सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 411–420

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

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७८७ 955 श्रीसनातन धर्मलोक ( ७ ) ८, टीका फिर तो व्याकरण पर प्रश्न करनेके समय श्रष्टाध्यायीमें जी. न कर स्वा. द. जोने उस मैथिलपर महाभाष्य में प्रश्न कर द्वारा प्रश्न क्ष अपने डाला, यह प्रतिपक्षके अनुसार वैदिक - स्वाभोजोको भूल रही । फिर तो उदारता वह पौराणिक मैथिल पण्डित ही ठीक रहा, तो क्या प्रतिपक्ष भी मैथिल पण्डितके अनुयायी हुए, स्वा. द. जीके नहीं? यदि व्याख्यान भी महाभाष्यको व्याकरण नहीं मानेंगे; तो स्वा ० व ० जी भी व्याकरण- आप आपके समाजसे उठ जावेंगे । यदि आप भी महाभाष्यको व्याकरण ण्डितर मान लेंगे, उसी हिसाब से ब्राह्मणभाग भी वेद रहेगा । नहीं तो हा कि श्रृभासू ० के स्वामीके ही किये अनुवादको ऋभाभू ० न मानकर ' पुराण-यह कह भूमिका ' मान लेना पड़ेगा । माना फिर जो व्यक्ति ऋभाभू ० के हिन्दी अनुवादका ऋभा ० के नामसे उद्धरण देते हैं; उसे भी स्वा ० द ० जीकी ऋभाभू ० नहीं कहा जा ते व्या • सकेगा । फिर जो कि- वर्णव्यवस्थाके गुरुकुलमें हुए शास्त्रार्थमें नर्थ तथा श्रीइन्द्रचन्द्रजीने ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' का भाभू का किया हैं; इस अर्थ ' इस ईश्वरकी आज्ञासे ' किया था; यह मूल संस्कृतमें न होने नाम भी से केवल उसके अर्थ में होने से उसे फिर स्वा ० द ० जीकी ऋभाभू ० मन्त्र- का नहीं माना जावेगा; तब मुखादि अङ्ग परमात्मा ही है; पर मानने पड़ेंगे - यह स्वामीका अनिष्ट होगा । तब तो स्वा ० द ० जीके सत्यार्थ प्रकाश तथा संस्कारविधि करण के यदि सभी ग्रन्थोंको भी स्वा ० द ० जीका स.प्र. आदि न मानना भाषिक- पड़ेगा । इसे पं. चन्द्रशेखरकी स.प्र. श्रादिकी टीका माननी किन्तु पड़ेगी । क्योंकि- स्वामी या तो गुजराती जानते थे या संस्कृत नहीं । यह श्रार्यसमाजी कहते हैं, उसीमें वे बोलते थे । पण्डित लोग वेदत्व उनकी संस्कृत वा गुजरातीका अनुवाद कर दिया करते थे । आप यह प्रतिपक्ष ने भी ' वेदसंज्ञा विमर्श ' ( पृ.७४ ) में लिखा है कि ' स्वामीजी अपनी भाषा में बोलते थे, श्रीर पं ०: चन्द्रशेखरा लिखते CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वैदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ७८६ थे | स्वामीजी हिन्दी तो जानते ही नहीं थे, संस्कृतमें ही बोलते थे, और पं. चन्द्रशेखर हि · दी में अनुवाद करके लिखते थे ' । तब तो स्वा ० द ० जोकी मूल पुस्तक धार्यसमाज में कोई भी नहीं रही, स्वा.द. जीका सभी कुछ समाप्त होगया । इस प्रकार सत्यार्थप्रकाश तथा स्वा. द. जीके नामकी संस्कारविधि, भ्रमोच्छेदन, गोकरुणानिधि आदि सभी पुस्तकें श्रव स्वा.द. जीकी नहीं माननी पड़ेगी; और उन · पुस्तकोंका वह वह नाम न मानना पड़ेगा । अब यह वर्तमान आर्यसमाज भी स्वाद जीसे प्रचालित नहीं मानना पड़ेगा; किन्तु स्वादजीके अनुवादकोंसे प्रचलित मानना पड़ेगा । अनुवादको भी स्वाद जीकी पुस्तकें माननेकी भान्ति वेदके परमात्मक तूंक-अनुवाद ब्राह्मणको भी फिर मुख्य वेद मानना पड़ेगा । यदि यह नहीं; तो वह भी नहीं 1 स. प्र. के द्वितीय संस्करण के विषय में भी प्रतिपक्षने ' वेदसंज्ञा-विमर्श ': ( पृ ०८६ ) लिखा है- ' यद्यपि सत्यार्थप्रकाशकी हिन्दी भाषा है, तथापि इसका भाव बागम्भीर है और ऋषिदयानन्दकी ' हिन्दी भाषा मातृभाषा नहीं थी, अतः अर्थ और गम्भीर हो जाता है । इससे स्पष्ट है कि स्वा ० द ० जीकी वर्तमान सं ० प्रे ० प्रांदि पुस्तकोंको जी संस्कृत वा गुजराती से श्री भीमसेन तथा श्रीचन्द्रशेखर प्रादिसे प्रतिपक्षके अनुसार अनूदित हैं - फिर भी उन्हें स्वामींजी की पुस्तक तथा उसी नामवाली पुस्तक माना है; इसी प्रकार व्याख्यानरूप ब्राह्मरण के विषय में भी समझ लें । यदि प्रतिपक्ष, वैसा नहीं मानता; तो फिर स्वाद जीकी हिन्दी दित पुस्तकों के स्वामी स्वाद जी न होकर उनके स्वामी श्रीचन्द्रशेखर पं. भीमसेन वा पं ज्वालादत्त श्रादि मानने पड़ेंगे । पुस्तकों के वही सप्र आदि नाम भी न रखने पड़ेंगे; स्वाद वा चित्र Gujarat. An eGangotri Initiative

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७६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ' हटाकर अब श्रार्यसमाज में पं. भीमसेनजी प्रादिका चित्र रखना चाहिये । पर प्रार्यसमाज ऐसा नहीं मानता; किन्तु उन अनूदित पुस्तकों के कर्ता भी स्वाद जी ही माने जाते हैं; इससे प्रतिपक्ष-को भी मानना पड़ेगा कि मन्त्ररूप शब्द भौर ब्राह्मणरूप प्र दोनों ही वेद हैं । ऋषि दोनोंके ही प्रवचनकर्ता थे; निर्माता नहीं । फिर तो वार्तिकपाठको भी पारिणनिप्रोक्तत्वं न होने से, और अष्टाध्यायीका शेषपूरक अनुवाद होनेसे प्रष्टाध्यायीसे भिन्न होनेसे, प्रतिपक्षीको व्याकरण नहीं मानना पड़ेगाः । वस्तुतः ' त्रिमुनि व्याकरणम् ' होनेसे ' तदेव सूत्रं विगृहीत व्याख्यानं भवति ' मूल और उपबृं हक- भाष्य दोनों मिलकर ही व्याकरण होते हैं । यह अपचारिकता वा पारिभाषिकता नहीं, किन्तु सिद्धान्त है । तभी तो अर्थरूप उपबृंहक महाभाष्य में जहां पाणिनिकी बातें काटी गई हैं, वहां भाष्यकी ही बात प्रमारण मानी जाती है । जैसे - वार्तिक और महाभाष्य - अष्टाध्यायीकी सोपी व्याख्या नहीं किन्तु शेषपुरक हैं; अतः उसे तथा अष्टाध्यायी दोनोंको ही व्याकरण माना जाता है, वैसे ही ब्राह्मणभाग - मन्त्र-भागका सीधा व्याख्यान नहीं, किन्तु शेषपूरक एवं उपबृहक होनेसे वेद ही है । तब प्रतिपक्षका पक्ष उपादेय नहीं दयानन्द जन्मशताब्दी में संस्कृत में अनूदित ' सत्यार्थप्रकाश ' का नाम श्री ' सत्यार्थप्रकाश ' ही रखा गया था, ' काव्यतीर्थपुराण ' नहीं । वस्तुतः मन्त्रभाग तथा ब्राह्मरण भाग यह दोनों ही भाग हैं । स्वा ०० जी भी दोनोंको ' भाग ' शब्द से प्रयुक्त करते हैं जैसे क्रि + ' वेद मन्त्रभाग ( स.प्र. ७.पू. १२७ ) ' ईश्वर - प्रणीत संहिता ' मन्त्र-भोग ' ( स्वमन्तव्यान्तव्य १ ) ' महाभाष्यकारेण मन्त्रभागस्यैव वेद + संज्ञां मत्वा ' ( ऋभाभू. पू. ८६ ) यहां स्वामीने ' मन्त्रभाग ' शब्दको प्रयोग किया है, सो वह भी भाग हुमा, ' फिर ब्राह्मणभागको भी CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ७ ९९ ( ऋभाभू पृ ८१ ) ' ब्राह्मणभागका नाम पुराण है ( पृ. ५४ ) ' भागस्यापि वेदसंज्ञा कुतो न स्वीक्रियते ' ( पृ. ८० ) यहां स्वामीने ब्राह्मण. ' ब्राह्मणभाग ' शब्दका भी प्रयोग किया है । सो दोनों ही जद स्वामी के अनुसार भी ' भाग ' हें; तब स्पष्ट हो गया कि मन्त्रभाग भी भाग है, ' भोगी ' नहीं । ब्राह्मणभाग भी भाग है, ' भागी नहीं । भागी वेद ही हुआ अर्थात् दोनों भाग मिलकर भागी वेद बनता है । तब मन्त्र - ब्राह्मरण दोनों ही भाग वेद सिद्ध हुए । तब जो अपने पत्र - व्यवहारमें प्रतिपक्षने मन्त्रः- ब्राह्मणम् आदि प्रमाण दिये हैं, उनसे स घ के पक्षकी सिद्धि होती है । जैसे निरुक्तमें - ‘ ग्रहि-वत्तु मन्त्रवर्णा ब्राह्मणवादाश्च ' ( २ । १६ । ३ ) । यहां ' मन्त्र-वर्णाः ' है ' वेदवर्णाः ' नहीं । प्रतिपक्षको तो ' वेदः - ब्राह्मणम् ' सम्म ऐसे प्रयोग ढूंढने चाहियें, उनका भी समाधान हमने ' आलोक ' पोषि ( ६ ) ( पृ ० १५५ - ५६ ) में कर दिया है, अतः वे भी उनके अभीष्ट साधक नहीं ।... Dir ( १३ ) प्रतिपक्षं लिखता है - ' ब्राह्मणभागकी यदि पुराणसज्ञा कर दी जायगी, तो वह तो जायसी के पद्मावत काव्य के समान लोकाख्यानरूप हो जायगा, ' और ' है । अतः उसे वेदसमत कदापि नहीं दी जा सकती ' ( पृ. ८० ) ऐसा नहीं । जैसे ब्राह्मण-भागमें इतिहास अर्थवाद हैं, बल्कि मन्त्रभाग - प्रोक्त सूत्रात्मक इतिहास-का हो विवरण हे स्वतन्त्र नहीं, क्योंकि वे ( ब्राह्मण ) मन्त्रस्थित ईतिहासको विवृत करके फिर कहते हैं- ' तस्मादेतद् ऋषिणाऽभ्यः नुक्तम् ', सो मन्त्रभागमें भी सूत्रात्मक इतिहास हैं । दोनों स्थान समान ही उत्तर है कि - प्रवाहनित्यता । अथवा ' ऋषीणां पुन- जाए राद्यानां वाचमर्थोनुधावति ' के अनुसार भविष्यद् - तिर्देश है । इससे दोनों भागोंके वेदत्वमें क्षति नहीं पड़ती । ब्राह्मणभागको नहीं वैदिककालके विद्वानोंसे लेकर अब तक सभीने वेद माना है । Gujarat. An eGangotri Initiative

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७६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७ ९ १ इसे ' आलोक ' के छठे पुष्प में ( पृ: १०५ से ११६ तक ) दिखला ' ब्राह्मण दिया गया है । फिर उसमें प्रतिपक्षका श्रीपचारिकता वा पारिभा स्वामीने. विकता बताना केवल श्रात्मपक्ष की दुर्बलताके संरक्षरंगार्थ है । हीज वादिप्रतिवादिमान्य श्रीपाणिनि - श्रीयास्क - श्रीपतञ्जलि मन्त्रभाग बादि सभी १ ९ ३१ संहिताओं तथा ब्राह्मरण भागको भी वेद नहीं ॥ माना है । देखिये श्रीपतञ्जलिका ' सर्वे देशान्तरे ' वार्तिकका भाष्य । ता है । ' सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे ' ( पा. १०१११६ ) में ' भाव ' शब्द अपने के लिए लिखा है | वेदसंज्ञाविमर्श ' ( पृ. ११५ ) में प्रतिपक्षने रणदिये भी लिखा है- ' ऋषि ' शब्दका अर्थ है ' वेद ' जैसाकि - ' सम्बुद्धों -हि- शाकल्यस्येतावनार्षे ' । सो इसो सूत्रके ' ऋषि ' ( वेद ) का सर्व-- " मन्त्र • सम्मत उदाहरण ' ब्रह्मबन्धवित्यब्रवीत् ' यह वर्तमान चारों वेद-ह्मणम् ' पोर्थियोंमें न मिलकर कृ. य. काठक. ( १००६ ) तथा ऋ. ऐत. पालनेको ( २७ ) में मिलता है । सो इस प्रतिपक्षसम्मत निर्देशसे भी सभी अभीष्ट शाखा तथा ब्राह्मण वेद सिद्ध हुए । भाषा ( लोक ) का कोई भी उदाहरण, कहीं भी ब्राह्मणभागका नहीं दिया गया । अतः स्पष्ट है रणसंज्ञा कि - ब्राह्मण भाषा ( लोक ) नहीं, किन्तु उसका प्रतिद्वन्द्वो वेद समान है । प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् ( पा. ७१.२८८ ) भाषा में ' युवा ' बनता है । भाषासे भिन्न वेदमें ' युवं ' बनता है । ब्राह्मण-भागमें भी ' युवं ' बनता है, ' युवा ' नहीं । देखिये ' युवं वै ब्रह्माणी ' इतिहास-( शत ० ८. । २ । १ । ३ ) ' युवमिदं निष्कुरुतं ' ( ऐ. बा. २.२६ ) । स्थित इससे ब्राह्मणभाग भी वेद सिद्ध हुआ । यदि ' ' आलोक'के यूँ, पुष्प, छठे पुष्प एवं कम पुष्पमें यह विषय समाहितचित्त होकर स्थान पढ़ लिया जावे; तो इस सम्बन्धकी सभी शंकाएं विलीन हो जाएं ।.... भागको ( १४ ) ' त्र्यायुषं जमदग्नेः का स्वामी जीका किया अर्थ ठीक वहीं था; इसपर हमने जो आपत्तियां खड़ी की थीं, ( छठा- सुमनः वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ७ ९ ३ पृ. ६७-६८-६९ ), उनका प्रतिपक्ष द्वारा उद्धार नहीं गया । हमने लिखा था कि- ' चक्षुर्वे जमदग्निऋषि किया ' वे ' शब्दसे ' जमदग्नि ' चक्षुका पर्याय वाचक: ' इसमें ' प्रायुर्वे घृतम् ' ( कृ य तैसं. २ । ३ । २ नहीं हो जाता । नहीं तो भी ' यु ' का पर्यायवाचक । २ ) के अनुसार ' घृतं ' को मान लिया जावे । फिर तो ' त्रयो वेदा एत एव - धाग़व ऋग्वेदः, मनो यजुर्वेदः, प्राणः सामवेदः ' ( शत. १६ । ४ । ३ । १२ ) इससे ऋग्वेदादिको भी बाकू भाविका पर्याय-वाचक मान लिया जावे; तब ' तस्माद् यज्ञात् - सर्वहुत ऋचः ' का जो कि स्वा. द. जीने ' तस्माद् यज्ञात् - पूर्णात् पुरुषाद् ऋग्वेदादयः च-त्वारो वेदाः प्रकाशिताः ' ( ऋभाभू. पू. १० ) यह वेदोंके प्राकट्य-का जो इतिहास लिखा है - यह स्वा. द. जीका प्रथं प्रशुद्ध हो जायगा । इस पर प्रतिपक्षने कुछ भी प्रत्युत्तर नहीं दिया । अथर्वा - अंगिरा विशेष ऋषि हैं, जिन्हें प्रथववेद प्रतिभात हुआ, उनका नाम भी ' अथगिरसो मुखम् ' ( श्रथवं. १०।७।२० ) इत्यादि मन्त्रों में जो ( १० म संख्यामें पूर्व दिखलाये जा चुके हैं ) आता है, सो मन्त्रभाग- ब्राह्मणभाग दोनोंमें इतिहास बराबर सिद्ध होनेसे उसमें एकमात्र ब्राह्मणको वेदत्वसे च्युत नहीं किया जा सकता । जो कि ' स्वाद आदि विद्वानों की तीन - चार सौ वर्षकी आयु क्यों न हुई, इसलिए स्वामीजीका उक्त अर्थ ठीक नहीं ' इस हमारे कथनपर प्रतिपक्षने लिखा है कि- विषदानादिद्वारा उनकी आयु समाप्त कर दी गई ' तब क्या प्रतिपक्ष ' अकालमृत्यु ' मानता है?, क्या मनुष्य का सामर्थ्य है कि - पुरुषकी परमात्मासे दी हुई प्रायु काट सके? आयु होनेपर विषदाता वा घातक पास तक नहीं फटक पाता, असफल हो जाता है । ' वेदोंका यथार्थ-स.घ.५० ख CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 414

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ७६४ स्वरूप ' ( पृ ० ४३४ ) में ऋ ० ३ । ५६ । २ मन्त्रका अर्थ लिखते हुए श्रार्यसमाजीविद्वान् श्रीधर्मदेवजी विद्यामार्तण्ड ( गुरुकुल कांगड़ी ) लिखते हैं- ' परमेश्वरके घटल नियम हैं । जो उनके अनुसार अपनेको चलाता है, वह पूर्ण दीर्घायुसे पूर्व मरता नहीं, न वह किसीसे दबता है । उसको पाप दूरसे नहीं प्राप्त होता " स्वा.द.जीने ' देवेषु त्र्यायुषं के अर्थ में विद्वानोंकी ३०० वर्षकी आयु लिखी थी, तो आर्यसमाज में कोई भी तो ३०० वर्ष की आयु का नहीं हुआ । ' इसमें या तो कोई विद्वान् नहीं हुआ; यह मानना पड़ेगा, या फिर ' देव ' का अर्थ ' विद्वान् ' प्रशुद्ध मानना पड़ेगा । इसपर प्रतिपक्षके पास कुछ भी उत्तर नहीं है । यदि प्रतिपक्षके अनुसार कर्मगतिके कारण बीचमें आयु-का टूट जाना ' माना जावेगा; तो फिर कोई प्राचीनता ( जैसे ब्राह्मणभागकी वेदता, मूर्तिपूजा आदि ) को नष्ट करना, तथा अनृत अर्थं करना आदि उनका असत्कर्म मानकर उनकी आयु बीचमें टूटना मानकर उनके सिद्धान्तोंको ' असत् ' भी कह सकता है । तब देवों ( विद्वानों ) की निश्चित आयु ३०० वर्षकी कहना भी ठीक नहीं रहता । आर्यसमाजकी एक शताब्दी होने वाली है, कोई विद्वान् तो उसमें ३०० वर्षकी प्रयुका होना चाहिये था? तब यहांके ' देव ' शब्दका ' विद्वान् मनुष्य ' अर्थ करना स्वामीका ठीक नहीं - इस विषय में ' आलोक ' ( ४ थं पुष्प ) में ' क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं ' तथा ' मनुष्ययोनिसे देवयोनिकी भिन्नता ' यह दो निबन्ध ( पृ ० ४२१-४३७ तथा ४०५-४२० पृ ० में ) देखने चाहियें । ' त्र्यायुषं का ४०० वर्ष अर्थ भी कैसे कर दिया गया? " यदि नित्य होनेसे ' जमदग्नि ऋषि ' का अर्थ ' चक्षु ' कियो गया है, तो यह व्याज भी व्यर्थ है; क्योंकि ऋषि भी नित्य हैं, ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार 19 ७६५ वेदके साथ वे भी होते हे 1 । देखिये- ' नामधेयानि चर्षीणां वेदेषु सृष्टयः । वेदशब्देभ्य एवादौ निर्मिमीते स ईश्वरः याश्च शान्ति. २३२ । २५ ) ' नामधेयानि चर्षीरणां याश्च वेदेषु ( महा. शर्वर्यन्ते सुजातानामन्येभ्यो विदधात्यजः ' ( २६ ) अर्थात् जो सृष्टयः वेदोंमें । ऋषियोंके नाम हैं, परमात्मा उसीके अनुसार ऋषियोंको वा प्रकट करता है । प्रतिपक्ष भी ' वेदसंज्ञाविमर्श ' ( पृ ० ६२ उत्पन्न ) में इस पद्यको प्रमाणित करता है । तव वेदमें लिखे अनुसार ही सृष्टिकी आादिमें परमात्मासे उत्पादित वेदके प्रवाहनित्य ऋषि अनित्य कैसे हुए, जो कि प्रतिपक्ष ऋषियोंका चक्षु यदि अर्थ इस करने बैठा? । तब ' वेदमें कोई ऋषियोंका संज्ञाशब्द नहीं; संज्ञा • ना शब्दोंकी व्युत्पत्ति नहीं होती ' यह श्रीबुद्धदेवजी आदिका पक्ष आ भी खण्डित हो गया । यथा नाम तथा गुरणः ' के अनुसार ऋषि- स्व ' योंके नाम भी गुरणानुसारी थे; इसलिए योगरूढ थे । योगस्व इस शब्दोंकी वेबमें सत्ता स्वा. द. जी भी मानते हैं, देखो इसपर • वा ' आलोक ' अष्टम पुष्पका पृष्ठ १५४-१५५-१५६-१५७ । जब - जब परमात्मा वेदको प्रकाशित करनेकी इच्छा करता है, तब - तब वेदोल्लिखित ऋषियोंको भी प्रकट करता है, और वह उन्हीं के द्वारा मन्त्रों को भी प्रकाशित करता है । सो ऋषियोंकी भ तथा देवोंकी भी जाति होती है । जैसे कि -न्यायमुक्तावली में त्व सूचित किया है - ' न च नृसिंहशरीरे कथं लक्षणसमन्वयः, तत्र नृसिंहस्य एकव्यक्तिवृत्तितया जातित्वाभावात्, जलीयतैजस-शरीरवृत्तितया देवस्यापि जातित्वाभावादिति वाच्यम्, कल्पभेदेन नृसिंहशरीरस्य नानात्वेन नृसिंहत्वजात्या लक्षरणसमन्वयात् ' ( ३८ ) यहां नृसिंहका उदाहरण उपलक्षणपरकं है; सो देवताओं तथा ( कृ वेदस्थित ऋषियों का भी जातित्व है; तभी ' जातेरस्त्री ' ( पा. ४ । बता १५ ६३ ) के वार्तिक ' गोत्रं च चरणैः सह ' से उन - उन संहिता - बन CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 415

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ser श्रीसनातनधर्मालोक ( 9 ) ७६५ मोंके द्रष्टा वा प्रवचनकर्ता ऋषियोंकी जातिसंज्ञा होकर स्त्री-याश्च लिङ्ग जातिलक्षण ङीष् किया जाता है- ' कठी कलापी ' । कई ' महा. श्रार्यसमाजी भी अग्नि वायु आदि ऋषियोंको वेदद्रष्टा होनेसे यः । इन्हें उपाधि वा जाति मानते हैं । इससे भी वेद में चाहे मन्त्रभाग वेदों में हो, चाहे ब्राह्मणभाग, उनमें ऋषियोंके इतिहाससे नित्यतावश उत्पन्न वेदत्वकी क्षति नहीं होती । तब चक्षु आदि अर्थ- कल्पना श्रौर श्रीबुद्धदेवजीका इनके अर्थोंमें आकाश एवं पातालके कुलाबे २ ) i मिलाना व्यर्थ है । वेदके साथ वेदके ऋषि तथा देवता भी रहें; ऋषि इससे वेदत्वकी कुछ भी हानि नहीं । नहीं तो वेदमें ही वेदके अयं श्रार्यसमाजानुसार ग्राहक अग्नि, वायु, आदित्य, श्रङ्गिरा, अथर्वा संज्ञा • आदिका नाम नहीं आना चाहिये । परन्तु श्राता है । बल्कि -पक्ष- स्वा. द. जीने तो ' अग्ने! देवेषु प्रवोचः ' ( ऋ. १ । २७.४ ) कृषि- इस मन्त्र में ' अग्निवाय्वादित्याङ्गिरस्सु मनुष्येषु ( ऋषिषु ) प्रोक्त-गल्त - वान् ' - इस प्रकार भूतकालमें भी उन्हें वेदोपदेश मान लिया है! सपर और फिर ' शतपथ ' के ' चक्षुर्वे जमदग्निॠषि: ' इस वचन में ' त्र्यायुषं जमदग्नेः ' ( यजु: ३।६२ ) इस मन्त्रकी व्याख्या भी नहीं । करता और वहां तो ' वसिष्ठ ऋषिः ' त्वया प्रारणं ' ( यजुः १३ । ५४ ) भरद्वाज ऋषिः.... त्वया मनः ' ( ५५ ) जमदग्नि ऋषिः त्वया चक्षुः ' ( ५६ ) ' विश्वामित्र ऋषिः " त्वया श्रोत्रं तत्र ( ५७ ) ' विश्वकर्मा ऋषिः " • त्वया वाचं ( ५८ ) इन याजुष जस- मन्त्रोंके कारण वसिष्ठ आदिमें ' त्वया प्राणं त्वया चक्षुः ' भेदेन प्राणत्व - चक्षुष्ट्टु आदिका आरोप किया गया है, जिससे शतपथने ३८ ) भी प्रारण वै वसिष्ठ ऋषिः ' श्रादिमें ' वै ' शब्दसे ' आयुर्वे घृतम् ' तथा ( कृ.य. तै. सं. २ । ३ । २ । २ ) की भान्ति चक्षु श्रादिका आरोप ४ । बताया है । यह नहीं कि वहां पर्यायवाचकता हो जावे । वहां यह इता -. बताया गया है कि- वसिष्ठ प्रारणकी भांति श्रेष्ठ होने से वसिष्ठ ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ७६७ कहे जाते हैं । सो वहां ' मनोरूपो भरद्वाज ऋषिः, विश्वामित्रषि रूपं यत् श्रोत्रम् ) ईदृशम् ( जमदग्निसदृशं ) यत् चक्षुः ' इत्यादि प्रारोप महीधरभाष्य प्रादिमें स्पष्ट हैं । सो यह प्रतिदेश ( सहशता ) है, पर्यायवाचकता नहीं । ' वति ' प्रत्ययके विना भी प्रतिदेश हो सकता है । जैसे कि महाभाष्यमें कहा ' धन्तरेणापि पतिम् प्रतिदेशो गम्यते । तद् यथा- गया है-ब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह - ते [ वयं, तेन ] मन्यामहे ' एष ब्रह्मदत्तः । ' अयं भवति ' ( ' बहुगरण ' सूत्रमें ) ब्रह्मदत्तवद् सो ऋषियोंके नाम: ' यथा नाम तथा गुण: ' होनेसे यौगिक होकर उन्हीं में रूढ अत एव योगरूढ थे, जंसे ' क्षतात् किल त्रायत इत्युदग्रः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः ' ( रंघु. २ । ५३ ) यहां क्षत्रशब्दकी व्युत्पत्ति करके उसे एक जातिमें योगरूढ बताया गया हैं । ' योगरूढ ' शब्द वेदमें स्वा. द. जी मी मान गये हैं; देखो उनकी निघण्टुकी भूमिका अथवा ' प्रोलोक ' ( ८ ) का पृ. १५४ देखें + मो ऋषियों वाला वही गुण ' चक्षु ' ' प्रादिमें देखकर उक्त विशेष-मन्त्रोंमें उन्हें ' तद्वयपदेश्य ' कह दिया गया । श्रतः यहां पर्याय-वाचकता नहीं हो जाती । जैसे कि -श्रीविद्याधरजी प्रायसमाज-में जब आवें, तो कोई श्रार्यसमाजी उन्हें कहे कि प्राइये ऋषि-दयानन्दजी!!! ' सो इससे मन्त्रीजी स्वा.द. जी नहीं बन जाते, किन्तु स्वामीजी वाले गुण होने से उन्हें ' तद्व्यपदेश्य ' कहा जाता है । इसे भक्तिवाद वा अर्थवाद कहते हैं । यह प्रकार ब्राह्मणभाग-में बहुत है । तभी तो श्रीयास्कको ब्राह्मणभागकेलिए कहना पड़ गया कि - ' बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मरणानि भवन्ति । पृथिवी वैश्वानरः ' ( शत. १३ । ३ । ८ । ३ ), संवत्सरो वैश्वानरः ( ५ । २।५।१५ ), ब्राह्मणो वैश्वानरः ' ( तै. ब्रा. ३ ॥ ७।३।२ ) ( निरुक्त ७ । २४ । ६ ) ' बृहती ' को ब्राह्मण में मध्यम ( बादल ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 416

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७६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ( ताण्ड्य ७।३।९ ), संवत्सर ( शत. ६१४।२।१० ), वाक् ( १४ । ४ । १ । २२ ), मन ( ५ । १० । ३ ।: १ ), सारे प्राण ऐत. ३ | १४ ), व्यान ( ताण्ड्य ७ । ३ । ८ ) आत्मा ( ऐ. ६ । २६, गो ० ३० । ६-८ ) इन विविध नामोंसे केवल अर्थवाद द्वारा कहा गया है । यदि इसमें वास्तविकता मानी गई; तो ' आयुर्वे घृतम् ' ( कृ.य. तै. सं. २ । ३ । २ । २ ) जो कृष्णयजुः के ब्राह्मणमें कहा गया है; तो क्या आयुको घृतका, वा घृतको प्रायुका पर्यायवाचक मान लिया जावेगा? । यह अर्थवाद प्रधानतया तो ब्राह्मरणभागका विषय है, पर मन्त्रभागमें भोः कहीं - कहीं आ जाया करता है । इससे उक्त सीमित - मन्त्रोंमें कहा हुआ चक्षु आदि आरोप अन्य मन्त्रों में प्रसक्त न होनेसे ' श्यायुषं जमदग्ने: ' में वह प्रारोप ' अप्रसक्त ' होजायगा । प्रतिपक्ष द्वारा निरुक्तकारका दिया हुआ ' बहुभक्तिवादनि हि ब्राह्मणानि ' ( पृ ० ८१ ) यह वाक्य प्रतिपक्षके पक्षको न सिद्ध करके हमारा ही पक्ष सिद्ध कर रहा है कि- ' चक्षुर्वे जमदग्नि-ऋषिः ' इस प्रारोपमूलक भक्तिवाद ( अर्थवाद ) से चक्षु आदिको ' जमदग्नि ' आदि कहा गया है कि- जैसे जमदग्नि ऋषि सबका द्रष्टा था, वैसे चक्षु भी है, इससे पर्यायवाचकता नहीं हो जाती । तब मन्त्रभागसे ऋषि प्रादिका इतिहास हटाया नहीं जा सकता । उसे भविष्यद्रूप मानना चाहिये- ' ऋषीणां ( वेदानां ) पुनराद्यानां वाचमर्थोनुधावति ' ( उत्तरराम १ । १० ) स्वा. द. जीके अनुसार भी ऐसे इतिहासोंसे वेंदोंकी आदिमत्ता दोषका श्रासञ्जन तथा उससे वेदत्वकी क्षति नहीं होती । स्वा. द. जी ' ग्रग्निः पूर्वेभि षिभिरीड्यो नूतनैरुत ' ( ऋः १११।२ ) इस मन्त्र में स्थित प्राचीन तथा नवीन ऋषियोंके कथनसे वेदोंकी श्रादिमत्ता दोषका सञ्जन करने वाले मैक्समूलर प्रादिको उपटकर कहते CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ७६६ ८०० - ईश्वरस्य त्रिकालदशित्वात् । ईश्वरो हि त्रीन् कालान् भूतभविष्यवर्तमानकाल स्थैर्मन्त्रद्रष्टृ भिर्मनुष्यैः मन्त्रैः जानाति, निरुक ता ऋषिभिरहमेव ईड्यो वभूव, भवामि, भविष्यामि ,, प्राणैः, है, त विदित्वा [ परमेश्वरेण ] इदमुक्तम्- इति प्रदोषः ' च इति हो ज ८६ ) ' इस मन्त्रमें वेदोंके कर्ता त्रिकालदर्शी ईश्वरने ( ऋभाभू. पू. वर्तमान तीनों कालों व्यवहारोंको यथावत् भूत, भविष्यत् एक-वेदोंका सनातनपन तो सिद्ध होता जानके कहा है. इससे भूत है, वेदोंका नवीनपन होना किसी प्रकारसे सिद्ध नहीं हो सकता ' ( ऋभाभू. पू. ८७-८८ ) ऐसा होने पर भी जब मन्त्रभाग के वेदत्वकी क्षति नहीं; वैसे ब्राह्मणभाग नह भी ऋषियोंके नाम आनेसे ब्राह्मणभाग की वेदत्वक्षति में हो सकती भी नहीं. ५५ ' वेदव्याख्यानात् ' पर जो हमने ' परिषद्य ' ह्यरणस्य ' श्रादि दों ' निम मन्त्र ' एक - दूसरेके अर्थके प्रदर्शक दिखलाये थे, और उसमें ' सिद्ध उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ' ( अगली ऋचा पूर्वका सम्यक् व्याख्यान प्रोक करती है ) यह निरुक्तकारकी उसमें साक्षी भी दी थी; इस- ( ५ परं प्रतिपक्ष लिखता है - ' निरुक्तकारका कंथन निस्सन्देह ही वेदात्मक नहीं हैं, उनका तात्पर्य निरुक्तकार ने अपनी दृष्टिसे उस सि रूपसे उपस्थित किया है ' ( पृ. ८१-८२ ) यहां प्रतिपक्षने स्वा. द. जी- जो मान्य निरुक्तकांस्पर भी श्रमान्यताका छींटा डाल दिया । उनकी उठ साक्षीसे जो कि स्वा. द. जीका ' वेदव्याख्यानात् ' हेतु ब्राह्मण नाम भागकी श्रवेदता में हेत्वाभास सिद्ध होता था, उसपर प्रतिपक्षने यह स्वामीका दर्जा निरुक्तकारसे भी बढ़ा दिया । यही पक्षपात प अन्धश्रद्धा परिणत हो जाया करता है । इसमें अन्य सार कुछ का भी नहीं । उत्तर वेदमंन्त्र जब पूर्वमन्त्रके अनुवादकी स्पष्ट सांक्षी बता रहा है, और इस प्रकार के मन्त्र प्रचुर मात्रा में मिलते हैं - जिन प्र केलिए निरुक्तकारमे · ‘ तस्य उत्तरा ' भूयसे निर्वचनाय ' लिखा है । Gujarat. An eGangotri Initiative

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VEE श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६०० नाति, निरुक्तकारने तो वह अनुवाद बनाया नहीं; वह तो वेदने बनाया । प्राणैः, है, तब वह पूर्वमन्त्रका अनुवादभूत उत्तरमन्त्र यदि श्रवेद नहीं च इति, जैसे कि - ' आष्टिषेरणी होत्रमृषिनिषीदन् । ( ऋ.१० । भू. हो ९ ८।५ जाता ) ' यद्द ेवापिः शन्तनवे पुरोहितो ' ( १०१६८७ ) यह दो मन्त्र वष्यत् पू. दूसरे के शेषपूरकात्मक अनुवाद हैं, तब मन्त्रभागके अनुवाद -इससे, एक भूत - ब्राह्मणभागके अवेदत्वकेलिए दिया ' वेदव्याख्यानात् ' यह - किसो हेतु निरस्त हो गया । मन्त्रका अनुवाद ब्राह्मण, मन्त्र भले ही हो न हो, पर वेद तो मन्त्र - ब्राह्मण दोनों ही सिद्ध हुए । भागमें ( १५ ) ' ब्राह्मण ' का अर्थ लिखते हुए ' वेदसंज्ञाविमर्श ' ( पृ. ' ' नहीं: ५५ पं. १६-१७-१८-१९ -२० में आर्यसमाजके मन्त्रीजीने लिखा है ---' निम्नलिखित शास्त्रीय प्रमाण भी ब्राह्मरणकी वेदोंसे भिन्नता दिदों सिद्ध करते हैं - ' चतुर्वेदविद्भिर्व्रह्मभिः - ब्राह्मण महर्षिभिः ' तस्य प्रोक्तानि यानि वेदव्याख्यानानि तानि ब्राह्मरणानि ' यह महाभाष्य. स्थान ( x ११ ) में कहा है । इस यहां आर्यसमाज के संयुक्त मन्त्रि महाशयने इस अपने पक्षको हही सिद्ध करनेकी प्रसन्नता में एक बड़े साहसका कार्य कर डाला है, उस जो बहुत खेदास्पद है । उन्होंने यह देखनेका कष्ट भी नहीं उठाया कि यह पाठ हम जो अपने पक्षको पुष्टि में महाभाष्यके नकी नामसे दे रहे हैं, वह महाभाष्यमें है भी सही, या नहीं? यह जो महाशयजीने महाभाष्यकारके नामसे ' शास्त्रीय प्रमाण ' क्षने दे डाला है, वे यह जानकर चकित हो जाएंगे कि यह महाभाष्य-. पोछे कारका शास्त्रीय - प्रमारण नहीं, किन्तु यह तो उन्होंने स्वा ० द ० जीकी कुछ ऋभाभू ० के ' वेदसंज्ञाविचारविषय ' ( पृ ० ६ ९ ) से स्वा ० द ० जी की. प्रपनी संस्कृत लेकर महाभाष्यके नामसे उद्धृत कर डाली है । इस हमारी बात पर यदि प्रतिपक्षको सन्देह हो; तो वे अपने ' वेद-संज्ञाविमर्श- ( पृ ० ३८ पं. २०-२१ ) में स्वा. द. जीका ऋभासू ० CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार का उक्त पाठ देखें | अपने पक्षकी ८०१ होनी चाहिये कि उसमें सिद्धिकी इतनी प्रसन्नता नहीं यह अपनेसे स्मृत पुस्तकका प्रमाणपर विचारा ही न जाय कि-स्वयम् है सही, या नहीं? न विचारनेसे अपने पक्षकी निर्बलता ही प्रतीत होती है । मेरा अनुमान है कि यह भूल उन्हें श्रीशिवपूजन वाहाने जो स्वयं अनुसन्धान पुस्तकोंकी जूठन ले लिया करते क्षीरविवेक ' के १२३ पृष्ठमें स्वयं है — ' वेदसंज्ञाविमर्श ' में मेरा भी २६७ पृ. २२ पं. में कुशवाहा जी ग्रन्थके प्रणयनमें मेरा भी हाथ है ' सहजी कुश • न करके अन्य श्रार्यसमाजियोंकी हैं ) कराई है । जैसे कि ' नीर-कुशवाहाजीने बड़े गौरवसे लिखा सहयोग था ' ( पं. १७ ) । फिर बड़े गौरवसे लिखते हैं- ' उस । मुद्रित सम्भवतः कुशवाहाजोने ' श्रीवेङ्कटेश्वर - समाचार ' में अपना ब्राह्मणभांगके प्रवेता - विषयका निवन्ध मन्त्रिमहाशयको दे दिया होगा । उसमें कुशवाहाजीने - जहां तक मुझे ऐसा ही लिखा था । यह भूल है, वा जानबूझकर स्मरण है-नामसे वैसा प्रक्षेप कर दिया गया, यह हमें ज्ञात नहीं महाभाष्यके यदि एक व्यक्ति ऐसा लिखता; तो भूल कही हो सका । पर कई व्यक्ति ऐसा कह - लिख रहे हैं; तो यह सकती थी; बूझकर किया हुआ मालूम होता है । अथवा यह अन्धपरम्परा कुचक्र जान-वा गड्डलिका - प्रवाह वा भेड़ाचाल चल रही है । वस्तुत: यह स्वा.द.जीमें अनर्गल श्रद्धाका ही परिणाम है कि उनके वाक्यको मूल पुस्तक में देखने की आवश्यकता ही नहीं समझी जाती । इसमें अन्य प्रमाण यह है कि- जो इनके सम्प्र-दायके सञ्चालककी कुछ आलोचना कर दे, तो उसे बड़ी अभद्र गालियां दी जाती हैं, इसमें जोता - जागता प्रमाण श्री-..५१क Gujarat. An eGangotri Initiative

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८०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) शिवपूजनसिंह कुशवाहाजीका ' माघवमुखमहाचपेटिका ' ( ' नीर-क्षीरविवेक ' का दूसरा नाम ) तथा डा. श्रीरामका ' पं. माधवा-चार्यकी चुनौतीका उत्तर ' है । ऐसी असभ्यता करके स्वयं ही यह स्वामीजीका ' सम्प्रदाय ' सिद्ध किया जा रहा है । यह ठीक है कि- ' अर्धो घटो घोषमुपैति नूनम् ' । सभी ऐसे नहीं हैं, पर जिनको संस्कृतभाषाका भी पूस ज्ञान नहीं है, वे सीमासे बाहर श्रा जाते हैं । यही भूल श्रीधर्मदेवजी विद्यामार्तण्ड ( गुरुकुलकाङ्गड़ी ) ने भी ' वेदोंका यथार्थ - स्वरूप ( पू. ११३ पं. २७-२८ ) में की है । वहां लिखा है- ' ब्रह्मभिः - चतुर्वेदविद्भिर्ब्राह्मणैः प्रोक्तानि यानि वेद-व्याख्यानानि तानि ब्राह्मणानि ' ( महा. ५ । १ । १ ) इस महाभाष्यकारसम्मत - निरुक्तिसे स्पष्ट ज्ञात होता है ' । परन्तु यह कथन भी गलत है । यह महाभाष्यकारका वाक्य नहीं है, किन्तु यह स्वा. द. जीका अपना वाक्य है । सब शास्त्रोंमें क्षेप - प्रक्षेपकी चिल्लाहट करने वाले आर्यसमाजी ही स्वा. द. जीके अपने वाक्य-का अब महाभाष्यमें स्वयं प्रक्षेप कर रहे हैं । ' किमाश्चर्यमतः परम् ' । यह स्वा. द. जीमें आर्यसमाजियोंकी श्रत्यन्त श्रद्धाका ही परिणाम है कि उनके वाक्यको मूल पुस्तकमें देखनेकी आवश्य-कता ही नहीं समझी जाती । दोबारा फिर यही भूल श्रीधर्मदेवजीने ' वेदोंका यथार्थ स्वरूप ' ( पृ. ३६ ९ - ४०० ) में इन शब्दोंसे की है - ' उस ( शुक्लयजुर्वेद ) में मूल वेदमन्त्र ही थे, उनकी व्याख्या जो ब्राह्मणरूपमें है, पीछे की गई । जैसे कि महाभाष्यकार पतंजलिने ब्राह्मरण - शब्दकी व्याख्या करते हुए ५ । १ । १ में कहा है- ' चतुर्वेदविद्वद्भिर्ब्र-ह्मभिर्ब्राह्मणं महर्षिभिः प्रोक्तानि यानि वेदव्याख्यानानि तानि ब्राह्मणानि " । वस्तुतः यह गलत है, महाभाष्य में ऐसा नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ८०३ लिखा, यह तो स्वा. द. जीका निजी वाक्य है । स्वामीजीकी य अपनी संस्कृतको महाभाष्यकारके नामसे दे देना स्वा उस अनुयायियों का जघन्य कृत्य है । इससे ब्राह्मणभाग. द. जीके वेदव च्युत नहीं हो सकता । महाभाष्यकार तो ब्राह्मणभागको वेद ही मानते हैं, यह हम ' आलोक ' के छठे सुमन ( पृ. ६०-६१ - ९ २ - ९ ३ में सप्रमाण दिखला चुके हैं । ) ( १६ ) अब संयुक्त मन्त्री आर्यसमाज मेस्टन रोड, तथा मन्त्रो केन्द्रीय प्रायसभा कानपुर श्रीविद्याधरजी इसी प्रकार-की दूसरी अपनी भारी भूल भी देख लें । ' वेदसंज्ञाविमर्श ' घ ( पृ. १० पं. ६-७ ) में आपने लिखा है- ' शतपथ ब्राह्मण में अन्यत्र भी स्पष्ट लिखा है- ' चतुर्वेदविद्भिर्ब्रह्मभिः- ब्राह्मण महर्षिभिः प्रोक्तानि यानि वेदव्याख्यानानि तानि ब्राह्मणानीति ' । ( हा! यह कितना अनौचित्य है! पहले इसी स्वा.व.लोके उस वचनको महाभाष्यके नामसे लिखा गया था; अब उसीको शतपथवा- लि “ के नामसे लिख दिया गया । ऐसा लिखकर प्रतिपक्षने अपने पक्षकी है, दुर्बलता प्रकाशित कर दी है । कौन - सा यह बड़ा प्रमाण है कि इसी - ब्राह को बार - बार दिया जा रहा है । यदि यह प्रमारण शतपथब्रा.का कर ही वस्तुतः है, तो उसका पता क्यों नहीं लिखा गया? अब भी बताया जा सकता है, परन्तु हमारा दृढ़ निश्चय है कि ये स्वा. द.जीके शब्द हैं, शतपथब्राह्मणके यह शब्द नहीं । स्वा. द. जीने यह ' ब्रह्म व ब्राह्मण, क्षत्रं वै राजन्यः ' इसे तो शत. १३ । १ के नामसे दिखलाया, उसके नोचे ' समानार्थी एतो ब्रह्मन् शब्दो ब्राह्मणशब्दश्च ' यह महाभाष्य ( ५ । १ । १ ) के नामसे दिख • लाया । फिर नीचे ' चतुर्वेदविद्भिब्रह्मभिर्ब्राह्मण महर्षिभिः प्रोक्तानि यानि वेदव्याख्यानानि तानि ब्राह्मणानि यह तो जा * स्वाद जीका निजी वाक्य है । न यह महाभाष्यकारका है, न Gujarat. An eGangotri Initiative

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८०३ ८०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) wwwउस यह शतपथब्राह्मणका । इस पर मन्त्रीजी अपने ' वेदसंज्ञाविमर्शं ' जीके ( क ) पृ. ३८ में स्वा. द. जीकी ऋ - भाभू.का उद्धरण देख सकते दत्वसे है । उक्त स्वा.द. जीके वाक्यका शतपथ वा महाभाष्य से कुछ हो भी सम्बन्ध नहीं, वह तो स्वाद - कल्पित वाक्य है, जो स्वयं २ - ९ ३ ) साध्य है । महाभाष्यकार तो ब्राह्मणभागको मन्त्रभागकी भांति ही वेद मानते हैं, यह हम पहले ' आलोक'के ६ ठे सुमनका निर्देश • तथा कर चुके हैं । नकार- उक्त श्रार्यसमाजियोंको भूलका अब हम सुधार कर देना विमर्श ' चाहते हैं, जिससे श्रागे उन्हें लज्जित न होना पड़े । वह यह पत्र भी कि - ' समानार्थी एतौ वृषशब्दो वृषन् - शब्दश्च ब्रह्मन्शब्दो ब्राह्म-षिभिः शब्दश्व ' यह पाठ जो स्वा. द. जीने व्याकरण - महाभाष्य ( ५ । १ । १ ) के नामसे दिया है, यह ५ । १ । १ । ७ में है । व. जीके उसके बाद ऋभाभू. में ' चतुर्वेदविद्भिनं ह्यभिः ' इत्यादि जो पाठ पथना.. लिखा है, वह स्वा. द. जीकी अपनी संस्कृत है, वह स्वयं साध्य पक्षकी है, उसे शास्त्रीय - प्रमाण नहीं माना जा सकता | ' ब्रह्मभिः-- इसी - ब्राह्मणैः प्रोक्तानि वेदव्याख्यानानि ब्राह्मणानि ' ऐसा अर्थ ब्रा. का करने पर ' ब्राह्मोऽजातो ' ( पा ० ६ । ४ । १७१ ) इस वेदाङ्गके ब भी सूत्रके बलसे जाति एव अपत्य अर्थं न होनेसे ' ब्राह्मारिण ' बनेगा स्वा. ' ब्राह्मणानि ' नहीं बनेगा । अतः स्वामीको व्यर्थ ' ब्रह्मन् ' शब्द द. जीने यहां न लेकर ' ब्राह्मणैऋषि - मुनिभिः प्रोक्तानि ब्राह्मणानि ' 1. १ के यह निरुक्ति करनी चाहिये थी, तब कुछ ठीक होता । फिर - शब्दो ' ब्राह्मणैः प्रोक्तानि ब्राह्मणानि ' यह होने पर भी उसमें ' वेद्र दिख- व्याख्यानानि ' यह शब्द स्वा. द. जीके निज - कल्पित हैं; वहां पर इषिभिः ' ब्राह्मणैः प्रोक्तानि वेद- व्यपदेश्यानि ब्राह्मणाति ' यह भी कहा तो जा सकता है । हैन मन्त्रीजीने जो कि - ' वेदसंज्ञाविमर्श ' ( के ९ २ ख पृ ० ) में ( वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ८० % ( ब्राह्मणं ' की निरुक्ति करते हुए लिखा है- ' ब्रह्मणः व्याख्यानं ब्राह्मरणम् ' यह विग्रह या व्युत्पत्ति – वेदस्य इदं भी ठीक नहीं, क्योंकि - ' ब्राह्मोऽजाती है ' यद्यपि यह अर्थ इस वेदाङ्ग - सूत्रकी ' ( पा. ६ । ४ । १७१ ) ' ब्राह्मम् ' ही बनेगा, साक्षीसे ' ब्राह्मणम् जाति तथा प्रपत्य श्रर्थ न होनेसे शब्दसे व्युत्पादित ' नहीं । ' ब्राह्मणं ' को ' ब्राह्मण ' करना चाहिये । वस्तुतः यह हमारे विचारसे इस भागका नाम रूढिसे है; तथापि यह प्रतिपक्षीका पक्ष कर भी हम यह कहते हैं कि फिर तो ' तस्माज्जातं मान ज्येष्ठं ' ( अ. ११ । ५ । ३३ ) इस मन्त्रमें स्थित ब्राह्मणं ब्रह्म-' ब्राह्मण ' का भी यही अर्थ कर दीजिये, और ' नपुंसकलिङ्गान्त ब्रह्म'का अनुसार ' वेद ' अर्थ कर दीजिये, और उसे ' ज्येष्ठ ' मानिये, अपने और ' ब्राह्मणं ' का ' ब्रह्मण इदं भाष्यम् ' तस्माद् ब्रह्मचारिरूपात् मात्मनो जातम् ' यह प्रर्थं कर लीजिये, इससे ब्राह्मणभाग पर-स्वतः परमात्मोद्भूत सिद्ध हो जायगा । आपके ही किये.. ' व- भी ह्मणो व्याख्यानं ब्राह्मणं ' इस नपुंसकलिङ्गान्तशब्दके अर्थसे हमारा पक्ष भी सिद्ध हो जायगा । फिर वहां क्यों प्राप ' ब्राह्मणं ' का निर्मूल अर्थ ' ब्रह्म ' करते हैं ' ब्रह्म ' तो उक्त मन्त्रमें पृथक् पड़ा हुआ है, फिर आप " ब्रह्म " का का भी अयं ' ब्रह्म ' और ' ब्राह्मणं ' का - भी ‘ ब्रह्म ' अर्थं करके वेदमें पुनरुक्तिदोषको क्यों प्रासञ्जित करते हैं? वा ' ब्राह्मणजाति ' ( पृ. ५८ ) अथं कैसे करते हैं, जब कि ' ब्राह्मण ' वहां नपुंसकलिङ्गान्त है, स्त्रीलिङ्गान्त नहीं । अथवा ब्राह्मणभागको जातिवाचक मानने पर भी हमारे ही पक्ष-की सिद्धि है, जाति व्यक्ति के विना नहीं रह सकती; तंव उसमें सभी शतपथादि - ब्राह्मण स्वतः गृहीत हो जाएंगे । इसी प्रकार ' अपूर्वेर्णेषिता वाचः ता वदन्ति यथायथम् । व॑दन्तीर्यत्र गच्छन्तिं तदाहुर्ब्राह्मणं महत् ' ( अ. १० । ८ । ३३ ) में CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८०६ भी यह अर्थ हो जायगा कि - अपूर्व ( जिससे प्राचीन कोई नहीं, ऐसे परमेश्वर ) से प्रेषित चार मन्त्रात्मक वेदवारिणयां यथायोग्य रूपसे ज्ञान बोलती हैं । वे बोलती हुईं परमेश्वरकी वाणियां जिसमें अर्थरूपसे पहुँच जाती है; वह बड़ा भाग ब्राह्मण है! इससे ब्राह्मणभाग भी स्वतः परमात्मासे उद्भुत सिद्ध हो जायगा, आपके ही किये ' ब्रह्मका व्याख्यान ब्राह्मण ' इस अर्थसे हमारा पक्ष भी सिद्ध हो जायगा । पर यदि आप ' ब्राह्मण ' का अर्थ ब्रह्म और ब्रह्मका अर्थं ' वेद ' कर दें तो स्पष्ट हुआ कि - ' ब्राह्मणं ' शब्दका अर्थं ' वेद-व्याख्यान ' नहीं; किन्तु ' वेद ' ही है, तब ' शतपथब्राह्मण ' में भी ' ब्राह्मण ' शब्द ‘ वेद ’ - परक सिद्ध हुआ; तब ब्राह्मण भी स्वतः-सिद्ध वेद प्रतिफलित हुआ । जब स्वामीके अनुसार परमात्माके त्रिकालदर्शी होनेसे - जैसे कि उनके यह शब्द हैं- ' ईश्वरस्य त्रिका-लवशित्यात् । ईश्वरो हि त्रीन् कालान् जानाति ' ( ऋभाभू. पू. ८६ ) ' इस मन्त्र में वेदोंके कर्ता त्रिकालदर्शी ईश्वरने भूत, भविष्यंत वत मान तीनों कालोंके व्यवहारोंको यथावत् जानके कहां है ' ( पृ.६७ ) उसके वेदमें पुराण - इतिहासका स्मरण आगया है, जैसे कि- ' तमिति-हासश्च पुराणं च, इतिहासस्य च वै स पुराणस्य च ' ( ऋ.१५.१ ३०१४ ), और स्वा.द.जीने ( ऋभाभू. पू. ६४ में ) इन्हीं पुराण- इतिहास बताने वाले मन्त्रके प्रमाणके लिए ' एतैः प्रमाणं ब्रह्मरण - ग्रन्थाना मेव ग्रहणं जायते ' ( ‘ वेदसंज्ञाविमर्श ' पू. ३१ ) यह कह कर वेदमें उस पुराणादिशब्दसे ' ब्राह्मणभाग ' का ग्रहण किया है, तो साक्षात् नपुंसकलिङ्गान्त ' ब्राह्मणं ' शब्दसे ' ' ब्राह्मणभाग ' अर्थ क्यों न लिया जाय? और जब कि प्र. सं. वि. में यह अर्थ किया भी गया था; तब उसकेलिए यह कहना कि संस्कारविधि ' का प्रथम संस्करण अप्रामाणिक है ' ( ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पृ.१५ ) कितना CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ८०७ प्रयुक्त है, जब कि सं.वि. द्वितीय संस्कररणकी भूमिकामें स्वामी ने लिखा है - ' इसमें यह न समझा जावे कि प्रथम ही [ संस्क रणस्थ ] विषय युक्त न था, और युक्त छूट गया था, उसका संशो घन किया है, किन्तु उन विषयोंका यथावत् क्रमबद्ध संस्कृतके सूत्रों में प्रथम लेख किया था ' ( पृ. १ ) I जब कि स्वामीके अनुसार ' ऋषि ' वेदमन्त्रार्थं द्रष्टा ( स.प्र. ७ पृ ० १२६ ) का नाम होता है; सो वे प्राचीन अर्वाचीन ऋषि ( स्वामीके अनुसार मन्त्रार्थद्रष्टा ) तो वेद ( ऋ. १ । १ । २ ) में स्मृत कर दिये जाए; पर उसी वेदमें प्रतिपक्षके अनुसार मन्त्रा रूप ब्राह्मण स्मृत न हों, यह कैसी बात? यदि आप शतपथको प्रमाण मानते हैं, जैसे कि आपने स्वामीजींकी ही संस्कृतको शतपथके नामसे लिख दिया ( वेद. सं. वि. पृ. १० ) तो उसी शतपथने कहा है- ब्रह्म हि ब्राह्मणः ' ( ५ । १ । १ । १ ) अर्थात् ब्रह्म ब्राह्मणका नाम है; तब ' तम चश्च सामानि च यजूंषि च ब्रह्म च अनुव्यचलन ' ( अथर्व. १५ । १। ८ - ९ ) में एक वचनान्त ' ब्रह्म ' से ' ब्राह्मणभागका अर्थ कर लेना चाहिये । पहले तीन बहुवचनान्त होनेसे मन्त्रविशेषोंके नाम हैं; उनसे तीनों मन्त्रविशेषोंके संग्रहरूप अथर्वका भी ग्रहण स्वतः ही हो जावेगा; और पृथक् कहे हुए ' ब्रह्म ' शब्दसे शतपथ कै उक्त प्रमाण - द्वारा ब्राह्मणभागका भी ग्रहण होकर ' मन्त्र ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' की अन्वितता हो जाएगी । ' आपको अपने साम्प्रदायिक - सिद्धान्तके भङ्ग होनेके भयसे इस अन्वित सत्य - अर्थंका त्याग नहीं करना चाहिये । कुछ उदारताका ' अवलम्बन भी करना चाहिये । इससे उस साम्प्रदायिक - पक्षकी बलात् सिद्धिकेलिए आपको स्वामीजीके ही संस्कृत - वाक्यको क महाभाष्य तथा शतपथके नामसे लिखने की प्रावश्यकता भी न अ Gujarat. An eGangotri Initiative