सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 1–10

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 1–10

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सनातन धर्भासोड - ४ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative.

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' श्रालोक ' - प्रन्थमालाका अष्टम सुमन संरक्षक - श्री पं ० मुरारिलालजी, मेहता, कलकत्ता रायसाहब चौधरी श्रीप्रतापसिंहजी रईस, करनाल सनातनधर्मका विश्वकोष एवं महाभारत श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) अखण्डानन्द पुस्तकालय श्री ( सनातन हिन्दुधर्मके प्रसिद्ध विषय संख्या ) १६४ " • लोकहित विषय-प्रणेता- प्रन्यास पं ० दीनानाथशर्मा शास्त्री सारस्वत विद्यावागीदा, विद्याभूषण, विद्यानिधि [ भूतपूर्व प्रिंसिपल स.ध. संस्कृत कालेज, मुलतान ] प्रिंसिपल संस्कृत महाविद्यालय, रामदल, दरीबाकलां, देहली -६ ( सम्पादक ' सिद्धान्त ' ( काशी ) और सारस्वत समाज ( देहली ) प्रकाशक श्रीनारायणशर्मा ' राजीव ' सारस्वत, शास्त्री, प्रभाकर, एम.ए. ( द्वि. ) ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमाला कार्यालय फर्स्ट बी. १६ लाजपतनगर, नई देहली १४ विजयदशमी ] सं. २०१६ [ मूल्य ८ रु. ५० पै. विदेशों में १० ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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प्रकाशक-श्रीनारायणशर्मा ' राजीव ' शास्त्री, सारस्वत, प्रभाकर एम.ए. ( द्वि. ) श्रीसनातनधर्मालोक कार्यालय फर्स्ट बी ० १६, लाजपतनगर, नई देहली १४ प्रथम संस्करण सन् १ ९ ६२ ( ई ० ) मूल्य आठ रु ० पचास पैसे, विदेशोंमें दश रुपये । मुद्रक--जमना प्रिंटिंग वर्क्स पीपल महादेव देहली । CC - 0. Ankur Joshi Collection आरम्भिक शब्द ( ८ ) माला ' अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूज्यते यः सुरासुरैः । तथा सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ ' दयामय भगवान् की असीम कृपा तथा दानी महानुभावोंके की सहयोग, पितरों एवं गुरुजनोंके शुभाशीर्वाद, और शुभचिन्तकोंकी सेठ - स सद्भावनासे ' आलोक ' ग्रन्थमालाका यह अष्टम - सुमन, विकसित वे इध हो रहा है । अपने ही हिन्दुधर्मपर अपने ही कई महाशयोंके आश आक्रमण होते रहे हैं, और हो रहे हैं, उनके आक्रमणोंको विफल चाहि कर देना इस ग्रन्थमालाका प्रधान उद्देश्य रहा है । यद्यपि युग आज अज्ञानान्धकारके प्रसारक उन्हीं महाशयोंके बोधा खण्डक - कुसाहित्यके अतिशयित दुष्प्रचारवश पूर्वसे मुख मोड़कर ग्रन्थम पश्चिमकी ओर तीव्रगतिसे जा रहा है; तथापि हम प्राचीन श्री १ शास्त्रोंके निष्कर्षरूप इस ग्रन्थमाला के चमकदार पुष्पोंका आलोक बने ह रखते हुए उस युगानुधावननिरत जनताको फिर पूर्व की ओर महार लानेका प्रयत्न कर रहे हैं । इसमें जो सज्जन हमें सहयोग दे स्वा ० रहे हैं, उन्हें केवल धन्यवाद तथा शुभाशंसा के अतिरिक्त हम वार और क्या दे सकते हैं? इसे देखकर अन्य भी विद्वान् यदि धीश्वर अपने सनातनधर्ममण्डल नव - साहित्यकी सृष्टि करने लग जाएँ, हैं, तब हम इसमें अपनी सफलता समझेंगे । हैं । ' श्रीसनातनधर्मालोक ' मूलग्रन्थ संस्कृत में और १० सहस्र रहेंगे फुलिस्केप पृष्ठों में है; उसीका हम ग्रन्थमालाके रूपमें हिन्दीमें इस ब प्रकाशन कर रहे हैं । अबतक हिन्दी में इसके पौने पाँच हज़ार के नन्दव लगभग पृष्ठ छप चुके हैं । यह उसका अष्टम - पुष्प है । हम इस भी स arat. An eGangotri Initiative

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[ ख ] मालाके प्रचारार्थ आजकल के अनुसार प्रोपेगण्डा नहीं कर रहे; तथापि मन्थरगति से सही, यह कुछ प्रगति कर रही है । इस ज्ञानयज्ञ में आहुति प्रायः सन्त महन्त एवं पण्डित लोगों-अनुभावोंके की ओरसे पड़ रही है । इसका यजमान तो बनना चाहिये था-चिन्तकों की सेठ साहूकारोंको; परन्तु उनका भाग अभी बहुत न्यून है । यदि विकसित वे इधर ध्यान दें; तो इस मालाकी पूर्णतामें देरी लगे ही नहीं; महाशयों के आशा है उनका इधर ध्यान पड़ेगा । प्रेरकोंको इधर ध्यान देना को विफल चाहिये । यह केवल हमारा कार्य नहीं है, यह सबका है । इस पुष्पमें जगद्गुरु - शङ्कराचार्य श्री १००८ स्वा ० कृष्ण-हाशयोंके बोधाश्रमजी महाराज पूर्व की भांति सहायक बने हैं । उन्हें इस व मोड़कर ग्रन्थमालाका बड़ा ध्यान रहता है । महामण्डलेश्वर स्वामी प्राचीन श्री १००८ गंगेश्वरानन्दजी महाराज इस बार भी इसके सहायक आलोक बने हैं । बल्कि उन्होंने ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी सर्वानन्दजी की ओर महाराजकी ओर से भी १०० ) प्रदान किये हैं । इससे उनका योग दे स्वा ० सर्वानन्द जीके प्रति अगाध प्रेम प्रस्फुटित होता है । इस रिक्त हम वार अष्टमपुष्पके जगद्गुरु श्रीमन्मध्वाचार्य भण्डारकेरि मठा-यदि धीश्वर श्रीविद्यामान्यतीर्थ स्वामीजी महाराज भी सहायक बने जाएँ, हैं, आप मा सम्प्रदायके सम्मान्य नेता और परिनिष्ठित विद्वान् हैं । आशा है आप आगे भी इस ग्रन्थमालाके सहायक बनते ० सहस्र रहेंगे । स्वामी १००८ श्रीवैष्णवाचार्य महाराज दरबार पिण्डोरी हिन्दी में इस बार भी इसके सहायक बने हैं । इस वार स्वा ० अनुमवा-हज़ार नन्दजी शास्त्री तथा श्रीयशः पालजी शास्त्री बी. एस. सी. ( नर्स ) हम इस भी सहायक बने हैं । श्री पं ० मथुराप्रसादजी चतुर्वेदी शिक्षक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. [ ग ] आरौन ( गुना ) भी इस बार इसके सहायक बने हैं; आपका ग्रन्थमालासे बहुत प्रेम है - आशा है आप आगे भी इसके सहायक बनते रहेंगे । इस वार परमहंस स्वामी श्री १०८ वामदेव-जी महाराज भी इस ग्रन्थमालांक सहायक बने हैं । आपमें सनातनधर्मकेलिए दृढ निष्ठा है । आशा है - आगे भी आप इस · ग्रन्थमालाके सहायक बनते रहेंगे । इस बार श्रीस्वामी मुनीश्वरा-नन्दजी महाराज ( खपड़िया बाबा ) जो सङ्कीर्तन प्रणालीकं प्रारण हैं; जिन्होंने कई विद्यालय भी खुलवा रखे हैं, इसके सहायक बने हैं; उनका भी इस ग्रन्थमालासे उत्कट प्रेम बना हुआ है । श्री कन्हैयालालजी भेड़ा वैद्यराज बम्बई भी ग्रन्थमालाकी ओर बहुत ध्यान देते हैं । अर्थदाता श्री सेठ छोटेलालजी कानौडिया ( कलकत्ता ) आदि बने हैं, उनका नाम अन्तिम टाइटिल पर लिख दिया गया है । इन सबको धन्यवाद देते हुए हम अन्य महोदयों को भी प्रेरित करते हैं कि - वे भी अपनी शुद्ध कमाईका भाग इसमें अर्पित करें, जिससे यह ग्रन्थमाला पूर्ण हो जावे । पूर्ण हो जाने पर फिर इसे विषयानुसार पृथक - पृथक ग्रन्थोंमें प्रकाशित किया जावेगा । अमूल्य कोई भी न ले । यह ध्यान रहे कि इस ग्रन्थमालाको जो भी सहायता-द्रव्य वा बिक्री का द्रव्य प्राप्त होता है, वह सब आगेके पुष्पोंके प्रकाशनार्थ जमा कर लिया जाता है । उसका एक भी पैसा हम अपने काममें नहीं लगाते । यदि कोई महोदय इसको अधिक An eGangotri Initiative

पृष्ठ 10

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[ घ ] सहायता न दे सकें; तो इन ग्रन्थोंको बिना मूल्य न लें । ग्रन्थका मूल्य अवश्य दें । इसके संरक्षकका १००० ) नियत है । संरक्षकका चित्र छपता है, और नाम प्रत्येक प्रकाशन में छपता है । संमान्य सहायकका ५०० ) तथा मान्य साधारण सहायकका १०० ) नियत है । चाहे दिया जा सकता है । ध्यान दें । सनातनधर्म कोई अलिफ लैलाकी शास्त्रानुगृहीतता होनेसे और शास्त्रोंके यत्र - तत्र कठिनता भी आ सकती है, पर चाहिये । धीरे - धीरे उधर प्रवृत्ति करनी विषय पढ़ लेने चाहियें, फिर कठिन सहायकका २५० ) और अर्थदान जितना भी कहानी नहीं । इसमें गम्भीर होनेके कारण उससे घबड़ा नहीं जाना चाहिये । पहले सुगम विषयोंको दो - तीन वार पढ़ कर सरल कर लेना चाहिये । आजकल प्रतिपक्षी हमारे सनातनधर्मको शङ्काप्रवाह में बहा देना चाहते हैं; परन्तु आप हमारी ग्रन्थमालाका मनन करके उनका उत्तर देने में सक्षम हो सकेंगे । प्रस्तुत- पुष्प प्रस्तुत पुष्पमें ' वेदचर्चा ' में वेदसम्बन्धी निवन्ध दिये गये हैं, इनका ज्ञान होना आवश्यक है । पुराणोंको कलङ्कित करने वाले आक्षेपोंका परिहार हम सप्तम पुष्पमें कर चुके हैं । जिन्होंने उसे न मँगाया हो; उसे वे अवश्य मँगा लें । फिर ' सैद्धान्तिक-चर्चा ' में वर्ण - व्यवस्थापर तीन निबन्ध दिये गये हैं । इस CC - 0. Ankur Joshi Collection [ ङ ] वाद ' साम्प्रदायिक - सिद्धान्तचर्चा ' में श्राद्ध तथा यमराज, नियोग, सायण और विधवाविवाह, नियोग वा विधवाविवाहके सिद्ध करनेकेलिए दिये जाते हुए प्रसिद्ध वेदमन्त्र, यमयमीसूक्त, विश ' क्लीवे च पतितेपतौ ' पर विचार, तलाकपर विचार आदि विषय " सन दिये गये हैं । फिर परिशिष्ट में अष्टग्रहीसन्देश, नमस्ते तथा पौरा ग्रन्थ कि घटनाएँ यह तीन विषय देकर अष्टम - पुष्पम गया दिया गया है । आप अधिकारी निष्पक्ष विद्वानोंसे प्रार्थना है कि- विचारमें चाय जहाँ कहीं कुछ त्रुटि रह गई हो, जिसका रहना असम्भव नहीं, ' सन तो उसकी सूचना दे दिया करें, जिससे आगे ध्यान रखा जा सके । किसी जावे; तो उसे इस वार शर्मा अम्बाला प्रश्नके उत्तर में कुछ अच्छी सूझ भी सूचित किया करें । ग्रन्थमालाको उसके गुणज्ञ श्री तथा पं ० घनश्यामचन्द्रजी शास्त्री श उन्हें स्फुरित हो । इसक रामः पं ० रामचन्द्रजी सत्य विद्यामार्तण्डका को आत्यन्तिक वियोग सहना पड़ा है । उसमें पहले महोदय आर्य- इस समाजी होते हुए भी ' सिद्धान्त ' में प्रकाशित हमारी लेखमालासे विभ ' बहुत प्रभावित हुए थे । इससे उनके विचार भी परिवर्तित होगये महार थे । इस विषय में उन्होंने ' कल्याण ' के ' नारी अङ्क ' के परिशिष्टाङ्क-की टिप्पणी में यह संकेतित भी किया था । दूसरे महोदय ग्रन्थ मालाको प्रोत्साहित करनेवाले थे । परमात्मा इन्हें सद्गति दे । समाज निवेदक- दीर्घा विजयदशमी दीनानाथ शास्त्री सारस्वतः विद्यावागीश प्रवच सं ० २०१६ प्रिंसिपल संस्कृतमहाविद्यालय, दरीवा कलाँ, देहली-Gujarat. An eGangotri Initiative