सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 491–500
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 491–500
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६४८ श्रीसनानधर्मालोक ( ७ ) मानने वाले विद्यार्थीजी नियोग ' को वेश्याकर्म ' मान लें 1 वहाँ यह मत दंत्योंका दिखलाया गया है । स्वा ० द ० जीने स ० प्र ० में इसे नास्तिकों का मत बताया है । मालूम नहीं कि - गुरु एवं चेले चार्वाकको इम युक्ति पर रोककर क्यों दैत्य एवं नास्तिक के पक्ष के बनना चाहते हैं । हमने इसका प्रत्युत्तर ' आलोक ' ( ४ ) में था-द्धविषयक शङ्काओं में सम्यक्तया दे दिया है । प्रतिपक्षी वहाँ पर देखे । १८ सामवेदको ध्वनिविषयमें प्रतिपक्षी स्वमान्य मनुस्मृति देखे ( ४१२४ ) | १६ गङ्गागङ्गति यैर्नाम योजनानाँ शतैरपि ' यह कथन अर्थवाद है । इसका तात्पर्य गङ्गाकी पवित्रता में है । तभी वेदमें भी ' इमं मे गंगे ' ( ऋ ० १०७५५ ) इत्यादि मन्त्रमें गङ्गाको गौरवास्पद प्रथम पद दिया है । २० श्राद्धमें माँस माँस - भक्षियोंके लिए है । यह घटिया पक्ष है । मुनि-योंके अन्नको उत्तम माना गया है । इसमें कोई विरोध नहीं । प्रकृतिके त्रिगुणात्मक होने से प्रकृति की सन्तानभूत पुरुषोंके लिए भी, भिन्न - भिन्न प्रकारको व्यवस्थाएँ दिखलाई जाती हैं. इसका नाम विरोध नहीं होता । हमारे शरीर में भी वात - पित्त - कफ यह तीन विरुद्ध पदार्थ रहते हैं । तब क्या विरुद्ध - धर्म वाले शरीर को भी छोड़ देंगे? । २१ पुराणों में विचित्र उत्पत्तियाँ प्रयोनिजं हैं । अयोनिज शरीरों की सिद्धि वैशेषिकदर्शन आदि में प्रसिद्ध है ।. २२ ‘ श्रीकृष्ण वालके ग्रवतार ' इस विषय में इसी पुष्प में विचार, किया जा चुका है । २३ ईश्वरका स्वरूप निकराकार तो सनातनधर्म भी मानता है । ' निर् ' से श्राकारका प्रभाव इष्ट नहीं, किन्तु अनिर्वचनीयता. इष्ट है; अतः स ० ध ० साकार निराकार दोनों रूप मानता है ।: तब स ० ध ० के ग्रागे निराकार के प्रमारण दिखलाने " CC - 0 को . Ankur आवश्यकता Joshi Collection विष्णुपुराण पर विवेचन II नहीं । हाँ ' ईश्वर साकार नहीं हो सकता ' प्रतिपक्षी ऐसे प्रमारण ढूंढा करें । इस विषय में ' आलोक ' चतुर्थ पुष्प देखें । २४ बुद्ध विष्णु एक तार हैं । सो यदि पुराण में बुद्धावतारका भी भविष्यतृरूप में.िरूपण श्रा गया है; तो कोई दोष नहीं । पुरागमें कल्की अवतारका भी निरूपण आया है वह अभी कई लाख वर्ष के बाद कलियुगके अन्तमें होगा । जब उस कल्कीका भी वर्णन पुराणोंमें प्राता है, तो बुद्ध अवतार के वर्णन में भी कोई दोष नहीं आता । • २५ बिन्दुमतीकी ५० कन्या उत्पन्न होने से उत्पादकको प्रति-पक्षीने कामी बताया है । '१० सन्तान से अधिक उत्पन्न करने वाला कामी होता है, ऐसा वेदमन्त्र तो प्रतिपक्षीने कहीं बताया नहीं । ' दश स्याँ पुत्रानाघेहि ' यह मन्त्र प्रतिपक्षीके स्वामी के धनु-सार ११ पतियों को कहा जाता है; तब यदि उन सबके एक स्त्रो से दस - दस लड़के होते रहे, तो उसी एक स्त्रीसे १०० सेविक लड़के हो जाएगे, अथवा यह वेदमन्त्र असत्य हो जायगा । तब क्या उन वैदिक लड़कों वाली एक स्त्री कामिनी होगी - वा नहीं? यदि हाँ, तब पुराण पर ही दोष क्यों? दो - तीन प्रसवोंमें भी डिम्बाणु एवं शुक्राणुके कारण ५० सन्तान हो सकते हैं । जैसे धृतराष्ट्रकी स्त्री गान्धारोके एक ही प्रसवमें १०० लड़के हुए । इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) में ' बहु - सन्तान ' विषय देखना चाहिए । २६ मन्त्र से भी विषचिकित्साएं हुआ करती है - यह तो उप-वेद आयुर्वेद में वर्णन आता है । इसमें नर्मदा के जलकी विषहर शक्ति सूचित की गई है । २७ श्रीकृष्ण - भगवान् को रासक्रीड़ा के विषयमें ' आलोक ' ( ७ ) देखिये । उनकी १६१०८ रानियां थीं, इसेवा प्रतिवादिमान्य महाभारत भी बताता है । इस विषय में ' आलोक ' का छठा पुष्प देखिये । २८ ' नक्षत्रसूचककी निन्दासे Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६५० फलित - ज्यौतिषका खण्डन न होकर मण्डन ही हुआ । २६ आर्य-हिन्दुके विषयमें ' आलोक ' चतुर्थ पुष्पमें ' हिन्दु शब्दका महाभाष्य ' देखिये । हमारा यह लेख पहले ' सिद्धांत ' में छपा था । ' क्यों ( २ ) ' पुस्तकमें उसी का सार वहींसे लेकर दिया गया है । २६ शेष जो नमरते, आर्य, नियोम, सन्ध्याके काल, ईश्वरका स्वरूप, उर्वशीको देखकर रेतः पात, ' कृष्णं गोपाङ्गना रात्रौ रमयन्ति ' आदिका समाधान हमारे ' आलोक ' के भिन्न - भिन्न पुष्पों में किया जा चुका है । प्रतिपक्षी जरा निष्पक्ष होकर उनका अध्ययन करे, तो उसके सब सन्देह दूर हो जायेंगे । ‘ देर है अंधेर नहीं ' । शेष कई बातोंका महत्त्व न होनेसे उन्हें उपेक्षित कर दिया गया हैं । यह पुष्प जितना सोचा गया था, उससे बड़ा हो गया । इसमें पुराण- इतिहास आदिमें प्रतिपक्षियोंकी ओरसे जो प्रक्षेप किये ज ते हैं - उनका प्रायः प्रत्युत्तर हो गया है । जो कई बातें यदि बच गई हैं, तो उनका समाधान अन्य पुष्प में दिया जायगा । अब परिशिष्ट में कई पौराणिक घटनाएं दिखलाकर यह पुष्प समाप्त किया जायगा । अष्टम पुष्प भी मुद्रित हो गया है । उसमें वेद-विषय, वेदोंके शब्द रूढ हैं, या यौगिक? वेदार्थके साधन, तथा वर्णव्यवस्था, नियोग, विधवाविवाह, तलाक आदि विषयों पर विचार दिया गया है । पाठकगण इन पुष्पों का प्रचार कर-कराके अग्रिम पुष्पोके प्रकाशन में सहयोग दें । CC - 0. Ankur Joshi Collection ६४ ज परिशिष्ट दा ( २ ) पुराणोंको सत्य सिद्ध करने वाली घटनाए ( पुराण सनातन हिन्दुधर्मके प्रारण हैं । उन्हीं के होनेसे हिन्दु-जाति अभी तक जीवित है । नहीं तो मुसलमान अपने राज्यके समयमें, और ईसाई वा अंग्रेज अपने राज्यके समयमें हिन्दुजादि को निगल लेते । ऐसे साक्षात् भगवत्स्वरूप पुराणोंकी जिस समय अज्ञानी प्रतिपक्षी निन्दा करते हैं और उन्हें पोपोंकी बनाई गप्पें बताते हैं तो बड़ा खेद होता है । हमारे सैकड़ों प्राचीन ग्रन्थोंक मुसलमान बादशाहोंने फूंककर राख कर डाला । महीनों उनसे अपने हमाम गर्म करते रहे । उनमें जो कुछ वेद एवं उनके भाष्य-. प भूत पुराण, गीता, रामायण आदि बचे, प्रतिपक्षी इनमें भी एक प्रक्षिप्तताका अविष्कार करके इन्हें भी मिटाने पर तुले हुए हैं । पि जिस गोताका आज सारे विश्वमें मान हो रहा है और जिस म गीताको सर्वोपरि ग्रन्थ माना जा रहा है, जर्मनी, इंगलैंड, अमे- व रिका आदि विदेशों में भी जिसके लाखों भक्त हैं; उसी गीताको कई ईर्ष्यालु समाप्त करनेके लिए जी - तोड़ प्रयत्न कर रहे हैं । इनमें कई एक तो उल्टी- सुल्टी थोथी युक्तियां देकर गीतामें ३४५
श्लोकोंको प्रक्षिप्त बताकर निकाल रहे हैं, जिससे अवतार - सिद्धि
कहीं न हो जावे | इस प्रकार गीताको समाप्त करनेका षड्यन्त्र कर रहे हैं । इन्हीं कामण्डूक प्रतिपक्षियोंके दिमाग में पुराणों की जो बात नहीं बैठती, उसे एकदम गप्प बताकर हंसीमें उड़ानें लगते हैं । हम ' प्रालोक ' पाठकोंके समक्ष इस सम्बन्धकी कुछ प्राश्चर्य-Gujarat. An eGangotri Initiative
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६५२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) जनक घटनाएं रखने जा रहे हैं । इनका भक्त रामशरण-दासजीने आज के वेद - पुराण, समाचारपत्रोंसे सङ्कलन किया है । श्राशा है - पाठक इन्हें ध्यानसे देखेंगे । अधिक स्थान यहाँ न होने से शेष घटनाओं को ' आलोक ' के अग्रिम अष्टम पुष्प में हम देंगे । ' आलोक'- प्रणेता ) १ पुराणोंमें प्राई दैवी चमत्कार की घटनाएं • जब पुराणोंमें दैवी चमत्कारोंकी अद्भुत घटनाएं प्राती हैं, तो देवी - देवताओं को न मानने वाले प्रतिपक्षी उन्हें एकदम अरा- ' म्भव, एवं प्रसत्य बताने लगते हैं, पर आज भी देवी चमत्कार की घटनाएं हुआ करती हैं । देखिये – बाराबंकी । देवी चमत्कारकी एक असाधाररंग - घटना यहां पर हुई है, जिसकी नगरमें बड़ी चर्चा है । बताया जाता है कि-व्य-. एक रिक्शा वालेकी दो वर्ष की कन्या चेचक से भर गई और उसे श्मशानके निकट गाड़ दिया गया । वापस घर पहुँचकर कन्याके 1 पिता को लगा कि - जैसे किसीने उसके मुँह पर जोरका तमाचा " मारो हो, और उससे कहा हो कि - तूने कन्याको गाड़ दिया, I वह तो अभी जिन्दा है । काफी सलाह - मशवरेके बाद लोग उसके पिता के साथ फिरसे श्मशान गये और वह स्थान खोदा गया तो वह व लिका वस्तुनः जोवित निकली और उसका रोग भी दूर हो चुका था,,, यद्यपि फफोले फूटने के निश न थे । यह उल्लेखनीय है कि बालिकाका शरीर भूनिमें १० घंटा गड़ा रहा था । पुलिस-ने भी इस घटना की सत्यता की पुष्टि की है " ( नवभारत टाईम्स. ६ / -- ६० ) अन्तिम प्रणाम! नरेला २० सितम्बर । नरेलाके प्रसिद्ध पं ० रघुनाथ स्वामीका इनके द्वारा १५ दिन पूर्व की गई भविष्यवारगो * CC - 0 के. Ankur अनुसार Joshi श्राज Collection प्रत्यक्ष घटनाएँ ६५३ रात्रिको स्वर्गवास हो गया । स्वामीजीने १५ दिन पूर्व अपने दो पुत्रो से ग्रपने मित्रोंको पत्र लिखाये थे कि यह उनका अंतिम प्ररणाम है । ग्रतः सम्भव हो तो आकर मिल जायो । पुत्रोंने न चाहते हुए भी पिताकी आज्ञानुसार पत्र लिख दिये । इसके बाद स्वामीजीने समाधि लगाई, और ठीक १५ दिन बाद आज उनका स्वर्गवास हो गया । ( वीर अर्जुन २१-१-६० ) । भविष्यवाणी ' फ्रान्सके ग्रमीर फील्ड मार्शलके सामने राज्यका बड़ेसे बड़ा व्यक्ति भी दम नहीं मार सकता था । जव उनका जन्म हुआ, तब पैरिसके एक प्रसिद्ध ज्योतिषीने उनकी जन्मपत्री बनाई । उसमें यह भविष्यवाणी को गई थो कि - चार्ल्सको मृत्यु बरगंडीके एक व्यक्तिसे होगी, जो अभी पैदा नहीं हुम्रा । चालीस वर्षकी प्रायुमें जब मार्शलका सितारा बुलन्दी पर था, उनके विरुद्ध षड्यन्त्रका अभियोग लगाया गया । अदालतने मृत्युदण्ड की आज्ञा सुनाई, चार्ल्सका सिर काटनेके लिए जिस जल्लादको नियुक्त किया गया, वह बरगंडीका निवासी था । वह व्यक्ति उस समय पैदा नहीं हुना था, जव ज्योतिषीने भविष्यवाणी की थी ( साप्ताहिक हिन्दु-स्तान १६-१०-६० ) । २ भयंकर राक्षसों और उनके सींग होनेकी बात । जब प्रतिपक्षी पुराणोंमें भयानक प्रकृति वाले राक्षसोंका वन पढ़ते हैं, तो वे उस पर विश्वास नहीं करते । इस पर निम्न घटना देखिये- 1 काशीके मानस मर्मज्ञ पं ० हरिप्रसाद व्यासजीने हापुड़ में प्रशा-नन्दमलिकजीके सामने घटना सुनाई कि- मैं पहले भयंकर राक्षसों Gujarat. An eGangotri Initiative स ० ध ० ६१
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६५४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) की रामायण में आई घटनाओंको यथार्थ न मानकर उन्हें रोचक मानता था । पर एक घटनाने मेरे विचार बदल दिये । काशी ( नीची ब्रह्मपुरी ) में एक प्रतिष्ठित धनाढ्य ब्राह्मण रहा करते थे । उनकी धर्मपत्नीके गर्भ से घोर राक्षसका जन्म हुआ, जिसे हमने स्वयं देखा । वह पैदा होते ही भयंकर शब्द करता हुआ सामने की खूंटी पर जा बैठा । उसके सिर पर दो सींग थे, और दाँत निकले हुए थे, मुंह बड़ा डरावना था । घर वाले यह देखकर काँपने लगे कि - यह हम पर आक्रमण न कर दे । वह राक्षस लाल - लाल आँखें किये किटकिटाता रहा । वे ब्राह्मरण चुपचाप किसी से बन्दूक माँगकर लाये, और उस राक्षस पर फायर कर दिया, पर राक्षसका बाल भी बाँका न हुआ । दूसरी - तीसरी गोली लगनेसे उसका अन्त हुआ । तब जाकर मैं राक्षसोंको मानने लगा । १ विचित्र बालकोंका जन्म । दूसरी घटना व्यासजीने यह सुनाई - काशीमें मैं जिस मुहल्ले में रहता हूं, उसी में एक माली रहता था । उसकी स्त्रीके, गर्भसे एक बच्चा पैदा हुआ, जिसके दो सिर थे, और तीन पैर थे । मैंने स्वयं जाकर उसके उस बच्चेको देखा, दोनों सिर बराबर जुड़े थे, चार नेत्र, चार कान दोनों मुखोंमें थे । दो पैरोंके प्रति-रिक्त तीसरा पैर पीछे कमरसे जुड़ा हुआ था, जो नीचे तक लटकता था । इससे मैं आश्चर्यचकित रह गया । तब पुराणोंमें जो एक से अधिक सिर वालोंका वृत्त आता है, उसमें भी असंभव न रहा । अब समाचारपत्रोंकी घटनाएं सुनिये -२ चार सींग वाला बच्चा । नजीबाबाद | कल स्त्रीचिकित्सालय में एक ब्राह्मणकी स्त्री CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रत्यक्ष घटनाएँ ६५५ ६५६ के ४ सींग वाला बच्चा पैदा हा । जिसके दो सींग माथे और दो सींग गुट्टी पर थे 1 । कमर की जगहकी एक हड्डी थी पर धर्मपत्न मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था ( वीर - अर्जुन १६-११-६० ) ॥ यह जिसके नेत्र था ३ अद्भुत राक्षरा बच्चा । ( वीर वाली ( राजस्थान ) । यहाँ एक अद्भुत बच्चेका जन्म हुआ । बच्चेकी बनावट एक राक्षस - जैसी थी । उसके मुहमें दो बड़े-बड़े दाँत बाहर निकले हुए थे, और दाढ़े सारी मौजूद थीं । दोनों ला हाथोंमें सात - सात अंगुलियाँ थीं, और उसका सिर बहुत लम्बा जिला था । मुहमें जीभ नहीं थी । इस अद्भुत तथा भयानक बच्चेकी दर्द हो आकृतिको देखकर घरके लोग भयभीत हो गये । वह बच्चा जन्म पेटमें क लेते ही मर गया ( नवभारत २७ - ९ -६० ) । कर हैर ४ तीन आंखों, दो मुंह वालः बच्चा | स्तान तक दतिया | यहाँ एक काछी परिवार की एक बकरीके ऐसा ग बच्चा उत्पन्न हुआ है, जिसकी तीन आँखें हैं, दो मुख हैं । यह हैं, पर बच्चा २१ फर्वरीको प्रातःकाल उत्पन्न हुआ, तथा अभी तक जीवित पुराणों है । इस विचित्र बच्चे को देखनेके लिए सैंकड़ों व्यक्तियोंकी भीड़ पशुचिकित्सालयमें लगी रहती है ( वीर अर्जुन २५-२-६१ ) । ५ दो सिर, चार हाथ तथा ४ पैर वाले ले जाते पुर बालकका जन्म । घट राँची । पता चला है कि - हजारी बाग़के अस्पतालमें एक नव ग्रामीण महिलाने २ सिर, ४ हाथ तथा ४ पैर वाले लड़केको जन्म राजसे दिया है ( हिन्दुस्तान १२–४–६१ ) । सुप्रसिद्ध ६ गंगापुर में गोकर्णका अवतार | लालवि गंगापुर सिटी । स्थानीय अस्पताल में श्रीरामहेत ड्राइवरकी Gujarat. An eGangotri Initiative
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३५५ ६५६ श्रोसनातनधर्मालोक ( ७ ) पर धर्मपत्नी के गर्भ से १ दिसम्बरको विचित्र बालकका जन्म हुआ, यह जिसके दो सींग और बड़े - बड़े कान और कपाट पर एक विशाल नेत्र था । इस विचित्र बालककी मृत्यु दो घण्टे पश्चात् हो गई ' ( वीर अर्जुन ६–११–६० ) । ७ मर्दके पेट से बच्चा । ना ।बड़े- लायलपुर ( पश्चिमी पाकिस्तान ) के पचास वर्षके वृद्धने नों जिला अस्पतालके सुपरिन्टेण्डेण्टसे शिकायत की कि - मेरे पेटमें म्वा हो रहा है । एक्सरे लिया गया तो मालूम हुआ कि — उसके की पेटमें कोई चीज रेंग रही है । आपरेशन करने पर लोग यह देख कर हैरान हो गये कि उसके पेट से बच्चा निकला ' ( दैनिक - हिन्दु-न्म स्तान १६–२ -- ६० ) । तब पुराणोंमें जो विचित्र उत्पत्तियाँ आई हैं, उनका समाधान सा हो गया । आजकलके मानुषी वायुमण्डलमें ऐसे बच्चे मर जाते यह हैं, पर दैत्य, राक्षस वा देव ऐसी उत्पत्ति वाले - जिनका प्रायः बत पुराणों में वर्णन है -- जीवित रह जाते थे ( सं ० ) । ३ परलोक वा यमराज वा यमदूतोंकी बात । पुराणों में यह मिलता है कि - मरनेके समय जीवको यमदूत ले जाते हैं, यमराजके सामने उपस्थित करते हैं । इस सम्बन्ध की घटना सुनिये -क नवम्बर सन् १६५७ में कानपुरमें श्री स्वामीकरपात्रीजी महा-म राजसे कराए सर्ववैदिकशाखा- सम्मेलनमें पधारे हुए काशीके सुप्रसिद्ध विद्वान् गोयनका संस्कृत - महाविद्यालय के अध्यापक प ० सालबिहारीजी मिश्रने यह घटना सुनाई थी, जो उनसे जाँच की की गई है । CC - 0. Ankur Joshi प्रत्यक्ष घटनाएँ ६५७ पहली घटना सकलडीहास्टेशन ( वाराणसी ) से २५ कोम उत्तर की ओर के प्रभुपुर गाँव में मनिहार जातिकी भाँगरी नामक मुसलिम स्त्री थी । उसके पड़ोसकी एक स्त्री सांघातिक रोग से पीड़ित थी । एक दिन भांगरी उस बीमार स्त्री को देखने के लिए गई । वहीं से लौटकर श्रानेपर उसकी एकदम मृत्यु हो गई, कोई रोग भी उसे नहीं था । एक घंटा प्रतीक्षाके बाद उसे दफनाने की क्रिया प्रारम्भ कर दी गई । ज्योंही उसे कब्रमें दबाने लगे; तो वह एकदम जोवित हो गई । उसके मुखसे कुछ श्रव्यक्त शब्द निकले, हाथ के संकेतसे उसने अपने मुखपर से कपड़ा हटाने के लिए कहा । कपड़ा हटानेपुर लोगोंको यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि- । उसके सिरपर जलनेके तीन निशान लगे हैं । जब भाँगरीसे पूछा गया; तो उसने बताया- मेरे सामने दो व्यक्ति प्राये, मुझे पकड़ कर कहीं दूर ले गये । मैंने देखा वहाँ बड़ी सभा लगी हुई थी, और ऊँचे ग्रासन पर एक तेजस्वी व्यक्ति बैठा हुआ था । उसने मुझे पकड़ लाने वाले दो दूतों को फटकारा कि इसे तुम क्यों ले आये? इसकी तो मृत्यु अभी नहीं थी । इसकी तो आयु १४ वर्ष की और बाकी है । तुम्हें तो हमने इसके पड़ौसकी बीमार स्त्रीको के लिए भेजा था । यह बड़ी पापिन है, जब यह अपनी आँखोंसे दोनों लड़कियोंके मरनेका दुःख लेगी; तब मरेगी । त्रिशूलसे इसके सिरको दाग दो- जिसे यह याद रखे, और पाप न करे । भांगरीकी बताई बातें सत्य सिद्ध हुईं । जब वह जीवित हुई तो ठीक उसी समय उसके पड़ौसकी बीमार स्त्री का भी तुरन्त देहावसान हो गया । अन्य बातें १४ वर्षके मध्यमें पूरी हुई । उस की दोनों लड़कियाँ मरीं, उस दुःखसे वह भी मर गई । हम Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६५८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) लोग भांगरीके गाँवमें गये, और वहाँके मुसलमान मियां रहमान-खां, और गाँवके मुखिया प्रादिके इस घटनाके सम्बन्ध में हस्ताक्षर लिये गये । दूसरी घटना मुरैना ( डाकसे ) । यहाँके एक व्यवसायो विश्वम्भरनाथ ( आयु ७५ वर्ष ) का १६ तारीखको प्रारणान्त हो गया, किन्तु कुछ समय बाद वे फिर जीवित हो उठे । उसी समय एक दूसरे व्यक्ति का देहान्त हो गया । घटना इस प्रकार है कि - १६ ता ० को श्रीविश्वम्भरनाथको दशा बिगड़ने लगो, धीरे - धीरे जोवनके सभी लक्षण उनके शरीर से लुप्त हो गये । नाड़ीकी गति बन्द हो गई, श्वाँस बन्द हो गई । शरीर ठंडा हो गया । कुटुम्बियोंने उन्हें भूमि पर उतार लिया था । उनकी श्मशानयात्राकी तैयारी हो गई । लेकिन प्राघ घण्टे के बाद ही वे अचानक उठ बैठे । आश्चर्यसे पूछने लगे कि-यह सब क्या हो रहा है? और कहा कि कुछ लोगोंने उन्हें आकाशमें उठाकर एक दिव्यपुरुषके सामने रख दिया, जो भैंसेपर आरूढ़ था । उस दिव्यपुरुषने फटकारते हुए कहा कि- इस आदमी को शीघ्र ही पृथिवी पर छोड़कर आओ । मैंने दूसरे व्यक्ति को बुलाया था, इसे नहीं । इसपर वे मुझे छोड़ गये । उन्होंने यह घटना सुनाई ही थी, और लोगों को आश्चर्यं हुआ कि - विश्वम्भरनाथमें चेतना उत्पन्न होनेके ठीक उसी समय नगरके एक दूसरे व्यवसायी श्रीग्यासीराम ( आयु ४० वर्ष ) स्वस्था-वस्था में हृदयकी गति रुक जाने से मर गये । इस घटना की चर्चा नगरके कोने - कोने में हो रही है, ( हिन्दुस्तान २०।१२।५७ ) । ४ पशुपक्षियोंकी व्रत - उपवास आदि को बात जब पुराणोंमें यह आता है कि - हनुमान यादि वानर सग ction प्रत्यक्ष घटनाएँ ६६० ६५६ रामके अनन्य भक्त थे, इसे प्रतिपक्षो मानने को तैयार नहीं किय थे । आज हम पशु - पक्षियोंके व्रत - उपवास रखने की वा होते किया होने की कुछ घटनाएँ रखते हैं- अगल १ व्रत रखने वाला एक कुत्ता उपत्र मेरठके सुप्रसिद्ध श्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीसुखदेवशास्त्रीजीने चार्यन स्वयं देखी हुई घटना सुनाई - है, खण्ड खेंची मेरठ ) में मेरी छोटी बहिन का विवाह था । हमारे मामा भातई के रूप में हमारे घर आये, उनका कुत्ता भी उनके साथ था । उन्होंने सुनाया कि - यह कुत्ता आज व्रत - उपवास रखे हुए है । जब रिगन कन्यादान के बाद हम व्रत खोलेंगे; और कुछ खाएँ - पीएँगे; तभी यह कुत्ता भी अपना व्रत खोलेगा । हमें यह विश्वास न हुआ । हमने हनुम यह परीक्षा करनी चाही । कुत्तेके श्रागे रोटी डाली, पर उसने खाना तो दूर, सुँघा तक नहीं । पीछे हट गया । जब कन्यादान उनक हो गया, भातईयों ने अपना व्रत खोला, खाना खाया, तब कुत्ते की भी भ आगे भी भोजन डाला, तो उसने तुरन्त खाना शुरू किया । यह देखकर हम दाँतों तले अंगुलि दवा गये । मामाजी ने कहा समय भक्ति कि - केवल आज नहीं; यह हर मंगलवारके दिन भी व्रत रखता है, भूलकर भी कुछ नहीं खाता - पीता । थे । दूसरी घटना डोली सन् १ ९ ५ ९ में पिलखुग्रा हमारे स्थानपर आर्यसमाज के महोपदेशक श्रीबलवीरसिंहजी बेधड़क पधारे । उन्होंनें भी ऐसी ( नव घटना सुनाई— श्रार्यसंन्यासी श्रीस्वा ० केवलानन्द जीके निगमाश्रममें मैंने एक ऐसा कुत्ता देखा, जो हर सोमवार के दिन व्रत रखता था । Gujarat. An eGa ण हैरान होते थे कि यह बात कुत्तेको कैसे मालूम हो जाती है
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१६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) EYE कि - ग्राज सोमवार है । उसे सोमवार रोटी खाने का श्राग्रह यदि होते किया भी जाता था; तो उस रोटीको एकान्तमें रख श्राता था; भक्त अगले दिन मंगलवार को खाता था । कई कुत्तोंको चतुर्दशीको उपवास करते हु मीमांसादर्शनके भाष्यकार श्री स्वा ० शबरा-चार्यने भी देखा था । उसका उल्लेख उन्होंने अपने भाष्य में किया जीने है, जिसका आर्यसमाजके श्रीतुलसीराम स्वामीने अज्ञानवश खण्डन करने की चेष्टा की थी । मामा श्री हनुमान भक्त बन्दर था । आगरा । यहाँ प्राप्त एक विश्वस्तसमाचारके अनुसार ग्राम जब रिंगनोदमें पिगला - नदीके किनारे शंकर मन्दिरके पास एक प्राचीन यह हनुमानजी का मन्दिर है । इसमें एक बन्दर ७२ घण्टे तक हनुमान् हमने जीकी सेवा - भक्तिमें लगा रहा । वह हनुमानजीके पैर दबाता; उसने उनको हाथ जोड़ता 1 इस भक्त बानर को देखने सैंकड़ों व्यक्तियों दान की भीड़ एकत्रित हो गई । मन्दिरमें पानी की व्यवस्था करने पर कुत्ते भी भक्त बानर ने नदीमें जाकर पानी पिया । शामको भारतीके या । समय घड़ियाल के बजते ही वानरराज भी तालियाँ बजाता हुआ भक्ति में लीन हो गया । लोगों का कहना है कि - मन्दिरके निकट खता ही एक महात्मा रहते थे, जो हनुमान् जीकी सेवा किया करते थे । वे ही मृत्युके पश्चात् बानररूपमें आकर सेवा कर रहे हैं । बाद में बानर की मृत्यु हो जाने पर जनता द्वारा बैंड बाजेके साथ डोली निकाली गई; बानर के शव को बागमें गाड़ दिया गया । के ऐसी ( नवभारत १५-४-६० ) । भविष्य जानने वाली कुतिया ने प्राण बचाये मैं भरतपुर । स्थानीय विक्टोरिया अस्पतालके निकट एक था । बहुत पुराने मकान निवासीके प्रारण पालतू कुतियाने बचाये । ती है CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. प्रत्यक्ष घटनाएं ६६१ रात्रि के करीब दस बजे वह कुतिया अपने मालिकको भूक भूक कर और उसका दुपट्टा खींच - खींचकर उसे बाहर ग्रानेका इशारा देने लगी: अनेक बार टालने के बाद भी जब वह नहीं हटी; तब मालिक ज्योंही मकानसे बाहर ग्रावा, उसी समय मकानका सारा ऊपरी हिस्सा नोचे या पड़ा, और वह बाल - बाल बच गया । ( नवभारत १६/१२/५६ ) । पशु - पक्षियों को भूकम्पका पूर्व ज्ञान जब सनातनधर्मी बुढ़िया माताएँ कुत्तोंको समयमें भू कते हुए देखती हैं, तो वह उसे प्रसगुन मानती हैं, जिसपर प्रतिपक्षी हंसते हैं । इसपर सुनिये - मई सन् १ ९ ३५ में क्वेटाके जिस भयङ्कर भूकम्प में श्राघे मिनटमें २० हजार व्यक्ति कालकवलित हुए थे, लगता है कि - वहाँ के पशु - पक्षियोंको इसका पूर्व ज्ञान होगया था । डा ० हेनरी हालँडने जो उत्तर - पश्चिम सीमाप्रान्त में मिशनरी थे, उस दैवी प्रकोपके समय केटामें हो अपनी ‘ फ्र ंटियर डाक्टर ' नामक पुस्तक ( १ ९ ५८ ) में लिखा है-' ऐसा प्रतीत होता है कि - पशुओंोंको अपनी सहज अन्तः प्रेरणा द्वारा प्राकृतिक प्रकोपोंका पहलेसेही ज्ञान होजाता है । भूकम्प ग्रानेसे पूर्वकी रातमें नगरके कुत्तोंने सामूहिकरूपसे बड़ी भय बनी आवाजोंमें रोना शुरु कर दिया था [ पक्षी भी तीन दिन पूर्व ही वृक्षोंको छोड़कर चले गये थे - सम्पादक ] | इसी प्रकार हालके अगादीरके भूकम्पके बारेमें प्राप्त समाचारोंमें इस बातका उल्लेख किया गया है कि- भूकम्प ग्रानेके कुछ समय पहलेसे ही नगरके कुत्ते बुरी तरहसे भूकने लगे थे । उनमें जो पालतू थे, वे घरोंकी खिड़कियोंमेंसे कूद - कूदकर बाहर भागने लगे थे; और अस्तबलोंके घोड़े अपने खुरोंको जमीनपर पटकने और जोर - जोर से हिनहिनाने लगे थे, ( धर्मयुग साप्ताहिक बम्बई ७ । ८ । ६० ) । An eGangotri Initiative
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६२ श्रीसनातनधर्मालांक ( ७ ) ५ मन्त्र - शक्ति के चमत्कार पुराणोंमें जब मन्त्रशक्तिके चमत्कारोंकी बातें आती हैं; तो प्रतिपक्षी लोग उन्हें गप्प बताने लगते हैं, और हंसी में उड़ाने लगते हैं । कोई माने वा न माने; पर यह बातें अक्षर - अक्षर सत्य हैं । इसमें निम्न घटनाएँ देखिये -पहली घटना कानपुर ५ जुलाई । मन्त्रद्वारा सर्पविष उतारनेकी क्रियाका अत्यन्त मनोरंजक प्रदर्शन उस समय हुआ, जब सेठ केदारनाथने बर्न कम्पनी के एक मज़दूरके शरीरसे सर्पविष निकाला । ह जाता है कि वह मज़दूर साँप देखते ही प्रायः उसे मार दिया करता था । एक दिन एक काले साँपने उसे काट लिया । उसे तत्काल उक्त सेठके पास पहुँचाया गया । सेठजीने काटने वाले साँपका मन्त्रद्वारा आवाहन किया । मारने का कारण पूछनेपर उसी मज़दूरके माध्यमद्वारा सर्पने बताया कि उसने उसके जोड़ेको मार डाला था, जिसका सर्वने बदला लिया | अनेक धमकियों तथा अनुरो-घपर सर्प अपना विष खींचनेपर तैयार हुआ । विष खींचते हुए मजदूर ठीक हो गया, किन्तु विषकी तीव्रताने उसके मस्तिष्कको विकृत कर दिया था । तब सेठजीने कुछ जड़ी - बूटी खिलाकर उसे स्वस्थ कर दिया । सेठजीका दावा है कि कहीं भी किसीको सांप काटे, तो उसकी शिखामें गाँठ बाँधकर सेठ केदारनाथ लार्डगंज जबलपुरके पते पर तार करना चाहिए । सेठजी वहीं से मन्त्र-शक्ति द्वारा उसे ठीक कर देंगे । ( हिन्दुस्तान ६।७।४४ ) । चांटा मारकर सर्पका विष उतारना मथुरा सदर बाजार थानेके काँस्टेबल पं ० श्री नत्थीलाल मिश्र साँप काटेका इलाज मन्त्र द्वारा बड़े - ग्ररुचर्य जनक से tion प्रत्यक्ष घटनाएँ करते हैं । हमने मथुरा जाकर आपसे भेंट की थी ६६४ जाँच की थी ॥ सांप काटने की खबर लेकर जो, और घटनाको खेतों में पास आता है, आप झटसे उसके मुख पर तीन चांटे भी व्यक्ति आपके बार उ इधर चाँटा लगता है और उधर साँपका काटा मार देते हैं । स्वस्थ हो जाता है | नवभारत टाईम्स ( २६ | ३ | १६५ हुआ आदमी | ज है कि - छातासे टेलीफोन आया कि ९ ) में पा जि लड़केको साँपने काट अमुक प्रादमीके इकलौते हैं; लिया, तो आपने टेलीफोन पर हो चाँटा उसे ए मारा, और बालक स्वस्थ हो गया । बालकके बापने आपको अन्दर पुरस्कार भी देना चाहा, पर आपने नहीं लिया । इस प्रकार सकता हरिद्वार में रहते हुए तो आपने लगभग १०० प्रादमियोंको लगान मारकर अच्छा कर दिया । पूछने पर आपने यह भी बताया चाँटा कि मेरे इष्ट - देव भगवान् श्रीहनुमानजी हैं । उन्होंकी कृपाके प्रभाव महार इस कार्य में सफल हुआ हूँ । २४ घ टिड्डियों को भगाया अंग्रेज उनकी रामगढ़ ( डाकसे ) । इस हफ्ते में रामगढ़ के ऊपर से टिड्डियोंक स्थान दल कई बार गुज़रा, जिसने खेतीको भारी हानि पहुंचाई । कह आप जाता है कि - जब रूकनसर ( रामगढ़ ) में रहने वाले किसान से प वहाँके रहने वाले एक साधुबाबाके यहाँ सहायतार्थ गये । इस चार पर बाबाजीने लड़केसे दो टिड्डियाँ पड़कर मंगाई । उन्हें जलसे अग्नि स्नान कराकर रोलीसे चर्चित करके टिड्डियोंके सामने मन ही मनमें प्रार्थना - सी की और मन्त्र पढ़ा । तदुपरान्त उन्होंने उन पृथ्वी टिड्डियोंको सौंपकर उससे कहा कि - ' तुम दौड़ते हुए जाओ, दिन और इनको गाँत्रकी सीमाके बाहर छोड़ आओ ' । जब वह व्यक्ति ओर दोनों टिड्डियोंको लेकर एक ओर दौड़ गया, तो उस गाँवमें थे जितनी भी टिड्डियाँ पड़ी थीं, वे सभी उस व्यक्तिके पीछे उड़ती बा Gujarat An eGan हुई चली गई । कहा जाता है कि इस दिनके बाद रूकनसरके
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) घटनाको २६३ खेतों ६४ में टिड्डियोंका पड़ाव नहीं हुमा । जब कि उसके ऊपर कई क्ति प्रापके उड़ती चली गई ' ( हिन्दुस्तान ( ११०/५० ) देते हैं बार ६ लम्बी समाधि! । - आदमी जब पुराणोंमें ऋषि - मुनियोंकी भूगर्भसमाधिकी बातें आती में पा जिनके ऊपर मट्टी के ढेर लग जाते थे, तो बहुतसे अविश्वासी इकलौते हैं उसे; एकदम गप्प बताने लग जाते हैं, और कहते हैं कि — पृथ्वोके हो चाँटा अन्दर बिना वायुकें और बिना खाये -पीये कोई जीवित नहीं रह श्रापको सकता; परन्तु इस गये - बीते युगमें भी पृथ्वीके भी भीतर समाधि प्रकार लगाने वाले मौजूद हैं हैं ॥ को चांटा पिछले दिनों देहलीमें योगिराज स्वा ० श्रीरामलखनदासजी या कि महाराजने सेठ रामकृष्ण डालमियाँके प्राग्रह पर पृथ्वीके अन्दर के प्रभाव २४ घण्टे की समाधि लगाकर दिखाई, जिसे अमेरिकन और अंग्रेजोंने भी देखा था । बाद में वे पिलखुआ भी पधारे थे । हमने उनकी समाधिका प्रबन्ध आर्यसमाजके महाशय गिरवर सिंह के पर कराया था, जिससे कोई सन्देह बाकी न रह जावे । य आप स्थान ४५ दिनकी समाधि लगा सकते थे । आपको ऊपर से सीमेंट कह से पाट दिया गया था । योगिराज देवमूर्तिजीको योगके बल पर किसान चार कारें एक साथ रोकते हुए, छाती पर हाथी खड़ा करते हुए इस अग्नि पर चलते हुए हमने स्वयं देखा था । जलसे एक योगिराजको सन् १ ९ ६० में एक शहर में १४ दिनकी मन ही अन्दर समाधि लगाते हुए हमने देखा था । उन्होंने १४ ने उन पृथ्वीके तक खाया - पीया नहीं था, न वायु जानेको जगह थी । चारों जाओ, दिन से बन्द कर दिये गए थे । वे छः मासकी समाधि लगा सकते व्यक्ति ओर हमारे स्थान पर भी पधारे थे । हमने स्वयं जाकर इस गाँवमें थे । आप कोई चालाकी तो नहीं है । प्रतीत उड़ती बात की पूरी जाँच की कि हुया कि कोई धोखे - बाज़ी नहीं थी; १४ दिन बृगृह, योगासन सनातन- Collection सर प्रत्यक्ष घटनाएँ २६५ योगिराज की समाधि धर्मकी जयके नारे लगाते हुए सकुशल निकल ग्राए, उन्हें किली प्रकारकी भी हानि नहीं हुई । ७. १३ गज लम्बे पुरुषका अस्थिपिंजर । गत दिनों श्रीबिनोवा भावेजीने कहा था - जिस रामायण में रावरणके दस सिर बीस भुजा होनेकी बातें लिखी हैं, और कुम्भ-कर्णको पर्वताकार लिखा है, वह ग्रन्थ कैसे माना जा सकता है, उसमें संशोधन होना चाहिये । हम आपके सामने दैनिक हिन्दु-स्तान ( ३० अगस्त १ ९ ४१ ) देहली में छपी घटना रखते हैं, पाठक उसे ध्यान से पढ़ें-देहली के एक गाँव में खुदाई करते समय एक अस्थिपंजर मिला है, जिसके सम्बन्ध में यह ख्याल किया जाता है कि यह Gujarat. An मला जसक
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ७ ) ६६६ प्राचीनकालके किसी व्यक्तिका है । इसकी कुछ हड्डियां देहली अधिकारियोंके पास लाई गई हैं, जिससे इस मनुष्यके डीलडौल लगाया जा सके । बयान किया जाता है कि यह का अनुमान गज लम्बा है । इसकी खोपड़ी धोबियोंके कपड़े धोनेके पंजर १३ कू डेके बराबर है । और आँखोंकी खाली जगह श्रीसतन मनुष्यकी समान है । इसकी नाकके सुराख इतने चौड़े बताये खोपड़ीके आदमीकी मुट्ठी बन्द होकर इसमें जा जाते हैं कि — श्राजकलके से लेकर टकने सकती है । इसके दांत ८-६ इंच लम्बे हैं । घुटने पिण्डलीकी हड्डी दो गज़के बराबर है । इसकी छाती ५ तकको जाती है । इस पंजरके बाकी हिस्सोंकी तलाश करके गज्र बताई विभागके विशेषज्ञको रायके लिए केन्द्रिय सरकारके अनुसन्धान सोचा जा रहा है । जाता है कि - तिलो -अस्थिपंजर मिलने के विषयमें बताया थाना महरौली में एक भट्ठ े के लिए जमीन खोदी जा कड़ी रही थी बदरपुर , जबकि भजदूरोंको जमीनके अन्दर दबा हुआ यह मुकम्मल ढाँचा मिला, परन्तु उन्होंने उसे तोड़ डाला; हड्डियोंके टुकड़े फेंक दिए । पर गाँवके लोगोंको पता चलने पर इसमें दिलचस्पी हुई, और वे कुछ हड्डियाँ उठाकर ले गए । कुछ हड्डियाँ पुलिस तक भी पहुँचीं । मामला जब अधिकारियोंके नोटिसमें प्राया; तो उन्होंने इस पर अफसोस प्रकट किया कि ऐसी महत्त्वपूर्ण वस्तुको इस प्रकार खराब कर दिया गया, और हुक्म दिया गया कि — इसके जितने भी हिस्से मिल सकें, लाये जायँ ' । हमने स्वयं क्या देखा खेड़ाके वैद्य मुन्शीलालजी उन दिनों हमारी CC - 0 बिलडिंगमें . Ankur Joshi लड़के Collection प्रत्यक्ष घटनाएँ पढ़ाया करते थे । वे तिलोकड़ीसे अपने साथ पंजरका ६६७ उठा लाये थे, उसे हमारे सामने तोलकर देखा, तो एक एक दाँत ११ ॥ छटाँकका था । पिलखुग्राके पासके डूहरी ग्रामके रहने वाले शतवर्षीय सूबेदार मेजर श्रीजसवन्तसिजी तथा भूतपूर्व तहसील- वा दार डा ० श्री शम्भुसिंहजीने इस बातसे विस्मित होकर उन करनी चाही, और वैद्य मुन्शीलालजीका बयान लिया । उन्होंने ऊपरका वृत्त सुनाया, और दाँतोंके विषयमें यह कहा कि - एक का दांत १४॥ छटाँकका था, जो मेरेसे टूटने पर ११ ॥ छटाँकका रह गया था, और दूसरा दाँत १। सेरका था, उसे इकला वाले ज फकीर जाति वालेका दामाद ले गया था । मैंने अपने पास वाला दाँत पुलिसको दिया; जो उसे लेने आई थी । दूसरी चीजें भी उस पंजरकी ढूंढकर उपरोक्त पूरा ढाँचा तैयार किया गया । चित्रमें द गी प्र ल वैद्य मुन्शीलालजो हाथके संकेतसे बना रहे हैं वि - १३ गज लम्बे मनुष्यकी आँखें, मनुष्यकी खोपड़ीके बराबर थी । Gujarat An eGangotri Initiative