका रहस्य ही इसमें इष्ट होता है । इसी प्रकार जौ साधारण - र्जन परम्परासे शिव भक्त है; उसोका ही वह अनन्य भक्त बना रहे - यह उद्दिष्ट करके पद्म पुराणका यह ग्रंथ-वाद है । इस प्रकार देवीपुराण में विष्णु श्रादिकी श्रपेक्षा देवीको ढ़ाया जाता है; सी इस प्रकारके स्थलोंमें शब्दार्थ में तात्पर्य नहीं होता । विष्णुकै दर्शनमात्रसे शिवका द्रोह होता है — यह यहाँ शब्दार्थं नहीं, किन्तु अन्य देवकी प्रोर लगने से पूर्वं - उपास्य की भक्ति में विघ्न पड़ता है, जिससे उपासककी इष्टसिद्धिमें बाधाको उपस्थिति श्रानेसे दुःख हो प्राप्त होता है - इसी तात्पर्य में पर्यवसान होता है - कि - दूसरे उपास्य की ओर साधारण उपासक ध्यान न दे । परन्तु जो परम्परासे पञ्चायतनको पूजामें लगे हैं; वा उच्च णीके हैं; उनकेलिए यह मध्यमश्र रेणी वाले वचन नहीं । वेदके विषय में भी ऐसे विचार चालू रहे हैं । जिस गोत्र वाले ब्राह्मणोंकी वेदशाखा परम्परासे चली आ रही है, उसका उल्लं-घन करके अन्य वेदशाखाका ग्रहण करनेवाला हानि उठाता है । अतः परम्परासे आई हुई वेदशाखाका परित्याग नहीं करना Gujarat. An eGangotri Initiative

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३५० श्रीसनातनधर्मा लोक ( ७ ) चाहिये । जैसे कि महाभाष्यकार अथर्ववेदको पैप्पलाद संहिता -वाले थे; अत: उन्होंने अथर्ववेदका श्रादिममन्त्र ' पैप्पलादसंहिता ' का ' शं नो देवी ' ही दिया है ' ' ये त्रिषप्ताः परियन्ति ' यह शौनक -शाखाका मन्त्र नहीं दिया । इसीलिए कात्यायनस्मृतिमें भी कहा गया है - ' स्वशाखाश्रयमुत्सृज्य परशाखाश्रयं च यः । कर्तुमि-च्छति दुर्मेधा मोघं तत्तस्य चेष्टितम् ' ( ३ । २ ) यन्नाम्नातं स्वशाखायां परोक्तमविरोधि च । विद्वद्भिस्तदनुष्ठेयमग्निहोत्रा दिकर्मवत् ' ( ३ । ३ ) ' ऊनो वा व्यतिरिक्तो वा यः स्वशाखो-वतमाचरेत् । तेन सन्तनुयाद् यज्ञं, न कुर्यात् पारतन्त्रिकम् ' ( गृह्यासंग्रह २ । २ ) ‘ यः स्वशाखोक्तमुत्सृज्य पर - शाखोक्तमा-चरेत् । प्रप्रमाणमृषिं कृत्वा सोन्धे तमसि मज्जति ' ( २। ३ ) । घमंचन्द्रिकाके संस्कारकाण्ड में अध्ययन - प्रकरण में भी यहीं कहा है । - ' स्वशाखां यः परित्यज्य पारक्यामधिगच्छति । स शुद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वकर्मसु साधुभिः । स्वोयशाखोज्झिता येन ब्रह्म तेनोज्झितं परम् । ब्रह्महैव स विज्ञेयः सद्भिर्नित्यं, विगर्हितः ’. जिस प्रकार यह प्रर्थवाद है; वैसे पुराणोंके उक्त पद्योंमें भी । परन्तु जो परम्परासे द्विवेदी वा त्रिवेदी या चतुर्वेदी हैं; उन -के लिए पहला नियम नहीं । गो. तुलसीदास प्रसिद्ध रामोपासक थे । वह श्रीकृष्णको भी श्रीरामके रूपमें ही देखना चाहते थे । इसी अनन्य भक्तिसे उन-की अत्यन्त उन्नति हो गई । यदि वे अनन्य भक्त न बनते; तो उतने उन्नत न होते; इसीलिए कहा है- ' येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः । तेन यायात् सतां मार्गं तेन गच्छन्न रिष्यते ' ( मनु ० ४ । १७८ ) । ( ४ ९ ) उत्तर - इस विषय में हम पहले ( ६ प्रश्न ) में प्रकाश डाल चुके हैं । तात्पर्य यह है कि यह वचन परम्परासे: विष्णु-CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणों में देव निन्दा (? ) भक्तोंके लिए उनको अनन्यभक्तिको स्थिरतार्थ है कि अपने उपास्यदेवको दूसरे देवोंसे बड़ा जाने | इससे उपार निन्दा अपेक्षित नहीं होती; किन्तु अपने उपास्यको अन्य देव दृढभक्ति अपेक्षित होती है । इसलिए प्रसिद्ध है; ' नहि निन्दा निन्द्य स्व प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम् ' । इसलिए कहा है कि-- निदि का भक्त दूसरे देवोंको नारायणके समान न जाने किन्तु नाराय को. ही सबसे बड़ा जाने । इससे उसकी, निष्ठा नारा रहेगी । नहीं तो एकमें निष्ठा शिथिल होनेपर दूसरे में भी उसने निष्ठा न होनेपर ' इतो भ्रष्टस्ततो नष्टः, संशयात्मा विनश्यन ( गीता ४। ४० ) इन उक्तियों का उदाहरण बन जाता है । ' यही अभिप्राय हैन स्प्रष्टव्या न द्रष्टव्या न वक्तव्य कदाचन ' का । नहीं तो दूसरोंका सङ्ग निस्सङ्कोच हों जा तव पुरुष अपनी दुर्बलतासे चलितमति वाला हो जाता है । सती स्त्रीका सर्वोपरि इष्टदेव वा ईश्वर पतिदेव ही होता है । वह पति चाहे मूर्ख हो, निर्धन वा कुरूप, अथवा थोड़ी सरि लि वाला. हो, चाहे दूसरे पुरुषोंसे योग्यता प्रादिमें हीन है; वर्षा रूप उस सती स्त्री के लिए वही सर्वश्रेष्ठ तथा पूज्य होता है, प वा पुरुष सुन्दर भी हो; तो भी पूज्य नहीं । यदि स्त्री परपुरुष वा सुन्दर वा योग्यतर समझकर उन्हें देखे, वा उनसे मधुरख कल बोले, वा उनका स्पर्श क्ररे; तो दुर्बलतावश चलितचित्त हो सक हाति प्राप्त कर सकती है. 1. जैसे अपने पतिका सर्वश्र ेष्ठ माननेका अभिप्राय अन्य स्त्रियोंके पतिको निन्दाकेलिए नहीं होता; किन्तु दूसरोंकी नि अपने पतिकी प्रशंसा के लिए ही होती है; वैसे ही नाराय यदि अपने इष्ट देवों की सर्वश्रेष्ठताके कथनका अभिप्राय विष सैन्य देवोंकी निन्दा वा तुच्छता के लिए नहीं होता । ' न स Gujarat An eGangotri Initiative

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सनातनधर्मालोक ( ७ ) ३५२ कि - उपायर व्या: ' इस वाक्य से अन्य देवोंके उपासकोंकी निन्दा इष्ट नहीं, अन्य उससे विष्णुभक्तिकी प्रशंसाके द्वारा विष्णुभक्तिकी देवाश किन्तु इष्ट होती है । दृढभक्ति स्तुतिमात्र निन्द्य निन्दि ( ५० ) उत्तर - ' भवव्रतधराः ' इस प्रकारके पुराणके वचनोंके कि-- नाराय‍ विषयमें पहले स्पष्टता हम कर चुके हैं कि जहां कहीं अपने किन्तु नारा इष्टदेवी स्तुत्यर्थं दूसरे देवोंके उपासकोंको तुच्छ बताया जाता निष्ठा उपो है, उसका अभिप्राय अन्य देवोंकी निन्दा में नहीं होता; किन्तु सरेमें भी पूर्व वह निन्दार्थवाद अपने इष्ट देवकी प्रशंसा में पर्यवसित हो जाता नविन है । ' था ते द्ररु! शिवा तनूरधोरा पापकाशिनी ' ( यजुः १६।४६ ) इस ता है । वेद के अनुसार प्रतीत होता है कि रुद्रके घोरघोर दो शरीर न वक्त हैं । उनमें पापियोंको दण्ड देनेकेलिए शिवका घोर शरीर होता च हों जार है, मुमुक्षु लोगोंकी भक्तिकेलिए अघोर शरीर होता है, जो शांत जाता है । के होता है । ही होता है । शिव भूतपतिरूप घोर - स्वरूपकी मुमुक्षु सात्त्विक - भक्तोंके थोड़ी शरि लिए उपास्यता वेद भी नहीं मानता, किन्तु वेद उनकेलिए अघोर-है; त रूपकी उपास्यता मानता है । ' रुद्राणां शङ्करश्चास्मि, वृष्णीनां होता है वासुदेवोस्मि ' ( गीता १०।२३, ३७ ) इस कथनसे शिव एवं विष्णुका श्री परपुरुष वास्तव में अभेद है । तब पुराणके पद्यमें जहां शान्त नारायणकी नसे मधुरत कला कही हैं, इससे शिवकी भी अघोर तनू उपास्य समझी जा चित्तं " हो सकती है । इससे शिवको जिन्दा इष्ट नहीं होती; किन्तु मुमुक्षुत्रोंके लिए देवताओंके घोररूपोंकी उपासनाका. निषेध. न्य ग्रन्य इष्ट है । सरोंकी निन्द केवल शिवजीके ही घोरघोर दो रूप होवें, यह भी, नहीं ही नारावर है किन्तु विष्णु भी वैसे दो रूप हैं । उनमें मुमुक्षु विष्णु भक्त. अभिप्राय विष्णु के अघोर शान्त राम कृष्ण आदि रूपोंकी उपासना करते T.1 न है उसके घोररूप नृसिंह यादिकी नहीं; क्योंकि - घोररूपोंकी. CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणों में देव - निन्दा (? ) ३५३ आराधना शत्रुसंहार ग्रादि श्राभिचारिक कर्मों में होती है, मुक्ति-की इच्छा में नहीं । इस प्रकार शक्तिके भी घोर अघोर दो रूप हैं । रक्तबीज श्रादि सुरोंके विध्वंसार्थ काली - प्रादि घोर रूप हैं । दूसरे अघोर अम्बिका प्रादि रूप हैं । मुमुक्षु लोग अपने-अपने इष्टदेवके अघोररूपोंकी हो उपासना करें, घोररूपोंकी नहीं । हां, शत्रुत्रोंके उच्चाटनार्थं घोर रूपोंकी उपासना भी निषिद्ध नहीं - यही आशय पुराणके प्राक्षिप्त श्लोकों का है । न इससे उनकी साम्प्रदायिकता सिद्ध होती है, न भिन्न - भिन्न कर्तृ-कता ही । तथापि इससे लोग सम्प्रदाय - भेदमूलक कलहों की सृष्टि न करें, बल्कि दूसरे की मूर्तिको भी अपनी इष्टदेवमूर्ति समझकर उसे प्रणाम करना चाहिये । वैष्णवोंका विष्णु, शैवोंका शिव, शाक्तोंकी शक्ति- यह सभी सर्वत्र व्याप्त हैं । यदि विष्णु प्रतिमामें शव अपने शिव-को, श्रौर शाक्त शक्तिको व्यापक नहीं देखता, ' और शिवप्रतिमा-में वैष्णव विष्णुको व्यापक नहीं देख सकता; तो यह लोग ' स्वयं अपने इष्टदेवकी व्यापकताको खण्डित कर रहे हैं । तब उपा-सकको उचित है कि - प्रपने इष्टदेवको सर्वत्र व्यापक देखे, उसके साथ अनन्य हो । उसीको सर्वत्र देखे । वैष्णव शिवमूर्ति में भी विष्णुको ही देखे । शैव विष्णुमूर्ति में भी शिवको देखे । इससे परस्परविरोध हो ही नहीं सकेगा । इससे जो विरुद्ध वचन मिलते हैं; उनका तात्पर्य अनन्यनिष्ठामें ही है । विरोध वा कलहों का सूत्रपात अपूर्ण लोग ही करते हैं, पूर्ण-विद्वानोंके विरोध नहीं होते । वेदकी ११३१ शाखाएं हैं; वे सभी वेद हैं । परन्तु पौराणिक अपूर्ण विद्वानोंकी भान्ति वैदिक पूर्ण-विद्वान् भी इसमें कलहोंकी सृष्टि किया करते हैं । दूसरेकी स. घ. २३ Gujarat. An eGangotri Initiative

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३५४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) शाखाकी मानुषता बताना वा उन्हें न मानना - यह वहां भी अर्थ -वादसे ही अपनी शाखामें अनन्यनिष्ठतार्थ होता है, वस्तुतः सभी वेद हैं; परन्तु कुल परम्परा वा गुरु - परम्परासे जो शाखा जिस-की प्रधान हो, उसको प्रधान वह भले ही माने, पर दूसरी शाखाओंका भी प्रादर करे । अन्यमें विरोधकी आवश्यकता नहीं । दूसरी वेदशाखाको प्रवेद सिद्ध करना यह पौराणिक देव-भेदकी भान्ति अनभिज्ञता | विरुद्ध वचन अर्थवाद अनन्य-निष्ठतार्थ होते हैं कि - पुरुष एकका बनकर रहे । ' इतो भ्रष्ट-स्ततो नष्ट: ' न हो जावे । पर तदर्थं कलहसूत्रपात प्रवाञ्छनीय है । इस प्रकार परस्पर सहिष्णुता होनेसे साम्प्रदायिक - कलह नहीं हो सकेंगे । शैव - वैष्णवों में जो विरोध होता है, वह नास-मझोंका होता है, इस प्रकार भिन्न वेद शाखा वालोंके पारस्प--रिक कलहका मूलकारण भी प्रविचार है । अब यह कलह तो कम होते हैं; अब हिन्दु - मुस्लिम कलह भी इसी अविचारके कारण होते हैं; परस्परसहिष्णुता होनेसे सब ठीक हो जाता है; दूसरेके -मतको भले ही न मानो; पर यह तो समझो ही कि दूसरा भी अपनी स्थिति में ठीक है । इसी अविचारके कारण मुसलमानों में शिया - सुन्नियोंके, ईसाइयोंमें रोमनकैथलिक प्रोटेस्टेण्टोंके: भी कलह हुआ करते हैं । इससे स्पष्ट है कि विभिन्न सम्प्रदायोंमें जो विरोध होता है, वह अपने इष्ट देवको सर्व व्यापक न माननेके कारण तथा शास्त्रोंके परस्पर - विरुद्ध वचनों का वास्तविक तात्पर्य न समझने केही कारण ही होता है । हमने उनका तात्पर्य समझा दिया है; इसमें निष्पक्ष - दृष्टि रखने से सब समझ में आ सकता है । ' * ( ५१ ) उत्तर - विष्ठायां जायते कृमि: ' यादि WRIES पर निन्दक वचन भी ' विरोधे गुरणवादः स्यात् ' इस न्यायसे श्रपने देवमें CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणों में देवनिन्दा ( 2 ) अनन्यनिष्ठार्थं ' भयानक ' प्रर्थवाद - वचन होते हैं; विधिवचन अतः उनका स्वार्थ ( शब्द के अर्थमात्र ) तात्पर्य न अर्थवादमें एककी प्रशंसार्थ, उस एकमें प्रव्यभिचारिणी- नहीं होता । के उत्पादनार्थ जहां रोचक - वचन प्राते हैं; वहां उससे भसि हटवानेकेलिए भयानक वचन भी निन्दार्थवादरूपमें भिन्न इस प्रकारके वचन एकदेशी विचारवाले, भेददर्शी आते है । मनुष्योंके अपनी परम्पराप्राप्त इष्टदेवमें अनन्यमनस्कताले- , अल्पमनि उत्पादनार्थ होते हैं । वास्तविक दृष्टिमें शिव वा विष्णु परमेश्वर वा शक्तिविशेषके भिन्न - भिन्न नामरूप एक है । विचार उच्च कोटिका होता है । इस प्रकारकी हैं; पर यह उच्चकोटिक सभी अधिकारी नहीं होते; किन्तु थोड़े ही होते हैं । जो उन्न कोटिके, सर्वदर्शी तथा अभेद - वादके जानकार होते हैं, उनके. य लिए उक्त अर्थवादवचन होते भी नहीं । अधिकारिभेदसे का कर्मोंके अनेक प्रकार शक्तिके अनुसार व्यवस्थापित होते हैं । क जैसे सती स्त्री सुन्दर वा योग्य भी पर - पुरुषमें पति वाली-दृष्टि, परिचर्या, स्तुति वा रति करे; तब उसकेलिए भी ' विद्यायां । जायते कृमि: ' प्रयोग हो जाता है । यदि उसकेलिए ऐसा कठोर प्रयोग न किया जाए; तो वह दुर्वलतावश चलचित्ततासे हानि उठा सकती है । जैसे अपने पतिकी सर्वश्रेष्ठता वतानेका श्रमि प्राय अन्य सतियोंके पतिकी वस्तुतः निन्दार्थ नहीं होता, किन्तु अन्य पुरुषोंकी निन्दा उसके अपने पतिकी स्तुत्यर्थं तथा अपने पतिमें रतिकेलिए होती है, क्योंकि व्याहारिकता में भेद स्वाभाविक ही होती है; वैसे ही अपने - अपने पुराण वा स्मृति अपने देवकी प्रतिशयित स्तुति तथा दूसरेकी निन्दा चलचित्तता हटाने के लिए ही होती है । वह साधारण लोगोंकी चलचित्तता ‘ विष्ठायां जायते कृमिः आदि भयानक बचनों के प्रयोगके बिना Gujarat An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ३५६ धिवचन भी नहीं । पर विशेषज्ञ विद्वान् समझ जाता है कि यहांकी नहीं हटती अपने देव की स्तुत्यर्थ है, दूसरेके देव की निन्दार्थ नहीं । नहीं रिणी होता । निन्दा में यह एक न्याय प्रसिद्ध है - " नहि निन्दा निन्द्य ं उससे - भक्ि मीमांसाशास्त्र प्रवर्तते किन्तु विधेयं स्तोतुम् ' । तब प्रतिपक्षी लोग जो में भिन निन्दितुं कि उन निन्दा -, वचनों को साधारणों के बुद्धिभ्रमार्थ उपस्थित कर , आते है । देते हैं, यह या तो उनकी ना - समझी है, या उनकी कलह कराने-व्यमनस्कताई अल्पमनि में स्वाभाविक प्रवृत्ति ही इसमें अपराधिनी है । विष्णु एक । ( ५२ ) उत्तर -- इसी प्रकार ' येन्यं देवं परत्वेन ' आदि हैं; पर पह हो । श्लोकोंकी व्यवस्था भी समझनी चाहिये । यहां पर ' परत्वेन ' का उच्चकोटिल ' बड़ा करके मानते हैं ' यह तात्पर्य न होकर ' भिन्नतासे मानते हैं ' जो उच्च यह अर्थ एवं तात्पर्य है, नारायण ही सर्वदेवात्मक हैं ' यह भाव हैं, उनके हैं । अथवा ' जो लोग किसी दूसरे देवताको नारायणसे बड़ा भेदसे कर्तव्य मांनते हैं, वे अज्ञानी हैं ' ऐसा अर्थ होनेपर नारायणकी भक्ति-होते हैं । का अर्थवाद इष्ट है । इस प्रकार ' एष देवो महादेवो न तस्मात् परमं किञ्चित् ' यहाँ उस महान् देव की प्रशंसा है । पति वालो | इस प्रकार ' वासुदेवं परित्यज्य ' इस पद्यका तात्पर्य भी भी ' विष्ठा । समझ लेना चाहिये । इसका यह अभिप्राय है कि जो पहले से ऐसा कठोर श्रीकृष्णका भक्त है, अब उसकी भक्ति छोड़ कर अन्य देवकी उपासना करता है, वह प्यासा उपस्थित गङ्गाजलको छोड़कर नेका श्रमि • अन्य कु वा खोदना चाहते हुए पुरुषकी भान्ति दुर्मति है । जैसे-ता, किन कि- गङ्गाजल जब उपस्थित है; अतः उसके पीनेमें कोई परि-तथा अपने में भेद ह श्रम न होगा, अन्य कुएंका खोदना नवीन प्रयास- साध्य होने से वा स्मृतिगं कष्ट - जनक होता है, वैसे ही पहले से ही वासुदेवका भक्त उसे चलचित्तता छोड़कर नये देवताकी भक्ति करना शुरू करेगा; तो उसमें नया-चलचित्तता । प्रयास होनेसे कष्ट ही होगा । इससे शिव श्रादिकी निन्दा नहीं है, किन्तु पूर्व - प्रतिज्ञात व्रतका भङ्ग होनेसे निन्द्रित है; पर चाहिये, पुराणों में देवनिन्दा (? ) ३५७ एकमें दृढता । इसी कारण भगवान् गीतामें कहते हैं - ' अनन्या -श्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ' ( २२ ) ' अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभ: ' ( ८ । १४ ) ' यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्ररणश्यामि ' ( ६ । ३० ) ' भक्त्या त्वनन्यया शक्य ग्रहमेवंविधोऽर्जुन ' ( ११ । ५४ ) । इस विषय में पाठक अन्य स्पष्टता भी देखें - ' उदितेऽनुदिते चैव समग्राध्युषिते तथा । सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकी श्रुतिः ' ( मनु २ । १५ ) यहां उदित यज्ञ, अनुदितयज्ञ, समयाध्युषित यज्ञ-को वैदिक कहा गया है । इन्हीं यज्ञोंकेलिए न्यायदर्शन में यह वैदिक - वचन उद्धृत किया गया है- ' श्यावोऽस्य ग्राहुतिमभ्यवह-रति, य उदिते जुहोति । शवलोऽस्य ग्राहुतिमभ्यवहरति, योऽनु-दिते जुहोति । श्यावशबलौ श्रस्य प्राहुतिमभ्यवहरतो यः समया-ध्युषिते जुहोति ' इनमें परस्पर विरोध दीखता है । इस विरोध-का दूर करनेका उपाय श्रीगोतममुनिने न्यायदर्शनमें लिखा है-' अभ्युपेत्य कालभेदे दोषवचनात् ' ( २२११५८ ) यहांपर श्रीवात्स्या-यनने अपने भाष्यमें कहा है- ' न व्याघातो हवने - इति अनुवर्तते । योऽभ्युपगतं हवनकालं भिनत्ति, ततोऽन्यत्र जुहोति; तत्र प्रभ्यु-पगतकालभेदे दोष उच्यते - ' श्यावोस्य आहुतिमभ्यवहरति ' इत्यादि । तदिदं विविभ्र शे निन्दावचनम् " - इति । इसका अभिप्राय यह है कि इन तीन कालों में जिसने अपनी कुल - परम्परासे एक काल ( चाहे सूर्योदयमें यज्ञका, या सूर्योदयसे पूर्व यज्ञका वा सूर्योदयके बाद देरीसे यज्ञका ) स्वीकृत कर रखा है; उस कालको तोड़कर यदि पुरुष अन्य - कालका अनुसरण करता है, वही उक्त श्रुतिप्रोक्त दोषोंका भागी बनता है । इस प्रकार विरोध हट जाता है, वैसे ही पुराणों में भी जानना चाहिये । देवपूजा ही CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ७ ) ३५८ यज्ञ होता है, ' यज देवपूजा - सङ्गतिकरण- दानेषु ' । जो परम्परासे वासुदेवका भक्त है, वह उसे छोड़कर अन्यको भजता है, वह पूर्व की न्यूनता - सी बताकर पुराणोक्त दोषका भागी बनता है । इस प्रकार उक्त - पुराणवचनमें उस दृढताको शिथिल करनेमें निन्दा-वचन है । उसमें न कोई विरोध है; न दूसरे देवकी पूजाका खण्डन । नहीं तो वैदिक यज्ञकालके भेदमें परस्पर - विरुद्ध वचन दीखनेसे उक्त व्यवस्थाके अस्वीकार करनेपर न्यायदर्शन के पूर्व पक्षानुसार व्याघात उपस्थित हो जानेसे वेदकी अप्रमाणता उपस्थित हो जाएगी । पर यह बात न्यायकारको अभिप्रेत नहीं । इसलिए मनुस्मृति में यज्ञकालके परस्पर विरुद्ध वचनोंको अप्रमाण न मानकर सभीकी प्रमाणता स्वीकृत की गई है-' श्रतिद्वैधं तु यत्र स्यात् तत्र धर्मों उभौ स्मृतौ । उभावपि हि तौ धर्मों सम्यगुक्त मनीषिभिः ' ( २ । १४ ) सो वह विरुद्धता भिन्न पात्रमें चरितार्थ हो जाती है । इस कारण भगवद्गीतामें भी कहा गया है - ' यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाचितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् || स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान् ' । ( ७ । २१-२२ ) अर्थात् भक्त जिस देवकी मूर्तिकी पूजा करता है - मैं उसकी उधर श्रद्धा बढ़ाता हूँ । फिर वह मुझसे ही फल प्राप्त करता है । ऐसे विचार जानलेनेपर सभी विरोध काफूर हो जाते हैं । उससे पुराणोंकी भिन्न - कर्तृ कता भी नहीं हो जाती । उपसंहार इस निबन्ध में ' संसारके पौराणिक - विद्वानोंसे ३१ प्रश्न ' नामक क्षुद्र - पुस्तिका ( ट्रैक्ट ) का पूर्ण उत्तर दे दिया गया है । अव तक ' कीर्तन सम्बन्धी विज्ञापन ' पुराणों के कृष्ण, शिवलिंग पूजा-CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणों में देवनिन्दा (? ) 1. रहस्य, नृसिंह अवतार वध, शिवजीके विलक्षण बेटे शिर्वानर पूजा क्यों?, शास्त्रार्थ - चैलेंजका उत्तर, मृतक श्राद्ध, का पौराणिक मुख - चपेटिका, सनातनधर्म में नियोग - व्यवस्था - खण्डर रहस्य, पौराणिक -कीर्तन पाखण्ड है ' इत्यादि प्रतिपक्षीको , प्रवास पुस्तिकाओं के ' स्थाली - पुलाक ' न्यायसे अपेक्षित श्राक्षेपोंका स । सभ हार ' आलोक ' के इस पुष्प में प्रायः कर दिया गया है आक्षेपोंका परिहार गत - पुष्पोंमें हो चुका है; क्योंकि । झप आक्षेप नये नहीं हैं, पुराने आर्यसमाजी ट्रैक्टों का निचोड़ हैं । कुतर्कों का परिहार आगे होगा । निष्कर्ष यह है कि - ' नहि निन्दा निन्द्य ं निन्दितुं प्रवर्तते, विधेयं स्तोतुम् ' इस न्याय से ' अपशवो वा अन्ये गोग्रश्वे पशवो गो - प्रश्वाः ' की भांति अन्य देवकी निन्दा तात्पर्य - विन न होकर अपने इष्ट देवमें प्रवृत्ति तथा अन्य देवसे हटाने में ताल I सत्य रखती है | कड़ी निन्दा के विना शास्त्रीय शैलीसे अनभिज्ञ साथ- अस रण- लोग एक निष्ठ भक्त न बनकर, सब चोर प्रवृत्ति करते तात संशयात्मा बनकर ' संशयात्मा विनश्यति ' ( गीता - ४ । ४० ) लोग उक्तिके कहीं लक्ष्य न बन जाएं; इस कारण उनके हितैषी रादि - शास्त्र उन्हें एक में स्थिर रखना चाहते हैं । एरण इसी कारण श्रीमद्भगवद्गीता में भी बहुत स्थलोंपर है कि - भक्ति प्रव्यभिचारिणी हो, पुरुष अनन्य - मन बने - यह ह पहले संकेतित कर चुके हैं । उसका कड़े निन्दार्थवाद के प्रतिति साध सरल उपाय अन्य नहीं हो सकता । नौकाओं पर पैर रख वाले न इधरके और न उधरके रहकर बीचमें ही गिरकर जाते हैं । साधारण - लोग अपना हित आप नहीं सोच स अतः वे अपनी प्रकृतिसे विरुद्ध अपथ्य - पदार्थके सेवन करने वीमारं पड़ जाते हैं । ऐसे अवसरों पर निपुण - वैद्यकी श्रावश्यक श्रीर Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ३६० है- जो उस प्रपथ्य में विषाक्तता होनी उन असमीक्ष्य-बेटे, शिर्वानर पड़ती हृदयोंमें रूढ - मूल कर दे । श्राद्ध - खण्डर कारियोंके स्था, अवतार यही प्रकार जीवमात्र - हितैषी पुराण, स्मृति तथा वेदादि पक्षीकी सभी शास्त्रोंमें थोड़ा - बहुत, स्पष्ट - अस्पष्टरूपमें अवलम्बित किया क्षेपोंका परि गया है, पर आपाततोदर्शी, अदूरदर्शी, तथा ' बिह्नणो वृषणायते ' या है । के निदर्शनभूत, ज्ञानलवदुर्विदग्ध, गालिव्यसनी तथा असभ्य योंकि इस रे पक्षी इन बातोंको जान नहीं पाते; तब वे ' अशक्तास्तत्पदं चोड़ हैं पक्षाततो निन्दां प्रकुर्वते ' ' न वेत्ति यो यस्य गुरणप्रकर्ष, स तं सदा उपस्ति नात्र चित्रम् । यथा किराती करिकुम्भभाजो मुक्ताः प्रवर्तते इस ्यज्य बिर्भात गुञ्जा: ' इन उक्तियोंके अनुसार अपनी अस-गो प्रकाशक भी पुस्तकोंको अपनी कूपमण्डूक - बुद्धिके कारण तात्पर्य - विष सत्यार्थ - प्रकाशक समझते हुए उसी सीमामें रहा करते हैं । वे हटाने में ताल • समुद्र में पहुँच तो दूर, उसे समझ भी नहीं पाते, तब उसको नभिज्ञ सा असम्भव दिखलाकर उसकी निन्दापर उतारू हो जाते हैं । त करते हू तात्पर्य पर्यन्त - प्रतीतिवन्ध्य ( तात्पर्यं तक पहुँच न रखने वाले ) वे ४ । ४० ) लोग शब्दार्थमात्रप्रतीतिमें उलझकर विद्वानोंके उपहास्य होते हितैषी पुर हैं, पर मूर्खो में वे लोग ' अन्धों में काना राजा ' ' निरस्त - पादपे देशे एरण्डोपि द्रुमायते ' इस न्यायसे वे धुरीण मान लिये जाते हैं । यलोंपर ह मतः अपने प्रापको ' कुछ ' समझकर देवताओंकी निन्दाभासके बने यह हो श्लोकोंका संग्रह करके उन्हें ग्रन्थोंके पूर्वापर न देखने वाली, दके प्रतिति साधारण जनता के सामने रख दिया करते हैं । पर वे नहीं पैर रखें जानते कि प्रस्थिरचित्त जीव भिन्न - भिन्न रूपमें भटक कर कहीं गिरकर यहू कहावत न चरितार्थ कर बैठे कि - ' न इधरके रहे न उधरके सोच रहें । इसी अज्ञानके ही काररंग प्रतिपक्षी भी तात्पर्य तक पहुँच सेवन करते त होनेसे स्वयं भी भ्रम - संदेह के सागर में खूब गोते खा रहे हैं, श्रावश्यक्त और दूसरे अपने साथियों को भी गोते खिलाना चाहते हैं । पुराणों में अन्य देवोंकी निन्दा (? ) ३६१ पुराणोंमें दूसरे रूपोंकी होनता इसीलिए दिखलाई गई कि- कोई भी कार्य क्यों न हो; चाहे वह सांसारिक हो, वा पार-मार्थिक; उसको उस समय तक पूर्ण - उन्नति नहीं हो सकती, जब तक कि कार्यकर्ताका मन प्रतिक्षरण उसमें रमा न रहे । संसारमें यह प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ रहा है कि - जो विद्यार्थी अपनी श्रेणीकी विद्या ग्रहण करने में पूर्णरूपसे संलग्न होते हैं; वही उस श्र ेणीमें फर्स्ट - डिवीजनमें उत्तीर्ण होकर आगे उन्नति कर जाते हैं; पर जिनके प्रस्थिर - मन अन्य श्रेणियोंके कोर्समें, हैं । रहते हैं, वा विषयान्तरोंमें संलग्न रहते हैं; वे न केवल फिर श्रेणी ही सफल नहीं होते, बल्कि उन्नत श्रणीमें कभी कुछ ही नहीं पाते । वे ठोकर पर ठोकर खाकर निरन्तर सीर्तन रहा करते हैं । परन्तु पुरुष ऐसी असफलता प्राप्त न करे, यह सोचकर जीवमात्र के हितैषी पुराणोंने रोचक - भैयानक प्रथंवादों-का प्रयोग करके पुरुषोंको सावधान कर दिया है । परमात्मा श्रङ्गी है, देवता उसके ग्रङ्ग हैं, यह हमने दम पुष्प में बताया है । प्रङ्गीकी पूजा किसी श्रङ्गके बिना हो ही नहीं सकती । यह सोचकर पुराणोंने अंगीके अपने इष्ट - अंगकी उपा-संनार्थ प्रेरणा की है । भिन्न देव को जो निन्दा वहां मिलती है,.. उसका भी रहस्य हमने बता दिया है । अब इस दीर्घ निबन्धको यहाँ उपसंहृत करके आगे सुधार-कोंसे प्राक्षिप्त ' श्रीपराशर मत्स्यगन्धा समागम, श्रीसीतारामकी विवाहावस्था, तथा द्रौपदीके पञ्चपतित्वपर विचार ' पाठकोंके समक्ष प्रस्तुत करना चाहते हुए, उससे पूर्व कुछ ' कुतर्कितर्क कर्तन ' उपस्थित करेंगे । उसमें पाठकोंको प्रतिपक्षियोंसे किये जाते हुए अनेकों प्राक्षेपोंका समाधान मिलेगा । हम प्रतिपक्षीको भी धन्य-वाद दिये बिना नहीं रह सकते, जो कि उसने पुराणोंके दोषाभास CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३६२ श्री सनातनघलोक ( ७ ) दिखलाते हुए जनताको उनके समाधान जाननेका अवसर दिया । यदि वह सभ्यता वा लिखनेका ढंग बदल दे; तो आपस में मनो-मालिन्य न रहे । उसीकी दुर्नीतिसे कहीं हमें भी न चाहते हुए भी तदनुकारी शब्द लिखने पड़े हैं । यह सभीको याद रखना चाहिये कि इतिहास - पुराण वेदका रोचक भाष्य होनेसे पुरुषको वेदके विषय में बहुश्रुत कर हैं; पर यह तब होता है, जब पुराणों में श्रद्धा हो । पक्षाने सत्यमाप्यते ' ( यजु: १६ । ३० ) इस मन्त्रके अनुसार उपति ही सत्यको प्राप्ति होती है । इतिहास - पुराणका अवगा-इर्सान करने वां उनमें श्रद्धा न रखनेसे पुरुष ' अल्पश्रुत ' ही रह जाता है, बहुत - सी शास्त्रीय भूलें कर बैठता है । सभीको महा-भारतका यह वचन याद रख लेना चाहिये-' इतिहास - पुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् । बिभेत्यल्पश्रु ताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' ( १ । १ । २६७ ) संशोधन - ३१ वें प्रश्नका छूटा हुआ अन्तिम अँश यह है- ' सना-• तनधर्मकी गोरी स्त्रियोंपर दया एवं काली स्त्रियोंपर इतनी क्रूरता क्यों है? इसका धार्मिक शेष संशोधन - पृ. सम्भोगः । ५७-४ १७६-२० दिया । लिखा । १६६-१३ ३१६-१२ पारिण- । वर्णा । ३३५ - १८ ३५२ - ९. रुद्र! । एवं वैज्ञानिक श्राधार प्रस्तुत करें । ३१ । ४६ पं. ७ पूज्यन्ते । ५१-८ अथर्व । ५२-१२ देवानन्द । ६१- १६ यथा । १५३-१८ पुराण । १७७-२४ समु. ५। १६० -५ ( ब्रह्मा ) यह पद्य रहा । २०२-७ अण । ३१५-१६ दोग्ध्रीं । ३२३–३० विष्ण्वा । ३२६, ३३१ कृष्ण-टोने ३४५ पुराणोंमें देव - निन्दा (? ) | CC - 0. Ankur Joshi Collection वराहावतारपर प्रक्षेप Gujarat. An eGangotri ५. कुर्ताक - तर्ककर्तन । प्रतिपक्षीने ' पुराणों के कृष्ण ' एक क्षुद्र - पुस्तिका ग्र प्रकाशित की थी; हमने उसका पूर्ण प्रत्युत्तर ' आलोक ( १ ९ ) पुष्पमें ' भगवान् कृष्णका सुदर्शनचक्र ' निबन्धमें पौने ' के उट दिया था । उसमें हमने उसके सभी कुतर्कोंका प्रत्युत्तर दोसो दिया इस पर उसने ' अवतार - रहस्य ' १३० पृष्ठों में प्रकाशित किया । ' वि इसमें उसने हमारे प्रत्युत्तरोंका कुछ भी उद्धार न करके । शा प्रायः वही की वही बातें पृष्ठ भरनेकेलिए लिख डालीं; श्रौर नये प्रश्न भी बढ़ा दिये । यही तरीका उसका ' पौराणिक पाखण्ड ' आदिमें भी देखा गया है । तब उसकी पुरानी बातों तो लिखना व्यर्थ है, हां, उसके अपने ट्रैक्टोंमें जो उसके कुतर्क हैं; उनका प्रत्युत्तर इस निबन्धमें दिया जाता है । उ लिखनेका प्रकार इतना कुत्सित, निर्लज्ज, गालियोंसे युद्ध हु असभ्यता - पूर्ण और निस्सार होता है कि कोई भद्र पुरुष किन्त क्षुद्र - पुस्तिकाओं को देखना ही पसन्द न करे । पर हम खनावर भोज धर्मकी सेवाके का कर्तन यहां ध्यान देंगे । १. कुतर्क – सफाईका काम नाते उन गालियोंको भी सहते हुए उसके कुक कमेट कर देते हैं; प्राशा है- ' प्रालोक ' पाठक हास भी स्त्रों श्रीवराहावतारपर प्राक्षेप । मूषक ब्रह्माजीके छींकसे निकले हुए वाराह अवतारते ग्राचा लिया जाता; तो ज्यादा उपयोगी रहता, कुतर कि- उसके वंशज सुअरोंसे भंगी लेते हैं ' ( अवताररहस्य पु. ॥ प्रवच प्रत्युत्तर -- वाराह अवतार सृष्टिकी आदिमें प्रलय - जल में नि पृथ्वीके उद्धारार्थं उसे जलपर कर देनेकेलिए हुआ था । रूपसे समय मानुषी सृष्टि हुई ही नहीं थी; तब मानुषी - मल भक्षएर Initiative

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३६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) क्षेप प्रतिपक्षीका ही मलप्रेम अछूतोद्धारके नाते सिद्ध होता है । यह अवतार ' वनजी वनजी खर्वो रामौ रामः कृपोऽकृपः । अवद्वारा दर्शते स्युः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ' इसके अनुसार स्तिका ' आलोक देश ( ' वनज ' माना जाता है, ग्राम्य नहीं । उसने अपनी दाढ़ पर भूमि के उठाई थी । ग्राम्य - सूकरकी आरण्यक - सूकरकी भांति दाढ़ नहीं ने दोस होती । दाढ़ वाला आरण्यक - वराह विष्ठा नहीं खाता, वह तो न्युत्तर दिया विस्रब्धं " क्रियतां वराहपतिभिर्मुस्ताक्षतिः पल्वले ' ( अभिज्ञान-शित किया शाकुन्तल २ । ६ ) इस महाकवि कालिदास के वचनानुसार न करके ' नागरमोथा ' की जड़ें खाता है । इसीलिए निरुक्तकारने भी ' वराह ' श्रीर के निर्वचनमें ' वराहारः ' ( ५।४ । १ ) कहकर वराहका अच्छा राणिक रानी बातों श्राहार माना है । श्रीयास्कने ' बृहति मूलानि, वरं वरं मूलं बृहति ' जो उसके ( ५।४ । १ ) कहकर वराहका श्राहार अच्छी जड़ें खाना माना है । है । लयोंसे युद्ध यहां तो वह अवतार, खानेके उद्द ेश्यसे तो हुआ नहीं था; भद्र - पुरूष किन्तु पृथिवीके उद्धारके उद्देश्यसे हुआ था । दिव्य होनेसे उसे हम सना भोजनकी आवश्यकता भी क्या थी? तब जो ' स्वर्ग में सब्जेक्ट उसके कुतर कमेटी ' में आर्यसमाजी श्रीरुद्रदत्तने वराहावतारके भोजनपर उप-पाठक हास किया है, वह और उसकी जूठन चाटनेवाला यह प्रतिपक्षी भी शोचनीय ही है । लार्ड - मैकालेके मानसिक दास ये अपने शा-स्त्रोंका ही तो खण्डन करेंगे! तब प्रतिपक्षीका यह कुतर्क उसकी ह - प्रवताते मूषक - प्रशिष्यताको पुष्ट कर रहा है । मूषक उसके सम्प्रदाय के श्राचार्य के ' बोध ' का प्राचार्य एवं बोधोत्सवका 7 रहता, कुतरने की प्रकृति रखनेसे नायक है । वह रहस्य पृ. 15 प्रर्वाचीन सम्प्रदायने ' कुतर्की ' का प्रतीक है, जिसे इस - जल में निकल शिरोधार्य कर रखा है । पर श्रद्धा - विश्वास आ था । रूपसे एवं प्रमा - प्रमाणके प्रतीक उमा शंकरके ' श्रात्मा वै पुत्रनामसि पुत्र गणेशने उसे अपने नीचे दबा रखा - मल भक्ष है; सो छुआछूत CC - 0. Ankur Joshi श्रीवराहावतार ३६५ न मानने वाले उन कुर्ताकयोंको ही अपना ग्रभिमत वह भोजन स्वीकार कर लेना ' ज्यादा उपयोगी ' होगा । शेष प्रश्न है वाराहका ब्रह्माजी के छींकने से उत्पन्न होना; इस-से प्रयोनिज - शरीर की उत्पत्ति सिद्ध होती है । प्रयोनिज शरीर की सिद्धि वैशेषिक दर्शन ( ४।२।५-६-८-१-१०-११ स्तपादभाष्य ( द्रव्य ग्रन्थ पृथिवी - जल - तेज- वायु प्रादि ) निरूपण तथा प्रश- ) में देखिये । इस उत्पत्तिमें असम्भव भी नहीं है । निरुक्तमें नास-त्यों ( अश्विनीकुमारों ) का ' नासिकाप्रभवो बभूवतुः ' ( ६।१३ । १ ) नाकसे पैदा होना माना गया है । शतपथ ब्राह्मण में भी नासिका द्वारा अविपशुकी उत्पत्ति बताई गई है ( शत. १२ । ७। १ । ३ ) । आर्यसमाजी भी पुंसवन संस्कार ( सं. वि. पृ. ४ ९ ) में प्रोषधि - विशेषको नाक द्वारा डलवाकर पुत्रोत्पत्ति कराते हैं । ' वराहेण पृथिवी संविदाना सूकराय विजिहीते मृगाय ' ( अथर्व. १२ । १ । ४८ ) यह मन्त्र वराहावतारका मूल है । यहां ' वराह ' को स्पष्ट करने वाला ' सूकर ' शब्द भो साथ पड़ा है । फिर सूकरका विशेषण पशुवाचक ' मृग ' शब्द पड़ा है; अतः इसमें वराहावतारका ही संकेत है । ' सृष्टिके प्रादिम वेदमें पोछेके वरा-हावतारका नाम कैसे प्रावे ' यह शङ्का भी नहीं करनी चाहिये । वराहावतारने प्रलयके वाद सृष्टिसे पूर्व जलके भीतर पड़ी हुई पृथिवीको जलके ऊपर कर दिया था; तो वेदमें पृथिवी, जल, सूर्य आदि सृष्टिके पदार्थों का वर्णन प्रानेसे सृष्टिकी पूर्व अवस्था आविर्भूत वराहावतारका संकेत क्यों न आवे? ' जो कि प्रतिपक्षी निघण्टु ( २ । ६ ) के सहारे ' वराह ' का अर्थ ' मेघ ' करता है; ( अव. पृ. १३४ ) इसपर वह याद रखे कि -यह निघण्टु ऋग्वेदकी एक विशेष - संहिताका है, तभी इसके कई शब्द वर्तमान ऋ सं. में नहीं मिलते । देखिये - निघण्टु ( १1१० ) में Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ' बलिशानः, बलाहकः ' यह मेघका नाम, ' शोकी ' ( १-1 ७ ) यह रा त्रिका नाम, ' आष्ठा ' ( १ । ६ ) यह दिशाका नाम, बेकुरा ( १।११ ) वाक्का नाम, सर्णीकम्, स्वृतीकम् ' ( १ । १२ ) यह जलके नाम वर्तमान ऋसं. में तो दूर, चारों वेदसंहिताओं में भी नहीं मिलते । स्वा. द. जी भी अपने प्रकाशित निघण्टुकी भूमिकामें उसे ऋग्वेदका सूचित करते हैं; तब एक विशेषसंहिता के निघण्टु अथर्ववेदकी शौनक संहिताका अर्थ करना प्रतिपक्षीकेलिए उचित नहीं । दूसरा - उसे यह भी याद रखना चाहिये कि - निघण्टु वेदके अधीन होता हैं, वेद निघण्टुके अधीन नहीं । प्रतिपक्षी देखे कि-स्वा. द. जीने निघण्टुके अनुसार ' ब्रघ्न'का ' अश्व ' श्रयं करने वाले मैक्समूलरका अर्थ नहीं माना; और उससे भिन्न ' सूर्य ' अर्थ करने थाले श्रीसायणाचार्यका श्रयं मान लिया । देखो ऋभाभू. ( पृ. १७० ) । तब हम भी यहां निघण्टुसे किये हुए प्रतिपक्षीके ' वराह ' का ' मेघ ' अर्थ मानने में बाध्य नहीं, और फिर निरुक्तकार श्रीयास्कने मेघवाचक ' वराह ' के निगम ' विध्यद् वराहं ' और ' वराहमिन्द्र! ' यह दिये हैं; अथर्वका उक्त मन्त्र नहीं दिया । तब प्रतिपक्षीका उसमें ' मेघ ' अर्थ करना सत्यार्थ कैसे हो सकता है? और फिर श्रीयास्कने ' अयमपि इतरो वराह एतस्मादेव ' ( ५ । ४। १ ) यह कहकर वेदमें ' वराह ' को सुधर - वाचक भी माना है । तब उक्त - वेदमन्त्रमें वेद - पुराणका समन्वय दीख रहे होनेसे उक्त पृथिवो सूक्तका मन्त्र पृथिवीके प्रादिम - उद्धारक वाराहाव-तारका ही मूल है - यह स्पष्ट हो गया । यही यहां पर सत्यार्थ है । मोहिनी अवतार पर प्राक्षेप । २२ - कुतर्क - मोहिनी अवतारखे नः दुष्टोंका नाश T Pi ' सज्जनोंकी, रक्षा की, केवल शिवजीके किया, न साथ कामक्रीड़ा करके CC - 0. Ankur Joshi Collection मोहिनी अवतार ३६६ उनका वीर्यपात करा दिया । क्या अवतारका होता है ' ( पृ.१३८ ) उद्देश्य के प्रत्यु. - मन्थन से उत्पन्न अमृतको दैत्य लोग छीन ले उसमें देवताओं का परिश्रम भी था । पर दैत्य अन्यायसे गये थे । सज्ज हक्क भी छीन ले गये । इससे दैत्योंको दण्डविधान भी उन कि वे सीधे - साधों को ठीक मौकेपर ठग ले गये करना ह रिक्त सांपोंको दूध पिलानेसे उनका विष बढ़कर दूसरोंको । इसके अति हरे पहुँचाने वाला सिद्ध होता है । सभ्य जनताके हितार्थ सांपन मारना न सही, पर उनके दान्त तोड़ देना सर्वजन हितकर है । दैत्य अन्यायी दुष्ट एवं सज्जनोंको तंग करने वाले थे । करन देवता लोग सौम्य, भद्र, एवं जनताके रक्षक थे । यदि दैत्यों को मिल जाता; तो अन्यायका बाजार सदा के लिए गर्म है सम्प जाता; इससे न्यायको बड़ा धक्का लगता । देवता सब मारे परमध जाते । इस समय युद्धका अवसर भी नहीं था । प्रबलोंके साथ उससे नीतिकी आवश्यकता होती है । इसी कारण दैत्योंको नीति आसु फांसने के लिए ' एवं मायाभिः श्रप मायिनोऽधमः ' ( ऋ. सं. ११५१२३ ) गरद इत्यादि वैदिक - राजनीतिके प्रादेशसे मोहिनी अवतार हुआ । वैसे तो वेद मायावी - दैत्योंको मार डालनेका प्रदेश भी देता है । हुए जैसे कि - ' इन्द्रे! जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियं मायया शाशक नाम् ' ( ऋ. ७ । १०४ । २४ ), परन्तु इन्द्ररूप विष्णुने " इस सरपर इसी नीतिका अवलम्बन वेदानुकूल समझा; क्यो बेदिव यही अन्त में उनके हननका मूल थी । यही यहां दुष्टोंका क्या और सज्जनोंकी रक्षा थी; पर यह दैत्य - प्रकृतिवालोंको नहीं करत दीखता । तभी ऐसे लोग दैत्योंके हिमायती बनकर देवरखा देखि अवतारोंका खण्डन करने केलिए एड़ीसे लेकर चोटी तक्श तब पंसीना बहाते हैं । कर Gujarat An eGangotri Initiative