सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 331–340

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६२७ ६२८ " दृष्ट्वैव ' कर्मा ' आया है, उसी के बलसे वह स्त्रीभावके गुणसे भी सद्यः भूषित ( उपरिचर स हो गई । यह बात यहां लोकोत्तर हुई 1 । अन्य लोकोत्तरता रत • देखिये- ' एवं तयोक्तो भगवान् नीहारमसृजत् प्रभुः । येन देशः स १ ९ ६३ ॥ सर्वस्तु तमोभू त इवाभवत् । ( ६३।७३ ), दृष्ट्वा सृष्टं तु नोहारं सान्त्वपूर्व से अपना ततस्तं परमर्षिणा । विस्मिता साऽभवत् कन्या व्रीडिता च तप-कामनाका स्विनी ' ( ७४।७५ ) यहां श्री पराशर के विशेषण भगवान् ( अणिमां-कन्यां सदा दि - ऐश्वर्यवान् ), प्रभुः, परमर्षिः ये श्राये हैं । विशेषणों का रखना ममानघ! साभिप्राय हुआ करता है । इससे ऋषिकी लोकोत्तरता स्पष्ट हो तम! गृहं रही है, तभी तो मुनिने नीहार ( कुहरा ) ' अभिभूय स मां बालां - तपोवल- तेजसा वशमानयत् । तमसा लोकमावृत्य नौगतामेव भारत! ' कर भी तू ( १०५।११ ) अथवा अन्धकार अपने तेजसे प्रकट कर दिया । तब भविष्यसि ऐसे लोकोत्तरशक्तिशालीका ' ततो मामाह स मुनिर्गर्भमुत्सृज्य मामकम् । द्वीपेऽस्या एव सरितः कन्यैव त्वं भविष्यसि ' ( १०५।१३ ) नगन्धा वा यह कहना कि तुम मेरे गर्भको प्रसूत कर कन्या हो हो जायगी-वा मानती यह बात उपपन्न हो ही सकती है । जब लोकोत्तरशक्तिशाली अपने होगा कि वर - शाप से स्त्रीको भी पत्थर और पत्थरको भी स्त्री कर सकते हैं, तब साधारण वे ही अपने दिव्य - संयोगसे प्रसूत हुई स्त्रीको भी कन्या कर सकते हैं । ततो वह व इस दिव्य - संयोगकी लोकोत्तरता देखिये - पराशरेण संयुक्ता ना था, पर सद्यो गर्भं सुषाव सा ' ( ६३।८४ ) यहां सत्यवतीका पराशरसे संयोग, रहस्य खुल संयोगके समकालमें ही गर्भ, गर्भके समकालमें ही प्रसव हो गया । 1 या संयोग घरसे में क्या ऐसी विचित्रता साधारण - संयोग में हुआ करती है? उसमें तो बहुत बार गमन करनेसे कभी जाकर गर्भ होता है । जब, होता भी है, तो प्रायः उस मासके बाद जाकर पता लगता हैं । हैं - ' ततो स्पष्ट प्रकट तो पांच मासके बाद होता है । फिर प्रसव भी दशम-संसर्गमृषि - ' अद्भुत- मासमें जाकर होता है और वह क्षतयोनि रहती है । फिर लड़के-को भी ढ़ाई साल तक पालना पड़ता है, तभी जाकर वह चलना-CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रोपराशर मत्स्यगन्धासमागम ६२६ फिरना ठोक शुरू करता है, पर यहां उत्पत्ति में भी विलक्षणता दाखय-' जातमात्रश्च यः सद्य इष्ट्या देहमवीवृधत् । वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् सेतिहासान् महायशाः ( १२६०१३ ) यहां गर्भके सद्यः प्रसूत होते ही एकदम बड़े शरीरवाला हो जाना, उसी समय शास्त्रोंका पढ़ लेना और ' स मातरमनुज्ञाप्य सब वेद-( ११६३८५ ) इस प्रकार तपस्यामे मन तपस्येव मनो दवे ' ' स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि लगानेवाला होना और माताके स्मरण कृत्येष्विति च सोऽब्रवीत् ' ( ६३।८५ ) करते ही ( चाहे वह बहुत दूर - देशमें भी हो ) तत्काल उसके पास उपस्थित होनेकी शक्तिवाला होना श्रीर ' समुत्पन्नः स तु महान् सह पित्रा ततो गतः ' ( १ | १०५/१६ ) उत्पन्न होते तत्काल बड़ा होकर पिता पराशरके साथ वनमें तपस्या करने चले जाना - यह घटना वैचित्र्य ही बतला रहा है कि यहां साधारण लौकिक - सयोग नहीं हुआ, किन्तु दिव्य सयोग हुआ है, तभी तत्फलस्वरूप विलक्षण घटनाएँ हुई । ऐसी विलक्षणता तथा अप्राकृतिक उत्पत्ति, तत्काल वृद्धि, यह उसमें मैथुनयोनिता को बतला रहे हैं, क्योंकि प्राकृतिकता न होनेसे उसीमें ऐसी विलक्षणता दीखती है, तभी तो स. प्र. ( ८ समु. पृ. १३८-१३६ ) में आदि - सृष्टिको प्राक्षेप्ताओंके नेता स्वा. द. जीने भी प्रयुनी माना है, उसमें एक ही दिनमें सैंकड़ों - हजारों स्त्रियों का जो १६ वर्ष की थीं, और सैंकड़ों सहस्रों पुरुषोंका जो २५ वर्ष के थे, उत्पन्न होना माना है । उसी उत्पत्ति के समय स्त्री-का १६ वर्षकी हो जाना और पुरुषका उसी समय २५ वर्षका हो जाना, उसी समय उनका विवाह हो जाना, सन्तान हो जाना, यह बात प्राकृतिक तो होतो नहीं, अतः यहां दिव्यतावश तथा प्र मैथुनयोनित्व के कारण ही ऐसा हुआ यह स्पष्ट है । इसी प्रकार Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६३० श्रीव्यासकी ऐसी विलक्षण - उत्पत्ति साधारण संयोग - मूलक तो मानी नहीं जा सकती, अतः यहां पर भी अमैथुनिक दिव्य सं-ही निमित्त मानना पड़ेगा । प्राकृतिक - संयोग में ऐसा नहीं योग करता, तभी कैयट आदिने सूर्य आदि द्वारा कुन्ती श्रादिके हुआ संयोग में भी अक्षत - योनित्व माना है । ऐसी घटना में उस ( यो-) का कन्यात्व भी उपपन्न हो जाता है 1 । जैसे सृष्ट्यादि-जनगन्धा में एकसे मैथुन से उत्पन्न दो - दो जोड़े भाई - बहिनका भी विवाह दोषाधायक नहीं माना गया, वैसे यहां भी अमैथुनसदृशता होने से यह दिव्य - संयोग दोषाधायक नहीं माना जाता । साधारण - संयोगमें उस लड़कीके कन्यात्वका प्रमाणपत्र योन्यन्तर्गत आवरण फट जाना, हट जाना होता है । प्रसवके बाद तो योनिमार्ग सर्वथा निरावरण हो जाता है; पर यहां पर तो कहा है- ' कन्यैव त्वं भविष्यसि ' ( १४६३२७८, १।१०५।१३ ) तू कन्या ही रहेगी । बात भी वैसी ही हुई । तपोमाहात्म्यसे उसका योनि - धावरण श्रक्षत ही रहा, तभी तो शान्तनुने उससे और कुन्तीसे पाण्डुने विवाह किया; यह पहले कहा जा चुका है । विवाहबोधक मन्त्रों में ' कन्या ' का विवाह आया है, ' कन्या ' का भाव है ' कुमारी ' अर्थात् प्रथम- अवस्थावाली, अविवाहितपूर्वा, अक्षतयोनिच्छद वाली । तब इस प्रकारके तपस्या आदिके अलौ-किक शक्तिशालियों में साधारण जनों के लिए सीमित कन्यादूषरणा-पराधप्रदर्शक शास्त्र भी प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि वह उत्सर्ग है; और उत्सर्ग अपवादांश को छोड़कर ही प्रवृत्त तथा व्यवस्थित होता है । आजकल के पुरुषोंमें पहले कन्याका योनि आवरणा छिन्न करके फिर वैसे ही उसके प्रक्षत कर देने की शक्ति नहीं, श्रतः वे शास्त्रके बन्धनमें हैं, पर लोकोत्तरशक्तिशाली, मुक्त, प्रभु ( समर्थ ), तापस उस सीमित बन्धन में कैसे बद्ध हो सकते हैं? CC - 0. Ankur Joshi Collection श्री पराशर मत्स्यगन्धासमागम ६३१ प्रसिद्ध है ' प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो यदिच्छति करोति पाणिनेन नदा गङ्गा यमुना च स्थली नदी । तत् । ' समरथ को नहि दोष गुसाईं ' इस चौपाईका लक्ष्य है । यही बात अब इस समागम में अङ्गसङ्ग हुआ, या मथुन हुम्रा या हुआ, यह कुछ भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वैसा, होने नहीं प्राकृतिकता, लौकिकता होती, दस महीने गर्भ रखना पड़ता पर समय पर प्रसव करना पड़ता, कैवर्तकी भिड़कियां, पड़तों, सम्भव है - मत्स्यगन्धाको घरसे बाहर निकलना पड़ता सुननी । कन्या होनेसे उसका कहीं बाहर निकलना भी नहीं हो सकता था कि कहीं भिन्न - देशमें जाकर गुप्तरूपसे प्रसव कर लेती । पर यहां तो लोकोत्तरता होनेसे ऋषिको नौकाके केवल पार ले जाने ही द्वीप - स्थान में संयोग तथा गर्भ एवं प्रसव उत्पत्ति प्रादि एक साथ हो गये, बच्चा - द्वपायन उसी समय श्रीवेदव्यास होकर पिता के साथ चला भी गया, कन्यात्वका श्रावरण भी खण्डित न हुआ, तभी तो श्रीव्यास को ' विधानविहितः स त्वं यथा मे प्रथमः सुतः ' ( १०५ ॥ ३२ ) वैध - लड़का माना गया है, अन्यथा तो अवैध - लड़का होने से कल्प उसकी सदाकेलिए त्यक्तव्यता होती, पर ऐसा नहीं हुआ । बो मदास इन बातोंको न माने, वह इस इतिहासको भी प्राक्षिप्त नहीं कर सकता; क्योंकि - वैसा होने पर उस इतिहासकी सत्ता ही न विक रहेगी । ' सति हि कुड्ये चित्रं भवति ' । अतः इस समागमको साधारण लौकिक - मैथुन नहीं कहा अण्डा को जा सकता । यदि प्रतिपक्षी इनं अलौकिक घटनाओं को नहीं इसी मानना चाहते, तब वे अपनी मनमानी उसकी उत्पत्ति ' महा भारत ' दिसे सिद्ध करें, अन्यथा तो उनका प्रयत्न वा उनकी पके शङ्कित- दृष्टि प्रभित्ति चित्र होगी, असिद्ध होगी । श्रसिद्ध पर स्पर उनका आक्षेप शशशृङ्गको तीक्ष्ण करनेके समान, वन्यापुत्र धोत Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६३१ ६३२ ति समान निर्मूल सिद्ध होगा । आशा है -- शास्त्र दृष्टि से तत् । उत्पादनके की इस ' श्रीपराशर - सत्यवती - समागम ' में शङ्कित - दृष्टि यही बात लोगों - दृष्टि उपस्थित हो जायगी 1 । जैसे सृष्टिकी प्रादि-1 हटकर प्रशङ्कित दिव्यता के कारण पुरुषोंकी यौवनावस्थाकी उत्पत्ति-T, या नहीं में परमेश्वरकी - दोष को प्रश्रय नहीं दिया जाता, एकके हो पुत्र होनेसे होने पर में प्रसम्भव होनेपर भी उनके परस्पर सम्बन्ध तथा मथुनमें अलौकिकता-ना पड़ता, भाई लौकिक - बहन मर्यादा त्यागको भी अनुचित नहीं माना जाता वैसे ही यां सुननी श, हो पड़ता । संशोधन एवं परिवर्धन - पृ. ११८ पं. २४, २३६-२ ( क ) सकता ती । पर प्रकृतिरूप - मेखलासे वेष्टित परमात्मा ही लिङ्गसे विर्वार्तत हो रहा है । ले जाने में खेद है कि - विषयकीट पामरोंको वेदसिद्ध नादबिन्दुके यामलरूपके प्रति-एक साथ मात्मक चिन्हमें प्राकृत लिङ्ग - योनिका भ्रान्तिमूलक आभास होता है । ताके साथ इसे उनके घोर प्रज्ञान, मानसिक विकार अथवा स्त्रणस्वभावके प्रतिरिक्त तभी तो और क्या कहा जाय ' ( सर्वदर्शनाचार्य स्वा. अनिरुद्धाचार्यजीमहाराज : ' ( १०५ ॥ ' कल्याण ' शिवपुराणाङ्क ) । ( ख ) - लिङ्गार्चनमें अश्लीलताके भावकी का हो कल्पना परममूर्खता, परमनास्तिकता और घोर अनभिज्ञता है ' ( श्रीरा श्रा । जो मदासजी गौड़ एम. ए. ' कल्याण ' शि. पु. ) । ( ग ) सृष्टिसंहार के बाद नहीं सम्पूर्ण जगत् पिण्ड अण्डाकृतिमें हो जाता है, और उसी अॅण्डसे सृष्टि नाही न विकसित होती है । विनाश और विकास में शिवका रूपयोग है ही, श्रतः प्रण्डाकृति -शिवलिङ्ग सबके लिए पूजनीय हैं । स्कन्द - पुराणमें प्राकाश-नहीं कहा को पृथिवीको पीठ माना है । ( घ ) - इसीम सबका लय होता है, को नहीं इसीलिए इसे लिङ्ग कहते हैं । ( प. हनुमानशर्मा ' कल्याण ' ) । ( ङ ) यह ' महा लियोनि जिसका व्यवहार श्रीशिवपूजामें होता है, प्रकृति और पुरु-उनकी • पके होने वाली सृष्टिको उत्पत्तिको सूचक है । इस प्रकार यह परा-सिद्ध पर पर जमेत्पिता और दयामयी जगन्माताके श्रादिसम्बन्ध के भावकी ध्यापुत्र के धोतक है, अंतः यह परमपवित्र और मधुरभाव है; इसमें अश्लीलताका CC - 0. Ankur Joshi Collection श्री पराशरमत्स्यगन्धा समागम ६३३ सृष्टिके मध्य में भी अलौकिक एवं परमेश्वरकल्प, विलक्षण-सामर्थ्यशाली ऋषि - मुनियों की सृष्टिमें भी श्रसम्भवदोष तथा लोको-तरतावश लौकिक- मर्यादाका उल्लङ्घन न देखना पड़ता है, न ही मानना पड़ता है । लोकोत्तरोंके व्यवहार तथा कार्य भला लोकनियमसीमित हो भी कैसे सकते हैं? यह निष्कर्ष बुद्धिमान् पुरुषोंको अवश्य जान रखना चाहिए । ऐसा विचार रखनेसे उनको पुराणेतिहासमैं कोई भी शङ्का श्रविश्वासकै गर्तमें न गिरा सकेगी । श्रालेप करना सर्वथा प्रज्ञान है, ( स्व. पं. भवानीशङ्कर शि. पु. षङ्क ) 1 २६८- ३ विष्णुके पुराणके अनुसार कहीं शिवके अवलम्बनसे ' नरक ' की प्राप्ति लिखी हो; इस प्रकार शिक्षके, पराणमें कहीं विष्णुके लिए लिखा हो, वहां पर ' नरक ' एक पारिभाषिक शब्द होता है । वहां भाव यह होता है कि हमारे इष्टदेवसे तो दुःखात्यन्ताभावरूप मुक्ति मिलती है, पर दूसरेसे मुक्ति न मिलकर स्वर्ग मिलता है । वह स्वर्ग प्रनित्य होनेसे गतागत करनेसे बड़े - बड़े दुःखोंका कारण होता है, दुःखका २ नाम'नरक ' भी होता है; सो वहांपर ' नरक ' दुःखका वाचक प्रथवा श्रयं-बाद मुक्तिकी अपेक्षा निम्नगतिका उपलक्षक होता है, साक्षात् नरक-लोकवाचकं नहीं । यह पुराणोंमें भी स्पष्ट है । एक शिवभक्त कवि लिखा था कि- तुमसे संयुक्त विष भी मेरे लिए अमृत है, घोर तुमसे. भिन्न अमृत भी विष है ' कण्ठकोणविनिविष्टमोश! ते कालकूटमपि मे महामृतम् । श्रप्युपात्तममृत भवद्वपुर्भेदवृत्ति यदि, में विषमतम् ( न रोचंतें ) यही तात्पर्य ' नरक ' शब्दमें समझना चाहिये । प्रतिपक्षी तो नरकको मानता नहीं, तब वह दूसरोंको उससे क्यों डराता है? ३१८-३ देवीभांग. ' ( ७।१०।५२-५३ ) ७३३३-११-१३१।३६६-१० ' विष्णुर्यस्यां विचक्रमें " ( ० १२ २ १० ) । ३८५-४ प्राचीनतमता । ३६६-५ व्यवहार । ३६०।२५ उसीके हम पृष्ठमे एहि कृष्ण ३ ' अत्र Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६३४ १२. विवाह के समय सीता - रामको आयु पर एक दृष्टि । ( पूर्वपक्ष ) – ( क ) पौराणिकोंका कथन है कि - विवाहके समय रामकी आयु १५ वर्ष और सीताकी आयु ६ वर्षकी थी । ' ऊनषोडशवर्षो मे रामः... न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि ' ( वाल्मी. २०१२ ) ( हे विश्वामित्रजो; अभी राम १६ वर्षसे कम हैं - यह राक्षसोंसे युद्ध नहीं कर सकते ) । इसी समय राम उनके साथ गये । यज्ञकी रक्षा कर धनुष तोड़कर जानकी ब्याही, पर इस श्रीज्वालाप्रसादजीके कथनसे श्रीरामका विवाह १५ वर्ष में हुआ यह सिद्ध कहां होता है? ( ख ) ' पुत्रा दशरथस्येमे रूपयोवनशालिनः ' ( १।७२ / ७ ) यदि श्रीराम १५ वर्षके थे; तो लक्ष्मणादि इनसे भी छोटे होंगे, पर इन्हें वाल्मीकिने यौवनशाली कहा हैं । सुश्रुतानुसार ' श्रा पञ्च-विंशतेर्यौवनम् था षोडशाद् वृद्धि: ' ( सूत्र. ३५ ) १६ वें वर्ष वृद्धि - अवस्था तथा २५ वें (? ) वर्षमें यौवन होता है । तब उक्त

श्लोक कहने वाले मुनि क्या अज्ञानी थे, जो १५ वर्षमें उन्हें

' योवनशाली ' कहने लगे? । जनकने मुनिसे पूछा - ' इमौ कुमारी... समुपस्थितयोवनी ' ( १।५०।१७-१८ ) यौवनावस्थाको प्राप्त (? ) यह दोनों कुमार किसके हैं? । यहां भी उन्हें धनुषभंगके पूर्व (? ) ' समुपस्थित -यौवन ' कहा है । ( ग ) सीता संन्यासिवेषधारी रावणसे अपना परिचय देते हुए कहती है- ' उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने । गौश्चरति उदाहरण है । ४०६-१ ' विष्णु: त्रिविक्रमावतारं कृत्वा ' ( यजु: ५।१५ ) यहां श्रीमहीधराचार्यने वामनावतार माना है..। ४३६-५ शाङ्खायनगृ. ( १ | १४ | १२ ) । ( शेष आगे ) CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी विवाहावस्था ६३५ भुञ्जाना मानुषान् भोगान् ' । मम भर्ता... वयसा पञ्चविंशकः अष्टादश हि वर्षारिण मम जन्मनि ' ( ३।४७ / १० ) मैंने । ' तक श्रीरामके घरमें सभी सुख भोगे हैं । मेरे भर्ताको १२ वर्ष वर्ष और मेरी १८ की थी 1 । इससे वनमें श्राई सीताकी प्रायु २५ । १८ वर्ष की थी और विवाहके बाद १२ वर्ष तक वह माधु रही । इससे छः वर्ष बच रहते हैं । तब क्या सीताकी ससुराल । विवाह के समय ६ वर्षकी थी? वस्तुतः यह श्लोक प्रक्षिप्त अवस्था सीता विवाहके समय पूर्णंवयस्क, पतिसंयोग के अनुकूल, बुद्धिमती है । थी । डा. नानूराम व्यास, श्रीअनन्त - सदाशिव, और पादरी फादर उक्त श्लोकको प्रक्षिप्त मानते हैं । ( घ ) जनक जी कहते हैं - ' भूतलादुत्थितां तां तु वर्ध॑मानां ममात्मजाम् ' ( १।६६।१५ ) इस प्रकार जब मेरी श्रात्मना मेरे आत्मा वा शरीरसे उत्पन्न हुई मेरी कन्या सीता वर्धमाना- प्राप्तः यौवना वा यौवन - सम्पन्न हुई ' इससे विवाह के पूर्व सीताके शरीरमें यौवनावस्थाका सूत्रपात हो गया था; अतः समुपस्थित-यौवन - रामचन्द्रजीके साथ जब सीताका विवाह हुआ; वह भी वर्धमाना ( प्राप्तयौवना ) थी । ( ङ ) ' रेमिरे मुदिताः सर्वा भर्तृभिः सहिता रहः ' ( ११७७ अ १४ ) सीता - माण्डवी प्रादियोंने एकान्त में अपने पतियों के साथ रमण किया । ' रेमिरे ' का अर्थ ' रमण करना ' होता है । इससे सीता आदि चारों बहिनों की आयुका सहज ही अनुमान किया जा सकता है । राम - लक्ष्मण तो थे ही प्राप्तयौवन । पौराणिकों के मतमें ६ वर्ष की कन्याके साथ रमरण कैसे किया जा सकता है?. इसी प्रकार अध्यात्म रामायण में भी कहा है- ' रामलक्ष्मणशत्रुघ्न • भरताः‘- स्वां स्वां भार्यामुपादाय रेमिरे स्वस्वमन्दिरे । रामः सीतासमन्वितः 1 । रेमे वैकुण्ठसदने स्त्रिया सह यथा हरिः ॥ Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 335

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६३५ ६३६ उचविंशकः ( च ) सीतानॆ अनसूयासे कहा था – ' पतिसंयोगसुलभं वयोऽवेक्ष्य मैंने ॥ चिन्तामभ्यगमद् दीनो वित्तनाशादिवाघनः ' की आयु १२ वर्ष पिता मम पिताको मेरी पतिसंयोगसुलभ अवस्था देखकर ताकी भा २५ ( ऐसी २/११/३४ चिन्ता ) हुई, जैसे निर्धनको घन - नाश होने पर होती है । वह ससुराल से पूर्व सीताजी के लिए ' पतिसे संयोगके लिए सुलभ वय ' की अवस्था विवाह प्रयुक्त हुआ है; और विवाह के बाद ' रेमिरे ' शब्द आया है, अत: प्रक्षिप्त है । अर्थ सहज ही यह होता है कि- ' वर्धमाना ' - पत्नी के साथ ल, बुद्धिमती - इसका ' प्राप्तयौवन ' पतिका मिलाप हुआ । और पादरी ( छ ) अध्यात्म - रामायण में सीता स्मितवक्त्रा स्मय-माना मुदं ययौ ' इन शब्दोंसे तथा ' वस्त्रान्तर - व्यञ्जितस्तनी ' से तु वर्धमानां विवाह के समय सीता ' प्राप्तयौवना ' सूचित होती है । ' पति-मेरे संयोग - सुलभ, रेमिरे मुदिता रहः, वस्त्रान्तर - व्यञ्जितस्तनी ' ना- प्राप्तः मादिकी साक्षी पढ़कर कोई भी संस्कृतज्ञ सीताकी अवस्था नवं सीता के ६ वर्ष की नहीं मान सकता । ( ' पथिक ' वेदवाणी १३।१० में ) समुपस्थित. ; तो वह ( उत्तरपक्ष ) ( क ) इन सभी आपत्तियोंका विस्तीणं प्रत्युत्तर लागे दिया जाने वाला है । यहां केवल यह कहना है कि प्रतिपक्षो लोग चालाकियाँ करके अर्थ का अनर्थ कर देते हैं । जब यज्ञकी ' ( १७७२ रक्षा के लिए रामको मांगने आये श्रीविश्वामित्रको श्रीदशरथने है । इससे साथ श्रीरामकी १६ वर्ष से कमकी आयु बताई, जिसका भाव यह था किया कि -१६ वर्षके क्षत्रियकुमारको कवच आदि पहनाया जाता है, मान राणिकों के श्रीर युद्ध में भेजा जाता है । यह वैसा नहीं । पर विश्वामिव है?. रामकी वास्तविकता दशरथको समझाकर रामको ले गये । यज्ञं कता. समाप्त करके उसे जनकपुरोमे ले गये, और श्रीरामका विवाह मरणशत्रुघ्न दरे । रामः हुप्रा । इसमें विवाह के समय श्रीरामकी ' ऊनषोडशवर्ष ' आयु ' ॥ स्वतः सिद्ध हो गईं । क्योंकि - श्रीवाल्मीकिके अनुसार यह सब एक मासके समयमें हो गया । तब ऊनषोडश वर्ष के राम इससे CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी विवाहावस्था ६३७ बड़े कैसे हो गये? ( ख ) शेष है रामग्रादिके लिए ' रूपयौवनशालिनः ' शब्द सो यहां उसी ऊनषोडशवर्षकी अवस्थामें उनका. यौवनारम्भ बताया गया है, यह सुश्रुतानुसार भी ठीक है यह हम अभी कहने वाले हैं; वैसे भी अनुपपन्न नहींः जबकि उपनयनमें पढ़े जाते हुए ' युवा सुवासा: ' इस मन्त्रके द्वारा ८ वर्षके बटुको ( देखो स्वा ० द ० जीकी संस्कार - विधि उपनयन- प्रकरण पृ ० ८४ ) ' युवा ' सूचित किया गया है । महाभारत में १२ वर्षकी उत्तराको ' वय: -स्था ' ( युवति ) ( विराट. ७२०४ ) कहा गया है । १६ वर्षसे कम के अभिमन्युको भी ' युवा ' ( ७०४८१२७ ) कहा है । तब क्या प्रतिपक्षी उपनेय- वटुको २५ वर्षका बताकर ' व्रात्य ' सिद्ध कर देगा? वस्तुतः पक्षपातका आवरण कुछ देखने नहीं देता । प्रतिपक्षीने ' आ षोडशाद् वृद्धिः, श्रा पञ्चविंशतेर्यौवनम् ' इस सुश्रुतके वचनका अर्थ अपने अनुसार भी अशुद्ध किया है । ‘ आ ंषोडशाद् वृद्धिः’का ‘१६ वें वर्ष तक वृद्धि ' यह अर्थ तो कुछ ठीक किया है, और उसी अर्थ वाले ' था पञ्चविंशतेर्योवनम् ' के आङ्का अर्थ '२५ वें वर्षमें यौवन है ' यह कैसे किया? यहाँ दोनों स्थान ‘ नाङ्’का समान अर्थ है, पर प्रतिपक्षीने पहले ' ग्राङ्’का अर्थ १६ वें तक वृद्धि ' यह ठीक किया है, पर दूसरे श्राका '२५ वर्ष तक योवन ' अर्थं न करके '२५ वेंमें यौवन ' यह अर्थ ठीक नहीं किया । वस्तुतः यहां अर्थ था कि- जन्मके वादसे शुरू करके १६ वें वर्षसे कुछ पूर्व तक तो लड़केकी वृद्धि होती है, और फिर १६ से शुरू करके २५ वें वर्षसे कुछ पूर्व तक यौवन हुआ करता है, फिर २५ वर्ष से ४० वर्षके कुछ पूर्व तक सम्पूर्णता, फिर ४० वेंसे किञ्चित् क्षीरणता शुरू हो जाती है । मालूम होता है कि प्रति-Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६३८ पक्षीने सुश्रुतका उक्त पाठ तथा अर्थ सत्यार्थप्रकाश वा भास्कर-प्रकाशसे लिया है, पर दोनोंके ही अर्थ अशुद्ध हैं, यह हम डंकेकी चोटसे कहते हैं । अपने पक्ष के गिरनेके डरसे ही उन्होंने अशुद्ध अर्थ किया है; सो सोलह वर्षके लगभगके रामके लिए सुश्रुत-प्रतिपक्षि सम्मत पाठके ही अनुसार ' समुपस्थित -यौवन ' शब्द ठीक समन्वित हो जाता है । क्योंकि - १५ वें वर्षसे कई मास ऊपरके व्यक्तिकी १६ वें वर्षकी प्राप्ति निकट होनेसे, और १६ वेंसे यौवन के प्रारम्भ कहे होनेसे ' ऊनषोडश - वर्षं'के सुश्रुतानुसार कुमारके लिए ' समुपस्थित -यौवन ' शब्द पूराका पूरा सङ्गत हो जाता है । वही वहां ' रूपयौवन -शाली ' का अर्थ है । ' समुपस्थित -यौवन ' का ' यौवनावस्थाको प्राप्त ' अर्थं करना प्रतिपक्षीका छल है । सुश्रुतके प्रतिपक्षीसे दिये हुए प्रमाणके अनुसार जब १६ वर्षसे यौवनका प्रारम्भ है, और २५ वां वर्ष यौवनकी निष्ठा ( चरम - सीमा ) है; तो १५ वर्षकी अवस्था वालेके लिए ' समु-पस्थित - यौवन ' कहना सर्वथा सङ्गत है । सोलह वर्षके लगभग क्षत्रिय अभिमन्यु ने जैसी वीरता महाभारत में दिखाई; वैसे ही १६ वर्षके लगभगके रामने भी यज्ञ तथा जनकपुरी में वैसी वीरता दिखलाई । अब अज्ञान वसिष्ठ आदि मुनियोंका न होकर प्रति-पक्षोका हो अपना अज्ञान सिद्ध हुआ । यज्ञोपवीती ८-११-१२ वर्षके वटुको भो जब ' थुत्रा सुवासाः परिवीत । श्रागात् ' में ' युवा ', कहा जाता है, जैसे यहां यौगिक यौवन है, वैसे राम आदिकेलिए भी प्रतिपक्षी समझ ले । राम आदि प्रायः समान प्रायुके थे, क्योंकि पुत्रेष्टियज्ञ के पायससे सभोकी भिन्न - भिन्न रानियोंसे प्रायः समान - समयमें उत्पत्ति हुई थी । ( ग ) और फिर जोकि सीताके अपने स्पष्ट - चचनसे जिससे सीता - रामकी विवाहावस्था स्पष्ट होती थी, उसे प्रतिपक्षीने CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी विवाहावस्था ६३ ९ नानूरामव्यास तथा एक पादरीके कहने से प्रक्षिप्त क्या वे श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास वा श्रीवाल्मीकिमुनि मान लिया; प्रतिपक्षीने उनके श्रागे सिर झुका दिया? यह अंग्रेज हैं कि. दृष्टिकोण रखने वाले इस विषय में ठीक ज्ञान या अंग्रेजी प्रतिपक्षी भी मालूम होता है कि - संस्कृत पूर्ण नहीं दे सकते । इन अंग्रेजी विद्वानोंके आगे उसने सिर नहीं जानता जोकि संस्कृतज्ञताका एक आदर्श झुका दिया । उसकी ' आलोक ' के पाठकगण भी देखें-' भूतलादुत्थितां तां तु वर्तमानां ममात्मजाम् ' इस सीताके जन्मके बताने वाले पद्यको उसने सीताके विवाहमें लगा दिया वह ' वर्धमानां ' का ' प्राप्तयौवना ' अर्थ करके! और साथ प्राप्तयौवनपतिका ' प्राप्तयौवना - पत्नीके मिलाप ' तात्पर्य बता दिया । ' म ' आत्मजा ' का अर्थ ' जनकके शरीरसे उत्पन्न हुई ' कर दिया । क्य जनकजीका भी ' गर्भाशय ' बना दिया । का सोता तो अयोनिजा लड़की थी, जनकजीने उसे केवल पाला I था । इसी पालकपिता के नाते उसे ' आत्मजा ' कहा । जैसे कि- क कण्वमुनि मेनका की लड़की शकुन्तला के पालक - पिता होनेसे उसे अपनी लड़की कहते थे, और उसका विवाह भी पितृत्वके नाते " कर दिया । उसके लिए पुत्रीवाचक ' दुहितरं ' शब्द ' इयं च वः सखी तदात्मजा ' ( १ माक ) एतदादिस्थलोंमें दुहिता, आत्मजा, सुता, तनया, आदि शब्द प्राये हैं । तब क्या प्रतिपक्षीकी नीति से कण्वको शकुन्तलाका उत्पादक मान लिया जावेगा? यदि नहीं, गर तब यहां भी जनक सीताका उत्पादक नहीं, किन्तु धर्मपिता था; व और ममता हो जानेसे सीताको उसने ' आत्मजा ' कहा । ' भूतलादुत्थितां तां तु ' पद्यमें जनकजीने यज्ञ भूमिमें हल चलाते हुए सीताको पृथिवीतलसे उत्पत्ति बताई है । इसी कारण उसका नाम ' सीता ' रखा गया था । ' सीता ' हल की क Gujarat An eGangotri Initiative ल

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ६३ ९ ६४० स्थान - स्थानपर इसीलिए उसे ' प्रयोनिजा ' न लिया; रेखाको कहते हैं, योनिसे उत्पन्न नहीं हुई । पैदा होने के साथ ही हैं कि- कहा वह खूब है कि बढ़ वह गई, इसलिए उसे ' वर्धमाना ' कहा है कि - ' बढ़ रही या अंग्रेजी हुई । " जैसे सत्यनारायणव्रतकथामें बनियेकी लड़कीको चन्द्रमा सकते । की भाँति बढ़ रहा हुआ कहा गया है, इसीलिए ही उसका नाम ताजोकि । उसकी ' कलावती ' रखा गया था । नीदेखें- ( ङ ) जो कि ‘ रेमिरे'का ' रमण ' अर्थ प्रतिपक्षीने किया, सो के जन्मके वहां ‘ रमण'का अर्थ ‘ ग्रामोद - प्रमोद ' ही है, जिसे अपने बड़ोंके ! और मांगे करना असभ्यता समझकर ' रह: ' ( एकान्त ) में कहा गया । -पलीके ' मैथुन ' अर्थ माना जावे; तो वहां ' रहः ' व्यर्थ हो जाता है, दिया । क्योंकि जब मैथुन किसीके सामने नहीं होता; उसकेलिए ‘ रहः ’ दिया । कहना असाभिप्राय ही हो जावेगा । कविलोग मैथुनका वर्णन ग्राम्यतावश नहीं करते । तब वह ग्रामोद - प्रमोद ६ वर्षकी ल पाला कन्यामें कैसे असम्भव है? यही अर्थ अध्यात्मरामायण के ' रेमिरे ' स कि- का भी है । से उसे ( च ) ' पतिसंयोगसुलभवय ' का अर्थ भी विवाह - योग्य के नाते अवस्था ही है । कन्याका विवाह उसका उपनयनस्थानीय यं च वः माना जाता है, सो ' राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे ' ( मनु ० २ । ३७ ) -त्मिजा, के. अनुसार जव बलार्थी क्षत्रियका छठे वर्ष में उपनयन माना नीतिसे गया है; तब क्षत्रिया लड़कीका उपनयनस्थानीय विवाह भी छठे नहीं, वर्षमें शास्त्रानुसार हो सकता है । विशेष स्पष्टता आगे होगी । ता था; ( छ ) अध्यात्मरामायरणके ' स्मितवक्त्रा, स्मयमाना मुदं ययौँ ' इसमें छः वर्षकी लड़कीके लिए क्या असम्भव है? वह में हल मुस्कराती हुई माला वरको पहनाने जा रही हो, इसमें असम्भव इस क्या है? शेष है ‘ वस्त्रान्तर्व्यञ्जितस्तनी ' सो पुष्ट- शरीरवाली हल की लड़कीके कुचोंका उभार छोटी आयु में भी वस्त्रोंसे प्रतीत होने... .. ' CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामको विवाहामु ६४१ लग जाता है, यह लोकसिद्ध बात है । स्वा. द. जीने जो प्रमैथुन-योनिकी सृष्टि कराई है, वे स्त्रीपुरुष उत्पत्तिवाले दिन ही युवा थे । यहां भी सीता - रामको श्रमैथुनयोनिता थी, तब सीताके छठे वर्ष में यह भला असम्भव कैसे हो सकता है? तब ' इस प्रसंगको पढ़कर कोई भी संस्कृतज्ञ यह नहीं कह सकता, कि - सीताकी अवस्था छः वर्षको थी ' यह प्रतिपक्षीको घोषणा गलत है । बहु-श्रुत संस्कृतज्ञ तो यह मान सकता है, पर संस्कृतका प्रपूर्णज्ञाता अग्रेजी- चश्मे के ग्रावरणसे यह नहीं जान सकता । प्रतिपक्षीने केवल अनुमानके घोड़े दौड़ाए हैं । विवाह के समय सीताकी ६ वर्षकी नहीं, तो कितने वर्षकी अवस्था थी, यहां रामायणका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं दिया; न ही उसकी कोई निश्चित - प्रवस्था लिखी है । केवल हुक्म चढ़ा दिया किन्तु सीताकी विवाह के समय छः वर्ष की प्रायु कदापि नहीं हो सकती । हम कहते हैं कि - शास्त्रों एवं रामायणादिके अनुसार छः वर्षकी आयु हो सकती है । यह हम पूर्वापरकी संगति - सहित दृढ - प्रमाणोंसे आगे, विवेचना दे रहे हैं, जिसमें प्रतिपक्षियोंके सभी ऊहापोहों-का समाधान हमने कर दिया है । श्रीरामकी आयु१५-१६ वर्षकी प्रतिपक्षीने दबे - शब्दोंमें मान ली । क्योंकि उसकेलिए उसने, ऐसा स्पष्ट फतवा नहीं दिया । सो जब विवाहमें राम १६ वर्षे से कुछ कम थे; तो उनकी पत्नी सीता भला उनसे बड़ी कैसे हो सकती है? ६-१५ वर्षका अन्तर सुश्रुतके अन्तर ( ६ वर्षे ) से भी मेल खाता है । आशा है- पाठक इस सूत्र के भाष्यरूप आारोके निबन्धोंको मनोयोग से पढ़ेंगे, जिससे उनकी इन विषयकी सभी शङ्काएं मिट्ट जाएंगी, तब उन्हें प्रतिपक्षियोंका कोई भी तर्क प्रभावित न कर स. घ.. ४१ Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६४२ सकेगा । ( २ ) श्रीसीता - रामकी विवाहायु । समय श्रीराम तथा श्रीसीताकी श्रायु कितनी थी; विवाहके भी सन्देह बना हुआ है; इस विषय में बड़े - बड़े अनुसन्धाताओंको श्रायु वे उस समय श्रीरामकी प्रायु २५ वर्ष, और श्रीसीताकी १७ से २४ वर्ष तकके अन्दर मानते हैं; पर वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह बात सिद्ध नहीं होती । तदनुसार विवाह के समय श्रीरामकी आयु १२ या १५ तथा श्रीसीताकी श्रायु ६ वर्षकी थी । आजका नव - शिक्षित समाज यह न समझ सके, यह भिन्न बात है, पर इतिहास में तो ऐसा ही है । अद्यतन समाज यदि उसे न मान सके, तो इससे उस इतिहासमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता । इस पर रामायणक्रे प्रमाणोंको उद्धत कर हम उस पर विचार करेंगे । उन पर जो सन्देह हो सकते हैं; उनका भी परिहार किया जायगा । ' आलोक ' पाठक - गरण इस आवश्यक विषय पर ध्यान अवश्य देंगे; यह उनसे आशा है । ( १ ) ' वाल्मीकि - रामायण ' में एक पद्य मिलता है - ' ऊन-षोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः । न युद्ध - योग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसैः ॥ ' ( बालकाण्ड २० । २ ) यह महाराज - दशरथका ऋषि विश्वामित्रके प्रति वचन है; जब वे ताड़का - मारीच श्रादिके बघके लिए श्रीरामको अपने यज्ञके निर्विघ्नतार्थं ले जाना चाहते थे । यहां ‘ ऊन - षोडशवर्ष ' का अर्थ है सोलह वर्षसे कम । श्रन्य पद्योंके संवादसे प्रतीत होता है कि - राम उस समय बारह वर्ष-के थे । जैसे कि - ' बालो ह्यकृतविद्यश्च न च वेत्ति बलाबलम् । न चास्त्रबल - संयुक्तो न च युद्ध - विशारदः ॥ ' ( बालकाण्ड २० ।७ ) ' बालं मे तनयं ब्रह्मन्! नैव दास्यामि पुत्रकम् ' ( १।२०।२५ ) यहां पर वार - वार श्रीरामकी बालावस्था दिखलाने से श्रीराम १२ वर्ष -. CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामको विवाहायु ६४३ के सिद्ध होते हैं । ' ऊन - षोडश वर्ष: ' यह श्रीदशरथका श्री रामके यौबनाऽभावको बतानेके लिए है; क्योंकि वचन तो बाल अपने प्रिय रामको राक्षसोंसे लड़ाई - रूप कठिन कार्य महाराज में " | भेजना चाहते थे; अतः उन्होंने श्रीविश्वामित्रके आगे कोई नहीं निमित्त तो रखना ही था । यौवनका आरम्भ प्रायः १६ वे प्रत्यक्ष- वर्षो | माना जाता है । इसी लिए उक्त पद्यके व्याख्यानमें ' कतक'ने कहा है - ' षोडश - वर्षः क्षत्रिय- कुमार एव कवच - घरो युद्धाहं- इति भो ॥ शास्त्रम् ' अर्थात् सोलह वर्षका ही क्षत्रिय कुमार कवच धारण करता है; और शास्त्रानुसार युद्धके योग्य होता है । तब श्रीराम. के १२ वर्षका होनेसे उसकी युद्धको अयोग्यता दिखलाना श्री. दशरथको इष्ट था; जिससे ऋषि उस रामको युद्धार्थं न ले जायें । यदि श्रीरामकी उस समय २४ - २५ वर्ष की अवस्था होती; तो श्री. रामके न भेजने का यह प्रत्यक्ष व्याज दशरथका कभी बन नहीं ( ११ सकता था । ( २ ) पाठकगरण अरण्य काण्डमें भी दृष्टि डालें । मारीब अपने द्वारा राम- पत्नी जानकीको चुराना चाहते हुए रावणको उस समयका हाल बताता है; जब कि विश्वामित्रके यज्ञके समय चाह विध वह विघ्न डाल रहा था, और श्रीरामने अपने प्रबल - बारणाघात-से उसे समुद्र पार फेंक दिया था । प्रकररणकी सङ्गति दिखलानेके लिए वह रावणको पहले विश्वामित्रका दशरथके पास जारा और उसे रामके ले जानेके लिए कहना यह वृत्त सुनाकर फिर दशरथके वाक्यका अनुवाद करता है - ' बालो ( ऊन ) द्वादश - वर्षों. यमकृतास्त्रश्च राघवः ' ( अरण्यकाण्ड ३८ । ६ ) यहां पर श्रीराम-को अवस्था स्पष्ट - रूपसे बारह वर्ष के लगभग बताई गई है । फिर मारीच विश्वामित्रद्वारा कहे गये वाक्यका अनुवाद करता है-' बालोप्येष महातेजाः समर्थस्तस्य निग्रहे ' ( ३८ । ११ ) प्रर्थात् प्रया Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६४३ ६४४ का वचन भी राम मारीच राक्षसका दमन कर सकता है । कि तो बालक महाराज मारीच स्वयं भी श्रीरामकी अवस्थाका वर्णन करता कार्यमें कोई नहीं है - प्रवात अब - व्यञ्जनः श्रीमान् बालः श्यामः शुभेक्षणः । ' ( ३।३८।१४ ) प्रत्यक्ष- तदा राम्रो बालचन्द्र इवोदितः ' ( ३८ ) १५ ) प्रागे वह ' १६ वर्ष अश्यत है- ' प्रवजानत्र संमोहाद् बालोऽयमिति राघवम् । विश्वा कतक ' ने भी कहता तां वेदिमभ्यधावं कृतत्वरः । ( ३८१८ ) एवमस्मि तदा युद्धाहं: - इति... मित्रस्य वृक्तः सहायास्ते निपातिताः । श्रकृतास्त्रेण रामण बालेनाक्लिष्ट-वच धारण तब श्रीराम- कर्मणा ( ३८ । २२ ) इत्यादि प्रमाणोंसे श्रीरामकी बारह वर्षकी खलाना श्री. सिद्ध होती है । ' रघुवंश ' में श्रीकालिदासने भी यही न ले जायें । प्रकृतित किया है - धनुष तोड़नेके समय उसने श्रीरामका ती; तो श्री. शव दिखलाया है । जैसे कि ' तस्य वीक्ष्य ललितं वपुः शिशोः ' बन नहीं ( ११ | ३८ ) ‘ अब्रवीच्च भगवन्! मतङ्गजैर्यद् बृहद्भिरपि कर्म दुष्करम् । तत्र नाहमनुमन्तुमुत्सहे मोघवृत्ति कलभस्य, चेष्टितम् ' । मारी ( ११ । ३६ ) यह जनककी उक्ति है अर्थात् ' बड़े हाथियोंसे भी कठिनता से साध्य कार्यको में बच्चे हाथीसे नहीं कराना ए रावणको चाहता ' । जब विश्वामित्र रामको सांगते प्राये तब ' राममध्वर-यज्ञके समय विघात- शान्तये काकपक्षधरमेत्य याचितः । " तेजसां हिच वयः - बारणाघात समीक्ष्यते ' ( रघु. ११ । १ ) यहां रामका विशेषण ' काकपक्षधारी ' दिखलाने के ( जुल्फें रखे हुए ) दिया है । कवि लोग इसे छोटे बच्चेकेलिए प्रयुक्त पास जाना करते हैं; अतः प्राचीन - टीकाकार श्रीमल्लिनाथते यहां टीका की नाकर फिर - वर्षों- है- ' बालकोचित शिखाधरं रामम् ' । इसो १२-१३ वर्षके; लगभग द्वादश रामकी आयु होनेसे उसे बताते केलिए ४ र्थं पादसें प्रर्थान्तरन्यास पर श्रीराम-गई है । फि कारका प्रयोग किया क्रि - तेजस्वियों की आयु नहीं देखी जाती । है- इसीलिए ही. ' एवसाप्तवचनात् स. पौरुषं काकपक्षकधरेपि राघवेः । करता ११ ) पर्याश्रये ( १११४२ ) यहां पर ' काकपक्षकधरेपि ' में श्रमि ' शब्द दिया गया है कि उस छोटे कुमारमें भी जनक़ते विश्वामित्रके कहने से CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. अपनी और श्रीरामको प्रायु सीताकी जुबानी ६४५ बलका विश्वास किया । इस प्रकार श्री कालिदासने भी यहां पर श्रीवाल्मीकि - मुनिकी तरह रामकी छोटी ही अवस्था बताई है । अस्तु । विश्वामित्रके यज्ञके समय में जब श्रीराम यज्ञको पूर्ण करवा-कर विश्वामित्रके साथ मिथिलाको प्राप्त हुए, और धनुष तोड़-कर उन्होंने सीतासे विवाह किया; उस अवसरपर रामायणानु-सार एक महीनेकी संख्या मालूम पड़तो है; इसमें बालकाण्ड २३ । १ से ७३ । २६ तक दिनोंकी गणना करने पर प्रतीत होता है । इससे सिद्ध होता है कि विवाह के समय में श्रीरामकी कुछ अधिक १२ वर्षकी आयु थी । ( ३ ) अब इस विषय में पाठकगण श्रीसीताजीका वचन भी • देखें, जिससे हमारे पक्षकी पुष्टि होती है । उस वचनसे श्रीराम तथा सीता दोनोंकी विवाहकी आयु सिद्ध होजाती है । उस वचनका प्रकरण यह है कि जब रावण सीताको चुरानेके लिए श्रीरामको अनुपस्थितिमें उनकी कुटिया में श्राया; तो पूर्व परिचय पूछने पर श्रीसीता रावरणको कहती हैं- " मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः । श्रष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते ' ( ग्ररण्य काण्ड ४७ । १०-११ ) यहाँ श्रीसीताने ६-७-८ पद्योंके अनुसार • वनवास प्राप्त होनेके समयकी अपनी तथा अपने पतिकी प्रायु बतलाई है | यहां पर ' रामाभिराम ' ने इस प्रकार लिखा है- " ब " निर्गमन - काले ' इति शेषः " । रामायण- शिरोमणिने यहाँ इस प्रकार व्याख्या की है- ' मम भर्ता वयसा पञ्चविंशकः - पञ्चविशेन युक्ताः काः ( वह्वयः ) त्रयो यस्य सः, अष्टाविंशतिकः - इत्यर्थः ” अयोध्यातो निर्गमन - काले " । पहले रामाभिरामने वन - निगर्मन-समय रामकी आयु २५ वर्षको बताई है; उनके अनुसार रामको विवाह के समय प्रयु कुछ अधिक बारह वर्ष की बैठती है; और. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६४६ रामायण - शिरोमरिणने अयोध्यासे वनको ओर निकलनेके समय-की श्रीरामकी प्रायु २८ अट्ठाईस वर्षकी बताई है; इसके अनुसार श्रीरामकी, विवाहके समयमें १५ पन्द्रह वर्षकी प्रायु सिद्ध होती है । यहांपर गोविन्दराजने अपनी टीकामें यों लिखा है- ' मम भर्ता पञ्चविंशति वर्षाणि अर्हतीति पञ्चविंशकः ( प्रार्हीयो वुन् ) राम-स्य जन्मारभ्य द्वादशे वर्षे विश्वामित्रागमनम्, तदनन्तरं वैदेह्या सह नगरे द्वादश वर्षारण निवासं कृतवान् । ततः परं त्रयोदशे वर्षे यौवराज्याभिषेकारम्भः, ततश्च वनप्रवेश - समये रामः पंञ्चवि-शतिवर्षार्हः ' अर्थात् - जब राम १२ वर्षके थे; तो तब विश्वामित्र आये | फिर विवाह होनेपर राम सीताके साथ १२ वर्ष घरमें रहे, इस प्रकार वे २४ वर्षके हुए । फिर १३ वें वर्षमें श्रीरामका यौवराज्य अभिषेक प्रारम्भ हुआ । पर वनमें जाना पड़ गया; इस कारण वे उस समय पच्चीस सालके थे । इस प्रकार सीताने अपने पति की तथा अपनी वनवास-प्राप्ति समय की प्रायु बताई । कैकेयीसे विघ्नित राज्याभिषेकसे पूर्व श्रीसीताने ' उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकरणां निवेशने । भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी " ( अरण्य ० ४७।४ ) इस प्रकार १२ वर्ष अपना ससुराल में रहना बताया । ' तत्र त्रयो-दशे वर्षे राजाऽमन्त्रयत प्रभुः । अभिषेचयितुं रामं समेतो राज-मन्त्रिभिः ' ( ४७ । ५ ) १२ वर्ष बीत जानेके बाद राज्याभिषेक प्रारम्भ होने पर कैकेयी द्वारा विघ्न होनेसे तेरहवें वर्ष में बनवास मिला । उस वनवास मिलनेके समयमें श्रीसीताने ( ४७ । ११ पद्यमें ) अपनी श्रायु १८ वर्षकी बताई है । ४७ । ४ पद्यमें विवाह-के बाद बनवाससे पूर्व १२ वर्ष तक अपना ससुराल में निवास सूचित किया है । १८ से १२ को घटाने में ६ वर्ष बचते हैं, वह CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी विवाहावस्था अवस्था सीताके विवाहकी हुई । इसलिए ' पद्म ६४७ गया है- ' रामः पञ्चदशे वर्षे षड्वर्षामथ पुराण ' में भी कहा मैथिलीम् । विवाहेन रम्यां सीतामयोनिजाम् ॥ ' ( ३६ ॥ उपयेमे । कन्द - पुराण में ब्रह्मखण्डान्तर्गत धर्मारण्यखण्ड । १५ ) इसी प्रकार तन्म भी कहा है । ' अग्निवेश्य - रामायण ' में भी श्रध्याय ३० में तल पञ्चदशे वर्षे षड् - वर्षामय मैथिलीम् 1 । उपयेमे त्वयोध्यायां कहा है- ' रामः ' कुत ब्दानुवास सः । सप्तविंशतिमे वर्षे वनवासमकल्पयत् द्वादशा- । तु वर्षाणि सीतायास्तु तदाऽभवन् । अष्टादश है । टीका में ६ । ११० सर्गके अन्तमें ' यह किया वचन ' रामाभिरामी ' इंस रामचरित ' में भी कहा गया है - ' उद्धृत रामः गया है । ' लोमश- प्रान्त मैथिलीम् । उपयेमे विवाहेन पञ्चदशे वर्षे षड् - वर्षाभय रूपक रम्यां सीतामयोनिजाम् । ततो द्वादश-वर्षाणि रेमे रामस्तया सह । सप्तविंशतिमे वर्षे यौवराज्यम- च कल्पयत् ' ( १६-१७ ) ( ४ ) ये ही बातें श्रीसीताने युद्ध - काण्ड में भी का ‘ न प्रमाणीकृतः पाणिर्बाल्ये सूचितकी हैं । है; मम निपीडित: ( ६ । ११८ । १६ ) यहांपर रामाभिरामी - टीकामें लिखा है - " बाल्ये कृतं धर्मप्रबो- अन्य द्द ेश्यक पाणिग्रहरणमपि त्वया परित्यागे न प्रमाणीकृतम् ' यहांपर बालेन राम तथा सीताका बाल्यावस्था में विवाह माना गया है । ' वाल्ये रामके मम निपीडित: ' यहांपर ' बालेन मम पीडित: ' यह पाठान्तर है । फलतः इससे दोनोंके विवाह में बाल्यावस्था व्यक्त होती है । श्री सूचित रामकी तब १६ से नीचे १२ वर्षकी अवस्था और सीताकी ६ वर्ष सहचा की अवस्था हुई । इस प्रकार बाल्यावस्था स्वत: सिद्ध होगई । ( ३२ । ( ५ ) सीताकी ६ वर्षकी इस श्रायुका भवभूतिकविने रामके तथा मुखसे स्वाभाविक - चित्र ' उत्तर - रामचरित्र ' में खिंचवाया है । कर दि जैसे कि— वचनव ' राम: - ( सास्रम् ) स्मरामि, हन्त! स्मरामि, ' जीवत्सु तात- प्रबोध Gujarat. An eGangotri Initiative