सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 421–430

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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८०७ 505 श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) रह जायगी । [ संस्क ' वेदसंज्ञाविमर्श ' के द्वितीय अंशमें स्वा. " श्रीकरपात्रीजीसे का संशो. ‘ ब्राह्मणभागको वेदता ' विषयमें पत्रव्यवहार द्वारा पूर्वपक्ष उत्तर संस्कृत के पक्ष प्रकाशित किया गया है । इसमें त्रुटि यह है कि - अन्तमें पूर्व-पक्ष रखकर उसका उत्तरपक्ष नहीं दिया गया है, यह क्यों? ( स.प्र. अन्तिम सदा उत्तरपक्ष हुआ करता है, पूर्वपक्ष कभी अन्तिम नहीं न ऋषि हुआ करता । पूर्वपक्षको ही अन्तिम रखकर अपने पक्षकी दुर्बलता १ । २ ) में प्रकाशित की गई है; और उसके पूर्वके उत्तरपक्षको भी पूरा न मन्त्रायं. छापकर आपने अपने [ पूर्व ] पक्षकी दुर्बलता ही प्रकाशित कर दी है । तथापि इस पुस्तकको प्रकाशित करके अच्छा ही किया क- श्रापने गया है । इन पूर्वपक्षोंमें कई बातें विचारणीय हैं, पर इस या ( वेद. स्वयोजनानुसार समाप्तप्राय सप्तमे पुष्पमें तथा अधिकांश ब्राह्मणः ’ छप चुके हुए अष्टम- पुष्प में स्थान न होनेसे वे अन्य किसी पुष्प-तब ' त मैं प्रालोचित होंगी । प्रतिपक्षको वेदकी प्राजकलको चालू चार . १५ । पोथियों के अतिरिक्त संहिताओं तथा ब्राह्मणभागके अवेदत्वकां भ्रम न रहे, अतः इस विषय में श्रीपाणिनि, कात्यायन, पत-बोंके नाम लि, श्रीयास्क आदि वेदज्ञ एवं वेदपर अभूतपूर्वं परिश्रमकर्ता नीग्रहण प्राचीन विद्वानोंका मन्त्र- ब्राह्मणके वेद माननेका मत हम सूत्र -शतपृथ रूपसे इस निबन्धसे पूर्व ' वेदस्वरूपनिरूपण ' ( ग ) इस शीर्षक-रमन्त्र सें दे चुके हैं । आर्यसमाजको उस पर निष्पक्ष विचार करना ' आपको चाहिये । अन्वित इन विद्वानोंपर याज्ञिकोंका प्रभाव बताकर उन्हें एक ढंगसें दारताका अविद्वान् बतानेको शैलीको अपनाना श्रार्यसमाजो विचारकोंको बर्क - पक्षी शोभित नहीं हो सकता । वेद स्वयं याज्ञिक हैं, इसपर ' आलोक ' - वाक्यको का छठा सुमन ( पृ. १४० से १४६ तक ) देखना चाहिये । वेदका तो भी नं अधिकार पट्ट यज्ञोपवीत भी स्वयं याज्ञिक है । यज्ञका काल भी वेदके CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार झालसे चालू है, वेदके कालसे पीछे का नहीं । यज्ञोपवीत तथा उसके सरको प्रतिपक्ष भी वैदिककालसे ही तो मानता होगा, महाभारतकालसे नहीं । ' प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात्, ( सं ० वि ० पृ ० ८१ उपनयन ० ) यहाँ यज्ञोपवीतको प्रजापति से सहोत्पन्न ( सृष्टिके आदिका ) बताया है । वह यज्ञोपवीत ' यज्ञोपवीतं परमं पवित्र ' ( पारस्कर गृ ० २।२।१ ' ) यज्ञका वस्त्र होने से उसकी भी सत्ता याज्ञिककालमें ही तो होगी, और वह प्रजापतिकी प्रजासृष्टिके समकालीन सृष्टिकी श्रादिका समय वैदिककाल ही तो होगा । तब मन्त्र ब्राह्मणकी वेदता प्रतिपक्षके अनुसार याज्ञिक-कालमें होने पर भी, याज्ञिककालके वेदके सहचारी होनेसे वह याज्ञिककाल सृष्टिके प्रादिकालसे ही चालू है, यह सिद्ध बात सदा के लिए स्मरण रख लेनी चाहिये । इसी लिए ' यज्ञं ' चैव सनातनम् ' ( मनु ० ११२२ ) यहां पर स्वा ० द ० जी के स ० प्र ० के ११ वें समुल्लासके प्रारम्भिक शब्दोंमें सृष्टिकी श्रादिमें प्रणीत मनुस्मृतिने यहाँ पर याज्ञिकताको सनातन बताया है । ऐसा न मानने से प्रतिपक्षके मतमें बहुत - सी अनुपपत्तियाँ जन्म लेंगी । तब १६ संस्कारोंमें- जिनमें यज्ञोपवीत ( उपनयन ) का संस्कार स्वा ० द ० जीके अनुसार १० वां और मुख्य है, श्रवैदिक मानकर स्वा ० द ० ज़ीकी संस्कार विधिको भी तथा प्रावसथ्र्या-घान, श्रौताधान एवं दर्शपौर्णमास, ग्रश्वमेधादि वेदसम्मत यज्ञों को भी अवैदिक मानना पड़ेगा । उन यज्ञोंकी उपनयनके बिना सत्ता नहीं हो सकती । अतः पूर्वपक्षको दूरकी दृष्टि अपना कर ब्राह्मणभागको भी वेद माननेकी उदारताका अवलम्बन कर लेना चाहिये । यव अनुसन्धानका समय आ गया है | अब ' यह औपचारिकता है ', ' यह तत्कालका अनुसरण है ', इन बातों से एक सिद्ध विषयको छिपाना वा टालने की चेष्टा स ० ध ० ५२ Gujarat. An eGangotri Initiative

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८१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) करनी अनुसन्धान- रसिक विद्वानोंकी दृष्टिमें उपहास्य बात है, पाणिनि - पतञ्जलि आदि वेदरहस्यविज्ञों को तथा वेदभाष्यकार वेदाङ्ग निरुक्तके प्रणेता श्रीमान् यास्कको परिस्थितिका अन्धा --नुकरणकर्ता बताना उनको प्रकारान्तरसे मूर्ख सिद्ध करना यह आधुनिक साम्प्रदायिकोंका अपने सम्प्रदायकी दलदलमें आकण्ठ निमग्न होनेके कारणसे ही है, अतएव यह उनकी शोच्यता ( १७ ) ' ब्राह्मणभागको वेद माननेसे याज्ञिक - पशुहिंसा आदि भी हमारे गले मढ़ जायगी ' इस बातसे भी मन्त्री जी को नहीं डरना चाहिये, जिसका संकेत उन्होंने अपने ‘ वेदसंज्ञाविमर्श, ( पृ ० ४५-४६ ) में दिया है कि ' यदि ब्राह्मणोंको वेद मानने लगे, तो वेदों पर किये गये आक्षेपोंका उत्तर देना कठिन हो जायगा ' इस पर यह समझना चाहिये कि जैसे आप लोग मन्त्रभागमें अर्थ बदलनेकी क्षमता रखते हैं, वैसे ही ब्राह्मणभागमें भी अर्थ अपनी इच्छानुसार बदल सकते हैं । श्रीबुद्धदेवजी इसी प्रकारके अर्थोंके आकाश - पाताल के कुलाबे जोड़ कर अर्थको फिट कर देनेका यत्न किया ही तो करते हैं । ' विन्टरनीज़ ' आदि ने तो मन्त्रभाग पर भी सोधे आक्षेप कर डाले हैं; तो क्या इस डरसे प्रतिपक्ष मन्त्रभागको भी वेद मानना बन्द कर देगा? वस्तुतः कई डरोसे वास्तविक वेदको वेदत्व से च्युत करना - यह प्रकार युक्त नहीं । ' नहि मृगाः सन्तीति यवा नोप्यन्ते, भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाघि-श्रीयन्ते ' यह महाभाष्यकारोक्त बात ' प्रतिसमाधेयं दोषेषु ' रूप में याद रखकर उसमें अपनी प्रखर प्रतिभाका परिचय देना चाहिये । शेष है ब्राह्मणभागमें ' याज्ञिक - पशु तथा उसका वध ' इस CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ८ विषयमें यह जानना चाहिये कि यज्ञमें शास्त्रानुसार ८११ I होता है, और उसका वध भी । जब यह शास्त्रीय पशु श्रवश्य व डर कर अपने पक्षके बचाव के लिए ब्राह्मरणभागको है, तो उससे च्युत करना ठीक नहीं । वेदत्वसे स I ' वेणीसंहार ' नाटकमें एक पद्य भीमसेन य प्रणेताने कहलवाया है- द्वारा उसके म चत्वारो वयमृत्विजः, स भगवान् कर्मोपदेष्टा हरिः, स संग्रामात्र दीक्षितो नरपतिः, पत्नी गृहीत व्रता । कौरव्याः पशवः, प्रियापरिभवक्लेशोपशान्तिः फलं राजन्योपनिमन्त्रणाय रसति स्फीतं हतो दुन्दुभिः । ( १ म अङ्क ) यहाँ पर साङ्गरूपकसे संग्रामको अध्वर ( यज्ञ ) बताया गया है । इस निमित्तसे यहाँ पर यज्ञकी सामग्री बता दी गई है । इसमें चार ऋत्विक्, कर्मोपदेष्टा ( आचार्य ), यज्ञमें दीक्षा लिये हुए यजमान - यजमानपत्नी, पशु तथा यज्ञका फल आदि बताया गया है । चतुर्थं पादमें लोगोंको बुलानेके लिए ढोलका बजाते रहना भी कहा है । इस संग्रामाध्वर ( युद्ध - यज्ञ ) में कौरवोंको पशु बताया है । भीमसेन - द्वारा पशु - कौरवोंका शस्त्र द्वारा वध विवक्षित होनेसे ' यज्ञ में शस्त्र द्वारा पशु - वध भी होता है ' यह सूचित किया गया है । . उक्त नाटकीय - पद्य में पशुवध होने पर भी संग्रामको अध्वर कहने.. का भाव यह है कि ' तस्माद् यज्ञे वघोऽवध: ' ( मनु ० ५।३ ९ ) अर्थात् यज्ञमें वघको भी अवध ( अहिंसा ) माना जाता है । ' आम्नाय ( वेद ) वचनाद् श्रहिंसा प्रतीयेत ' ( निरु ० १।१६।६ ) । प्रतिपक्षका यहाँ प्रश्न हो सकता है कि नाटक कोई माननीय Gujarat. An eGangotri ग्रंथ नहीं, Initiative इस पर तो कोई वादिप्रतिवादिमान्य आर्षं ग्रंथ का

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८१२ श्रीसनातनधर्मांलोक ( ७ ) ८११ प्रमाण होना चाहिये, जिससे यज्ञकी सामग्री में पशु तथा उसका प्रवश्य वध भी होता है, यह प्रतीत हो जावे; इस पर हम प्रतिपक्षके उससे सम्प्रदायके सर्वे सर्वा स्त्रा ० द ० जी की संस्कारविधिके संन्यास वेदत्वसे • प्रकरण ( पृ ० २७६-२७७ ) से उनकी बहुत ही मान्य तैत्तिरी-यारण्यकका जिसका उन्होंने अपनी तीनों मुख्य पुस्तकोंके प्रादिमें उसके मङ्गलाचरण किया है — प्रमाण उद्धृत करते हैं; उसमें यज्ञकी सामग्री बताते हुए पशुका, तथा पशुके शान्त करने ( मारने ) का नाम भी बताया गया है । वह वचन यह है-‘ यज्ञस्य आत्मा यजमानः, श्रद्धा पत्नी, शरीरम् इध्मम्, उरो वेडी, " " हृदयं यूप:, काम आज्यम्, मन्युः पशुः, तपोग्निः, दमः शमायता, य ऋतवः, ते पशुबन्धाः, यन्मरण तदवभृथः ' ( तैत्तिः १०। ६४ ) । अङ्क ) इस अध्यात्म - यज्ञमें मन्यु ( क्रोध ) को पशु तथा इन्द्रियनिग्रहको बताया - उस मन्यु- पशुका शमयिता ( मारने वाला ) कहा है । सो यज्ञमें दी गई पशु तथा उसका शस्त्रसे वध होता है - यह तो यहाँ भी सिद्ध हो गया । स्वा ० द ० जीकी संस्कारविधि ( पृ ० २० ) में यज्ञपात्रोंमें आदि खाँडा ( खड्ग ) वा वज्र भी लिखा गया है । इससे भी याज्ञिक लका पशु तथा उसका वध संकेतित हो रहा है । आरण्यक ब्राह्मणभागान्तर्गत होनेसे वेद है - यह पूर्व निबंध T है । मैं बताया जा चुका है, अब वेदकें मन्त्रभागमें भी यज्ञ में पशु होने से " होने का संकेत देखा जा सकता है-T है ।कह ' यत् पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यांसीद् ३ ९ ) ग्राज्यं, ग्रोष्म इध्मः, शरद् हविः ' ( यजुः माध्यं. ३१।१४ ) यहाँ 1 है । पुरुषमेध नामक मानस - यज्ञमें यज्ञकी सामग्री बताते हुए पुरुषको = )! हवि बताया गया है । ' सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिघः कृताः । देवा यद् यज्ञं तन्वाना श्रबध्नन् पुरुषं पशुम् ' ( ३१।१५ ) यहाँ नीय यज्ञ - सामग्री बताते हुए पुरुषका यज्ञके पशुरूपमें बन्धन बताया का CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार गया है । ' तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं ८१३ अयजन्त साध्या ऋषयश्च जातनग्रतः । तेन देवा पुरुषको पशु मानकर ये ( ३१६ ) यहाँ मानस - यज्ञके साधनभूत यजन कहा गया उसका प्रोक्षरगादि - संस्कार तथा उस हविसे है । इसीका संकेत यजुर्वेद - शतपथब्राह्मणमें ह वै देवा अग्रे पशुपाले मिरे ( १२३६ ) आया है । मानस पुरुषं से यहाँ यज्ञकी सामग्रियोंकी स्थानापन्न - यज्ञ होने यह तो होना ही था, पर यज्ञ में पशु तथा वस्तुएं विचित्र आई हैं, सामग्री में परिगणित कर दिया उसका प्रोक्षरणादि, यज्ञ-में उद्धृत आध्यात्मिक गया है । स्वा ० द ० जी से संन्यास उसका इन्द्रियनिग्रह यज्ञमें भी मन्यु ( क्रोध ) रूप पशु तथा - रूप शस्त्र वा शस्त्रग्रहीताके द्वारा शान्त करना ( मारना ) या गया है, तव यदि ' यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य ( न्याय दर्शन ४ | १ | ६२ ) यज्ञ बताने वाले ब्राह्मणभागने ' यज्ञमें पशु तथा उसका संज्ञपन बता दिया है, तो उससे डरनेकी भी क्या आवश्यकता है? स्वा ० दयानन्द जीने सं ० वि ० में उद्धत आरण्यक - वरिणत ‘ पशु ' का चालाकीसे “ पशुः - निवृत्त करने अर्थात् शरोरके मलवत् छोड़नेके योग्य है " यह अर्थ बदल कर अपनी दुर्बलताका परिचय दिया है । और संहितास्थित पशु, का ' पशु ं सर्वद्रष्टारं सर्वैः पूजनीयं प्रबध्नन्- ध्यानेन बध्नेन्ति ' ( ऋभाभू, पृ ० १४४ ) यह अर्थ बदल दिया है । जब गुरुपरम्परासे प्रतिपक्षियों को इस प्रकार अर्थ बदलनेकी चालाकियोंका अभ्यास है, तो ब्राह्मणभागमें भी वे अर्थं वदल सकते हैं, तब ब्राह्मणभागके परम्परासे प्राये हुए वेदत्वको उससे च्युत करनेकी क्या आवश्यकता? यज्ञमें पशुओं में गाय तो आ नहीं सकती, क्योंकि वह वेद-शास्त्रानुसार ' अघ्न्या ' होने से उसमें गृहीत नहीं हो सकती । अन्य शास्त्रानुशिष्ट पशु तो गृहीत हो जाता है, उसका वध भी Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 424

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श्रीसनातनघलोक ( ७ ) ८१४ शास्त्रानुशिष्ट है, पर यहाँ भी कई हानियोंका विचार करके शास्त्रानुसार मुनियों द्वारा कलिर्वार्जित कर देने से गृहीत न होकर वहाँ विधिपूर्ति के लिए पिष्ट - पशु ( आटे का पशु ) वा घृतपशु बनाया जाता है, उसीका ही प्रलम्भ उपचारसे वध माना जाता है, पर उस वध को शास्त्रानुसार ' प्राम्नायवचनाद हिंसा प्रतीयेत ' ( निरु ० १।१६।६ ) ' या वेदविहिता हिंसा नियतास्मिं-श्वराचरे । प्रहितामेव तां विद्याद्, वेदाद् धर्मो हि निर्बभौ ' ( मनु ० ५।४४ ) इत्यादि प्रमारणों से जिनका निष्कर्ष ' वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति ' यह प्रसिद्ध है - हिंसा नहीं माना जाता । कई कानूनों में तथा युद्ध श्रादिमें मारनेको हिंसा ( कानूनन जुर्म ) नहीं माना जाता । युद्ध - यज्ञ में पशु - रूप शत्रुको मारने वाले सैनिकको अपने पक्षके राजा की ओरसे फाँसी न मिलकर इनाम ही मिलता है । इसीको प्रतिपक्षिगण भी ' नरमेधयज्ञ ' श्रद्धानन्दकी बलि. लेखरामकी बलि ' इन शब्दोंसे प्रसारित करते हैं । देशत्रारण - रूप यज्ञमें अपनी बलि देना भी वे स्वर्ग्य मानते हैं, इसमें वध होना तो सिद्ध हो ही गया । उसे वे भी ' आत्महत्या ' नहीं मानते । देशवारणार्थं युद्धमें जाकर बलि हो रहे हुए पुरुषको भी नेता द्वारा, सैनिकको राजा द्वारा बलिभूत पशु की भाँति कहा जाता है कि - ' नवा उ एतन्म्रियसे, न रिष्यसि, देवान् इदेषि ' ( यजु ० माध्यं ० २३।१६ ) ( तू यह मर नहीं रहा और न ही हिंसित हो रहा है, तू तो देवलोक ( स्वर्ग ) जा रहा है, इसी का अनुवाद भगवद्गीता में प्राया है- ' हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं ( २।३७ ) । इस प्रकार शास्त्रीय यज्ञके पशु संज्ञपन में भीसमझ लेना चाहिये मनुष्य ज्ञानप्रधान होनेसे स्वेच्छासे हकीकत-राय आदि की भाँति अपनो बलि देता है, पर पशु प्रज्ञानी होने से परेच्छा से; यह भेद है, पर स्वेच्छा न होने पर भी दूसरेकी CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार इच्छा से भी श्रद्धानन्द, लेखराम राजपाल ८१५ को भी ' श्रद्धानन्द आदि की बलि, ' आदि के वघ बलिदान दिवस मनाया जाना है और कहा जाता है, श्रद्धानन्द-उन्हें ' अमर हुतात्मा ' माना जाता है । इस गति को ' अपगति ' द धर्मनिमित्तक होने से स्वर्ग्य माना जाता न मानकर है, इसी प्रकार याज्ञिक-पशुवध में भी यहाँ सब घटा लिया जा सकता है प्रतिनिधि ब्राह्मणभागानुसार ब्रोहि - यव ( चावल, जौ ) आदिको । पशु अथवा का नानकर जिसे हमने ' आलोक ' के छठे सुमन ( ४५३-४५४ पृ ) में सप्रमाण लिखा है, उसी का हवन भी मान लिया जा सकता है । पशु - हवन फलतः यज्ञमें पशुका होम तो सिद्ध हो ही गया, पर उसे सत्त्व, रज, तम गुणोंकी अपनी - अपनी प्रकृतिके भेदानुसार भिन्न-भिन्न रूपसे लिया जा सकता है । जैसे कि -सदा के लिए नैष्ठिक ब्रह्मचर्य रख कर किसी भी स्त्रीको मैथुनके लिए न लेना - यह उत्तम कोटि है, सन्तानके लिए स्त्रीको मैथुनार्थ शास्त्रविध्यनुसार लेना मध्यम कोटि है, उसे भी ब्रह्मचारी - जैसा ही कहा जाता है, जैसे कि महाभारतमें लिखा है - ' भार्यां गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतौ भवति ब्राह्मण: ' ( वनपर्व २०८।१४-१५ ) ' ऋतौ भार्यां गच्छन् ब्राह्मणो ब्रह्मचारी भवति ' यह इसका अन्वय है अर्थात् ऋतु कालमें भार्या - गमन करने वाले को भी ब्रह्मचारी ही माना जाता है । परन्तु बिना ही सन्तानेच्छाके और बिना. ही शास्त्रीय विवाह - विधिके केवल इन्द्रियानन्द - विषयानन्दके लिए किसी स्त्रीको स्वेच्छासे मैथुनार्थ ले लेना यह ग्रघम कोटि होती है, वैसे ही सर्वथा अहिंसा यज्ञ लेना, किसीको भी कायिक वाचिक, मानसिक दुःख न देन - यह उत्तम कोटि है । शास्त्र- क विध्यनुसार देशलाभ तथा स्वकीय मनोरथविशेषकी पूत्यर्थं Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 425

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5१६ श्रीसनातनधर्मालीक ( ७ ) ८१५ पशुसंज्ञपन करना मध्यमकोटि है, उसे भी पहले की भाँति केवघ अहिंसक -कोटि वा अमाँसाशी - कोटिमें रखा जाता है, जैसे कि निन्द- महाभारतमें वहीं कहा है ' अत्रापि विधिरुत्रतश्च मुनिभिमांसभक्षणे वात्मा ' देवतानाँ पितृणाँ च भुङक्त दत्त्वापि यः सदा । यथाविधि । नकर यथाश्राद्ध ं न प्रदुष्यति भक्षणात् । प्रमाँसाश भवत्येवमित्यपि ज्ञिक- श्रूयते श्रुतिः । भार्यागच्छन् ब्रह्मचारो ऋतौ भवति ब्राह्मणः ’ नथवा ( महा ० वन ० २०८।१४-१५ ) इस पर श्रीनीलकण्ठने लिखा है, शुका यज्ञियमांसभुजोपि ऋतुगामिनो ब्रह्मचर्यमिव औपचारिकमाँसा २४५३- शित्वमिति भावः ' । अर्थात् जैसे स्त्रीसे ऋतुकालमें गमन करने हवन वाला परिभाषिक ब्रह्मचारी माना जाता है, वैसे याज्ञिक ( देवयज्ञ, पितृयज्ञ आदि में ) पशुवधकर्ता भी वधकर्ताकी वा मां-- उसे साशोकी कोटि में नहीं आता । परन्तु बिना वाज्ञिकताके केवल अन्न- जिह्वानन्द वा विनोद के लिए पशुको बिना विधि मारना अधम लिए कोटि में परिगणित हुआ करता है । जैसे मध्यम कोटिम मैथुन एन को मैथुन वा व्यभिचार न कहकर उसे गार्हस्थ्य - धर्म कहा जाता नार्थ हैं, वैसे मध्यमकोटि में पशुवधको वध न मानकर उसे आलम्भऩ कहा जाता है, उसे हिंसाकोटिमें नहीं गिन जाता । जैसे छन् अवैध - मैथुनात्मक तृतीय कोटि व्यभिचार - कोटि है, वैसे बिना ऋतौ शास्त्रीय विधिके पशुवध करना हिंसाकोटि वा धर्म है, इन बातोंका विचार कर लेना चाहिये - प्रासङ्गिक होने से यहाँ सब वर्णन करना पड़ा । इसी प्रकार ब्राह्मणभागमें याज्ञिक पशु बलिको अपनी - अपनो शैली वा दृष्टिकोण से लिया वा सिद्ध भी किया जा सकता है, पर इन बातोंसे डर कर उनके प्रतिपादक ब्राह्मणको ही वेदत्वसे च्युत करना जहाँ शास्त्रापराध है, वहाँ अपना दौर्बल्य - प्रकाशन भी है हिन्दुधर्म जहाँ कच्चे फलको तोड़नेमें भी हिंसा मानता है, छोटे ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ८१७ देखकर छोटे जीवोंके चलने बचाव के लिए भी ' दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं ' ( मन ) को कहता जीवोंकी सूक्ष्म - हिसको भी वर्जित करता है, वही वहाँ जो यज्ञमें पशुबलि बताता है - इसमें क्या सूक्ष्म वैज्ञानिक, लौकिक - प्रलौकिक रहस्य क्या-अपने बुद्धिमान्दयवश थे, यदि यह नहीं जाना जा सकता है, तब उसे आध्या-त्मिक वा मानस यज्ञ रूपमें ले लिया जा सकता है, पर इससे उसकी मूल - वस्तु ब्राह्मणको हो वेदत्वसे च्युत करना तो ग्रक्षन्तव्य अपराध है । सृष्टिकी आदिसे लेकर अब तक की परम्परामें ग्राये हुए उसे वेद बताने वाले वेदरहस्यज्ञाता एवं शास्त्र मर्मज्ञ विद्वान् लोग प्रमत्त नहीं थे - यह समझ मुनि चाहिये । रखना यह मैंने अपने सम्बन्धमें ' वेदसंज्ञाविमर्श ' के तर्कोंका प्रत्युत्तर दिया है । जो अग्रिम भागमें श्री स्वा ० करपात्री जीसे मन्त्री आर्यसभा का पत्र - व्यवहार मुद्रित है, उसमें भी स ० व ० का पक्ष प्रबल रहा है । जिन प्राचीन प्रमाणों द्वारा ब्राह्मणभाग की वेदता सिद्ध होती थी, वहाँ मन्त्री जीने केवल कई व्याज . ( बहाने बनाकर उनसे अपनी जान छुड़ाई है । उन व्याजों ( बहानों ) का हम ' वेदसंज्ञा विमर्श ' से पृष्ठ देकर कहीं - कहीं अपनी टिप्पणी - पूर्वक कुछ संग्रह करते हैं । वे यह हैं-' ब्राह्मण अर्थ में वेद - शब्दका प्रयोग भावत है ' ( १० ) ' यज्ञ-सम्बन्धी कार्य - सम्पादनार्थं वेदसंज्ञाका संकेत किया है ' ( १२ ) यह ब्राह्मणकी वेद संज्ञा तो शवरस्वामी तथा कुमारिल भट्ट आदि के समय चालू हुई है ( २२ ) । श्रौपचारिक दृष्टि से ( २५ ) ' यह संज्ञा व्यवहारार्थं शबरस्वामी द्वारा प्रवर्तित है ' ( २८ ) शवर-मुनिके समय में उक्त संज्ञाको विशेष प्रचलन मिला ( ५५ ) । परम्परागत समानशीलता का एकमात्र अनुवाद किया है ( ५५ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 426

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८१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ब्राह्मणोंकी वेद - संज्ञा मुख्य नहीं ( ५७ ) श्रौतसूत्रकारों ने उक्त परिभाषाका निर्माण किया ( ५७ ) ' मन्त्र ब्राह्मणयों र्वेद नाम-धेयम् ' ऐसा वचन कात्यायन के प्रतिज्ञापरिशिष्ट में समाविष्ट कर दिया गया ( ५८ ) ' सर्वानुक्रमसूत्रकार ने जी शु ० यजु ० में स्थान - स्थान पर ब्राह्मरणका निर्देश किया है, वह श्रप्रामाणिक है ( ६० ) स्वाभिमत ब्राह्मणोंका वेदत्व प्रसिद्ध करनेके लिए उक्त सूत्र की रचना की गई है ( ६३ ) ( फिर तो मन्त्रकी वेद-संज्ञा भी जो साथ की गई है, उसमें भी प्रतिपक्षको स्वप्रोक्त कारण मानना पड़ेगा - आलोक - प्ररणेता ) । ब्राह्मणोंका मुख्य वेदत्व उन्हें इष्ट नहीं ( ६३ ) प्रयाज्ञिक ग्रन्थांमें जो वेद - शब्दसे ब्राह्मरण - ग्रन्थोंका निर्देश मिलता है, वह उन ग्रन्थकारों ने उक्त य. ज्ञिक मत को स्वीकार करके ही किया है । या मन्त्रव्याख्यान् भूत ब्राह्मण - ग्रन्थोंमें व्याख्येय - ग्रन्थ ( वेद ) का औपचारिक ( गौण रूप से प्रयोग किया है । व्याख्यान - ग्रन्थों में व्याख्य ग्रन्थका उपचार प्रायः लोकमें देखा जाता है ( ६४ ) ( यदि ऐसा है तो प्रतिपक्ष के अनुसार मन्त्र - मात्र के व्याख्यानभूत ब्राह्मण-भाग को मन्त्रभाग क्यों नहीं कहते? व्याख्येय ग्रन्थ प्रतिपक्ष के अनुसार मन्त्रभाग है । वेद तो दोनों ही हैं इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं आती ' आलोक प्रणेता ' ) । ‘ वात्स्यायन - भाष्यकार शबरसे अर्वाचीन हैं, अतः जो मान्यता शबरने स्थापित की है, वे ( वात्स्यायन ) भला उसका उल्लंघन क्यों करने लगे । ( ६४ ) ( क्या वात्स्यायन वेदानभिज्ञ थे? ( आ ० प्र ० ) । जैसी लोक - त्रचलित उदाहरणपरम्परा थी, उसको ही उद्धृत कर दिया । ( ६४ ) ( यह गलत है - सूत्रकारको ही तो वही वेदंके उद्धरण इष्ट थे, ( प्रा ० प्र ० ) । ' उन्होंने तात्कालिक प्रचलित पद्धतिका अनुसरणमात्र किया है. ( ६४ ) गड्डलिका -CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ८१६ GRO प्रवाह न्यायसे अन्य टीकाकारोंके अनुसरणको बतलाया ब्राह्म ( ६६ ) । यह उक्तिभी प्रसिद्ध का ही अनुसरण कर रही है ( ६६ ) है ॥ अंधा मनु ने भी प्राचीन पद्धति का अनुसरण क्रिया है, असलियत में आम्म वहाँ पर किसी वेवमन्त्रक! नद्धरण देना चाहिये था ' ( ५७ ) । यहाँ मान तो प्रतिपक्ष के पक्ष का इसी अपनी उक्ति से सम्यक् खण्डन हो में रहा है । स्वा ० द ० जी के स ० प्र ० के ११ वें समुल्लास के आरम्भ त्याय के ‘ यह मनुस्पति जो सृष्टिकी प्रादिमें हुई है ' ( पृ ० १७२ पं ० १७ ) इन शब्दों के अनुसार सृष्टिकी आदिमें बनी हुई मनुस्मृतिकी ब्राह्मणभागको भी वेद कहनेकी प्राचीन पद्धति स्वीकार करके प्रतिपक्ष ने व्रहमभागकी वेदता सृष्टिकी अदिसे ही सिद्ध कर · दो, हम प्रतिपक्षको धन्यवाद देते हैं, वे ऊपर से श्रार्यसमाज की रखनी रखते हुए ब्राह्मणभागको वाड़ मात्रसे वेद न मानते हुए भी भीतरसे ब्राह्मणभाग को वेद मानते ही हैं- पुनः धन्यवाद ( आलो ० प्र ० ) । ' मेधातिथिका कथन अपनी समझकी ही भूल है, मेधातिथि की नहीं ( ६७ ) ( मेधातिथि की समझ शायद मेधातिथिसे अलग निज होगी? प्र ० प्र ० ) । ' संहिता और ब्राह्मणोंकी भाषा भाषाशा-स्त्रियोंकी दृष्टि से अत्यन्त भिन्न है ( ६८ ) । ( फिर तो ऋ ० सं ० प्रति के १ म तथा १० म मण्डलकी भाषाके भी भाषाशास्त्रियों की दृष्टि से २ - मण्डलों की अपेक्षा भिन्न होने से १-१० मण्डल भाग भी वेद न रहेंगे, साधु! - आलो ० प्र ० ) । ' जब हम आपस्तम्ब के कथनको ही शावर भाष्य का अनुकरण कह रहे हैं, तो इन करा आधुनिक ( मेधातिथि आदि ) विद्वानों के प्रमाणोंको स्वत: प्रमाण कैसे माना जा सकता है? ( ६८ ) ' यहाँ वात्स्यायन मुनि ने प्रचलित परम्पराका अनुकरण किया है, ( ११४ ) कौशिकसूत्रकार श्रादिके समय में भी मन्त्र- उन Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 427

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८२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८१६ दोनोंकी ग्राम्नाय वेद ग्रादि संज्ञायं यज्ञपरक की थीं । यह नाया है ब्राह्मरण ही था ( ११५ ) ( फिर तो प्रतिपक्षके अनुसार मन्त्रक ( ६६ ) । धानुकरण वेद आदि संज्ञाएं भी यज्ञपरकता का अन्धानुकरण लियत में आम्नाय माननी पड़ेंगी, ‘ मन्त्रब्राह्मणयो:, मन्त्राश्च ब्राह्मणं च ' इत्यादि यहाँ में ' एकयोगनिर्दिष्टानां सह वा प्रवृत्तिः सह वा निवृत्ति: ' इस हो न्यायसे यदि ब्राह्मणभागकी वेदसंज्ञा याज्ञिककाल प्रतिपक्ष आरम्भ के अनुसार अर्वाचीन काल से माननी पड़ेगी, तो तत्सहचारी-०१७ ) मंत्रभाग की वेदसंज्ञा भी प्रतिपक्ष को अर्वाचीन माननी पड़ेगी । मृतिकी जो वे उत्तर मंत्रभागकी वेदतामें बताएंगे, वही उत्तर ब्राह्मरण-करके भागकी वेदतामें भी हो जाएगा । इससे प्रतिपक्षके सम्पूर्ण कर परिश्रम पर उन्हीं द्वारा स्वयं पानी फेर दिया गया है । समाज मानते ( बालो ० प्र ० ) । ' शबर - मुनिका यह वाक्य याज्ञिकपद्धतिका न्यवाद अनुकरणमात्र है । ( १५१ ) ( शबरमुनि तो भाष्यकार हैं, उन्होंने जैमिनिके मतको ही विवृत किया है, सो मन्त्रब्राहणकी बातिथि वेदता जैमिनि आदिका पारम्परिक मत है, शवरस्वा का अलग निजप्रचालित मत नहीं; श्रालो ० प्र ० ) । षाशा- ' मीमांसा के ७ वें अध्याय में जो ब्राह्मणोंको वेदोंके समान ० सं ० प्रतिष्ठा दी गई है, वह तत्कालिक रीति के कारण ही है, ( पूर्व स्त्रियों भाग पृ ० २५ ) [ यह क्यों नहीं मान लिया जाता कि ब्राह्मणभाग मण्डल को मनु, पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि, कपिल, पतंजलि, स्तम्व तो इन करणाद, गीतम. जैमिनि, व्यास आदि सभी वादिप्रतिवादिमान्य रगोंको वेदज्ञ विद्वान् एक स्वरसे वेद मानते हैं, केवल आजकलके स्वा ० द ० ' यहाँ जी तथा उनके साम्प्रदायिक- शिष्य ही ब्राह्मणभाग को वेद नहीं मानते । सो स्वा ० द ० जी तथा उनके शिष्य तो वैदिककाल ' किया में हुए हैं, एवं वे वेदोंके पूर्ण विद्वान् हैं, स्वा ० द ० जी तथा मन्त्र- उनके शिष्योंके अतिरिक्त अन्य सभी प्राचीन विद्वान् वर्तमान--CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वेदसंज्ञाविमर्श ' पर विचार ८२१ समय के अधकचरे, अन्धपरम्पसमें बहने वाले पण्डित हैं, श्रीर उन्हीं मनु, पाणिनि, पतंजलि, यास्क प्रादिमें कोई वेदका पूर्ण विद्वान् नहीं है, अतः उनका मद्र ब्राह्मणभागके वेदत्वविषयमें प्रमाण नहीं, ऐसा मान लेनेसे प्रतिपक्षके मत की बिना लेखनीको प्रयासित किये सिद्धि हो जायगी!!! -ग्रालो ० प्र ० ] । ' शवरस्वामी ने ' इत्याम्नाय: ' इन वाक्यों के द्वारा जो ब्राह्मणों के उदाहरण दिये हैं, वे भी प्रसिद्धि के कारण ही हैं । ( २५ ) ( आम्नायके उदाहरण ब्राह्मण भागमें हो उन्हें कैसे मिल गये, क्या वे प्रतिपक्ष के अनुसार ग्राम्नाय ( वेद ) हैं? वे ही उदाहरण उन्हें मन्त्रभागमें जो कि छोटी सी प्रतिपक्ष सम्मत चार पोथियाँ हैं- क्यों नहीं मिले; इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मणोंको वेद न मानना यह मत प्रतिपक्षकी वालुकाभित्तिसे अधिक मूल्य नहीं रखता । आलो ० प्र ० ) । इस प्रकार के ही वाक्य लिखकर मन्त्री - प्रार्यंसभाने जिनको स्थान - संकोचवश हम सम्पूर्ण उद्धत नहीं कर सकते; ब्राह्मण-भागके वेदत्वको हटानेको उपहासास्पद चेष्टा की है, अन्य सार प्रतिपक्षके पत्रोंमें बहुत न्यून है, यह अनुभवी संस्कृत एवं वेद में प्रवेश रखने वाले विद्वानोंने समझ लिया होगा । इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मणभाग सृष्टिकी प्रादिसे ही, मन्त्रभागके समकालसे ही वेद है - इस पक्ष को कभी भी किसी द्वारा निरा-कृत नहीं किया जा सकता । ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' में ब्राह्मणभागकी वेदताकी अर्वाचीनता तथापरिभाषावताना मन्त्रभाग की वेदताको भी अर्वाचीन बताने वाला होकर प्रतिपक्षियोंके पक्ष को भी ले डूबेगा - वहाँ ' चौबे गये थे छबे बनने, दुबे बनकर आये ' यह कहावत चरितार्थ हो जाएगी । कई व्यक्ति ' छन्दो ब्राह्मणानि च तद्विषयारिण ' इस पारिणनि सूत्रको ब्राह्मणकी अवेदतामें एक Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 428

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ८२२ महत्त्वपूर्ण निर्देश मानते हैं, समय आता है कि वे श्रीपाणिनि-द्वारा सभी स्थानों में कही हुई ब्राह्मण की वेदताको माननेके लिए तैयार नहीं होते, उसे तत्कालकी परिस्थिति का अन्धानुकरण मानते हैं, पर अब ' यदेव वान्तं तदेव भुक्तम्, के अनुसार उस पाणिनिसूत्रको देखकर गद्गद होजाते हैं, पर यह प्रसन्नता उनकी क्षणिक है, इसका पू समाधान हम आलोकके छठे पुष्पमें कर चुके हैं, शंकाकर्ता वहीं इसका समाधान देख लें । ( पृ ० सं ० ४६ से ५४ तक ) । पूर्वयोजनानुसार निर्णीत होनेसे अन्य स्थान न होनेके कारण हम इस वेदचर्चा में न तो अधिक कुछ और लिख सकते हैं, न वेद - सम्बद्ध अन्य निबन्ध देसकते हैं । अब ' वेदचर्चा ' को यहाँ समाप्त करके ‘ वेदपुराणेतिहासचर्चा ' में दो निबंध देकर इस पुष्प को पूर्ण किया जावेगा । अष्टम पुष्प भी अधिकांश मुद्रित हो चुका है, अब पाठकगरण उसकी भी प्रतीक्षा करें । छठे पुष्प में हमने जो सप्तम पुष्प की विषयसूची दी थी, उसके बहुत बड़े हो जाने से उसे दो पुष्पों में विभक्त करना पड़ा । सो सूचीके अवशिष्ट विषय अष्टम पुष्पमें पूर्ण कर दिये जावेंगे । परिवर्धन - पृ ० १३६ अथवा ' तं दानवं वज्रास्त्रमादाय मेढ अशातयत् ' इस धन्वय के अनुसार उस दैत्य को प्रपराधी अंग में महादेव जी ने वज्र द्वारा विदारित किया ' यह प्रथं भी हो सकता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection ८२ वेद - पुराणेतिहास - चर्चा ( १६ ) कई अन्य आक्षेपों पर विचार हम पुराण, इतिहास एवं वेद पर पृथक् - पृथक् पर्याप्त चर्चित कर चुके । अभी - अभी हमें ' पं ० माधवाचार्य की चर्चा का उत्तर ' नामक क्षुद्र - पुस्तिका ( ट्रैक्ट ) तथा ' नीर - क्षीरविवेक चुनौती ' स ० पुस्तक मिली हैं । प्रतिपक्षियोंने उनमें पुराण - इतिहास तथा मा सनातनधर्मके किये हुए वेदार्थ पर आक्षेप भी कर डाले हैं । इस इससे स्पष्ट है कि पुराण- इतिहासको तथा वैदिक स ० ध ० को कलङ्कित करनेमें प्रतिपक्षियोंका बड़ उत्साह रहता है । यदि यह ट्रैक्ट हमें पहले मिल जाते, तो प्रतिपक्षीके अन्य सभी ट्रैक्टों * की भाँति इनका उत्तर भी ' पुराण - चर्चा ' में हम दे देते । पर उस चर्चाके छप चुकनेसे हमें यह ' वेदपुराणेतिहासचर्चा ' में रखना की पड़ा है । फिर पता नहीं हमें कब अवसर मिले, अत: इसी पुष्प- वात में यह विचार क्रमसे हम रख रहे हैं । प्रतिपक्षियों की गुरुपरम्परासे यह प्रकृति रही है कि पुराण- यह इतिहास के पूर्वापर - प्रकररणको वे छिपा देते हैं, जिससे उसे न देखने वाली जनता पुराणों पर बिगड़ उठे । पर पूर्वापर-प्रकरण के उपस्थित कर देनेसे वही प्रमारण प्रतिपक्षियोंको गिराने वाले बन जाते हैं । हम यहाँ कुछ प्रक्षेपों पर विचार रखेंगे । ' आलोक ' पाठक ध्यान से देखें । उक्त पुस्तकें पं ० माघवा-चार्यजी पर लिखी गई हैं, उनका पूरा उत्तर वे देंगे ही, पर हम भी कुछ आवश्यक बातों पर प्रकाश डालते हैं । यह स्पष्ट है कि पं ० माघवाचार्य जीने जो प्रश्न रखे थे, उनका उत्तर प्रतिपक्षी मैं Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 429

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८२४ से नहीं बन पड़ा आक्षेप कर डाले किये हुए आक्षेपों द्वारा सनातनधर्म करेंगे । र प्ति चर्चा ( १ ) श्री पं ० श्री सनातनधर्मालोक ( ७ ) । केवल इस बहाने उसने सनातनधर्मं पर हैं कि- पं ० माध ० जी के स्वा ० द ० जी पर को भुलवा दिया जाय । श्रस्तु! हम प्रतिपक्षी-पर किये गये प्रक्षेपोंका प्रत्युत्तर द्वारा परिहार ' उदीर्ष्व नारि! ' का अर्थ माघ ० शा ० जो ने ' उदीर्ष्व नारि! ' मन्त्र के चुनौती स ० प्र ० में किये हुए स्वा ० द ० के ' विधवे! इस मरे हुए पतिकी रविवेक ' प्राशा छोड़के, बाकी पुरुषों में से जीते हुए दूसरे पतिको प्राप्त हो ' स तथा इस वेदार्थके अनार्य होनेका आक्षेप किया था कि – श्रार्यसमाजी डाले हैं । मृत - पतिका शव जलानेसे पूर्व ही अंगुलिनिर्देशपूर्वक विधवा ध ० को को कहते हैं कि — इस मरे हुए पतिकी आशा छोड़के जीवितों-है । यदि में से किसी को वर ले ' । नीट्रैक्टों पर उस यहां पर स्वा ० द ० जीसे प्रयुक्त किया हुआ ' इस मरे हुए पति रखना की आशा छोड़ के ' का ' इस ' शब्द ' इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतः-श्री पुष्प- वति चैतदो रूपम् ' इस न्याय से ' अ ंगुलिनिर्देश ' को बता रहा है! यह आक्षेप ठीक था, क्योंकि - यहाँ ऐसा व्यवहार एक अमेरिकन पुराण- लेडी के रवैयेको भी मात कर गया था । सुना जाता है कि-से उसे अमेरिका में स्वा ० रामतीर्थने एक लेडीको देखा कि वह अपने पूर्वापर- पतिकी कब्रको पंखा कर रही है, तो वे चमत्कृत हुए किं क्षियोंको यह तो भारतकी पतिव्रतानोंसे भी बाजी मार ले गई है । विचार उन्होने कग्रं को पंखा करनेका कारण पूछा, तो वह दोजी कि माधवा- हमारे यहाँ का नियम है कि पतिकी कब्र सूख जाने पर तब पर हम विधधोंको अधिकार हो जाता है कि वह - अन्य पति ले ले । परं है यह कम्बख्त केंद्र सूख भी नहीं रही है । इसे सुखानेके लिए ही तिपक्षी मैं इसे पंखा कर रही हूँ । श्रीरामतीर्थका वह चमत्कार घृणा-CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य ग्राक्षेपों पर विचार ८२५ रूप में परिणत हो गया । स ० प्र ० के अर्थने तो उस स्त्रीको भी मात कर दिया । यहाँ तो पतिके जलानेसे पूर्व ही श्मशान में आये हुए पुरुषों-में से जीते हुए दूसरे पतिको चुन लेनेके लिए स ० प्र ० ने श्राज्ञा दे दी - यह आक्षेप था श्री मांघ ० जीका कि यह तो पशुधर्म है । प्रतिपक्षी उस पर बहुत - कुछ हाथ - पैर पटकने पर भी उसका प्रत्युत्तर तो न दे सका, क्योंकि दुर्भाग्य से स ० प्र ० में किया हुआ वेदार्थ बड़ा ही खराब था, यहाँ तक कि - उस अर्थ को बलात् निकालनेके लिए मन्त्र - स्थित ' शेष ' इस निघात स्वर वाली तिङ-क्रिया को ' बाकी ' अर्थमें सुप बनाकर तो वेद एवं वैदिक व्याक-रण पर भी आक्रमण कर दिया गया है - इस विषय में ' आलोक, ( ८ ) का ' नियोग एवं विधवाविवाहके प्रसिद्ध मन्त्र ' ( पृ ० ५१७-५४६ ) निबन्ध देखिये । पर प्रतिपक्षीने इस बातका बदला लेने के लिए वही बात सायरणभाष्य पर डाल दी, और मोटे अक्षरों में शीर्षक लिख दिया कि ' पति की लाश पर पत्नी का स्वयम्बर पौराणिक प्रथा है ' यह शायद मन्त्र के ' पुराणं धर्ममनुपालयन्ती ' के अर्थ में प्रतिपक्षीने लिखा हो, और पुराण धर्मको वेदावमंसे भी प्राचीन सिद्ध कर देने का अपने अनजानमें प्रयत्न किया हो । अस्तु -पूर्वोक्त शीर्षक देकर प्रतिपक्षीने तैत्तिरीयारण्यकका सायरण-भाष्य दिया है, और उसपर टिप्परगी चढ़ाई है कि स ० ध ० का महान् आचार्य सायरण तो डंके की चोट मुर्दे - पतिके कारण शोकमें कातर पड़ी हुई सद्योविधवाको लाशको छोड़कर शोक - प्रदर्शनको आई हुई भीड़ में से पुनः विवाहके लिए किसी का हाथ पकड़नेका आदेश दे रहा है । यह पापाचार खास स ० घ ० का प्रङ्ग है । मुर्दे के पड़े होने पर विधवाकी शादी रचना यह आर्यसमाजका स ० ६० ५३ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 430

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८२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) नियम तो नहीं है [ स ० प्र ० का अर्थ तो यही बता रहा है, पर प्रतिपक्षो उसे छिपाना चाहता है ] पर स ० घ ० में अवश्य है- " अब विपक्षी ( मा ० चा ० ) बतावे कि -- मुर्देको जलानेसे पूर्वं हो अंगुलीनिर्देशपूर्वक विधवासे शादीके लिए कहना यह सनातनी पशुधर्म है या नहीं ' [ यहाँ पर ' उल्टा चोर कोतवालको डांटे ' यह कहावत प्रतिपक्षी चरितार्थ कर रहा है ] यह आक्षेप करके प्रतिपक्षीने आर्यसमाजके धर्म - ग्रन्थ स o प्र o में आये हुए ' हे विधवे! तू इस मरे हु । पतिकी प्रशा छोड़ के बाकी पुरुषों में से जीते हुए पतिको प्राप्त हो ' ( ४ थं समु ० ) इस मन्त्रके अर्थ पर पर्दा डालनेकी चेष्टा की है, अपनी बला दूसरे पर डाल देनेकी चेष्टा की है - यह विद्वान् पाठकोंने अनुभव किया होगा । यही आक्षेप जो प्रतिपक्षीने सायरण पर किया है - यही का यही प ० माघ ० जी ने स्वा ० द ० जी के वेदार्थ पर किया था, पर प्रतिपक्षी ने उसका उद्धार न करके उसे भुलवानेके लिए यह चाल खेली कि — वही आक्षेप सायरण - भाष्य पर कर दिया । स्त्रा ० द ० जी ने ' गतासुमेतं ' इस मन्त्रके ज्ञापकसे अन्त्येष्टिके समय बोले जाते हुए ' उदीर्ष्व नारि! ' इस मन्त्र का अर्थ करते हुए इस मरे हुए पतिकी आशा छोड़ के ' यहाँ ' इस ' शब्दसे ' इदमस्तु संनिकृष्टे समीपतरवति चैतदो रूपम् ' इस न्यायसे ' समीपतर अर्थको बताने वाले मन्त्र - स्थित ' एतद् ' शब्द के अनुसार ' इस ' शब्दसे अंगुलिनिर्देश सूचित किया था, और फिर मन्त्रमें सर्वथा न ठहरे हुए ' इस मरे हुए पतिकी आशा छोड़ के बाकी पुरुषों में से दूसरे पतिको प्राप्त हो ' यह शब्द भी स्वामीने मन्त्रार्थमें प्रक्षिप्त कर दिये थे कि - जिससे उनका मनचाहा नियोग अर्थ सिद्ध हो जावे । स ० प्र ० में स्वामी ने जो अर्थ किया था, थोड़े से परिवर्तनके साथ वैसा ही अर्थ ऋभाभू. में भी कर डाला कि-CC - 0. Ankur Joshi Collection कई अन्य प्रक्षेपों पर विचार ८२७ ' हे स्त्रि! अपने मृतक - पतिको छोड़ के इस जीवलोक में... पुरुष के साथ नियोग करके सन्तानोंको प्राप्त हो । " दूसरे लिखे हुए भी पदोंका स्वामीने निर्मूलतासे अर्थ मन्त्र में न म जैसे कि - छोड़ के, जो तेरी इच्छा हो, सन्तानों को बढ़ा दिया, विधवे नारि! गतप्राणं मृतं विवाहितं पति ं त्यक्त्वा ' इससे प्राप्त हो, ' है 1 की लाश का मौजूद होना और उसको छोड़ देना मृतक पति कहा जा रहा है ) जीवन्तं देवरं द्वितीयवरं पति एहि स्पष्ट प्राप्नुहि शब्दों में स ० प्र ० में तो ' शेष ' इस तिङ - क्रिया को सुप् बनाकर । नर्थ कर दिया था, और ऋभाभू में भी इसी तिङ - क्रियाको ' बा सुप् ' बनाकर उसका ‘ सन्तानोत्पादनाय ' यह गलत अर्थ कर दिया । सन्तानवाचक ‘ शेषस ' शब्द सकारान्त है, और मूर्धन्य ' ष ' पर स्वरित स्वर है, देखो निघण्टु ( २२ ), पर उक्त मन्त्रमें ' शेष ' तिङ-क्रिया होनेसे निघात है, ' षे ' के अनुदात्त को सामने उदात्त होने अनुदात्ततर हो गया है । यदि ' सन्तानाय ' अर्थ होता. तो ' शेषसे ' बनता, जैसे ' शेर्षसा ' ( ऋ. ५/७० । ४ ) यह वेदमें अपत्यवाचक ' शेषस ' शब्द तृतीयान्त है । पर प्रतिपक्षी ने जो कि ऋभाभू. का सहारा लेकर स ० प्र ० के अर्थको छिपानेकी चेष्टा की है कि-' तू इस मरे हुए पतिकी आशा में दुःखी होना छोड़कर ' इस वाक्य में ' इस ' शब्दका यह अर्थ नहीं होगा कि लाश सामने पड़ी है, और विधवासे दूसरी शादीका उपदेश दिया जा रहा है, इत्यादि-रूप में ‘ इस ’ अर्थके बदलने में और ' दुःखी होना ' प्रक्षिप्त करके ' यह मरनेके समयका वर्णन नहीं, किन्तु पीछे का ' इत्यादि बलात् अर्थं करनेमें बेचारे प्रतिपक्षी की बड़ी दयनीय दशा हो गई है । प्रत्यक्ष वातको छिपानेका यही तो परिणाम होता है । स्पष्ट है कि - वह इसमें सफल नहीं हो सका । इस मन्त्र के विषय में ' आलोक ' म पुष्प देखना चाहिए । भ Gujarat. An eGangotri Initiative