सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 361–370

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 361–370

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६५७ श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ६८८ द्वारा चुराई रामकी ( विवाह १५ वर्षके अनुसार ) बयालीसकी और श्री-उसे मार- सीताकी ( विवाहमें छः वर्ष के अनुसार ) तैंतीस वर्षको अवस्था वाली होने बताई गई है; इस प्रकार हमारा पक्ष सिद्ध हो गया । लोटपड़ वादियोंके अनुसार तो चुरानेके समयकी उस ( सीता ) की इस अवस्था ४२-४६ वर्षकी थी; अयोध्या वापिस आजानेपर गर्भव-नुसार ४२० तीत्वमें उसकी आयु ४४-५१ वर्षकी जा बैठती है; तब क्या रजः-कल्पा सीता कालको समाप्ति वा उसकी निकटतामें उसे गर्भ हुआ यह बात निकट थी? क्या कभी युक्तियुक्त हो सकती है? इस प्रकार स्पष्ट हो गया द्वादशादूर्ध्वं कि - वादियों का पक्ष सर्वथा निर्मूल है, और हमारा पक्ष समूल, हृद युक्तियुक्त एवं रामायण - सम्मत है । स्वयंवरके ( ज ) अब शेष एक प्रश्न रह जाता है कि जब श्रीराम मर्यादा-ससुराल पुरुषोत्तम हैं तब क्या विवाहसमयमें हमें भी उनकी श्रायुका अनु-समयमें १३ सरण करना चाहिये? ' इस पर यह जानना चाहिये कि - श्री-स्था हुई । राम ' वाल्मीकि रामायण ' के अनुसार विष्णु भगवान्के अवतार हो जाती है; हैं । अवतारमें लौकिक - मनुष्यकी अपेक्षा दिव्यता अधिक होती । जैसेकि-है । तो जहां उनका लोकोत्तर दिव्य अंश हो, उसका हमें अनु-दु वर्षाणि करण नहीं करना चाहिये । इसका इस अंश में अनुकररण करना खण्ड ऋ समय में छः चाहिये कि -अपनी कन्याका विवाह ऋतुकालसे पूर्व किया जाय; तीस वर्षके वेदव्रतकी समाप्ति पर ही पुरुषको विवाह करना चाहिये । पर धर्मारण्य- बारह वा पन्द्रह वर्षके हमें छः वर्षकी कन्यासे विवाह नहीं करना चतुर्दश हि चाहिये । हम मैथुनी - योनिके हैं; तब अमैथुन - योनिवालोंके स्वारिश के विशिष्ट आचरणोंको हम अनुकरण करनेकी क्षमता में अधिकृत वर्षाणि कैसे हो सकते हैं? श्रमैथुनयोनिमें तो भाई - बहनोंके विवाह भी घर १४ हो जाते हैं; याद कीजिये श्रादिम- सृष्टि के विवाहों को । आदिम मय श्री. लोग एकके सन्तान होनेसे परस्पर भाई - बहन ही तो थे, पर भाई - बहनोंके विवाहकी यह उनकी मर्यादा हम कैसे ले सकते CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीताको विवाहायु हैं? इसी तरह प्रकृतमें भी समझें । अकेले श्रीराममें चौदह सहस्र राक्षसोंके शक्ति थी; वह हममें कहां है? तब हमें उनका सम्मत चरित्र ही अनुकर्तव्य है । या वे जिस दें; वह अनुकर्तव्य है, साग उनका चरित्र ६८६ मार डालनेकी लौकिकशास्त्र-कार्यका उपदेश लिए ' श्रीमद्भागवत ' -पुराण में कहा अनुकर्तव्य नहीं । इसी मनसापि ह्यनीश्वरः है- ' नैतत् समाचरेज्जातु ब्धिजं विषम् । विनश्यत्याचरन् मौढयाद् यथा रुद्रोऽ-॥ धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् जीयसां न दोषाय वह्नः सर्वभुजो यथा । ' सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् । तेषां ॥ ईश्वराणां वचः शास्त्रानुगृहीतं यत् स्ववचो युक्तं ( लौकिक-३२ ) । यदि हम ) बुद्धिमांस्तत् उनके समाचरेत् ' ( १० । ३३ । ३०-३१-हमारा विनाश लोकोत्तर - आचरण भी अनुसृत करें, तो हो जाय । यह बात ' विनश्यत्याचरन् मौढ़याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम् ' इस वाक्यसे तथा ' तेजीयसां न दोषाय वह्नः सर्वभुजो यथा ' इस पद्यांशसे व्यक्त हो रही है । ( झ ) जो कई लोग ' कल्किपुराण ' के तृतीयांशके ध्यायके " स भूपपरिपूजितो जनकजेक्षितैरचित तृतीया-. जानकी का रामके प्रति कटाक्षपात: ' इस पद्यसे दिखला कर उससे उसकी १७- २४ वर्षकी अवस्था सिद्ध करना चाहते हैं; यह बात भी ठीक नहीं । उक्त पद्यके ‘ जनकज़ेक्षितैरचित: ' इस प्रदामें स्थित ‘ ईक्षित ' शब्दका ‘ कटाक्षपात ' अर्थ करना बाक्से बलात्कार करना है । ' ईक्षित'का दर्शनमात्र अर्थ है । सीताके श्रवलोकनसे सम्मानित ' यही यहां प्रकृतंप्रयुक्त अर्थ है । मला सभामें कोई : तुिलज्जासे निर्लज्जा, लड़की भी - जिससे अभी उसका कोई सम्बन्ध ही नहीं हुआ वह भला सबके सामने किसी अपरिचितको • .स.घ., ४४: Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६६० बात श्रद्धेय ही नहीं । तब सीता - जैसी कटाक्षपात करे- ऐसी पूर्व ही श्रीरामको - जिससे कोई सुशीला - लड़की धनुषभङ्गसे कटाक्षपात करे, यह बात क्यों - कर थोड़ा भी सम्बन्ध नहीं हुमा ही अर्थ माना जावे; मानी जा सकती है? अथवा कटाक्षपात बढ़ती । ' उत्तर-तब भी सीताकी विवाहकी प्रायु छः से नहीं गया है-रामचरित ' में भी सीताको छः वर्षकी ही माना १ । २० यह बात हम गत - निबन्धमें दिखला ही चुके हैं । उसके गये हैं । तब पद्यमें सीताके शैशवमें ही ' प्रकृत्रिम विभ्रम ' दिखलाये सिद्ध हुप्रा हमारे पक्षमें कोई बाधा नहीं पड़ती । इस मीमांसासे श्रीसीता-विवाह के समय श्रीरामकी आयु १२ वा १५ और कि-की श्रायु छः वर्षकी थी । ( ञ ) अन्त में आर्यसमाज में प्रतिष्ठित ' वेद, गीता एवं रामा-प्रायः निष्पक्ष - अनुवाद करनेवाले ' वैदिकधर्म ' यरण - महाभारत'का सातवलेकर महोदयकी एतद्विषयक सम्पादक पं. श्रीपाद - दामोदर समाप्त करते हैं । श्री-सम्मति उद्धृत करके इस लेखांशको ' की टीका ' बाल-सातवलेकरजी ने अपनी ' वाल्मीकिरामायण ..काण्ड ' के अन्त में ६२३ पृष्ठमें लिखा है-" सीताकी श्रायु छः वर्षकी और रामकी पन्दरह वर्षकी हो-' चुकी थी, जिस समय उनका विवाह हुआ । वैदिक - संस्कारमें । विवाह - संस्कार अलग है, और गर्भाधान - संस्कार अलग है " विवाह होते ही गर्भाधान होना ही चाहिये- ऐसी कोई बात नहीं । ' योग्य समय श्रानेके बाद ही गुरुजन गर्भाधान - संस्कार कराके • उन्हें परस्पर मिलनेका अवसर देते हैं । आजकल यूरोपियन - * विचार समाज में चारों ओर फैले हैं, इस लिए " विवाह और " गर्भाधान मिलकर एक ही संस्कार " है ऐसा माना जाने लगा है । श्रौर यह श्रनार्य विचार मनमें रखकर ये लोग अपने प्राचीन Joshi ग्रन्थ हन ection श्रीसीतारामकी विवाहायु ६६ | ६६२ देखते हैं । अतः उनको कई बातें चक्करमें डाल देती हैं है कि- प्राचीन समय में प्रौढ समय में विवाह होते थे । जहां । हमें पता | ८-६-१ वर - पद्धति थी; वहां प्रौढ - विवाह होना ही चाहिये ॥ नहीं स्वयं शत्रुघ्न वधू पतिको किस तरह चुन सकेगी? पर जहां ' समाह्वय ' तो इकट्ठी है, वहां इसकी आवश्यकता नहीं है । वहां तो वधूकी पसन्दगीको होता अतः इ कोई बात ही नहीं है । जो शनं पूरी करेगा; वही कन्याको उनमें होगा । सीताका ' समाह्वय ' था. न कि स्वयंवर । सीताका विवाह प्राप्त भर्तः इससे भी पूर्व होना था । कई राजा प्राये; उनमें एक भी शर्त पूरी ने विक कर सका । इसलिए किसीको सीता मिली नहीं । क्रोधित होकर । हो ह सबने मिलकर मिथिलाको घेर लिया । साल - डेढ साल युद्ध ग्राजक - रहा । पश्चात् परास्त होनेके बाद वे सब राजा चले गये । तथा ' वृत्तान्त इसी ' बालकाण्ड ' में है । श्रीरामके साथ सीताके विवाह प्राणिस होने के पूर्व समयका यह वृत्तान्त है । इस समय सीता पांच वर्ष श्रादिक की होगी ” ( पृ • ६२३-६२४ ) । ( ट ) एक प्रश्न यह भी है कि - ' यदि सीताकी श्रायु ६ वर्षको सामने थी; तो लक्ष्मणकी स्त्री ऊर्मिला, भरत की पत्नी माण्डवी प्रौर कभी म शत्रुघ्न की स्त्री श्रुतकीर्तिकी क्या अवस्था थी? ' इसपर उत्तर पाश्चा यह है कि यहां की सीताकी ६ वर्षकी अवस्थामें विवाह प्रमं भारती योनिताके कारण हुआ; इसपर सोपपत्तिक हम लिख चुके है । परिचा श्रीसीता सीरध्वजजनककी श्रौरस पुत्री नहीं थी; उनकी पुत्री को भी ऊर्मिला श्रौरस थी; माण्डवी और श्रुतकीर्ति उनके भ्राता - कोश ध्वजकी लड़कियां थीं । वे तीनों मैथुनयोन्युत्पन्न थीं; प्रतः श्रीर उनकी अवस्था से सीताकी अवस्थापर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, प्रथर्व और न ही रामायणमें उनकी अवस्था निरूपित है । सुतरां में वैदकी जितनी भी अवस्थाकी रही हों; पर ऋतुमतीत्वकी सीमासे तथा भाष सीता डीलडौल से न्यूनकी होंगी यह रामायणसे स्पष्ट है । रांगी Gujarat. An eGang माता काल श्रीरा

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६६ । श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६६२ हैं । हमें पता वर्षके भीतरकी सम्भव है । राम, लक्ष्मण, भरत, 1 जहां स्वयं. -६-१०-११ अवस्थाभेद तो था नहीं । इनकी उत्पत्ति प्रायः ये नहीं तो शत्रुघ्न इनका । पुत्रेष्टिको अभिमन्त्रित - हविसे इनकी उत्पत्ति हुई, नाह्वय ' होता इकट्ठी हुई परस्पर थोड़े दिनों वा घण्टोंका अन्तर सम्भव हैं; पसन्दगीको उनमें अतः इनमें बड़े - छोटेका राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न - यह क्रम है; कन्याको प्राप्त प्रर्तः वे सब १२-१३ वर्षसे १५ वर्ष के भीतरके थे । अतः स्वाभा-ताका विवाह बिक है कि इनकी पत्नियोंकी आयु ८ - ९ - १०-११ वर्षोंके भीतर 7 शर्त पूरी न हो । हां, श्रीसीता ६ वर्षकी होती हुई भी श्रमैथुनयोनितावश कोधित होकर प्राजकलकी ११-१२ वर्षके लगभग अवस्था वाली लड़की जैसी, युद्ध होता तथा बड़े डीलडौल वाली मानी जा सकती है । पर उसकी गये । यह प्राणिसंसारमें ग्रानेकी अवस्था छः वर्षकी ही थी; ग्रतः माण्डवी ताके विवाह ना पांच वर्ष श्रादिकी श्रवस्थानोंका उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता । ( ठ ) अन्य यह भी प्रश्न है कि - ' आजके ऐतिहासिकों के बायु ६ वर्षकी सामने यदि श्रीसीताकी यह अवस्था रखी जावे; तो वे तो यह माण्डवी पोर कभी मानें ही नहीं " । इसपर जानना चाहिये कि प्राजकल के इस पर उत्तर पाश्चात्य चश्माधारी - ऐतिहांसिकों और पौरस्त्य - प्राँख वाले हम बवाह प्रमं भारतीयोंके दृष्टिकोण में बड़ा भारी वैषम्य है । वे तो प्रपने, ख चुके है । पाश्चात्य दृष्टिकोणसे भाषाविज्ञान द्वारा ऋग्वेदसं ० के मण्डलों - उनकी पुत्र को भी भिन्न र समयका बनाया हुआ और १ म तथा १० म मंडल-भ्राता कुश को शेष - मण्डलोंसे अर्वाचीन मानते हैं । वे रामायरंगके बालकाण्ड न्न थीं; एतः और उत्तरकाण्डको भी शेषं काण्डों से अर्वाचीन मानते हैं । वे नहीं पड़ता, अथर्ववेदसं ० को अत्यन्त अर्वाचीन मानते हैं । उनकी समझ में है । सुतरां वेदको श्रनादिता एवं अपौरुषेयता ही नहीं प्राती । वें संस्कृत-सीमासे तथा भाषाको भी सर्वादिम - भाषा नहीं मानते । वे तो महाभारत स्पष्ट है । रामायणादि युद्धों, रावण के दशमुखीको ही काल्पनिक, बल्कि श्रीराम एवं श्रीकृष्णको भी काल्पनिक मानते हैं । इन Aur लोगों Joshi पर " Collection Gujarat. श्रीराम और सीताकी विवाहकी प्रायु ६६३ प्रायः पाश्चात्योंका प्रभाव पड़ा हुआ है । अपनी बात उन्हें ग्रच्छी न लगकर ' दूरके ढोल सुहावने ' उन्हें उन दूसरों पाश्चात्योंकी बात युक्त मालूम पड़ती है; तो क्या हम भी उनके कहने से अपने ग्रन्थों में परिवर्तन कर लें? । उनको ४ अरब ३२ करोड़ वर्षका दिन और उतनी ही एक रात, इस प्रकारसे ३५० दिन ब्रह्माका एक इस प्रकार सौ वर्ष की आयु फिर भी सृष्टिको ब्रह्मा का वर्ष, शास्त्रनिर्दिष्टसंख्या ग्रनादिता, युगोंकी समझमें नहीं प्राती । वे तो ' युनान से प्राचीन भी कोई इतिहास है ' इस वातको ही नहीं मान सकते । वे तो यह भी नहीं मान सकते कि महाभारत के युद्धको हुए पांच हजार वर्ष और श्रीरामावतारको हुए नौ लाखके लगभग वर्ष बोते हैं । उनका दृष्टिकोण अभी बहुत संकुचित है; तो इससे भारतोयोंका प्राचीन इतिहास असम्भव नहीं हो जाता । इन ऐतिहासिकों की विचारकी कसौटीमें जो बात फिट बैठे; वहो ठीक है, ऐसा कहना भारतीय इतिहासका अपमान करना है । अतः वे व्यक्ति उपेक्षा के योग्य ही हैं । ऐसे ऐतिहासिकोंका प्रार्यसमाजके प्रतिष्ठित - विद्वान् श्रीभगवद्दत्तजीने अपने ' भारतवर्षका बृहद् इतिहास ' प्रथमभाग-में युक्ति - युक्त निराकरण किया है । तथापि कई आर्यसमाजी भी पाश्चात्योंकी कई युक्तियोंसे प्रभावित होकर उनके प्रवाहमें भी बह गये हैं । अस्तु । ' आलोक ' पाठकगण श्रीसीता - रामकी विवाहायु - विषयक लेखमालाके चार निबन्ध देख चुके, जिनमें वर्तमान- सुधारकोंकी एतद् - विषयक विप्रतिपत्तियां सब दूर की जा चुकी हैं । अब अग्रिम पञ्चम- निबन्ध – जिसमें छोटी प्रायुकी विवाहावस्थापर विचार किया जायगा -पाठकोंके समक्ष उपस्थित किया जाता है; तब सीतारामविवाह विषयक यह लेखमाला पूर्ण होजायगी । परिवर्धन वा संशोधन - पृ. ५२० पं.१६ शिवपुराण वायवीयसं. में An eGangotri Initiative

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६६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ( ५ ) श्रीसीतारामके बाल्यविवाहपर विचार । श्रीसीता एवं श्रीरामकी वैवाहिक वाल्मीकिप्रोक्त प्रायुमें हम चार लेख दे चुके हैं; जिनमें वादियोंकी ओरसे की गई आपत्तियों-का सप्रमाणोपपत्तिक समाधान हो चुका है । पर फिर भी कई महाशय इसे बाल्य - विवाह मानकर इसे अयुक्त बताते हैं; और इतिहास में युवति कन्याओं का विवाह होना वे सिद्ध करते हैं । प्रसक्तानुप्रसक्त इस प्रपत्ति पर भी विचार कर लिया जाना हम युक्त समझते हैं । आशा है- ' आलोक ' पाठकगरण इधर दृष्टि देकर हमें अपना सहयोग देंगे।— जो कि कई व्यक्ति इतिहास श्रादिमें विवाह्यमान कई कन्याओं में प्रयुक्त ' यौवन ' शब्द क्वचित् देखकर वहां १७-२४ वर्षकी अवस्थाका अनुमान कर लेते हैं; इसीलिए श्रीसीताका विवाह भी १७-२४ वर्षकी अवस्था में मानते हैं; उन महाशयों को जानना चाहिये कि यौवन वहां पर यौगिक विवक्षित होता है, शिवको ' भ्राग्नेयमण्डलाधीश ' ( ३१।११ ९ ) कहा है । और उसीके २८ अध्याय में रुद्रके ही घोर तेजोमय - शरीरको प्रग्नि, तथा सोमको शक्ति-का स्वरूप बताकर ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' यह तत्त्व भी प्रतिपादित किया है । शिवकी शर्व आदि ८ मूर्तियोंमें तृतीय रुद्र - मूर्ति में तृतीय भौतिक मूर्ति अग्निका अधिष्ठित होना और उसका ' रौद्री ' मूर्ति नाम होना कहा है ( वाय. सं. उत्तर. ३ य अध्याय ) । ५२८-१७ चाय्वालय । ` ५२६-२४ आर्यसमाजी । ५३३-१९ क्योंकि - शिवकी 5 मूर्तियोंमें वायु भी एक मूर्ति है । शिव पु. शत रुद्र सं. २० अध्यायमें मरुतोंके अवतार हनुमानको शिवका श्रंश कहा है । ५३४-५ रुद्रप्राणसे ही भूमिके स्तरमें-पारद बनता है, अत: उसे ' रुद्रवीर्य ' कहा जाता है । ५५८-१३ ' तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ' ( छान्दो. ६/३/४ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An बाल्य विवाहपर विचार ६६५ ६६६ पारिभाषिक नहीं । ' बालेति गीयते नारी यावद् वर्षारण ततस्तु तरुणी ज्ञेया द्वात्रिंशद् - वत्सरावधि, ( भावप्रकाश षोडश । ' पाणिनि ऋतुप्रकरण २७६ पद्य ) इसके अनुसार स्त्रियोंका पूर्वखार श्री तं हरी यौवन १६ वर्षसे बत्तीस वर्ष तक होता है । पारिभाकि धोवन क विवाह आठवें वर्ष से लेकर बारह वर्ष तक वैध ( परन्तु शास्त्रीय कन्याओंका भानुजीव और आठवें वर्ष से पूर्व विशिष्ट कारण से ) होता है. ज्ञेया युवा वर्षके बाद १५ वर्ष तक कन्या विवाह हुआ करता है । बारह नाम भ सकता है, पर पन्द्रह - सोलह वर्ष के बाद कन्याका अपवाद - शास्त्रवश हो संगत भी दिखाई नहीं पड़ता । तब यदि कन्याओं का विवाह विवाह कहीं तो कही ( जा में दोखे; वहां पर यौवन यौगिक जानना चाहिये । पारिभाषिक न व्याघ्रान नहीं । वह यौगिक - यौवन बाल्यावस्था में भी हुआ करता है । प्राश्रमस इसीलिए ‘ सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् ' ( शुक्ल यजु. ट्वा माध्यं. सं ० २२ । २२ ) इस मन्त्रके ' शतपथ ब्राह्मरण ' में कहा गया शकुन्तल है- ' एष वै सभेयो युवा यः प्रथमवयसी । तस्मात् प्रथमवयसी यहां पर स्त्रीणां प्रियो भावुकः ' ( १३।१।६।८ ) यहां पर पहली आयु वाले बुछ, अ को भी ' युवा ' कहा गया है । छे वर्ष ( ख ) इसीलिए ' महाभारत ' श्रादिपर्व ( ७६ । १४ ) में पहली ग्रव- लेना चा स्थावाले कचको ( ७६।२४ में ) ' युवा ' कहा है । ( ग ) इसी कारण है उच्छ्वा । उसी ही तैत्तिरीयोपनिषद् ' ( ८1१ ) के शाङ्करभाष्य में ' युवा'की ' प्रथम, इससे वया: ' यह व्याख्या है । ( घ ) इसी हेतु ' वयस्थया तया राजन्! यदि ऐस ( महाभारत विराट पर्व ७२४ ) इस पद्यमें ११-१२ वर्षकी उत्तरा-के लिए ' वयस्थस्तरुणो युवा ' ( श्रमरकोष २२६/४२ ) इस प्रकार यौवनो '' श्रीवनश ' युवा'का पर्यायवाचक ' वयस्था ' शब्द प्रयुक्त किया गया है । भाषिक ( ङ ) इसी प्रकार १६ वर्षकी अवस्था के अन्दर के प्रभिमन्युको भो महाभारतमें ' युवा ' - कहा गया है ( ७।४८।२७ ) । इस राम - लक्ष eGangotri ( च ) Initiative इसीप्रकार ' ग्राम्यपशुसंघेष्वतरुणेषु स्त्री ' ( १।२०७३ ) इम ( 118

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६६५ १६६ के ' प्रतरुरण ' के प्रत्युदाहरण में ' वत्स ' और ' वत्सा ' को षोडश पाणिमसूत्र ( युवा ) कहा गया है । नहीं तो वत्सावस्थां में पारिभाषिक पूर्वखण्ड श्री तरुण हो सकता है? ( छ ) इसके अतिरिक्त ' युवति ' शब्द रिभाषिक यौवन कैसे ' श्रमरकोष ' की टीका में स्थित ' प्रमदा चेति व कन्याओं का भानूजी दीक्षितकृत तथा स्मृता ' इस भागुरिके प्रमाणसे सामान्य स्त्रीका ) है होता है, नाम या युवतिस्तु भी हुआ करता है । तंत्र वह पहली प्रायुमें भी उपपन्न । बारह वश हो ( संगत ) हो सकता है । तो कहीं ( ज ) ' षड्वर्ष एव बाल: स ( भरत ) कण्वाश्रमपदं प्रति । सिंह-कहीं यौवन व्याघ्रान् वराहाँश्च महिषाँश्च गणस्तथा । बबन्ध वृक्षे बलवान् रिभाषिक शाश्रमस्य समीपतः ' ( महा ० प्रादिपर्व ७४ । ६ ) ' तं कुमारमृषि-करता है । कर्म चाऽस्यातिमानुषम् । समयो यौवराज्यायेत्यब्रवीच्च शुक्ल यजु. शकुन्तलाम् ट्वा ' ( ७४।९ ) ' अतिकायश्च ते पुत्रो बालोऽतिबलवानयम् ' कहा गया यहां पर शकुन्तलाके पुत्र भरतको छे वर्षका होने पर भी यौवन-नायु थमवयसी वाले युक्त, प्रतिकाय, और युवराज होनेके योग्य बताया है । वैसे ही हे वर्ष वाली एवं बड़े डील - डौल वाली सीता के लिए भी समझ तेना चाहिये । ( झ ) ' हर्षचरित ' में ग्रहवर्माके विवाहके समय चतुर्थ उच्छ्वास ' स्वाकारं युवानमदर्शयत् ' यह एक युवाके लिए लिखा-नी कारण है । उसीकी सम्बुद्धि में वहां ' बालक ' का प्रयोग किया गया है-' प्रथम, इससे स्पष्ट है कि बाल्यावस्था में भी यौवन माना जाता है । राजन्! ' यदि ऐसा है; तब इतिहासमें विवाह्यमान लड़कियों में प्रयुज्यमान की उत्तरा ' पौवनोपेता ' इत्यादि शब्द तथा १२-१५ वर्षके श्रीरामकेलिए स प्रकार | ' यौवनशालिनी ' यह शब्द यौगिक - यौवनका सूचक है, पारि-गया है । भाषिकं यौवनका नहीं । न्युको भी इस प्रकार बारह वर्षके, अधिकसे अधिक पन्द्रह वर्ष के श्री-।७३ ) इम राम - लक्ष्मणादिके लिए ' अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयोवनी ' ( १ । ४८ । ३, १ । ५० । १८ ) ' पुत्रा दशरथस्येमे रूपयौवन-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. यौगिक यौवन ६६७ शालिनः ' ( १। ७२ । ७ ) इस प्रकार ' यौवनशाली ' शब्द प्रयुक्त किया गया है - इससे स्पष्ट है कि इतिहास प्रादिमें स्त्री वा पुरुषों-के लिए प्रयुक्त ' यौवन ' शब्द ' यौगिक ' ही है । इस प्रकार छः ariat श्रीसीता भी यौगिक - युवति सिद्ध हो जाती है; तब विवा हावसरमें प्रयुज्यमान यौवन केवल ' पारिभाषिक यौवन है ' यह पूर्वपक्षियोंकी बात निरस्त हो गई । श्रीराम श्रादिके साथ ' यौवन ' शब्द देखकर भी उन्हें २५ वर्षका मानना अनिवार्य नहीं । ' युवा ' शब्द तो प्राठ वर्षवाले बालकके लिए भी प्रयुक्त किया जाता है-देखिये-( ञ ) ' युवा सुवासाः परिवीत ग्रागात् ' मन्त्र ८ वर्ष वाले उपनेय बालकको भी ' युवा ' बताता है, क्योंकि यह मन्त्र उपनयनमें पढ़ा जाता है । देखिये- स्वा ० द ० को संस्कारविधि ( उपनयनप्रकरण पृ ० ८४, ६२ ) । तब ' पुत्रा दशरथस्येमे ' रूप-यौवनशालिनः ' ( १ । ७२ । ७ ) से ' वेदवाणी ' ( १३ । १० ) में रामको २५ वर्षका व्रताना ' पथिक'का प्रबहुश्रुतता के काररंग है । नहीं तो वह क्या उपनेय ' युवा ' बालकको ' युवा सुवासा: ' इस लिङ्गसे २५ वर्षका मान लेगा? जनकने जो श्रीरामकेलिए कहा-' समुपस्थित यौवनी ' ( १ । ५० | १८ ) सो वह १६ वर्षसे कम श्रायु बतानेकेलिए भी कहा जा सकता है? । क्योंकि पूर्व प्रोक्त सुश्रुतके वचनसे यौवनका प्रारम्भ १६ वें वर्षसे होता है । व १५ वें वर्ष में ' समुपस्थितयौवन ' शब्द ठीक समन्वित हो गया । कोई अनुपपत्ति नहीं प्राती । ' रूपयौवनशालिनः ' का भी यही तात्पर्य है । राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न यह सब पुत्रेष्टियज्ञके पायससे तीनों रानियोंसे उत्पन्न हुए थे; अतः सभी प्रायः समवयस्क थे । कई दिनों वां घड़ियोंके फ़र्क होनेसे राम बड़े, भरत उनसे छोटे, An eGangotri Initiative

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६६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) उनसे छोटे लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे । यहां वर्षोंका अन्तर नहीं, जैसा कि प्रतिपक्षीने संकेत दिया है । स्वा. दयानन्दजीके अनुसार ' सुश्रुतसंहिता ' में यह पाठ है-' चतस्रोवस्थाः शरीरस्य वृद्धिर्यौवनं सम्पूर्णता, किञ्चित्परि-हारिणश्च इति । प्राषोडशाद् वृद्धिः । प्रपञ्चविंशतेर्योधनम् । श्रा चत्वारिंशत: सम्पूर्णता । ततः किञ्चित्परिहाणिश्च ' इससे जन्मसे प्रारम्भ करके सोलह वर्ष से कुछ पूर्व तक पुरुषको वृद्धि श्रवस्था कही गई है । जैसे ' आ कडारादेका संज्ञा ' ( पा. १ । ४ । १ ) यहां पर ' आङ्’का अर्थ ' कडाराः कर्मधारये ' इत्यतः प्राक् ' यह अर्थ है, वैसे ही ' भा षोडशाद् ' का अर्थ भी सोलहसे कुछ पूर्व तक है । फिर १६ से प्रारंभ करके पच्चीस वर्ष से कुछ पूर्व तक यौवन अवस्था मानी गई है । '२५ वें वर्ष में यौवन होता है, यह पथिक ' का किया हुश्रा अर्थ अशुद्ध है, दोनों एक - स्थानके वाक्योंमें ' आङ् ' समान अर्थ रखता है । ' सुश्रुत ' में यह भी लिखा है- ' पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे । समत्वागतवीर्यो तो जानीयात् कुशलो भिषक् ' ( सूत्रस्थान ३५ । ८ ) अर्थात् पच्चीस वर्षके पुरुष तथा सोलह वर्षकी स्त्रीकी समवोर्यता होती है । पच्चीसवां वर्ष पुरुषके यौवनको अन्तिम कोटि है; क्योंकि - पुरुषयौवन १६ से २५ वर्षं तक कहा है । इस प्रकार स्त्रीका १६ वां वर्ष भी उसके यौवनकी अन्तिम कोटि होती है, क्योंकि स्त्री तथा पुरुषको यौवनादि अवस्था भिन्न - भिन्न वर्षमें हुआ करती है । इसलिए स्वा. द. जीने भी ' संस्कारविधि ' में कहा है-- ' अब इस में इतना विशेष समझना चाहिये कि - स्त्री और पुरुषके शरीरमें पूर्वोक्त चारों श्रवस्थाओंका एक - सा समय नहीं है ' ( संस्कारविधि १०३ पृष्ठ ) पुरुषका तो यौवन १६-१७ से शुरू होता, इस प्रकार स्त्रीका यौवन भी उस हिसाबसे प्राठ वर्षसे प्रारम्भ होता है CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीताकी विवाहायु 90 ६६ ९ तो हुआ सर्वसाधारण - स्त्रियोंका लेखा; लेकिन मैथुनिकयोनि - सीताका तो वही ५-६ वर्ष में स्वतः सिद्ध पुष्टकाय है उत्पन उसका यौगिक - यौवन संगत है । क्योंकि वह डीलडौल । तब थी वाली थी । इस प्रकार श्रीसीताके विषयमें होनेवाले अन्य भी आक्षेप सर्वा इस मीमांसासे परिहृत समझ लेने चाहियें । इधर राम विवाहो- प्रत्य परान्त १६ वर्षके थे; तब ' नर्ते वै षोडशाद् वर्षात् सप्तत्याः परतो उ न च । श्र ेयस्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति ' ( चिकित्सित- थे । स्थान २ । ४० चतुर्थपाद ) इस चरक सहित के वचनसे १६ वर्षक स्टुटा पुरुषको संयोगकी प्रभ्यनुज्ञा है; तब श्रीरामके संयोग- पक्ष में भी विवाह कोई अनुपपत्ति नहीं रहती; पर वहां संयोग इष्ट नहीं है । हासमा आजकल पाश्चात्योंके अनुकरण में लगे हमारे देशके लोग पड़ता १७-२४ वर्षोंमें कन्याका विवाह करना उन्नतिप्रद मानते हैं और बाल्यविवाहको हानिप्रद मानते हैं पर वे पक्षपातकी काली ऐनकसे गरणन सैनिक ढकी हुई नेत्र वाले होनेसे अपने माने हुए यौवनमें विवाह करनेपर हानि नहीं देखते, और बालाविवाह में हानि देखते हैं । इस कुलों विषयमें शास्त्रीय - मीमांसा तो फिर कभी दिखलाई जावेगी; पर विवाह इस निबन्ध में उक्त विषय में देशी एवं वैदेशिक विद्वानोंकी सम्मतिमात्र दिखलाकर और अधिकवयस्का लड़कियोंके विवाह- २०७ में हानि दिखलाकर इस लेखको समाप्त करते हैं । पाठकगण अवधान देकर देखें-- यह पत्र में मिसमेयोसे बनाई ' मदर इण्डिया ' नामक पुस्तकके उत्तर-स्वरूपमें लिखी ' दुखी भारत ' नामक पुस्तकमें उसके निर्माता अपने समयके प्रमुख - आर्यसमाजी, पञ्जाबके प्रसिद्ध नेता, बड़े नहीं ' सुधारक ला. लाजपतराय महोदयने इस विषय में कुछ लिखा है । हम उसके हिन्दी - संस्करणसे उसका अनुवाद उद्धृत कुमार करते हैं-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 367

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 3 ) ६६ ९ 900" प्राचीनकाल में जिन जातियोंने बड़ी - बड़ी सभ्यताओंको पुष्टकाय किया है; उनके अधिकांश बाल्यविवाहकी प्रथा प्रचलित है । त उत्पन्न यूनानके लोग जो पूर्ण मनुष्यकं सुन्दर विकास तथा उसके ल वाली थी । उन्नतिके प्रदर्शसे प्राज भी हमें उत्साहित करते हैं-आक्षेप विवाहो-परतो कित्सित-२६ वर्षके क्षमें भी 1 के लोग हैं और सर्वाङ्गीण में ही विवाह करते थे । रोमन अत्यन्त बाल्यावस्था ते उत्तम सैनिक शासकों की सृष्टि की - बाल्य में थे । यही प्रथा हिब्रू लोगों में भी प्रचलित थी । सुग्रर्ट सके समय तक बालविवाह प्र विवाह ही राष्ट्रोंको अशक्त करनेका एकमात्र कारण हासमें यूनान, रोम तथा हिब्रू जातियोंका इतना गड़ता ' ( २०६-२०७ पृष्ठ ) रिसल तथा गेट नामक दो साहिबोंने सन् गणना के विवरण में ४२३ पृष्ठ में लिखा है -लोग भी- जिन्हों-ही विवाह करते इङ्गलेण्ड में तो होता; तो इति-स्थायी प्रभाव न १ ९ ०१ की मनुष्य-' जिसमे पञ्जावी ऐनकसे सैनिकों का दल कहीं से निकलता देखा है, अथवा ग्रामके करनेपर कुलोंपर स्वस्थ जाट स्त्रियोंको जलसे भरे बड़े - बड़े घड़ोंकी उठाये हैं । इस हुए देखा है, उसके हृदय में यह बात पैदा नहीं हो सकती कि बाल्य-गी; पर विवाहका जातीय स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है, ( दुखी भारत-द्वानोंकी विवाह- २०७ पृ ० ) । ठिकगरण एक अमेरिकन महिला ने भी बालाविवाह स्वीकृत किया था-यह बात १ ९ । ५ । ३७ तिथिके दैनिक, लाहौर के ' हिंदी मिलाप ' के उत्तर-निर्माता ता, बड़े ख उद्धृत पत्रमें देखी जा सकती है । वहां उसने लिखा विवाह किया था; अब भी पूर्ण स्वस्थ हूँ । १४ वर्षकी कन्या स्वस्थ है तो उसके विवाह में नहीं ' इत्यादि । लाहौरके ' शक्ति ' नामक दैनिक पत्रमें १७ था - ' मैंने १३ वे यदि कोई १३-कोई भी हानि । ६ । ३७ तिथिमें कुमारी कौशल्यादेवी कपूरकी सम्मति भी द्रष्टव्य है । वहां उसने CC - 0. Ankur Joshi : Collection Gujarat बाल्य विवाह ७०१ लिखा था - ' हरी टहनीको जिधर चाहें, उधर घुमा दें । परन्तु पक्की शाखा ऐसा करनेसे टूट जाती है, परन्तु झुकती नहीं । यही हाल प्राजकल लड़कियोंका है । वाल्यविवाहसे तो उनके स्वभाव परिस्थिति के अनुकूल हो जाते थे; पर अव परिपक्व अवस्था हो जाने पर और अपनी प्रकृति स्थिर हो जानेपर उन लड़कियोंके स्वभावको परिस्थिति . के अनुसार बदलना कठिन हो जाता है । और वैसे विवाह असफल सिद्ध होते हैं ' | ला ० लाजपतराय - प्रणीत ' दुखी भारत ' पुस्तकके २३५ पृष्ठ-में अमेरिकाके जज श्रीलिण्ड सेसे बनाई हुई पुस्तकके ४१ पृष्ठके अनुसार यह लिखा है- ' हमने अनुसन्धान किया है कि- ३१३ - लड़कियों में २६५ लड़कियां ११-१२ वर्षकी श्रायुमें यौवनावस्था-को प्राप्त हो गई थीं । इनमें भी अधिकांश १२ वर्षकी आयु में ही • युवति हो गई । ३१३ बालिकाओंोंको यदि दो दलों में बांटें; तो - २८५ इस प्रकारकी होंगी- जो ११-१२-१३ वर्षकी श्रायुर्मे हो यौवना हो गई थीं, केवल २८, ऐसी होंगी जिन्होंने १४-१५ वर्षों में ही • यौवन प्राप्त किया ।.. • इस पुस्तक जर्मनी प्रदेशके पूर्वीयभागकी विवरगा ' पुस्तकसे एक उद्धरण सद्धमृत किया गया है । वह यह है कि जब पुरुषसङ्गः करनेकी बालिकाओं में ऐसी प्रवृत्ति है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि — बहुत लोगोंकी यह धारणा हैं कि -१६ वर्षकी आयुके पीछे कोई भी लड़की अक्षत योनि नहीं रहती ' ( पृ. २३५ ) उसी दुखी भारत ' पुस्तकके २३५ पृष्ठमें लिखा है कि- " इस का अर्थ यह हुआ कि - उल्लिखित योरोपियन देशोंकों समस्त बालिकाएँ सोलह वर्षकी श्रायुसे पहले ही युवति हो जाती हैं । कदा--चित्. अधिकांश, इससे भी बहुत काल पूर्व ही यौवन धारण कर लेती हैं । अमरीकाकी स्कूली लड़कियोंके सम्बन्धमें जज लिण्डसेने भी . An eGangotri Initiative

पृष्ठ 368

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७०२ इस प्रकार की बातें कही हैं । ' इस प्रकार २३३ पृष्ठमें भी वहां की १४ वर्षकी अविवाहित - बालिकाओंोंके दुश्चारित्र दिखलाये गये हैं । जब शीतप्रदेशकी ये घटनाएँ है तब इस उष्ण - भारत देश का तो क्या हाल होगा । जब कि इसमें भी पाश्चात्योंका अनुकरण चाहते हुए व्यक्ति अधिकवयस्क - कन्याओं का विवाहनियम बनवाते हैं । समर्थन करती हुई ' कैलोफोनिया ' की सुप्रसिद्ध बाल्यविवाहका महिला लेखिका मिसेज जोजेफ रेबेलोने एक वक्तव्य उपस्थित किया था; उसके अंग्रेजी शब्द ' अनुभूतयोगमाला ' पत्रिका ( १७ । ३ पृ ३८७ ) में देखे जा सकते हैं । बहुतसे पत्रोंमें उसका अनुवाद हुआ था । उसका अभिप्राय यह है - यदि १२-१३ वर्षकी लड़की विवाह करना चाहती है तो उसमें रोक क्यों? मेरा विवाह.. इतनी ही अवस्थामें हुआ । श्राज मुझे उससे कुछ भी पश्चात्ताप न हुआ । प्राज मुझे ३५ वर्ष हो गये हैं । मैंने २१ बालकोंका मातृत्व प्राप्त किया है, जिनमें १६ आज भी जीते हैं और सभी स्वस्थ हैं । मेरी १६ सन्तानोंमें दस लड़कियां हैं, उन्होंने भी मेरा अनुकरण किया; एकने बारहवें वर्षमें विवाह किया, दूसरीने तेरहवें वर्ष में । वे दोनों भी दो बालकोंकी माता बन चुकी हैं । " लण्डन के प्रोवेशन अध्यक्षका निम्नाङ्कित वक्तव्य भी पत्रों में प्रकाशित मिला है । वह यह है - ' यदि सत्य अवस्था लोगोंके प्रागे प्रकट हो, तो पता लगेगा कि इसमें कोई वर्ष खाली नहीं जाता जब कि १३ वर्षको लड़कियां जिनकी संख्या कई शतक होगी- बालकों को पंदा न करती हों । मैं जोरसे कहता हूँ कि बारह वर्षकी लड़-कियां भी प्रतिवर्ष बालकों को पैदा करती हैं । १३-१४ वर्षकी लड़-कियोंको तो में बहुत संख्यामें जानता हूं, जो उस अवस्था में माताए बन चुकी हैं । " CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी विवाह - श्रवस्था ७०३ यह हाल है ठण्डे देशोंका । इस देशमें भी ११ वर्षकी लड़कियों ध का सन्तानोत्पन्न करना सुना जाता है 1 । १६३७-३८ सन्में लायलपुर में ऐसा हुआ था; इस प्रकार बहुत देखा वा सुना जाता है । जो हस्पतालों में १४ वर्षकी विवाहित एवं अविवाहित कुमारियोंक वा प्रसव भी हुआ करते हैं; इस प्रकारको लड़कियां विवाहसे प्रायः भ्रष्ट हो जाती हैं; ग्रथवा अवैध प्रेम करने लग जाती है पूर्व । ऐसा होनेपर जो लोग बड़ी आयु में विवाहोंके कानून बनवाकर अपने धर्म शास्त्रोंपर प्राक्रमरण कर रहे हैं; उन्हें इन परि. स्थितियोंमें हो रहे हुए दुष्परिणामोंके लिए भी सदा तैयार रहना चाहिये । तब तो वैसी लड़कियां विवाह - समयमें गर्भ - युक्त हो कर • आया करेंगी । गर्भिणी - गायके दानकी तरह उनका दान भी फैल देनेवाला माना जायगा । बहुत इतिहास में सीता - उत्तरा आदिकी छोटी आयुके विवाह में भी उनकी सन्तानों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा । यदि छोटी अवस्था में विवाह करनेसे राजयक्ष्मा वा वैधव्यकी प्राशा होती है, तो वादियों से मानी हुई आयु में विवाह होनेपर भी स्त्रियोंमें वही बात देखी गई है । तब यहां पूर्वजन्मके कर्मोंको ही कारण मानना पड़ेगा; अथवा दोनों स्थान अत्यन्त असंयम हो कारण माना जावेगा; छोटी श्रायु में विवाह नहीं । इस कारण अर्वाचीन पुरुषों को उचित है कि वे अपने श्राचरण धर्मशास्त्रसे विरुद्ध न करें! ' फ: १२ वर्षके लगभग कन्याविवाह न करनेसे चित्तकी निरंकु-शता बढ़ने पर चित्त बहुपुरुषभोगभावित होकर एकपतिकत्व-व्रतमें अन्तराय उपस्थित करता है । उसीके फलस्वरूप प्राजकी नारियां हिन्दुकोड बिल पास करानेकी धुन में लगी हुई हैं, जिस के पास होनेपर वह जब चाहेंगी - कोई व्याज बनाकर वर्तमान Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 369

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ७०३ ७०-४ विच्छिन्न कर फिर मनमाने अन्य पतिको प्राप्त कर लड़कियों पतिको । इसमें वही पूर्वोक्त कारण है । जिस कन्याको ध्रुवति हो यलपुर जानेसे सकेंगी इधर कौमार्य में श्रावरण भी न होने से अनेक पुरुष कामभाव । मिशन वा कुंदृष्टिसे देखते हैं; उसके भविष्यत् - पातिवत्य में अवश्य हानि रियों के करती है । मानसिक वा शारीरिक बिजलियों की शक्ति इसे पूर्व हुआ आँखके द्वारा स्पर्श वा मनसे अन्य व्यक्तिमें अपना प्रभाव डाल-आती हैं । कर उसको अभिभूत कर देती है । प्राजकल मैस्मरेजम, न नवाकर परि हिप्नोटिज्म आदि विद्यायोंसे यह बात सिद्ध है । आंखें वा मन शक्तिके आधार होते हैं । इस कारण नेत्र तेज द्वारा वा, मन रहना हो कर द्वारा, सत्त्विक वा तामसिक शक्तिका एक स्थानसे अन्य स्थान-बहुत प्रयोग विज्ञानसिद्ध है । इस सिद्धान्तसे कौमार्यवश अनावृत युवति कन्यानोंके शरीर पर कामी पुरुष कामभावसे हृष्ट हुए उसके पातिव्रत्य धर्मका शनैः शनैः ह्रासकर सकते हैं; क्यों हमें भी कि - ' चक्षुर्मुसलं, काम उलूखलम् ” ( अथर्ववेदसं. ११ । ३ । ३ ) छोटी आंख होती है मूसल, और काम होता है, ऊखल । जैसे ऊखल-होती • मूसलका सम्बन्ध होता है, वैसे प्रांख पूरी मिली कि - काम-स्त्रयों में सञ्चार हुआ । अधिक शक्ति वालेकी आंख कम - शक्ति वाले कारण व्यक्तिको दबा लेती है । विवाह होनेपर उन नारियोंके घरमे ' कारण चीन रने रूप पर्देसे वा अत्रगुण्ठनसे चार प्रांखें साधारणतया नहीं विरुद्ध हो सकती । अतः इस प्रकारको अवस्थाके प्रकटीभावसे पूर्व " ही विवाह विज्ञान - सिद्ध है । विवाहकाला कोई नियत वर्ष बताना इसलिए सम्भव निरंकु. नहीं; क्योंकि- स्त्रियोंके स्त्रीभावक विकेशिका " समय देशकाल-जिंकी कत्व- · पात्रके भेदखे भिन्न हुआ करता है । पर साधारणतः मैथुनी जिस सृष्टिमें दस से बारह वर्ष तक स्त्रीभावका विकाशकाल होता है । मान पहले के युगों में धर्मभावको प्रधानतांसे कभी - कभी कहीं - कही इस अवधिक्रे उत्तरकालमें भी विवाह होते थे, उसका एकमात्र कारण CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामको विवाह - अवस्था या ऋतुकालकी विलम्बसे ७०५ परिस्थितिमें बारहवें प्राप्ति । परन्तु श्राजकलकी - सी भीषरण दृष्टिसे भी युक्त वर्ष में ही कन्या विवाह कर देना लौकिक-श्रादिके युगमें, तथा प्रतीत होता है, क्योंकि आजकल सिनेमा - नाटक काल शीघ्र प्राप्त हो उत्तेजक जाता विशिष्ट वेषभूषादिके समय में ऋतु-होने से ऋतुकालकी है । श्रमैथुन - योनि होनेपर शारीर पुष्ट वर्ष में विवाह हो गया शीघ्रताका था विचार करके श्रीसीताका छठे आविर्भावके । स्वा. द. जी के मत में अमथुन- सृष्टिके का विवाह ही दिन - छठे वर्षकी बात तो दूर रही - प्रत्येक युगल-हो गया था । प्राचीन इतिहास में रजस्वलात्वके बादके कई विवाह कि नीति के ही अनुसार हुए; अथवा गुणवान् आपत्का-अन्वेषणमें लगनेसे हुए - हुए विलम्बके वृत्तिमान् मर्ताके दाताके ही न होनेसे कहीं - कहीं नियत कारण हुए; वा कन्या-हो जाया करते थे; मनुस्मृ ० ( ८ ९ ) । पर विवाह - विधिसे लेट भी जा सकता । रजोधर्म द्वारा स्त्री उसे विधि नहीं माना जाती है । रज पुष्प होता है, पुष्पका गर्भधारण योग्य सूचित की कर रहा होता है । पुष्परूप रजोधर्म होना प्रकृतिकी फलप्राप्तिको सूचित विशिष्ट प्रेरणा हुआ करती है । इसीलिए ही ऋतुकालमें स्त्रियोंकी काम - चेष्टा बलवान् हो जाया करती है-' जायेव पत्ये उशती सुवासाः ' ( ऋ १०।७१ मन्त्रका पाद यही सूचित करता है । ' मलवद्वासाः । ४ ) यह का प्रतिद्वन्द्वी ' सुवासा: ' ( ऋतुस्नाता ) शब्द लड़कीके ' ( रजस्वला ) त्व- कामचेष्टावत्त्वको बता रहा है । इसी कारण १२ ' उशती'- वर्षके बादकी इस अवस्थामें कुमारियोंमें अधिक चञ्चलता हो जाती है । इसी प्रवृत्तिको केन्द्रीकृत करनेके लिए शास्त्रोंमें रजोधर्मके स. घ. ४४ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 370

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७०६ पूर्व हो पतिनिकटता अर्थात् विवाहको प्राज्ञा निर्दिष्ट-प्रारम्भसे की गई है । रजःकाल के देशभेदवश भिन्न - भिन्न समय होने के कारण सात-वर्ष से लेकर बारह तक, कहीं अधिकाधिक सोलह वर्ष तक आठ वचन मिलते हैं । यदि इस प्रकारके अवसरसे पहले कन्या विवाह न किया किया जाय; तो प्राकृतिक कामेच्छाका अव-ही विवाह अपेक्षा प्राठ गुणा अधिक काम लम्बन प्राप्त करके पुरुषकी इधर - उधर घूमकर ( क्योंकि - कुमारीको वाली होनेसे लड़की होती है ) - अपने सतीत्वधर्म में हानि पिताके घर प्रायः स्वतन्त्रता निर्देश इसमें मिलते हैं-प्राप्त कर सकती है, जैसेकि वेदादिके जारमिव प्रियम् ' ' जारं न कन्या ' ( ऋ ० सं ०६ । ५६ । ३ ) ' योषा । ३२ । ५ ) जारिणीव ' ( ऋ ० १० । ३४ । ५ ) ' स्त्रिया ( ऋ ० मनः ' ( ऋ ० ८ । ३३ । १७ ) ' प्रायः स्त्रियोंका स्वभाव अशास्यं मृदु होता है ' ( सत्यार्थ प्र ० पृ ० ४७ ) जिस हेतु तीक्ष्ण और वाले बहुत पुरुष होते हैं; इस हेतु उन्हें कभी स्त्रियोंको बहकाने उचित नहीं ( ऋ ० ४ । ५ । ५ ) मन्त्रके श्राशय में स्वतन्त्र छोड़ना ' वेदामृत ' ( प्र. सं. ३५४ आर्यसमाजी श्रीशिवशंकरकाव्यतीथं-पृष्ठ ) में । स्त्री - प्रकृति में चञ्चलताके कारण अविद्याभावका विकाश अधिक हुआ करता है, अतः स्त्री वैसे थोड़े भी अवसरको प्राप्त करके उसी भावमें लग जाती है । फिर उसका कुमार्गसे हटाना प्रतिकठिन होता है, क्योंकि - प्रत्येक कार्य में सीमाका उल्लङ्घन कर देना ही स्त्रियोंकी प्रकृति होती है, इसके साक्षी समाचारपत्र ' हैं । सतीत्वधर्मका पालन न करनेपर स्त्रीका अस्तित्व ही व्यथं है । इस लिए जिन कारणोंसे स्त्रीके सतीत्वमें थोड़े भी प्रहार-की सम्भावना हो; उन्हें झट हटाकर स्त्रीको विवाह बन्धनमें CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीताकी विवाहायु ७०८ ७०७ कर देना चाहिये, जिससे वह प्रावरण में रहे और उसकी परस्पर तन्त्रता न रहे । स्व-जब कि साधारणदशामें ही इन्द्रियदमन श्रुतिकठिन होता है, उसीमें फिर प्रकृतिद्वारा रजोधर्म के विकाश हो जानेपर रात चर्यं धारण करना श्रुतिकठिन होता है । विवाह न करनेसे श्रनेक ब्रह्म- पुरुष पुरुषोंमें उसके चित्तको चञ्चलतावश व्यभिचार - दोष बढ़ सकता ( भैंस त है । रजस्वलात्व होनेपर स्त्री पुरुषका योग चाहती है । तब यदि भैंसा क उसका अन्तःकरण रक्षित नहीं होगा; तो उसके चित्तमें श्रनेक- कष्ट पुरुषों की छाया स्वतः पड़ेगी । तब विवाहसे पूर्व ही यदि कोई तो क्या परपुरुष मिल गया; क्योंकि वैसी लड़कीको वे भांप जाते हैं; तव पर सतीत्वधर्म की हानि हो सकती है । तब उसे कौन विवाहेगा? में भावि ' ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् । ( ११ । ५ । १८ ) कामचेष्ट ब्रह्मचारिणीसे ही युवक विवाह करना चाहता है, परपुरुषगा- प्र. पू. मिनीसे नहीं । अथवा यदि कोई वैसी पुरुषको न भी प्राप्त कर कारणो सके; तब अप्राकृतिक ' लैदर ' श्रादिका उपयोग करके अपनी का अव शारीरिक बड़ी हानि भविष्य के लिए कर लिया करती है; जिससे | सर नहीं भावी पतिको भी हानि पहुँच सकती है । जाता ह इसके अतिरिक्त पूर्ण यौवनमें स्त्रीके विवाह कर देनेपर उस- द्वितीया की चित्तकी मृदुता हट जानेसे उस समय उसकी प्रकृति बहुत पुरु क्रम क्रम -के भावसे भावित होती है; तब एक पति में स्थिरता रहनी बहुत होती; व कठिन हो जाती है । पिताके घर में स्वतन्त्रता अधिक हो जाती है; जाता है अधिक आयुमें भी उसका अभ्यास बना रहता है; तब पति शीघ्र ही अधीन रहना वा लज्जाशील होना अत्यन्त कठिन हो जाता है । देती है-छोटी में विवाहित तो स्वयं भी संयमवती होती है; पुरुषको है - ' नि भी तब संयम करना ही पड़ता है । इस प्रकार संयम के अभ्यास शक्तिं, होनेपर स्वास्थ्यको वृद्धि भी होती है, अधीरता नष्ट हो जाती है, लोक ) Gujarat. An eGangotri Initiative