सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 381–390

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) 025 ७२७ कहा था कि - ' मा मां नरेन्द्र त्वमधर्मभाज प्रदेशके अनुसार जंचता धर्मोऽयम शिष्टदृष्टः । भवान् निवेश्यः प्रथमं ततोऽयं भीमो न चिन्त्यकर्मा || अहं ततो नकुलोऽनन्तरं मे पश्चादयं । महाबाहुर । ( १६३ । ५-६ ) अर्थात् हम सब ही माताकी नल- महदेवस्तरस्वो इसके स्वामी बनेंगे । इस प्रकार अर्जुनको प्राज्ञाके अनुसार रोहि परीक्षाके समाप्त होनेपर युधिष्ठिरने भी स्वयं इसका अनुमोदन किया और कहा- ' सर्वेषां द्रौपदी भार्या भविष्यति हि नः शुभा ' । तनोंकी ( १३ । १६ ) ( ' द्रौपदी हम सब लोगोंकी भार्या बनेगी । ' माता सुन्तोने भी युधिष्ठिरकी तरह ही श्रीव्यासदेवको कहा ' एवमेतद् भवद् या प्राह धर्मचारी युधिष्ठिरः । श्रनृतान्मे भयं तीव्र मुच्येऽहम-१३८ । तवात् कथम् ॥ ( १६८ । १८ ) ( धर्मका आचरण करनेवाले क्षाकी पुधिष्ठिरने जैसा कहा है, वह ठीक है । मुझे झूठसे बड़ा भय मघमं | लगता है । बताइये - मैं झूठसे कैसे बचूंगी? ) इससे स्पष्ट है कि-' क ' का ग्रन्थकारके मतमें, कुन्तीके मतमें तथा युधिष्ठिर कि पादिके मत में समान ही ' उपभोग ' अर्थ है । पूर्वपक्षवालों के अमी- अनुसार ' रक्षण ' अर्थ माननेपर भी कोई लाभ नहीं, तब तो बहु तपर प्रोपदी सब पाण्डवों से मिलकर संरक्षणीय ही हो जायगी । उसके चि साथ ' प्रोवाच भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे ' इस पूर्वपक्षवालोंसे सम्मत न - पुण्य माताकी आज्ञाको सूचित करनेवाले वचनके अनुसार अर्जुन भी हा है- दिवाह नहीं कर सकेगा । वह भी सारी श्रायु उसे पाल हो सकता है, न उसका उपयोग कर सकता है, न उससे पुत्र ही उत्पन्न कर सकता याज्ञ- है; क्योंकि कुन्तीका यह प्रादेश अर्जुनके लिए कुछ विशेषता नहीं वह्नि- खलाता, किंतु सभीका द्रौपदीके साथ समान ही व्यवहार कहता है । को यह इससे अथवा – यदि कुन्ती पाण्डवोंको ' भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे ' ता है । ( १ ९ ३ । २ ) यह वचन न कहती, तो क्या अर्जुनके साथ विवाही वैदिक ई भी उसकी रक्षा सभी भाई न करते? अवश्य करते । इस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. एक पति वा पांच? ७२६ कारण पूर्वपक्षवालोंकी यह कल्पना कोई महत्त्व नहीं रखती, प्रतः उनका यह कल्पना - प्रासाद यहाँ गिर पड़ा है, यह पाठकोंने देखा होगा । पूर्वपक्षवालोंने ' तैत्तिरोय ' के प्रमाणसे पत्नीको ' गृहलक्ष्मी ' बताया है, तब जब उनके मतके अनुसार कुन्ती द्रौपदीको सबकी ' गृहलक्ष्मी ' बनाना चाहती है, और उसके पालनका आदेश देती है, जब पूर्वपक्षवालोंके अनुसार युधिष्ठिर प्रादि पाँचों प्रत्येकमें पञ्चभावसे रहते थे, तो वह भी सबकी वास्तविक पत्नी थी, वे भी उसके वास्तविक पति सिद्ध हुए, क्योंकि पूर्वपक्षके अनुसार पांचोंका पञ्चत्व एक - दूसरेमें है । जो कि यह कहा जाता है कि कल्पना करनेवालोंने मूलमें स्वसम्मत भाव मिला दिये, सो यह बात प्रमारणहीन है; नहीं तो महाभारत में अग्निसे प्रकट हुई द्रौपदीको भी कल्पित मान लेना पड़ेगा । द्रौपदीकी तरह ग्रन्य स्त्रियां भी कुरुवंशमें उस समय तीन - चार पतियोंवाली क्यों नहीं दिखलाई गई? दुर्योधनकी स्त्री भानुमती भी सौ भाइयोंकी स्त्री क्यों नहीं बताई गई? इससे स्पष्टतया यह ' अपवाद ' है । इधर पद्यका ' कुटोगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्रौं प्रोवाच भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे ' ( १ ९ ३ । २ ) इसका पूर्वार्धं वास्तविक मानकर ' पश्चाच्च कुन्ती प्रसमोक्ष्य कृष्णां कष्टं मया भाषितमित्युवाच ' ( १ ९ ३ । २ ) उसके उत्तरार्धको काल्पनिक मानना पूर्वपक्षवालों का अर्धजरतीय - न्यायका अवलम्वन करना है । यदि पूर्वाधं ही नालंकारिक वा प्रप्रक्षिप्त वा वास्तविक है, इसीलिए उद्धृत किया जाता है, उसीसे अपने पक्षकी पुष्टि समझो जाती है, मो वह भी हमारे पक्षको पुष्टि करता है — यह बात विज्ञ पाठक देखें । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 382

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७३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ' कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्रौ प्रोवाच भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे ' यही पूर्वपक्षसम्मत पूर्वाधं है । इसमें ' कुटीगता सा त्वन-वेक्ष्य पुत्रौ ' ये पद साभिप्राय हैं । कुटी में होनेसे, और पुत्रों ( भीम, अर्जुन ) को न देखनेसे ही कुन्तीने उक्त प्रमाद किया, यह बात उक्त पदोंसे सिद्ध होती है, नहीं तो, ' कुटीगता सा ' ' पुत्री अनवेक्ष्य ' इन पदोंके कहने की आवश्यकता ही नहीं थी; क्योंकि इन पदोंके प्रसाभिप्राय होनेसे अपुष्ट दोष उपस्थित हो जाता है । इधर इस पद्य पूर्वकेमें पद्य में प्रतिदिनको भिक्षाका संकेत किया गया है, उधर इस पद्य में कुटीमें होनेसे उसके द्वारा पुत्रोंको न देखना कहा है, तब उस भिक्षाका कुन्तीद्वारा कहे हुए ' भुत ' इस पदसे प्रतिदिनकी तरह ' उपभोग ' अर्थ ही अभीष्ट है, ' सरक्षण ' अर्थ नहीं । प्रतिदिनकी भिक्षाका ' संरक्षण ' नहीं होता था, किन्तु परस्पर यथाविभाग उपभोग ही किया जाता था । हां, यदि कुन्तोके द्वारा पुत्रोंका अनवेक्षण न होकर अवेक्षरण-( दर्शन ) होता, भिक्षाकी विलक्षणता का भी उसे ज्ञान होता, तब अवश्य यह न कहती । अतः " भुज् धातु यहां ' पालनार्थक है ' तुम सब मिलकर इस द्रौपदीरून गृहलक्ष्मीको पालो ' यह कुन्तीका अभिप्राय था, " यह पक्ष सिद्ध नहीं हुआ । इसमें उसी पूर्वपक्ष-वालोंसे उद्धृत, अप्रक्षिप्त तथा अनालङ्कारिक पद्यके ' कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्रौ ' इस प्रथम पादमें आये हुए ' कुटीगता ' ' अनवेक्ष्य पुत्रौ ' ये ग्रन्थकारके पद प्रमाण हैं । तात्पर्य यह है कि यदि कुन्ती कुटी से बाहर होती, भिक्षाको भी वह देख लेती, तब तो कुन्तीको ' उपभुङ्क्त ' वहो अर्थ विवक्षित होता, जो पूर्वपक्षवाले करते हैं, पर अब जब कुन्ती कुटीमें है, उस-ने पुत्रोंके साथकी भिक्षा भी नहीं देखी, तब किसी भी युक्तिसे कुन्तीका वह अभिप्राय कल्पित नहीं हो सकता । उसी कारण CC - 0. Ankur Joshi Collection द्रौपदीका एक पति वा पांच? ७३१ पूर्वपक्षवालों को बलात् इस अभिप्रायको दिखलानेके लिए देवाः ) करने के अवसरपर अपने दिये हुए इस पूर्वार्धके पद्यका प्रथमपाद अर्थ महारथ लोकदृष्टिसे छिपाना पड़ जाता है । प्रथमपादके सामने रखनेपर दे अपने कहे हुए उक्त अभिप्रायको कहीं निकाल सकते । पू

श्लोकके चार पादोंमें उन्हें केवल दूसरा पाद ही अपना अभि ( ऋ

प्र ेत श्रर्थं सिद्ध करनेके लिए लोक- दुष्टिमें रखना पड़ता है । व का पारि

इस पादके शेष तीन पाद कौन से हैं - यह बताना उनका कर्त्तव्य उत्तम म रह जाता है । द्रोपदी कई अन्य महाशयोंका यह अभिप्राय है कि ' जब अर्जुनने बाती थी मत्स्यवेध किया था, तब धर्मसे वह द्रौपदीका पति हो गया, तब दिव्य ह युधिष्ठिरका अनुजवधूके साथ सम्बन्ध कैसे युक्त हो सकता है? ' कन्यात्वं इस पर जानना चाहिये --- यदि मत्स्यवेधनमात्रसे अजुन पति लंबे इस तथा द्रौपदी पत्नी होती, तो उसके बाद विवाहकी श्रावश्यकता क्यों विवाहका होतो? जैसे कि युधिष्ठिरने कहा था कि " त्वया जिता पाण्डव तो यह दूस याज्ञसेनी ··· प्रज्वाल्यतां हूयतां चैव वह्निर्गृ हारण पारिंण विध॒त् ति । त्वमस्याः । ” ( १६३॥७ ) इससे स्पष्ट है कि विवाह ही पतिपत्नीत्वका साधक होता है । वह यह कुन्ती के पूर्ववचनसे द्रौपदीका सब पाण्डवोंसे भिन्न - भिन्न हुआ, ई थी, केवल से ही नहीं हुआ । तब वह पत्नी भी पाँचों की हुई, तेथे? एकमात्र अर्जुनकी नहीं । अधिक एक यह भी प्रश्न सम्भव है कि - ' विवाहिता कन्या नहीं रह जाती, तब युधिष्ठिर आदिसे विवाहित हुई, उसका अकन्या होने को बच से भी भीम आर्दिसे विवाह कैसे हुआ? ' इसमें यह जानना रूप घा चाहिए कि यह अपवादस्थल है; क्योंकि वह विवाहिता भी पुनः लिए सिं कन्याभावको प्राप्त कर लेती थी । जैसे कि ' महाभारत ' में कहा हो ' मिसा ' गया है – ' क्रमेण चानेन नराधिपात्मजाः ' ( भीमाजु ननकुल सह-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 383

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श्रीसनातनधर्मालोक ७३१ ७३२ ( ७ ) ( देवा:) वरस्त्रियास्ते जगृहुस्तदा करम् । श्रहन्यहन्युत्तमरूपधारिणा ए अर्थ कौरववंशवर्धनाः ' ( १ । २०० । १३ ) -- इदं च तत्रा-थमपाद महारथाः जगाद देवर्षिरतीतमानुषम् । महानुभावा पर बे भुतरूपमुत्तमं बभूव कन्येव गते गतेहनि ॥ ( १४ ) किल - पूर्व | सुमध्यमा ( क्रम से राजकुमार पाण्डवोंने एक - एक दिन वरस्त्री द्रौपदी है अभि- । व का पाणिग्रहण किया । देवर्षि नारदने वहाँ घटित हुई इस अद्भुत - कर्त्तव्य उत्तम और अलौकिक घटनाका वर्णन किया है कि महानुभावा द्रोपदी प्रतिवार विवाह के दूसरे दिन कन्याभावको प्राप्त हो जुनने बाती थी । ) या, तब दिव्यदृष्टि श्रीव्यासजीने श्रग्निसे उत्पन्न दिव्य - कन्या द्रौपदीकें ता है? " स्यात्वको दिव्यदृष्टिसे देख लिया, प्रतएव उन्होंने वैसा लिखा । न पति तब इस प्रकार अलौकिक होनेसे द्रौपदीका विवाह सामान्य- । कता क्यों विवाहका नाका विषय नहीं, अतः यह अपवादस्थल ही जानना चाहिए | न पाण्डव तो यह दूसरेसे अनुकरणीय ही है, और न यहं प्रथा हीं उस समय विषुवत् प्रचलित थी । यह जो कहा जाता है कि ' कृष्णा तो प्रतियोगिता में जीती है । वह ई थी, भिक्षाकी तरह नहीं माँगी गई थी । तब धर्मभीरु, एवं हुआ हुई,, स्लवादी अर्जुन अथवा भीम द्रौपदीको ' भिक्षा ' शब्द से कैसे कह तेथे? " इसपर जानना चाहिए कि क्षत्रिय होनेसे उन्हें भिक्षा-प्र प्रधिकार ही नहीं था, तब ये भिक्षाके लिए जाते ही कैसे नहीं रह । वस्तुतः यहां रहस्य यह है कि पाण्डवोंने लाक्षागृहसे अपने होने को बचाकर तब दुर्योधनको प्रतारित करने के लिए ब्राह्मण जानना धारण कर लिया था । बाह्मण रूपको ही प्रसिद्ध करने पुनः लिए माका नय करते थे, जिस किसी भी लाई में कहा ' मला ' शब्द से पुकारा करते थे । इसीलिए हुई वस्तु कुलसह समाज ' महाभारत ' में कहा ब्रह्मणी वृत्तिमाश्रिताः । तान् सम्प्राप्तस्तथा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. द्रौपदीका एक पति वा पांच? ७३३ वीराञ्जज्ञिरे न नराः क्वचित् ' । ( १ । १८७ १७ ) ( वहाँ ब्रा-वहां वृत्तिका आश्रय ले वे भिक्षा मांगकर लाते थे । इस प्रकार सके पहुँचे हुए पाण्डव- वीरोंको कोई भी मनुष्य पहचान ) । न यहां स्पष्ट है कि उन्होंने भिक्षाको अपने छिपानेका साधन बनाया था । ब्राह्मणरूपकी प्रसिद्धिमें ही अर्जुन ग्रादिने द्रोपदीको किया था । भार्गवको कर्मशाला में प्राप्त होकर जनदृष्टिमें प्राप्त श्रापको ब्राह्मण परिचायित करनेके लिए ही जैसे वे प्रतिदिन अपने- ' हम भिक्षा लाये हैं ' यह कहा करते थे, वैसे ही द्रौपदीके लानेके दिन भी कुटीसे बाहर ही उन्होंने ऊँचे स्वरसे ' हम भिक्षा लाये हैं ' यह कहा । यह सब कुछ ' चारैः पश्यन्ति राजान: ' इस नीतिसे राजा दुर्योधन की दृष्टिमें ( क्योंकि वे लोग भी वहां उपस्थित थे ) अपने छिपाने के लिए था । तभी दुःशासनने भी पीछेसे कहा था-' यद्यसौ ब्राह्मणो न स्याद् विन्देत द्रोपदी न सः । ( २०२१११ ) अर्थात् यदि अर्जुनने ब्राह्मरणका रूप धारण न किया होता, तब वह द्रौपदीको न पा सकता । अर्जुनके ' घर्मभीरु ' तथा सत्यवादी ' - ये दो विशेषण पूर्वपक्षि-द्वारा अपने पक्ष सिद्ध करने के लिए ही दिये गये मालूम होते हैं । परन्तु अर्जुन आदि इस अपने ब्राह्मणत्वको परिचायित करने के लिए आपत्कालको नीतिके अनुसार सर्वत्र असत्य बोलते थे । तभी जब ब्राह्मणवेषधारी अर्जुनते लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको जीता था, तब करणं प्रादि उससे युद्ध करने लगे । उस समय कने उससे पूछा कि - ' तुम ब्राह्मण हो वा कोई अन्य? " इसपर अर्जुन-ने उत्तर दिया- ' तमेवंवादिनं तत्र फाल्गुन: ( अर्जुनः ) प्रत्यभाषत । ब्राह्मणोऽस्मि युधां श्रेष्ठ! सर्वशस्त्रभृतां वरः । ( १ । १६२ । २०-२१ ) यहाँपर पूर्वपक्षीको बताना चाहिये कि धर्मभीरु ' और An eGangotri Initiative

पृष्ठ 384

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७३४ श्री सनातनधर्मा लोक ( ७ ) सत्यवादी ' अर्जुनने अपने आपको ब्राह्मण सत्य कहा वा श्रसत्य? ' एवमुक्तस्तु राधेयो युद्धात् करर्णो न्यवर्तत । ब्राह्मं तेजस्तदा-जय्यं मन्यमानो महारथः ॥ ' ( १६२ । २३ ) यह असत्य भाषण अपने ब्राह्मणत्वके परिचायित करनेके लिए दुर्योधनकी दृष्टिमें ( क्योंकि वे लोग भी वहां उपस्थित थे ) अपने - आपको छिपाने के लिए था । जब द्रौपदीको जीतकर वे घर ले गये, तब कुटियासे बाहर ही उन्होंने ऊंचे स्वरसे ( क्यों-कि कुन्ती उस समय अंदर थी ) ' भिक्षा लाने के ' शब्दका उच्चारण किया, तब अनुसंधानके लिए आये हुए लोगोंने उन्हें ' भिक्षा- ' शब्दसे वास्तविक ब्राह्मण माना । सायंकाल वे फिर भिक्षा मांगने के लिए गये | जैसे कि - ' सायं च भीमस्तु रिपुप्रमाथी जिष्णु-र्यमौ चापि महानुभावौ । मेक्षं चरित्वा तु युधिष्ठिराय निवेदयाञ्च-कुरदीनसत्त्वाः ॥ ( १ । १६४ । ३ ) यह सुनकर संदेह में पड़ हुए द्रुपदने भी उनसे पूछा- ' कथं जानीम भवतः क्षत्रियान् ब्राह्मरणानुत ॥ १७ । २ ) - जहाँ इस प्रकररणसे कर्म से वरर्णव्यवस्था हटती है, वहां द्रौपदीको ' भिक्षा ' शब्दसे कहने के कारणपर भी प्रकाश पड़ता है । जो यह कहा जाता है कि- ' द्रुपद श्रलं नको ही द्रौपदी देना चाहता था, यही जानकर युधिष्ठिरने लक्ष्यवेध नहीं किया, नहीं तो वह भी समर्थ था, और बड़ा भाई होनेसे अधिकारी भी था, " ' 7 यह बात भी ठीक नहीं, प्रत्युत पूर्वपक्षसे उपस्थापित पद्यसे भी विरुद्ध है । ' महाभारतमें यह संकेत ही नहीं दिया गया कि युधिष्ठिर आदि इस विषयमें द्रुपदकी अभिलाषा जानते थे'-' यज्ञसेनस्य कामस्तु पाण्डवाय किरीटिने । कृष्णां दद्यामिति सदा न चैतद् विवृणोति सः, ( १।१८७।८ ) इस पद्यके चौथे पादमें तो यह बताया है कि द्रपद अपनी उक्त अभिलाषाको CC - 0. Ankur Joshi Collection द्रौपदीका एक पति वा पांच? ७३५ ७३ किसी के आगे प्रकट नहीं करते थे । यही बात ' अयं द्रुपदस्य राज्ञो हृदि स्थितो नित्यमनिन्दितांगाः हि कामो । यदर्जुनो वै पृथुदीर्घबाहुर्धर्मेण विन्देत सुतां मर्मताम् ॥ ( १ । १६५ । १६ ) इस पद्य में भी ' हृदि स्थित: ' इस पदसे अप्रकट, ब्रुपदके हृदयस्थ मनोरथको युधिष्ठिर कैसे जान गये, कर्ण श्रादि कैसे न जान सके-इस प्रकार यह पद्य, उद्धरण करनेवालोंके ही पक्षको काट प्राव रहा है । ग्राव इधर युधिष्ठिर के लिए ' समर्थ ' यह पद भी महाभारत से विरुद्ध बत देख है । युधिष्ठिरने जो कि लक्ष्यवेध नहीं किया, उसमें कारण उसका श्रसामर्थ्य ही था । इसलिए श्रीद्रोणाचार्यने भी वैसी सामथ्र्यं न होनेसे युधिष्ठिरको इस परीक्षा में अनुत्तीर्ण कर दिया था, जैसे कि ' नैतच्छक्यं त्वया बेद्धुं लक्ष्यमित्येव कुत्सयन् । ' ( १३४।७६-७७ ७८ ) । अर्जुन जो कि इसमें साहस किया था, उसका कारण उसकी सामर्थ्य थी- यह द्रोणाचार्यको परीक्षामें १३५ अध्याय में स्पष्ट है, इस कारण अर्जुनने ही लक्ष्यवेध किया था ' यत् पार्थिवै रुक्मसुनीथवक्रं राधेयदुर्योधन- शल्यशाल्वैः । तदा धनुर्वेद परैर्नृसिंहैः कृतं न सज्यं महतोऽपि यत्नात् । ( १ । १६० । १६ ) इस प्रकार जिस धनुषको कर्ण तथा दुर्योधनादि डोरीसे नहीं जोड़ सके, तब उनसे न्यूनशक्तिवाले युधिष्ठिरकी भला उस लक्ष्यभेदमें क्या शक्ति थी? स्पष द्रौपदीके पञ्चपतित्वको प्रावृत्ति । है । इधर यह भी जानना चाहिए कि यदि द्रौपदीकी पञ्चपति-की कथा कल्पनामात्र या असत्य होती, तो असत्यका मूल स्थिर भव नहीं हुआ करता । उसके लिए ' महाभारत ' या अन्य ग्रंथ में कोई नीत संकेत होता, अथवा कहीं प्रसंगति पड़ती, पर कहीं भी प्रसंगति Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 385

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७३५ ७३६ । ' प्रत्युत द्रौपदीका पञ्चपतित्त्व अन्य प्रकरणों में हि कामो नहीं दीखती किया गया है; इस कारण यहां श्रवैयासिका दर्जुनो कई बार प्रवृत्त है । तात्पर्यनिर्णायक लिङ्गोंमें उपक्रम, उपसंहार तथा -५।१ ९ ) भी नहीं आदि मुख्य हुआ करते हैं, अभ्यासका अर्थ है पुनः पुनः हृदय स्थित प्रभ्यास मन सके- प्रवृत्ति । तो द्रौपदीका पञ्चपतित्व हु कोकाट हुआ है । उसके विवाहके उपक्रममें उसका पञ्चपतित्व बतलाया प्रावृत्त ही जा चुका है, अब उपसंहार में भी उसका संकेत नसे विरुद्ध देखना चाहिए । उसका ( क ) महाप्रस्थानमें जब पाण्डव हिमालयकी श्रोर गये, तब मध्यं न मार्ग में सबसे पूर्व द्रोपदी गिरी । भीमसेनने उसका कारण पूछा था, जैसे ' ( महाप्रस्थानिकपर्व २। ३-५ ) 1 तब युधिष्ठिर ने बताया- ' पक्ष--१७६-७७ पातो महानस्या विशेषेण धनंजये । तस्यैतत्फलमद्यषा भुङ्क्त पुरुषसत्तम ॥ ( महा ० २।६ ) कारण इसका पक्षपात अर्जुनमें अधिक था इसलिए गिरी है । यहां अध्याय द्रौपदीका पञ्चपतित्व स्पष्ट है । यदि अर्जुन ही एकमात्र उसका ना ' यत् पति होता, पाँचों पाण्डव नहीं, तब उसका अर्जुन पक्षपात उचित धनुर्वेद ही था । पांचोंकी पत्नी होने पर तो उसका एकके साथ पक्षपात १६ ) अनुचित होनेसे गिरना सोपपत्तिक है । तब द्रौपदीका पांचोंकी से नहीं पत्नी होना महाभारतके तात्पर्यका विषय सिद्ध हुआ । ला उस इस प्रकार जहां उपक्रम - उपसंहारमें उसका पञ्चपतित्व स्पष्ट है, वैसे ही अन्य प्रकरणों में भी उसकी बहुत प्रवृत्ति हुई है । दिङ्मात्र प्रदर्शन किया जाता है । चपति- ( ख ) नारदजीने पांचों पाण्डवोंको कहा था -- पाञ्चाली स्थिर भवतामेका धर्मपत्नी यज्ञस्विनी । यथा वी नात्र भेदः स्यात् तथा में कोई नीतिर्विधीयताम् ॥ ( श्रादिपर्व २१० । १८ ): संगति ( यह यशस्विनी पाञ्चाली आप पाँचोंकी एक पत्नी है, जिस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. द्रौपदीका एक पति वा पांच? प्रकार ग्रापलोगों में परस्पर भेद - फूट न हो जाय ७३७ लें । ' ) यदि यह पाँचों की पत्नी न, वैसी नीति कर कथन व्यर्थ था । होती; तो नारदजीका यह ( ग ) ' ते ( पाण्डवे ) लब्धा द्रौपदी भार्या सहायः पृथिवीलाभे वासुदेवश्च द्रुपदश्च सुतैः सह । ( ' उन पांचोंने पत्नीरूपमें वीर्यवान् । ( सभापर्व ४८ । ४ ) शकुनिने दुर्योधनको द्रौपदीको प्राप्त किया है । यह पाण्डवोंकी स्त्री द्रौपदीके लिए कहा है । ( घ ) द्यूतक्रीड़ाके समय शकुनिने युधिष्ठिरको ते वै प्रिया राजन् ग्लह एकोऽपराजितः कहा - ' प्रस्ति तयाऽऽत्मानं । परणस्व कृष्णां पांचाली पुनर्जय ' ॥ ( २ । ६५ । ३२ ) । यदि द्रौपदी एकमात्र अर्जुनकी पत्नी होती, तो शकुनि यूधिष्ठिरको द्रौपदीका लगानेके लिए न कह सकता । युधिष्ठिरके भी उसके दांव वह उससे स्वेच्छा व्यवहार कर सकता पति होनेसे पतित्व स्पष्ट है, तब उसका पञ्च-हो गया । महाभारतको यह प्रसिद्ध घटना कभी श्रालङ्कारिक नहीं हो सकती । ( ङ ) द्रौपदीने जुए में हरकर दुर्योधनके दास्यसे अपने - आप को छुड़ाने के लिए भीष्म प्रादिसे पूछा कि ' जब युधिष्ठिर द्यूतमें पहले अपने - आपको हार गये थे, तब उनको मुझे दाँवपर लगाने का क्या अधिकार था? इसमें आप व्यवस्था दीजिये । ' तब श्रीभीष्मने उत्तर दिया कि - ' न धर्मसौक्ष्म्यात् सुभगे! विवेक्तु ं शक्नोमि ते प्रश्नमिमं यथावत् । अस्वाम्यशक्तः परिणतुं परस्वं स्त्रियाश्च भतुं वंशतां समोक्ष्य ' ॥ ( २ । ६७ । ४७ ) । ( ' पति स्वयं पराजित होकर स्त्रीका स्वामी न होनेसे उसे दांवमें नहीं लगा सकता, अथवा स्त्री सभी अवस्थाओं में भर्ताके अधीन होती है, और भर्ता स्वयं पराजित होकर भी स्त्रीमें स्वामित्व होनेसे स ० घ ०४७ An eGangotri Initiative

पृष्ठ 386

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७३८ उसे दाँव लगा सकता है - यह में धर्मकी सूक्ष्मतावश व्यव-स्थापित नहीं कर सकता । ) इस भीष्म - वचनसे भी द्रौपदी युधिष्ठिरकी भी स्त्री सिद्ध होती है । तब एकमात्र अर्जुन ही उसका पति ' महाभारत ' को इष्ट नहीं । ( च ) ' तथा ब्रुवन्ती करुणं सुगध्यमा भर्तृन् कटाक्षः कुपितानपश्यत् । सा पाण्डवान् कोपपरीतदेहान् संदीपयामास कटाक्षपातैः ॥ ( २ । ६७ ४२ ) । वैशम्पायनके इस वचनमें क्रुद्ध द्रौपदीने अपने पतियोंकी ओर तिरछी दृष्टि से देखा । ' सा भर्तृन् पाण्डवान् ' इस पदसे द्रौपदी पांचोंकी पत्नी ग्रन्थकारको सम्मत सिद्ध होती है । ( छ ) ' साधाररणी च सर्वेषां पाण्डवानामनिन्दिता । जितेन पूर्वं चानेन पाण्डवेन ( युधिष्ठिरेण ) कृतः परणः ' ॥ ( २२६८।२३ ) ' एतत् सर्वं विचार्याहं मन्ये न विजितामिमाम् ' ( २४ ) । विकरके इस वचन से द्रौपदी सब पाण्डवोंकी समान पत्नी सिद्ध होती है । ( ज ) कर्णंने कहा था- ' एको भर्ता स्त्रिया देवैर्विहितः कुरु-नन्दन । इयं ( द्रौपदी ) त्वनेक ( पञ्च ) वशगा बन्धकीति विनि-श्चिता ॥ ( २ । ६८ । ३५ ) । अस्याः सभामानयनं न चित्रमिति मे मतिः । ( ३ ) । यदि द्रौपदी एकमात्र अर्जुनकी पत्नी होती, पांचोंकी नहीं, तो कणको ऐसी निन्दा करनेका साहस न होता कि- ' स्त्रीका एक ही शास्त्रानुसार भर्ता होता है, पर यह अनेकों-की स्त्री है, अत: कुलटा है । ' ( झ ) दुर्योधनने द्रौपदीको कहा था- ' तिष्ठत्वयं प्रश्न उदार-सत्त्वे भीमेऽर्जुने सहदेवे तथैव । पत्यौ च ते नकुले याज्ञसेनि वदन्त्वेते वचनं त्वत्प्रसूतम् ॥ ( २ । ७० । ३ ) न वित्र वन्त्यार्य-सत्त्वा यथावत् पतींश्च ते समवेक्ष्याल्पभाग्यान् । ( ६ ) | यहांपर ततीय - पद्यमें दुर्योधन द्रौपदीको सम्बोधित करके ' पति ' शब्दका CC - 0. Ankur Joshi Collection द्रौपदीका एक पति वा पांच? ७३६ सम्बन्ध युधिष्ठिरके साथ करके युधिष्ठिर को उसका ज्येष्ठ पति नेपाल बताता है । और छठे पद्यमें ' ते पतीन् ' इससे उसे पांचोंकी बता रहा है । इससे भी प्रकृतकी पुष्टि हो रही है । पली हीं वैसे ( ञ ) द्रौपदीने ( २ । ७१ । २ ९ -३० पद्यमें ) अपने में: पालनीय से उत्पन्न हुए प्रतिविन्ध्य नामक पुत्रको दासपुत्रता हटानेके युधिष्ठिर बात धृतराष्ट्र से वर माँगा, फिर ( ७१ । ३२ पद्यमें ) अवशिष्ट लिए उत्पन्न पाण्डवोंके दास्य हटाने के लिए दूसरा वर मांगा । इससे स्पष्ट चार है । २२३ कि वह केवल अर्जुनकी स्त्री नहीं थी, अपितु युधिष्ठिर श्रादि इसके सबकी पत्नी थी । इस सिद्धा ( ट ) ' महाप्राज्ञः सौमकिर्यज्ञसेनः कन्यां पाञ्चालीं पाण्डवेष्ट परिचित प्रदाय । ग्रकार्षीद् वै सुकृतं नेह किंचित् क्लीवाः पार्थाः पतयो एकस्य व याज्ञसेन्याः । ’ ( २ । ७७ । १० ) यहां द्रौपदीको दुःशासनने पांचों ध: ( यह पाण्डवों की पत्नी बताया है । ( ठ ) कुन्ती बनवासके गमन के समय द्रौपदीको उपदेश देती तुमर्हसि है— ' वत्से शोको न ते कार्यः प्राप्येदं व्यसनं महत् । स्त्रीधर्मा- शेह पाण्ड रणामभिज्ञासि शीलाचारवती तथा । ( २१७६ । ४ ) ' न त्वां धाज्ञा गुरू वचनं तथ्य सन्देष्टुमर्हामि भर्तृन् प्रति शुचिस्मिते । ( ५ ) यहांके ' भतृ ' न ' इस माणतः बहुवचन से द्रौपदी पांचोंकी समान पत्नी सिद्ध होती है । । वाले ' मात इस प्रकार महाभारत में अन्यत्र भी पुनः पुनः प्रवृत्तिरूप कारण य अभ्याससे तथा उपक्रम उपसंहार आदिसे स्पष्ट हो जाता है कि प्रेरणा भी महाभारतकारको द्रोपदी पांचों पाण्डवोंकी वास्तविक ही पत्नी मि जो य प्रेत है, एकमात्र अर्जुनकी नहीं । जब पूर्वपक्षानुसार युधिष्ठिर आदि पाँचों प्रत्येकमें पञ्चभावसे थे, तब सबको गृहलक्ष्मी द्रौपदी भी तरह, कु | इस पर उसको वास्तविक पत्नी और वे भी सब उसके वास्तविक पति सि शास्तविक द्ध हुए, अन्यथा यदि पूर्वपक्षप्रोक्त व्युत्पत्ति के अनुसार अर्जुन ही इसपर पञ्चपाण्डवात्मक था, तो अर्जुनसे अतिरिक्त चार पाण्डवोंको एक Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 387

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७३६ 180 ज्येष्ठ मानना पड़ेगा, पर पूर्वपक्षको भी यह इष्ट चोंकी पालङ्कारिक बसे ही ' वह एक अर्जुनकी ही स्त्री थी, दूसरोंसे केवल । पली हो । ' थी, दूसरे उसके संरक्षक थे, वास्तविक पति नहीं-में युधिष्ठिर पालनीय न सकी । इस कारण प्रत्येकसे द्रौपदी के पांच टाने के लिए बह बात सिद्ध न होनेका वर्णन भी काल्पनिक सिद्ध नहीं हो सका । शिष्टा ॥ उत्पन्न २२३ ॥ ७८-८०-८ ६०-८६ ) असे स्पष्ट है । इसके अतिरिक्त उस कालके लोग ' नकस्य बहवः सहपतयः ' नष्ठिर आदि के भी जाननेवाले थे । यह सिद्धान्त उस समय सिद्धान्त हरिचित नहीं था । तभी द्रुपद आदिने स्वयं भी कहा था— पाण्डवेभ्यः एकस्य बह्वयो विहिता महिष्यः कुरुनन्दन । नैकस्या बहवः पत 6. ( यह भी अपाणिनीय प्रयोग है । ) श्रूयन्ते पतयः क्वचित् । सनने पांचों ॥ १७ । २७ ) लोकवेदविरुद्धं त्वं नाधर्मं धर्मविच्छुचिः । लुमर्हसि कौन्तेय कस्मात् ते बुद्धिरीदृशी ॥ ( २८ ) तथापि धर्म-उपदेश देती | शीर पाण्डवोंका उसके अनुसरणमें एक कारण है, वह है--स्त्रीधर्मा | भाज्ञा गुरूणां ह्यविचारणीया ' । ( रघुवंश १४ । ४६ ) ' गुरूणां १ ) ' न त्वां वचनं तथ्यं सदोषमपि मानवैः । कर्तव्यमविचार्यैव शिष्टाचार-भर्तृ ' ' इस | भाणतः । ( देवी - भाग ० ८ । २४ । ५१-५२ ) इस प्रथको बताने-है । ' मातृदेवो भव ' इस प्रबल वैदिक आदर्शका पालन । दूसरा प्रवृत्तिरूप धरण यह है कि पांचों पाण्डव पूर्वजन्ममें एक थे, तो वहां जाता है कि रा भी वैसी होनी थी । पत्नी अभि जो यह कहा जाता है कि -- ' शेष सब रावण के दस सिरोंकी ष्ठिर आदि द्रौपदी भी | तरह, कुम्भकर्ण की छः मासकी नींदकी तरह रूपक वा काल्पनिक कपति सि | है इसपर यह जानना चाहिये कि रावण के दस सिर भी अर्जुन ही रास्ताविक थे, तथा कुम्भकर्णकी छः मासकी नींद भी वास्तविक पाण्डवको इसपर अन्य पुष्पमें विचार होगा । तब द्रौपदीको साध्वी एक - पतिका सिद्ध करनेके लिए पूर्वपक्षद्वारा बताया गया CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. द्रोपदीका एक पति वा पांच? ७४१ उपाय कल्पित ही सिद्ध हुआ है, उसमें किसी प्राचीन चीनको सहमति नहीं । जो कि नियोगसे या धर्वा-कुलमस्य ' इस व्युत्पत्ति से अर्जुनको उत्पन्न होने से ' न भी संगत नहीं जान पड़ता ' नकुल ' माना जाता है, यह था? नियोगसे उत्पन्न । क्या नकुलका यह नाम इसी कारण एकमात्र भी कुलरहित नहीं हुआ करते । क्या नकुल ही नियोगोत्पन्न थे? यदि सभी, तो सभीका नकुल ——कुलरहित क्यों नहीं कहा गया? क्यों क्षत्रिय वा कुरु माना गया । वस्तुतः यहां नियोग हो साध्य है, सिद्ध नहीं । ' क्योंकि धर्म, इन्द्र, वायु आदि मनुष्य नहीं ये द्रौपदी का पति एक । अब हम महाभारत के अभिप्रायानुसार द्रौपदीको एकपतिका एवं साध्वी सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं, जिसमें न तो कहीं प्रक्षिप्तता बतानी पड़ती है, न प्रालंकारिकता हो, और न कहीं असङ्गति ही पड़ती है । विज पाठकगण अब इस प्रकारकी भी परीक्षा करें । पूर्वपक्षकी भांति द्र पदका भी यही आक्षेप था कि ' अचर्मोऽयं मम मतो विरुद्धो लोकवेदयोः । न ह्येका विद्यते पत्नी बहूनां द्विजसत्तम ॥ ( १६८ । ७-८-६ ] राजा द्रुपद योगविद्या तत्त्वज्ञ नहीं थे, कुन्ती भी नहीं थी । वहांपर योगिराज श्रीमान् व्यासजी उपस्थित हो गये । उन्होंने कुन्तीसे कहा कि तुमने जो जो सब पुत्रोंको अज्ञानसे कहा था कि जो वस्तु तुम लाये हो, उसको ' समेत्य भुङ्क्त ' विभक्त करके इकट्ठे उपभुक्त करो, तब एकके साथ द्रौपदीके विवाहमें तुम्हारा कथन अनृत - असत्य हो जायगा और अनृतमें दोष होगा । पर तुम डरो नहीं । तुम अनृतभाषण के दोषसे मुक्त हो जाओगी । क्योंकि - द्रोपदी के साथ पांच पाण्डवोंका विवाह अनिवार्य है । ( १ । १ ९ ८।१ ९ -२१ ) An eGangotri Initiative PYAAR

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७४२ इस विषय में विज्ञ पाठक यह याद रखें कि - ' आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षभ । कुर्याद् योगी बलं प्राप्य तैश्च सर्वे-मंहीं चरेत् । प्राप्नुयाद् विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् । संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ' ॥ यह पद्य वेदान्त-दर्शन ( १ । ३ । २७ ) शाङ्करभाष्यमें तथा अन्य ग्रन्थोंमें भी मिलता है 1 मार्कण्डेयपुराण में भी कहा है- योगीश्वराः शरीरारिण कुर्वन्ति बहुलान्यपि । ( ५।२५ ) ' योगदर्शन ' में भी कहा है- " प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकचित्तम् एक-मनेकेषाम् ' । ( ४ । ५ ) । इन प्रमारणोंमें योगी की अनेक शरीरोंके बनाने में तथा उनसे अनेक कार्य करने में शक्ति बताई गई है । इसके अनुसार कोई पुरुष ब्रह्मचर्याश्रममें पूर्व - प्रारब्धके योगसे योगसिद्धिको प्राप्त करके अपने एक शरीरके अनेक शरीर बना ले, घोर यह एक उत्तम कन्याके साथ विवाह कर ले, तो उस एकके अनेक शरीरोंके साथ एक कन्याके विवाह करनेपर भी वह विवाह एक पुरुषके साथ ही सम्पन्न हुधा माना जायगा । वे श्रापाततः देखनेसे तो अनेक पुरुष हैं, परन्तु वास्तवमें वह एक ही पुरुष है । आशा है. - योगसिद्धि माननेवाले आस्तिकोंको इसमें कोई भी प्रक्षेपका अवसर न होगा । आयं समाजके स्वामी श्रीदयानन्दजी के लिए उनके जीवन-चरित्रमें एक घटना मिलती है । ' श्रीमद्दयानन्दप्रकाशके अन्तिम प्रकरण में लिखा ' है - ‘ उन्हीं श्रीगुरुदत्त ने क्या देखा कि एक ओर तो परम धामको पघारनेके लिए प्रभु परमहंस पलंगपर बैठे प्रार्थना कर रहे ' है, श्रीर दूसरी घोर वे व्याख्यान देनेके वेशमें सुसज्जित उसी कमरेकी छतके साथ साथ लगे बैठे हैं । इस श्रात्मयोगकें प्रत्यक्ष - प्रमारणको पाकर पण्डित महाशय चित्तस्फटिक ~~ -१-०का IN 1. Ankur RAID Joshi Collection जन द्रौपदीकाएक पति वा पांच? ७४३ आजकल के शक्तिमय समय में भी यह योगशक्ति मानी जाती है, तो प्राचीनकालके शक्तिमय समय में योगप्रक्रियाको मानी ७४४ उन्नति न हो, ऐसा नहीं माना जा सकता । यदि एकके अनेक अंश उससे श्रभिन्न न माने नेक हमारे एक शरीरमें भी हाथ - पांव आदि अनेकों जायं, तो अर्थात श्रङ्ग हैं, तब उन सर्वत्र सबके साथ हो रहा हुआ एक कन्या का विवाह भी अनेकोंके करनेव हुआ माना जाय । परन्तु ऐसा नहीं है । इसके अनुसार श्रीवेद साथ ( ऋ ० व्यासने ' महाभारत ' के आदिपर्व में १६६ अध्यायमें पञ्च - इन्द्रो- माया पाख्यान सुनाया है, जिसका अभिप्राय यह है कि एक ही इन्द्रदेव प्रकार पाँच पाण्डवोंका रूप धारण किया है । उसी इन्द्रको दिव्यलक्ष्मी ' महा दूसरे जन्ममें राजा द्रुपदके घर द्रौपदीके रूपमें प्रकट हुई है । ऐश्वय इन्द्रदेव भी पांच रूपों में प्रकट हुए हैं । जब योगी मनुष्य भी पूर्व. कथित प्रमाणसे तथा ‘ योगी खलु ऋद्धी ( श्ररिणमादिसिद्धौ ) प्रादु भूतायां विकरणधर्मा ( इन्द्रियाणां विशिष्टसामर्थ्यवान् ) निर्मा सेन्द्रियाणि शरीरान्तराणि ( ३ । २ । १६ ) इस ' न्यायदर्शन ' के प्रमाणसे बहुत - से रूप और बहुतसे शरीर बना सकते हैं, तो स्वभावसिद्ध योगी देवताओंके लिए तो क्या कहना? यही बात ब्रह्मसूत्रकी व्याख्या करते हुए श्रीस्वामी शंकराचार्यचरणोंने भी कही है- ' श्रात्मनो वै शरीराणि बहूनि देवाः भरतर्षभ ।... इत्येवंजातीयका स्मृतिरपि प्राप्ता णिमाद्यं: नामक श्वर्याणां योगिनामपि युगपदनेकशरीरयोगं दर्शयति, किमु वक्तव्यम् आजन्मसिद्धानां देवानाम् । श्रनेकरूपप्रतिपत्तिसम्भवाच्च एकैका इसी देवता बहुभी रूपैरात्मानं प्रविभज्य । ( १ । ३ । २७ ) ' इन्द्रो इस प्रकार इन्द्रदेवता के विषयमें उसके द्वारा बहुत शरीर देवम धारण करनेके सम्बन्ध में भी जान लेना चाहिये । इसीलिए प्रकट ' महाभाष्य ' में भी इन्द्रदेवताके लिए कहा गया है - ' एक इन्द्रो- व्यक्ति द्रौपदी h उनके एक Gujarat. An eGangotri Initiative

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७४३ नी मानी श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) क्रियाको ७४४ क्रतुशते प्राहूतो युगपत् सर्वत्र भवति ' ( १२६४ ) । • नेकस्मिन् जायं प्रर्थात् एक ही इन्द्र सैकड़ों यज्ञों में बुलाया जाता हु एकदम , तो होता है । इस प्रकार वेदमें भी इन्द्रके अनेक शरीर धारण तब उन सर्वत्र वर्णन आता है । जैसे कि - ' इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ' कोंके साथ करनेका श्रीवेद ऋ ० ६ । ४७ । १८ ) । ‘ रूपं रूपं मघवा ( इन्द्रः ) बोभवीति च. इन्द्रो. मायाः कृण्वानस्तन्वं परि स्वाम् ' ( ऋ ० ३ । ५३ । ८ ) । इस . निरुक्तमें देवता के बहुत रूप धारण करना दिखलाया है-' इन्द्रदेवने... प्रकार दिव्यलक्ष्मी ' महाभाग्याद् देवतायाः ' ( ७ । ४ । ८ ) । भाग्य अणिमा आदि हुई है । ऐश्वर्योंका नाम है । भी पूर्व इस प्रकार एक ही इन्द्र पांच पाण्डवोंके रूपमें था । इन्द्रका जुन है, यह तो सुप्रसिद्ध ही है । उसके इघर दो बड़े ] निर्माण भाई हैं, इधर दो छोटे भाई । तो इन्द्र ही युद्धमें स्थिर होनेसे ने दर्शन हैं, ' तो के ' धुधिष्ठिर ' नामवाला हुआ । शत्रुनोंके लिए भयानक होनेसे ' भीम ' वा भयानक सेनावाला होनेसे ' भीमसेन ' हुआ । मनुष्य-कुलवाला न होनेसे ‘ नकुल ' हुआ । ' इन्द्रज्येष्ठा अस्मान् अवन्तु श्रीस्वामी देवाः ( यजुः ३३ । ५० ) । इस प्रकार देवोंके सहित होनेसे ' सहदेव ' बहूनि नामका हुआ । युधिष्ठिरका वह ' धर्म ' रूपसे, भीमका ' वायु ' रूप रेगमाद्यं: से, नकुल सहदेवका ' अश्विनीकुमार ' रूपसे उत्पादक हुआ । वक्तव्यम् - एकैका इसीलिए वेद में कहा है- ' इन्द्रः सर्वा देवता: ' ( शतपथ ३ | ४ || २ ) ' इन्द्रो वै सर्वे देवा: ' ( शत ० १३ | २ | ७ | ४ ) । यहांपर इन्द्र को सर्व-शरीर देवमय कहा है । इस प्रकार स्वर्गकी लक्ष्मी द्रौपदीरूपमें संसारमें इसीलिए प्रकट हुई । इस भांति एक द्रौपदीका विवाह एक ही इन्द्रकी पांच इन्द्रो. व्यक्तियोंसे जो हुआ, वह वास्तवमें एक ही इन्द्र से हुआ । द्रौपदीके पातिव्रत्य में अथवा पाण्डवोंकी धर्मप्रारणतामें अथवा रमे उनके चरित्रमें कोई भी त्रुटि नहीं पड़ती, क्योंकि पति वस्तुतः एक है । CC - 0. Ankur Joshi Collection द्रौपदीके पति पांच वा एक? ७४५ इसीलिए मार्कण्डेय पुराण में भी --- ' कस्माच्च पाण्डुपुत्रारणा-मेका सा द्रुपदात्मजा । पञ्चानां महिषी कृष्णा सुमहानत्र संशयः ॥ ( ४।३२ ) । पांच पाण्डवोंकी एक ही रानी द्रौपदी कैसे हुई? यह शंका करके वहां उत्तर दिलवाया गया है- ' तेजोभागे-स्ततो देवा श्रवतेरुर्दिवो महीम् । प्रजानामुपकारार्थं भूभारहरणाय च ॥ यदिन्द्रदेहजं तेजस्तन्मुमोच स्वयं वृषः । कुन्त्यां जातो महातेजास्ततो राजा युधिष्ठिरः । बलं मुमोच पवनस्ततो भीमो व्यजायत । शक्रवीर्यार्पितश्चैव जज्ञे पार्थो धनंजयः ॥ उत्पन्नौ य-मलौ माद्रयां शक्ररूपी महाद्य ती । पंचधा भगवान् इत्यमवतीर्णः शतक्रतुः । तस्योत्पन्ना महाभागा पत्नी कृष्णा हुताशनात् । शक्रस्यैकस्य सा पत्नी कृष्णा नान्यस्य कस्यचित् । योगीश्वराः शरीराणि कुर्वन्ति बहुलान्यपि ॥ ( ५१२०/२५ ) । इसका यह भाव है कि योगीश्वर अपने शरीर बहुत बना लिया करते हैं । इन्द्र भी अपने एक शरीरके कई ग्रंश बना लिये, जिन्हें धर्म, वायु तथा स्वयं इन्द्रने कुन्तीमें तथा अश्विनीकुमारोंने माद्रीमें रखकर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और नकुल सहदेवको उत्पन्न किया । बात स्पष्ट हो गयी, तब ' नैकस्यै बहवः सहपतयः । ' ( गोपथ २।३।२० ) । यह विरोध सिद्ध नहीं हुआ; क्योंकि वास्तवमें पति एक ही था । व्यावहारिक बाहरी भिन्नतामें उन्होंने जनताके हितार्थं बाहरी नियमों का भी यथावत् पालन किया । इस प्रकार उक्त विषय में ब्रह्मवैवतपुराणमें कहा है- पञ्चेन्द्राश्च हरेरंशा भविष्यन्ति प्रियास्तव । ( ११५/१ ) । स्वर्गलक्ष्मीमहेन्द्राणां सा च पश्चाद् भविष्यति || ४ || अर्जुनाय ददौ राजा कन्यायाश्च स्वयंवरे । पप्रच्छ मातरं वीरो वस्तु प्राप्तं मयाधुना ॥ ५ ॥

तमुवाच स्वयं माता गृहाण भ्रातृभिः सह । शम्भोवरेण पूर्वं च परन मातुराज्ञया ॥६ ॥ द्रौपद्याः स्वामिनस्तेन हेतुना पञ्च

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७४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पाण्डवा: । चतुर्दशानामिन्द्राणां पञ्चेन्द्राः पञ्च पाण्डवाः ' ॥ ( श्रीकृष्णखण्ड ११५/७ ) । यहां पर बताया गया है कि इन्द्रके चौदह भेद होते हैं, उनमें पांच इन्द्रके रूप पांच पाण्डव बने, स्वर्गकी लक्ष्मी द्रौपदी बनी । पूर्वजन्म में महादेवके वरके कारण इस जन्ममें माताकी प्राज्ञासे द्रौपदीके पांच पाण्डव पति बने । वस्तुतः इन्द्रदेव एक ही थे, द्रौपदी उन्हीं इन्द्रदेवकी स्वर्गकी लक्ष्मी थी । जैसे एक सूर्य मासोंकी उपाधिके भेदसे बारहकी संख्या का माना जाता है, वैसे ही एक इन्द्र चौदह प्रकारका माना जाता है । जैसे एकके अनेक अंश भिन्न - भिन्न नहीं माने जाते, वैसे पाण्डव भी कथनमात्रमें पांच ये, वस्तुतः एक ही इन्द्र था । इससे द्रौपदी तथा पाण्डवोंके चरित्रमें कोई त्रुटि नहीं आती । फलतः द्रौपदोको एक - पतिका तथा साध्वी सिद्ध करनेका यही वास्तविक प्रकार है । इस प्रकारमें न कहीं प्रक्षिप्तता माननी पड़ती है, न कहीं कोई असङ्गति पड़ती है, न यहाँ बलात् कोई कृत्रिमता करनी पड़ती है । पूर्वपक्षोक्त प्रकारमें तो बहुत स्थलोंमें असंगति दीख पड़ती है, बहुत स्थलोंमें ' महाभारत ' के इतिहासका रूप परिवर्तित करना पड़ जाता है । जहां सर्वथा निर्मू-लता हो जाती है । कहीं उस पक्ष में प्रक्षिप्तता वा स्वेच्छामात्रसे अलंकारिकता माननी पड़ जाती है । प्रत्युत उस पक्षको स्वीकार करनेमें उसके सिद्ध करनेके लिये दिए गये महाभारतीय पद्य भी उस पक्षसे स्वयं विद्रोह करने लग जाते हैं, तब हमें निर्मूल पक्षके आश्रयणकी क्या आवश्यकता है? द्रोपदीके बाहर देखने में पांच पति थे । पर वस्तुतः वह पाँच रूप बने हुए एक ही इन्द्रकी पत्नी थी । आशा है ' आलोक ' पाठकोंने इस विषयमें पाश्चात्य-संस्कृति - प्रभावित पौरस्त्यों तथा शुद्ध पौरस्त्योंके अभिप्रायमें तारतम्यका विश्लेषण अपनी सूक्ष्म बुद्धिद्वारा कर लिया होगा । CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदचर्चा ७४५ www . हम यथ इस प्रो जनता दिया ह उन ( १४ ) वेदस्वरूपनिरूपरण ( ग ) समझत प्रथर्ववे ( ११३१ संहिताओं तथा ब्राह्मणोंकी वेदता + ) शेष वेद विषय म अब तक ' आलोक ' पाठकोंने पुराण - इतिहासकी पृथक् ( १ चर्चा में बहुतसे आक्षेप तथा उसके परिहार - पृथक् आक्षेपोंके देख लिये । अन्य भाष्यक परिहार आगे ' पुराणेतिहासचर्चा ' में दिये जायेंगे । अव भाष्यक स. घ. के मूलधर्मग्रन्थ वेदकी सीमा में कितना साहित्य या जाता श्रीकात्य है, इस विषय पर लिखा जाता है । अब पाठक मनोयोगपूर्वक इस नीय मा के मननका यत्न करें । चाहिये, क्योंकि इन्हीं श्रमधर्मं सुरक्षित है । + इस निबन्धको दीवानहाल देहली ) में तात्कालिक - प्रधान डा ० M.A. ने इसकी बहुत ही पाठकोंको इस विषय में दृढ रुचि रखनी रामक वेदोंके आधारपर हमारा सनातन- वर्णा- स्वा ० द इन्हीं का अधिकारपट्ट यज्ञोपवीत - सूत्र | इन सब यह बता ' संस्कृत प्रचारकमण्डल ( प्रार्यसमाज, ब्राह्मरण संस्कृत में सुनाया गया था । उसके मानते श्री पं ० कृष्णदत्तजी शास्त्री भारद्वाज प्रशंसा की और इसे अकाट्य बताया । सन अपने से सम्पादित ' सिद्धान्त ' पाक्षिकपत्र ( वाराणसी - प्रकाशित ) माननेवा में भी हमने इसे दिया । उसे देखकर श्रीस्वामी परमानन्द जी ही वेद सरस्वती महाराजने भी इसकी बहुत प्रशंसा की; और इस विषय पक्षसे करता दि में एक बृहद् - ग्रन्थ बनाने का आदेश दिया । यद्यपि यह विषय ‘ ग्रालोक ' ४ र्थ, ६ ठे तथा दम पुष्पमें आ चुका है, पर यह सार-Gujarat. An e अत होने से इसे जनलाभार्थं नवीनरूपसे सूत्ररूपसे दिया जा ---.