सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 11–20

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 11–20

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यमराज ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के सम्बन्धमें विद्वानोंके भाव । , विवाह के ( १ ).. आप संस्कृतके अद्वितीय विद्वान् हैं । इससे हमें मीसूक्त, विशेष प्रसन्नता है । पर्याप्त लेख दृष्टिगोचर हुए हैं । अब आप द विषय ' सनातनधर्मालोक ' नामक महाग्रन्थका प्रकाशन कर रहे हैं । इन पौरा ग्रन्थोंमें सनातनधर्म के प्रत्येक विषयपर अच्छा प्रकाश डाला बात कर गया है । सनातनधर्मी जगत्के विशेष लाभके ग्रन्थ हैं । ईश्वर आपके परिश्रमको पूर्ण सफल करे ।.. ( श्री ११०८ श्रीवैष्णव-विचारमें चार्य महाराज श्रीदरबार ( २ ) माननीय श्री पं नव नहीं, ' सनातनधर्मालोक ' ग्रन्थ रखा जा में शास्त्रीजीने यह बहुत कुरित हो । इसकी जितनी प्रशंसा रामशरणदास पिलखुआ चन्द्रजी सत्य घटनाएँ भी छपी हैं डिका को न मानने वालोंके लिए पिंडोरीधाम ) । ० दीनानाथ शास्त्रीजीके द्वारा लिखित देखनेका सुअवसर प्राप्त हुआ । वास्तव-ही सुन्दर महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा है । की जाय, थोड़ी है । इसमें भक्त द्वारा संग्रह की हुई पुराणोंके सम्बन्धकी , वह भी बहुत सुन्दर हैं; और पुराणों-मुहतोड़ उत्तर है । हमारा शुभाशीर्वाद - इस ग्रन्थमाला के साथ है ' ( श्रीमज्जगद्गुरुमध्वाचार्य अनन्तश्री-मालासे विभूषित भण्डारकेरिपीठाधीश्वर स्वामी श्रीविद्यामान्यतीर्थजी त होगये महाराज ) । - शिष्टाङ्क- ( ३ ) ग्रन्थ अद्वितीय है ( श्रीमदनगोपालजी सिंहल, मेरठ ) । इय ग्रन्थ- ( ४ ) आपके इस दृढधर्मप्रचारविषयक अध्यवसाय से धार्मिक ति दे । समाज आपका अधमर्ण रहेगा । दयामय भगवान् आपक दीर्घायुरारोग्य दे, यही प्रार्थना है ( श्रीभालचन्द्र विनायक मुले, वागीश प्रवचनकार - श्रीत्र्यम्बकेश्वर ) बाँ, देहली-CC - 0. Ankur Joshi [ 1 ( ५ ) ' दयानन्दी - लेखकों की चिल्लपोंके उत्तरका सिविल महकमा श्री पं ० दीनानाथ जी शास्त्रीने संभाला हुआ है ' ( ' दूधका दूध और पानीका पानी ' में शास्त्रार्थ महारथी श्री पं ० माधवाचार्य जी शास्त्री ) । ( ६ ) ' यह सन्तोषकी बात है कि - दिल्लीके श्री दीनानाथ-शास्त्रीने प्रधान सम्पादकका पद स्वीकार कर लिया है । ' सिद्धान्त ' के पाठक उनसे परिचित हैं । उनके लेख उसमें बराबर निकलते रहे । वे सनातनधर्मके लब्ध प्रतिष्ठ विद्वान् हैं । ' श्री-सनातनधर्माल्लोक ' ग्रन्थमाला निकालकर उसकी अमूल्य सेवा कर रहे हैं ' ( ' सिद्धान्त ' सम्पादक - श्री पं ० गङ्गाशङ्करमिश्र M.A. ) ( ७ ) ' सनातनधर्मालोक ' के पुष्पोंको देखकर धार्मिक जनताका हृत्कमल विकसित हो जाता है । अनुसन्धानपूर्ण ' आलोक'-ग्रन्थमाला सभी सनातन धर्मियोंकलिए आदरणीय है । इसके प्रकाशनसे विधर्मियों द्वारा फैलाया हुआ अन्धकार मिट जाता है । - ( सहजराम शर्मा, जमथा. पो ० श्रमदही - गोंडा ) । ( ८ ) मेरा आजतक जितनी धार्मिक पुस्तकोंके पढ़ने तथा सुनने से सम्बन्ध रहा है, मुझे यह आपका हिन्दुसमाजके हेतु कल्याणकारी उपहार ' श्रीसनातनधर्मालोक ' अति ही पुनीत प्रतीत हुआ है । सनातनधर्मकीं यह अनूठी व्याख्या महामान्य विद्या-वागीश सारस्वतजीका नाम चिरस्मरणीय रखेगी, और आपकी अमरकृतिसे धार्मिक जगत्का उत्थान होगा । ( श्रीसूर्यमोहन शुक्ल प्रधानाध्यापक, जमथा, गोंडा ) । ( ε ).... इन पुष्पोंके बढियापनकी पराकाष्टा नियत करना Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ ज ] कठिन है; क्योंकि - जीवनके मध्यमें यथासमय श्रीशास्त्रीजीने अपने अनुभवसे इसके द्वारा दूसरोंको अन्धकारसे प्रकाशमें लानेका प्रयत्न किया है । मैं आशा करता हूँ कि इन लोकोपयोगी पुष्पोंके प्रकाशनमें प्रत्येक समर्थ तथा गुणग्राही सज्जन सहायता कर जनकल्याणके अनुपम पुण्यके भागी होंगे ( श्रीब्रह्मदत्तशर्मा -अध्यापक माध्यमिक विद्यापीठ, कादेड़ा ( अजमेर ) ( १० ) पूज्यपाद विद्यावयोवृद्ध वेदमूर्ति... आपकी ग्रन्थमाला-की सुगन्धसे आनन्द उठा कर जनताका भला ही होगा । सनातनधर्मके प्रकाण्ड विद्वान्‌के करकमलों द्वारा ऐसा प्रयास जनताको मार्गदर्शन चिरकाल तक करनेका सामर्थ्य इन पुष्पों में आपने सचित किया है, जो आजके समयमें अनुपम है । मैं आपके इस कार्यकी बारम्वार सराहना करता हूँ । भगवान् से प्रार्थना करता हूँ कि वह आपके इस प्रारम्भ किये ज्ञानयज्ञको पूर्ण सफल बनाये ।... आपका — मथुराप्रसाद चतुर्वेदी शि. प्रा. शा. सोवत आरौन ( गुना ) ( ११ )... आप हमारी जातिके शिरोमणि हैं । हमें आपपर गौरव है । • भ ० रामकृष्णशर्मा शास्त्री प्रो ० टी ० कृष्णनगर, मिवानी ( हिसार ) एतदादिक अयाचित सम्मतियाँ - बल्कि यह कहना चाहिये कि - हृदयके स्वाभाविक भाव बहुत अधिक आये हुए हैं । स्थानाभाववश सभी प्रकाशित नहीं किये जा सकते । आगे के पुष्पों में क्रमशः प्रकाशित होंगे । आलोक ' ' ग्रन्थमाला स्वयं भी खरीदें, तथा दूसरोंको भी इसके खरीदनेकेलिए प्रेरित करके नवम पुष्पके प्रकाशनमें सहयोग दें । निवेदक --- नारायणशर्मा ' राजीव ' सारस्वत शास्त्री हिन्दी - प्रभाकर, एम. ए. ( द्वि ० ) [ प्रकाशक ] श्रीसनातनधर्मालोक - ग्रन्थमाला ( अष्टम विषय - सूची क्रमाङ्क विषय ( क ) प्रारम्भिक शब्द ( ख ) सम्मतियां एवं विषयसूची १. मङ्गलाचरणम् ( वेदचर्चा ) २. मङ्गल के अवसर पर विघ्नवारण ३. वेदस्वरूप - निरूपण ( क ) ( शाखाओंका वेदत्व ) ४. स्त्री - शूद्रोंका वेदाधिकारविचार ५. क्या वेद में केवल यौगिकता है? ६. वेदार्थ के साधन ७. क्या श्रीगीता वेद - खण्डक है? ८. वेदमन्त्रहत्याका दिग्दर्शन ६. क्या सध में परिवर्तन हो सकता है? ( सैद्धान्तिक - चर्चा ) १०. ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( छ ) ११. वर्णव्यवस्था - गतभ्रान्ति - परिहार १२. क्या गुणकर्मानुसार वर्णव्यवस्था चल– सकती है?. पुष्प ) की १ १ १७ पृष्ठ संख्या १६ कन्ड १५ च - ब.११ १ १६ २० २-५१ २१ ५२-१३० २२ २३ १३०-१४२ २४ १४२-१६६२५ १६६-१८५ १८८-२११ २६ २११-२६५ २७. २६५-२७८ २८. २७६- २६६ नारि २६६-३६० ' पति देवर ३६०-४१८ प्रथमो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 13

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१३. १४-१५. ष्ठ संख्या १६. कङ १७. च - ब. १८. १ १६. २०. २-५१ २१. २२-१३० २२. २३. १०- १४२ २४. [ न ] ( साम्प्रदायिक सिद्धान्त -चर्चा ) आर्य समाजका श्राद्ध एवं यमराज नियोग और मैथुन ( १ ) " ( २ ) सायण और विधवाविवाह नियोग वा विधवाविवाहके मन्त्र यमयमी - सूक्त विधवाविवाहपरक कई स्मार्त श्लोक ' नष्टे मृते प्रब्रजिते क्लीवे च पतितेपतौ ' ' पतौ ' या अपतौ?? विधवाविवाह पर लौकिक दृष्टि विधवाविवाह की उपपत्तियोंपर विचार विवाह विच्छेद पर विचार ४२-१६६ २५. क्या विवाह विच्छेद शास्त्रीय है? ६६-१८८ ( परिशिष्ट ) --२११ २६. अष्टग्रहीयोगका सन्देश ३१-२६५ २७. ' नमस्ते ' पर विचार -५-२७८ २८. पुराणोंकी प्रत्यक्ष घटनाएँ ( १ इयं नारी पतिलोकं वृरणाना ( पृ. ५१८ ) १-२६६ नारि! ( ५२७ ) ३ स्वा.द. और विधवाविवाह – ६-३६० ' पतिमेकादशं कृषि ' ( ५४६ ) । ५ ' देवृकामा ' ( ५५४ ) देवरम् ' ( ५६२ ) । ७ ' या पूर्व पति वित्त्वा ' ( ५७५ ) -०-४१८ प्रथमो विविदे ' ( ५८० ) ९ ' उत यत् पतयो दश स्त्रियाः ' ४१६-४३८ ४३८-४७३ ४७४-४८६ ४८६-५१७ ५१७- ५६५ ५६५-६२२ ६२२-६४० ६४१-६५४ ६५५-६८१ ६८१-७०४ ७०४-७२६ ७२७-७४२ ७४३-७६४ ७६५-७६६ ७८७-८०२ ८०३-८१८ । २ ' उदीर्ष्व ( ५४३ ) ४ । ६ ' विधवेव । ८ ' सोमः ( ५८६ ) CC - Q. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 14

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III III III III III III III III III III ' श्रीसनातनधर्मालोक ' - प्रणेता-शास्त्री a दीनानाथ पं ० दीनानाथ शर्मा शास्त्री सारस्वतः [ विद्यावागीश, विद्याभूषण, विद्यानिधि ] प्रिंसिपल संस्कृतमहाविद्यालय, रामदल, दरीबा कलाँ, देहली -६ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An सनातन हिन्दुधर्मके प्रसिद्ध विषय ( १ ) मङ्गलाचरणम् ।

' गजाननपद्मार्क गजाननमहर्निशम् ।

अनेकदन्तं भक्तानामेकदन्तमुपास्महे ' ॥

देवषाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । म सा नो मन्द्रेषमूर्जे दुहाना धेनुर्वागस्मान् उप सुष्टुतैतु ' ॥ ( ऋ ०८ । १००१११ ) ! तुर्थ या परमेष्ठिनी बाग - देवी ब्रह्मसंशिता । पथैष ससृजे घोरं तयैव शान्तिरस्तु नः ' ॥ ( अथर्व ० १६/६/३ ) रामः पश्चादधरादुत्तरात् पुर इन्द्र! नि पाहि विश्वतः । • स्मत् कृणुहि दैव्यं भयमारे हेतीरदेवीः ' ' पक्ष इन्द्र! भयामहे ततो नो अभयं कृधि मंधग्धि तव तन्न ऊतिभिर्विद्विषो विमृधो जहि

' तस्य प्राशं त्वं जहि यो न इन्द्राभिदासति ।

अधि नो ब्रूहि शक्तिभिः प्राशि मामुत्तरं कृधि ' ॥

' यां नो मित्रः शं वरुणः, शं विवस्वाञ्छमन्तकः ।

उत्पाताः पार्थिवान्तरिक्षाः शं नो दिविश्वरा ग्रहाः ' ॥

" श्रीसनातनधर्मा ass लोकोऽयं सम्प्रकाशते ।

तमा॑स्यनेन दूरे स्युर्धर्ममार्गः स्फुटो भवेत् ॥१ ॥

पूर्षे पञ्चाप ( मुल्तान ) वास्तव्य इदानीं देहलीं श्रितः ग्रन्थं विनिर्मात श्रीदीनानाथ नामकः सारस्वतस्य तस्याऽयं प्रयत्नः शास्त्रिणो महान् साफल्यमेतु भगवत्कृपया भृशम् ” स. ध.. १. eGangotri Initiative ॥ ( ऋ ० ८ | ६१ | १६ ) क । ॥ ( ऋ ०८।६१ | १३ ) छ य ( अथर्व ० २।२७ | ७ ) क ल ( अथर्व ० २६/६७ ) । वा ॥२ ॥ व

। पश ॥३ ॥

पृष्ठ 15

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२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ( २ ) मङ्गलके अवसर पर विघ्न चारण - । ( श्रीगणेशाय नमः ) आजतक जितने भी ग्रन्थकार हुए हैं, उनमें नास्तिकों को छोड़कर कोई भी दूसरा मङ्गलाचरणका विरोधी नहीं हुआ । आस्तिकोंके ग्रन्थोंमें यदि कहीं मङ्गल नहीं भी दीखता; तथापि वे मङ्गल करते अवश्य थे; क्योंकि यह शिष्टों ( सभ्यों ) का आचार था; चाहे वे पुस्तक से पृथक् ही उसे कर लें । पुस्तककी आदिमें मङ्गलका करना तो आडम्बरमात्र है, वह भी व्यर्थ नहीं, किन्तु शिष्यों की शिक्षाकेलिए चरितार्थ है । जैसे सन्ध्या में वा यज्ञादिमें किया जाता हुआ परमात्माका ध्यान मनसे सम्बन्ध रखता है, बाह्याडम्बर से नहीं, और न ही वहां ऊँचे स्वर से बोलने की आवश्यकता होती है; तथापि उसमें बाहरी आडम्बर इस कारण करना पड़ता है कि हमारे पुत्र, शिष्य, यजमान अथवा अनुयायी भी उससे प्रभावित होकर वैसा करें; नहीं तो यदि यह सब हम मनमें ही करते रहें, तो शिष्य वा पुत्रादि वैसा करना कैसे सीखें? इसी प्रकार मङ्गलाचरणके विषय में भी जान लेना चाहिये । मङ्गलाचरणमें ग्रन्थकर्ता स्वतन्त्र है, वह जिस देवताकी स्तुति करे । जिसे जो देव इष्ट है, वह उसीकी स्तुति करता है । वह यदि आरम्भ में अपने इष्टदेवको नमस्कार करता है, इससे वह निन्दनीय नहीं हो जाता । क्योंकि – ' त्रयी, साङ्ख्यं, योगः, पशुपतिमतं वैष्णवमिति; प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat मङ्गलमें विघ्नवारण [ ३ रुचीनां वैचित्र्याद् ऋजुकुटिल - नानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्व-मसि पयसामर्णव इव ' ( महिम्नस्तोत्र ७ ) यह श्री पुष्पदन्ताचार्यका वचन सुप्रसिद्ध ही है कि - शास्त्र कई प्रकारके होते हैं, अतः मत भी भिन्न - भिन्न होते हैं, रुचियाँ भी विभिन्न । कोई जल टेढ़ा होकर जाता है, कोई सीधा । अन्त में वह समुद्र में ही प्राप्त होता है, इस प्रकार ' सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति ' सब देवताओंको किया हुआ नमस्कार भगवानको ही प्राप्त होता है । उसका कारण यह है कि भगवान् श्रङ्गी है, देवता उसके अङ्ग हैं । जैसा कि कहा गया है— ‘ पश्यामि देवाँस्तव देव! देहे, सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ’ ( गीता ११।१५ ) ' यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा श्रङ्ग े गात्रा विभेजिरे । तान् वै त्रयस्त्रिंशद्देवान् एके ब्रह्मविदो विदुः ( अथर्ववेदसं. १०/७/२७ ) इन प्रमाणोंसे देवता भगवान्‌के अङ्ग कहे गये हैं; तब भगवान् श्रङ्गी हुए । श्रङ्गीकी पूजा, विना श्रङ्गके कमी भी नहीं हो सकती । हमारा आत्मा अङ्गी है, इम आत्मस्वरूप हैं । हमारी जो कोई भी पूजा करना चाहेगा; तदर्थ हमारे किसी अङ्गकी ही पूजा करेगा । फूलोंकी माला हमारे गलेमें ही डालेगा, वा हमारे सिरपर फूल डालेगा । क्यों? इसलिए कि अङ्गीकी पूजा अङ्ग द्वारा ही सम्पन्न होती है । अङ्गपूजा के बिना अङ्गीकी पूजा कभी सम्भव भी नहीं । कोई पुरुष गुरुजीकी लातें दवा रहा है - यह एक सेवा है । इस सेवासे सन्तुष्ट कौन होता है? गुरुजीका आत्मा । आशीर्वाद . An eGangotri Initiative

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४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) भी वही आत्मा देता है, वह भी मुख- श्रङ्गके द्वारा ही । इसी प्रकार अङ्गी भगवान्की पूजा भी उसके किसी देवतारूप अङ्ग-द्वारा ही करनी होगी; फल उसका भी भगवान् हीं देगा | जैसा कि भगवान् ने अपने श्रीमुखसे कहा है- ' यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विद-घाम्यहम् । स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान् ' ( गीता ७२१-२२ ) । अर्थात्-जो भक्त मेरी जिस तनु - अङ्गको श्रद्धा से पूजता है, उसमें मैं उसकी श्रद्धा स्थिर करता हूँ; और उस आराधनाका फल भक्तको मुझसे ' ही प्राप्त होता है, क्योंकि- ' अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ' ( ६।२४ ) मैं ( भगवान् ) ही सभी यज्ञों ( देवपूजाओं ) का भोक्ता तथा स्वामी हूँ । इस कारण भिन्न - भिन्न- देवपूजा भगवत्पूजा ही प्रतिफलित हुई । पर यदि कोई उस देवताको अङ्गी भगवान्का अङ्ग न मानकर स्वतन्त्रतासे उस देवता की पूजा करता है; अथवा यह कहना चाहिये कि इस अङ्गपूजाको अङ्गकी ही प्रसन्नताके उद्देश्य-से करता है; अङ्गीकी प्रसन्नता के उद्देश्यसे नहीं; तब वह पूजा अङ्गीकी होती हुई भी वहाँ श्रङ्गी साक्षाद् उद्दिष्ट न होनेसे सीधी अङ्गी की पूजा न होकर अविधिपूर्वक अङ्गी की पूजा हो जाती है; जैसे कि श्रीभगवान् ने कहा है- ' येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तॆपि मामेव कौन्तेय! यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ ( ६।२३ ) अर्थात् वे केवल - देवपूजक करते तो मेरी ही पूजा हैं, CC - 0. Ankur Joshi Collection मैङ्गलमें विघ्नवारणे tv पर मेरी पूजा वहाँ साक्षात् उद्दिष्ट न होनेसे मेरी अविधिपूर्वक पूजा हो जाती है । कारण वही है कि उस अङ्गको अङ्गीका न नह समझकर उसे स्वतन्त्र समझना । तभी कहा है – ' अहं हि सर्व पह यज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्चच- कि वन्ति ते ' ( गीता ६।२४ ) अर्थात् वे उस देवपूजामें मुझ अङ्गीको सि वास्तविकता से नहीं जानते, अतः वे गिर जाते हैं । वैसे ही अज्ञानी भिन्न - भिन्न देवपूजक आपस में लड़ते - झगड़ते हैं । वा उस दो शिष्य गुरुजी की लातें दबा रहे थे, एक दाहिनी लात, इस दूसरा बाईं । गुरुजीने करवट बदली । लातें भी बदल गई । है । अपनी - अपनी स्थितिमें रहनेके दुराग्रही उन मूढ - शिष्योंने यह न सहकर अज्ञानसे गुरुजीकी एक - दूसरेकी लातपर डण्डा जमा दिया; और इससे वे एक - दूसरे से झगढ़ भी पड़े । यह सेवा प्रवत उन दोनोंकी अङ्ग - सेवाकी दृष्टिसे हो रही थी कि - यह सेवित की" इस हुई लात मुझ पर प्रसन्न हो जायगी; तो मुझे विद्या आजायगी । भ्यां यदि वे अज्ञानी न होते, अङ्गकी सेवासे अङ्गी - गुरुजी की पूजा हनुम समझते; अङ्गकी प्रसन्नतासे अङ्गी - गुरुजीकी प्रसन्नता समझते, शिवा तब उन द्वारा वैसा अवैध - काण्ड न हो पाता । यही अज्ञान देखन भिन्न - भिन्न देवोंकी पूजा में परस्पर झगड़ने वालोंका होता है । विरुद्ध सो वह ' यजन्त्यविधिपूर्वकम् ' अवैध पूजन है । पर यदि वहाँ के ग्र अङ्गपूजासे फलाकाङ्क्षा - विरहित अङ्गीकी पूजा उद्दिष्ट की जावे; आर्ष-सो वह पूजा विधिपूर्वक ही हो जाती है । इस विषय में ' क्या ( प्रथम गीता वेदकी खडक है? ' यह निबन्ध आगे देखें । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 17

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tx ६. ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वधिपूर्वक इससे यह सिद्ध हुआ कि - अङ्गीकी पूजा अङ्ग - पूजाके बिना ङ्गीका न नहीं होती । अङ्गी हुए भगवान्; और अङ्ग हैं देवता - यह बात हि सर्व- पहले हम प्रमाणित कर चुके हैं । सो अपनी प्रकृति के अनुकूल नातश्चच- किसी इष्ट - देवतारूप अङ्गकी पूजा - रूप यज्ञ अङ्गी भगवानके अङ्ग तोषको लक्ष्य में रखकर अवश्य ही करना पड़ता है । तब यज्ञके वैसे ही- संक्षिप्तरूप मंगलाचरणके द्वारा भी भगवान्‌ के अंग किसी देव, I वा भगवान्‌के अवताररूपको अथवा ज्ञान प्रदाता गुरुको वा उसके चरणादिको नमस्कार करनी स्वाभाविक हो उठती है-7 लाव, इसमें खण्डनीयता कुछ भी नहीं; क्योंकि यह अखण्डित ल गई । है । इसलिए श्रीभगवान् ने अपने श्रीमुख से गीता में भी व्यवहार चने यह आदिष्ट की है ( ३।११-१३ ); और वेदमें तो देवपूजा व्याप्त देवपूजा है ही । डा जमा ( २ ) यह न जानकर आर्यसमाज नामक अर्वाचीन सम्प्रदायके वित सेवा की प्रवर्तक स्वा. दु.जीने जो कि अपने स. प्र. में यह लिखा है कि-" इसलिये जो आधुनिक - ग्रन्थोंमें ' श्रीगणेशाय नमः सीतारामा-जायगी । भ्यां नमः, राधाकृष्णाभ्यां नमः, श्रीगुरुचरणारविन्दाभ्यां , की पूजा हनुमते नमः, दुर्गायै नमः, बटुकाय नमः, समझते, शिवाय नमः, सरस्वत्यै नमः, भैरवाय नमः, नमः, नारायणाय नमः, इत्यादि लेख अज्ञान देखनेमें आते हैं- इनको बुद्धिमान् लोग वेद और शास्त्रोंसे होता है । विरुद्ध होनेसे मिथ्या ही समझते हैं; क्योंकि वेद और ऋषियों-नदि वहाँ के ग्रन्थोंमें कहीं ऐसा मङ्गलाचरण दीखने में नहीं की जावे; आर्ष ग्रन्थोंमें ओ ३ म् तथा ' अथ ' शब्द तो आता; और देखने में आता है ' ' क्या ( प्रथम समु. पू. १३ ) ऐसा कहते हुए उनकी शास्त्रविरुद्धता सिद्ध CC - 0. Ankur Joshi मङ्गलमें विघ्नवारण हुई; क्योंकि यह देवविशेष हैं । देवताओंका पूजन वा उपासना वेदको भी इष्ट है । इसके ज्ञानार्थ हमारा ' देवपूजा प्राचीन ' यह निबन्ध अन्यत्र देखना चाहिये । ( ३ ) ' देवताओंकी उपासना वेदको अभिमत है, अथवा युक्त है ' इस विषय में हम आर्यसमाजी विद्वान् अथर्ववेदसं. के हिन्दी-भाष्यकार, उसके १४ तथा २४ पृष्टमें ' सा मा सत्योक्तिः परिपातु विश्वतः ' ( ऋ. १० | ३७ | २ ) इस वैदिक - नादका अनुसरण करने--वाले, श्रीराजारामजी शास्त्रीका मत उनके अथर्ववेदकी भाष्य-भूमिकासे उद्धृत करते हैं । इससे पाठकोंको पता चल जाएगा कि - विचारशील आर्यसमाजी विद्वान भी देवताओं की उपासना-को वैदिक मानते हैं । अब देखें उनके शब्द-‘ वेदमें परमात्माके वर्णंनका प्रकार । वेद दो प्रकारसे परमात्मा-का वर्णन करता है । एक- बाहर के सम्बन्धों में अलग हुए उसके केवल स्वरूपका, दूसरा - बाहरके जगत्से सम्बन्ध रखते हुए का । ··· जगत्को अलग रखकर उसके जिस रूपको देखें; तो वह उसके शुद्ध - स्वरूपका दर्शन है; और जगत्का अन्तर्यामी होकर उसपर शासन करता हुआ देखें; तो वह उसके विशिष्ट - रूपका दर्शन है । शुद्ध ज्ञेय, और विशिष्ट उपास्य है । अब उसका शुद्ध स्वरूप तो सच्चिदानन्दस्वरूप वा नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव अथवा ' नेति नेति ' के सिवाय किसी प्रकारसे वर्णित नहीं हो सकता, और अगम्य एवम् अचिन्त्य होनेसे न हमारे जीवनपर उसका कोई प्रभाव Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 18

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 18 का मूल पृष्ठ
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श्रीसनातनघर्मालोक ( ८ ) पड़ता है । न हम अपनी त्रुटियाँ पूरी करने और अपनेको उच्च अवस्था में लानेकेलिए उससे प्रार्थना कर सकते हैं । क्योंकि - किसी मानुष - गुण प्रेम- दयालुता आदिका हम शुद्धके साथ सम्बन्ध नहीं कर सकते, न किसी प्रकारसे उसकी पूजा कर सकते हैं । यह बात याज्ञवल्क्यने गार्गीको शुद्धका उपदेश देते हुए बतलाई है-' स होवाच - एतद् वै तदक्षरं गागिं! ब्राह्मणा अभिवदन्ति अस्थूलमनणु, अह्रस्वमदीर्घम्, अलोहितमस्नेहम्, अच्छाय-तमोऽवाय्वनाकाशमसङ्गम्, अरसमगन्धम्, अचक्षुष्कमश्रोत्रम्, अवाग् अमनोऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रम्, अनन्तरमबाह्यम् । न तद् अश्नाति किञ्चन, न तदश्नाति कश्चन ' ( बृह. उप. ३८८ ) इसका अभिप्राय यही है कि इस रूपमें न हम उसके कुछ अर्पण करते हैं, न वह हमारे जीवन पर कोई प्रभाव डालता है । या यों कहो कि इस रूपमें वह हमारे ज्ञानका परम लक्ष्य तो हो सकता है, पर उपास्य नहीं । उपास्य वह अपने विशिष्टरूपमें ही है । विशिष्टरूपमें उसकी अनेक रूपोंमें उपासना - मनुष्य के हृदय में उसके जिस रूपकेलिए भक्ति - पूजा और उपासना है, वह उसका विशिष्ट रूप ही है; और यह रूप उसका अनेक रूपोंमें पूजा जाता है । इन्हीं रूपोंको देवता कहते हैं, जो वेदमें अग्नि, इन्द्र, वायु, सूर्य, मित्र, वरुण, पूषा आदि नामोंसे वर्णित किये हैं । मनुष्य पहले - पहल इन अलग - अलग विशिष्ट - रूपों में उसका चिन्तन कर सकता है, और जब वह उसकी महिमाको अलग-अलग अनुभव कर चुकता है, तो फिर उसका हृदय एकसाथ CC - 0. Ankur Joshi Collection मङ्गलमें विघ्नवारण १० सारे विश्व में उसकी महिमाको अनुभव करता हुआ ध्यान क्या हा पूजन करता है । इस समष्टि - रूपको अदिति, प्रजापति, है कि हिरण्यगर्भ आदि नामोंसे वर्णित किया है । गणपत विशिष्टरूपों [ देवतारूपों ] में परमात्माके जानने की आवश्यकता खल्वि पहले पहल केवल शुद्धरूपमें परमात्मा दुर्ज्ञेय है । उसका जा परमात जगत्में ही सम्भव है । वह भी अनेक विशिष्टरूपों [ देवताओ ] आदिम ) क्योंकि उसकी महिमा जो इस जगत्में देखी जाती है, है ' और नमो न बड़ी है कि समष्टिरूपमें उसका ज्ञान मनकी शक्तिके बाहर. इसलिए अग्नि, वायु, सूर्य, सविता, मित्र, वरुण, द्यावापृथि वेदार्थभ " अश्वि, इन्द्र, रुद्र, ब्रह्मणस्पति, वाचस्पति, वास्तोष्पति, क्षेत्र भाष्यक पति, इत्यादि परिमित - रूपोंमें उसकी महिमा वेदमें कही गई. और स्तुति, नमस्कार और पूजा द्वारा उन सब रूपोंके साथ ग दोष सम्बन्ध करनेका उपदेश है ” ( अथर्व भाष्यभू. पू. १२-१३ ) मस्का अन्य मतसे भी हमारे पक्षकी पुष्टि हो गई । नही ( ४ ) स्वा ० द ० जीने भी स ० प्र ० के १० वें पृष्ठ में लिखा है कि, इस ‘ गण संख्याने ’ इस धातुसे ‘ गण ' शब्द सिद्ध होता है और दिक ह आगे ईश वा पति शब्द रखनेसे गणेश और गणपति इस ' श्रीर सिद्ध होते हैं । ' ये प्रकृत्यादयो जडा जीवाश्च गण्यन्ते - संख्यायनं शाहिये , तेषामीशः - स्वामी, पतिः - पालको वा ' इससे उस कि - श्र गणेश वा गणपति है ” इस कथन द्वारा ईश्वरका ना तो प्र गणपति गणेश यह नाश्ता । परमात्माका माना है; तब जिसने आदिमें ' श्रीगणेशाय नमः ' वान्त मङ्गल किया है, उसने परमात्मा के नाम - स्मरणरूप मङ्गलाचरण कर Gujarat. An eGangotri Initiative

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१० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ना ध्यान क्या हानि की है? इस कारण गणेशको ' लम्बोदर ' कहा जाता नापति! है कि बड़े पेटवाला, प्रलय में सारा जगत् जिसके पेटमें समा जावे । गणपत्युपनिषद् में भी कहा है- ' नमस्ते गणपतये... त्वमेव सर्वं वश्यकता खल्विदं ब्रह्माऽसि ' । तब जब सनातनधर्मी भी गणेशको सका जा परमात्मस्वरूप ही मानते हैं, तब जैसे स्वा. द. जीने स. प्र. की देवताओ ] आदिमें ] ' सच्चिदानन्देश्वराय नमो नमः ' और सं. वि. की आदिमें ती है, " नमो नमः सर्वविधात्रे जगदीश्वराय ' यह मङ्गलाचरण किया है, के बाहर और ऋभाभू में स्वामीने ' मदुपरि कृपां विधेहि, यथा निर्विघ्नं न्यावापृथि G वेदार्थभाष्यं , सत्यार्थं पूर्णं वयं कुर्वीमहि ' ( पृ. ७ ) अस्मिन् वेद-पति, क्षेत्र भाष्य करणानुष्ठाने ये दुष्टा विघ्नास्तान् प्राप्तेः पूर्वमेव दूरं गमय ' पृ ० ३ ) इसमें स्वामीने विघ्न दूर करनेकी प्रार्थना की है; इसमें कही गई दोष नहीं मानते, तब परमात्माके एक स्वरूप गणपतिके साथ ग २-१३ ) मस्कारात्मक - मङ्गलमें - जिससे विघ्न दूर हो जावें में भी कोई दोष नहीं दिया जा सकता । खा है इसके अतिरिक्त देवविशेष - गणपतिका पूजन भी युक्त एवं और इस है, एतदर्थ ' आलोक ' ग्रन्थमाला के पश्चम- सुमन ( मूल्य १० ) ' श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ' यह आदिम निबन्ध देखना तिये । तब इसमें वेदविरुद्धता क्या हुई? क्या वेदमें लिखा संख्यायनं कि- श्रीगणेश आदिको आदिमें नमस्कृत नहीं करना चाहिये? । काना तो प्रकारभेद है । सबका समान मङ्गल - प्रकार नहीं हुआ यह नाश्ता । महाभाष्य, पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, योग, साङ्ख्य, नमः पान्त आदि दर्शनोंकी आदिमें स्वा. द. जीने स.प्र. के १३ वें चरण कर CC - 0. Ankur मङ्गलमें विघ्नवारण [ ११ पृष्ठ में ' अथ ' शब्द दिखलाया है; पर वेदकी अनुसार भी अग्नि ( ऋ. ) इट् ( यजुः ) अग्नि यह शब्द हैं । अब स्वा ० द ० जीको बताना दर्शनोंकी आदिमें अग्नि, इट् आदि शब्द वेदविरुद्धता नहीं है? इसमें जो उनका उत्तर ' श्रीगणेशाय नमः ' के लिखने में । ( ५ ) मङ्गल तीन प्रकारका होता है-२. आशीर्वादात्मक, ३. वस्तुनिर्देशात्मक । श्रादिमें स्वाद के ( साम ) ये ( अथर्व. ) चाहिये कि उक्त-न दीखनेसे क्या होगा, वही हमारा १. नमस्कारात्मक, दर्शनोंमें वस्तु-निर्देशात्मक ही मङ्गल किया गया है । यदि अन्यत्र नमस्कारां-त्मक - मङ्गल हो, जिसमें नामस्मरण वा प्रार्थना प्रकारान्तरसे आ जावे; अथवा कोई माङ्गलिक शब्द प्रयुक्त हो, उसमें वेद-विरुद्धता क्या हो सकती है? मङ्गलमें केवल ' अथ ' शब्दका आग्रह करते हुए स्वामीने ' वृद्धिरादैच् ' ( पा ० १ | १ | १ ) सूत्रमें ' वृद्धि ' शब्द से मङ्गलको करते हुए श्रीपाणिनिको तथा ' सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे ' में ' सिद्ध ' शब्दसे मङ्गलाचरण करते हुए श्रीकात्यायनको भी वेदविरुद्ध सिद्ध कर दिया; क्योंकि इन दोनोंने ' अथ ' अथवा ' ओम् ' शब्दको स्वामीके अनुसार प्रयुक्त नहीं किया । इससे स्पष्ट है कि- स्वामीका कथन अबहुश्रुतता - मूलक है । यदि यहाँ इन मुनियोंको मङ्गलाचरणमें स्वतन्त्रता है, तब फिर ' श्रीगणेशाय नमः ' में माङ्गलिक ' श्री ' शब्द लिखनेसे वा गणेशके नमस्कारसे प्रकारभेदका अनुसरण करनेवालोंको वेद- विरुद्ध कैसे कहा जा सकता है? Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मङ्गलमें विघ्नवारण [ १ १४ अष्टाध्यायीका श्रादिम सूत्र । ( ५ ) कई व्यक्ति श्रीपाणिनिका आदिम - मङ्गल ' अथ ' शब्द से सिद्ध करना चाहते हुए उसका आदिम - सूत्र ' वृद्धिरादैच् ' ( १ | १ | १ ) न मानकर ' अथ शब्दानुशासनम् ' को पाणिनिका आदिम सूत्र बड़े संरम्भसे सिद्ध करना चाहते हैं; हम उनका मत देते हैं और उस पर अपनी आलोचना भी देते हैं ।-पूर्वपक्ष - आधुनिक वैयाकरण मानते हैं कि- ' अथ शब्दा-नुशासनम् ' यह महाभाष्यकारका वाक्य है, यह ठीक नहीं । यह सूत्र पाणिनिका है । शब्दानुशासनका उपक्रम पाणिनिने किया है, पतञ्जलने नहीं । उत्तरपक्ष — शब्दानुशासन जैसा पाणिनिने किया है, वैसे कात्यायन और पतञ्जलिने भी । इसलिए ' त्रिमुनि व्याकरणम् ' कहा जाता है । बल्कि यह वाक्य अष्टाध्यायी के महाभाष्य के उपोदघातमें है; अतएव महाभाष्यकारका ही है । पू ० – यह सूत्र पाणिनिका ही है । सूत्रोंको उद्धृत करके ही उनका भाष्य करना - यह भाष्यकारोंकी शैली होती है । इस सूत्रको उद्धृत करके भाष्यकार ने ' अथेत्ययमधिकारार्थः प्रयुज्यते ' यह भाष्य किया है । उ०- यदि ' अथ शब्दानुशासनम् ' यह सूत्र अष्टाध्यायीका आदिम हैं, तो अष्टाध्यायीके सूत्रोंका भाष्य तो तृतीयाह्निकसे शुरू हुआ है, पहिले आह्निकमें तो भूमिका है, और द्वितीय में प्रत्याहार, तीसरेमें सूत्रपाठ जारी हुआ है; तब ' अथ शब्दानु-CC - 0. Ankur Joshi Collection शासनम ' भी वहीं होता । पर नहीं है । ' अथ शब्दानुशासनम प्रारम लिखकर ‘ अथेत्ययं शब्दोघिकारार्थः प्रयुज्यते ' यह भाष्य लिखने शुरू अर्थव पूर्वका वाक्य सूत्र हो जावेगा - ' यह भी ठीक नहीं । पहला ' अ फिर शब्दानुशासनम् ' भी भाष्यकारका वाक्य है, ' अथेत्ययमधिकारार्थ प्रतिप प्रयुज्यते ' यह भी भाष्यकारका वचन है; क्योंकि भाष्यका लक्षर कर द भी यही है - ' स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ' अर्था व्याख भाष्य में अपने विशेष वाक्यकी भी व्याख्या हुआ करती है । ब अवत शब्दानुशासनम् ' यह अपना विशेष वाक्य देकर ' अथेत्ययमधिकारार्थ: ' पस्पश इत्यादिरूपसे स्वयं व्याख्या करनी भी भाष्यकी शैली वा लक्षणके अनुरू है । उ है । अष्टा इसके अतिरिक्त भाष्यकार लोग आरम्भिक सूत्रकी व्याख्यारे पूर्व भी अवतरणिका वा उपोद्घात दिया करते हैं, और उस उसका स्थूल वाक्य देकर उसकी व्याख्या भी करने लग जाते हैं । भाष्यव श्रीयास्कने वैदिकनिघण्टुकी व्याख्या करते हुए स्वयं ' समाम्ना उ समाम्नातः... तमिमं निघण्टव इत्याचक्षते ' यह अपना स्थू योगान वाक्य लिखकर फिर उसकी स्वयं व्याख्या शुरू की है । इस उपो परिपा घात में श्रीयास्कने पहला अध्याय तथा दूसरे अध्यायके कुमलं श खण्ड समाप्त कर डाले, फिर निघण्टुकी व्याख्या शुरू की प्राज श्रीसायणने ऋग्वेदभाष्य करना चाहते हुए पहले लम्बा - चौ वचन उपोद्घात लिख ही डाला । तुल्यता इसमें वादि - प्रतिवादिमान्य न्यायदर्शनका उदाहरण होता है । देखिये | न्यायदर्शनका ' प्रमाण- प्रमेय - संशय ' ( १ | १ | १ ) इस सूत्र Gujarat. An eGangotri Initiative