सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 371–380

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७०७ ७०८ ममता भी बढ़ती है । तब पूर्वके संयम के अभ्यास से स्त्री-इसकी स्व- | परस्पर दिनोंमें भी पति संयम कर सकता है । नहीं तो प्रारम्भ-| के कटके पूर्ण यौवनवती के साथ यदि विवाह हुआ; तो वह तो दिन-ठिन होता से ही विषय चाहती है; तब उससे दिनरात लगा हुआ वह परब्रह्म- रात उसके कष्टमें भी ' महिषी प्रसवोन्मुखी, महिषो मदनातुरः ' नेसे अनेक | पुरुष ( भैंस तो प्रसूता होना चाहती है; और कष्ट पा रही है; और बढ़ सकता सा कामसे आतुर हो रहा है ) इस न्यायसे पुरुष, और पुरुषके | तब यदि हमें स्त्री दोनों संयम न कर सकनेसे अन्यत्र गति करेंगे, फिर अनेक- तो क्या - क्या हानियां नहीं होंगी? यदि कोई ते हैं; तव पूर्ण - यौवनमें कन्याका विवाह होनेपर वह बहुपुरुषोंके भाव-हेगा? में भावित होकर सर्वथा इसी चिन्ता में रहती हुई " स्त्री - पुरुषकी ५।१५ ) कामचेष्टा तुल्य अथवा पुरुषसे स्त्रीकी अधिक होती है ' ( सत्यार्थ-पुरुषगा. प्र. पू. २३६ ) ' कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ' ( चाणक्य १ । १७ ) इन प्राप्त कारणों से वह प्राती हुई ही कामिनी बनी हुई पुरुषको विश्राम-के अपनी का अवसर ही नहीं देती । वा पुरुष स्त्रीको विश्राम लेनेका नव-है; जिससे | सर नहीं देता; जिससे दोनोंका स्वास्थ्य बहुत शीघ्र क्षीण हो जाता है । श्राजकल टी. बी. की बहुतायत में यही कारण है । नेपर उस द्वितीयाके चन्द्रमाकी इसलिए उपासना की जाती है कि वह आगे बहुत पुरु क्रम - क्रमसे बढ़ता है, परन्तु पूरिंगमाके चन्द्रमाकी उपासना नहीं रहनी बहुत होती; क्योंकि - पूर्ण होनेसे उसका क्षय बहुत शीघ्र प्रारम्भ हो 7 जाती है; जाता है । यही पूर्ण यौवनकी व्यवस्था होती है । पूर्णयौवनवती तव पतिके शीघ्र ही शीर्ण हो जाती है, और पतिको भी शीघ्र शीर्णं कर जाता है । देती है - इसलिए आयुर्वेद के ग्रन्थ ' भावप्रकाश ' में कहा गया पुरुषको है- ' नित्यं बाला सेव्यमाना नित्यं वर्धयते बलम् । तरुणी ह्रासयेत् के अभ्यास शक्तिं, प्रौढोद्भावयतेजराम् ' ( पूर्वखण्ड ऋतुप्रकरण २७६ हो जाती है, स्लोक ) । ' तरुणी ह्रासयेत् शक्तिम् ' का भाव है कि वह असंयत बाल्यविवाहपर विचार ७०६ होनेसे शुक्रका बहुत ग्राकर्षरण करती है । तब पुरुष अपना पौरुष सिद्ध करने के लिए मद्य, मांस, ग्रण्डे, तीतरोंके शोरवे, सण्डेका तेल आदिका उपयोग करते हैं, जिनसे परिणाममें बहुत हानि हुआ करती है । वैसी स्त्री प्रातः के पहरको बिताकर शय्या छोड़ती है, और फिर दो पहर तक तिरछी मांग वना, मुहमें पाउडर लगा, बार-बार शीशे में मुंह देख, कई तरह की ड्रैसें पहर इस प्रकार अपने सजानेमें लगी रहती है । घरके झाड़ने बुहारने के लिए कही हुई भृकुटी करतीं हुई, प्रांखें लाल करके अपनी अप्रतिष्ठा दिखलाती है । भोगविलासमें लगी अधीर हुई हुई वह अन्तमें पतिके राज-यक्ष्माका कारण बनती है । बहुत समय तक बन्धी हुई नदीका वेग महान् तीव्र होता है, वह तो सीमाको भी लांघ कर बड़ी हानि करता है - यह प्रत्यक्ष है । पूर्ण युवावस्था तक अविवाहित कुमारी भी वैसी नदोकी तरह होती है; और युवक तब तक अपने ग्रापको खाली कर बैठता है 1 । न बची हुई नदीका यदि धीमा - धीमा उपयोग किया जावे; तो भावी हानि नहीं हो पाती । जिन देशोंमें अधिक वयमें विवाह हुआ करता है; उन्हीं देशों में विवाह - बन्धन भी ढीला होता है; अन्धे अनुराग के कारण दम्प-तियोंका प्रेम भी चिरस्थायी नहीं होता; अतः वह ग्रन्तमें विवा-होच्छेद ( तलाक ) का कारण बनता है । एतदादिक बहुत कारणोंसे अधिक प्रयुमें कन्या विवाह होनेपर संसारमें नित्य अशान्ति, दम्पतियोंका कलह, दुराचार आदि सभी दुर्गुण प्रारम्भ हो जाते हैं । हों इसका अपवाद कई सदाचारिणी स्त्रियां; पर उत्सगं ( सामान्यशास्त्र ) वही होगा, जो हमने बताया है; अधिक अवस्थामें विवाहको पक्षपातिनी यूरोप वा अमेरिका प्रादिकी कुमारियोंको देखिये, जो विवाहसे पूर्व ही CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 372

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७१० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) कई प्रसव कर बैठती हैं; श्रथवा भ्रूणहत्याएं करा लेती है । उस देश में वैसे गुप्त धात्री भवन भी हैं; एतदर्थ ' लण्डन - रहस्य ' नामक श्री-रिनाल्डकृत उपन्यास देखिये । अथवा वैसी कुमारियां ' वूमन ' -ण्ड'का सेवन करती हैं; अथवा आगे ' विवाह विच्छेद ' करती है । आजके सुधारक भी यदि कुमारियोंकी भ्र ूणहत्याएं, अथवा कई गर्भो के बाद विवाह, वूमनफ'ड ' के सेवन से होनेवाली भवि-यत् आन्तरिक हानियों वा तलाकों ( विवाहोच्छेदों ), वा विवाहसे पूर्व एक लड़की अक्षतयोनि न रहे, यदि यह चाहते हैं, अथवा इसी को वैदिक धर्म वा उन्नति समझते हैं; तो अपनी इच्छाएं पूर्ण करें, परन्तु दूसरोंकी हानियां तो न करें करावें! वैसी युवति - कुमारियोंको विद्यालयोंकी दीवारें वा गुरुकुलोंके अधिकारी भी नहीं रोक सकते । कन्याविद्यालयोंके रह-स्योंको प्रायः सभी जानते हैं, वे गर्लस्कूल होकर वस्तुतः ' गरल-( विष ) स्कूल ' हैं । वस्तुत: ' पतिसेवा गुरौ वासः ( मनु ० २ । ६७ ) उनका पतिसेवन ही गुरुकुलवास होता है । १२ वर्षमें कुमारीका विवाह होनेपर पतिकी निकटतावश ऋतुकालमें ' पतियोग होनेपर सभी हानियां हट सकती हैं । बाल्यमें शुद्ध कोमल चित्त में रूढ-मूल हुआ स्वाभाविक सीता - जैसा प्रेम कई रावणोंके मिलनेपर भी कभी - भी ढीला नहीं होता; परन्तु पूर्ण - यौवनमें भोग - तृष्णासे उत्पन्न प्रेम एकमें स्थिर नहीं होता । उसका परिणाम सुख जनक नहीं होता; वह प्रवेश ' सोडावाटर ' के उद्गमकी भान्ति " अचिरस्थायी होता है । उस समय पतिवियोगमें रावणके मिल जानेपर प्राजकलकी युवतिर्या उससे घुल - मिल जाती हैं । यह सभी-कुछ सूक्ष्म दृष्टिसे देखकर ही त्रिकालदर्शी हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियोंने छोटी आयुमें कुमारियोंकी विवाहावस्थाका निर्धार किया था; परन्तु अपने - आपको बुद्धिमान् मानने वाले प्राजकल-CC - 0. Ankur Joshi श्रीसीतारामकी विवाहायु के सुधारकाभास तो उनकी उस त्रिकालाबाधित ७११ ७१२ www रीतिको पांवसे ठुकराते हैं; फिर उनके दुष्परिणाम प्राचीन नीति- भेद समय पर निकलते रहते हैं 1 । अपने आश्रयभूत भी तो समय- जार हुए प्राश्रयाश ( अग्नि ) बने हुए यह स्वयं ही बुझ धर्मको जाएंगे जलाते । इन्हीं प्राशङ्कित - हानियों को दूर करनेके लिए ' मर्त्यावतार- भी प्र स्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ' ( देवीभाग संस्कृ १०।१५ ) मर्त्यशिक्षरणार्थ ग्रवतीगं हुए मर्यादापुरुषोत्तम ०८ । हैं कि रामने छोटी आयु में विवाह किया । यहां छः वर्षकी श्रीसीता- पर व विवाहसे छः वर्षमें कन्याका विवाह तात्पर्यका विषय श्रीसीता के न होकर ऋतुकालसे कुछ पूर्व ही कन्या विवाहावस्था प्रतिफलित होती है, यह हम पूर्व बता चुके हैं । अब इस दीर्घ निबन्धसे श्रीसीताराम - भी की सिद्ध की हुई विवाहकालीन अवस्था शास्त्रीय दृष्टिसे ऐतिहासिक दृष्टि से, व्यावहारिक दृष्टिसे तथा युगदृष्टिकोणसे तथा द्रोपद सर्वविध दृष्टिसे शुद्ध ही सिद्ध हुई । इस छोटी आयु में विवाहित, परिष स्त्रियोंके भी लड़के बहुत गुरणी देखे गये हैं; इस विषय में सम्भवतः शास्त्र अल्प पुष्पमें निबन्ध दिया जा सकेगा । यह निवेदन करके हम लोगो इस निबन्धको यहीं रोकते हैं । प्राशा है - निष्पक्ष ' आलोक'-पाठक दूरदर्शितासे इसका तात्पर्य समझने का प्रयास करेंगे | अब गुणो द्रौपदीका पति एक था वा पांच थे - इसपर विचार होगा- पाठ- है । कगरण सावधानता से देखें । हुना ( १३ ) द्रौपदीका एक पति था या पांच? आघ ' ऐतिहासिक - चर्चा ' में ' आलोक ' - पाठक रामायणमें श्रीसीता- को रामकी वैवाहिक प्रायु, पर विचार स्पष्टतासे देख चुके, अब महाभारत में ' द्रौपदीके पांच पति थे या एक ' इस विषय पर विचार देखें । महाभारतमें यह उल्लेख है कि द्रौपदी पाँचों पाण्डवों की पत्नी थी । पर इस विषय में विभिन्न- विचारकों में बड़ा मत-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 373

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७११ ७१२ न इस सम्बन्धमें ' आलोक ' में कुछ विवेचन दिया नीति- भेद है | अतएव तो समय- जा रहा है । 1 जलाते कई पाश्चात्य - संस्कृति से प्रभावित, पर हिन्दु प्राच्य - संस्कृतिसे 1 भी प्रेम रखनेवाले महाशय, पाश्चात्योंके समक्ष अपनी प्राच्य-यवतार- अपने परिष्कृत प्रकारोंसे इस प्रकार उपस्थित करते भागन्दा है संस्कृतिको कि उन पाश्चात्योंकी हमारी पौरस्त्य - संस्कृतिपर श्रद्धा बढ़े । श्रीसीता- पर वे उनके स्वपरिष्कृत प्रकार अमौलिक होनेसे हमारे शास्त्र श्री सीता के और इतिहासको सर्वथा विरूप कर दिया करते हैं । हम चाहते हैं न होकर कि ऐसे परिष्कार उनमें किये जायँ कि ' साँप भी मर जाय, लाठी होती है, भी न टूटे ' । ताराम- आज हम उन्हीं पाश्चात्त्य संस्कृति से प्रभावित महाशयोंका से तथा द्रौपदीविषयक आख्यानपर उसके एकपतिकत्वार्थ किया हुआ कोणसे, परिष्कार - प्रकार उपस्थित करते हैं । उनके अनन्तर हम उसपर विवाहित शास्त्राऽविरोधपूर्वक उसके एकपतिकत्वका प्रकार लिखेंगे । उन सम्भवतः लोगोंका कथन प्रायः यह है -के हम लोक'- पूर्वपक्ष - " परमात्मा तथा प्रकृतिकी कृति विचित्र है । प्रकृतिके | अब गुणोंकी विचित्रतासे हो जीवके स्वभावकी विचित्रता भी नैसर्गिक -पाठ- है । अपनी - अपनी प्रकृति के अनुसार सब वैसे - वैसे कार्यों में व्याप्त हुआ करते हैं । तब किसने, कब, कैसे, क्या किया, यह बात बिना आधार किसीके द्वारा सहसा नहीं जानी जा सकती । उसी ग्राधार-को प्रामाणिक विद्वान् ' इतिहास ' शब्द से कहा करते हैं । प्रका सीता- प्राचीनतम पुरावृत्त ॠग्वेद में मिलता है, उसके बाद ' रामायण ” फिर ' महाभारत ' में मिलता है - यह सब लोग निर्विवाद मानते षय पर ही हैं । परन्तु वर्तमान - काल में ' महाभारत ' जिस रूपमें उपलब्ध पाण्डवों है, उसमें ऐसे न माननेयोग्य उपाख्यान वरिंगत किये गये हैं कि वे ड़ा मत- प्रायौकी रीति, व्यवहार तथा धर्म श्रादिमें भारतीयों तथा पाश्चा-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. द्रौपदी अर्जुन की ही पत्नी ७१३ त्योंके मनमें संदेह उत्पन्न कर दिया करते हैं । बहुत क्या कहा जाय? वे - ' एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ' ॥ ( मनु ० २ । २० ) - ( पृथिवी - मण्डलमें सभी लोग इस ब्रह्मर्षिदेशमें उत्पन्न ब्राह्मणसे अपना - अपना चरित्र सीखें ) इस मनुकी उक्तिको भी खण्डित करवा दिया करते हैं । पाठकगरण पहले प्रातःस्मरणीय द्रौपदीके पंचपतित्वको ही देखें-- पतिव्रता वीराङ्गना द्रौपदी तथा संसारविश्रुत धर्मप्राण पाण्डवोंके चरित्रोंको - ' कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्रौ प्रोवाच भुड्. क्तेति समेत्य सर्वे ' । ( महा ० १ । १८५ । २ ) इत्यादि पद्यके साधाररण अर्थको भी न जाननेवाले लोगोंने दूषित कर दिया है, इसमें विद्वान् ही प्रमारण हैं । वस्तुतः द्रौपदी अर्जुनकी ही पत्नी थी, अर्जुनने ही स्वयंवरमें लक्ष्य वेधकर प्रतिज्ञानुसार द्रौपदीका वरण किया था । उसने भी अर्जुनको ही जयमालासे अलंकृत किया था । द्रुपदकी इच्छा भी द्रौपदी अर्जुनको ही देनेकी यो, जैसे कि ' महाभारत ' में कहा गया है- ' यज्ञसेनस्य कामस्तु पाण्डवाय किरीटिने । कृष्णां दद्यामिति सदा न चैतद् विवृणोति सः ' ॥ ( १ । १८१ । ८ ) इसीलिए द्रुपदके मनोरथको जानकर युधिष्ठिरने धनुषसे लक्ष्यको नहीं वींधा, नहीं तो वे भी समर्थ तथा ज्येष्ठ होनेसे अधिकारी थे । तभी युधिष्ठिरने अर्जुनसे ही द्रौपदी के साथ विवाहार्थं कहा था-' त्वया जिता फाल्गुन! याज्ञसेनी- | प्रज्वाल्यतां हूयतं चैव वह्निगृहाण पारिंग विधिवत् त्वमस्याः ॥ ( १ । १८५ । ७ ) ( ' अर्जुन! तुमने द्रौपदीको जीता है । तुम अग्नि प्रज्वलित करो; और विधिपूर्वक इस राजकन्याका पाणिग्रहरण करों ) ' माता कुन्ती के वचनसे द्रौपदी पांचों पाण्डवों की पत्नी बनी-An eGangotri Initiative

पृष्ठ 374

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७१४ यह बड़ा आश्चर्य है । जब कि माताकी वैसी इच्छा नहीं थी, तब ऐसा होना कैसे संगत हो सकता है? भीमसेन तथा अर्जुन-ने, द्रौपदीके लिए कुन्तीसे कहा था कि- ' मातः! हम भिक्षा लाये हैं, यह बात भी नहीं घट सकती । द्रौपदीको तो प्रतियोगिता में जीता गया था, भिक्षाकी तरह मांगा नहीं गया था, तब धर्मभीरु तथा सत्यवादी अर्जुन भीमसेन द्रौपदीको झूठ - मूठ ' भिक्षा ' कैसे कह सकते थे - यह बात विद्वानोंको सोचनी चाहिये । ' तो इसमें क्या रहस्य है? ' मातृदेवो भव ' यह वैदिक प्रदेश है । ' प्रोवाच भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे ' यह माताका वचन भी श्रवश्य- कर्तव्य है । माताका आदेश यदि पाण्डव न मानें, तब भो प्रत्यवाय है, यदि उसे पालें, तो अभूतपूर्वं धर्मसंकट है । इधर व्याघ्र है, उधर नदी है । इस उभयतःपाशा - रज्जुने अल्पज्ञ तथा यथार्थताको न जाननेवालोंको मोहमें डाल दिया, जिससे उन्होंने मूल - इतिहासमें कई काल्पनिक भाव निविष्ट कर दिये । ' केवल भारतवर्ष में ही स्त्रीका बहुपतित्व निन्दित नहीं, अपि-तु अन्य देशों में भी निन्दित है । तब युधिष्ठिर - आदिमें श्रीव्यास के वाक्योंमें एवं तात्कालिक सामाजिक रीतियोंमें वैसी सम्भावना नहीं हो सकती । तात्कालिक - इतिहाससे भी स्त्रीका बहुपतित्व वा पाञ्चपतित्व सिद्ध नहीं होता । ब्राह्मरण - भागके प्रवचनके बाद महाभारतका उपाख्यान संकलित किया गया । ब्राह्मणग्रन्थोंमें स्त्रियोंके बहुपतित्वका निषेध तथा कारणवश पुरुषकी बहुत पत्नियों का विधान स्पष्ट तथा सहेतुक प्रतिपादित किया गया है । जैसे कि-‘ ऋक् च वा इदमग्रे, साम च आस्ताम् ' सैव ' नाम ऋगा-सीत् ' श्रमो ' नाम साम । सा वा ऋक् साम उपावदत् मिथुनं CC - 0. Ankur Joshi द्रौपदी अर्जुन की ही पत्नी ७१५ ७ सम्भवाव प्रजात्या इति ' साम वा ऋचः पतिः ( शतपथ १ । ३ । ५ ) ० ८ । एत न इत्यब्रवीत् साम, ज्यायान् वा अतो मम महिमा - इति ।... तस्माद् एकस्य बहुव्यो जाया भवन्ति, नेकस्या बहवः सहपतयः द्रोप ( गोपथ ब्राह्मण ३ । २०, ऐतरेय ब्रा ० ३ । २३ ) । अन्त यहांपर सामका तीन ऋचाओं से विवाह - सा बताया गया है, परन्तु एक स्त्रीके बहुपतित्वका निषेध किया गया है । यह द्रौपदीका पञ्चपतित्वका उपाख्यान सर्वथा काल्पनिक प्रतीत होता है । इसीलिए पांच इन्द्रोंकी कथाका वर्णन, शिवद्वारा पांच पतियोंका वर देनारूप उपाख्यान, बहुत पतियोंवाली स्या नालायनी आदिका चरित्ररूप दृष्टान्त, युधिष्ठिर श्रादिके द्रौपदीसे एक - एक पुत्रकी उत्पत्ति का वर्णन किया गया है, पर यह सब श्रवैयासिक, अभारतीय एवं प्रधार्मिक है - यह निस्संशय है । इससे महाभारतीय सारा ही उक्त उपाख्यान असत्य नहीं है, केवल शब्दोंका अर्थ ठीक - ठीक जाननेका यत्न नहीं किया गया । जैसे आजकल भी कोई अर्थानभिज्ञ व्यक्ति ' स्वसुर्जारः शृणोतु नः'-( ऋ ० ६ । ५५ । ५ ), स्वसुर्यो जार उच्यते ' ( ऋ ० ६ । ५५ । ४ ) प्रजापतिः स्वदुहितृभ्यां दुराचचार ' ब्राह्मणभाग तथा पुराणों में उषा - सूर्यका सभापति - सभासमिति स्वरूप अथं न जानते हुए बहिन- सा उपपति, ब्रह्मा, उसकी लड़की - ऐसा प्रथं करते हुए स्वयं भी भ्रांत कर रहते हैं, दूसरोंको भी भ्रममें डालते हैं, वैसे ही - ' प्रोवाच भुङ्- इस क्तेति समेत्य सर्वे ' यहांपर भी भुज धातु पालनार्थक है, उप- नही भोगार्थक नहीं । ' तुम सब मिलकर इस द्रौपदी रूप गृह - लक्ष्मी-की पालना करो । ' यही कुन्तीका अभिप्राय था, जिसे आजकल ग्रा के लोग नहीं समझ सके । ' भुङ्क्त ' पद परस्मैपदका प्रयोग है, परस्मैपदमें पालन अर्थ होता है, उपभोग नहीं । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 375

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७१५ ७१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ०८ एतद् रूपं यत् पत्न्यः ( तै ० ब्रा ० ३ । ६ । ४ । ७ ) यहांपर पत्नीको । - लक्ष्मी माना गया है । ' पा रक्षणे ' धातुसे डति प्रत्ययमें गृह व ।.. निष्पन्न पति - शब्द भी पालनार्थक ही है, तब पांचों पाण्डवोंने पतयः द्रौपदीका पतित्व - पालन स्वीकृत किया और माताका वचन । धन्त तक पाला । है, कई महोदय ' पतयो ह्य व स्त्रियै प्रतिष्ठा ' ( शतपथ ब्रा ० २ । ' तब ६ । २ । १४ ) यहां पर ' पतय: ' में बहुवचन देखकर बहुपतित्व मानते व्यतिक हों, यह भी ठीक नहीं । ' जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमभ्यतर-वद्वारा स्याम् ( पा ० १ । २ । ५८ ) इस सूत्र से उक्त स्थल में ' पति ' शब्दमें वाली बहुवचन जात्यभिप्रायसे है, व्यक्त्यभिप्रायसे नहीं । वस्तुत: पदीसे युधिष्ठिर आदि पांचों प्रत्येकमें पांच रूपसे अवस्थित थे । वही ह सब एक ही अर्जुन युद्ध में स्थिर होनेसे ' युधिष्ठिर ' थे, शत्रुकेलिए भया-1 नक होनेसे ' भीम ' थे, नियोगसे उत्पन्न होनेसे कुल न होने हेतु हृीं है, ' नकुल ' थे, कृष्ण - सारथि, जो देव थे, उनसे युक्त होनेसे ' सहदेव ' जैसे । द्रौपदीका पति अकेला वीरवर अर्जुन ही था । यह निर्विवाद है, नः'- शेष सब रावण के दश सिरोंके समान, वा कुम्भकर्णं की छः मास-I ४ ) की नींदके समान रूपक या काल्पनिक है । " ( ' श्री ' । १० । ३-४ ) रणों में उत्तरपक्ष - यह अर्वाचीन विद्वानोंका कथन है । यह कल्पना बहिन • साधारण लोगों की दृष्टि में द्रौपदीको साध्वी या एकपतिका सिद्ध भ्रांत करने के लिए है; इसके लिए हम इसकी स्तुति करते हैं, परन्तु इसका आधार कल्पनामात्र तथा असत्य है, अतएव यह श्रद्धेय - उप- नहीं हो सकती । क्ष्मी. यदि ' किसने कब, क्या, कैसे किया ' इत्यादिको जानने के लिए नकल प्राधार इतिहास है, तो उस विषयमें उसीको पूछना चाहिये; निराधार तथा इतिहासकर्तासे विरुद्ध कल्पना प्रामाणिक कैसे वा हो सकती है? इतिहासस्थित जो नाचरण, वेदादि - शास्त्रोंके CC - 0. Ankur Joshi Collection द्रौपदीका एक पति वा पांच? ७१७ वचन से विरुद्ध हो, वह अवश्य ही अनादरयोग्य तथा प्रनाचरणीय तो हो सकता है, परंतु वेदादिसे विरुद्धता दीखनेपर भी इतिहास परिवर्तन करना कहांतक उपयुक्त हो सकता है? उसी इतिहासमें में धर्मप्रारण युधिष्ठिरको द्यूतक्रीड़ा भी देखी गई है, उसमें ' अक्षेर्मा दीव्य: ' ( ऋ ० १० । ३४ । १३ ) यह वेदविरोध भी है । तो क्या वहां आलङ्कारिकता ही सिद्ध कर दी जाय? ऐसा करनेपर तो इतिहासका रूप ही विरूप हो जायगा, और बड़ी अव्यवस्था हो जायगी । इस प्रकार तो सम्पूर्ण इतिहास ही प्र-लङ्काररूप बन जायगा, जैसा कि कई पाश्चात्त्य और पाश्चात्त्य-भावावेशित भारतीय विद्वान् बनाया करते हैं । वस्तुत: जैसे व्याकरण में उदाहरण और प्रत्युदाहरण भी हुआ करते हैं, उत्सगं और अपवाद भी हुआ करते हैं, वैसे ही वेदके भाष्यरूप पुराणेतिहास में भी वेदादिके सिद्धान्तोंके उदाहरण - प्रत्युदाहरण तथा उत्सर्ग एवं अपवाद भी हुआ करते हैं । तभी तो ' गौतमधर्मसूत्र ' में कहा गया है - ' दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च पूर्वेषाम् । न तु दृष्टोऽर्थो वरो दौर्बल्यात् ॥ ' ( १ । २ ) इसी प्रकार ' आपस्तम्बधर्मसूत्र ' में भी कहा गया है- ' दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च पूर्वेषाम् ' ( २ । १३ । ७ ), ' तेषां तेजो-विशेषेण प्रत्यवायो न विद्यते ' ( २ । १३ । ८ ), ' तदन्वीक्ष्य प्रयुञ्जानः सीदत्यवरः ' ( २ । १३ । ६ ) । इतिहास श्राचरण के लिए सर्वथा श्रादर्श नहीं हुआ करता । इसीलिए इतिहास देखकर अपना आचरण नहीं बनाया जा सकता । श्राचररणका निर्मारण तो धर्मशास्त्रका अनुसरण करके ही किया जाता है । इतिहास तो मुख्यतः लोकमें घटी घटनाओंका वर्णन प्रस्तुत करता है, लोकव्यवहार - व्यवस्था धर्मशास्त्र के अधीन रहा करती है । इसी-लिए न्यायदर्शन में कहा गया है- ' यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य ( वेदस्य ), Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 376

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ७१८ लोकवृत्तम् इतिहासपुराणस्य । लोकव्यवहारव्यवस्थापनं धर्मशा-स्त्रस्य विषयः । तत्र एकेन न सर्वं व्यवस्थाप्यते इति यथाविषयम् एतानि प्रमाणानि इन्द्रियादिवत् ' इति ( ४ । १ । ६२ ) । इसी-लिए ' वेद: स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ' ( मनु ० २ । १२ ) यहाँ पर सत्पुरुषोंके प्राचारको तीसरे पदमें रखा गया है । धर्मलक्षरणमें पूर्व - पूर्व ही पर - परकी अपेक्षा बलवान् होता है । अतः अर्वाचीन - विद्वानोंका यह प्रयास व्यर्थ है । तथापि उनसे उपक्षिप्त विषयपर भी विचार किया जाता है । वे लोग - ' कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्रौ प्रोवाच भुङ्क् ति समेत्य सर्वे ( १ । १६३ 1 २ ) इस पद्यमें ' भुज् ' धातुको परस्मैपद देखकर केवल उसके प्राधार-पर कल्पनाका महल खड़ा करते हैं, परंतु उसका मूल शिथिल है, इसीलिए उस कल्पनाप्रासादको पाठकगरण शीघ्र ही गिरता देखेंगे । उनका अभिप्राय यह है कि - ' कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्रौ प्रोवाच भुङ्क्ते ति समेत्य सर्वे ' यहांपर ' भुङ्क्त ' यह परस्मैपद है । ' भुजोऽनवने ' ( पा ० १ । ३ । ६६ ) इस पाणिनिके सूत्र से ' पालन ' अर्थ में ही परस्मैपद होता है, खाने तथा उपभोग अर्थ में तो प्रात्मनेपद होता है । जैसे कि ' वृद्धो जनो दुःखशतानि भुङ्क्त " यहां पर ' भुज् ' धातुका आत्मनेपदमें उपभोग अर्थ है । ' ओदनं भुङ्क्त " यहां पर खाना अर्थ है, इस कारण दोनों स्थलोंमें आत्मनेपद हुआ है, परंतु ' महीं भुनक्ति ' इस परस्मैपदमें तो भुज् घातु का पालन अर्थ है, इस प्रकार प्रकृत ' महाभारतके ' पद्य में भो ' भुङ्क्ङ्क ' यह परस्मैपदमें लोट्के पुमध्यम- पुरुषके बहुवचनका प्रयोग है । तब कुन्तीका यह अभिप्राय था कि ' तुम सब मिलकर इस द्रौपदीरूप गृहलक्ष्मीको ' भुङ्क्त ' प्रर्थात् पालो, उसकी रक्षा करो । यहां उपभोग अर्थं नहीं हो सकता, अन्यथा CC - 0. Ankur मु Joshi Collection द्रौपदीका एक पति वा पांच? ७१६ ७२० इस प्रकार प्रात्मनेपद होना चाहिये था । इस आशयपर हम विचार करते हैं । श्रीपाणिनिने अपनी ‘ अष्टाध्यायी ’ तथा ‘ गणपाठ ' में उनके सहपाठी श्रीकात्यायनने न्यून अपने वार्तिकपाठमें जहां - तहां व्यास, शुक ( ४ । ३ । ९ ७ ) काल वासुदेव, अर्जुन ( ४ । ३ । ६८ ), युधिष्ठिर ( ८ । ३६५ ), प्रका साम्ब, गद, प्रद्युम्न, राम ( ४। १ । ६६ ), श्रनिरुद्ध होते, सहदेव ( ४ । १ । ११४ ) प्रादि महाभारतीय पात्रोंका, नकुल नाम-, ' ग्रहण किया है । महान् भारभारत ( ६ । २ । ३८ ) इस प ' महा सूत्रमें महाभारतका भी स्पष्ट नाम लिया है । इससे सकत सिद्ध होता है कि वेदव्यास आदि पाणिनिसे पूर्वकालीन थे । भगव इसके अतिरिक्त पाणिनीय व्याकरण से पूर्व भी अन्य व्याकरण चस थे, यह बात अष्टाध्यायी में उपलभ्यमान गार्ग्य, शाकटायन आदि नामोंसे जानी जाती है । पदा इससे स्पष्ट है कि अन्य व्याकरण में पाणिनिसे विरुद्ध प्रयोग अक भी सम्भव हैं । इस प्रकार परिणनिसे पूर्वकालीन मुनियोंकी पुस्तकों में भी अपाणिनीय प्रयोग हो सकते हैं, यह स्वाभाविक है । वे प्रयोग शुद्ध नहीं माने जाते; किंतु यदि कोई अपाणिनीय-प्रयोग पाणिनि से अनुकूल न दिखाई पड़े तो वहाँ प्रार्ष मानकर उसका समाधान कर देना पड़ता है । परंतु जहां पाणिनिसे पूर्वोत्पन्न किसीके ग्रन्थ में बहुत स्थलों पर पाणिनिसे विरुद्ध प्रयोग दिखलाई पड़े, तो वहां अनुमान करना पड़ता है तब पर पाणिनि से भिन्न कोई व्याकरण रहा हो, जहाँ पारिणनिका वह नियम स्वीकृत न किया गया हो, अथवा वहां अनियम कर दिया कार गया हो । इसीलिए श्रीव्यासके लिए माहेन्द्र - व्याकरण के अवलम्बन को बतानेवाला एक पद्य प्रसिद्ध है- ' यान्युज्जहार माहेन्द्राद् व्यासो व्याकरणार्णवात् । तानि किं पदरत्नानि सन्ति पाणिनिगोष्पदे? इस Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 377

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७१६ ७२० इससे स्पष्ट सिद्ध है कि पाणिनीय व्याकरणमें पर्याप्त-अपनी है, यद्यपिउसकी शैली असाधारण है । पारिणनि से पूर्व व्यायनने न्यूनता श्री व्यासने इन्द्र व्याकरणका ग्राश्रय लिया, उसमें इस 1 ९ ७ ) कालीन के बहुत से प्रयोग थे, जो पारिणनिव्याकरण से सिद्ध नहीं ६५ ), प्रकार यह उक्त पद्यसे प्रतीत होता है । होते, नकुल, फलतः पारिणनिसे पूर्वकालीन श्रीवेदव्यासके बनाये हुए नाम- ' में भी पाणिनिके नियमसे विरुद्ध प्रयोग अवश्य हो अपने ' सकते महाभारत हैं । जैसे कि - ' महाभारत ' शान्तिपर्वमें - ' ततो मामाह स्पष्ट भगवानास्यं स्वं विवृतं कुरु । विवृतं च ततो मेऽऽस्यं प्रविष्टा न थे । च सरस्वती ॥ ( ३१८ । ७ ) करण यहां ‘ मेऽऽस्यम्’का ‘ मे आस्यम् ' यह छेद है । यहांपर ' एङ: आदि पदान्तादति ' ( ६ । १ । १०६ ) इस पारिणनिके सूत्रसे ' मेऽऽस्यम् ' की सिद्धि कभी नहीं हो सकती; क्योंकि यहाँपर सामने ' ह्रस्व प्रयोग अकार ' इष्ट है, किंतु उक्त पदमें दीर्घ श्राकार है, इससे स्पष्ट है नयोंकी कि श्रोपाणिनिके पूर्वज श्रीव्यासजी ने इस संधिको या तो अन्य भाविक व्याकरणसे सिद्ध किया होगा, अथवा निरंकुशतावश उससे विरुद्ध रणनीय- प्रयोग किया होगा । इसी प्रकार प्रकृत - विषयमें भी जानना नानकर चाहिये । रंगनिसे श्रीपाणिनिने ' भुज् ' धातुको ' खाने ' तथा ' उपभोग ' अर्थ में विरुद्ध ही प्रात्मनेपद किया है, ' पालन ' अर्थ में तो उसने भुज् धातुको कि तब परस्मैपद ही किया है, परंतु पारिणनिसे पूर्वकालीन महाभारत में का वह तो स्वाभाविकतावश उस नियमकी अवहेलना हो सकती है, इस र दिया कारण उसमें भुज्धातुमें खाने तथा उपभोग अर्थमें आत्मनेपद बलम्बन व्यासो भी हो सकता है, परस्मैपद भी । तो-- ' कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य ष्पदे? पुत्रौ प्रोवाच भुङ्क्त े ति समेत्य सर्वे ' । इसमें जो कि ' भुजोऽनवने ' इस पाणिनि - सूत्र के बलसे ' पालन - रक्षण ' अर्थ ' ही किया जाता CC - 0. Ankur Joshi Collection द्रौपदीके पांच पति वा एक? ७२१ है, वह ठीक नहीं; क्योंकि पारिनिसे पूर्वकालीन उस नियमका अनुवर्तन कैसे ' महाभारत ' में हो? इसके अतिरिक्त ' छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति ' यह व्याकरणकी परिभाषा भी प्रसिद्ध है । वेदमें उपग्रह ( परस्मैपद - श्रात्मनेपद ) -का व्यत्यय भी विख्यात ही है, तभी वहां कवि श्रीव्यासजी ने ' भुङ्ग्ध्वम्’के स्थान ‘ भुङ्क्त ' यह जोड़ दिया है । अन्य बात यह है कि अर्थ में दृष्टि रखनेवालेका शब्ददृष्टिमें उतना आदर नहीं हुआ करता । इतिहासपुराण ' अर्थप्रवान ' प्रसिद्ध हैं, वेद भी ' शब्दप्रधान ' तथा काव्य ' रस- प्रधान ' प्रसिद्ध हैं । देखिये इसमें ' काव्यप्रकाश'का प्रारम्भ । इसी कारण श्रर्थदृष्टि रखनेवाले नैयायिकों के लिए भी अतिशयोक्तिगभित यह प्रवाद प्रसिद्ध है-‘ अस्माकूरणां नैयायिकेषां श्रर्थरि तात्पर्यम् न तु शब्दसि, ' अस्मा-कृणामिति कथम्? गुरूणामिति यथम्, नैयायिकेषामिति कथम्? सर्वेषामिति यथम् । अर्थरोति कथम्? कर्तरि इति यथम् । शब्दसि इति कथम्? छन्दसि इति यथम् । यथम् - इति कथम्? कथम् इति यथम् । ' फलतः अथंतात्पर्यवाले ' महाभारत ' के वचनमें भी ' सर्वे समेत्य भुङ्क्त ' इसका अर्थ व्याकरणका विरोध होनेपर भी खाने व उपभोग अर्थात् उपयोगमें हो सकता है । इसमें अन्य प्रमाण भी हैं । वह यह कि महाभारतकारको जहां ' भुज् ' धातुका खाना वा उपभोग प्रथं विवक्षित होता है, वे वहाँपर पाणिनिके अनुसार केवल आत्मनेपद नहीं करते, किंतु परस्मैपद भी करते हैं, आत्मनेपद भी । जैसे कि- ' यथावदुक्तं प्रचकार साध्वी ते चापि सर्वे बुभुजुस्तदन्नम् । ( १६४ । ७ ) यहाँ पर भुज् धातुको परस्मैपद है । ' तदन्नम् ' इस अन्न पदकी स.ध. ४५ Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) ७२२ संनिधिसे कोई भी पुरुष यहाँ ' पालन ' अर्थं नहीं कर सकता, किंतु खाना वा उपभोग अर्थ ही करना पड़ेगा । पाणिनिके अनुसार तो यहां ' बुभुजिरे ' प्रयोग हो सकता है, परंतु वैसा यहां नहीं है - यह प्रत्यक्ष हो है । इससे हमारी कही बात ठीक सिद्ध हुई । इसी प्रकार ' भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे ' यहां परस्मैपद होनेपर भीरक्षण धर्य नहीं है, किंतु खाना वा उपभोग - उपयोग अर्थ है । इससे स्पष्ट है कि श्रीव्यासजी खाने वा उपभोग अर्थ में जहां - तहां श्रात्मनेपद भी देते हैं, परस्मैपद भी । इससे परस्मैपदमें भी भुज् धातुका भक्षरण वा उपभोग ग्रथं संभव है । इस प्रकारके महा-भारतके अन्य भी प्रयोग दिखलाये जा सकते हैं । हमारे पास केवल यही अमोघ अस्त्र नहीं है कि श्रीव्यास-जी पारिणनिसे विरुद्ध प्रयोग भी करते हैं, प्रत्युत उसमें प्रकरण भी हमारे पक्ष का धनुग्राहक है । ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थः ' यह न्याय भी प्रसिद्ध है । शब्द जिस उद्देश्यसे प्रयुक्त किया जाता है, वही उसका अर्थ हुआ करता है । तब वहां ग्रन्थकारको भी पालन अर्थं इष्ट नहीं है, उस वाक्यका प्रयोग करने वाली कुन्तोको भी वहां पालन अर्थ इष्ट नहीं है, कुन्तीके वाक्यके अर्थको जाननेवाले युधिष्ठिर आदि को भी वहाँ पालन अर्थ इष्ट नहीं है, और फिर ' पालन ' अर्थ करनेसे वैसा प्राशय बतानेवालोंकी कोई इष्ट - सिद्धि भी नहीं है — यह प्रागेके विवेचनसे सिद्ध हो जायगा । पूर्वपक्षी अपने पक्षकी पुष्टि में ' कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्रौ प्रोवाच भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे ' ( १६३ । २ ) इस पाठको तो उद्धृत करते हैं, परंतु उसका पूर्वापर- प्रकरण स्पष्टतया नहीं दिखलाते, जिससे अर्थका प्रनर्थ हो जाता है । अब वह प्रकरण दिखलाया जाता है, जिससे पूर्वपक्ष प्रसिद्ध हो जाता है । आदि-पर्वके १ ९ ३ वें अध्यायका यह प्रथम पद्य है- ' गत्वा तु तां Cc - o. Ankur Joshi Collection Gujarat. द्रौपदीका एक पति वा पांच? ७२३ ७२ भार्गवकर्मशालां पार्थो पृथां प्राप्य महानुभावौ । तां याज्ञसेनीं परमप्रतीतौ भिक्षेत्यथावेदयतां नराग्रयो || १ || इसका श्राशय है कि भीमसेन और अर्जुन द्रौपदीको अपने साथ यह दिनकी तरह कहने लगे कि मातः! हमलोग भिक्षा लाकर प्रति-' प्रतिदिनको तरह ' कहनेका यह प्राशय है कि वे प्रतिदिन लाये भिक्षा हैं । लाकर कुन्तीको कहा करते थे, जैसे कि - चेरुर्भैक्षं तदा ते तु सर्व एव विशाम्पते । निवेदयन्ति स्म तवा कुन्त्या भैक्षं सदा निशि ( १ । १५६ । ४-५ ) पूर्व - उद्धृत पद्यके आगे ही यह पद्य है -- ' कुटीगता सा त्वन-वेक्ष्य पुत्रौ प्रोवाच भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे । ( १ ९ ३ । २ ) इसका अर्थ है कि - कुन्ती कुटीके श्रंदर थी, उसने भिक्षा लेकर प्राये हुए पुत्रों चाह भीम - अर्जुनको नहीं देखा, इस कारण उनके साथ लाई हुई सबक विशिष्ट - भिक्षा द्रौपदीको भी नहीं देखा, इसलिए वह सदाकी भांति भिक्ष भिक्षा जानकर [ क्योंकि वह कुन्ती भी उनको भिक्षा के लिए गये हुए और बहुत देर बीत जाने पर भी उनको न श्राया देखकर उनकी प्रतीक्षा कर रही थी । जैसे कि -- ' अनागच्छत्सु पुत्रेषु शब्द भैक्षकालेऽभिगच्छति ' ( १६२ । ४४ ) उनको सदाकी तरह कहने करत लगी कि तुम सब मिलकर ' भिक्षां भुङ्क्त ' भिक्षाका भोग करो, भिक्षा खाओ वा उसका उपभोग करो । था, क्या यहाँपर कोई मान सकता है कि कुन्तीको यहांपर प्रतिदिन प्रानेवाली भिक्षाकी ' रक्षा ' प्रभोष्ट यो? नहीं नहीं, किंतु भिक्षाका उसको पूर्व की भांति उपभोग - उपयोग ही इष्ट था । इसके बाद उक्त द्रौपदी पद्यका उत्तरार्धं यह है, जिसे पूर्वपक्षवाले जनताकी दृष्टिमें नहीं उपय प्राने देते ' पश्चाच्च कुन्ती प्रसमीक्ष्य कृष्णां कष्टं मया भाषित- क्योि मित्युवाच ॥ ( १६३ । २ ) इसका यह अर्थ है कि - जब कुन्ती ने मिला के रूप में दोपट्टीको कुटीसे बाहर आकर देखा, तो पछता-

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७२३ ७२४ लगी- ' हा खेद! मैंने यह क्या कह दिया? ' यदि उस नाज्ञसेनी कर कहने ही ' भुङ्क्त ' का अर्थ ' पालो ' प्रभीष्ट होता तब शय यह कुन्तीको वस्तुतः क्या अवसर था?, उसे पछतानेका प्रति-नाये हैं । आगे तो इससे भी स्पष्ट कहा है-- ' साधर्मभीता परिचिन्त-न भिक्षा यन्ती तां याज्ञसेनीं परमप्रतीताम् । पाणौ गृहीत्वोपजगाम तु सर्व कुन्ती युधिष्ठिरं वाक्यमुवाच चेदम् ' ॥ ( १६३। ३ ) कुन्ती श्रधर्म-निशि भय भीत हो गई । कुन्तीदेवी द्रौपदीका हाथ पकड़कर युधिष्ठिरके पास गई और उनसे कहा । इस पद्यमें ' सा कुन्ती T त्वन- अधर्मभीता ' यह पद भी ' भुङ्क्त ' का ' पालो ' यह अर्थ इसका है, अन्यथा वह यदि अपने पुत्रोंको द्रौपदीके पालनार्थं कहना हुए पुत्रों चाहती थी, तब यहाँ ‘ अधर्म ' क्या था? भिक्षाका वा द्रौपदीका ई हुई सबके द्वारा पालन अधर्मं नहीं था । अथवा -- यदि कुन्तीको भांति मिक्षाका भी ' रक्षण ' अर्थ इष्ट था, फिर द्रौपदीको देखकर उसका ए गये भी ' रक्षण ' अर्थ इष्ट था, तो उसे अनृतभाषणरूप- श्रधमंसे कोई भय देखकर नहीं था, क्योंकि यह एक प्रसिद्ध न्याय है । - ' यत्परः शब्दः स पुत्रेषु शब्दार्थः ' शब्द जिस लक्ष्यसे कहा गया है, वही उसका अर्थ हुआ कहने करता है । करो, इससे स्पष्ट है कि - कुन्तीको ' भुङ्क्त ' का ' संरक्षण ' अर्य इष्ट नहीं था, किंतु उपभोग - उपयोग अर्थ ही इष्ट था । यदि भिक्षा साधारण तिविन होती, तब तो सबके द्वारा उसका उपभोग - उपयोग करने पर भी कोई नक्षाका श्रवमं नहीं था, अपितु धर्म ही था, परंतु जब उस कुन्तीने भिक्षारूप में उक्त द्रौपदीको देखा, तब सोचा कि यदि इस द्रौपदीका सभी उपभोग-में नहीं उपयोग करें, अर्थात् सभी उसके पति हो जायें, तो अधर्म ही होगा; नापित-क्योंकि सुना जाता है — ' एकस्य बहव्यो जाया भवन्ति, नैकस्या न्ती ने बहवः सहपतयः ' गोपथब्रा ० ( ३ | २०; ऐत ० ब्रा ० ३ । २३ ) पछता यदि मैं ( कुन्ती ) ‘ भुङ्क्ङ्क ' यह भिक्षाके लिए कहकर द्रौपदीरूप Joshi ' Collection Gujarat. द्रौपदीका एक पति वा पांच? ७२५ भिक्षाके लिए अन्य प्रयोगको चाहे वह समान प्रकारका भिन्नार्थक हो -- करूंगी, तो असत्यका प्रसंग हो जाने से अधर्म पर होगा; क्योंकि ' प्रथंभेदसे ही शब्दभेद ' हुआ करता है । शब्वभेव जानेपर दो बार भिन्न - भिन्न बातें हो जानेसे असत्य उपस्थित हो जाता हो है । इस प्रकार असमंजसमें पड़ो हुई कुन्ती ही ' भुङ्क्त ' इस शब्दका ' उपभोग ' यं सिद्ध कर रही है - यह अत्यन्त स्पष्ट है । इसी कारण आगे उसने युधिष्ठिरके सामने स्वयं अपना प्रमाद स्वीकार किया है । जैसे कि- ' इयं तु कन्या द्रुपदस्य राज्ञ:, तवानुजाभ्यां मयि संनिविष्टा । यथोचितं पुत्र मयापि चोक्तं समेत्य भुङ्क्तेति नृप प्रमादात् ॥ ( १६३ । ४ ) कुन्तीने कहां- ' युधिष्ठिर! यह द्रुपदराजकन्या द्रौपदी है । तुम्हारे छोटे भाई भीम और अर्जुनने इसे भिक्षा कहकर मुझे समर्पित किया धौर मैंने भी भूलसे अनुरूप उत्तर दे दिया कि तुम सब मिलकर इसका उपभोग करो । यहाँपर ' प्रभावात् ' यह शब्द ' भुङ्क'का उपभोग अर्थ हो कुन्नीको विवक्षित था, ' रक्षण ' धर्य नहीं - यह स्पष्ट कह रहा है; क्योंकि किसी स्त्रीकी रक्षार्थं प्राज्ञा देना प्रमाद नहीं हो सकता । उपभोग प्रथं होने पर तो एक स्त्रीके साथ बहुतों-का उपभोग प्रशास्त्रीय होनेसे उस कुन्तीको दृष्टिमें प्रमाद स्पष्ट ही है; क्योंकि वह पाण्डवोंके गत जन्मका वृत्त नहीं जानती थी । इस-लिए वह उसे प्रथमं जानती हुई युधिष्ठिरको फिर कहने लगी-' मया कथं नानृतमुक्तमद्य भवेत् कुरुणामृषभ ब्रवीहि । ' ' कुरुश्रेष्ठ! बताओ, अब मेरी बात झूठी न हो । ' [ ब्रवीहि ' यह प्रयोग भी पा-रिनिसे विरुद्ध है - यह बात भी पूर्वपक्षियोंको याद रखनी चां-हिए । - ] ) ' पाञ्चालराजस्य सुतमधर्मो न चोपवर्तेत न विभ्रमेच्च ' ( १ ९ ३५ ) ' जिससे इस पाञ्चालराजकन्याको न तो पाप लगे, नं नीचयोनि में भटकना पड़े ' इस कुन्तीके वाक्यसे भी हमारा An eGangotri Initiative

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७२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पक्ष सिद्ध होता है । ग्रन्थकारको भी यही ' उपभोग ' प्रयं ' भुङ्क्त'का इष्ट है; क्योंकि वह अपने पात्रके द्वारा अपने अभिलषित पर्थको ही कहलवाता है । अथवा ग्रन्थकारका अपना अभिलषित अर्थ हो ही क्या सकता है? उसे तो इतिहासके सम्पादक होनेसे वही लिखना है जो कि इतिहास में हो चुका है । ' इति ह आस इतिहासः ' हो चुके हुए का नाम इतिहास होता है । तब वह उसके परिवर्तनमें अधिकारी ही कैसे हो सकता है? इस प्रकार पूर्व- समयमें द्रोपदीका पाँचों पाण्डवोंके साथ विवाह हुआ, तभी तो इतिहासके सम्पादक श्रीकृष्णद्वैपायनने उसे ग्रन्थबद्ध किया । अब फिर प्रकरणपर आना चाहिये । युधिष्ठिर आदि को भी मातासे कहे हुए ' भुङ्क्त ' पदका उपभोग ही अर्थ इष्ट है । इसीलिए युधिष्ठिरने द्रुपदको कहा था - ' सर्वेषां महिषी राजन् द्रौपदी नो ( - अस्माकं पञ्चानां ) भविष्यति । एवं प्रव्याहृतं पूर्वं मम मात्रा विशाम्पते ॥ ( १६७ । २३ ) एष नः समयो राजन्!

रत्नस्य सहभोजनम् । न च तं हातुमिच्छामः समयं राजसत्तम ॥

सूक्ष्मो धमों महाराज नास्य विद्मो वयं गतिम् । न मे वागनृतं प्राह

नाघर्मे धीयते मतिः । एवं चैव वदत्यम्बा मम चैतन्मनोगतम् ॥

( १ ९ ७ । २५,२६-३० ) ' राजन्! द्रौपदी हम सभी भाइयोंकी रानी होगी, मेरी माताने पहले ही हम सब लोगोंको ऐसी ही आज्ञा दे रक्खी है । महाराज! हम लोगों में यह शर्त हो चुकी है कि रत्नका हम सब बाँटकर एक साथ उपभोग करेंगे! हे राजसत्तम! हम अपनी उस शर्तको छोड़ना नहीं चाहते । महाराज! धर्मका स्वरूप प्रति सूक्ष्म है । उसकी गतिको नहीं जाना जा सकता । मेरी वारणी कभी मिथ्या नहीं बोलती और मेरी बुद्धि कभी अधर्म में नहीं लगती । हमारी माताने हमें ऐस CC - 0. Ankur Joshi Collection द्रौपदीका एक पति वा पांच? 025 ७२७ करने की आज्ञा दी है और मेरे मन में भी यही उचित प्रादेश के है । ' ) ' मम चैतन्मनोगतम् ' की व्याख्या ' सतां हि संदेहपदेषु जंचता क्यान वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः '! ( अभिज्ञानशाकुन्तल - महाबाहु ( १ । २३ ) इन कालिदासके शब्दों में समझनी चाहिये । सहदेवस्त इस प्रकार युधिष्ठिरने श्रीव्यासजोको भी कहा था ' गुरोहि राज्ञाके के वचनं प्राहुर्धर्म्यं धर्मज्ञसत्तम । गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमो परीक्षा गुरुः ॥ ( १६८ । १६ ) ( " धर्मज्ञश्रेष्ठ व्यासजी! गुरुजनोंकी क्रिया प्रो आज्ञाको धर्मसंगत बताया गया है, और समस्त गुरुयों में माता ( १ ९ ३ ॥ परम गुरु मानी गई है ) । सा चाप्युक्तवती वाचं भैक्षवद् । कुन्तीने भ भुज्यतामिति । तस्मादेतदहं मन्ये परं धर्मं द्विजोत्तम ॥ ( १ ९ ८ या प्राह १७ ) ( हमारी उस माताने कहा है कि तुम सब लोग भिक्षाकी भाँति इसका उपभोग करो, अतः द्विजश्र ेष्ठ! इसे हम परमधर्म पुधिष्ठिर मानते हैं । ) लगता है भुक ' यह वचन युधिष्ठिरने जो कहा, उसका कारण यह है कि पादिके " आज्ञा गुरूणां ह्यविचारणीया ' ( रघुवंश १४ । ४६ ) ‘ अमी- अनुसार मांस्या गुरवः ' ( चारणक्यसूत्र ४२१ ) अर्थात् गुरुयोंकी वातपर पदी सब विचार नहीं करना चाहिये । यदि कोई उनकी प्राज्ञा अनुचित साथ ' प्रो भी है, तो उसका उत्तरदायित्व उनपर होगा, उसका पाप - पुण्य माताकी उन्हें ही होगा, हमें नहीं । इसीलिए ' तैत्तिरीयोपनिषद् ' में कहा है- विवाह नह ' मातृदेवो भव ' ( १ । ११ । १२. ) उसका इससे पूर्व युधिष्ठिरने जो कि- ' त्वया जिता फाल्गुन याज्ञ- है क्यों सेनी त्वयैव शोभिष्यति राजपुत्री । प्रज्वाल्यतां हूयतां चैव वह्नि- बतलाता, गृहारण पारिंग विधिवत् त्वमस्या: ' ॥ ( १ ९ ३ ॥७ ) अर्जुन को यह अथव कहा था कि द्रौपदीको तुम ही जीत लाये हो, अत: तुम ही इससे विवाह करो, यह कथन अर्जुनकी परीक्षा के लिए हो सकता है । ॥ १ ९ ३ । दुई भी तभी तो अर्जुनने ' मातृदेवो भव ' ( तै ० १ । ११ । २ ) इस वैदिक Gujarat. An eGangotri Initiative