सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 391–400

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 391 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

exer हम यथाधिकार | इस प्रोर हमारे जनताको अपनो दिया है । श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) पहनते हैं । सब शास्त्रोंका मूल वेद ही हैं । ध्यान न देनेके ही कारण अर्वाचीन सम्प्रदायोंने इच्छानुसारी पाठ पढ़ाकर वेदोंको संकुचित कर उन्हीं अर्वाचीनोंके अनर्गल प्रचारसे प्रभावित जनता यह समझतो है कि ऋग्वेदसंहिता, शुक्ल यजुर्वेदसं ०, सामवेदसं ० और प्रथर्ववेदसं ० नामसे मिलनेवाली चार पोथियां ही चार वेद हैं, शेष वेदसंहिताएँ इन्हीं चारोंकी शाखाएं हैं, वेद नहीं । इस विषयमें ' आलोक ' पाठकों को परिचय प्राप्त कर लेना चाहिये । ( १ ) वेदको माननेवाले लोग वैदिक - निघण्टु और उसके क् - पृथक् भाष्यकार निरुक्तप्रणेता श्रीयास्कको, वादिप्रतिवादिमान्य महा-1 अन्य भाष्यकार पतञ्जलि, अष्टाध्यायीकार श्रीपारिणनि, वार्तिक गे । अव जाता श्रीकात्यायनको वेदज्ञ तथा वेदविषयमें प्रामाणिक एवं विश्वस-नीय मानते हैं । अपने - आपको वैदिक माननेवाला आर्यसमाज इस रखनी नामक अर्वाचीन सम्प्रदाय इन सभीको तथा अपने सञ्चालक -वर्णा- स्वा ० द ० जी को इस विषय में प्रामाणिक मानता है । अब हम जीत - सूत्र इन सबके तथा अन्य भी प्रामाणिक ग्रंथोंके वचन उद्धत करके यह बताते हैं कि यह सभी प्राचार्य ११३१ संहिता तथा उतना ही समाज, ब्राह्मणभाग एवं उसके अन्तर्गत प्रारण्यक एवं उपनिषदोंको वेद उसके मानते हैं । रद्वाज सनातनधर्मका भी यही मत है, पर अपने - आपको वैदिक ताया । माननेवाला श्रार्यसमाज केवल वर्तमान वेदकी चार पोथियोंको महिताओं तथा ब्राह्मणोंको प्रमाणित न्द जी विषय करता हुआ भी उन्हें वेद नहीं मानता । प्रत्येक प्राचीनग्रंथ में अपने विषय पक्षसे विरुद्धता देखकर उसमें प्रक्षिप्तताका प्रडङ्गा लगानेवाले सार- मो श्रार्यंसमाजकी यहां यह विशेषता है कि वेदकी अपनी मानी बाजा CC - 0. Ankur Joshi वेदस्वरूपनिरूपण( ग ) ७४६ हुई चार पोथियोंमें वह न तो कुछ प्रक्षिप्तता ( अधिकता ) मानता है, न कुछ न्यूनता ही । हां, इन चार पोथियोंमें भी जब वह अपने पक्षसे विरुद्धता देखता है, तो उनके ही शब्दों में तोड़ - मरोड़ करके ' मक्खीको मल - मलकर भैंसा ' बना दिया करता है । अस्तु । स ० ध ० के अनुसार वेदभूत ११३१ संहिताओं वा ब्राह्मणों में कुछ साहित्य तो मिलता है, परन्तु ग्रन्य बहुतसी संहिताए वा ब्राह्मण लुप्त हैं । सो जव प्राचीन साहित्यमें वेदके नामसे कहा हुआ वचन वर्तमान वेदसाहित्य में न मिले, तब उसकी सत्ता लुप्त वा अनुपलब्ध वेदसाहित्यमें अनुमित कर लेनी पड़ती है । अब पूर्व प्राचार्योंका इस विषय में मत देखना चाहिये । ( २ ) वादिप्रतिवादिमान्य - महाभाष्यके पस्पशाह्निकर्मे प्रप्रयुक्त-शब्दों की सत्ता बतानेके लिए शब्दका प्रयोगविषय महान् बताते हुए चार वेद ' इस प्रकार कहे गये हैं । ' चत्वारो वेदाः साङ्गाः सरहस्या बहुधा भिन्ना एकशतम् ( १०१ ) अध्वर्युं ( यजुर्वेद ) -शाखाः, सहस्रवर्त्मा ( १००० ) सामवेदः, एकविंशतिघा ( २१ ) बाह्व च्यम् ( ऋग्वेदः ), नवघा ( १ ) श्रथर्वणो वेद: ' इसमें यजुर्वेदकी १०१, सामवेदकी १०००, ऋग्वेदकी २१ और अथर्ववेदकी शाखा -- -- १ यही चार वेद बताये हैं । यजुर्वेदमें भाष्यकारने शुक्ल, कृष्ण दोनों संहिता गृहीत की हैं । उनमें ८६ कृष्ण ( तैत्तिरीय ) तथा १५ शुक्ल ( वाजसनेयी ) संहिताएँ मिलाकर यजुर्वेदकी १०१ शाखा बनती हैं । कुल ११३१ शाखाएं चार वेद हैं- यह इसमें बताया गया है । इसमें मन्त्रभाग- ब्राह्मणभाग नाम नहीं आया है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि शब्द और अर्थ मिलकर एक वस्तु हुआ करती है । मन्त्रभाग है शब्द, और ब्राह्मणभाग है । अर्थ | शब्द और अर्थका सम्बन्ध नित्य होनेसे ' वागर्थाविव संपृक्तौ ... पार्वतीपरमेश्वरी ' ( रघु ० १११ ) शब्दसे अर्थ भी गृहीत हो Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 392

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 392 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७५० जाता है । सो यहां ११३१ मन्त्रसंहिताभाग और उतना ही ब्राह्मरणभाग - यह मिलकर चार वेद हुआ करते हैं - यह तात्पर्य निकलता है । आरण्यक श्रीर उपनिषद् ब्राह्मणभाग के अन्तर्भूत हो जाया करते हैं । इसमें आर्यसमाज ११२७ शाखा और ४ वेद अपनी इच्छानुसार पृथक् कर लेता है । इस पातञ्जल-वाक्यमें यह कहीं नहीं लिखा कि - चार वर्तमान संहिता हो चार वेद हैं, शेष ११२७ संहिता प्रवेद हैं । सभी शाखाएं मिलकर ही शाखी बन जाता है । शाखाओं से भिन्न शाखीकी कहीं स्वतन्त्र - सत्ता नहीं हुआ करती 1 । मूल परोक्षमें हुना करता है, प्रत्यक्ष नहीं होता, और मूल होता भी एक ही है । सो मूल तो वेदका परोक्ष परमात्मा ही है- ' ऊर्ध्वमूलमधः - शाखम् ' । शाखाएँ हमारे पास हैं । यही महाभाष्यकारका अभिप्राय है । इस प्रकार वेद समुदायवाचक सिद्ध हुआ, परन्तु ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्ते, ( ' लक्ष्यलक्षणे व्याकरणम् ' वार्तिकमें ) इस पस्पशाह्निकस्थ महाभाष्यके वचनसे कि - समु द।यवाचक शब्द अवयवका नाम भी हुआ करता है - भाष्यकार-ने वेदोंका उद्धरण देते हुए कहीं मन्त्रभागका और कहीं ब्राह्मण-भागका वचन दिया है, कहीं दोनोंका भी । मन्त्रभागमें ११३१ संहिताओंमें यथोपलब्ध वा यथेच्छ संहिताएं उद्धृत की हैं । अस्तु । अब हम पूर्वोक्त मुनियोंके वेदोंके नामसे उद्धृत किये हुए वचनोंको उद्ध ृत करते हैं, जिससे वेदके स्वरूपका ज्ञान हो जायगा । वेदवाचक शब्द वेद, छन्द, निगम, आम्नाय, समानमय, ऋषि, अध्याय आदि आते हैं । स्वा ० द ० जी ने ऋभाभूमें लिखा है — ' तथा व्याकरणेपि - ' मन्त्रे घस, छन्दसि लुङ्, वा षपूर्वस्य निगमें ' अत्रापि छन्दो - मन्त्र - निगमाः पर्यायवाचिनः सन्ति । एवं छन्दभादीनां पर्यायसिद्ध ेर्यो भेदं ब्रूते, तद्वचनम् प्रमाणमेवास्ति ' CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण ( ग ) 19 ७५१ [ प्र ० ८० ] ' यच्चोक्तम् - छन्दोमन्त्रयोर्भेदोस्ति तदपि ना कुतः? छन्दो - वेद - निगम - श्रुतीनां पर्यायवाचकत्वात् असङ्गतम् । व ८० ] इस अपने वचनमें ' [ ऋभानू ७ ९-आदि शब्दोंको स्वा ० द ० जी ने छन्द, मन्त्र, निगम, वेद क वेदका पर्यायवाचक माना है । तब पाणिनि आदिको छन्द [ वेद ] के जो उद्धरण इष्ट हैं, वे स्वा ० द ० जी म तथा उनके अनुयायियोंसे इष्ट छन्द [ वेद ] की चार पोथियों में वे अवश्य मिलने चाहिए, क्योंकि वे इन चार पोथियोंको पूर्ण वेद मानते हैं, उनमें न कुछ प्रक्षिप्त और न कुछ न्यून ही मानते हैं, पर यदि वे उद्धरण उनमें न मिलें, तो मानना पड़ेगा कि प्रार्थ-समाज अभी तक वेदोंको नहीं जान सका है, और वेदके विषय में अभी भी वह सन्देहके झूलेमें लटक रहा है । जोकि, ऑजॅिकलके [ ब्र ० मु ० आदि ] आर्यसमाजी छन्दको हेरफेरवाला वैद कहकर उसे वेदसे भिन्न कहने की दृश्चेष्टा करते हैं, उनका वचन अपने ऋषिके अनुसार प्रप्रमाण [ गलत ] ही है । हेरफेरवाला वेद आजकलके आर्यसमाजियोंके मत में शाखाएँ हैं । जब स्वा ० दे ० श्रादि सभी प्राचीन अर्वाचीन विद्वानों के मत में ' छन्द ' वेदका नाम है, तब सभी शाखाएँ वेद सिद्ध होगईं । यह वेद व की चार पोथियां भी तो शाकल्य सं ०, वाजसनेयी - माध्यन्दिनीसं ०, कौथुम सं ०, शौनकसंहिता नाम वाली शाखाएं ही हैं । मन्त्रोंका परस्पर हेर - फेर तो इन वेदकी चार पोथियों में भी मिलता है । देखो इस पर ' आलोक ' ४ र्थं पुष्प पृ ० १५४ तथा दम पुष्प । ( ३ ) अब पहले निरुक्तकार श्रीयास्कमुनिसे व्याख्यात निघण्टु ल जिसे श्रीयास्क ' समाम्नायः समाम्नातः, ( नि ० १।१।१ ) समाम्नाय ( वेद ) कहते हैं, स्वा ० द ० जीने जिसका नाम ' निघण्टु: - वैदिक-कोषः रखा है, श्रीयास्कने जिसे छन्दोंसे समाहृत किया है-( नि ० ११११४ ) के कई पद हम उद्धृत करते हैं । ' छन्द ' वेदका Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 393

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 393 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७५२ ७५१ है- यह हम स्त्रा ० द ० जीकी ऋभाभू ० से उद्धृत वचनसे पहले नाम नम् । बता चुके हैं । कई श्रार्यसमाजी [ श्रीकुशवाहा श्रादि ] तो यहाँ ७६- के भाष्यको साक्षी देकर ' छन्द ' का अर्थ मन्त्रभाग श्रीदुर्गाचार्य करते हैं, ' अर्थात् उनके मतानुसार यह निघण्टु शुद्ध [ प्योर ] मन्त्रभाग के पदोंका संग्रह है । तब उस निघण्टुके सभी पद चारों वेदोंकी पोथियोंमें मिलने चाहियें । पर सभी नहीं मिलते । योंमें अपने वेदोंको आर्यसमाजी न्यूनाधिक नहीं मानते - यह हम पूर्व ही कह चुके हैं । अब देखना चाहिये-हैं, ' आष्ठा ' [ १।६ ] यह दिशाका नाम, ' शोकी ' [ १७ ] यह रात्रि का नाम, ' बलिशान: ' [ १०१० ] यह मेघका नाम, ' बेकुरा ' [ १।११ ] यह वाक्का नाम, ‘ सर्णीकम्, स्वृतीकम्, बुर्बुरम्, यहः, भविष्यत् ' [ ११२ ] यह पांच जलके नाम; ' मल्मलाभवन् ' [ १।१७ ] यह ' ज्वलन् ' का नाम, ' करन्ती ' [ २१ ] यह कर्मका नाम, ' साचीवित् ' [ २।१५ ] यह क्षिप्रका नाम, ' निघृष्व: ' [ ३२ ] यह ह्रस्वका नाम आजकल की चारों वेदकी पोथियोंमें नहीं मिलते । इस प्रकार अन्य भी बहुतसे वैदिक - निघण्टुके शब्द हैं, जोकि नत वेदकी वर्तमान चार पोथियोंमें नहीं मिलते । तब केवल यही विद चार पोथियां वेद हैं- यह प्राजकलका प्रर्यसमाजका मत निर्मूल °, सिद्ध हुआ । उनकी सीमा अब बढ़ गई । तदनुसार ११३१ मन्त्र-संहिता तथा उतनेही उपनिषद्, प्रारण्यकसहित ब्राह्मणभाग वेद EL सिद्ध हुए । उनमें उक्त शब्द मिल सकते हैं । इनमें बहुतसे ग्रंथ 1 लुप्त हैं । य ( ३ ) श्रव वादिप्रतिवादिमान्य निरुक्तकार श्रीयास्कमुनिको ही लीजिये । निरुक्तके प्रथम अध्यायकें १५ वें खण्ड में मन्त्रभागकी सार्थकताऽनर्थकताका शास्त्रार्थं आता है । उसमें ' श्रोषधे! I त्रायस्वैन ", स्वविते मैन ", हि सी: ' यह मंन्त्र ( १४ ९ ५।६ ) और वेदस्वरूपनिरूपण ( ग ) ७५३ ' अग्नये समिध्यमानाय अनुत्र हि ' ( १११५२६ ) यह मन्त्र उद्धत किया गया है, पर यह दोनों ही मन्त्र धार्यसमाजसे मानी हुई चारों वेद - पोथियोंमें नहीं हैं । इनमें ' प्रोषवे! त्रायस्वनं ' तो कृष्णयजुर्वेदमंत्रायणीसं ( शरा ०, कृ.य. काठकसं ० ३ शरा ), कृ.य.तै. सं ० ( १२ | १ | १ ० ) आदिमें आता है, इन्हें श्रामं समाज वेद नहीं मानता । उससे वेद मानी जाती हुई शुक्लयजुर्वेदमाध्यंसं. ( ४/१, ६।१५ ) में ' प्रोषघे! श्रायस्व ' पाठ तो है, परन्तु उसके साथ ' एन ' नहीं है; निरुक्तमें तो ' त्रायस्व ' के साथ ' एनं ' पढ़ा गया है, तब आर्यसमाजके वैदिक-यन्त्रालय अजमेर में प्रकाशित हुए मूलनिरुक्त ( पृ. ६ ) में यह पता शुक्लयजुर्वेद ( ४११, ६।१५ ) का गलत लिखा हुआ है, क्योंकि— उक्त स्थल में ' एनं ' शब्द ' त्रायस्व ' के साथ नहीं । श्रार्यसमाज अपने वेदमें एक भी पद न्यूनाधिक नहीं मानता । तब इससे कृष्ण-यजुर्वेदकी सभी संहिताएं वेद सिद्ध हुई । ( ख ) दूसरा ' अग्नये समिध्यमानाय ' मन्त्र भी आर्यसमाजके माने चारों वेदों में नहीं, वह कृ.य. मैत्रायणोसंहिता ( १४१२२४५ ) में है, उसे श्रार्यसमाज वेद नहीं मानती । आर्यसमाजी- वैदिक-यन्त्रालय अजमेर के निरुक्त ( पृ.६ ) में ' श्रग्नये समिध्य ' का स्थल- निर्देश ( शत. १ । ३ । २ । ३ ) यह दिया है । स्मरण रहे कि यह मन्त्र ग्रार्य समाज के अनुसार निरुक्तमें वेदको सार्थकतान-र्थकताप्रकरण में है । स्वा. द. जीके अनुसार ' मन्त्र ' वेदका पर्याय-वाची है, तब अजमेर वैदिकयन्त्रालयके उक्त पतेके अनुसार प्रायं-समाजको शतपथब्रा. को भी वेद मानना पड़ेगा । इससे वेदकी सीमा चार पोथियोंसे बढ़कर ११३१ मन्त्रसंहिता तथा उतने ही ब्राह्मणों में जा पड़ी, यह ' आलोक ' के विद्वान् पाठकोंने सम्यक् अनुभव स.घ.४८ क CG - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 394

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 394 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७५४ कर लिया होगा । निरुक्तकार जिसे वेद कहें, उस स्वप्रमाणित भी प्राचार्यको यदि आर्यसमाज इस विषय में नहीं मानता, इससे स्पष्ट उसका अपने संप्रदायकी दलदल में फंस जाना ही कारण समझना पड़ेगा । ( ग ) निरुक्तके इसी वेदकी सार्थकतानर्थकता प्रकररणमें ' एक एव रुद्रोवतस्थे न द्वितीयः ' यह मन्त्र ( १।१५।७ ) भी दिया गया है, परन्तु यह आर्यसमाजकी मानी हुई चारों वेदपोथियोंमें नहीं मिलता । इसीलिए वैदिक यन्त्रालयमें प्रकाशित निरुक्त ( पृ. ९ ) मैं इसका स्थलसंकेत नहीं दिया गया । इसका तात्पर्य यह हुआ कि यह उनके माने हुए चारों वेदोंमें नहीं । जबकि प्रार्थसमाज अपने वेदोंको पूर्ण मानता है, जैसे कि प्रार्यसमाज कानपुरसे प्रका-शित ' वेदसंज्ञाविमर्श ' ( पृ. १२४ ख ) में भी लिखा गया है कि-' वेद्रोंके पूर्णतया उपलब्ध होनेसे, बेद जितने हैं वे सब मिलते हैं ' । इस प्रकार जब उनका वेद कुछ भी लुप्त नहीं, तब यह निरुक्तसे दिखलाये हुए वेद - मन्त्र उन चारों वेद - पोथियोंमें नहीं मिलते, इससे सिद्ध हुआ कि केवल यही चार वेद- पोथियां ही वेद नहीं, बल्कि ११३१ मन्त्रसंहिता, तथा उतने ही ब्राह्मण वेद हैं । उनमें कुछ संहिता वा ब्राह्मण अनुपलब्ध वा लुप्त हैं, तब वह वेदका अनुपलब्ध वचन उन लुप्त - संहिताओं में होगा यह सिद्ध हो जाने से प्रार्यसमाजका वेदस्वरूपविषयक मत गलत सिद्ध हुआ । ' एक एव. रुद्रो न द्वितीयाय तस्थे ' यह पूर्वसमानार्थक मन्त्र तो कृ. य. तैत्ति. सं. ( १।८।६।१ ) में मिलता है, तब आर्यसमाजको उचित है कि वह कृष्णयजुर्वेदको भी वेद मान ले । ( ५ ) ' इत्यपि निगमो भवति ' से श्रीयास्कमुनि वेदका उद्धरण देते हैं, यह बात सभी वादी प्रतिवादी मानते हैं । स्वा. द. जीका वचन भी कि - ' निगम वेदका नाम है ' दिया जा चुका है । स. प्र. CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण ( ग ) ७५५ ७५६ ७ समु के अन्त में भी ' इति ब्राह्मणम्, इत्यपि निगमो www ( ५/४११ ) इस निरुक्त प्रमाणके द्वारा स्वामीजीने भवति ' करन प्रयुक्त ' निगम ' शब्दका ' वेद ' - वचन - अर्थ में प्रयोग श्रीयास्कसे दिखल माना है । हम श्रोयास्क द्वारा उद्धत निगम वचनोंको स्पष्टतया इससे करने हैं, जिससे प्रतीत हो जावेगा कि श्रीयास्कको निग़म उदाहृत ( वेद ). से केवल मन्त्रभाग इष्ट नहीं, किन्तु मन्त्रभाग भी, आरण्यक एवं अनित्ररूप ब्राह्मणभाग भी श्री rent for ( वेद ) इष्ट भियो है । ' प्रालोक ' पाठकगरंग देखें-( क ) ' यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित् " तेनेदं पूर्वं पुरु-सर्वम् ' इत्यपि निनो भवति ' ( २।३।१ ) यह ' निगम ' नामसे उदाहृत वचन आर्यसमाजसे वेद मानी जाती हुई चारों पोथियोंमें नहीं, किन्तु ' श्वेताश्वतरोपनिषद् ' ( ३ ९ ) का यह वचन है । इसीको वैदिकयन्त्रालय अजमेर के निरुक्त में ' तैत्तिरीयारण्यक ' ( १० प्र. ) का वचन माना है । यह दोनों कृष्णयजुर्वेदकी आरण्यक एवं उपनिषद् होनेसे आरण्यक और उपनिषदुरूप ब्राह्मणभाग भी निगम प्रथत् वेद सिद्ध होगया । ( ख ) ' पोयतित्वो, नेमे देवाः, इत्यपि निगमौ भवतः, ( निरु. उद्ध ३।२०१५ ) इनमें ' नेमे देवा: ' यजुर्वेद काठकसं. ( १४१६ ) का है, तत्र हुए स्वा. द. जोके अनुसार ' निगम ' का यह उद्वरण काठक पंहिताको भवत वेद बनानेवाला सिद्ध हुआ । वव ( ग ) ' प्रमेनानु, नास्त्वा ' इत्यपि निगमो भवत: ' ( निरु.. उनम ३।२१।२ ) इनमें ' नास्त्वा ' यह मन्त्र सामवेद - ताण्डयत्रा ( १२८ तथा कृ. य. काठकसं. ( 1 ) का है, और वैदिकयन्त्रालयके ' निरुक्त के अनुसार कृ. य. मैत्रायणीसं. ( १ ९ ०४ ) का है, तब संभो शाखा तथा ब्राह्मण वेद सिद्ध हुए । अब निरुक्तकारपर याज्ञिकों-का प्रभाव बताना, वा तत्कालका प्रभाव बताना उनका अपमान ठीक Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 395

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 395 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७५६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७५५ है । श्रीयास्क तो निघण्टुके पदोंका उद्धरण वेदों से भवति ' करना दिखला रहे हैं, और वे मन्त्र - ब्राह्मणात्मक वेदमें मिल रहे हैं, इससे ' मन्त्र - ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' की सिद्धि हुई, तत्कालका नष्टतया उदाहृत अनुसरण कहां हुआ? तत्कालके भी पूर्वकालानुसारी होने से यह प्राचीन मत सिद्ध हुआ । या तो यदि यह प्रतिपक्षियोंके वेदमें ( वेदं ) - नहीं, तो ' वेदकी सीमा यही चार वेद पोथियां हैं ' यह प्रतिप-एवं ) इष्ट -भियोंका पक्ष गलत सिद्ध हुआ । यदि वे वेदपद अन्य शाखा वा ब्राह्मणों में हैं, तो वे भी वेद सिद्ध हुए । वेद स्वयं भी याज्ञिक हैं, और यज्ञोपवीत भी वेदोक्त है, और वह वेदाधिकारप्रद है, नामसे तब याज्ञिकता वेदको भी सम्मत- होनेसे: ( देखिये इसपर ' आलोक ' यों में छठा सुमन ( पू. १४०-१४६ ) प्रतिपक्षियोंके मतानुसार याज्ञिकता-है । मैं ब्राह्मणकी वेदता होनेसे ' मन्त्रब्राह्मणम्रो वेदनामधेयम् ' यह ण्यक ' प्राचीन घोष ठीक सिद्ध हुआ; और शाखा वा ब्राह्मणभागको वैदकी बुदै न माननां यह आजकलका अर्वाचीनतम मत सिद्ध हुना । दुरूप.. ( ६ ) अब कुछ महाभाष्यकार - श्रीपतञ्जलिमुनिके वेदके उद्धरण भी देखिए - ( क ) प्रप्रयुक्त - शब्दों का प्रयोग दिखलाते ( निरु. हुए श्रीपतञ्जलिमुनिने पस्पशाह्निक में लिखा है- ' ये चाप्येते तब भवतोऽप्रयुक्ताः श्रभिमताः शब्दाः, एतेषामपि प्रयोगो दृश्यते । नाको क्व? वेदे ' । यह कहकर वे शब्द भाष्यकारने वेद में दिखलाये हैं । उनमें ' यद्वो रेवती रेवत्यां तमूष ' यह जी ' ऊष ' शब्दका वेदसे ( निरु. उद्धरण भाष्यकारने दिया है, यह आजकलको चारों वेदपोथियों में शाह नहीं मिलता, अंशतः यह वचन कृ. य. काठकसं. ( ३१।७ ) में T लयके ' मिलता है । इसे आर्य समाज वेद नहीं मानता, पर वादिप्रति-संभो वादिमान्य भाष्यकारने उसे वेद माना है, तब आर्य समाजका ज्ञिकों- वेद - सीमाविषयक सिद्धान्त गलत सिद्ध हुआ, और सनातन धर्मका अपमान ठीक । CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण ( ग ) ७५७ ( ख ) ' ऋषि ' शब्द ' वेद ' वाचक है - यह वेदज्ञ लोग जानते हैं, श्रार्य समाज कानपुरसे प्रकाशित ' वेदसंज्ञाविमर्श ' ( पृ.११८ ) में भी यह माना है । इसके प्रमारगमें उसमें ' सम्बुद्धौ शाकल्यस्ये-तावनायें ( पा. १ १ १६ ) यह सूत्र दिया गया है । इसी सूटके ऋषि ( वेद ) के उदाहरण में ' ब्रह्मबन्धविति श्रब्रवीत् ' यह जो वेदवचन दिया जाता है, यह कृ.य. काठकसं. ( १०।६ ) तथा ऐतरेय ( ७।२७ ) यह कृष्णयजुर्वेद तथा ब्राह्मणका उदाहरण है । तब यह भी वेद सिद्ध हुए । ( ग ) महाभाष्यकारने ३ | १ | ७ सूत्रके भाष्यमें लिखा है-' ऋषिः ( वेदः ) पठति ' शृणोत ग्रावाणः ' । श्रीपाणिनिको भी ( ७११४५, वैदिकसूत्र में यही वेदमन्त्र इष्ट है, पर वेद प्रातकी चारों देवपोथियों में नहीं मिलता । उनमें तो शुक्लयजुः ( माध्य. ) सं. में ' श्रोता ग्रावाणः ' ( ६।२६ ) मिलता है, ' शृणोत ग्रावाणः ' नहीं, पर कृष्णयजुर्वेद तै. सं. ( १।३।१३।१ ) में ' शृणोत ग्रावारणः ' ही मिला है । इसीसे महाभाष्यकार कृष्णयजुर्वेदको भी वेद मानते हैं, यह सिद्ध होगया । ( घ ) तभी तो महाभाष्यकारने वैदिक शब्दोंका उद्धरण देते हुए. यजुर्वेदका ' इषे त्वोर्जे त्वा ' यह उद्धरण दिया है । यदि तो भाष्यकारको शुक्लयजुर्वेद ( माध्यं ) संहिता ही केवल वेद इष्ट होती, तो वे ' इषे त्वोर्जे त्वा वायवस्थ देवो वः ' इतना पाठ देते, जिससे ' उपायवः स्थ ' वाली कृष्णयजुर्वेद तै. सं. की वेदत्वसे निवृत्ति हो जाती । यदि उन्हें केवल कृष्ण यजुर्वेद सं इष्ट होती, तो वे ' इषे त्वो-र्जे त्वा वायवः स्थोपायवः स्थ ' इसी का उद्धरण देते, जिससे इस पाठसे रहित शुक्ल यजुर्वेद सं. की वेदत्वसे निवृत्ति हो जाती, पर जबकि भाष्यकारने केवल ' इषे त्वोर्जे त्वा ' यह यजुर्वेदका Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 396

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 396 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७५८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) सामान्य उद्धरण दिया है, इससे सिद्ध है कि वे कृष्ण और शुक्ल दोनों यजुः- संहिताओं को यजुर्वेद मानते थे । यह दोनों शुक्ल ( वाज. माध्यं ) कृष्ण ( तैत्ति ) की प्रधान संहिताएँ आगई । ( ङ ) ' वेदे खल्वपि ' कहकर भाष्यकारने ' पयोव्रतो ब्राह्मणो ' वह उदाहरण दिया है । यह स्वा. द. जो के अनुसार शतपथब्रा. का है । इससे ब्राह्मणभाग भी भाष्यकार के मत में वेद सिद्ध हुआ । ( च ) ' वेदशब्दा अपि एवमभिवदन्ति ' कहकर भाष्यकार ने पस्पशाह्निक में ' योग्निष्टोमेन यजते ' यह ब्राह्मणभाग उदाहृत किया है । उससे भाष्यकारके मतमें ब्राह्मणभाग भी वेद सिद्ध हुआ । इसमें स्पष्ट वेदके नामसे उद्धृत ब्राह्मणभागके भाष्यकार-प्रोक्त उदाहरणों में प्रार्यसमाजियों का औपचारिकता या याज्ञिक -प्रभाव वा तात्कालिक परिस्थितिका व्याज बतलाना उनके पक्षकी निर्मूलताका प्रमापक है । ( छ ) ‘ वैदिकाः खल्वपि ' कहकर ' शंनो देवी ' यह प्रथर्ववेदसं. का प्रथम - मंत्र - प्रतीक भाष्यकारने दिया है । स्वा. द. जीने भी इसी ‘ शंनो देवी ' मन्त्रको अथर्ववेदका प्रथम - मंत्र - प्रतीकं ऋभाभू (. पृ. ८६ में ) माना है । यह वर्तमान अथर्व वेद शौ.सं. कान होकर अथर्ववेद पैप्प्लादसं. का है । इस विषय में स्पष्टता ' प्रालोक ' के ४ र्थं पुष्प में ' श्रीपतञ्जलि ' एवं ' शंनो देवी मंत्र ' में देखिये । इससे सभी वेद - शाखाएँ वेद सिद्ध हुईं । हर्षकी वात है कि - हमारी इस बातसे प्रभावित होकर मन्त्री प्रार्यसमाज मेस्टन रोड़ कानपुरने अपने ' वेद - संज्ञा - विमर्श ' ( पृ. ८ ) में पैप्पलादसं. को ही मूल अथर्ववेद माना है, और प्रार्य-समाज की छपाई अजमेरी प्रथर्ववेद सं. को ' खण्डित प्रतिलिपियों के अनुसार संगृहीत की हुई ' ( हेर - फेर वाली ) संहिता माना है । आर्यसमाजकी एक शताब्दी पूर्ण होने वाली है, इसमें हमारी CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण ( ग ) ७५६ ७६० ' आलोक ' प्रथमालाके प्रभावसे उन्होंने अपने माने एक वेदमं परिवर्तन स्वीकृत कर लिया । वस्तुतः उन्हान यह मानकर ' सभी शाखाओं- मानते की वेदता ' यह प्राचीन मत एक ढंगसे मान लिया है । ' वेदसंज्ञा विमर्श ' ( पृ. ६७ ख ) में उन्होंने इसे सृष्टि के आदिजात. कहकर प्राचीन पद्धति माना है । मनुजीको गच्छत ( ७ ) अब हम पारिगनिसूत्रोंके कुछ उदाहरण उद्धृत करते हैं- इसका र उ ( क ) ' स्नात्व्यादयश्च ' ( ७-१-४६ ) यह छान्दस ( वैदिक ) सूत्र है । गच्छत स्वा.द. जी ' छंद ' वेद को कहते हैं, इस पर हम उनका उद्धरण दे पर वह चुके हैं । इसका उदाहरण ' स्विन्नः स्नात्वी मलादिव ' है, यह चारों वह उ श्राजकी वेद - पोथियों में नहीं, किन्तु कृष्णयजुर्वेद ( काठक सं. ' ततोह ३८।५।६३ ) मैत्रायरणी सं.३।११।१११ ( १० ) तथा तं ब्रा २२४४६ ) नो बुव में मिलता है, इससे कृष्णयजुर्वेद एवं ब्राह्मणभाग भी वेद सिद्ध ऋषि - हुवा, जिन्हें आर्यसमाज वेद नहीं मानता । मैं नही ( ख ) ' मतुव्रसो रु सम्बुद्धौ छन्दसि ' ( ८-३ - १ ) इस सूत्र से सिद्ध ब्राह्मए हुआ हुआ ' भगवः ' शब्द ' छान्दोग्य उपनिषद् ' ( ४-५-१ ) में है । इस ( प्रकार ' व्यवहिताश्च ' ( पा १-४-८२ ) इस वैदिक सूत्रका उदाहरण जमाने ' उप त्वा नेश्ये ' ( ४-४-५ ) यह छान्दोग्य उपनिषद् में है । इससे उप-निषदें भी वेद सिद्ध हुईं, जिन्हें श्रार्यसमाजी वेद नहीं मानते । हस ( गु ) ' यजुषि काठके ' ( ७-४-३८ ) में काठकसं को श्रीपाणिनि नमाज ने यजुर्वेद कहा है - इससे सभी वेदशाखा वेद सिद्ध हुई । दो ( ८ ) अब वार्तिककार - श्रीकात्यायनका भी मत देखिये - स्वामी ' षष्ठ्यर्थे चतुर्थीति वाच्यम् ' ( वा २।३।६२ ) इस वैदिक - वार्तिक का इनमें उदाहरण है- ' या खर्वेण पिबति तस्यै खर्वः ' यह आजकी वेदकी नं. है, चार पोथियोंमें न होकर कृ.य. तैत्तिरीयसं. ( २२२१७ ) के हैं, तब ब्राह्मण में है । तब सभी शाखा तथा ब्राह्मण वेद सिद्ध हुए । ( c ) शतप्रथब्रा. में ' तस्माद् एतद् ऋषिणा अभ्यनुक्तम् ' —यह उदाह Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 397

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 397 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( 3 ) ७५६ ७६० परिवर्तन ' शब्द मन्त्रभाग के लिए आता है, यह वादी प्रतिवादी सभी ' ' ऋषि हैं । उसके एक स्थल में ' तस्मादेतद् ' ऋषिणाभ्यनूक्तम् ' यह शाखाओं- / मानते लिखा है- ' मनसा संकल्पयति तद् वातमभि-' वेदसंज्ञा- कहकर एक मन्त्र । वातो देवेभ्य श्राचष्टे यथा पुरुष! ते मनः ' ( ३।४१२ । ७ ) -मनुजीको | पच्छति तो अथर्ववेद शौ. सं. ( १२२४/३१ ) में मिलता है करते हैं | इसका उसमें पूर्वार्ध ' ' हेरफेर ' है । शतपथ में पाठ है- ' तद् वातमभि-, ] सूत्र है । गच्छति पर प्रथर्व. शौ.सं. में पाठ है-- ' तद् देवाँ श्रपि गच्छति ' । उद्धरण दे पर वह उत्तरार्धं शतथोक्त वेदमन्त्र के उत्तरार्धसे भिन्न है । यह चारों | वह उत्तरार्ध इस मन्त्र के पूर्वार्धसे मेल नहीं खाता । वह यह है-तो ब्रह्मणो वशामुपयन्ति याचितुम् ' । पर शनपथोक्त उत्तरार्धं ४ ) तो पूर्वार्धसे सुसम्बद्ध है । सो जहाँ वह होगा, वह ब्राह्मणके मतमें वेद सिद्ध ऋषि ( वेद ) होगा । जब वह उत्तरार्ध वर्तमान चार वेदपोथियों में नहीं मिलता, तो स्पष्ट है कि यह किसी अन्य शाखा वा से सिद्ध ब्राह्मण में होगा । इससे भी सभी शाखा ब्राह्मण वेद सिद्ध हुए । है । इस ( १० ) अब हम स्वा. द. जी - जो आर्यसमाजकी दृष्टिसे इस उदाहरण ज़मानेके वेदज्ञाता ऋषि - महर्षि माने जाते हैं, उनका मत देते हैं-ससे उप- ( क ) ' छन्दो ब्राह्मणानि च तद्विषयाणि ' ( पा. ४ | ३ | ६५ ) ( ३२३ ) मानते । वह सूत्र स्वामोके ' स्त्रेणताद्धित ' ( ६५ ) पृष्ठ में है । यह आर्य-पाणिनि समाजका प्रिय सूत्र है । इसमें ' छन्द ' को जिसे सभी वादी - प्रति-दो यहाँ मन्त्रभागात्मक त्रेदका वाचक मानते हैं - उदाहरण देखिये- लामीने- ' कठाः, मौदा, पैप्पलादाः, वाजसनेयिनः ' दिये हैं । नमें ' वागसनेयिनः ' से तो श्रायं समाजको इष्ट यजुर्वेद [ माध्य. ] वेदक नं. है, पर, पैप्पलाद, कठ एवं मोद - यह अन्य शाखाओंके नाम १७ ) के । तब सभी शाखाएँ वेद सिद्ध हुई । हुए । ( ख ) ' छन्दसि निष्टक्य ' [ पा. ३ । १ । १२३ ] इस वैदिकसूत्रका तम् ' यह उदाहरण स्वामीने निष्टक्यं चिन्वीत पशुकामः ' दिया है, पर यह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वेदस्वरूपनिरूपण ( ग ) ७६१ चारों वेदसंहिताओंमें नहीं, बल्कि, ' निष्टक्य ' शब्द भी चारों वेदपोथियोंमें नहीं, किन्तु कृष्ण यजुर्वेद तै.सं. [ ६०१७ २ ] तथा ' ऐतरेयारण्यक ' [ ५ | १ | ३ ] में है, इससे सभी शाखा, ब्राह्मण जिनमें श्रारण्यक तथा उपनिपर्दे भी शामिल हैं - वेद सिद्ध हुए ।, ( ग ) कई थोड़े से व्यक्ति ' वेदाङ्गप्रकाश ' के भागोंको स्वा.द.-कृत नहीं मानते । वे ग्रष्टाध्यायी भाष्यको स्वा. द.कृत मानते हैं, यह बात निर्मूल है! वादितीषन्यायसे हम डा. रघुवीर तथा श्रीब्रह्मदत्त जिज्ञासु - सम्पादित उस अष्टाध्यायी भाष्यसे भी कुछ उद्धरण देते हैं-( अ ) ' मन्त्रे घसजनिभ्यो लेः ' ( २०४८० ) इसके ' मन्त्रे ' का अर्थं स्वा. द. जीने लिखा है- ' वेदविषये ' । इसमें ' जन् ' धातुका उदाहरणं स्वामीने ' अज्ञत ' लिखा है । यह न तो चारों वेद-पोथियोंमें है, न लोकमें । यह ऋ. ऐतरेय ब्राह्मरण ( ७ | १४ | ५ ) में मिला है । तो ब्राह्मणभाग भी वेद सिद्ध हुप्रा । यदि ' ब्राह्मण ' वेद नहीं, तो बताना पड़ेगा कि यह किस वेद संहिताका है? ( प्रा ) ' उत्सर्गश्छन्दसि ' ( पा. ३।२।१७१ ) यहां स्वामीने लिखा है- ' छन्दसि वेदे । इसका उदाहरण स्वामीने ' सेदि: ' दिया है । यह चारों वेदपोथियों में नहीं मिलता । यह यजुर्वेद-शतपथब्रा. ( ७ | ३।१।२३ ) तथा कृ.य. तैत्तिरीयारण्यक ( ४।२२।१ ) में मिलता है, तब सभी शाखा - ब्राह्मण वेद सिद्ध हुए । ( इ ) ' णेश्छन्दसि ' ( ३।२।१३७ ) इस सूत्र के कहे ( वेदका उदा-हरण स्वा. द. जीने ' धारयिष्णुः ' दिया है । यह चारों वेद-पोथियोंमें न मिलकर ' शाङ्खायन - धारण्यक ' ( १२/२७ ) में मिलता है, तब ब्राह्मणभागान्तर्गत ' आरण्यक ' भो वेद सिद्ध हुए । स. घ. ४८ ख An eGangotri Initiative

पृष्ठ 398

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 398 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ( ई ) ' बहुलं छन्दसि ' ( पा. ३।२८८ ) यहां वेदका उदाहरण स्वामीने ' मातृहा ' दिया है, यह चारों वेद- पोथियों में नहीं, किन्तु ' छान्दोग्योपनिषद् ' ( ७।१५।२३ ) में है; तब उपनिषद् भी वेद सिद्ध हुए । ( उ ) ' ईदूतौ च सप्तम्यर्थे ' ( पा. १।१।१८ ) इसके लिए स्वा. द.जीने लिखा है- ' छन्दोविषयमिदं सूत्रम् ' । इसका वेदका उदा-हरण स्वामीने ' मामकी तनू इति ' दिया है । यह चारों वेद - पोथियों में नहीं । ' मामकी ' की सिद्धि भी ' केवलमामक ' ( पा. ४ । १ । ३० ) इस सूत्र से वेबमें होती है । यह शब्द भी चारों वेद - पोथियोंमें नहीं । इससे वेदकी सीमा इन चार पोथियोंसे बढ़कर १ ९ ३१ संहिता तथा उतने ही ब्राह्मण, उपनिषद्, प्रारण्यक में जा पड़ी । यही सनातनधर्मका पक्ष है । ( ऊ ) ' नोनयति ' - ( पा. ३।१।५१ ) यह भी वेदके प्रयोगका बतानेवाला सूत्र है । इस पर स्वामीने लिखा है- ' छन्दस्यनुव-र्तते ' । इसके उदाहरणों में स्वामीने लिखा है- ' ऐलयी:, प्रर्दयी: -इति वेदे । पर यह चारों वेदपोथियोंमें नहीं मिलते । अतः इनकी सत्ता अन्य शाखाब्राह्मणों में सिद्ध हो जानेसे वे भी वेद सिद्ध होगये । इस निबन्धसे यह सम्यक् सिद्ध होगया कि - पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि, यास्क, निघण्टु आदि वादिप्रतिवादिमान्य-विद्वानों वा ग्रन्थोंके अनुसार ११३१ मन्त्रसंहिता तथा शब्द - अर्थ-के नित्य सम्बन्ध होनेसे उतना ही मन्त्र ब्राह्मरण - श्रारण्यक उप-निषद् यह सारा साहित्य ही चार वेद हैं । यही सनातनधर्मका भी पक्ष है । तभी पारस्करगृह्यसूत्र में भी वेदका लक्षण बताते हुए कहा है- ' विधिविधेयस्तर्कश्च वेदः ' ( २६५ ) यहां पर विधिसे ब्राह्मणभागका विधिभाग और तर्कसे उसका अर्थवादभाग और CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण ( ग ) ७६३ ७६४ विधेय - ब्राह्मणभागसे प्रयोज्य मन्त्रभाग — इस प्रकार मन्त्र- सं., स ब्राह्मण दोनोंको ही वेद माना है । यही हरिहरभाष्यमें लिखा है- “ कियान् वेद इत्यपेक्षायामाह । विधिः - ' अग्निमादधीत भी यह चा ... इत्यादि विधायकं ब्राह्मणवाक्यम् । विधेयः - विधीयते = न्दिनश विनियुज्यते ब्राह्मणवाक्यत्वेन कर्माङ्गत्वेन इति विधेयो मन्त्र- मन्त्रभ इषे त्वादिः । तर्कोऽर्थवादः [ इति वेदः ] । वही स ( ११ ) यह बात भी विशेष ध्यान देने योग्य है कि - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद कहीं भी नहीं मिलते । जहां भी मिलते हैं, वहां ऋग्वेदसंहिता, यजुर्वेदसंहिता, सामवेदसंहिता, और ( अथर्ववेदसंहिता ही मिलती हैं । इसका भाव यह है कि यह में कृष्णव कर ऋग्वेदकी संहिता है, यह शुक्लयजुर्वेद की संहिता है - इत्यादि । फिर उस पर प्रश्न होता है कि यह ऋग्वेदकी कौनसी संहिता गौर, है, अथर्ववेदकी कौनसी संहिता है, तो उस पर यह उत्तर मिलता इसपर है कि यह ऋग्वेदकी शाकल्यसंहिता है, अभी इसमें २० संहिता ऋषिक अन्य हैं । यह यजुर्वेदकी वाजसनेयी - माध्यन्दिनी संहिता है, जाता अभी इसकी १०० संहिता ग्रन्य हैं । यह सामवेद को कौथुमी. है । संहिता है, अभी इसकी ९ ६६ संहिता अन्य हैं । जिसे प्रथर्ववेद लाउड कहते हैं, वह उसकी शौनकसंहिता है । अभी उसकी - अभ्य- है । संहिता है । इसका भाव यह हुआ कि उस उस वेदकी सभी कर ही वह वह वेद बनता है । इससे सभी ११३१ सिद्ध हुई । यह शाखाओं के वेदत्वमें बड़ा भारी बड़ी प्रबल साक्षी है । प्रतिपक्षियोंको भी इधर चाहिए । ब्राह्मणभाग अभी इनसे अतिरिक्त है का प्र होती संहिता मिल संहिताएँ वेद प्रमाण तथा बाहर कि - इ ध्यान देना उनसे , ' शब्दार्थके सम्बन्धकी नित्यतासे वह भी वेद ही है, और इतना ही है । कहा आर्यसमाज के मत में केवल चार पोथियां ऋग्वेदसं., यजुर्वेद- हजार वह Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 399

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 399 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७६३ II रमन्त्र- सामवेदसं. और अथर्ववेदसं. ( वैदिकयन्त्रालय में छपी हुई ) ष्य में सं., वेद हैं, यह भी क्रमसे शाकल्यशाखा, वाजसनेय- माध्य-भी यह चार कौथुमशाखा, शौनकशाखा नाम वाली चारों वेदों के नमादधीत बघीयते न्दिनशाखा, एक - एक संहिता है । यह अपूर्ण वेद हैं । सो इससे यो मन्त्र = मन्त्रभागकी सनातनधर्मका ही पक्ष सिद्ध हुआ कि सभी वेदशाखाएं : - वही बंद हैं; क्योंकि — शाखाओंसे अतिरिक्त शास्त्री, भागोंसे अतिरिक्त - ऋग्वेद भागी, कहीं भी स्वतन्त्र रूप से नहीं मिला करता । , जहां भी ( ख ) श्रार्यसमाज - विनयनगरसे समायोजित सभानोंमें व्र. हता, र कृष्णदत्तका व्याख्यान लाजपतनगर, जङ्गपुरा आदिमें गत दिनों कि-- यह में कराया गया था । उसे आर्यसमाजी विद्वान् श्रीसुरेन्द्रशर्माजी इत्यादि । गौर, शृङ्गी ऋषिका अवतार मानते हैं! ' वैदिकधर्म ' में उन्होंने संहिता इसपर लिखा था । आर्यसमाजोंका विश्वास है कि उसमें शृङ्गी-मिलता ऋषिकी आत्मा उतरती है । वह खाट पर कपड़ा प्रोढ़कर लेट संहिता जाता है । पन्द्रह मिनट के बाद अपने मुँ हसे कपड़ा हटा देता हिता है, है । फिर सिर हिलाने लगता है । इसी बीच में उसके ऊपर कोथुमी. लाउडस्पीकर लगा दिया जाता है, वह वेदमन्त्र बोलने लगता अथर्ववेद है । फिर वह हिन्दी में भाषण करता है । स्वामी तथा महानन्दी अन्य- का प्रश्नोत्तर सुनाता है, जिसमें प्रायः आर्यसमाजी विचारधारा होती है । इता मिल ताएँ वेद जो मन्त्र वह बोलता है, वे आर्यसमाजसम्मत वेदके न होकर रण तथा वाहरके मालूम होते हैं - इससे आर्यसमाजका सिद्धान्त गिर गया न देना कि इन्हीं चार वेदपोथियोंके मन्त्र ही वेदमन्त्र हैं, अधिक नहीं, शब्दार्थ के उनसे न्यून भी नहीं । हमें एक विश्वस्त प्रार्यसमाजी शिष्यने है । कहा था कि- ' ब्रह्मचारी यह भी कहता है कि वेदके मन्त्र ३७ यजुर्वेद- हजार हैं, जबकि आर्यसमाज २२ हजार के लगभग मानता है । वह कहता है कि - स्वा. द. जीको भी सारे वेदमन्त्र नहीं मिल CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वेदस्वरूपनिरूपण ( ग ) सके । इससे आर्यसमाजका ७६५ उस व्यक्ति में दो - तीन ग्रात्माएँ वेदविषयक सिद्धान्त कट गया । का तत्काल आती हैं; तब ' मृतकों की ग्रात्मा-पुनर्जन्म हो जाता है ' यह श्रार्यसमाजका सिद्धान्त भी कट गया । इसमें श्राद्धसिद्धि भी हो गई, मरे हुएकी ब्राह्मण में भी आ - जा सकती है । तीसरा सुश्रुत श्रात्मा अनुसार यह भूतविद्या होनेसे ब्रह्मराक्षसका चरक संहिता के आर्यसमाजको भूत - प्रेत भी मानने पड़ेंगे प्रवेश है, श्रव विशारद प्रेतोंको बुलवाकर । जोकि प्रेतविद्या-करवाते हैं, आर्यसमाज किसी माध्यमके द्वारा वातचीत उसे नहीं मानता था, अब उसे यह भी मानना पड़ेगा । कई स्त्रियां भी सिर हिलाती हैं, उनमें देवीका आवेश माना जाता है, अव ग्रार्यसमाज उसे भी पाखण्ड नहीं कह सकेगा । मुख्यतः इससे सिद्ध हुआ कि वेदे ' केवल चार पोथिय नहीं, किन्तु ११३१ संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषद् आदि मिलकर ही चार वेद हैं । एक प्रश्न यह भी होता है कि जब सभी शाखाएं थोड़ेसे पाठभेदमात्र वाली हैं; तवं इन वर्तमान चार शाखा ( वेदपोथियाँ ) . होने पर शेष शाखाओं की क्या प्रावश्यकता है? यह प्रश्न भी व्यर्थ है । तब तो इन चार वेदपोथियोंके बहुतसे मन्त्र वरावर ' मिलते हैं । सामवेदसं. के तो ७० मन्त्र के अतिरिक्त शेष ऋ.सं. से लिये गये हैं । यजुर्वेदसं. तथा अथर्वसं भी ग्राधी ॠग्वेदसं. से लौं गई है । ॠग्वेदसं.में ही ४०० मन्त्र पुनरुक्त हैं, तब उन संहिताओं वा पाठोंकी ग्रार्यसमाजियोंको नहीं मानना पड़ेगा । ' वे फिर उन उन वेदसंहिताओंसे उन - उन मन्त्रोंको निकलवाकर ' उन पोथियोंको हलका करवा लें । पर यदि चे इन शाखाओंमें वैसा नहीं करतें, तव अन्य शाखाओं में भी वैसा प्रश्न व्यर्थ है । अपनी अपनी - कुलपरंम्परा में शाखाभेदको चरितार्थता होजायेगी, An eGangotri Initiative

पृष्ठ 400

सनातन धर्मालोक ७, पृष्ठ 400 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७६६ श्रीसनातनधर्मालोंक ( ७ ) पर वेदत्व सभीका होगा । यह वेदस्वरूपको बतानेवाला हमारा निबन्ध सूत्ररूप है । यदि पाठकगरण इसका भाष्य वा व्याख्या देखना चाहें, तो ' आलोक ' के ४ र्थं पुष्पमें - ' वेदविषय में भारी भूल ' तथा ' श्री-पतञ्जलि एवं शंनोदेवीरभिष्टये मन्त्र ' यह दो निबन्ध तथा छठे सुमनमें ' वेदस्वरूपरणनिरूपण ' ( ख ) ( ब्राह्मणभाग भी वेद है ) यह निबन्ध तथा भ्रष्टमपुष्पमें ' वेदस्वरूपनिरूपण ' ( क ) ( शाखाओं - संहिताओंका वेदत्व ) यह निबन्ध देखें । आगे इस विषय पर एक बृहत् पुस्तक बनानेकी भी योजना है । इससे पाठकगणोंको इस विषयका पूर्ण ज्ञान हो जायगा । अब मागे ' वेदसंज्ञाविमर्श ' ( आर्यसमाज कानपुरसे प्रकाशित ) के प्रपनेसे सम्बद्ध कुछ पृष्ठोंपर विचार दिया जाता है । ( १५ ) ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर feare ' आलोक ' के ४ थं तथा ६ ठे पुष्पमें हमने शाखाओं एवं ब्राह्मणभागके वेदत्वपर विचार दिये थे, उनमें कुछ अंशोंपर श्रीविद्याधरजी मन्त्री केन्द्रीय श्रार्य सभा कानपुरने बहुतसे प्रायं-समाजी - विद्वानोंके अवलम्बसे बनाये हुए ' वेदसंज्ञाविमर्श ' के ८० से ८ पृष्ठ तक विचार रखा है । यह मुझे गत दिनों मिली, और उस पर हमने लिख डाला । अब उसे इस पुष्पमें रख रहे है । पूर्व हम संयुक्त - मन्त्री आर्यसमाज के उन विचारोंको रखते हैं, जहां उन्होंने हमारे विचार एक प्रकारसे मान लिये हैं । ( १ ) हमने लिखा था कि - समाज निरुक्तके ' समास्तायः CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ७६ ७६७ समाम्नातः ' ( १ | १ | १ ) ' छन्दोभ्यः समाहृत्य समाम्नाताः वैदि ( १॥१॥४ ) इन शब्दोंमें ' समाम्नाय ' तथा ' छन्द ' का अर्थं वेद, बल्कि- ' वेदप

वेदका केवल मन्त्रभाग अर्थ मानता है । इसीलिए ' आदि श्रार्यसमाजी यहांपर ' छन्द: ' का अर्थ ' मन्त्रभाग कुशवाहा ' ' हैं । ‘ वेदसंज्ञाविमर्श ' • ( ३- ९ ४ पृष्ठ में ) भी मन्त्री - आर्यसमाज- उपि निरुक्तस्थ ' छन्दोभ्यः ' का ' मन्त्रभाग ' श्रथं माना है भाग अर्थ नहीं माना । यदि ' छन्द ' का अर्थ यहां, ' मन्त्रभाग ब्राह्मण-और ब्राह्मणभाग ' दोनों हैं; तब स्वा. द. जो आदि के म ' छन्द ' का अर्थ ' वेद ' होनेसे ब्राह्मणभाग भी ' वेद ' सिद्ध अनुसार हुआ । क्योंकि निरुक्त बेदका भाष्य माना जाता है, लोकभाषाका नहीं; और वह श्रोत्रनामक ‘ वेदाङ्ग ' है, ' लोकभाषाङ्ग ' नहीं, इससे वैद कठिन मन्त्रब्राह्मरणात्मक ही प्रतिफलित हुआ । यह ' समाम्नाय ' शब्द. पादि निघण्टुके लिए आया है । ' समाम्नाय ' वेदको कहते हैं । इस- कार लिए निघण्टुको भी ' वैदिक - कोष ' वा वेदाङ्ग ( निरुक्त ) कहा निरुत्र जाता है । तब उस निघण्टुके सभी शब्द आर्यसमाजियोंकी उन्हो अभिमत चारों वेदपोथियोंमें तो मिलने चाहियें, क्योंकि वे वेद सिद्ध मन्त्रभागकी केवल इन चार वेदपोथियोंको ही मानते हैं । जो । वर्तमान आर्यसमाजी वेदकी चालू चार पोथियोंको पूर्ण मानते प्रतिम हैं, न उनमें कुछ प्रक्षिप्त मानते हैं, और न न्यून | ' वेदसंज्ञा- उन्हें विमर्श ' ( पृ ० १२४ ) में आर्यसमाज के मन्त्रो भी कहते हैं- ' वेबक कर । ' पूर्णतया उपलब्ध होनेसे ' । ' वेद जितने हैं, तथा जितना उनका प्रमारण है, वे सब मिलते हैं । जब ऐसा है, तत्र निघण्टुमें ' यहः, तिघण्ट - मल्मलीभवन् आदि शब्द, तथा निरुक्त में उद्धत वेदमन्त्र वेदों- थी । में मिलने चाहियें, ( देखिये गत १० वां निबन्ध ) पर नहीं मिलते । सार तब क्या उनके अभिमत वेद प्रपूर्ण हैं? यदि ऐसा है, तो आर्य- ब्राह्मर समाजका वैदिक - धमं भी अभी अपूर्ण ही हुआ । उन प्राप्त मन्त्रभ Gujarat. An eGangotri Initiative