सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 461–470
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 461–470
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दद श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) थी । उसे वायुने एक रूपमें किया । अतः उसके पति भी १० रूपों की एक समष्टि थी, तभी वहां उन्हें ' एकनाम्नः प्रचेतसः ' कहा गया है । इसीलिए एक जन्ममें उसके १० जन्मोंके समान व्यव-हार प्राप्त हुआ । जैसे द्रौपदी प्रयोनिजा ( अग्निसे उत्पन्न ) थी, वैसे मारिषा भी प्रयोनिजा ( वृक्षोंसे उत्पन्न ) थी । अयोनिज-उत्पत्ति में योनिज वाली व्यवस्था अनिवार्य नहीं होती और वे जो १० थे, वस्तुतः गरणदेवता प्रचेता नाम वाले सरूप थे । इसीको श्रादी से दिए हुए ' तथैव मुनिजा वार्शी तपोभिर्भावितात्मनः । संगता-भूद् दश भ्रातृन् एकनाम्नः प्रचेतसः ' ( १।१ ९ ६ । १५ ) इस महाभारत के पद्यमें सूचित किया गया है । सो विष्णुपुराणकी मारिषा तथां महाभारतकी वार्शी ( वृक्षों की सन्तान ) एक ही व्यक्ति थी, भिन्न - भिन्न व्यक्ति नहीं । यदि वादी इस योनिज उत्पत्तिको नहीं मानता, तब वह उक्त इति-हास भी नहीं दे सकता, क्योंकि तब यह उसका उद्धरण श्रभित्तिचित्र होगा । फिर तो न कोई वार्थी मारिषा ही हुई, न उसके दस पति ही हुए । यदि वादी पुराणपर प्राक्षेप करता है, तो पुराणके पूर्वापरको भी उसे मानना ही होगा । अयोनिज उत्पत्ति वैशेषिक दर्शनमें प्रसिद्ध है । अयोनिज सन्तति में योनिजों वाली व्यंव-स्था भी नहीं होती । स्वा ० द ० जी ने सृष्टिकी श्रादिमें अयोनिज-युगलकी उत्पत्ति मानी है । वे परस्पर भाई - बहन होते हुए भी उनका परस्पर- विवाह इस बातका ज्ञापक है कि -- प्रयोनिज तथा योनिज सन्तानोंकी व्यवस्था एक नहीं हो सकती । तब अयोनिज वार्शी ( दस वृक्षोंसे उत्पन्न दसरूपों वाली मारिषा ) का १० पतियों से योग भी इसी सूत्र का उदाहरण है । उसपर आक्षेप - प्रज्ञान प्रदर्शन है । इसमें न तो वादीसे, संगत विधवा-वादीका की गन्ध है, और न ही नियोग के ११ पतियों की सिद्धि विवाह * CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८८ है है । तब वादीकी एक ग्रार्यसमाजिन विधवा स्त्रीको नियोग से देना यह श्रार्यसमाज का ही ' भूषण ' है । यह ११ पति जी की अपनी कपोल कल्पना सिद्ध हुई । पुराणोंमे स्वा ० द ० न हो सकनेसे वादी ' पथिक ' के प्रयास पर पानी उसकी सिद्धि पुराणोंको कलंकित करनेके लिए फिर गया । प्रत्येक समझदार व्यक्ति वादीसे घृणा करेगा उसका । यह पूर्वापर ' नीरक्षीरविवेक छिपानेसे है, या ' जोंक का रुधिर पान ' यह वादी स्वयं ही समझ सकेगा ' " यह १० पति किसी वाजारू स्त्रीके नहीं थे, वरन् मुनिकी । पुत्रीके थे " यह पथिकके ' वार्शी के दशपति ' की टिप्परगी में शब्द हैं; पर उसे कदाचित् यह पता न हो, वा हो तो जनताकी श्राँखों में धूलि झोंकता हो, उसे पता होना चाहिए कि यह वाक्षी { मारिषा ) श्रप्सराकी लड़की थी । रूपके मोहमें पड़े मुनिकी काम-वासना द्वारा अप्सरामें निषिक्त हुई थी । और उस अप्सराके पसीनेके ग्रहणसे १० वृक्षों से प्रयोनिज उत्पन्न हुई थी । महा-भारत की वार्शी तथा विष्णुपुराण की मारिषा भिन्न - भिन्न व्यक्ति नहीं - यह वादीको ध्यानमें रख लेना चाहिये । इसी अज्ञानके . कारण उसने ' मारिषाके दस पति, वार्शी के दस पति ' यह भिन्न-भिन्न शीर्षक दिये हैं । वार्क्षी पर बाजारू औरतका व्यङग्य कस कर वादीने नियोगसे ११ पति करने वाली ग्रार्यसमाजिन - स्त्री को भी ढंग से बाजारू औरत ( वेश्या ) का द्वितीय- संस्करण सिद्ध कर दिया है, बधाई हो । पृ ० ७४ में '२१ पति का विधान ' - ' एकविंशतिभिर्तारः काले-काले मृतारतदा ' ( पद्मपु ० भूमि ० ८५।७१ ) दिव्यादेवी के २१ पति समय - समय पर मृत्युको प्राप्त हुए । ' वेदसंज्ञादिमर्श ' ( पृ ० ५३ ) में भी यही पद्य मन्त्री - आर्यसमाजने दिया है । स ० [ ०५: Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) यहाँ पर वादीने गुरुपरम्परासे आई हुई प्रकृतिवश पूर्वापर छिपा दिया है । पूर्णं विवाह होने पर पूर्ण पतित्व होता हैं, पर दिव्यादेवी का एक भी विवाह पूर्ण न हुआ । बात यह है कि दिव्या पूर्व जन्ममें चित्रा थी । वह स्वैरिणी ( कुलटा ) हो गई थी ( ८६।४-५ ) उसने दूती - कर्म करके स्त्रियोंको इधर - उधर वरगला कर १०० घर नष्ट किये ( १०-१४ ) उसीके फलस्वरूप विवाहका समय प्राप्त हो जाने पर उसका भावी पति मर जाता था- विवाहसमये प्राप्ते दैवं च पक्वतां गतम् । प्राप्त विवाहसमये भर्ता मृत्युं प्रयाति च ' ( ८६।१६ ) तस्या विवाहकाले तु संप्राप्ते समये नृप! मृतोऽसो चित्र-सेनस्तु ' ( ८५।५ - ६० ) । इससे स्पष्ट हो गया कि उसका विवाह पूर्ण सम्पन्न न होता था, अतः फिर उसका विवाह किया जाता था । यदि उसका विवाह पूरा हो जाता; तो वह विधवा हो जाती, उसका फिर विवाह न हो सकता । इसीलिए उसी पुराण में लिखा है-‘ अनृद्वाहितकन्याया उद्वाहः क्रियते बुधैः । न स्याद् रजस्वला यावद् अन्यः पतिविधीयते ' ( ८५/६५ ) इसीलिए अविवाहिता होने से पति के मरने पर विवाह का आदेश शास्त्रीय था; तभी ब्राह्मणों ने कहा कि- इसका विवाह कर दो ( ६७ ) ' यदा यदा महाभाग! दिव्यादेव्याश्च भूपतिः । भर्ता च म्रियते काले प्राप्ते लग्नस्यं सर्वदा ' ( ८५/७० ) इससे सिद्ध हो गया कि लग्न आने वाला होता था, और उसका भावी भर्ता मर जाता था । विवाहकी पूर्णता सप्तपदी तक हुआ करतो है । जैसेकि मनु जी ने लिखा है - ' पाणिग्रहणिका मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् । तेषां निष्ठा तु विज्ञेया विद्वभि: सप्तमे पदे ' ( ८२२७ ) । कइयोंके मतमें चतुर्थीकर्म में विवाहकी पूर्णता होती है । उससे पूर्वं पतिकी मृत्यु -में कन्याका विवाह हो सकता है । जैसे कि कहा है- ' नष्टे मृते CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नोरक्षीर विवेक ' पर विचार ८० प्रव्रजिते क्लीबे च पतितेऽपती । पञ्चस्वापत्सु ८६१ लि विधीयते ' नारीणाँ पतिरन्यो पर ( पराशर ४ | ३२ ) यहाँ पर ' पतौ का अर्थ है ' पो पति ' । सो सप्तपदीसे पूर्व ईषत्पतित्व होनेसे ईषत् -हो सकता है, वह विधवा विवाह उसकी मृत्युमें विवाह स नहीं कहा जा सकता । दि इस श्लोक में ' पती ' है वा ‘ अपती ' इस विषयमें कम पुष्पमें ( पृ ० ६४१-६८१ ) देखिये । अब पाठकोंने देख लिया कि वादी ग्रन्थों पूर्वापर छिपाकर अपने पक्षको सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं । जानकार लोगोंको ग्रन्थोंका पूर्वापर देखकर तब किसी सिद्धान्त -का निश्चय करना चाहिये । अब २१ पतिका विधान कहाँ हुआ? विघि तो इसको कहीं लिखी नहीं गई । इतिहाससे विधि नहीं बन जाती । उसी दिव्या के स्वयंवर में ही १०० वर आपसमें बिना विवाह मर गये ( ८५/७४ ) तो क्या उसके यह लड़कर, पति हो जाएंगे? १०० आगे वादीने ' कामिनी ' का निषादसे व्यभिचार दिखाया है, और उस व्यभिवारका नाम ' नियोग ' रखा है । यहीका यही ‘ वेदसंज्ञाविमर्श ' ( पृ ० ५३ - ५४ ) में कुशवाहाजीके कहनेसे लिखा गया है । इससे ‘ नियोग ' भी वादीके अनुसार व्यभिचार ही सिद्ध हुआ | इतिहासका प्राचरण प्रमाण नहीं होता, किन्तु विधिशास्त्र ही प्रमाण होता है । मारिषा ( वार्शी ) आदि का कहीं भी नियोग नहीं दिखलाया गया । यह हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं । दिव्या-देवीका एक भी पति नहीं हुआ, तब २१ खसमोंसे नियोग कहाँ? यह तो ' दशास्याँ पुत्रानाघेहि ' मन्त्र जिनके यहां नियोगियोंके लिए कहा जा रहा हो, वहाँ तो ११ ११ - १२१ अथवा ११ × १० = ११० नियोगी हो जाएंगे । यह वादीकी टोनसे ही हमने लिखा है । हम स्वयं ऐसा कभी लिखना ही नहीं चाहते । पृ ० ७५ में म ० म ० पं ० गिरिधरशर्माजी के ' वैदिकविज्ञान ' के Gujarat. An eGangotri Initiative
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८६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) लिखे अनुसार वादीने स्वा ० द ० जीके भाष्यकी प्रशंसा लिखी है, दन्यो पर जो म ० म ० जीने उसी पृष्ठकी २७ - २८-२६-३१ आदि पंक्तियोंमें ' किन्तु दुर्भाग्य से वैज्ञानिकों को सन्तोषीं वत्- सकता, ' इत्यादि वाक्यों द्वारा मधुरतासे स्वामिभाष्यके दोष चाह दिखाये हैं, पथिक उन्हें गुरुपरम्परावश छिपा गया है ॥ पृ ० ८३-८४ ‘ अक्षतयोनि - स्त्री और प्रक्षतवीर्य - पुरुषका पुन-विवाह होना चाहिये, किन्तु ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्णोंमें क्षत-योनि स्त्रो, क्षतवीर्य - पुरुषका पुनर्विवाह न होना चाहिये ' इस न्त- स्वा ० द ० जीके वाक्यपर वादी लिखता है - ' अक्षतयोनि विधवा-T? विवाहको स्वामीजी ब्राह्मणादि सभीके लिए मानते हैं परन्तु क्षत-वन योनि विधवाका विवाह केवल शूद्रोंके लिए मानते हैं । " कर, पर आर्यसमाजी लोग क्षतयोनि - विधवाओं का विवाह करते-कराते हैं, सो वे स्वामीजीके अनुसार शूद्र सिद्ध हुए । स्वा ० द ० जीके अनुसार कोई भी विवाहित स्त्री अक्षतयोनि नहीं होती, है, क्योंकि स्वामीजी विवाह वाले ही दिन विवाहके बाद दंपतोका मैथुन कराते हैं । देखिये – खा स ० प्र ० ( पृ ० ५६ समु ० ४ ) में स्वामी लिखते हैं - ' जिस दिन पद्ध कन्या रजस्वला होकर जब शुद्ध हो जिस दिन ऋतुदान देना स्त्रनोग योग्य समझें, उसी दिन सं ० वि ० के अनुसार सब कर्म करके या- मध्यरात्रि वा दश बजे सबके सामने पाणिग्रहणपूर्वक विवाहकी i? त्रिको पूरा करके एकान्त सेवन करे । ' आगे स्वामीने विवाहविधि नों के सद्यः बादही स्त्रीको वीर्याकर्षणविधि, नासिका के सामने. ex नासिका, स्त्री वीर्यप्राप्तिसमय अपानवायुको ऊपर खींचे, योनिको मने संकोच कर वीर्यंको ऊपर आकर्षण करना ' आदि को शिक्षा भी बड़े प्रमसे कर दी । - ' के सं ० वि ० के पृ ० १३४ में भो स्वा ० द ० जीने लिख दिया--CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८६३. ' जब कन्या रजस्वला होकर शुद्ध हो जाय, तव जिस दिन गर्भाधान की रात्रि निश्चित की हो, उस ( दिन ) में विवाह करने के लिए सब सामग्री जोड़ रखे । ' इम प्रकार जब स्वामीके अनुसार द्विज स्त्री विवाह वाले दिन ही क्षतयोनि हो जाती है, यदि वह विधवा होजाय, तब क्षतयोनि होनेसे ही उसका पुनर्विवाह स्वा ० द ० जीके अनुसार न हो सकेगा । तब वंसा करने - कराने वा प्रचार करने वाले वादी भी स्वामी के अनुसार शूद्र हुए । श्रब वादी बतावें कि पं ० माघ ० जी की बात ठीक निकली न? उस समय आर्यसमाजी श्री अखिलानन्दजीके ' वैधव्यविध्वं सूनचम्पू ' का प्रसारण देना वादीकी बड़ी समझ (? ) सिद्ध कर रहा है । ' सा चेदक्षतयोनिः स्यात् ' इस मनुपद्य पर भी हमने पूरा विचार किया हुआ है, उसे अग्रिम पुष्पोंमें लिखा जावेगा । पर स्वा ० द ० का श्रार्यसमाज इसका प्रयोग नहीं कर सकता, क्योंकि विवाह होते ही स्त्री उनके अनुसार क्षतयोनि हो जाती है । क्षत-योनिका पुनर्विवाह स्वामी द्विजों में मानते ही नहीं; इससे विधवा-विवाहकी वादीको चिल्लाहट उसीके ऋषि द्वारा समाप्त कर दी गई । उसके करने वाले ग्रार्य समाजी शूद्र सिद्ध हुए । जैसाकि -' कुमारयोः स्त्रीपुरुषयोरेकवारमेव विवाहः स्यात्, पुनरेवं नियो-गश्च । पुनर्विवाहस्तु खलु गूद्रवर्ण एव विधीयते, तस्य विद्या - व्यवहार रहितत्वात् ' ( ऋभाभू पृ ० २२२ ) । पृ ० ८६-६० ' सहस्राब्दे कलौ प्राप्ते कर्मभूम्यां च भारते । कण्वो नाम मुनिश्र ेष्ठः संप्राप्तः कश्यपात्मजः ' ( भविष्य ० प्रति ० ४।२१।५ ) सरस्वत्याज्ञया कण्वो मिश्र देशभुपाययो । म्लेच्छान् संस्कृतमाभाष्य तदा दशसहस्कान् ' ( १५ ) यहांपर वादीने कण्वमुनि द्वारा कलियुग के १००० वर्ष बीतने पर १० हजार म्लेच्छों को संस्कृत पढ़ाना लिखा है । इससे हमारे पक्ष Gujarat. An eGangotri Initiative
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८६४ श्रीसनात धर्मालोक ( ७ ) की क्या हानि है? ' उनकी शुद्धि की ' यह अर्थ यहाँ दीख नहीं रहा । वादी यहाँ ' म्लेच्छका ' मुसलमान ' अर्थ करता है । क्या वह यह ठीक मानता है? यदि हाँ, तो प्रष्टव्य है कि- मुसलमानों का हिजरी सन् आजकल १३८२ है और कलियुग आजकल ५०६३ है । इससे घटाने पर ३६८१ यह कलिसंख्या मुसलिम सम्प्रदाय के शुरु होने की बनती है । परन्तु पुराण के वचन में कलियुगकी १००० वर्ष संख्या में उक्त इतिहासका घटित होना लिखा है, जिसको हुए ४०६३ साल बीत चुके । उस समय कण्वमुनिके जमानेमें भला म्लेच्छ · मुसलमान कैसे हो सकते हैं, जिन्हें हुए केवल १३८२ साल बीते हैं । और वर्तमानका मिसुदेश भी इतना. पुराना कैसे हो सकता है? यहाँ ' मिस ' शब्द ' भी नहीं, किन्तु ' मिश्र ' है; अतः स्पष्ट है कि भारतका ही यह कोई देश है, जिसमें वैश्य, शूद्र, म्लेच्छ मिले - जुले रहते थे । इससे उस देश का नाम ' मिश्र ' पड़ा । क्योंकि - ' भारते कण्वः संप्राप्तः ' लिखा है । फिर कण्वका भारतके ही एक भाग ब्रह्मावर्त में जाना लिखा है । इसके बाद वादीने पृ ० १० में जोकि म्लेच्छोंको शिखा- सूत्र देना कहा है, वह भी गलत है । इसमें कण्वमुनिका कुछ भी हाथ नहीं था । उन म्लेच्छों ने अपनी धींगाधींगीसे यह कार्य किया । इन्द्रका पूजन भी शुरु किया, पर पूज्य इन्द्र उनके शिखा- सूत्र रखने और यज्ञ करनेको प्रशास्त्रीय व्यवहार और बलिदत्यका उसमें इशारा समझते थे । अतः उन्होंने वेदादि उनसे छीन लिये, और उहें बौद्ध - जैन बना दिया । इस विषयमें ' आलोक ' ( ३ ) पृ ० १६३ - २०१ में स्पष्टता देखनी चाहिए । पृ ० ६८ ( प्र ० ) ' शतपथ ' और ' महाभाष्य ' में ' म्लेच्छ ' शब्दका अर्थ ' अपशब्द ' है, किन्तु पुराणों में इसका अर्थ ' मुसलमान ' है । प्रत्येक ग्रन्थको अपनी परिभाषाएँ होती हैं । अष्टाध्यायी में marathi वृद्धि को collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८६ ८६५ परिभाषा आ, ऐ, औ है, पर नौकरी करने वाले के यहाँ वेतन बढ़ाना ‘ वृद्धि ' है । एक - दूसरे का अर्थ एक दूसरे में नहीं हो सकता । अतः पुराण में आये ‘ म्लेच्छ ' शब्दका ' मुसलमान ' ही अर्थ उचित है । " ( उ ० ) यह वादीकी हास्यास्पद बात है कि - पुराणों में ‘ म्लेच्छ ' की परिभाषा ' मुसलमान ' है । ' वृद्धिरादैच् ' यह क्या वृद्धि की परि-भाषा है? यह तो संज्ञासूत्र है, परिभाषा सूत्र नहीं । भविष्यपुराण कोई व्याकरण नहीं कि - उसमें संज्ञा वा परिभाषाएं रखी गई हों । मुसलमानी मत ३६८१ कलियुगमें जारी हुआ; परन्तु भविष्य-पुराणमें तो १००० कलियुग प्राप्त होने पर ( ' बीतनेपर ' यह वादोका अर्थ गलत है ) वरिगत म्लेच्छ ३६८१ वाले ' मुसलमान ' कैसे हो सकते हैं? बाणभट्टने कादम्बरी में हरिवश, नारद आदि पुराणों का वर्णन किया है, आपस्तम्बधर्मसूत्रादिमें भविष्यत्-पुराण का नाम लिया है " उस समय मुसलमान नहीं थे । तव स्पष्ट है कि मुसलमान पुराणसमयके नहीं, बहुत पीछे हैं । डा सग पृ ० ६६-६७-६८-६६-१०० - १०१ ( प्र ० ) ' देखिये - आपके मान्य. सम पुराण में ही लिखा है कि- ' एतस्मिन्नन्तरे म्लेच्छ प्राचार्येण व समन्वितः । महांमद इति ख्यातः शिष्यशाखासमन्वितः ' ( भविष्य ०. ३।३।५ ) उसके अनुयायियोंको ' मुसलमा ' कहा है, लक्षरण भी वही हैं- ' लिंगच्छेदी शिखा हीनः श्मश्रुधारी स दूषकः । उच्चालापी सर्व-भक्षी भविष्यति जनो मम | १६ | विना कोलं ( सूकर ) च पशवस्तेषु म . भक्ष्या मता मम । मुसलेनैव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति ( १७ ) तस्मान्मुसलवन्तो हि जातयो धमदूषकाः । इति पैशाचधर्मश्व भविष्यति मया कृतः | १८ | इसलिए म ० दयानन्द जी श्रीसुख-देवादिने म्लेच्छका अर्थं पुराणों में ' मुसलमान ' किया है । ' ह कलौ प्राप्ते ' कलियुगके एक सहस्र वर्ष बीतने पर कण्व मुनिने Gujarat. स्लेच्छोको संस्कृत पढ़ाई ' ( पृ ० ८ ) ।
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२५ ८६ श्रीसनातनधर्मालोक. ( ७ ) व दीकी बात वादीके ही दिये प्रमाणों से कटती है । जबकि तन कलियुग में १००० वर्षमें प्रतिपक्षीसे दिये हुए प्रमाणों में महामदका II वर्णन है, तब ३६८१ कलिसंवत् में उत्पन्न मुहम्मदका तथा उससे अर्थ जारी को हुई मुसलमान - जातिका कलियुगके १००० सचत् में छ ' पुराणनिरूपित महामदके साथ अभिन्नता कैसे हो सकती है? शेष हैं नामकी तथा लक्षणों की समता, सो ३६८१ कलियुग में रण होने वालेने भी अपना नाम तथा धार्मिक - लक्षण ग्रपनेसे बहुत हों । पहले के जारी पराणसे कहे हुए ही रख दिये हों; तब वे एक त्र्य- कैसे हो सकते हैं? अर्वाचीन मा प्राचीन - मतमें कुछ परिवर्तन यह करके अधिकांशमें उसे ले लिया करते हैं । जैसे- ' अल्ला ' शब्द न ' संस्कृत में अम्बा ( देवी ) का नाम है, उसकी उपनिषद् ' अल्लोप-दि निषद् ' भी उपनिषदोंमें परिगणित यो । मुसलमानोंने उसे ले. त्-- लिया, अल्ला का अर्थ ' खुदा ' करके उसमें फारसी के शब्द भी तव डाल दिये! सो भविष्यपुराणका महामद भिन्न है । तथा मुसलमानी समय को मुहम्मद भिन्न है । उसका पुराणोंके महामदसे कोई सम्बन्ध नहीं । केवल शब्दसमतामात्र है, अभिन्नता नहीं । रामायण-रण वरिंगत रावणकों लङ्कापुरी समुद्र में डूब गई । अब उसके बाद य ०. भी ' लङ्का ' नामकी नगरी बना दी गई; पर यह वह थोड़े ही है? वही आर्यसमाजके स्वा ० द ० जीको मृत्युके बाद भारतधर्मं-तेषु महामण्डल के स्वा ० द ० जी हुए उन्होंने सत्यार्थविवेक आदि -७ ) ग्रॅन्थ बनाये! क़ई आर्यसाजी भ्रमसे स ० ध ० के स्वा ० द ० जी के उद्धरणोंको प्र ० स ० के स्वा ० द ० जीके नामसे दे दिया करते ख- हैं । जैसे कि लाहोरके डी ० ए ० वी ० कालेजके हिन्दीविभागाध्यक्ष शब्दे श्रीसूर्यकान्तशास्त्री M. A. M. C. L. ने ' हिन्दी साहित्यका तिने विवेचनात्मक इतिहास ' में ऐसा किया हैं । देखो ' आलोक ' ( ६ ) पृ ० २४-२५ । इसी प्रकार ' सार्वदेशिक ' देहलीके दयानन्ददीक्षाङ्क " CC - 6: Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ८६७ ( ३५।११ पौष २०१६ ) में उसके सम्पादक श्रीविश्वधवाव्यासजीने ' सदाचार ' लेखको जो भा ० ध ० महामण्डलके स्वा ० द ० जीके ' धर्मकल्पद्र ुम ' के ७ म खण्ड में २२४६ पृष्ठसे २०५७ पृ ० की ४ पं ० तक छपा है, जो भारतधर्ममहामण्डलकी ' आर्य महिला ' पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, श्रीनानजीभाईकी श्रात्मकथासे लिखकर उसका कर्ता अपने ग्रार्यसमाजके प्रवर्तक स्वा ० द ० सरस्वतीको लिख दिया । उस सप्तमखण्डकी भूमिकायें भा ० ध ० के स्वा ० दा. जी ने कार्तिक पूरिणमा सं ० १ ९ ८२ वि ० लिखा है, तो क्या सं ० १ ९ ४० में मृतक स्वा ० द ० जी फिर सं ० १ ९ ८२ में भी जीवित मान लिये जायेंगे; और दोनों दयानन्द अभिन्न मान लिये जाएंगे? यदि नहीं, तब दोनों महामद - मुहम्मदको एक करके पुराणकालक वर्तमान मुसलमानोंके कालसे सम्बन्ध जोड़ना उनसे अन्याय करना है; और प्रक्षेप्ता का यह भ्रममात्र है । वेदमें ' भोजस्येदं पुष्करिणीव वेश्म ' ( ऋ ० १०।१०७।१० ) में ' भोज ' शब्द श्राया है, क्या यह धारानगरीके राजा भोजका नाम मान लिया जायगा? दक्षस्मृतिमें ' मूलत्राणे भवेत् स्कन्ध: ' ( २२६२ ) आया है; तो क्या इससे हमारे ' मुलतान ' जिसका संस्कृत नाम ' मूलकारण ' था, मान लिया जायेगा? उसी स्मृतिमें ' दीनानाथ --विशिष्टेभ्यो ' ( २।४४ ) आया है, क्या यह हमारा नाम मान लिया जायगा? महाशय! इसमें परं तु श्रुतिसामान्यमात्रम् ' की भान्ति शब्दमात्रकी समता समझनी चाहिये । ' मुसलमान ' लोग अपना नाम ' मुसल्ले - ईमान ' होनेसे ' मुसल-मान ' कहते हैं, तब पुराणके ' मुसलवन्तः ' शब्द से उसका मेल न होनेसे यह वह मुसलमान नहीं - यह स्पष्ट हो गया । अथवा वहाँ ' भविष्यपुराण ' होनेसे भविष्यका वर्णन समझना चाहिए । इस लिए वहाँ ' भविष्यति ' शब्दसे भविष्यकाल इष्ट है । जहाँ भूत-Gujarat. An eGangotri Initiative
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== श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) काल भी हो, वा वर्तमानकाल भी हो, तो वहाँ भविष्यत् कल्की अवतारके पुराण में भूत वा वर्तमानकालकी क्रियाओं के प्रयोगकी भांति इतिहासको शैलीकी व्यवस्थाके लिए ही भविष्यका भूत वा वर्तमानमें प्रयोग आता है । जैसे कि - इस समय मेरे सामने ' ' हिन्दी - सन्देश ' फाल्गुन १ ९ ६० का अङ्क ( पृ ०१३५ - १३८ ) पड़ा है, जो कि - गुरुकुल के ' अलंकार ' नामक पत्रके बन्द होने पर उसके स्थान पर उक्त पत्र लाहौरसे निकला था । उसके मार्च १ ९ ३४ के अङ्क ( पृ ० १३५ ) में ‘२० वीं सदीका ' भविष्यपुराण ' शीर्षक से लेख निकला था । उसमें सन् १ ९ ३६ -४० में होने वाले यहूदी-पोलेण्ड - हिटलर नाज़ी युद्धका वर्णन भविष्यद् - रूप में किया गया है, पर वहाँ इतिहासकी शैली सुव्यवस्थितं रखनेके लिए भूत वा वर्तमानकालकी क्रियाओं का प्रयोग किया गया है । यहाँ पृ ० १३६ के दूसरे कालमसे मैं कई वाक्य उद्धृत करता हूँ । बदकिस्मती से एक नौजवान नाज़ी ( जर्मननिवासी हिटलरका अनुयायी ) वहीं प्लेटफार्म पर खड़ा था । उसने यह समझा कि -यह पोलेन्डवासी यहूदी उसके नाज़ी - वेशसे घृरणा प्रकट करने के लिए मुँह बना रहा है । उसके हृदयमें तीव्र जर्मन देशभक्तिकी ज्वालाएँ भड़क उठीं । उसने अपने तीन साथी और दो पुलिस बालोंको बुलाया और डब्बेमें सहसा उत्तेजित भावसे चढ़ गये । -लड़ाई शुरू हुई ' इत्यादि । यह पुस्तक डाक्टर फिलिप रेवनने १ ९ ३० से पहले बनाई थी । भविष्य की घटनाको भी उसने भूतवत् लिखा । तो क्या वादी यही कहेगा कि - यह युद्ध सन् १ ९ २६ से शुरू हो गया, तभी तो फिलिपने उसे भूतकालमें लिखा । सन् १ ९ ३६ -४० में होने वाले युद्ध के लिए यह कहने वाले वादीकी बुद्धिका जो मूल्य होगा, वही भूतकालमें भविष्यत्को घटनाओंको वृरिंग करने sh गुल ' नोरक्षीरविवेक ' पर विवेचन पुराणको भी वर्तमानकालका मानने वाले वादीकी बुद्धिक भी है । बात यहाँ के ' मिश्र ' ब्राह्मणोंने विलसन श्रादि अनुसन्धाताओंके इन्ह उन अनुसार अफ़्रीकामें अपने उपनिवेश वसाये, इसलिए वह ' मिश्र जाल देश हो सकता है । वहाँ वाले यहां नहीं आये । क्योंकि वे ब्राह्मण नहीं थे, तब वे मिश्रब्राह्मण कैसे कहे जा सकते थे? कार फलतः वादीका पक्ष खण्डित हो गया । प्रयु पृ ० १०७ - १०८ ' शिखा काटने में वेद प्रमाण - ' यत्र बाणाः आ सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' ( यजुः १७।४८ ) यहाँ पर श्री- ला ज्वालाप्रसाद मिश्र ने ' विशिखाइव ' का ' शिखा रहित ' ग्रंथ भी बात लिखा है ' । यहाँ स्वा ० द ० प्रोक्त ' गर्म देश में शिखा कटाना ' सिद्ध नहीं है, होता । यहाँ कई देशोंमें बच्च के मुण्डनके समय सारा मुण्डन कर भा दिया जाता है । फिर एक - दो वर्ष के बाद बच्चेकी चुटिया रखाई जाती है । यह वेद - प्रमारण उसीको सूचित भी कर सकता है । वस्तुत: ली इस विषय में ' आलोक ' का पञ्चम पुष्प तथा गत निबन्धमें इस विषय पर विवेचना देखिये । यहाँ पर ' मुण्डित -कुमार छन्दोग ' पह तथा ' मुण्डा भृगव: ' यह चूड़ाकररणके समयके व्यवहार हैं, ग्रीष्म आ या गर्म देशके कारण चोटी कंटानेका वर्णन नहीं, अतः वादीका देख पक्ष निरस्त है । उल्टा दीर्घशिखा होने से शीतोष्णसहनकी क्षमता वढ़ती है । स्वा ० द ० जीने ४८ वर्ष तक ' दीर्घश्मश्रुः ' इस प्रथर्ववेद उन के पदसे ' पञ्चकेशधारण करना ' लिखा है, उसमें शिखा भी का है, तो क्या उस समय ग्रीष्मऋतु तङ्ग नहीं करेगी? तब उक्त पं हेतु ठीक नहीं । पृ ० ११०-१११ ( प्र ० ) कविरत्नजी वा श्रीकालूराम शास्त्री दोनों ही इसलामके एजेण्ट थे, उनसे रुपये मिलते थे, ( उ ० ) यह ection Gujarat. An e Sangoli initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६०० बुद्धिका बात गलत है । उन्होंने इसलामका क्या प्रचार किया? उन दिनों इन्हीं दोनोंने भारतधर्ममहामण्डलका विरोध किया था, अतः नाओं के उन दिनों ' भारतधर्म ' ( काशी ) पत्रमें भगवान्दी नशुक्लने एक " मिश्र जाली चिट्ठी छपवा दी । नोटिस देने पर शुक्लजीने तथा भारत-क- वे धर्मंपत्रके सम्पादकने क्षमा माँगो थी । प्रतिपक्षी लोग खण्डनके थे? कारण इनसे जलते थे, अत: इन्हें वदनाम करनेके कई हथकण्डे प्रयुक्त किया करते थे । अब दोनोंकी मृत्युपर वादीको भी याद वारणा: आ गया | स्वा ० द ० जीके प्रशास्त्रीय सिद्धान्तोंका खण्डन इस-र श्री- लामका प्रचार नहीं हो जाता । हसननिज़ामीने भी उन दिनों इस अर्थ भी बातका खण्डन कर दिया था । पृ ० ११२-११३ पुराण -- कुरानका जो वादीने साम्य बताया नहीं है, यह उसका व्यर्थ आरोप है । पुराण वेदोंके अनादि - सिद्ध डन कर भाष्य हैं । जो वेदने लिखा, वही पुराणने । दोनों स्थान अर्थ रखाई बराबर होंगे । कुरानने कई बातें पुराण से परिवर्तन करके ले वस्तुतः ली हों, यह सम्भव है । पुराण प्राचीन हैं, वैदिक - कालके हैं । में इस कुरान एक १४, सौ वर्ष से कम आयु वाला ग्रन्थ है | पीछे वाला छन्दोग ' पहले को चालू वस्तुएँ ले लिया करता है । पुराण तो सृष्टि की ग्रीष्मर्तु आदिके ही हैं । इस विषय में इसी पुष्पके ३७७ – ३८८ पृष्ठमें वादीका देखना चाहिए । जोकि वादी पुराणोंको कुरानकी नकल कहते हैं, - क्षमता उनका पुराणसे विद्वेष ही कारण है । थर्ववेद ( क ) सृष्टिकी श्रादिमें पहाड़ोंका उड़ना और इंद्रद्वारा पंख खा भी काटना वेदमें देखिये ( अथर्व ० २०११५१६, २०१३४१२, १४ ) उनके तब उक्त पंख काटकर पृथ्वीको स्थिर किया गया । शास्त्री ( ख ) पहाड़का नाम गोत्र वा महीधर इसीलिए तो कहा है उ ० ) यह कि - वे हिल रही पृथ्वीको मजबूत करते थे ' यः पृथ्वीं व्यथमानाम् ! ( इतस्ततः चलन्तीम् ) अदृहत् ( पर्वतादिभिद्ध दीकृतशन Ankur Joshi ) ( ऋ. Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन ६०१ २।१२।२ ) ( कृष्णयजु ० मैत्रायणीयं १।१०।१३, काठकसं ३६।७ ) जैसे ऊंट के दोनों प्रोर भूसा लदा हो, दोनोंके तोलमें कुछ ग्रन्तर पड़े, तो बैलेन्स ठीक करनेके लिए एक - दो पत्थर साथ जड़ देते हैं । वैसे ही सृष्टिकी आदि में भी ऐसे ही नियमसे पंख काटकर पहाड़ रखे गये थे । ( ग ) घृतकुल्या यादिका वर्णन वेदमें देखिये ( अथर्व ० १८।३।७२ ) तथा ' घृतह्रदा मधुकूलाः सुरोदकाः, क्षीरेण पूर्णा, उदकेन, दध्ना । एतास्त्वा वारा उपसर्पन्तु सर्वाः स्वर्ग लोके मधुमत्पिन्वमानाः ' ( ग्र ० ४३४/६ ) इत्यादि मन्त्रोंमें उनका संकेत मिलता है । ( घ ) वेद और पुराण ' गाय ' को ' अघ्न्या ' कहते हैं, अतः जहाँ पर ' गोवध ' मालूम पड़े, वहां ' गो ' शब्द पशुसामान्य-वाचक होनेसे वहां गो से अतिरिक्त पशु समझना चाहिये । इ विषयमें ‘ आलोक ' ( ६ ) देखिये । पृ ० ११७ – ११८ - ११ ९ ' पञ्चलक्षगवाँ माँसः ' इत्यादिमें माँसका अर्थ ' आलोक ' ( ६ ) ( ४१७ - ४३६ पृ ० ) में देखिये | पृ ० १२४ ( प्र ० ) करपात्रीजीको तो इस कलियुगमें संन्यास लेना ही नहीं चाहिये था, क्योंकि - ' अग्निहोत्रं संन्यासं पल-पैतृकम् | कलौ पञ्च विवर्जयेत् ' ( निर्णयसिन्धु ) । ( उ ० ) इसका अपवादवचन देवलका उन्हीं निबन्धग्रन्थोंमें मिलता है - ' यावद् वर्णं विभागोस्ति यावद् वेदः प्रवर्त्तते । संन्यासं चाग्निहोत्रं च तावत् कुर्यात् कलौ युगे ' सो वर्णंविभागकी स्थिति तक कलिमें संन्यास एवं अग्निहोत्र लिया जा सकता है । हां, संन्यासीको ब्राह्मण, विद्वान् एवं त्यागी होना चाहिये । अतः यह थाक्षेप अल्पश्रुततामूलक है । आगे प्रतिपक्षी द्वारा आर्यसमाजी श्री अखिलानन्दके विचार सनातनधर्मके नामसे लिखना जनताको ठगना है । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) पृ ० १२६ ' वेदसंज्ञाविमर्श ' की जिसमें प्रतीपक्षीका हाथ भी इस पुष्प में स्थालीपुलाक - न्यायसे आलोचना कर दी गई है । पृ ० १३१ ( प्र ० ) चारों वर्ग गुरण कर्मसे प्रार्य हैं । ( उ ० ) शूद्र श्रार्य नहीं होता । इस विषय में ' आलोक ' ( ४ ) में ' हिन्दुशब्दका महाभाष्य ' देखें । पृ ० १३६ आर्यसमाज वेदमत नहीं, किन्तु दयानन्दमत है, यह तो प्रत्यक्ष है । वादीकी ' नीरक्षीरविवेक ' पुस्तक भी इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण है । पृ ० १३६ - १४० ( प्र ० ) ' सनातनधर्मकी परिभाषा - ' अनावृता: किल पुरा स्त्रिय आसन् वरानने ' इत्यादि । यदि यही ' सनातन-धर्म ' है, ऐसे को मैं दूरसे नमस्ते करना पसन्द करता हूँ । ' ( उ ० ) यह सृष्टिके आदिका प्रकरण है, जिसे ' पुरा ' ( १।१२२ । ४ ) शब्दसे व्यक्त किया गया है । यहां यह प्रकट किया गया है कि- विवाहप्रथा नियमबद्ध कब जारी हुई? उस समय अपने वर्णंमें स्त्री - पुरुष स्वतन्त्र होते थे । कौमारावस्थासे ही विवाह न होकर जो जिसे चाहता था, ले लेता था । उस समयकी प्रकृति-परतन्त्र प्रजाओं का यह चित्र खींचा गया है । कामक्रोधविव-जिताः ' ( १।१२२।६ ) उस समय काम - क्रोध नहीं था - यह भी सूचित होता है । केवल प्रकृतिका गाय - बैलकी भांति अनुवर्तन था । इसीको उस समय ' धर्म ' समझा जाता था, अधर्म नहीं जैसे कि — ‘ नाघर्मोभूद् वरारोहे! स हि धर्मः पुराभवत् ' ( १।१२२ । ५ ) । इसे लक्ष्य करके मनुजीने भी कहा है- ' प्रवृत्तिरेषा भूता-नाम् ' ( ५।५६ ) । इसी उद्देश्यसे उद्दालकने कहा था - ' मा तात! कोपं कार्षीस्त्वम् एष धर्मः सनातनः ' ( १२२ । १४ ) । इसे वहां पशुपक्षियोंका धर्म बताया है - ' तं चैव धर्मं पौराणं तिर्यम् योनिगताः प्रजाः । श्रद्याप्यनुविधीयन्ते कामक्रोधविवर्जिताः ' ( ६ ) ' यथा गावः स्थितास्तात! ' ( १५ ) । CC - 0. Ankur Joshi ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन यहाँ सनातन या ' सदाका धर्म ' का यह भाव है ' प्राकृतिक ६०३ धर्म ' । वादी याद रखे कि धर्म कई प्रकार के होते हैं-देशिकधर्मं, सार्वदेशि धर्म, देशधर्म, कालधर्म, ग्रामधर्म एक द धर्म, कुलधर्म, सार्वभौमधर्म । अपने - अपने वातावरणमें, जाति-अपने देश - कालमें अधर्म नहीं समझे जाते, अपने-में परपुरुष पराई स्त्रीका हाथ । यूरोपमें ' बालनृत्य ’ पकड़कर उसे ले आता है, उसके साथ चिकनी भूमिपर नाचता है, उसके सौन्दर्यकी प्रशंसा करता है । उसके मुखका चुम्बन करता है । इसे वहाँ धर्मं या सभ्यता समझा जाता है । यदि कोई वहां की स्त्री किसी परपुरुषका हाथ पकड़कर उसे नाचने के लिए ले आवे, और वह पर - पुरुष निषेध कर दे, तो उसे असभ्य समझा जाता है । पर हमारे यहाँ परपुरुषका हाथ पकड़ना, पर - स्त्रीका चुम्बन करना अधर्म समझा जाता है । इसीलिए वादीसे दी हुई उक्त कथामें संकेत दिया गया है - ' उत्तरेषु च रम्भोरु! कुरुष्व-द्यापि पूज्यते ' ( ७ ) उत्तरकुरु से कई अनुसन्धाता रूसका ‘ काके-शिया ' भाग लेते हैं, तो दूसरे यूरोप | यह है विशेष देशका धर्म, व्यापक तनातनधर्मं नहीं, जोकि वादो ग्रनभिज्ञतासे हमारे सना-तनधर्म पर आक्षेप करने बैठा है । मुसलमान लोग चाचाको लड़की विवाह कर लेते हैं, यह उनमें अधर्म नहीं समझा जाता है, यह है जातिविशेषका धर्म, सार्वदेशिक सनातनधर्मं नहीं । श्रार्यसमाज • परस्त्री विधवाको कामवती होनेपर मैथुनार्थ परपुरुषकी अङ्क-शायिनी बनाता है । इस प्रकार अशक्त - पति अपनी कामिनी .. स्त्रीको । एक विधवाको ११ तक पति देता है । यह वहां धर्म - नहीं समझा जाता । यह है साम्प्रदायिक - धर्मं, पूर्ण सनातनधर्म नहीं । प्रक्षेप्ता प्रतिपक्षी इस पर व्यापक दृष्टिकोण से विचार करने पर तब महाभारतीय उक्त ऐकदेशिक इतिहासको सार्व-देशिक - सनातनधर्मं समझने की भूल न कर सकेगा । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मांक ( ७ ) ६०३ ६०४ कृतिक स्त्रीगरणपक्षपाती सम्प्रदायका सेवक पथिक देखे कि – उक्त ऐक-देशिक सनातनधर्मको ' स्त्रीणामनुग्रहकरः स हि धर्मः सनातनः ' जाति- " एक ( ८ ) कहा है । तब नियोगपक्षपाती बादी उसे दूर से नमस्ते क्यों करना चाहता है? ग्राजकलके सुधारक ' तलाक ' की मांग कर अपने- रहे हैं । क्या यह ‘ अनावृताः किल पुरा स्त्रिय श्रासन् वरानने! नृत्य ' कामाचारविहारिण्यः स्वतन्त्राश्चारुहासिनि! ' ( १२२।४ ) तासाँ उसके व्युच्चरमाणानाँ कौमारात् सुभगे! पतीन् ' ( ५ ) का अनुसरण करता नहीं? फिर वादी इस स्वतन्त्रताका विरोध क्यों करता है? जो-वहां कि श्वेतकेतुने उक्त स्वातन्त्र्यको हटाकर यह व्यवस्था बांधी थी-ए ले ' व्युच्चरन्त्याः पति नार्या अद्यप्रभृति पातकम् । भ्रूणहत्यासमं घोरं नमा भविष्यत्यसुखावहम् ' ( १८ ) इसे वहाँ ' घर्म्या ' ( २१ ) कहा है, त्रीका इसका विरोध क्यों? । हुई इस पूर्वापरसे वादीने समझ लिया होगा कि उक्त इतिहास रुष्व- सृष्टिके आदिमें अनियन्त्रणके समयका है । सृष्टिकी प्रादि में वेदा-काके- दिशास्त्रप्रोक्त व्यवस्थाएँ प्रचलित नहीं थीं । उसमें पशुओं की भाँति धर्म, प्रकृति का अनुवर्तन था; ( जैसे उक्त इतिहास के पद्य पूर्व उद्धृत सना- किये जा चुके हैं । ) उस समय काम - क्रोध आदि भी नहीं थे । देखिये-लड़की सृष्टिकी आदिमें जो संयोग हुए, वे क्या आपस में भाई - बहिन यह है. नहीं थे? वहाँ शास्त्रीय व्यवस्था कहाँ थी? किसके वहां नियन-नमाज बद्ध संस्कार होते थे? क्या उस समय संस्कार विधियाँ थीं? । अङ्क- तव स्पष्ट है कि उस मानससृष्टिमें प्रकृतिका अनुवर्तन था, जैसे मिनी आज भी पशुओं में है । पर वादीको जानना चाहिये कि- ' नैनं धर्म देवा अतिक्रामन्ति, न पितरः, न पशवः । मनुष्या एवैके प्रतिक्रा-निधर्म मन्ति ' ( शतपथ ० २ | ४ | २ | ६ ) अर्थात् मनुष्य ही अपने लिए बनाये वचार हुए नियमों को तोड़ दिया करता है । सार्व- ही कहा गया है कि उस समय काम - क्रोध नहीं थे; पहले CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन I ‰ अतः यह स्वातन्त्र्य ( प्रकृतिका अनुवर्तन ) कुछ सीमा तक क्षम्य एवं सह्य था । पर मनुष्य यहां तक नहीं ठहरता, आगे चलता है । आगे चलनेसे फिर काम - क्रोध प्रारम्भ हो जाते हैं । काम-क्रोध जारी हुए; तो विशृङ्खलता प्रारम्भ हुई । उसी समय मार-काट आदि प्रारम्भ हो जाते हैं । उस समय व्यवस्था स्थापनकी ग्रावश्यकता पड़ा करती है । यही बात यहां भी हुई । उद्दालककी पत्नीको उसके पुत्रके समक्ष ही एक ब्राह्मरण पकड़ कर कहने लगाकि - ' चलो, चलें ' । यहां वलात्कार तो नहीं था । दो पुरुषोंके सामने अकेला व्यक्ति भला बलात्कारका साहस ही कैसे कर सकता था? वास्तवमें यह था काम; क्योंकि इस प्रकारकी स्वतन्त्रतामें पुरुष विषयों में श्रासक्त होने लग जाता है । इससे कामसंचार प्रारम्भ हो जाता है! कामसे क्रोध भी स्वाभाविक हुआ करता है - ' ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूप-जायते । संगात् संजायते कामः कामात् क्रोघोभिजायते ' ( गीता २६२ ) यही स्वतन्त्रता, जो पहले वर्मं थी, अब वह अधर्म हो जाती है । पहले स्त्रियाँ अनावृत रहती थीं, जो ग्रकामताका चिन्ह है । छोटे लड़के - लड़कियाँ अब भी सभी अनावृत रहते हैं । जब काम - संचार होता है; तब फिर व्यवस्था बनानी पड़ती है । कपड़े पहनने पड़ते हैं । एकपतिकत्वका नियम रखना पड़ता है । क्योंकि -- ' काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विध्येनमिह वैरिणम् ' । ( गीता ३।३७ ) कामता होने पर तो ' शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् नाप्नोति किल्विषम् ' ( ४।२१ ) ' कुर्वन्नपि न लिप्यते ' ( ५७ ) कर्मण्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित् करोति सः ' ( ४२० ) ' लिप्यते न स पापेन पद्मपत्र-मित्राम्भसा ' ( ५/१० ) ' मनः कृतं कृत राम! न शरीरकृतं कृतम् । येनैवालिङ्गिता कान्ता तेनैवालिङ्गिता सुता स ० ६० ५८ Gujarat. An eGangotri Initiative
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६०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ( योगवासिष्ठ ) कोई दोष नहीं माना जाता । इस तरह स्पष्ट है कि यह ' काम ' था, और इस ' काम ' से श्वेतकेतुको क्रोध हुआ, जो स्वाभाविक था । तभी उसने स्त्रीसमाजके कल्याण की व्यवस्था की कि- ' व्युच्चरन्त्याः पतिं नार्या अद्यप्रभृति पातकम् । भ्रूणहत्यासमं घोरं भविष्यत्यसुखावहम् । भार्यां तथा व्युच्चरतः कौमारब्रह्मचारिणीम् । पतिव्रतामेतदेव भविता पातकं भुवि ' ( १२२.१७, १८ ) अर्थात् पतिका उल्लंघन करने पर नारीको और सच्चरित्रा, पतिव्रता भ र्याका अतिक्रमण करने पर पतिको पाप लगेगा । यह व्यवस्था स्त्री- समाजके संरक्षरण का हेतु है । स्त्रीके स्वातन्त्र्य होने पर वह दूसरों से इस प्रकार खींच ली जा सकेगी - यह उक्त कथासे संकेत मिलता है । स्त्री - स्वातन्त्र्य स्त्रीके लिए तथा पतिके लिए भी परिणाम-हितप्रद सिद्ध नहीं होता । इसी कारण तो उद्दालक भी उ ब्राह्मणको कुछ नहीं कह सके; और श्वेतकेतुको नारीके संरक्षरणार्थ उसका स्वातन्त्र्य छीनना पड़ा । कई मर्यादा में नारीको बाँधा गया । नारी - स्वातन्त्र्य चाहने वालोंको भी उनके दुष्परिणाम देखकर उन्हें भी स्त्रीके संरक्षरणार्थ श्वेतकेतु बनकर उन्हें नियममें बान्धना पड़ेगा । यदि वादी भी उनका पारतन्त्र्य चाहता हो; तो बधाई हो । प्राशाहै - वादी सनातन-धर्मके विषय में समझ लेगा । सनातनधर्म में अवान्तरधर्म बहुत है, सबकी समष्टि सनातनधर्म है; अतः उसके एकदेशपर हंसी उड़ाना अपनी अनभिज्ञता है । इस विषयमें कुछ गत-निबन्धों में भी लिखा जा चुका है । पृ ० १४०-१४१ ‘ सनातनमेनमाहु: ' इस विषय में ‘ प्रालोक ’ ( ६ ) पृ ० ३-५ तथा ' आलोक ' ( ८ ) पृ ० २७५-२७८ में देखें । पृ ० १४१ ( प्र ० ) सनातनधर्मं परस्पर विरुद्ध आदि असंख्य दोषोंसे परिपूर्ण है ' ( उ. ) इस पर यह याद रखें कि - यह सनातन-CC - 0. Ankur Joshi Collection ' नीरक्षीरविवेक ' पर विवेचन धर्म परमात्माका धर्म है, ' सनातनस्य ( परमात्मनः ६०७ ६०८ भी पृ ० १४१ में यह माना है - ' परमात्मा ) धमः । वादीने रहने उस परमात्मा में भी लोकोत्तरता होने से सनातन कहलाता है ' हैं— ' अजायमानो परस्पर विरुद्ध 1 । पुराण विरुद्धता बहुधा विजायते ' आदि । लोक में बहुत धर्म विरोध दूषण होती है, परन्तु अलौकिकमें तो परस्पर- इसी दूषरण न बनकर भूषरण बन जाया करती है । परस्पर विरुद्धत य जैसे कि साहित्यमें रस परस्परविरुद्धधर्मवाला नुसार वह परमात्मा अलौकिक माना जाता है, इसी प्रकार ' रसो वै होने पर भी कुत्ता तथा उसके सनातनधर्म में सः ' रसस्वरूप ब्राह्म सनातनधर्ममें सत्त्व, रज, तम, विविध परस्परविरुद्धता दूषरण नहीं । समस करते हैं । यह गुण परस्परविरुद्ध विविध नियम हुआ हैं, प्रतीत होता करते हैं, परन्तु है । कल के सत्यार्थप्र ० में पड़ी है । यदि यह देखनेकी इच्छा ' हिन्दुधर्मव्याख्यानदर्पण हो तो ' देखना चाहिये प्रकृतिपुरुष हुआ लिए तब वैसे पात्रोंके लिए अल्पश्रुतोंको यह दोष परस्परविरुद्धता तो भरी न स श्रीमालाराम सागर कृत । उत्त पृ ० १४३ – १४४ ( प्र ० ) ' ब्राह्मण, कुत्ता, हाथी के न साथी ' वाली कहावत । तीनों जाति रही है । आप जैसे प्रचारज आप [ ब्राह्मणों ] पर चरितार्थ हो आपके ब्राह्मणों व नियोगज सारस्वतोंको पुराण ' राक्षसोंका अवतार लिखते हैं- ' ये पूर्व राजन्! ते कलौ ब्राह्मणाः स्मृताः ' ( देवीभाग राक्षसा ( उ. ) इस पुराणवचनको ० ) । राक्षसों का अवतार प्रमाण मानकर वादी ब्राह्मणोंको सम्प्रदायप्रवर्तक बनाना चाहता है । तब तो वादीने अपने पाखण्डी, ठग, असत्यवादी प्रौदीच्यब्राह्मणको भी अपने शब्दोंमें राक्षस, वेदनिन्दक, वेदधर्महीन, अनेक धर्मोके प्रवर्तक, , निर्दयी, धर्मभ्रष्ट तथा अत्यन्त बकवादी Gujarat दिया . An eGangotri । यह हम नहीं कह रहे, वादी कह रहा है: कापड़ी सिद्ध बनाये कर