सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 341–350

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६४७ ६४५ दारसंग्रहे । भ्रातृभिश्चिन्त्यमानानां ते हि नो दिवसा ' में भी कहा पादेषु नूतने । १६ ) इयमपि तदा जानकी - ' पतन - विरलैः प्रान्तोन्मी-म् । उपयेमे गताः तन्मनोहरकुड्मलैर्दशन ( १ कुसुमैर्मु ग्वालोकं शिशुर्दधती मुखम् । ललि-इसी प्रकार कृत्रिमविभ्रमः, अकृत मधुरैरम्बानां मे नाय ३० में तललितज्र्ज्योत्स्नाप्रायैर ' ( १ । २० ) है- ' राम: कुतूहल मङ्गकैः यां द्वादशा- " यहां पर सीताकी विवाहायु स्पष्टता से ६ वर्षकी सूत्रित की गई । अष्टादश " है । यहां पर प्राचीन - टीकाकार ' वीर राघव ' की की हुई व्याख्या माभिरामी इस प्रकार है- " पतनेन प्रस्थित दशन - पतनेन, विरलै: - सान्तरालः । -1 ' लोमशः प्रान्तेत्यादि - अत्र उन्मीलच्छन्दः प्ररोहदन्तपरः, दशन- कुसुमैरिति षड् - वर्षामय रूपक - साहचर्यात् । तथा च उन्मीलदेव - उद्यन्नूतन दशनाङ्क ुर एव तो द्वाददा च मनोहर - कुड्मलं प्रान्ते येषामित्यादि । श्रनुकम्पितैरङ्गः वराज्यम- प्रङ्गकः । यद्वा - अल्पैरङ्ग स्तनुभिः - यहां पर सीताके दूधके दांतों-का गिरना तथा नवीन दांतोंका पैदा होना वरिणत किया गया को हैं । है; जो कि ६ वर्षके लगभगमें होता है । इसीलिए ही यहां २१८ । १६ ) सीताके लिए ' शिशु ' शब्द आया है । यही ' उत्तररामचरित ' में धर्मप्रबो- अन्य स्थानपर भी सूचित किया है- ' न प्रमारणीकृतः पाणिर्बाल्ये म् ' यहांपर शलेन पीडित: ' ( ७ । ५ ) यहां सीताकेलिए ' बाल्ये ' शब्द है, और है । ' बाल्ये रामकेलिए ' बालेन ' शब्द है । ठान्तर है । ' वाल्मीकि रामायण ' युद्ध - काण्ड ३२ सर्ग में भी सीताने यही है । श्री सूचित किया है । " बालां बालेन ( भवता ) संप्राप्तां भार्यां मां की ६ वर्ष सहचारिणीम् । संश्र ुतं गृह्णता पाणि चरिष्यामीति यत् त्वया ' होगई । ( ३२ । २० ) यहां भी सोताने विवाहावसरमें अपने लिए " बालां " वने रामके तथा रामके लिए ‘ बालेन ' यह शब्द कह कर हमारा पक्ष सिद्ध वाया है । कर दिया है । इतनी साक्षी होनेपर भी रामायणा के उक्त सीता-वचनको ‘ वेदवाणी ’ ( १३ । १० ) में ' पथिक ' का प्रक्षिप्त कहना वत्सुतात. श्रबोधमूलक है । इस प्रकार नानूराम व्यास आदिका कथनं भी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीसीतारामको विवाहवस्था ६४ ९ वैसा ही है । इसे हम आगे भी सिद्ध करेंगे । श्रीरामके राज्याभिषेक - सम्भव के समय अथवा यही कहना चाहिये कि - बनवासके समय ३ । ४७ । १० पद्यानुसार श्रीराम-की २५ वर्षकी अवस्था बताई है । बारह वर्ष तक श्रीराम सीता-के साथ घरमें रहे । तेरहवे वर्ष में राज्याभिषेकका भङ्ग एवं वनवास हुआ । इस प्रकार २५ और १३ श्रडु के घटानेपर शेष बारह वर्ष बचते हैं । इससे श्रीरामका विवाह कुछ अधिक बारह-वें वर्ष में हुआ यह सिद्ध हो गया । बारह वर्षं सीताने श्वशुर-गृह निवास किया; इसमें सुन्दरकाण्डस्थ श्रीसीताका हनुमान्के प्रति कहा हुआ निम्न - वचन भी प्रमाण है- ' समा द्वादश तत्राहं. राघवस्य निवेशने । भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृ-द्विनी ' ( ३३ । १७ ) ततस्त्रयोदशे वर्षे राज्ये चेक्ष्वाकुनन्दनम् । अभिषेचयितुं राजा सोपाध्यायः प्रचक्रमे ' ( ३३ । १८ ) । ( ६ ) जो लोग ' ऊन षोडश वर्षो मे रामो राजीवलोचनः ' ( १ । २० । २ ) इस पद्यका १२ वर्ष अर्थ रामकी श्रवस्थाका स्वी-कार नहीं करना चाहते; उनके मत में विश्वामित्र के साथ जानेकी रामकी अवस्था १५ वर्षकी थी । ' योग वसिष्ठ ' रामायण में भी श्रीरामकी अवस्था १५ वर्षकी मानी गई है । ' मम भर्त्ता महा-तेजा वयसा पञ्चविंशकः ( ३ । ४७ । १० ) यहांपर उनके मतमें ‘ वयसा सप्तविंशकः ' पाठ है । अथवा रामाभिरामके अनुसार ' पञ्चविंशकः ' का अर्थ ' प्रतिक्रान्त पञ्चविंशकः ' यही है । अर्थात् वह पच्चीस वर्षको लांघ चुके हैं, अथवा २७ वर्षके हैं । रामायण-शिरोमणिकार के अनुसार ' पञ्चविंशकः ' यह दो पद हैं; जिनका अर्थ पच्चीस और तीन अर्थात् श्रीरामकी उस समयकी अठाईस वर्षकी प्राय थी । इस प्रकार श्रीरामकी अवस्थामें बारहवां या पन्द्रह वर्षका मतभेद होनेपर भी हमारे पक्षकी कोई हानि An eGangotri Initiative

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६५० श्री सनातन धर्मालोक ( ७ ) नहीं । श्रीसीताकी तो विवाह - समय में छः वर्षको अवस्था थी- इसमें तो किसीका मतभेद नहीं मिलता । ( ७ ) वास्तवमें शास्त्रों में कन्या विवाहको अवस्थाके नियत करनेमें ही मतभेद पाया जाता है, पुरुषके विवाहकी अवस्थामें तो शास्त्रानुसार स्वतन्त्रता मानी गई है । इसीलिए ही ' त्रिंशद्वर्षो वहेत् कन्यां ( ६ | ४ ) इस मनुस्मृतिके पद्यकी मन्वर्थमुक्तावली में श्रीकुल्लूकभट्टने पुरुषकी विवाहावस्थाकेलिए कहा है- ' एतच्च योग्यकाल - प्रदर्शनपरम् नतु नियमार्थम् । प्रायेण एतावता कालेन गृहीतवेदो भवति । त्रिभागवयस्का च कन्या वोदुर्यो योग्येति गृहीतवेद- श्चोपकुर्वाणको गृहस्थाश्रमं प्रति न विल-म्बेतेति सत्वर इत्यस्यार्थः ' अर्थात् पुरुषकी विवाह - त्रय कुछ निश्चित नहीं है, किन्तु जब वह वेदको समाप्त कर चुके; तब गृहस्थाश्रमके ग्रहरणमें देरी न करे, क्योंकि - ब्रह्मचर्याश्रमका सम्बन्ध वेद एवं वेदको समाप्तिसे है । ब्रह्म वेदः, तदध्ययनार्थ-माचर्यमारणं व्रतमपि ब्रह्म, तच्चरणं ब्रह्मचर्यम् । तच्चरतीति ब्रह्मचारी ' । इससे स्पष्ट है कि वेदको जब ही समाप्त कर ले, उस समय बह गृहस्थाश्रमका अधिकारी हो सकता है, क्योंकि ब्रह्मचर्यं वेद पढ़ने के लिए ही लेना पड़ता है । यह ' ब्रह्मचर्यं ' शब्द के विग्रहसे बताया ही जा चुका है - इसी कारण श्री मनुजीने भी ब्रह्मचर्य के लिए कहा है- ' षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं. व्रतम् । तदधिकं पादिकं वा, ग्रहणान्तिकमेव वा ' ( ३ । १ ) व्रतसे यहां वेदाध्ययनरूप व्रत है । ( ८ ) उक्त - पद्य के अन्तिम ग्रंश ' ग्रहणान्तिकमेव वा ' के व्याख्यान में श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है ' यावता कालेन उक्तावघे -रूर्ध्वम् अधो वा वेदान् गृह्णाति; तावत्काले व्रताचरणम् ' अर्थात् चेदकी समाप्ति जब ही कर ले; जो अवधियां दी गई हैं । उनसे. CC - 0. Ankur Joshi Collection विवाहका प्रदेश कब? पूर्व ही वा पीछे, वेदकी समाप्ति कर ले; तभी तक ६५१ रखे । इसीलिए ही श्रीमनुने ' वेदान् ' इस बहुवचनको ब्रह्मचयं श्राश्रम लिया वक्षित माना है, और कहा है-- ' वेदानधीत्य भी अवि- तत्त्व वापि यथाक्रमम् | अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत् , वेदौ वा, वेदं स्नात ३ । २ यहां पर एक वेदको समाप्त करके भी ' ( मनु. का स्वीकार कहा गया है । इसी कारण ' वैखानस गृहस्थाश्रमका गया है - ' प्राङ्मुखमुदङ्मुखं वा... · वेदान्, वेदौ गृह्यसूत्र ' में भी कहा मध्यापयति ' ( २१ ) यहां पर एक वेदका, वेदं वा सूत्र - सहित-किया गया है । ‘ यावद्ग्रहणं वा ( पारस्क अध्ययन भी अनुज्ञात भी जब तक वेद समाप्त ० २ । ५।१५ ) यहाँ पर कर ले, तब तक ब्रह्मचर्यं रखे -यह कहा है । इसो प्रकार मनुने ( ३ | १ पद्य में ) ' पादिक ' ब्रह्मचर्थसे भी थोरा व्रतकी समाप्ति मानी है । पादिक ब्रह्मचर्य नौ वर्षका होता है । का ' वाराहगृह्यसूत्र ' में भी वेदग्रहणावधि ब्रह्मचर्यं माना है- रामा ' द्वादश वर्षारिण एकवेद - ब्रह्मचर्यं चरेद् यावद्ग्रहणं ( षष्ठ खण्ड ) । ' बोधायन - धर्मसूत्र ' में भी कहा है- ' प्रहणान्तं वा वा ' अत्र जीवितस्य अस्थिरत्वात् ' ( १ । २।४ ) अर्थात् जीवन अस्थिर, धर्मात होता है, कोई पता नहीं, कब समाप्त हो जावे । अतः जभी वेद-का ग्रहण कर ले, तभी तक ब्रह्मचर्यं व्रत करके फिर विवाह श्रीरा कर ले | १५ फलतः ग्रहणान्तिक आदि किसी भी ब्रह्मचर्यको पूरा करके और फिर गुरुकी अनुमति से स्नातक होकर विवाह कर सकता है । अवस्थ जैसे कि श्रीमनुजी ने कहा है- ' गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्त यथाविधि । उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णा लक्षणान्विताम् ॥ ' ( मनु ० ३ | ४ ) यह सब बातें भगवान् राममें भी घटा लेनी चाहियें । श्रीराम प्रादिने वेद एवं धनुर्वेद शीघ्र ही समाप्त कर गृह्यस Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 343

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६५२ चर्य ६५५ था, अत: वे स्नातक हो चुके थे । जैसे कि ' वेद - वेदांग -भी - श्राश्रम लिया धनुर्वेदे च निष्ठितः ' ( १ । १ । १४ ) ' सम्यग् विद्याव्रत-वा श्रदि- जाता तत्त्वज्ञा यथाव 1 - साङ्गवेदवित् ( २।२०३४ ) इस ' विद्याव्रतस्नात ' , वेद शेत ' का लक्षण पारस्करगृह्यसूत्रमें कहा है - ' वेद, व्रतं च ( नववर्ष -स्थाश्रमका ( मनु. रूपं ) उभयं समाप्य यः समावर्तते स विद्याव्रतस्नातकः ' ( २ । में भी कहा ५। ३५ ) यहां पर ' व्रत ' का अर्थ कमसे कम ६ वर्षका ब्रह्मचर्यं सुत्र सहित विवक्षित है । स्वा. द. जो की संस्कार विधिमें लिखा है- ' सब मिलाके अनुज्ञात. नौ वर्षोंके भीतर चारों वेदोंको पढ़ना, ( वेदारम्भ पृ. ११३ ) । यहाँ पर विद्यास्नान पृथक् हो, व्रतस्नान पृथक, ऐसा नहीं होता । ' धनु-रखे वंदे च वेदे च वेदाङ्ग ेषु च निष्ठितः ' ( सुन्दर ० ३५ । १४ ) ' चरित-- यह ब्रह्मचर्यस्थ विद्यास्नातस्य धीमतः ' ( २ । २ । ११ ) इन पद्योंमें भी श्री रामके स्नातकत्वका संकेत दिया गया है । तभी उनके विवाह-ता है । का विचार भी महाराज - दशरथ कर रहे थे । जैसे कि वाल्मीकि-ना है- रामायणमें कहा है- ' ते चापि ( रामलक्ष्मणादयः ) मनुजव्याघ्रा हणं वा वैदिकाध्ययने रताः । पितृशुश्रूषणरता धनुर्वेदे च निष्ठिताः । तंवा, ग्रत्र राजा दशरथस्तेषां दारक्रियां ( विवाह ) प्रति । चिन्तयायास अस्थिर धर्मात्मा सोपाध्यायः सबान्धवः ॥ ' ( १।१८ १३६-३७ ) भी वेद- ' राज्ञो वलार्थिनः षष्ठे ' ( २।३७ ) मनुके इस वचनके अनुसार विवाह श्रीरामके छठे वर्ष में उनका उपनयन समझना चाहिये । उनके " १५ वें वर्ष में मनुप्रोक्त, ३ वर्षके पादिक ब्रह्मचर्य व्रतकी समाप्ति'-करके और उसके बाद उनका विवाह समझना चाहिये । तब इस ता है । प्रवस्थाका उनका विवाह धर्म - शास्त्रानुकूल हो सिद्ध हो जाता है है । इसका मूल ' आनन्द - रामायण ' के ' सारकांड ' में भी पाय नाम् ॥ ' जाता है- ' प्रय पित्रोपनीतास्ते ( रामादयः ) गुरुणा मुनिभिमुदा T लेनी गर्भसंवत्सरे षष्ठे जन्मत: पंचमे समे ' ( ६ । १२६ ) । ' जैमितिः । प्त कर गृह्यसूत्र'में - ‘ द्वादश वर्षाणि वेदब्रह्मचर्यम्, जननात् प्रभृति इत्येते CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. स्त्री - पुरुषका विवाह कब? ६५३ यावदध्ययनं वा ' ( १ । १८ ) यहां पर जन्मसे बारह वर्ष तक वेद-ब्रह्मचर्य माना गया है । उसकी समाप्तिमें विवाह स्वतः प्राप्त है । इस प्रकार विवाहके समय श्रीरामको १५ वर्ष वा १२ वर्षसे कुछ अधिक अवस्था सिद्ध हो जानेसे दोनों ही अवस्थाओंमें धर्म-शास्त्र वा धर्मसूत्रकी अनुकूलता होकर संगति लग जाती है । इसमें असम्भव नही समझना चाहिये । इसमें श्रार्यसमाजका ब्रह्मचारी-उषर्बुध १२ वर्षका वेद - विद्या पढ़ गया । लोकोत्तर- राममें तो उसका प्रसम्भव कैसे हो? जैसे लोकोत्तर परमात्मामें निमित्त-कारणतापक्ष में उसका सर्वव्यापकत्व भी मान लिया जाता है. अन्यथा लौकिक - निमित्तकारण कभी अपने कार्य में सर्वव्यापक नहीं रहता; वैसे ही लोकोत्तर तथा विष्णुदेवके ग्रवतारभूत श्रीराम में विद्याव्रत - स्नातकत्व इस छोटी उम्र में भी स्वत: -सिद्ध है । पुरुषके विवाहमें कारण वेदाध्यनव्रत की समाप्ति हुआ करती है, तब वह वेदकी अर्थात् शिक्षाकी समाप्ति होनेपर ही विवाह करने में अधिकृत हो जाता है । उसमें अवस्था नियमन दृढ निर्णीत नहीं; परन्तु स्त्रीके विवाहमें मतभेद नहीं होता । ऋतु-कालसे पूर्व ही कन्याका विवाह हो - इसमें सभी शास्त्रका रौंका ऐकमत्य है । पार ऋतुकाल सब देशोंकी कन्याओंों का समान न्यायमें नहीं हुआ करता । ऋतु कथ्याओंका प्रायः बारह वर्ष के अन्त में हो जाता है, कहीं अधिकाधिक सोलह वर्षके अन्त में भी । कहीं नवम - वर्षंके प्रारम्भमें भी होजाता है । इसीलिए ही त्रिशद्वर्षो सहेतु कन्यां ह्यां द्वादशवार्षिकीम् ' ( मनु ० ६ । ६४ ) यहां बारह वर्षकी कन्या का ' त्रिशवः षोडशाब्दां भार्यां विन्देत नग्निकाम् ' ( चाहत्रस्थ महाभारत- वतन ) यहां सोलह वर्षकी लड़कीका, ' विवाहो हष्टवर्षायाः कन्यायास्तु प्रशस्यते ' ( संवर्त ० ६८ ) ' त्र्यष्ट-An eGangotri Initiative

पृष्ठ 344

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६५४ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) वर्षोऽष्टवर्षां वा ' ( मनु ० ६ । १४ ) यहां आठ वर्षकी लड़कीका विवाह मिलता है । इस भेदका कारण ऋतुके आनेका भेद है । शास्त्रानुसार विवाहका विधान ऋतुसे पूर्वताका है । ' देश-दर्शन ' पुस्तकके १३४ पृष्ठमें लिखा है कि वहां पर ( इंगलैंड ) में भी १२ से १७ वर्षमें और कभी - कभी नौ वर्षकी आयुमें ही लड़कियां रजस्वला हो जाती हैं । ' ' The origin of Life ' ( Page 363 ) जहां इंगलैंड - जैसे ठंडे देश में भी वर्ष में रजस्वलात्व होता है; तो हमारे उष्ण- देशमें इससे भी पूर्व हो सकता है । इस प्रकार ऋतुकालके भेदसे कन्याके विवाहकी आयुमें भी भेद हुआ करता है । श्रीसीताका भी जो ६ वर्षकी प्रायुमें विवाह हुआ था, उसमें भी इसी तरहका कारण था । अर्थात् उसके ऋतुकालके शीघ्र प्राप्त होनेकी आशा थी । तब शास्त्रानुसार ही राजा जनकने उसका विवाह ६ वर्ष में ही कर दिया । यह बात पाठक आगे देखें । ( ३ ) श्रीसीताकी विवाहायुर्मे श्राक्षेप । श्रीरामकां १२ वें वा १५ वें वर्षमें विवाह हुआ, श्रौर श्री-सोताका छठे वर्ष में, यह हम पहले सप्रमारण बता चुके हैं । पर कई - महाशयों को इसमें ' वाल्मीकिरामायण ' के कई पद्योंकी असङ्गति दीख पड़ती है । उनका अभिप्राय यह है कि- ' विवाहके अवसर पर सीताकी आयुकी १७ मे २४ के भीतर थी, छः वर्ष की नहीं ' । हम उनसे उद्धृत उन पद्योंपर विचार करके फिर अपना पक्ष सिद्ध करेंगे | पहले यह जानना चाहिये कि - श्रीरामको विवाहके समयकी प्रायु १५ वर्ष से अधिक कहीं भी नहीं बताई गई है । गो ० तुलसी-दासजोने भी ' वयस किशोरा ' लिखकर श्रीरामकी धनुषभङ्गके समय किशोर अवस्था मानी है । तब श्रीरामकी अवस्था तो वहीं.. CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी विवाहावस्था १२ से १५ वर्षतकको रही; पर यदि श्रीसीताकी ६५५ ६५ २४ वर्षको आयु मानी जावे; तो ' बहू बड़ी उस समय १७ से यही यह कहावत सिद्ध होकर मर्यादा पुरुषोत्तमकी मर्यादा पर छोटे लाला ' यह जायगी । अतः ऐसा नहीं हो सकता । तब यहां श्रीवाल्मीकि- हीनता हो प्रोक्त - सीताकी ६ वर्षको ही विवाहायु ठीक है । ' प ताओंका कथन यह है कि- परन्तु प्राक्षे. ( १ ) ' पतिसंयोगसुलभं वयो दृष्ट्वा तु मे पिता । चिन्तामभ्यगमद् दोनो वित्तनाशादिवाधन: ' ( २ । ११८ । ३४ ) यह वचन श्रीसीता-ने श्रीअनसूयाको कहा था कि मेरे पिताजी मेरी पतिसे संयोग करने योग्य अवस्थाको देखकर दीन होकर ऐसे चिन्तित होगये, जैसे निर्धन- पुरुषको धन नाश उपस्थित होनेपर चिन्ता हो जाया करती है । " इससे सीताकी प्ररक्षरणीयता बताकर श्रीजनककी उससे चिन्ता बताई गई है । इससे अनुमान है कि - सीताकी प्रायु १७ से २४ वर्ष तककी थी । ६ वर्षको उसकी श्रायु माननेपर उक्त या पद्मकी सङ्गति नहीं बैठती " । हम पूर्वपक्षियोंकी इस युक्तिपर जिन्हें वे एक अकाट्य -प्रमाण माने हुए हैं, विचार करते हैं । इसपर हमारा कथन यह है कि प्रतिपक्षियोंके इस अनुमानका गत- निबन्ध में कहे हुए श्रीसीताके स्पष्ट - वचन के आगे - जिसमें उसकी ६ वर्षकी विवाहाय बताई । गई है - कोई मूल्य नहीं । अनुमान व्यभिचारी भी हो जाया करता है । यहां भी वही बात है । उक्त पद्य में ' पतिसंयोगसुलभं वयः'का पर्थ अन्य कुछ नहीं, किन्तु ' मेरी ( सीताकी ) विवाह - योग्य भवस्था देखकर यह अर्थ है । ' पतिसे सम्भोगयोग्य प्रायु देखकर ' ऐसा असभ्यताका अर्थ श्रीसीता अपनी मान्य और बड़ी श्रीमन--सूया आगे कभी नहीं रख सकती थी । ' पत्या- भर्त्रा संयोग: -सम्बन्धः, विवाह इत्यर्थ; तत्सुलभं वयः - श्रवस्था, तद् दृष्ट्वा ' | Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 345

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श्रीसनातनधर्मालोकं ( ७ ) ६५५ ६५६ । सो जैसे ' दारकर्मरिण, मैथुने ' ( मनु ० ३1५ ) य १७ से यहां है ' अर्थ ' विवाह ' है, ' मैथुन ' नहीं; नहीं ता लाला ' यहांपर ' दारकर्म का शब्द व्यर्थ हो जाता हैं, वैसे ही नता हो ' मैथुने ' यह पृथक् कहा हुआ ' ही है, ' मैथुन ' नहीं । ल्मीकि. ' पतिसंयोग ' का अर्थ भी ' विवाह ' तु प्राक्षे. इसी प्रकार ' भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनीं संन्यासीके वेष में आये हुये रावरणके प्रति कहीं ( ३ | ४७/४ ) इस में भी खाना - पीना, वस्त्र आदि पहनना - यही श्रीसीता- अभ्यगमबू हुई सीताकी उक्ति है, ' मैथुन ' नहीं । किसी अपरिचित गैर - पुरुष, सुख - भोग विवक्षित निर्लज्जताकी बात कही भी नहीं संयोग विशेष करके सन्यासी को ऐसी ' का ' अब मेरी कोई भी वासनाह होगये, जा सकती । ' सर्वकामसमृद्धिनी जाया शेष नहीं ' यह ' पथिक ' का किया अर्थ निर्मूल है । जनककी इसी प्रकार ' तेषां दारक्रियां प्रति ' ( १।१८।३६-३७ ) इस ' राम ' की श्रायु यण ' के पाठ में भी ' विवाह ' अर्थ है, ' मैथुन ' नहीं; इसी तरह ' पति ' र उक्त वयः का अर्थ भी ' विवाहयोग्य अवस्था ' हे ' मैथुन की संयोगसुलभं प्रवस्था ' नहीं । यहां ' रामाभिराम ' टीकाने यही अर्थ लिखा -प्रमाण है....... ' पतिसंयोग सुलभं पाणिग्रहणोचितम् ' । यह अर्थ ठीक है कि- भी है, क्योंकि — जब पूर्वोक्त प्रकारसे श्रीरामकी ही आयु विवाह ग सीता के समय १२-१५ वर्ष है; तो श्रीसीताकी आयु भला श्री रामकी. के आयुसे ऊपर १७ - २४ वर्षकी कैसे हो सकती है? । करता वयो दृष्ट्टा ' में श्रीसीताको ' अपनी चयः'का अब जब ' पतिसंयोगसुलभं अर्थं इष्ट है; तब ' पतिसे संयोगकेलिए इ - योग्य वैवाहिक आयु ' यही ' वेदवाणी ' ( १३ । १० ) में देखकर ' सुलभ वय ' यह कहकर ' पथिक'का अज्ञान है । इस अर्थ ' मैथुनकी योग्य वय ' यह तात्पर्य निकालना का खण्डन पूर्व किया जा चुका है । तब ' वैवाहिक आयु ' यहाँ योग: - अर्थं सिद्ध हो गया । सो शास्त्रोंमें कन्याका विवाह माठ वर्षकी वा ' । प्रायुमें भी मिलता है । देखिये संवत्तंस्मृतिः --''-CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामको विवाहावस्था ६५७ ' विवाहो ह्यष्टवर्षायाः कन्यायास्तु प्रशस्यते ' ( ६८ ) । व्यास-स्मृति में भी देखिये- ' घृताधोवसनां गौरीं ( अष्टवर्षा ) विख्यात-दशपुरुषांम् ' ( २।३ ) । अन्य देखिये- ' एष्टव्या बहवः यद्य कोपि गयां व्रजेत् । गौरीं वा वरयेत् कन्यां पुत्रा त्सृजेत् ' ( बोघायनीयगृह्यशेषसूत्र नीलं वा वृषमु-भाषा होती ३ । १६ । १३ ) गौरीकी परि-है - ' प्रष्टवर्षा भवेद् गौरी ' ( पराशरस्मृ. ७ । ६ ) सो यहाँ भी ग्राठ वर्षकी कन्याका विवाह कहा है । ' पातञ्जलमहा-भाष्य ' के २ । २ । ६ सूत्रके भाष्य में ब्राह्मणका ' गौर ' होना धर्म लिखा है । ' गौर'का अर्थ श्रीनागेशभट्टने इसप्रकार ' गौर इत्यस्य तु ' अष्टवर्षा तु या दत्ता श्रुतशीलसमन्विते लिखा है-गौरी, तत्सुतो यस्तु गौरः स परिकीर्तितः । इसका । सा है कि- ब्राह्मणका उपनयन संस्कार ८ ग्राठ वर्षमें होता श्राशय है; ब्रा- यह ह्मणीका विवाह ही उसका यज्ञोपवीत होता है, यह बात ' वैवा-हिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ' ( मनु. २ । ६७ ) मनुपद्य में स्पष्ट है । तब ब्राह्मणीका उपनयन- प्रतिनिधि विवाह. भी आठवें वर्ष में हो सकता है । आठ वर्षं वाली लड़कीकी संज्ञा ' गौरी ' हुआ करती है | जब उस गौरीका पुत्र होगा; तो उसका ' नाम ' गौर ' होगा । इससे गौरी ( ८ वर्ष वाली ) का विवाह भी सिद्ध हो गया । ' त्र्यष्टवर्षोष्टवर्षी वा ' ( ४ ) यहां पर मनुजीने भी ग्राठ वर्ष वाली कन्याका विवाह माना है । वेदमें भी ' इयमग्ने! नारी पति. विदेष्ट सोमो हि राजा सुभगां कृणोति ' ( अथर्व • २१३६।३ ) इस मन्त्र में सोम देवताके प्राधिपत्यमे भी पति - प्राप्ति कही है । ' सोमो गौरी अधिश्रितः ' ( ऋ ० ६ । १२१३ ) ' गौरी ' का अर्थ ' गोर्याम् ' है । ' सृपां सुलुक् ' ( ७।१।१ ९ ) इस पाणिनिसूत्रसे ङि का लुक् हुआ है । स, घ, ४२ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 346

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६५८ ' ईदूतौ च सप्तम्यर्थे ' ( पा. १।१।१६ ) इस सूत्र से प्रगृह्यसंज्ञा होकर प्रकृतिभाव होजानेसे सन्धिका अभाव हुआ है । तब अर्थ हुआ कि- सोम - देवताका ' गौरी ' में अधिकार होता है । ' गौरी ' कहते हैं-माठ वर्षं वाली कन्याको, भ्रष्टवर्षा भवेद् गौरी ' ( पराशरस्मृति ७।६ ) इससे आठ वर्षं वाली लड़कीका विवाह सिद्ध हुआ । ' महाभारत ' में ' सप्त वर्षामवाप्नुयात् ' ( अनुशासनपर्वं ४४ । १४ ) इसप्रकार सात वर्षं वाली कन्याका विवाह भी देखा गया है । ‘ पराशरमाघवीय’में ' जन्मतो गर्भाधानाद् वा पञ्चमाब्दात् परं शुभम् । कुमारीवरणं दानं मेखलाबन्धनं तथा ' इस प्रकार पांचवें वर्षके बाद कन्याका विवाह शुभ कहा गया है । ' राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे ' ( मनु.२।३७ ) इस वचनसे क्षत्रियका छठे वर्षमें भी उपनयन-संस्कार कहा है । स्त्रियोंका विवाह ही उपनयनस्थानापन्न होता है । ( मनु.२।६७ ) तब क्षत्रिय - बाला सीताका उपनयनस्थानापन्न विवाह भी तदनुसारं छठे वर्षमें होना शास्त्रीय है । इस प्रकार कन्याके विवाहमें बहुत से विकल्प हैं । श्रीजनक इन पारम्परिक ( पर-म्परासे आये हुए ) कन्याविवाहबोधक वचनोंके जानने वाले होनेसे उनके पक्षपाती हो सकते हैं । विकल्पों में अपनी प्रियता अपेक्षित होती है । ' याज्ञवल्क्य स्मृति ' में लिखा है- ' स्वस्य च प्रियमात्मनः । ... साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम् ' ( श्राचाराध्याय उपोद्घात - प्रकररण ७ म श्लोक ) इसमें मिताक्षराने लिखा है- ' स्वस्य च ग्रात्मनः प्रियं वैकल्पिकविषये, यथा- ' गर्भाष्टमेऽष्टमे वाब्दे ' इत्यादी आत्मे-च्छेव नियामिका ' । इस प्रकार इन कन्याविवाहावस्थाके विकल्पोंमें श्रीजनकको ६ वर्षमें लड़कीका विवाह करने का पक्ष प्रिय था; अतः उन्होंने सीताका विवाह भी छठे वर्ष में करना ठान लिया था । उसमें एक अन्य कारण भी था, जो आगे कहा जावेगा । उस अवस्थाके व्यतिक्रममें अपने प्रिय वा मान्ये धर्म के CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी विवाहावस्था भङ्गका भय होने से ' धर्म एव हतो हन्ति ' ( ६५४ www ६६ श्रीजनककी चिन्ता ठीक ही थी । ' न्यायदर्शन मनु ' में ० लिखा ८।१५ ) इस प्रकार । दत्ता ' कालभेदे दोषवचनात् ' ( २।११५६ ) ' विकल्प में जिस है ' अभ्युपेत्व वचन स्वीकार कर लिया गया हो; उसमें यदि कालभेद धर्मके पक्षको तो दोष लगता है — यह इस सूत्रका प्रकृतोपयुक्त कर दिया जाय, पूर्ण - धर्मात्मा जनक भला अपने धर्मंमें दोष क्यों आने ग्रर्थ देते है? । तब दक्षर यद्यपि ' काममामरणात् तिष्ठेद् गृहे कन्यतु मत्यपि । न चैवंनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् 1 मनु ० ६८ ९ ) यह अपवाद श्रीजनकके समक्ष था कि चाहे लड़को ऋतुमती हुई हुई - वचन सारी | आयु भी पिताके घर बैठी रहे, पर उसे गुणहीन पुरुपको 1 कभी न दे - तथापि धर्मात्मा लोग अपवाद- वचनोंसे अपने नर्मको व्यवस्थित नहीं समझते; किन्तु उत्सर्गवचनोंसे ही वे अपने धर्मको व्यवस्थित समझते हैं । और फिर इस पद्यका ऋतुमती लड़कीके घर बिठानेमें तात्पर्य नहीं है; किन्तु ऋतुकाल से पूर्व ही लड़कीको गुरणवान् - वरको दे देनेका तात्पर्य है । तव श्रीराम सदृश गुणवान् सुपात्र वरके ग्रा जानेसे ' म्रप्राप्तामपि ( अप्राप्त. विवाहकालामपि ) तां कन्यां तस्मै दद्याद् यथाविधि ' ( मनु ० १ । पर ८ ) इस मनुवचनके अनुसार मन्वभिमत आठ वर्ष से कम हूं. वर्षं वाली लड़कीका विवाह जनकके पक्षमें शास्त्राभिमत सिद्ध हो जाता है । उक्त - मनुपद्यका अर्थ यह है- यदि गुरणवान् वर मि शास जावे; तो अप्राप्ता अर्थात् श्रप्राप्तविवाहकाला लड़कीका भी विवाह भ्रात कर देना चाहिये । ' वैद्यनाथदीक्षितीय ' में यमका यह वचन पाया ( पर जाता है - ' बालिशा ( बाला ) या भवेत् कन्या गुणाढ्यो यदि शास्त्र लभ्यते T । दद्याद् श्रप्राप्तकालेपि देशकालभयान्नरः ' इस वचनते की मनुपद्यके उक्त - अर्थकी पुष्टि हो जाती है । ' प्रानुशासनिक ' में भी उसक लिखा है - ' जातमात्रा तु दातव्या कन्यका. सदृशे नरे । काले Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६५ ॥ ६६० पिता धर्मरेण युज्यते ' । यह भी प्रकृतोपयुक्त स्पष्ट-२ ) इस प्रकार दत्तासु कन्यासु है ' अभ्युपेय वचन है । धर्म के " कुलाचारादिभिरुत्कृष्टाय सुरूपाय समानजातीयाय बराय र पक्षको ' विवाहयेद् प्रष्टवर्षामेवं धर्मो न हीयते ' इि दिया जाय, प्राप्तकालामपि तस्मादपि कालात् प्रागपि कन्यां ब्राह्मविवाह-न अर्थ है । तब दक्षस्मरणात् विधिना दद्यात्, ' यह श्रीकुल्लूकभट्टने उक्त मनु- ( १।८८ ) पद्यका देते? अर्थं लिखा है; इससे अष्टम वर्षसे पूर्व भी गुणवान् वर श्रीराम-प । न चैवंग के मिलनेसे श्रीसीताका ६ वर्षकी आयु में विवाह कर देना स्मृति-पवाद वचन - विरुद्ध न ठहर कर स्मृत्यनुकूल ही सिद्ध होता है । ई - दुई सारी पर आजकल के अर्वाचीन विचारवाले वादी गण - ' चिन्ता-हीन पुरुषको सभ्यगमद् ! दीनो वित्तनाशादिवाधनः ' ( वाल्मी २ । ११८ । ३४ ) नोंसे अपने इस पूर्व कहे गये रामायणीय - पद्यपर बहुत उछल - कूद मचाते ही वे अपने है । इससे वे श्रीसीताकी अरक्षणीयता और उसकी २४ वर्ष के ऋतुमती लगभग विवाह समयकी अवस्थाका अनुमान करते हैं । यद्यपि काल से पूर्व हम इसका युक्तियुक्त और वास्तविक समाधान कर चुके हैं; तव श्रीराम प ( अप्राप्त तथापि वादियोंका इस पद्यमें अधिक प्राग्रह होनेसे हम भी इस . पर अधिक विचार दिखलाना चाहते हैं । पाठकगरण अवधान से ( मनु ० । से कम है. देखेंगे-भिमत सिद्ध हम पूर्व कह चुके हैं कि - कन्याका ऋतुकालसे पूर्व ही विवाह नू वर मिल शास्त्रनियमित है । ऋतुकालके बाद ' माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भी विवाह भ्राता तथैव च । त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ' वचन पाया ( पराशरस्मृति ७ । ७ ) कन्या विवाह करने पर तो इस प्रकार यदि शास्त्रों में निन्दार्थवाद कहा है । सीताकी अवस्था यद्यपि छे वर्ष इस वचनरे की थी; तथापि उसके ऋतुकाल आनेकी शीघ्र सम्भावना थी । निक ' में भी उसका कारण गम्भीर है । वह यह है कि श्रीसीता मैथुनयोनि नरे । कां नहीं थीं; किन्तु पृथिवीको फोड़कर उत्पन्न हुई थी । जैसे कि-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीसीतारामकी विवाहायु ६६१ ' वाल्मीकिरामायण ' में लिखा है- ' भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ' ( बालकाण्ड ६६ । १४ ) ' प्रयोनिजा ' ( ६६। १५ ) ' भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम् ' ( १ । ६६ । १५ ) इसका ' वेद-वाणी ' ( १३ । १० ) में ' इसप्रकार जब मेरी प्रात्मजा मेरी आत्मा से व मेरे शरीरसे उत्पन्न हुई सीता वर्धमाना ( प्रायोवना ) हुई ' यह पथिकते अर्थ किया है, ' इसमें ' भूतलाद उत्यिताम् ' इस पदका अर्थ छिपा लिया गया, जिससे वह अमैथुनयोनि ' सिद्ध होती है । सो ' आत्मजा ' यहाँ ' पुत्री'का पर्यायवाचक तो हैं, यौगिक नहीं । क्या आत्मासे भी कोई पैदा होता है? क्या पिताके शरीरसे भी कोई पैदा होता है? कभी नहीं । जनक्र - राजाकी • पृथिवी से वह उत्पन्न हुई थी । राजा पृथिवीका पति माना जाता है, इस रूपमें सीताकेलिए जनकने ' आत्मजा'का प्रयोग किया है । . वह योनिजा नहीं थी । ' सुतामयोनिजां सीतां ' ( १ । ६६ । २७, २ । ११८ । २८-३०, ३७ उत्तरकाण्ड १७ | ३२-३६, ६८ | ७, सुन्दरकाण्ड १६ | ६ ) । इस प्रकार ' पद्मपुराण ' में भी कहा है-' प्रयोनिज़ा " सीता - मुखोद्भवा सीता ' । इन प्रमाणोंसे सीता-को प्रमैथुन - योनि और पृथिवीसे उत्पन्न होनेके साथ ही उसका शरीरमें बहुत बढ़ जाना भी लिखा है । मैथुन - योनि और मैथुनयोनिके उत्पत्तिकालमें शारीरिक-वृद्धिका क्रम समान नहीं हुआ करता । मानुषिक- गर्भाशय में परिमितता होनेसे ऊष्मा ( गर्मी ) नियत होती है; पर भूमिका आशय तो अपरिमित और उस पृथिवीमें ऊष्मा ( गर्मी ) भी अनिय-मित अर्थात् बहुत हो होती है । इसी ऊष्माके ही कारण श्रीसीता-की उत्पत्तिके साथ ही शरीरकी वृद्धि भी बहुत हो गई - यह वहांक हा है । इसीलिए ही तो अयोध्याकाण्डमें कहा है –'अयोनिजों हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन् । सदृशं चाभिरूपं च मही-An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६६२ पाल: पति मम ' ( ११८ । ३७ ) इससे स्पष्ट है कि उसकी अयो-निज होनेसे शारीरिक वृद्धि बहुत हो गई थी । वृक्ष भी तो पृथिवी-से उत्पन्न एवम् प्रयोनिज होते हैं; उनकी कितनी शीघ्र वृद्धि हो जाती है? और स्त्री - वृक्षोंके कितनी जल्दी ॠतुमूलक पुष्प ( रजस्व-लात्व ) एवं फल ( सन्तान ) हो जाते हैं - यह बात लोकमें प्रत्यक्ष ही है । उन वृक्षोंका सदा भूमिसे सम्बन्ध रहता है; अत: उस भूमिकी ऊष्मासे उनकी वृद्धि भी शीघ्र हो जाती है । इसी प्रकार सीता भी पृथिवीसे उत्पन्न थी । अतः पृथिवीके सम्बन्धको ऊष्मासे उस ( श्रीसीता ) की वृद्धि भी बहुत हो जानी थी । पर पृथिवीसे उत्पन्न होते ही वृक्षकी तरह उसका पृथिवीसे सम्बन्ध तो न रहा; अत: उसकी वृक्ष- इतनी उन्नति तो न हुई; फिर भी साघारण - गर्भाशयोत्पन्न मैथुनयोनि वाली लड़कीकी अपेक्षा श्रीसीताकी शारीरिक- उन्नति बहुत अधिक हो गई थी । कदा-चित् प्रागे श्रीसीताकी शारीरिक शीघ्र वृद्धिकी भान्ति उसका ऋतुकाल भी कहीं शीघ्र प्रारम्भ हो जावे; क्योंकि — ऋतुकाल भी शारीरिक - वृद्धि की अपेक्षा किया करता है । अल्प - प्रायु वाली भी परन्तु शरीरवृद्धि वाली, बलवान् शरीरवाली, कभ्याके चिह्न छाती बढ़नेसे कुचोंका उद्गम आदि पहले प्रारम्भ हो जाते हैं; कुचोंके बाद ही ऋतुकालका उद्गम जारी हो जाना चाहता है, इधर समय पर कोई सीताके योग्य पति न मिल सके, क्योंकि अभी तक भी धनुष तोड़नेमें समर्थ कोई पुरुष नहीं मिल रहा - यही सोच-कर श्रीजनकने धर्मशास्त्रनियमित कन्याविवाहावस्थासे पूर्व ही उसके स्वयंवरकी घोषणा कर डाली, जैसेकि पूर्व पद्य उद्धृत किया जा चुका है; और एक आगे आने वाला है । और सोचते-विचारते सीता छः वर्षकी होगई । पूर्व - पद्यमें ' प्रयोनिजां हिमां ज्ञात्वा ' ( २ । ११८ । ३७ ) यहां ' अयोनिजां ' इस प्रद्रों सह अभि Collection श्रीराम और सीताको विवाहको श्रायु ६६३ प्राय गर्भित है । उसका स्पष्टीकरण करनेवाला अग्रिम यह है ' तस्य वुद्धिरियं जाता चिन्तयानस्य सन्ततम् । स्वयंवरं पद्य शोर तनूजायाः करिष्यामीति धर्मतः ' ( २ । ११८ । ३८ ) इन पद्योंमें करते ' अयोनिजां मां ज्ञात्वा, चिन्तयानस्य सन्ततम्, धर्मतः स्वयंवरं करिष्यामि ' ये पद साभिप्राय हैं । इनका अभिप्राय सङ्घ तित किया जा चुका है । अब इसका विशदीकरण किया जाता है । " मानुषिक - सृष्टिक्रमसे विलक्षण उत्पत्ति में मानुष - सृष्टिनियमित वृद्धिक्रम भी नहीं हुआ करता, किन्तु उससे विलक्षण हो हुधा करता बालों हैं । इसमें जरायुजसे विलक्षरण पृथिवीसे उत्पन्न होनेवाली उद्भिन् सृष्टिको ही देखिये । स्त्री - वृक्ष लता आदि कितनी शीघ्र पुष्प प्राप्त है, पह कर लेते हैं । श्रीसोता भी पृथिवी से उत्पन्न थी; पर उद्भिज्जाकार कृशाङ्ग न होकर मनुष्याकार थी । जरायुज - योनिमें भी मनुष्य योनिसे माना भिन्न गाय आदि पशुयोनिको देखिये; उसमें मनुष्ययोनिको अपेक्षा कितनी शीघ्र वृद्धि होती है? प्रत्युत गायकी तो ढाई वर्षोंमें हो चाहिए ऋतुमती हो जानेकी सम्भावना रहती है; तभी तो वह गर्म अर्थात् शारीि लेती है । + संसारम इस सीताविषयमें शङ्कित दृष्टिवाले लोग अपने नेता थी- का स्व स्वा. दयानन्दजीका वचन भी देखें । वे लिखते हैं - " आदि सृष्टि इष्टिक मैथुनी नहीं होती । ' ( सत्यार्थ प्रकाश ८ समुल्लास, १३ = वां पृष्ठ ) ष्टिकम यहां पर सृष्टिकी श्रादिमें अमैथुनयोनि होना सिद्ध हुआ । अप सृष्टिक वाद - न्याय से मध्यम- सृष्टिमें भी श्रमैथुनयोनिकी उत्पत्ति हो । भती सकती है । " आदिमें अनेक अर्थात् सैंकड़ों सहस्रों मनुष्य उत्पन्न युवावस्थार्मे ' ( पृ ० १३६ में ) इस सत्यार्थप्रकाशस्थ ऋतुका पड़ जा वचनसे सिद्ध हुआ कि - श्रमैथुनिक - सृष्टि उत्पत्तिके समयमें ही बुहा चुके हैं प्रर्थात् - दीर्घ - शरीर वालो हो जाती है । इस लिए स्वा. दयानन्दजीरे आदिम स्त्री - पुरुषोंका विवाह भी उनके प्रकट होनेवाले सिके ' सँग गई उन Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 349

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६६३ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६६४ ग्रिम है क्योंकि वे युवावस्था में ही उन स्त्री - पुरुषोंकी उत्पत्ति प कराया, ही उन स्त्री - पुरुषोंका विवाह सिद्धान्ति | स्वयंवरं धौर युवावस्थामें न पद्योंमें करते हैं । यह हमारा पक्षपोषक प्रबल प्रमाण है ।. : स्वयंवरं परन्तु श्रमैथुनयोन्युत्पन्न व्यक्तिकी ' ग्रायुंकी वर्षसंख्या इस सि आनेकी लोक वाली ही मानी जाती हैं । जैसे कि हमारा है । जगतमें गर्भ में नौ महीने तक ठहरता है, परन्तु वह उसकी नौ महीने ष्टिनियमित बालके ती संख्या आयुकी गिनती में नहीं प्राती, किन्तु जब वह बालक हुआ करता बाहर प्राणि - संसार में आता है; तभीसे उसकी श्रायुकी गणना की जाती ब्ली उद्भिन् है, पहले नहीं । ऐसा लोक व्यवहार है । चाहे उत्पन्न होने वाला पुष्प प्राप्त कृशाङ्ग हो, वा स्थूल हो, वह उत्पत्ति वाले दिन एक दिन का द्भज्जाकार माना जाता है; ऐसे ३६० दिन बीत जाने पर ही वह एक वर्षकी नुष्य योनिसे श्रायु वाला माना जाता है; इस प्रकार आगे भी समझ लेना नको अपेक्षा चाहिए । इसी भांति श्रीसीता भी ' अयोनिजा ' ( २।११८।३७ ) वर्षोंमें हो प्रर्यात् श्रमैथुनिक - योनि होनेसे उत्पन्न होती हुई ही अतिशयित वह गर्म शारीरिकवृद्धि वाली थी । जब सीताको उत्पन्न हुए श्रर्थात् प्रारिण-संसारमें श्राये हुए ६ वर्ष हो गये; तब तो उसकी शारीरिक - वृद्धि-नेता श्री. की स्वयम् अनुमान किया जा सकता है । तब श्रीसीताका मानुष-आदि - सृष्टि सृष्टिक्रमसे विलक्षरण- उत्पत्तिवश ऋतुकाल भी मानुषिकस्त्री-= वां पृष्ठ ) । ष्टिक्रमसे विरुद्ध कहीं शीघ्र न हो जाय; जैसे गौत्रोंके मानुषिक-हुआ । अप- " सृष्टिक्रमसे स्वभावतः विलक्षण होनेसे वह ढ़ाई साल में ही ऋतु-उत्पत्ति हो भती एवं गर्भग्रहण के योग्य हो जाया करती है; वैसे ही यहां भी न्नुष्य उत्पन्न - प्रकाशस्थ ऋतुकाल कहीं शीघ्र न श्राजाय, जिससे मुझे प्रायश्चित्तीय बन्ना नयमें ही युवा पढ़ जाय - जैसे कि इस विषय में पहले शास्त्रवचन उद्धृत किए जा दयानन्दबीने चुके हैं । इससे उन वचनोंको मानने वाले श्रीजनकको स्वस्वीकृत ोनेवाले दिन धर्मके विलोप होने की सम्भावनासे इस विषयकी बड़ी भारी चिन्ता ' सँग गई थी । यद्यपि सीता पृथ्वीं की ही लड़की थी, तथापि इस CC - 0. Ankur Joshi श्रीसीतारामको विवाहायु ६६५ समय राजा जनक तथा उसकी स्त्रीने हो अपनेको उसका पिता बनाकर तथा उसको अपनी लड़की बनाकर, माता-ही शिक्षा - दीक्षा देकर अपनी लड़की उसको अपनी उसके साथ करना ही था । इसी कारण वाला शास्त्रीय व्यवहार कहा, जैसे कि - कण्वमुनिने वस्तुतः उसको ' ग्रात्मजा ' भी शकुन्तलाको विश्वामित्र - मेनकाकी भी लड़की अपनी पुत्री मानकर उसका लालन - पालन किया, से लड़कीकी ही भांति पतिगृह भेजा । इधर कोई धनुषका तोड़ने वाला भी श्रीजनकको नहीं मिल रहा था । सब राजा लोग उस धनुषको भारी देख कर डरके मारे उसके उठा सकने का साहस न होनेसे उसे नमस्कार करके चले जाया करते थे; जैसे कि ' वाल्मीकिरामायण ' में ही कहा हो ‘ तच्च दृष्ट्वा धनुः श्रेष्ठं गौरवाद् ( भारवत्त्वाद् ) गिरिसन्निभम् है-अभिवाद्य नृपा जग्मुरशक्तास्तस्य तोलने । ' ( २।११८१४३ ) ' सुदी- । र्घस्य तु कालस्य राघवोऽयं महाद्युतिः । यज्ञ ं द्रष्टुं समा-गतः ' ( ४४ ) इस प्रकार श्रीरामके आनेसे बहुत काल पहले धनुष तोड़ने वाला कोई क्षत्रिय न मिलनेसे श्रीजनककी चिता बहुत बढ़ गई थी कि हमारी प्रतिज्ञाको पूरा करने वाला कोई क्षत्रिययुवक मिल नहीं रहा है; और यह कन्या पितृगृह में ही पूर्वकारणवश यदि ऋतुमती हो जाय; तो मुझे परलोकमें नरकवास मिलेगा - इस प्रकारको चितासे धर्मात्मा जनककी चिंता बढ़ जानेसे उसके दैन्य ( दीनता ) का अनुमान सहजमें ही हो सकता है, जिसका सजीव चित्र वादियोंसे उपस्थापित ' पतिसंयोगसुलभं वयो दृष्ट्वा तु मे पिता । चिन्तामभ्यगमद् दीनो वित्तनाशादिवाधनः ' ( वाल्मी. २११८-३४ ) इस पद्यमें चित्रित किया गया है । यदि प्रश्नकर्ता लोग थोड़े भी धर्मश्रद्धालु, हों तो वे सहज ही समझ सकते हैं कि धर्मश्रद्धालु एवम् अधर्मभीरु तथा एक शास्त्र-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 350

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श्रीसनातनधर्मी लोक ( ७ ) ६६६ विश्वासी पुरुषकी अपनी अनुमत कन्याकी शास्त्र नियमित विवा-हावस्थाके व्यतिक्रममूलक धर्मभङ्ग उपस्थित होने पर किस प्रका-रकी शोच्य एवं दयनीय दशा उपस्थित हो जाती है । श्रीसीता यहां अरक्षणीया नहीं हो गई थी, किन्तु श्रीजनकका ऋतुकालसे पूर्व कन्या विवाहरूप अपना धर्म ही अरक्षणीय हो गया था, जिसका सङ्क ेत ' धर्मे सीदति सत्वर: ' ( ४ ) इस मनुके पद्यमें श्राया है-उसीके नाश उपस्थित होने पर श्रीजनकको बड़ी भारी चिंता लग गई थी । ' वित्तनाशादिवाऽधनः ' ( २।११८।३४ ) यह उपमा उसपर सम्यक् प्रकाश डाल रही है । एक धर्मधनी धर्मके भङ्गसे निर्धन हो जावे, या उसे वैसे निर्धन बन जानेकी प्राशङ्का हो; तो उसे अपने धर्मघनके नाशकी कितनी चिंता हो जाती हैं? धार्मिकोंको धर्मभङ्ग उपस्थित होनेपर जो चिंता उपस्थित होती है; उसे वे ही जान सकते हैं । प्रश्नकर्ता - सदृश धर्मका केवल बाह्य आडम्बर दिखलाने वाले भला उस अवस्थाको कैसे जान सकते हैं? इसके अतिरिक्त वादियोंको यह स्वयं भी सोचना चाहिये कि - श्रीरामका श्रीसीताके साथ विवाह कब हुआ था? इस पर यह जानना चाहिये कि जब श्रीविश्वामित्र राक्षसोंको मारने के लिए श्रीरामको अपने साथ ले गये; उसके एक - दो मास बाद श्रीविश्वामित्र राम - लक्ष्मण को लेकर जनकपुरीमें गये । तब श्री-रामने धनुषको देखा और उसे तोड़ा । इस समय में श्रीरामकी कितनी अवस्था थी; यह ' रामायण ' में देखना चाहिये । श्री-दशरथ ऋषिको कहते हैं कि में रामको नहीं भेज सकता; क्यों-कि वह सोलह वर्ष से अभी कम है ( १ | २० | २ ); तो १२ वा १५ वर्षीय बालक रामके साथ १७-२४ वर्ष वाली सीताका विवाह ही कैसे हो सकता था? तब वादियोंका यह प्रयास II व्यर्थ CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीताकी विवाहायु ६६७ ६६ ही है । वह ' वाल्मीकिरामायण ' से विरुद्ध है । पूर्वोक्त मीमांसास सिद्ध हो चुका है कि - बाल्मीकिरामायणानुसार श्रीसीताकी वर्ष ही विवाहकी आयु है; यह न केवल प्रमाणपरिबृं हित छठा किन्तु सोपपत्तिक भी है । इसमें कोई ' ननु - न च ' करनेका ही है; काश नहीं रहता । अव छः संशोधन एवं परिवर्धन- २६४ पृष्ठ ७ पंक्ति प्रतिपक्षी ने प्रा स्थित महादेवके वचन द्वारा शिवपुराण आदिको पुराण-उनके अवलम्बनसे ' निरय ' ( नरक ) की प्राप्ति बताकर प्रक्षेप किया है; इसका उत्तर प्रकारान्तरसे पूर्व दिया जा चुका है । हम इस विषयमें अन्य प्रकारसे ६३३ पृष्ठकी टिप्पणी में ( पं. १० ) बना चुके हैं कि वहां ' निरय ' ( नरक ) एक पारिभाषिक शब्द है । इस विषय में हम महाभारतका प्रमाण देते हैं- " श्रमूनि यानि स्थानान देवानां परमात्मनाम् । चतुर्णां लोकपालानाँ ( इन्द्रादीनां ) शुक्रस्याथ बृहस्पतेः । मरुतां विश्वदेवानां साध्यानामश्विनोरपि । रुद्रादित्यवसूनां च तथान्येषां दिवौकसाम् । एते वै निरयास्तात! स्थानस्य परमेष्ठिनः ( शान्तिपर्व १६८ । ३-६ ) यहां गायत्री आदि इस पकर्ताको गति कही है । यहां रुद्र आदि देवताओंके स्थानों था ( स्वर्गों ) को पारिभाषिक - निरय ( नरक ) बताया गया है । ' कालः ता सम्पद्यते तत्र कालस्तत्र न वै प्रभुः । स कालस्य प्रभु राजन्! स्वर्गस्यापि तथेश्वरः । श्रात्मकेवलतां प्राप्तस्तत्र गत्वा न शोचति । निन ईदृशं परमं स्थानं, निरयाः ते च तादृशाः । एते ते [ उक्तदेवानां सक लोका: ] निरयाः प्रोक्ताः सर्व एव यथातथम् । तस्य स्थानवरस्यै सर्वे निरयसंज्ञिता: ' ( १६८ । ६-११ ) यहांपर परमस्थानको भी परिभाषासे निरय ( नरक ) बताया है । सो शिव आदि तामस ( र पुराणोंको अवलम्बन करनेवालेका जो नरकमें जाना कहा है; वहां ५४ परोक्षत से रुद्र आदिदेवोंके लोकोंकी प्राप्ति इष्ट है, निन्दा नहीं- छूत Gujarat. An eGangotri Initiative