सनातन धर्मालोक ७ — पृष्ठ 501–510
सनातन धर्मालोक ७ · पृष्ठ 501–510
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६६७ श्रीसनातनधर्मालाक ( ७ ) दाँ ६६८ दाँत जो लोग पुराण में ग्राई मनुष्योंके बड़े आकार वाले होनेकी वाले बातें गप्प बताते हैं, उन्हें इस शक्तिमय - समयके आकार देखकर नील- उन दिनोंके बड़े कद्दकी सत्यता का अनुमान कर लेना चाहिए । तब जांच जो बिनोवाभावेजी प्रादि एतदादिक - विषयमें अपना सन्देह प्रकट न्होंने करते हैं, इससे वे अपनी बुद्धिको कूपमण्डूकता सिद्ध करते हैं । अब यह सप्तम पुष्प बहुत बड़ा हो जानेसे समाप्त किया रह जाता है । अष्टम पुष्प भी छप गया है, पाठकगण इन दोनों वाले पुष्पों को मंगा लें । ला इति पूज्यश्री पं ० शीतललालशर्म - श्रीगौरीदेवी तनुजनुषा, उस देहली ( दरीबा कलाँ ) स्थ संस्कृतमहाविद्यालयाध्यक्षेण विद्यावा-में गोश, विद्याभूषण श्री दीनानाथशर्मं शास्त्रिसारस्वत विद्यानिधिना प्ररणोतस्य ‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' संस्कृतमहाग्रन्थस्य हिन्दी ग्रन्थमा -लायाँ सप्तमसुमनोविकासः सम्पूर्णः । संशोधन - पृ ० पं ० ७०५-५ शरीर । ७११-१६ अन्य । ७१३-२२ हूयतां । ७२० ३ ऐन्द्र । ७५८- १८ पैप्पलाद । ७५६-१७ नेष्ये * ७६०-२२ वाज । ८२३ - १८ बघ्नन्ति । ८१६-५ श्रमाँसाशी । ६ श्रुतिः । भार्यां! ८१८ - १२ व्याख्यान । १६ मन्त्रभाग । ८२५-१७ वेदधर्मं । ८२७-१५ शेषसा, शेषस् । ८३०-११ प्रतिपक्षी । ८३४-२१ धर्मं । ८३६-१० नैनं । २५ भाभीका । ८३७-२१ यह । ८३८-६ समानाधिकार । ८५१-१३ असभ्य । ८५२-१६ सम्प्रदाय | ८५-२६ तच्च । ८६२ - १२ भाष्यकार । ८६४-१ ऽनागता - ८७०-७, २६ भाष्य । १३ अशूद्रारणा । ८७३ - ३ धर्मिरणः । १६ त्रयारणाँ । ८७६-१४ स्वामी । १७ भीतर के परमाणु । ८६७-७ स्वा ० द ० । वे ९ ०२ - १ प्रतिपक्षी । २५ तिर्यग् । • ६२३-१६ आर्यं । ४२-२० तेजस्वियों । CC - 0. Ankur Joshi Collection ' परिचय ' एवं ' प्रेरणा ' विद्यावागीश श्रीदीनानाथशास्त्री ‘ श्रीसनातनधर्मालोक’महाग्रन्थ सारस्वतमहोदयद्वारा प्रणीत है । यह हिन्दुधर्मके प्राचीन संस्कृतमें १० हजार पृष्ठों में लिखित लिखा गया है, अतः यह ' हिन्दुधर्मका प्रर्वाचीन साहित्यारविको मथकर महाभारत ' सिद्ध हो सकता विश्वकोष एवं ' स ०६० का छप रही है । इसे १००० है । अव इसकी ग्रन्थमाला हिन्दी में चित्र छपेगा, आपका ) देकर इसके संरक्षक बनें, आपका ५०० ) देकर इसके नाम प्रत्येक प्रकाशनमें छपेगा । अथवा सहायक बनिये ' सम्मान्य- सहायक ' वा २५० ) देकर मान्य-सहायक । अथवा न्यूनसे न्यून १०० ) देकर इसके साबाररण बनिये । इस प्रकार आपके सहयोगसे ' आलोक ' ग्रन्थ-माला शीघ्र प्रकाशित होकर भ्रान्त - जनोंकी वार्मिक दूर करने वाली सिद्ध हो सकेगी । - शङ्काओंको अब तक इसके ८ पुष्प छप चुके हैं । विद्वानों एवं गुणज्ञोने इस ग्रन्थमालासे अपना पूर्ण - परितोष व्यक्त किया है । आप स्वयं इस ग्रन्थमालाको खरीदें, तथा दूसरों को भी इसके भी के लिए प्रेरित करें । सभी शङ्काएं मिटेंगी, और मंगाने होगी | आपका रुपया केवल इस ग्रन्थमालाके धर्म- सेवा भी लगेगा । प्रकाशनमें ही इसके कम से कम १२-१३ पुष्प भी प्रकाशित होजाएं, उनमें भी आपको स ० ध ० की पर्याप्त सुगन्ध मिल शीघ्रता से इसकी सहायतार्थ उद्यत सकेगी । अतः धार्मिक नवजीवन हों । इससे हिन्दु - जातिको प्राप्त होगा । ग्राज ही ग्रन्थकारके नामसे श्राप सहायताद्रव्य शीघ्र ही भेजना शुरू कर दें 1 । निवेदक-श्रीनारायण शर्मा शास्त्री सारस्वत ' राजीव ' ( एम. ए. ) फर्स्ट बी ० १६ लाजपतनगर ( नई देहली १४ ) Gujarat. An eGangotri Initiative
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* ' श्रीसनातनधर्मांलोक ' ग्रन्थमालाका परिचय * प्रणेता - पं ० दीनानाथ शास्त्री सारस्वत विद्यावागीश ( प्रिंसिपल - संस्कृत महाविद्यालय, दरीबाकलाँ, देहली -६ ) इस ग्रन्थमालाको १००० ) देने वाले इसके संरक्षक माने जाते हैं, उनका चित्र छपता है, प्रत्येक प्रकाशनमें उनका नाम छपता है । ५०० ) प्रदाता इसके सम्मान्य- सहायक, २५० ) दाता मान्य - सहायक और १०० ) देने वाले साधारण - सहायक माने जाते हैं । इसके प्रकाशित पुष्पों का परिचय दिया जा रहा है । पाठकगरण इसका जनतामें प्रचार करें । जो महोदय स्थायि ग्राहकताका शुल्क ५ ) पाँच रुपये पूर्व जमा करायेंगे, उन्हें सब पुष्प पौने मूल्य में दिये जाएंगे । प्रथम - द्वितीय पुष्प - ( परिवर्धित - द्वितीयावृत्ति ) आजकल ' नमस्ते'-शव्दका प्रचार संस्कृतानभिज्ञ - जनता में बहुत हो गया है; और इसके प्रचारक इसका वैदिक होनेका दावा करते हैं । बहुत से विद्वानोंका इधर ध्यान गया, और उन्होंने हमें प्रेरणा की कि -' आलोक ' ग्रन्थमालाके किसी पुष्पमें इस पर भी विचार दिया जाय । हमने प्रथम - द्वितीय पुष्पमें इस पर थोड़ा सा विचार दिया भी था; पर बहुत महोदयोंने कहा कि इस पर विस्तीर्णं विचार दिया जाय । इधर उन दो पुष्पोंकी प्रश्नमावृत्ति समाप्त भी हो गई थी । तव प्रथम दो - पुष्पोंको इकट्ठा करके हमने इसमें ‘ नमस्ते ' CC - 0. Ankur Joshi Collection ( इ ) विषय पर विस्तीर्ण विचार दिया है । ' नमस्ते ' विषयक जितने मिल सके, उन पर आलोचना पुष्प सुन्दर - कागज तथा सुवाच्य - टाइपमें में ‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' महाग्रन्थ की उसपर विद्वानोंके भाव भी दिये गये हैं सजिल्द एवं सुन्दर पुस्तकका मूल्य चार भी ट्रैक्ट हमें मृतक कर दी है । यह दो वैदिक छपवाये हैं । प्रारम्भ विद्वान संपूर्ण विषय - सूची तथा सम्बन । साढे तीन सौ पृष्ठोंकी परव रुपये 1 ५०० तृतीय पुष्प - इसमें स्त्री - शूद्रों के वेदाधिकार पर विचार मूल्य ४ ) करते पृष्ठो हुए ' यथेमाँ वाचं कल्याणी ' मन्त्रके वर्तमान - प्रचलित अर्थ की संस्क आलोचना करके उसका वास्तविक अर्थ, हारीतकी ब्रह्मवादिनी, ‘ गोभिलसूत्र ' के ‘ यज्ञोपवीतिनीं ' पदका रहस्य, ' दुहिता मे पण्डिता १०८ जायेत ', ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ', ' ब्रह्मचर्येण कन्या, पञ्चजना अने मम होत्रं जुषध्वम् ' आदि बहुतसे प्रमाणोंके वास्तविक अर्थ आ बताकर, ऐतरेय - महिदास, कवष - ऐलूष, कक्षीर्वान्, सत्यकाम- होल जाबाल, सूत, वाल्मीकि, शबरी आदि शूद्र थे वा अशूद्र - इस पर गए विचार किया गया है । इसकी प्रथमावृत्ति समाप्तप्राय है । इसे भा ' अभी - अभी मंगा लें, द्वितीयावृत्ति छपना प्रारम्भ होने पर इसका जा मूल्य बढ़ जायगा । शीघ्र मिल भी नहीं सकेगी । सा सजिल्द मूल्य ३ || ) चतुर्थं पुष्प — इसमें हिन्दु - शब्दकी वैदिकता, वेद - विषयमें है । भारी भूल, महाभाष्यकार के मत में वेदका स्वरूप, वर्ण - व्यवस्था क Gujards. An eGal गुण - कर्मासे है, वा जन्मसे, डा ० भगवानुदासजीके मतपर विचार,
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( ई ) ट्रैक्ट में मृतश्राद्ध तथा मृतक पितरोंका टाइमटेबल, उसमें ब्राह्मण भोजन यह दो वैदिक है वा वैदिक, मूर्तिपूजा एवं अवतारवादका रहस्य, क्या प्रारम्भ विद्वान् मनुष्य ही देव हैं, नवग्रहोंके प्रचलित मन्त्रों का ग्रहों से तथा सम्बन्ध कैसे है, ग्रहरण और उसका सूतक - इत्यादि अनेकों विषयों ष्ठोंकी पर बड़े सुन्दर विचार दिये गये हैं । पाठक इसे शीघ्र मंगावें । ५०० पृष्ठसे अधिक - पृष्ठकी सजिल्द सुन्दर पुस्तकका मूल्य ६ ) है । ल्य ४ ) पंचम पुष्प - यह बहुत ही सुन्दर कागज तथा सुन्दर - टाइपमें ५० र करते पृष्ठों में छपा है । इसमें हिन्दुधर्म के मुख्य विषय चोटी - जनेऊ, १६-की संस्कार, सन्ध्याके सभी अङ्गों पर विचार, मालाकी मरियों की दिनी, १०८ संख्या क्यों?, यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व क्या है - इत्यादि इण्डिता अनेकों विषयों पर विचार करके प्रातः से रात्रि - शयन तकके चजना आचारोंकी वैज्ञानिकता बताई गई है । इसके बाद दीपमाला, होली आदि वर्ष के प्रसिद्ध पर्वोके वैज्ञानिक रहस्य बताकर, श्री-काम- गणेशका वैदिक देवत्व तथा श्रोमहीधर के ' गणानां त्वा ' मन्त्रके स पर भाष्य पर - जिसपर प्रतिपक्षियोंकी ओरसे घोर - शोर मचाया । इसे जाता है— विचार करके, ओङ्कारका महत्त्व बताया गया है । इस इसकी में १२५ विषयों पर सुन्दर विचार दिये गये हैं । इस सुन्दर एवं १० ) सजिल्द पुस्तकका मूल्य-३॥ ) सुन्दर पुस्तक ६५० से अधिक पृष्ठोंमें छपी षष्ठ पुष्प —यह युक्ति - प्रमाणद्वारा साघित यमें है । इसमें हिन्दुधर्मके विविध विषय चस्था किये गये हैं? इसमें सनातन धर्मका तथा वेदका स्वरूप दिखलाते चार, प्रवेदत्व पर किये जाने वाले तर्कों पर हुए ब्राह्मणभागके CC - 0. Ankur Joshi Collection ( उ ) युक्ति प्रमाण द्वारा विचार करके, वैदाधिकारिविचार, देव-मन्दिरोंमें अन्त्यज- प्रवेश पर वैदिक दृष्टि ' दिखलाकर ' ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ' मानसकी इस प्रसिद्ध चौपाईके विविध अर्थ तथा उनकी आलोचना की गई है । फिर ' क्या प्राचीन - भारतमें गोवध होता था ' इस विषय पर दिये जाते हुए वेद - पुराणोंके प्रमाणोंपर १६ विषयों में विचार किया गया है । इसके बाद ' क्या पुराणोंमें वेद - विरुद्ध अ ंश है? ' इस पर विचारते हुए वृन्दाका पतिव्रतभङ्ग, चन्द्रमाका गुरुपत्नीगमन, अगस्त्यऋषिका समुद्रपान, स्त्री से पुरष, पुरुषसे स्त्री आदि बहुतसे विषयों पर विचार कर श्रीकृष्ण के बाल्यचरित्र एवं राधा - कृष्ण के परस्पर - सम्बन्ध तथा कुब्जा आदि के विषयमें पूर्ण - मीमांसा की गई है, और पुराणोंकी शङ्कित कथाओं पर प्रत्यक्ष अखबारी घटनाएं दी गई हैं । इसके बाद सैद्धान्तिक चर्चामें वर्णव्यवस्थाके विषयमें ब्राह्मणोऽस्य मुखमा-सीत् ' के अर्थ पर किये जाते हुए तर्कों पर विचार करते हुए ' ब्राह्मणादि क्या वर्णं नहीं हैं इस पर तथा ' चातुर्वण्यं मया सृष्ट गुणकर्मविभागशः ' पर भी विचार करके पुस्तक समाप्त कर दी गई है । यह पुस्तक विद्वानों तथा जिज्ञासुनोंके लिए प्रत्यन्त उपकारक सिद्ध होगी । इसको वादी - प्रतिवादी दोनोंको ही शीघ्र मंगाना चाहिए । सजिल्द मूल्य - १० ) सप्तम पुष्प-- इसमें पौराणिकचरित्र - पर्यालोचन तथा ' पुराण-परिचय ' का परिचय विस्तीर्णरूपसे बताकर एक पूर्वपक्षीके ३१ प्रश्नों सर्वाङ्गीण उत्तर देकर पुराण - सम्बन्धी अनेक आक्षेपोंके परिहार Gujarat. An eGangotri Initiative
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( ऊ ) दिये गये हैं । फिर अवतारसम्बन्धी १६ कुतर्कोको काटकर, विविध २१ आक्षेपोंका प्रत्युत्तर दिया गया है । इसके बाद क्या गणेश तथा रुद्र अग्नि हैं- इसपर विचार करके सत्यनारायणव्रत-कथापर किये ज ते हुए आक्षेपों पर प्रत्युत्तर देकर श्रीसीता - राम की वैवाहिक आयु तथा द्रौपदीका एक पति था या पाँच - इत्यादि परं विस्तीर्ण विचार दिया गया है । वेदचर्चामें वेदस्वरूपनिरूपण बताते हुए ' वेदसंज्ञाविमर्श, चुनौतीका उत्तर, नीरक्षीरविवेक, विष्णुपुराणकी आलोचना ' आदिपर लिखा गया है । इस प्रकार इस पुष्पमें २० के लगभग प्रतिपक्षियोंके ट्रैक्टोंपर आलोचना दी गई है । इस एक ही पुस्तक से प्रापको पुराणोंके सम्बन्धमें पचासों प्रश्नों का समाधान प्राप्त होगा । परिशिष्टमें पुराणोंको सिद्ध करने वाला प्रत्यक्ष घटनाएँ भी दिखाई गई हैं । यह १००० पृष्ठों में छपी पुस्तक सभीकेलिए संग्राह्य है । मूल्य १० ) । अष्टम पुष्प — इसमें वेदस्वरूपनिरूपणं, स्त्री - शूद्रोंका वेदाधि-कार विचार, क्या वेदमें केवल यौगिक्ता है? वेदार्थके साधन, क्या गीता वेदखण्डक है? वेदमन्त्रहत्याका दिग्दर्शन आदि विषयोंपर विस्तीर्ण विचार रखकर वर्णव्यवस्थाके सम्बन्धमें दिये जाने वाले सब प्रमारणोंपर आलोचना करके क्या गुणकर्मा-नुसार वर्णव्यवस्था चल सकती है - यह दिखलाकर श्रार्यं - समाज का श्राद्ध एवं यमराज, नियोग में मैथुन होता है या नहीं, क्या सायाचार्य विधवाविवाह मानते थे- यह स्पष्ट करके नियोग वा विधवाविवाहपर दिये जाते हुए सभी प्रसिद्ध सत्रों G संस्कृत on ( ए ) करके यमयमीसूक्त, ' क्लीबे च पतितेपतौ ' में ' पती • दिखलाकर तलाकपर भी विचार दिखलाया है या अपतो यह में अष्टग्रहीयोगपर तथा गया है " । परिशिष्ट । आव भी दिखलाई नमस्तेपर विचार करके प्रत्यक्ष घटनाएँ मान गई हैं । ८०० से अधिक पृष्ठको सजिल्द की पुस्तक का मूल्य ८ रु ० ५० पै ० है | एवं सुन्दर पुरु नवम पुष्प - की रूपरेखा भी दी जा रही है- इसमें वेद का वेददोहन रहस्य, द्वैतवाद एवं अद्वैतवादका का प्रमाणमें सामञ्जस्य, तर्क और कौन मान्यतर है - यह विषय श्राये हैं । फिर सिद्धान्तचर्चा- आ में - वर्णव्यवस्था जन्म से है, गुरणकर्मसे वर्णव्यवस्थामें वि है, मृतकश्राद्ध तथा उसमें क्या हानि श भ्रान्तिनिवारण, मूर्तिपूजाविषयक-संवाद, साम्यवादविषयकसंवाद, भारतीय नारी ( आक्षेपपरिहार स्त्रियोंकी आवरणप्रथामें ), वेदादिशास्त्रोंका मत, स्त्रीविवाह - वय-पर विचार, बाल्यविवाहपर विचार स्वा ० दयानन्दीयनियोग-निरीक्षण - संन्यासाश्रमकी प्राचीनता वा शास्त्रीयता, भूतप्र ेत-पिशाचादि को सिद्धि, हिन्दुओं का आदि स्थान भारतवर्षं, क्या रामायण महाभारतसे अर्वाचीन है? क्या हनुमानादि मनुष्य थे? इन विषयोंपर विचार दिया जायगा । पुराणचर्चामें पर्वतोंके पंख और उनका काटना - वैदिक, पुराणोक्त दीर्घं श्रायुमें वेद की साक्षी । असम्भव शब्द कूपमण्डूकोंके कोषमें. प्रकृतिके नियम सामान्यशास्त्र, स्थूल मैथुनके बिना भी सन्तान, विचित्र उत्पत्तियाँ, विष्णुकमलोद्भ तत्वं श्रादिपर विचार, रक्तबीजके रक्तसे असुरोंकी उत्पत्ति, नारद श्रादिका श्राकाशमें जाना - उतरना । Gujarat. An eGangotri Initiative
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( ऐ ) तो यह आकाशमें आकाशगंगा आदिकी स्थिति, एकसे अधिक मुख, हनु-रिशिष्ट सूर्यको पकड़ना, समुद्रमें पत्थरोंका तैरना, क्या कुम्भ घटनाएँ मान्का निद्रा असम्भव है? बृढेको जवानी देना, मरे हुएका संजीवन, सुन्दर की दीर्घ आकार, दीर्घजीवनमें उपपत्ति, अन्तर्द्धानसिद्धि, सूर्य पुरुषोंका और अस्त्रका परावर्तन । बिना देखे भी युद्ध आदि-का ढक देना १४ सूत्र । चर्चा में का वृत्तज्ञान और भविष्यत्का ज्ञान । शिवडमरूसे और श्राग्नेय, वायव्य, सम्मोहन आदि अस्त्र । गोवर्धनपर्वतके उठानेपर चर्चा- विचार, समुद्र - मंथन | देवताओंकी बहुत शरीर तथा दूसरोंके हानि I शरीर बना लेने में शक्ति आदि बहुतसे विषय होंगे । ग्रन्थकारके नाम एवं पतेसे शीघ्रता से त्रयक- आज ही सहायताद्रव्य हार ), भेजना शुरू कर दें । इन पुष्पोंको शीघ्र मंगाकर अपना सेट पूरा इ - वय- कर लें । इनमें सप्तम और अष्टम पुष्प अभी - अभी छपे हैं । योग- पुस्तकोंके मंगाने वो पत्र - व्यवहारका पता -त्रेत ' राजीव ' सारस्वत शास्त्री, प्रभाकर ( एम ० ए ० ) श्रीनारायणशर्मा क्या फर्स्ट बी ० १ ९ लाजपतनगर ( नई देहली १४ ) नुष्य र्चा में FG यम यां, TI CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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