सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 471–480

सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

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श्रोसनातनधर्मालोक ( ७ ) २०७ ६०८ उन्हें यह उपाधियाँ तो न दिलवा सकता । दीने रहने पर तो वादी को राक्षस कैसे बतावे? वह अपने पुराण भला अपने अनुक्कूलों वैसे बतावेगा । इस पर हमारा उत्तर धर्म विरोधी ब्राह्मणब्रवोंको १७५ से २१५ पृ ० तक देख लेना चाहिए । नर- इसी पुष्पमें ब्राह्मणजी वादीके माने हुए पुराणके वचना-ता • यदि श्रौदीच्य नहीं थे, तथा वादीके अनुसार ' ब्राह्मण ’ नुसार राक्षसोंके अवतार थे. तो सिद्ध हो गया कि -वे वादीके अनुसार कुत्ता, हाथी ' नहीं ब्राह्मण थे, तो उक्त पुराण - वचन ब्राह्मण भी नहीं थे । यदि वाले थोड़े लोगों के प ब्राह्मणोंके लिए न होकर उन लक्षणों । समस्त I लिए है । नाम लिखा है, और 3 उक्त पुराण - वचनमें न तो आचार्योंका लिए उक्त वचन न सारस्वतोंका, तब पुराणविरोधी ब्राह्मणोके गया । यदि प्रतिपक्षी हो जाने से औदीच्य ब्राह्मण में वह घट उसे देनेका अधि-प्रक्षिप्त माने तब उसका उक्त पुराणवचनको तो उसका समाधान उक्त पृष्ठोंमें कर ' कार सिद्ध न हुआ । हमने शूद्र थे, फिर व्यासके वचनसे दिया है । " व्यासोक्त ब्राह्मरण पहले यह वादीसे समर्थित ं बात पीछे ब्राह्मण हुए " ( पृ ० १४ ९ ) यदि लिखा है, तो सत्य है, क्योंकि — उसने उसे प्रमाण मानकर हो गये । हम तो इस प्रौदीच्य ब्राह्मण जी भी पहले शूद्र सिद्ध । वादीने अपने साध्य मानते हैं, सिद्ध नहीं मानते कथनको ‘ नादान - दोस्त ' बनकर अन्तत: उन्हें सचमुच औदीच्य ब्राह्मणके कर दिया । उसे वधाई हो । ही कापड़ी सिद्ध आप लोगों पृ ० १६२ ( प्र ० ) मरे हुए घोड़ेके लिङ्गको है? कौन धोकर - सी वैज्ञानिकता के यहाँ अचार - मुरब्बा बनाया जाता यज्ञके प्रकरण में है । एक इस अर्थ में है? ' ( उ. ) यह अश्वमेध होता है । इस विषय में विशेष घोड़ा कायापलटसे यज्ञमें हुत CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ६०६ वैज्ञानिकता ' आलोक ' ( ६ ) पृ ० ४०६ - ४१२ में देखें । वादी क्रोधी वनकर ग्रसभ्य शब्दोंका प्रयोग करता है । पृ ० १६३ ' कुमारी अध्वर्यु प्रत्याह ' कह कर जो महीघर-भाष्य पर वादीने आक्षेप किया है, वह अर्थ शतपथानुकूल है । स्वा ० द ० अपने भाष्यकी शुद्धता शतपथकी अनुकूलताके कारण करते हैं । इसे शतपथमें ' अभिमेथन ' कहा है । जो अर्थ शतपथमें होगा, वही यहाँ । इस विषयमें ' आलोक ' ( ५ ) पृ ०७७५ ७७८ में देखना चाहिये । पृ ० १६५ ' शिवदूतीको अण्डकोषभक्षरणका प्रादेश ' ' ग्रास्वा-दितं नचान्येन ' इस विषयमें इसो पुष्पके २५८-२६० पृष्ठमें देखो । शिवदूतोका ' मृत्यु ' अर्थ करना ' पिण्ड छुड़ाना ' नहीं, यह तो स्वयं उक्त पुराण उसे ' संहारकारिणो शक्ति ' बता रहा है । इस विषय में पूर्वोक्त पृ ० देखना चाहिए । पृ ० १६५ - १६६ ( प्र ० ) ' वेदोंमें यौगिक अर्थ होना चाहिए; वहां आप रूढि प्रथ करते हैं । पुराणों में रूढि प्रर्य होना चाहिए, वहां पर आप यौगिक अर्थ करते हैं ( उ. ) वेदोंमें भी रूढि - योगरूढि अर्थ होते हैं, अन्यत्र भी यौगिक अर्थ हुआ करते हैं । इस विषयमें ' आलोक ' ( ८ ) १४२ –१६ पृ ० देखिये | पृ ० १६६ ( प्र ० ) ' उपनिषदोंको वेदसंज्ञा देना आपकी भूल है ' ( उ ) भूल नहीं है । वे ब्राह्मणभागान्तर्गत होनेसे वेद हैं-इस विषय में ' आलोक ' ( ४ ) पृ ० ११५ – ११६ तथा इस पुष्पका ७४७ पृ ० देखें । पृ ० १६६ – १६७ ' उपनिषदें स्वयं अपने को वेद नहीं कहतीं, ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' ( कठोप ० ) स्वधर्मोभिहितो वेदेषु ' ( मंत्रपु ० ) यहाँ उपनिषद् धर्मके लिए अपनेसे भिन्न वेदोंका निर्देश Cjarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 472

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) १० कर रही हैं । ‘ ऋग्वेदं भगवोध्येमि ' ( छान्दो ० ) ऐसा कथन वेद उपनिषद् से भिन्न हैं- यह सिद्ध कर रहा है ' । ( उ. ) यह वादीने स्वा ० ब्रह्ममुनिके लेख से दिया है । यह कथन ठीक नहीं है । ' वेद ' शब्द से अथवा ऋग्वेदादिशब्दसे उसका मन्त्र-भाग तथा ब्राह्मणभाग ( जिसमें उपनिषद् तथा आरण्यक -भाग भी आ जाता है ) गृहीत हो जाता है । मन्त्रभाग आदि एकदेशी नाम है, परन्तु वेद आदि शब्द मन्त्रभाग एवं ब्राह्मण-भागका समष्टि नाम है । वादीके दिये हुए पहले प्रमाणके अनुसार प्रतिपक्षिसम्मत चार वेदपोथियोंमें ' ओम् ' का वर्णन वैसा नहीं है, जैसा कि वेदके ब्राह्मणभागरूप उपनिषदोंमें है । इस विषयमें ‘ आलोक ' ( ५ ) पृ ० ८६६-६०२ में देखिये । यदि वादी कहे कि — ‘ अपने में अपना नाम ' अस्मद् ' शब्दसे न कहकर परोक्षरूप वा अन्यरूपसे ' सर्वे वेदाः, वेदेषु, ऋग्वेदः, यजुर्वेदः ' आदिरे कैसे कहा '? इस पर जानना चाहिए कि-यह प्राच्य - शैली वा भारतीय - शैली है. अथवा यही कहना चाहिए कि — यह वैदिक - शैली है । हमारे रामायण, महाभारत, स्मृति, पुराण आदि सारे साहित्यको छान डालिये, सर्वत्र अपने लिए उत्तम पुरुष न मिलकर आपको प्रथम पुरुष मिलेगा । हमारे संस्कृत - साहित्य में अंग्रेजी - लिट्रेचरकी भाँति पहले फर्स्ट पर्सन ( उत्तम पुरुष ) नहीं आता, किन्तु प्रथम - पुरुष ( अन्य पुरुष ) ही आता है । इस प्रकार दर्शनोंमें तथा वेदाङ्गोंमें भी प्रतिपक्षीको यही शैली मिलेगी । वेदान्त आदि दर्शनोंमें ' तदुपर्यपि बादरायणः ' ( १।३।२६ ) इत्यादिमें ' बादरायण ' शब्द देखकर प्रतिपक्षी वेदान्तका कर्ता वादरायणसे भिन्न मान लेगा? ' कर्माण्यपि जैमिनि: ' ( ३ | १ | ४ ) यह मीमांसादर्शनमें जैमिनिका नाम ग्रन्यकी भाँति देखकर प्रति-CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ६१२ पक्षी उसका कर्ता जैमिनिसे भिन्न मान लेगा? फिर ६११ पञ्च पक्षी अपने वेदको भी वेदसे भिन्न मान लेगा तो प्रति- देखक रूपसे ' वेद ' शब्द वा ऋग्वेद ' आदि शब्द, यदि वहाँ अन्य ' पश्य ' यो गायत्र्या अधिपतिर्बभूव प्रजावे । देखिये- मन्त्र ( अथर्त्र ॰ ४।३५।६ · यहाँ अथर्ववेदसं एतस्मिन् वेद निहिता विश्वरूपाः ' ० ने ' यस्मिन् वयं निहिताः ' अथवा ' अहं निहित: ' न कहकर पूर्व शैली में अन्यरूपसे किया है । प्रतिपक्षीके न्याय से ' वेद ' प्रथर्ववेदसे भिन्न हो नामग्रहण जाएँगे ' तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋत्रः सामानि जज्ञिरे ' यह मन्त्र वर्तमान! भी संहिताओं में प्राया है । तब ॠग्वेदसंहिताने ' अहं ' न कहकर ' ऋच ' ऋचः ' यजुर्वेदसंहिताने अपने मन्त्रमें ' ग्रह ' न कहकर ' यजुः ' ताम्र यह ' वेद ' अन्यरूपसे ने अपनेको वा परोक्षसे कैसे कहा? और इस मन्त्रमें भो ' वेद वेद नहीं कहा । अब अथर्ववेदसं ० को देखिये - ' यस्माद् ऋचो अपातक्षन्, सम यजुर्यस्मादपाषन् । सामानि यस्य लोमानि, अथर्वाङ्गिरसो मुखम् ( १० ७ २० ) यहां पर अथर्ववेदने ' ग्रहं मुखमस्मि ' न कहकर इस ' अथर्वाङ्गिरसो मुखम् ' यह अन्यरूपसे कैसे कहा? क्या अथर्वा - ग्रान ङ्गिरोवेद ' इससे कोई भिन्न है? ' यस्मिन् वेदा निहिता विश्व- श्री रूपाः ' ( अ ० ४।७।६ ) ‘ ब्रह्मणा वीर्यावता ' ( ग्र ० ४ । ३७ । १ ) ‘ तं त्वा श्री यौमि ब्रह्मणा दिव्यदेव! ' ( ० २।२।१ । यहाँ दिव्यदेवका ब्रह्म यह ( वेद ) द्वारा युक्त करना कहा है । तब क्या यह वेदमन्त्र नहीं रहे कि — इसमें ' वेद ' शब्द परोक्षरूपमें कहा है? ' वेदाः तैर्मे कृतं स्वस्त्ययनमिन्द्रो मे शर्म यच्छतु ' ( प्रथ ० १६।६ । १२ ) तब क्या वेदोंसे की हुई स्वस्तिप्राप्तिको अथर्ववेदसंहिता अपने लिए प्रार्थित करके वेदको अपनेसे भिन्न बता रही है? रूप अथर्ववेदसंहिता का नाम ' प्रथर्वाङ्गिरसः ' प्रसिद्ध है जैसे वा कि- पूर्व मन्त्र दिया जा चुका है । उसी प्रथर्ववेदसं ० में ‘ प्राथर्व- श्र रणानां चतुऋ'चेभ्यः स्वाहा ' ( ०१६।२३।१ ) ' आङ्गिरसानामाद्यैः क्य Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 473

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६१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पञ्चानुवाकैः स्वाहा ' ( अ ० १६२२/१ ) इत्यादि परोक्षरूपसे वर्णंन देखकर इन मन्त्रोंको वादी अथर्ववेदसं ० नहीं मानेगा? तव तो ' पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति ( प्रथ ० १०1८1३२ ) इस मन्त्रमें वेदमें देवके काव्यका देखना कहनेसे वह ' देवका वेद ' इस-से कोई भिन्न हो जायगा? वस्तुतः वादीको उक्त युक्ति तुच्छ है । उत्तर दोनों स्थान समान हैं? इस प्रकार उपनिषद् आदिमें ऋग्वेदादिशब्दसे मन्त्र- ब्राह्मण, उपनिषद्, आरण्यक तथा अपना भी सभी कुछ गृहीत हो जाता है । जिस प्रकार वेदसंहिता में ' ऋचः, सामानि, छन्दाँसि, यजुः, ब्रह्म ' आदि कहनेसे उक्त संहि-तासे भिन्न चार वेद नहीं हो जाते, अथवा इन शब्दोंके साथ ' वेद ' शब्द साथ न ग्रानेसे यह अवेद नहीं हो जाते, वैसे यहाँ भी समझ लेना चाहिए । पृ ० १६७–१६८–१६६ ' न काँचन परिहरेत् ' छान्दोग्यके इस वचनका श्रीशंकराचार्यका भाष्य देकर वादीने उसपर श्री-श्रानन्दगिरिका भाष्य दिया है । इसपर यह जानना चाहिये कि श्रीमानन्दगिरिने जो समझा, उसी रूपसे लिखा । क्या वादी श्रीमानन्दगिरिको प्रमाण मानता है? यदि ऐसा है, तो उसने यहाँ अपवादस्थल मानकर तथा वेदप्रोक्त जो भी हो, वह धर्म होता है ' यह मानकर व्यवस्था दी है कि - ' श्रीत अर्थसे विरुद्ध स्मृति दुर्बल हो जाया करती है - ' श्रौते अर्थे दुर्बलायाः स्मृतेर्न प्रतिस्पर्द्धिता ' । स्वा ० द ० प्रोक्त नियोग बहुतों के मतमें व्यभिचारका दूसरा रूप है । तभी तो वह आर्यसमाजमें भी चालू न हो सका । पर वादी लोग उसे स्वा ० द ० जीके अनुसार वैदिक मानकर उस पर श्रद्धा करते हैं- ' वैसे यहाँ पर भी श्रौतता ( वैदिकता ) समझकर क्योंकि — उपनिषद् भी वेद होती हैं, इसपर देखो ‘ आलोक ’ CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन २१३ ( ६ ) उसे नियोगका एक भेद समझकर वे अपना मानसिक समाधान कर लें । तत्र वादी उम श्रीत- अर्थको भङ्गकी तरङ्ग कैसे कहता है? यह एक नियोग - जैसा कथन है, जैसे कि - स्वा ० द ० जीने लिखा है - ' जैसे देवरको विधवा समानस्थान शय्यामें प्राकृणुते ( इसका अर्थ ' बुलाती है ' है, और स्वा ० द ० जीने अर्थ लिखा है ) ' एकत्र होकर सन्तान उत्पन्न करती है, ' तो क्या विधवा देवरकी शय्यामें उसके साथ सोकर सन्तान उत्पन्न नहीं करती है? तब क्या उस आने वालीको देवर व्यभिचार समझ कर हटा देता है? स्वा ० द ० जीने लिखा है कि- ' पति स्त्रीको आज्ञा देवे कि तू दूसरे पतिकी इच्छा कर । ' ' तव स्त्रो दूसरेसे नियोग ( मैथुन ) करके ' । तब वह दूसरेकी शय्या पर चढ़ेगी, वा नहीं? तब वह दूसरा क्या उस समागमार्थिनीको मनाही कर देगा? ' पाप तो नियोग ( मैथुन ) को रोकने में है, क्योंकि ईश्वरके सृष्टिक्रमानुकूल स्त्री - पुरुषका स्वाभाविक व्यवहार रुक ही नहीं सकता । ( स ० प्र ० ४ पृ ० ७० ) इत्यादि वातोंके मानने वाले भी यदि छान्दोग्यभाष्यपर श्रापत्ति करें, तो कहना पड़ेगा कि ' छाज तो बोले, वोले, पर चलनी भी बोलती हैं, जिसमें नौ सौ छेद हैं । ' तब वादी नियोगको स्वामीकी ' भंगकी तरङ्ग ' तथा व्यभिचार मानता है क्या? दोनों स्थान समान उत्तर होगा । इस विषयमें हमने इसी पुष्पके ( पृ ० ६५-६६ । में मीमांसा की है, उसमें देखना चाहिये । पृ ० १६८ की टिप्पणीमें वादीकी पुस्तकके सम्पादक श्री-विद्यार्थीजी छान्दोग्यकी उक्त ' न काञ्चन परिहरेत् तद् व्रतम् ' कण्डिकाका अर्थं लिखते हैं- ' यह व्रत है काँचन- किसी भी पर - स्त्री को न परिहरेत् प्रपहरण न करे, यह लिखकर विद्यार्थीजी उसपर Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 474

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६१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) टिप्पणी चढ़ाते हैं कि- ' कैसा सीधा और कितना उत्कृष्ट अर्थ है! ' यह कहकर ' श्रपने मुह मियाँ मिटू ' बनते हैं । यहाँ विद्यार्थीजीने कमाल कर दिया! ' परिहरेत् ' का उनने ' अपहरण ' अर्थ कैसे कर लिया? मूलमें ' परि ' उपसर्ग है । विद्यार्थीजीने उसके स्थान ' अप ' उपसर्ग कैसे लगा दिया? वही ' परि ' उपसर्ग लगाकर ' परिहरण ' अर्थ क्यों नहीं किया? तब अपनी इच्छा है. जैसा चाहा अर्थ कर दिया! श्रार्यसमाज में हमारे विद्यार्थीजी के गलत भी अर्थ का सम्मान होगा और हमारे ठीक भी अर्थको उसमें माना ही न जावेगा! हमारे पास मुलतान में एक आर्यसमाजी विद्यार्थी कृष्णचन्द्र ( मिण्टगुमरी ) शास्त्रश्रेणीमें पढ़ता था । प्रकरण आ पड़ा । हमने कहा – स्वा ० द ० जोने ' शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चंति शूद्रताम् ' का गुरणकर्मसे वर्णव्यवस्था अर्थ कर दिया, जबकि मनु के श्लोकमें गुणकर्मका गन्ध ही नहीं । उसने वहा - पं ० जी! इस पद्यका अग्रिम अंश बोलिये, आपने कुछ छिपाया होगा? हमने अग्रिम अंग बोल दिया कि - ' क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात् तथैव च ' ( १०।६५ ) वह विद्यार्थी बोल उठा कि - पं ० जी! इसमें गुणकर्मका नाम तो कहा है । मैंने कहा – कहाँ? उसने कहा – ' विद्यात् ' में । मैंने ' कहा- – ' ' विद्यात् ' का क्या अर्थ है? वह बोला - विद्यात् - विद्यासे । मैंने कहा कि – ' विद्या, तो आकारान्त स्त्रीलिंग है । उसका पञ्चमी में तो ' विद्यायाः ' बनेगा ' विद्यात् ' कैसे बन सकता है? यह कोई प्रकारान्त पुलिङ्ग राम-शब्दके समान तो है नहीं! और यहाँ विभक्ति भां तृतीया अपे-क्षित है, पचमी नहीं विद्यार्थीने पूछा कि - यह ' विद्यात् ' क्या है? मैंने कहा कि यह क्रिया है, विद्धातुका लिङ, जिसका अर्थ है जाने । फिर CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नोरक्षीरविवेक ' पर विचार ६१६ मैंने ' शूद्रो ब्राह्मणतामेति ' का वास्तविक अर्थ २१५ थे, प सुनाया । विद्यार्थी चुप हो गया । मैंने कहा कि आर्यसमाजकी वेदी हो, तुम मेरे ऐतिह छात्र वहाँ पर ' विद्यात् ' का ' विद्यासे ' ऐसा गलत अर्थ करो और पुस्तक मैं तुम्हारा अध्यापक ' जाने ' यह वास्तविक अर्थ करूं, पर श्रार्थ-- समाजी तुम्हारा अर्थ मानेंगे और मेरे अर्थ के लिए कहेंगे कि— में ल प ० जीने पक्षपातसे अर्थ किया है । यह है प्रार्यसमाज में विद्या- भी महारानी (? ) की कृपा! हमारे प्रतिपक्षीकी पुस्तक संपादक समय हमारे विद्यार्थीजीने भी ' परिहरेत् ' का ' पहरेत् ' अर्थ करते हुए वेदवि वही कमाल किया है । संस्कृतभाषा न हुई यह अपनी मर्जी की ज्ञान भाषा हुई । समाज उन्हींका - चाहे वे संस्कृत भाषा से कोरे जास भी हों, उन अपने ग्रार्यसमाजियोंका ही अर्थ मानेगा, हम संस्कृत विद्वानोंका नहीं । यही पृ ० १७२ ‘ मेढासे, बैल से भोग करें यह स्वा ० द ० जीका अर्थ तो बड़ा भ्रामक है- ' बैलका भोग ' भी नहीं, ' बैल से भोग होता करें ' लिखा है, जिसमें वादी के अनुसार भङ्ग की तरङ्ग ग्रनुमित क्यों होती है । ' उपयोग लें ' यह ब्रेकेटका पाठ पीछे बढ़ाया गया है, जिससे भ्रम जो हो रहा था, हट जावे । अब तो व्रकेट भी हंटा कि उ दिया गया है । जबकि वे भोगका अर्थ ' उपयोग ' करते हैं, तब वियु पुराणमें भी ' भोग ' का अर्थ ' उपयोग ' कर दिया जा सकता है । ( उत्त फिर बलात् वहां प्रतिपक्षीद्वारा क्यों भ्रम पैदा किया जाता है? १६८ पृ ० १७३ में वादी पं ० माध ० जी पर प्राक्षेप करता है - १११ लिय बटा नाक ' । वैष्णव तिलकको 111 अंग्रेजी - नम्बर कहना अंग्रेजों-पड़े; का दास बनना है | क्या हिन्दी के १११ अंक ऐसे होते हैं? यदि य नहीं, तब उसे वैसा कहना अंग्रेजों का पिटू बनना है । १७३-१७४ ‘ शुक्याः शुकः ' ( भविष्य ० ) इसका उत्तर पहले दिया जा चुका है । मुनिलोग भी वंसा रूप धारण कर लिया करते प्रति Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 475

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१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) थे, पर भविष्य पुराण में तो यह सब बातें पूर्वपक्ष में कही हैं; ऐतिहासिकरूपमें नहीं । वादीको चाहिये कि इन इतिहासोंको मूल पुस्तक से ढूंढकर सामने रखे 1 १७६ ' तीतरका शोरबा ' जो स्वा ० द ० जीने प्रथम सं ० वि ० में लिखा था; उसपर वादी कहता है कि - ' स्वामीजीने यहां यह भी लिखा था कि यह एकदेशी मत है ' । यह ठीक है, पर उस समय तो यह वचन स्वामीजीको वेदविरुद्ध न मालूम हुआ, पीछे. वेदविरुद्ध कैसे हो गया? क्या उस समय स्वा ० द ० जीको वेद-ज्ञान नहीं था? इस प्रकार पुराणों में भी माँसका उत्तर दिया जा सकता है । जातिमें सात्त्विक राजसिक तामसिक सभी प्रकार के लोग होते हैं; सो मांस तामस लोगोंके लिए हो सकता है -यही इसकी ऐकदेशिकता समझनी चाहिये । सृष्टि में केवल सोना नहीं होता, लोहा भी होता है । अन्न भी होता हैं, उसका मल भी होता है । तब पुराणोंपर उसका प्रक्षेप क्यों? स्वा ० द ० जी भी माँस मांसाहारीको खिलानेका आर्डर देते हैं । स ० प्र ० में स्वामीने लिखा है- ' यह राजपुरुषोंका काम है कि जो हानिकारक पशु वा मनुष्य हों; उनको..... प्राणसे भी वियुक्त कर दें । ( प्रश्न ) फिर क्या उनका मांस फेंक दें? ( उत्तर ) चाहे फेंक दें अथवा कोई माँसाहारी [ मनुष्य ] खावे, तो भी संसारकी कुछ हानि नहीं होती, ( स ० प्र ० १० पृ ० १६८ ) इससे मांसवाले वचनोंको मांस खाने वालोंकेलिए मान लिया जावे; तब प्रक्षिप्तताका अङ्गा ग्रार्यसमाजको लगाना न पड़े; क्योंकि - संसार में जहां सात्विक हैं, वहां राजस- तामस भी व्यक्ति हैं । व्यवस्था सब के लिए रखनी पड़ती है । पृ ० १७७ ‘ पौराणिक - ग्रन्थोंमें मांसविधान ' दिखलाते हुए प्रतिपक्षीने ' अजामन्नाद्यकामः, तैत्तिरं ब्रह्मवर्चसकामः ' यह प्राश्व-CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नोर क्षीरविवेक ' पर विवेचन २२७ लायन गृ ० का प्रमारण दिया है । प्रथम संस्कारविधिमें स्वा ० द ० जीने भी इसे लिखा था । उस समय क्या स्वा ० द ० जीको वेदका ज्ञान नहीं था; यदि नहीं था; तो उन्हीं दिनों उनसे प्रचालित आर्यसमाज भी वेदके ज्ञानसे रहित सिद्ध हुआ । स्वा ० द ० जीने यदि मांस की ऐकदेशिकता दिखाई है, तब प्रतिपक्षी प्राक्षेपके समय यह बात क्यों भूल जाता है कि यहाँ भी ऐकदेशिकता है । सृष्टिके त्रिगुणात्मक होनेसे इस संसार में पुरुष भी सात्त्विक, राजसिक, तामसिक तीनों प्रकार के हो सकते है । सात्त्विकों में भी तामसिकता हो सकती है । उनमें भांसभक्षी भी हो सकते हैं । तब वे लोग सर्वसाधारण मांसका प्रयोग न करने लग जाएँ; उनकी विशेष व्यवस्था बना दी गई है । और फिर इनके वैद्यक-शास्त्रोंमें प्रसिद्ध अर्थ भी हुआ करते हैं; तब जो माँसके प्रेमी नहीं; वे सात्त्विक प्रोषधिविशेषोंका प्रयोग कर सकते हैं । पृ ० १७८ ग्रागे जो गोभिलके प्रमाण तथा उसपर सामश्रमी-जीका भाष्य वादीने दिया है, सो सामश्रमीजीको तो आप लोग प्रामाणिक वैदिक विद्वान् मानते हैं; तब फिर उन्हीं को प्रकारान्तर से अनभिज्ञ क्यों बता रहे हैं? वस्तुतः वेदादिशास्त्रोंके अनुसार गाय ' अघ्न्या ' होती है; तब ' गो ' शब्दसे, यदि मारना अर्थ है, तो उसका ग्रहण न होकर अन्य कृष्ण - पशुका- क्योंकि - ' गो ' शब्द सामान्यपशुवाचक भी होता है - ग्रहण हो जायगा । मूलसूत्रमें ‘ मांस ' शब्द नहीं है, श्रीसामश्रमीजीने मालूम नहीं - ' मांस ' शब्द वहां कैसे प्रक्षिप्त किया? ‘ यज् ' धातुका अर्थ ' देवपूजा ' होता है । इस का अर्थ यह होगा कि - कृष्ण गौसे देवपूजा करें । जैसेकि सिद्धान्त-कौमुदीमें ' यजेः कर्मणः करणसंज्ञा, सम्प्रदानस्य च कर्मसंज्ञा ' । इसका उदाहरण वहाँ है- ' पशुना रुद्र यजते ' इसका अर्थ किया गया है कि- ' पशु रुद्राय प्रयच्छति ' । यहाँपर भी वही देवोद्देश्यक Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 476

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श्रीसनात धर्मालोक ( ७ ) १८ दान समझना चाहिये, क्योंकि - ' यज् ' धातु का अर्थ ' देवपूजा, सङ्गतिकरण, दानेषु ' दान भी आया है । जैसेकि - ब्रह्मचारीका भूतोंको मानसिक दान आया है ( पारस्करगृ ० २।२।२० ) यहाँ ' ब्रह्मचारी को काट - काटकर उसे बाँटा नहीं जाता । तब वादी जबर्दस्ती गायको क्यों मारता है? ' पायसेन वा ' यह उत्तरपक्ष है ॥ वादीके मान्य श्रीसामश्रमीजीने ' अधमः कल्पः ' यह अर्थ ठीक नहीं किया? पृ ० १७६ ‘ घेन्वनडुहोर्भक्ष्यम्, मेध्यमानडुहमिति वाजसनेयकम् ' ं इस वादीसे उपक्षिप्त विषयमें ' आलोक ' ( ६ ) पृ ० ३८४-८५. में देखो । पृ ० १८० अनुस्तरणीमें काली बकरीका उत्तरपक्ष रखा गया है । गायके ‘ अघ्न्या ' होनेसे उसका ग्रहरण न होकर वहाँ ' गो ' शब्द पशुसामान्यवाचक समझना चाहिये । ' अनुस्तरणी गायका ' दान ही उत्तरपक्ष है । इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पृ ० ४१७ देखो । १८१-१८२-१८३ बृहदारण्यकके मांसके विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पृ ० ३२०-३३० में देखिये । स्वा ० द ० जीने प्र ० संस्का ० वि ० में ‘ वह मांसयुक्त भातको पकाके खायं तो वैसे पुत्र होनेका सम्भव है ' ( पृ ० ११ ) जब यह लिखा था; तब वह वेदविरुद्ध वाक्य था, वा नहीं? जो उत्तर प्रतिपक्षीका होगा, वही यहां भी समझ ले | -शेष जो वादीने इस विषय में श्रीशाङ्करभाष्यपर आक्षेप किया है, उसके विषय में वह इसो पुष्प के पृ ० ६६ से १०३ पृ ० तक देखें । यदि वादी श्रीश्रानन्दगिरिकी टीका ही मानना पसन्द करता है, तो वह ' देशविशेषापेक्षया कालविशेषापेक्षया वा मांसनियमः ' यह लिखकर वैसे देश - काल आदिका कारण बताया गया है । वस्तुतः यहाँ भी शास्त्रानुसार बैलके अघ्न्य होनेसे उक्षा एवं ऋषभक नामक ओषधियों का मांस लिया जावेगा । उनका नाम भी वैलके नामसे CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन होता है । इस विषय में हम इसी पुष्प में ( पृ ० १०१-१०२ कर चुके हैं । ) स्पष्टता ' महार मांसका वर्णन वेदादिमें अवश्य है; क्योंकि प्रकृति के लेखांक होनेसे प्राकृतिक संसार में भी त्रिगुणात्मकता त्रिगुणात्मक चोरी त्रिगुणात्मकतामें भो परस्पर अवश्य होती है । उस कि-में भी रजोगुण- तमोगुरगका गुरण सङ्कर हुआ करता है । सात्वि से छि अंश हो सकता है, तामसमें का अंश हो सकता हैं । भगवद्गीता में कहा सत्त्वगुण उ वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं है - ' न तदस्ति पृथिव्यां कि-त्रिभिर्गुणः ' ( १८।४० ) ' रजस्तमश्चाभिभूय प्रकृतिजैर्मुक्त यदेभिः स्यात् अब ग रजः सत्त्वं तमव तमः सत्त्वं सत्त्वं भवति भारत! की घर ही ' मांस मुपसिच्य उपहरति रजस्तथा ' ( १४ १० ) इसी लिए और णामि ते ' ( अ ० १८०४ | ४२ ) ' ( श्र ० १६ ६ + ४७ ) ( यन्मांसं निपृ- यह क प्रमारणोंसे पुराण में वर्णित इत्यादि वेद में भी आता है । इन घामा गाय - बैलके वेदानुसार मांसको वेदानुकूलता ही होती है, पर प्रत्युत्त अघ्न्या - अघ्न्य कहे जानेसे जहां पुराण आदिमें, बल्कि मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदमें भी जहां गोवधका त्रिपाठ आभास हो, वहां उसे परोक्षवाचक समझ कर वहां ' गो ' का अर्थ ' पशुसामान्य ' वा प्रोषधि आदि समझना चाहिये! न्यूनम यही हमारा पक्ष सदासे रहा है । कहीं यदि हमने वेदादिसे विचा पुराणके उस श्रंशकी समता बताई भी है, वहाँ हमारा यह करत पक्ष वा अभिप्राय नहीं है कि - प्रमुक स्थलमें गोवध शास्त्रीय ( पृ ० है, किन्तु वहाँ हमारा अभिप्राय यह रहा है कि - प्रतिपक्षी वेद में दयान ऐसे अंशका जो भयं करेंगे, वही पुराणादिमें भी हो जायगा । तभी दी ० तो श्रीपथिकने १८५ पृष्ठमें ' सिद्धान्त ' के मेरे लेखका १०।३६ भक्षर असे जो उद्धरण दिया है, उसीके श्रागे मैंने लिखा था कि- भक्षर ' अथर्व ε ॥ ७,६।६ ( ४ ) । ७ ) यह मन्त्र मूल है । श्राप जो प्रर्थ होता इस मन्त्रमें कर डालें, वही शतपथमें भी कर लें ।: महोक्ष ' तथा में कि Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 477

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९ २० श्रीसनातनघर्मालोक ( ७ ) T ' महाज ' का भिन्न अर्थ भी हो सकता है । ( पृ ० २८६ ) इस मेरे लेखांशको कुशवाहाजीने ' भद्र- तस्कर ' बनकर चुरा लिया और चोरी करके भी दोष मुझ ही पर डाल दिया । यह सोचा हो 5 कि— कौन पुराने लेखोंको देखता है, अतः उस लेखको जनदृष्टि 7 से छिपा लिया । उक्त अभिप्रायको न समझकर ' मेरे प्रक्षेपका परिणाम है कि - दीनानाथशास्त्रीकी बुद्धि ठीक हो गई और वे वेदशास्त्रोंमें अब गोमांसभक्षरण नहीं मानते ' ( पृ ० १८४ ) ' आपके इस प्रमाण की धज्जी मैंने उड़ाई थी, तब आपके होश ठिकाने आ गये थे, और अब आप ' आलोक ' में सही मार्ग पर आगये ' ( पृ ० १८५ ) . यह कथन गालिप्रिय एवं असभ्यताप्रिय कुशवाहाकी श्रात्मश्ला-घामात्र है । हमारे पक्षकी आलोचनामें कुशवाहाने युक्तियुक्त प्रत्युत्तर न दिखाकर केवल अशिष्टता ही दिखलाई, जिसपर श्री-त्रिपाठीजीने भी कुशवाहापर खेद प्रकाश किया था । स्वयं तो कुशवाहाज़ी का ज्ञान संस्कृतज्ञानकी भाँति अत्यन्त न्यूनमात्रा में है, प्रायः अपने आर्यसमाजियों वा उनके अधकचरे विचार वाले दूसरे लोगोंके साध्य मतका संग्रहमात्र कर दिया करता है । यह हमारा दिमाग क्या ठीक करेगा? जो कि उसने ( पृ ० १८४ पं ० २० में ) मुझ पर यह कलंक लगाया है कि- ' म ० दयानन्दजीके भाष्य तथा मेरे आक्षेपका परिणाम है कि पं ० दी ० शा ० की बुद्धि ठीक हो गई, और वे वेदशास्त्रों में गोमांस-भक्षरण ( अब ) नहीं मानते, इससे पूर्व वे वेदोंमें गोमांस भक्षरण ' मानते थे । ' अब पाठक इस प्रसत्यभाषी के असत्यका पर्दाफाश होता देखें । इसी तरहका प्रक्षेप श्रीधर्मदेवजीने भी अपने ' स्त्रियों का वेदाध्ययन ' के प्रारम्भिक - शब्द ( ' ज ' पृ ० ) तथा ' सार्वदेशिक ' में किया था । इन लोगोंका यह अध्यवसाय c केवल . D. Ankur इसीलिए Joshi Collection ' नीरक्षीर विवेक ' पर विवेचन ६२१ होता है कि - हम ( प्रतिपक्षी ) इन ( दी ० श ० शा ० ) के लेखों का विद्वानोंकी दृष्टिमें ठीक प्रत्युत्तर नहीं दे सकते, तो इन्हें लोक-दृष्टिमें तो गिरा दें । ' इस प्रकारके गन्दे तरीकोंमें इनकी प्रवृत्ति देखी गई है | मैंने सिद्धान्त ' ( ८/४४ ) में श्री व ० दे ० जीके उत्तर में लिखा या कि --- ' आगे आप जनताको भ्रममें डालनेके लिए मेरे चतुर्थ लेखमें ' गोवध ' लिखना लिखते हैं, पर यह नितान्त हो असत्य है । वेदादिमें गायको ' अघ्न्या ' कहा है । अतएव श्रालम्भमें ग्राये हुए ' गो ' शब्दका अर्थ ' पशु ' है, ' गाय ' नहीं । यह लिखकर आप ( घ ० दे ० ) की बातका खण्डन कर दिया गया है ' ( पृ ० ३४ ९ ) इस पर फिर श्री घ ० दे ० जी चुप्पी लगा गये, कुछ नहीं लिखा । यह मेरा लेख ' सिद्धान्त ' में माघ शुक्ला १५ सं ० २००४ ( जन ० १ ९ ४८ ) में छपा था । कुशवाहाजीने मेरे लेख ' वेद प्रोर गणेश ' ( पौ ० शु ० ८ सं ० २००६ ) की समीक्षा अपने लिखे अनुसार भाद्र-पद सं ० २००७ में की । अब कुशवाहाजी बतावें कि - मेरे व ० दे ० जी के उक्त लेखके उत्तरमें छपे हुए लेखमें सं ० २००४ में गौ की अवध्यता जो मैंने लिखी थी, वह क्या उसके ढाई साल बाद गर्भ में ग्राकर छपे हुए कुशवाहाके लेखते मैंने ली कि जिसने कुश-वाहाके शब्दों में ' मेरे • होश ठिकाने ' कर दिये? कुशवाहाज़ी असगति अलंकारके आचार्य किस युनिवर्सिटीसे हुए थे? इतना असत्यवाद!!! बल्कि - श्री ध ० दे ० जीके आक्षेपसे भी पहले मैंने उसो आक्षिप्त लेखमें लिखा था ' गो ' शब्द पशुसामान्यवाची है ' ( सिद्धांत ७।३६ पृ ० २८४ पौष शुक्ला १ सं ० २००३ ) तब में गोवध कैसे लिख सकता था? उसी लेख में मैंने पृष्ठ २८५ में लिखा था कि-स ० ६० ५६ Sujarat. An eGangotri Initiative

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६२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ' यदि आप ( घ ० दे ० ) ' मांस ' का अर्थ बदल दें, तब तो इसी प्रकार गृह्यसूत्रादि में भी उनके अर्थ बदल सकते हैं । आप प्रायुर्वेद के निघण्टु प्रोंको खोल बैठिये, आपको पशु - पक्षी आदिके श्रौषधिपरक अर्थ मिल जायेंगे; अथवा आप सामश्रमी वाला तथा ठा ० उदय-नारायणसिंह वाला अपना मान्य गोभिलगृसू ० ( प्र ० सं ० ) उठा लें, वहाँ आपको भूमिकामें पशुसंज्ञपन तथा मांसविषयक समा-धान प्राप्त हो जायगा । अथवा माँसके स्थान पर हमारे मतमें ' प्रजापतिस्मृति ' की ' मतोमाषान्नमेवंतद् मांसार्थे ब्रह्मरणा कृतम् । पितरस्तेन तृप्यन्ति श्राद्धं कुर्याद् न तद् ( माषं ) विना ' ( १ ९ ५२ ) इस व्यवस्था के अनुसार माष ( उड़द ) का प्रयोग हो जाएगा । ' अब कुशवाहाजी बतायें कि - सं. २००३ में उनके सं. २००७ के चार सालके पीछेके छपे हुए लेखसे क्या मेरे ' होश ठिकाने ' आ गये, और बुद्धि ठीक हो गई?; और ' आलोक ' में मैं ' सही मार्ग ' पर श्रा गया? ऊपरके कहे पूर्वके विचार आजकलके मेरे विचारोंसे विपरीत कैसे थे? इन मेरे लिखे प्रमारणोंके रहते क्या पथिककी शक्ति है कि वह ' मेरा गोवध सिद्धान्त हैं ' यह सिद्ध कर सके? जो शब्द उस समय मैंने लिखे थे, वे अब ' आलोक ' ( ६ ) पृ ० ४१६-४३६ में लिखे हैं, अब वादी मुझे ' सही मार्ग में ' बताता है । सो आशा है - अब कुशवाहाजीके ही होश - हवास ठीक हो गये, और उसकी ' बुद्धि ठीक ' होकर ' सही मार्ग ' पर आ गई है । ' प्राचीन भारतमें क्या गोवघ था ' इस आलोक ' ( ६ ) की मेरी ३११ पृ ० शुरू करके ४७१ पृ ० तक की २६० पृ ० की निबन्धमालामें न तो कुशवाहाजीके अनुसार कुछ स्वा ० द ० जीके भाष्यसे मैंने सहायता ली, न कुशवाहाजीके किये वेदभाष्य (? ) से । यह लेखमाला मैंने ' सरिता ' में लिखे हुए ' गोवध सम्बन्धी बंसलके लेखके प्रत्युत्तर में लिखी थी, उस समय आर्यसमाजी CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन २३ ६२४ बगलें झांक रहे थे, केवल विरोध करके तथा ' सरिता ' के सब के बन्द करनेके ही तरीके अपना रहे थे । उन दिनों मैंनें प्रचार यह किन्तु. ध लेखमाला दैनिक ‘ सन्मार्ग ’ काशीके १५ अङ्कोंमें प्रकाशित कराई उक्त है । पर थी । इसे बहुतोंने ं पसन्द किया था । वही कुछ संक्षेपमें हमने का क्या ' आलोक ' के छठे पुष्पमें दी । ' महोक्षं वा महाजं वा । जाय मुख्य अर्थंमें जो मैंने शतपथ तथा याज्ञवल्क्यस्मृतिकी एकवाक्यता पचेत् ' के ' नीरक्षी और ‘ पच् ' घातुका अर्थं तथा शतपथके अन्य वचनका सामञ्जस्य महाकोष किया, उसमें मेरी अपनी ही गवेषणा है । न स्वा ० द ० जीसे मैंने... उसे उधार लिया, न कुशवाहा जोसे, न किसी अन्य आर्यसमाजी व्यवहार से । तब ‘ महोक्षं वा महाजं वा ' का पं ० दी ० श ० ने वही अर्थ समझते किया है, जो आर्यसमाजी - विद्वान् करते हैं । ( पृ ० १८६ ) ऐसा उसके ल कहना पथिकका प्रत्यक्षका अपलाप करना है । आशा है - अब थके भी उस हुए ' पथिक ' जीके अपने ' होश हवास ' कुछ देर आराम करके: यह अपने शब्दोंमें ठीक हो गये होंगे । पाठकोंने पथिककी यह प्रशिष्ट- ' है तथा ता देख वा समझ ली । ब्राह्मण जोकि उसका यह कथन है कि आप प्रयंसमाजियों जैसे अर्थ- तस्य स करने लग गये । पौराणिक ग्रथं छोड़ दिये ' इस पर उत्तर यह सेवार्थ है कि यह ठीक नहीं । महाभारतने लिखा है --- ' अघ्न्या इति गवां बनधमंद नाम के एता हन्तुमर्हति । महच्चकाराकुशलं वृषं गां वालभेत्तु समय न य:, ( शान्तिपर्व २६२।४७ ) ' श्रोषधीभिस्तथा ब्रह्मन्! यजेरंस्ते न के माय तादृशाः ' ( शान्ति ० २६३/३३ ) पुराण में लिखा है ' अहिंसेव कि महि परो घर्मस्तत्र वेदेस्ति कीर्तितः । साक्षात् पशुवधो यज्ञे नहि जो वेदस्य सम्मत: ' ( स्कन्द पुराण वैष्णव खंड वासुदेव माहात्म्य प्रभारणो ६।४११४ ) ' तस्माद् व्रीहिभिरेवासौ यज्ञः क्षीरेण सर्पिषा । पक्षी मेध्यै रन्नरसैश्वाऽन्यैः कार्यो न पशुहिंसया ' ( २६२८ ) सनातनस्य भी उठ घर्मंस्य रूपमेतदुदीरितम् ' ’ ( ३१ ) श्रीमद्भागवतमें पशुयज्ञविरोघः अनुसरण Gujarat. An eGangotri Initiative कुछ थो

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६२४ श्रोसनातनघर्मालोक ( ७ ) यह सब बातें क्या पुराणोंने आर्यसमाजियोंसे ली हैं? कभी नहीं, वार किन्तु श्रार्यसमाजियोंने भी पुराणोंसे लेकर पौराणिकता अपनाई उक्त है । पर इस अल्पश्रुत कट्टर प्रार्यसमाजी ' पथिक ' को इन बातों का क्या पता, थोड़ी सी स्वा ० द ० वा ग्रा ० स ० की आलोचना की जाय, तो अभद्र गालियों पर उतर आता है, यही है - उसका ' नीरक्षीर विवेक ' इसका उपनाम रखना चाहिये ' गालिप्रदान-ता - महाकोष ' । इसमें उसने श्री पं ० माधवाचार्यजीके साथ प्रशिष्ट-स्य व्यवहारको सीमातीतता कर दी है । हम डा ० श्रीरामको तो ऐसा समझते थे, पर अब उससे ' पथिक ' की साँठ - गाँठ हो गई, ब उसके लेखको भी चुराने लगा हैं, और उसका अशिष्ट - व्यवहार भी उसने अपना लिया है । यद्यपि ऐसे शिष्टोंके साथ उलझना अपना अपमान कराना है तथापि ' अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः । ' ' संमानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव | अमृतस्यैव चाकार्ड क्षेद् अत्रमा-.. तस्य सर्वदा ' ( मनु ० २।१६२ ): इत्यादिके अनुसार स ० ध ० की सेवार्थ हम गालीप्रदानको भी सिर पर लेते हुए यथाशक्ति सना-तनधर्मकी सेवा में लगे रहना चाहते हैं । पाठनादिमें व्यस्ततावश समय न्यून मात्रा में मिलने पर भी हम यथाशक्ति प्रतिपक्षियों मायाजाल एवं सत्यपक्ष के निराकरण में लगे हुए हैं । जैसे कि महिदास एवं कवष - ऐलूष प्रादिके विषय में हमसे लिखे लेखपर जो पथिकने साध्य प्रमाणोंका संग्रहमात्र कर दिया था, हमने प प्रमाणोंपपत्ति सहित उसके लेखों को ऐसी धज्जियाँ उड़ाई, उसके पक्षकी रीढ़की हड्डी इस प्रकार तोड़ी कि - उसमें वह अभी तक J भी उठ नहीं सका है । पर अब यह गालिप्रदानमें स ० प्र ० का अनुसरण करके अपना पूरा आर्यसमाजीपन प्रकट करने लगा है । कुछ थोड़ी सी स्वा ० द ० जी पर यदि आलोचना दी जाती है, तो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. नीरक्षीरविवेक ' पर विवेच ६२५ चिढ़कर प्राचीन सब ऋषि - मुनियोंको गाली देने पर उतर आता है - यह स्पष्ट उसके पक्षकी दुर्बलताके तथा दयानन्दी एवं दयान-न्दपन्थी होनेके साक्षात् प्रमारण हैं । फलत. ' ग्रालोक ' ( ६ ) के गोवधके समाधानमें हमारा अपना ही अन्वेषण है, ग्रायंसमाजसे हमने उसे उधार नहीं लिया । पृ ० १ ९१-१६२ ‘ गरिणकागर्भसम्भूतः, जातो व्यासस्तु कैवर्त्याः, श्वपाकीगर्भसम्भूतः, ग्रादिका उत्तर हम पोछे ( पृ ० ८६६ पं ० १ ९ -- १- में ) दे चुके हैं । सत्यवती धीवरवंशकी नहीं थी । वह तो उपरिचर - वसुकी कन्या थी । इस प्रकार असत्-प्रसिद्धियो से नहीं, किन्तु इतिहाससे वादीको दिखलाना चाहिये कि यह लड़की अमुक श्वपाक वा अमुक कैवर्तकी थी । तब गौड़ोंको कहारवंशका कहना श्रीमाधव जीको अचारज कहना, माँ का पति कहना, सारस्वतोंको नियोगज कहना इत्यादि बातें वादीके दिम गके बिगड़ने के पूर्वरूप प्रतीत हो रही हैं । पृ ० १६३ स्वा ० शंकराचार्य के वर्णं विषय में, सारस्वतक नियोगजत्व के प्राक्षेप में तथा स्वा ० द ० जी के विषयमें हम अपने सम्पादकत्वमें निकलने वाले ' सिद्धान्त ( १५२-३-४ ) में लिख चुके हैं । यदि श्रीमाधवाचार्य जी स्वा ० द ० का कापड़ीपन में नाचना दिखलाते हैं, तो वादी नाचने को वैदिक सिद्ध करनेकी चेष्टा करता है । यदि वे स्वामीका भाँग पीनेका व्यसन दिखलाते हैं, तो वादी भांग पोना लाभदायक सिद्ध करने के G लिए उतारु हो जाता है । जब सब बातें वादी श्रीमाघ ० जीकी मानता चला जा रहा है, ब्रह्मणों को शूद्र तथा कापड़ियों को सारस्वतों से भी श्रेष्ठ बनाता जा रहा है, तो अब स्वामी को कापड़ी भी मानकर उसको तोड़ - मरोड़ करके वेदादिशास्त्रों से सिद्ध करें । फिर झगड़ा क्या? और गालियाँ क्या? An eGangotri Initiative

पृष्ठ 480

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२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पृ ० २०४ ' ब्रह्मा जी से असुरोंका सम्भोग । इस विषय में पृ ०३० ९ - ३११ में देखें । यहाँ सम्भोग कहां लिखा है- यह प्रति-पक्षीने नहीं दिखलाया, और न ही १०० वर्ष तक भी कभी दिखला सकता है । पृ ०२०५ ' श्रीकृष्ण का अर्जुन से संभोग ' वह वादीका कहना गलत है । वहां तो ' जुनी ' लिखा है । स्वा ० द ० यदि इस जन्म में वादीकी स्त्री बनकर आये हों; तो वादी क्या अपना स्वामीसे संभोग मान लेगा? फिर वहाँ ' रेमे ' यह रम्... धातु का प्रयोग है, जिसका पाणिनीय - धातुपाठ ' क्रीड़ा ' अथ होता है । तभी वहाँ ' क्रीडासरोवर, क्रीड़ावन ' लिखा है, और ' क्रीडाश्रान्ता ' लिखा है, ' मैथुन - सरोवर ' आदि नहीं लिखा । दिलीप का रघुवंशमें ' तदाननं मृत्सुरभि क्षितीश्वरो रहस्यु पाघ्राय न तृप्तिमाययो ' ( ३३ ) ( रहः ) एकान्त में सुदक्षिरणाका मुख सूंघना कहा है, वहांपर ' रहः शब्द देखकर भी ' मैथुन ' नहीं समझा जाता; किन्तु जैसे यहाँ क्रीडा- विनोद है, वैसे वादीसे दिये हुए प्रमारगमें भी ' रहः ' शब्द देखकर घबड़ाने की बात नहीं । वहाँ लिखा है- ' रहो रेमे महायोगेश्वशे विभुः ' । सो योगेश्वरके रमण के विषयमें प्रतिपक्षीके मित्र ' पुराणोंके कृष्ण ' के लेखक – जिसे वादी अखण्डित पुस्तक समझता है - ने लिखा है-. ' जहाँ रमरण योगी अथवा भक्तवा ईश्वरके सम्बन्धके अर्थ में होता है, वहाँ भक्त वा योगीका ईश्वरके ध्यानमें मग्न होनेके अर्थ में आता है ' ( पृ ०१४ ) तब अपने मित्रके वचनसे ही प्रतिपक्षीका यहाँ का अभिप्राय खण्डित हो गया । इस विषय में इसी पुष्पके ३०६–३०९ पृष्ठ में देखें । पृ ० २०६ ' दण्डकारण्यके महर्षियोंका रामके साथ मैथुन :. CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नोरक्षोरविवेक ' पर विवेचन ६२७ ६२८ ' भी प्रतिपक्षीका कथ । गलत है । इस विषय में ' आलोक प्र ०६१६ - ६२१ में देखें । ( ६ ) २ विषय म पृ ०२०७ ‘ श्रीकृष्णका नारदको नारदो बनाकर सम्भोग ' यहाँ पर वादीके दिये पद्यमें प्रभु को ' योषिन्मय ' स्त्रीरूप लिखा पृ है; तो स्त्रीका स्त्रीके साथ रमण क्या वादीके मतमें मैथुन लिखत होगा? इस विषय में इसी पुष्पके ३०६ – ३०६ पृष्ठ देखें I पुरारण कर दि पृ ० २०७–२०८ ' नारद ऋषिके साथ राजा तालध्वजका संभोग । यह भी प्रतिपंक्षीका गलत कथन है । वहाँ नारदी व्यर्थ हो लिखा है, नारद नहीं । क्या वादी संभोगसे पुरुषको भी गर्भ बनानेव मानता है? वहाँ तो स्त्रीको गर्भ लिखा है । वादीकी स्त्री भी इससे पूर्वजन्ममें उसकी बहिन रही हो, तो दूसरे जन्म में क्या उसे और उ भगिनी - गमन करने वाला कहा जा सकेगा? वस्तुतः वादी है । अ श्रीमाध ० जीके कथनमें निरुत्तर होकर अनाप - शनाप लिखकर की तो श्री माघ जीसे कही हुई बातको प्रमाणित कर रहा है ।. किनक पृ ०२०६ ' पौराणिक नाँ व्यभिचारदोषो- ' यह कथन किसी पुष्प में ऋषि मुनिका नहीं । यह किसी पौराणिकोंसे चिढ़े हुए लिखा है । इस जैसा श्लोक ' दयादिनन्दो व्यभिचारजातः ' यह दिखल ' शास्त्रार्थ पञ्चक ' में मिलता है । तब वादी क्याउसे मान लेगा? स्पष्ट पृ ० १०३ में वादी पं ० कालूरामजीके लिए लिखता है— था, अ ' इसी गौड ब्राह्मणकी वर्णसंकरता के कारण ये भो दयानन्दजी अनुवा को कापड़ी और अपशब्दोंका व्यवहार करते थे ' तब जोकि वादी स्वा ० द ० जीने स ० प्र ० में अपशब्दों का सनातनधर्मियों के लिए परदे तथा वादीने अपने इस पुस्तकमें प्रयोग किया, तब क्या वादी- में देख के शब्दों में स्वामी जी तथा स्वयं वे वर्णसंकर थे वा हैं? कदाि यदि ऐसा हो तो प्रौदीच्य ब्राह्मणको सचमुच वादीने कापड़ी बना दिया है, जिसका हमें भी खेद है । नियोगप Gujarat. An eGangotri Initiative