सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 141–150

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २५४ ] इतिहास - पुराणका खण्डन कभी कर न सके; अतः इतिह समाजी कर दिया । बिन्दुएँ दे उन्होंने अर्थ - परिवर्तन छिपा दिया ( ख ) एक अन्य नमूना भी अनुसन्धाताजीका देखें । ' वैदिक-है । इ इतिहास ' द्वितीयभाग २११ पृष्ठमें ' ब्राह्मण - ग्रन्थोंका वेद ( अर्थ वाङ्मयका विषय ' इस प्रकरण में ' पृथिवीकी पूर्वावस्था ' इस ) प्रतिपादित नुराणं प शीर्षक से वे ' काठकसंहिता ' का यह प्रमाण लिखते हैं - इम द माना बीच - बीचमें उसका अर्थ भी देंगे । ' प्रजापतेर्वा एतद् ज्येष्ठं तोकं को पाँच ( सन्ततिः ) यत् पर्वता: । ( पहाड़ प्रजापतिकी ज्येष्ठ सन्तान थे ) । को अश्रमा ते ( पर्व॑ताः ) पक्षिणः ( पक्षवन्तः ) आसन ( उन पहाड़ोंके पंख हुआ है । करते थे । ते [ पर्वताः ] यन्त्र - तन्त्र अकामयन्त, तत् परापातमासत या था, ( प्रपतिता भवन्ति स्म ) ( वे [ पहाड़ ] जहाँ चाहते थे, वहीं जा पड़ते ए कहा थ थे ) । अथ वै इयं ( पृथिवी ) तर्हि शिथिला आसीत ( इससे वहाँकी पृथिवी ढीली हो जाती थी ) । तेषामिन्द्रः पक्षान् अच्छिनत् ( इन्द्रने ठीक नहीं- उन पहाड़ोंके पंख काट दिये ) । तैः ( पर्वतैः ) इमाम् ( पृथिवीम् ) के श्रहत ( उन पहाड़ोंसे इस पृथिवीको प्रजापतिने दृढ कर दिया ) । ये ' प्रवक्तार पर्वतानां ] पक्षा आसन्, ते जीमूता ( मेघा ) अभवन् ( जो पहाड़ों-न्ध होनेपर के पंख थे, वे बादल बन गये ) तस्मात् [ पर्वतानां पक्षसत्त्वात् ] यह दोन ते [ जीमूता ] गिरिम् उपलवन्ते ( प्राप्नुवन्ति ) ( पहाड़ों के ही पंख दोनोंका होने से वे बादल पहाड़ों पर रहते हैं ) । योनि: ( उत्पत्तिस्थानं ) हि एषां [ मेघभूतानां स्वपक्षाणाम् ] एषः [ पर्वतः ] ( यह पहाड़ अपने = - अथर्व पंखोंका उत्पत्तिस्थान है ) । तस्माद [ मेघानां योनित्वादेव ] गिरौ जावे भूयिष्ठं वर्षति ( इसलिए ही पहाड़ पर बादल बहुत बरसते हैं ) वेद - इत्या [ २५५ ( काठकर्स. ३६ ( ७ ) इसी प्रकार मैत्रायणी - संहिता ( १।१०।१३ ) में भी है । हमने केटमें उक्त वचनोंका सम्भवी अर्थ लिख दिया है । इस वेदवाक्यसे पर्वतोंके पक्ष भी सिद्ध होते हैं, जिनका मन्त्रभागकी अन्य - संहिताओं में भी वर्णन है । यह हमारे अन्य निबन्धोंमें देखा जा सकता है । परन्तु श्रार्यसमाजी लोग यह न मानकर उसमें अर्थ बदलते हैं । हम श्रीभगवद्दत्तजीका अ उनकी उक्त पुस्तकसे उधृत करते हैं; और ब्रेकेटमें उसकी समालोचना करते हैं । वे लिखते हैं-प्रजापति = सूर्य के बड़े पुत्र हैं, जो बादल हैं [ जबकि उक्त वचनमें पहाड़ और जीमूत ( बादल ) अलग - अलग कहे गये हैं; तब पर्वत का बादल अर्थ कैसे किया गया? ] वे पक्षियोंके समान पंख रखते ये ( श्रर्थात् उड़ने वाले हैं ) [ ' वे पक्षियोंके समान पंख रखते थे, यह ' अर्थ ' ही असम्बद्ध है, ' आसन'का पहले ' थे ' करके फिर ' हूँ ' अर्थ कैसे किया गया? जबकि यह पृथिवी की सृष्टिकी श्रादिम अवस्था है – यह वादी भी मानते हैं ] । वे जहां - जहां कामना करते हुए [ बादलोंकी कामना कैसे हो सकती है? पर्वतोंको तो जीव - विशेष तथा ब्रह्माकी ज्येष्ठ सन्तान बताया गया है, वहां कामना सङ्गव ही है ], वहीं पर ( वर्षा - रूपमें ) गिरकर ठहरे [ यहां पर ' वर्षारूप में ' यह प्रन्थकारसे अनभीष्ट अध्याहार कैसे? ] | तब यह पृथिवी शिथिल थी, इसका ऊपरका भाग कठिन नहीं हुआ था ) [ यह किन शब्दोंका अर्थ है? यहां तो भारी पहाड़ोंके पृथिवीपर गिरनेसेही पृथिवीकी शिथिलता बताई गई है; अर्थात् वह उनके गिरने से CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 142

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२५६ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) हिल जाती थी ] । इन्द्र अर्थात् वायु और विद्यत्ने उन बादलोंका उड़ना बन्द करके उन्हें बरसाया [ वायु और बिजलीका बादलोंको उड़ना बन्द कर देना संगत नहीं, और संहिता के वाक्य में बादलों का बरसना नहीं कहा गया, किन्तु इन्द्र द्वारा पहाड़ोंके पंखका काटना ही कहा है । ] और इस पृथिवीको जलमय करके इसे दृढ किया ' जलमय करके ' यह किस शब्दका अर्थ है? यहां तो यह लिखा है कि - इन्द्रने पर्वतोंके पंखोंको काटा, इससे वे पर्वत गिर गए, गिरे हुए पर्वतोंसे पृथिवीका भार सम करके उस हिलती-जुलती पृथिवीको दृढ़ - स्थिर कर दिया । इसलिए ही पहाड़के नाम महीघ्र, कुध, गोत्र, महीधर, भूघर आदि हैं । वादी के पक्ष में ' पृथिवीको दृढ किया ' की कोई सङ्गति नहीं । जब वादीके अनुसार पहले ही बादल वर्षारूप में गिरे, तब पृथिवीको दृढ होजाना चाहिये था, पर उसे शिथिल कैसे कहा गया? वस्तुतः यह कल्पित अर्थ करनेका दुष्परिणाम है । ] ( तव पृथिवीका ऊपर-का भाग ठण्डा होकर सख्त हो गया ) ( यह अर्थ संहिता के किस वाक्यसे निकाला गया है? पहले पृथिवीकी उष्णता संहिता के वचनमें कहाँ कही गई है, जो कि यहाँ वादीने उसकी शीतलता कही? ] जो उन बादलोंके पर थे [ बादलोंके पंख कौनसे थे? पहले तो वादीने ' पक्षों ' का अर्थ ' उड़नेवाले ' किया; यहाँ ' पर ' कहाँ आगये १, वहां [ पृथिवीमेंसे ) पर्वत वने [ यहाँ अनुसन्धाताजीने CC - 0. Ankur Joshi Collection वेद - इत्या [ २२० पर्वत कहाँ से किया? ' जीमूत ' का अर्थ ' पहाड़ ' कैसे प ' पर्वत ' का अर्थ आपने ' पहाड़ ' न करके बादल किया! | प बादल - वाचक ' जीमूत ' शब्दका ' बादल ' अर्थ न करके किया, और कर दिया, यह कैसे? ] इसलिए वादल पर्वतों ' पहाड़ ' ग पर्वत ही बादलोंकी योनि ( उत्पत्तिस्थान को दौड़ते है, व परामर्शक ) हैं । यहां ' जीमूत ' के ‘ ते’का आपने ' बादल ' अर्थ कैसे किया; पहले तो है-' जीमूत ' का अर्थ ' पहाड़ ' किया; अव ' जीमूत ' वाचक सर्वनाम ग ' ते ' का उससे भिन्न अर्थ कैसे किया? जिन पर्वतोंका संहिताके वाक्यमें पहले वर्णन था, उसीका पर्यायवाचक ' गिरि ' शब्द आगे रखा गया है, तब अनुसन्धाताजीने पूर्व की भांति यहां भी ' गिरि ' प शब्दका ' बादल ' अर्थे क्यों नहीं किया? ' गिरि'का रूढिसें ' पहाड़ ' अर्थं कैसे किया? क्या आपकी इच्छा हुआ कि – एक स्थान उस शब्दका दूसरा अर्थ करती है । कर दिया जावे; उसीके है । आगे उसीके पर्यायवाचका अन्य अर्थ कर दिया जावे? ] त इसीलिए पर्वत में बहुत वर्षा होती है । [ ' तस्माद् गिरौ भूयिष्ठं व वर्षति ' यह संहिताका उपसंहारवाक्य है । उपसंहार उपक्रमकी न अपेक्षा कर रहा होता है । पहाड़ोंमें बादलोंकी बहुत वर्षाका कारण पहले दिखलाया है कि - पर्वतोंके काटे गये पक्ष ही मेघ पव बने । यही काटे गये पर्वतोंके बादलरूप बने पंख फिर - फिर उत अपने उत्पत्ति - स्थान पहाड़ पर आते हैं, इसलिए पर्वत पर बहुत वर्षा होती है ' । यदि पहले स्थान ' पर्वत ' शब्दका ' मेघ ' अर्थ किया जावे; तब मेघोंके पर्वतोंपर आने तथा उनपर बहुत वर्षा Gujarat. Agri An १७ Initiative

पृष्ठ 143

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श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) २५८ ] [ २५७ में कोई उपपत्ति नहीं रह जाती । संहिता के वाक्य में तो होने पर्वतों के पंखोंसे बादलकी उत्पत्ति कही है, बादलोंके पंखोंसे किया 1 पर्वतोंकी उत्पत्ति कहीं नहीं कही गई । बी. ए. जीने यहाँ उल्टा र अर्थ कैंसे कर दिया? पर्वतोंके पंख जो काटे हुए बादल बन ' पहाड़ ' गए, उनका अपनी योनि पर्वतोंपर फिर - फिर आना और उन पर चौड़ते हैं, वरसना संहिता के अनुसार संगत है, क्योंकि संहितामें ही कहा श्रीमूत के ' है - ते - छिन्नाः पक्षाः, स्वयोनिं गिरिम् पर्वतम् उत्प्लवन्ते - उत्प्लुत्य गच्छन्ति ' । इसमें संहिताप्रवक्ता हेतु कहते हैं - ' योनिर्हि एषामेष: ' नाम अर्थात् पर्वतोंके छिन्न - पक्ष जो बादल बन गये थे, पर्वत उनकी हिता के योनि - उत्पत्तिस्थान हैं | परन्तु ' पर्वत ' शब्द के ' बादल ' अर्थ करने-आगे पर उनके पंख जीमूतोंका ' पर्वत ' अर्थ करनेपर जहाँ अपनी ' गिरि ' कल्पना से अर्थ विपरीत करना पड़ता है, वहाँ पर संहितानुसार कोई उपपत्ति वा स्वारस्य कुछ भी नहीं रहता । रती है यदि श्रीभगवद्दत्तजी के अनुसार बादलोंके पंख पर्वत बने, उसीके है तब ' मेघ ' ही ' योनि ' सिद्ध हुए, उनके पक्षरूप पर्वत उनके पुत्र बने । तब पंख बने हुए पहाड़ोंको ही अपनी योनि बादलों में यिष्ठं जाना चाहिये था क्योंकि - संहिताप्रवक्ता ने ' तस्मात् ते गिरिमुप-कमकी ' लवन्ते, योनिर्हि एषाम् ( स्वपक्षाणां ) एष ( पर्वतः ) ' यह लिखा है । मेघ पर्वतोंके पंखोंकी योनि ' पर्वत ' स्पष्ट ही है, क्योंकि - वे पहाड़से ही -फिर उत्पन्न अङ्ग हैं; आपने भी लिखा है- ' पर्वत ही बादलोंकी योनि ( उत्पत्तिस्थान ) है ' यदि ऐसा है, पर्वत अपने पंखोंकी जब योनि हैं, बहुत और पंख बने मेघ, और पक्षोंकी योनि पर्वत ही है, तब उक्त-वर्षा CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदइत्या [ २५६ संहिताके वाक्य में पर्वतोंका पंख और उन पर्वतों का सृष्टिकी आदिमें उड़ना सिद्ध हो ही गया । उपक्रममें श्रीभगवद्दत्तजीने आधारभूत मेघोंके आधेयभूत पंखों का पहाड़ बनना दिखलाया; इस प्रकार पहाड़ तो आधेय बन गये, और मेघ आधार ( योनि, उत्पत्तिस्थान ) बने; तब आधेय पर्वतोंका ही अपने आधार योनि वादलोंमें जाना युक्त था, पर फिर उपसंहार में भगवद्दत्तजीने पहाड़ोंको ही मेघोंकी योनि उत्पत्तिस्थान वा आधार दिखलाया - यह उनका परस्पर विरोध भी सिद्ध हुआ । इसका कारण यही है कि शब्दोंका सम्भवी अर्थं छोड़कर जिसके लिए भाषा बनाई गई हैं- उनके अपने मनके अर्थ करना यही शब्दोंकी हत्या हो जाती है । और यह दशा प्रायः समस्त आर्यसमाजियों में पाई जाती है । अब कुछ नमूना अन्य आर्यसमाजियोंका भी पाठक देखें ।— ( ११ ) अव एक अन्य आर्यसमाजीकी लीला भी देखें । निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः । सर्वान् तान अग्न! आ वह पितॄन हविषे अत्तवे ' ( अथर्व. १८/२/३४ ) यह मन्त्र प्रायः सुगम शब्दों वाला है । यहां मृतकपितरोंका श्राद्ध बताया गया है । इसमें अग्निसे मृत पितरोंके आह्वानकी प्रार्थना है कि हे अग्ने! ये जो मरे हुए पितर निखाता: -आपत्ति आदिके समय गाड़े गये, ये परोप्ताः - जो कारणवश वन आदि में छोड़ दिये गये, ये दग्धाः- जो जला दिये गये, ये चोद्धिता: - जो युधिष्ठिरादि-की भांति अपनी शक्तिसे या राकेटों द्वारा सशरीर ऊपर Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 144

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२६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) स्वर्गादिमें चले गये, अग्ने - हे अग्नि! तान् सर्वान् पितृन - उन सब पितरोंको हविषे अत्तवे - हविके खानेकेलिए आवह- बुलायो । यहाँपर ' हविष: ' इस षष्ठीके स्थान में ' हविषे ' चतुर्थी घाई है । ' अत्तवे ' कृदन्ती प्रयोग है, इसके योगमें ' कर्तृ - कर्मणोः कृति ' ( पा. २ | ३ | ६२ ) सूत्रसे ' तवेन् ' प्रत्ययके योग में षष्ठी होनी चाहिये | ' तवेन् ' प्रत्यय ' तुमर्थे सेसेन् ' ' ' तवेङ्तवेनः ' ( पा. ३ | ४ | ६ ) इस सूत्र से हुआ है 1 । फिर उस ' हविष: ' इस षष्ठीके स्थान में ' षष्ठ्यर्थे चतुर्थीति वाच्यम् ' ( वा. २२३२६२ ) से चतुर्थी होकर ' हविषे ' बना है । यहाँ गाड़े हुए, जले हुए आदि दशाओं वाले पितरोंके आह्वानार्थ अग्निसे प्रार्थना की है; क्योंकि हव्य - कव्य उसी ( अभि ) के द्वारा देवता और पितरोंको दिया जाता है । इसकी स्पष्टता ' मृतक - श्राद्धसिद्धि ' में किसी पुष्पमें की जाएगी । इस मन्त्रका अर्थ आर्यसमाजी श्रीतुलसीरामस्वामीने इस प्रकार किया है, ' ये निखाताः - जो दब गये, ये परीप्ताः - जो इधर-उघर पड़े रह गये I । ये दग्धाः - जो केवल फुंक गये; और जो उद्धिताः - ऊपर उड़ गये, अग्ने - अग्नि तान् सर्वान् पितृन - उन सब मृत - पितृशरीरावयवोंको हविषे अत्तवे- होमके पदार्थों खाने-केलिए वह प्राप्त करता हूँ, वा करावे ' । यहाँ ' पितृ'का अर्थ करनेमें कुछ चालाकी की गई है, पर शेष अर्थ प्राय: ठीक है, अब एक ' व्रजमोहनझा ' नामक श्रार्यसमाजी उपदेशककी इसपर करतूत देखिये । उनने कानपुर के हुए लिखित शास्त्रार्थमें इसका अर्थ यों लिखा- इस मन्त्रका ठीक अर्थ यह है कि हे अग्ने! CC - 0. Ankur Joshi Collection निरुक्त की हत्या २६२ परमात्मन! जो पृथिवीमें कन्दादिक पैदा होते हैं हम बोते हैं, जो दग्ध - भूने हुए पदार्थ हैं उन सबको, और जिने मन्त्र , खानेकेलिए प्राप्त कराइये ' । इस इसमें उस उपदेशक से प्रष्टव्य है कि- ' कन्दादि बादी G किस पदका अर्थ है? यदि ' पितृन ' - पदार्थ प्रकर ' पितृ ' पदका ' कन्द ' अर्थ किस कोष का यह अर्थ है: से! अग्नि वा किस निघण्टु तान् व्याकरण में है? क्या यह धूर्तता इस कारण नहीं है कि वा ( अ. यह पर सनातनधर्मसम्मत मृत - पितरोंको भोजन अग्नि वा श्रमि जाते सहोदर ब्राह्मणद्वारा देना सिद्ध न हो जाए, जिससे आर्यसमाज वेद्य पक्षका विध्वंस हो जाए? कन्द आदि खाने में आप ईश्वरको पदार्थ क्यों खींचते हैं? क्या वह आपका नौकर है, जो दग्ध ( दग्धका पदार्थ अर्थ ' जलाया हुआ ' है, ' भुना हुआ ' नहीं, उसकी संस्कृत तो हत्या ' भृष्टाः ' होती है । ) कन्दादि - भोजनको आपको खिलावेगा! क्या पृथिवी में गाड़े हुए कन्दादिको पृथिवीसे निकालकर वह दिख श्रयै समाजियोंको खिलाता है? यदि ऐसा है; तब तो उसके खानेवाले आर्यसमाजी धन्य हैं । ( अथ यदि जनता पठित एवं निष्पक्ष होती; तो ऐसे अर्थ करते- प्रलय वालेका अपमान करती । यदि मनुका राज्य होता; तो ऐसे उपदेशकको कड़ा दण्ड मिलता । हा! कैसा है यह छल कि कहीं अर्थ अपठित जनता में हमारा मान भङ्ग न हो जाए? वेदका भले अर्थात ही अङ्ग भङ्ग हो; पर इन्हें इससे क्या? छान्द अथर्ववेद के इसी सारे १८ वें काण्डमें प्रायः ' पितर ' देवा Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 145

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २६२ ] तो क्या वहाँ भोज्यपदार्थ ही देवता हैं? ' न तु पृथक्त्वेन और हैं । निर्वक्तव्याः, प्रकरणश एव तु निर्वक्तव्याः ' ( १३ । १२ । १ ) जिन्हें मन्त्रा खाने के निरुतके वाक्यको भी भुलाकर, प्रकरणका अनादर करके लिए इस बादीने स्वतन्त्रता ( पृथक्त्व ) से अर्थ किया है । क्या समूचे पदार्थ प्रकरणमें ‘ कन्द ' अर्थका समन्वय है? इसके साथ वाले ' ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वघया मादयन्ते । त्वं है; निघण्टु सान् वेत्थ यदि ते जातवेदः! स्वधया यज्ञं स्वधितिं जुषन्ताम् ' वा है कि - यहाँ ( अ. १८ | २ | ३५ ) इस मन्त्रमें भी ' ये तान् ' इससे ' पितर ' ही लिये अमित जाते हैं; क्या यहाँ भी जले हुए कन्द आदि ही पितर हैं? | समान वे द्युलोकके बीच में स्वधा से कैसे हर्षित होते हैं? ' क्या भोज्य ईश्वरको पदार्थ द्युलोक में निराधार ही ठहरते हैं? वे तो स्वयं भोज्य - ( दुग्धका पदार्थ हैं; तो स्वघा ( अन्न ) से कैसे तृप्त होते हैं? यह है बेदमन्त्र-संस्कृत तो हत्याका आदर्श!!! लावेगा! ( १२ ) अब हम एक अन्य आर्यसमाजीकी भी लीला लकर वह दिखलाकर विस्तारके डर से इस विषयको समाप्त करते हैं ।-तो उसके ' वाराहे पृथिवी संविदाना सूकराय विजिहीते मृगाय ' ( अथर्व. १२ | १ | ४८ ) इस मन्त्रमें वराहावतारका सङ्केत है, जिसने र्थ करने- प्रलय के बाद पृथिवीका उद्धार किया था । यशःपाल नामक एक तो ऐसे आर्यसमाजीने अपनी पुस्तक ' वैदिक - सिद्धान्तदर्पण ' में इसका कि कहीं अर्थ किया है— ' वाराहका अर्थ मेघ है, वराहस्येदं बाराहम् का भले श्रर्थात् जल । सुकर - सूर्य सुष्ठु करा रश्मयो यस्य स सुकरः-छान्दसं दीर्घत्वम् । विजिहीते- जाता है । ओहाङ् गतौ इतिघातोः - देवता CC - 0. Ankur Joshi निरुक्तकी इत्या [ २६३ लटि प्रथमपुरुषस्यैकवचने रूपम् । संविदाना - सम्यक् गच्छन्ती । मृगाय - मृजु शुद्धो, मार्ष्टि शोधयतीति मृगः । शुद्ध करने वाला ( यजुः ५ २० महीधर ) अर्थात् जलके साथ भली - भांति मिली हुई पृथिवी सब पदार्थोंके शोधक सूर्यके चारों ओर घूमती है ' । गया विचारा शब्दकोष! शोचनीय है तू संस्कृत - साहित्य! पण्डितो! समाप्त होगये हो । आप लोगोंके सामने ही संस्कृत-भाषापर कुल्हाड़े चलाये जा रहे हैं । यशःपालजीसे प्रष्टव्य है कि- ' सूकर ' का अर्थ ' सूर्य ' कहांसे लिया? ' यदि वेदमें यौगिक-शब्द हैं, रूढ वा योगरूढ नहीं ' यही इस अर्थ करनेमें कारण है; तो ' पृथिवी ' शब्दका जमीनमें रूढ अर्थ कहांसे लिया? केवल यौगिक अर्थ माननेपर यशःपालजी भी ' सूकर ' बन जावेंगे, क्योंकि इनका हाथ अच्छा है, जो कि अपनी लेखनीसे अपने मतको बलात् सिद्ध कर देता हैं? ' पृथिवी ' का अर्थ ' विस्तीर्ण - कीर्ति ' ले लिया जाय, वह सूकर यशः पालजीको प्राप्त होती है । वाराहेण संविदाना - वह कीर्ति उत्तम आहारप्रदानसे मिली हुई है अर्थात् - ऐसा अर्थ करनेसे आर्यसमाजी यशःपाल-जीका यश भी करते हैं; और उत्तम आहार ( वृत्ति ) भी इन्हें देते हैं । और यह, मृग भी हैं, इधर - उधर उपदेशार्थं घूमा भी करते हैं, वा अपने आसामियोंको ढूँढा भी करते हैं । अपने मतका मण्डन किया करते हैं, अतः वे मण्डूक भी हैं; दूसरोंका अर्थ चुराया करते हैं; अतः मूषक भी हैं । कैसा अन्वित अर्थ है १ । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 146

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२६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) अरे छलियो! छलको छोड़ो, कुछ परमात्मा के दण्डसे भी डरो । यदि यौगिक होनेसे ' सूकर ' का ' सूर्य ' अर्थ करते हो; तो दूसरा अर्थ क्यों नहीं करते? ' सूकर ' से हाथी लीजिये, शोभनः करो यस्य । ' पृथिवी ' से मोटी हथनी ले लीजिये । वाराहेण-' अच्छे आहारसे युक्त ' यह अर्थ क्यों नहीं करते? ' सूकराय ' का ' सूर्यके चारों तरफ ' यह अर्थ कैसे किया? ' वाराहेण ' का ' जल ' अर्थ निकालना कितना जबर्दस्तीका है? ' मृगाय ' के अर्थ करनेमें महीधरको प्रमाण मान लिया, पर महीधरने अपने भाष्य में ' सूर्य ' अर्थ नहीं किया । तब वादीने महीघरका नाम देकर अपनी कल्पना कैसे की? उसी मन्त्रमें महीधरने ' कुचरः- मत्स्य-कूर्मादिरूपेण इन्द्रः पृथिव्यां चरति ' यह अवतारवादका अर्थ किया है । कूर्म - आदिके साथ तीसरा अवतार वराह है; तो ' वाराहेण ' इस पूर्वोक्त मन्त्रमें ' वराहावतार ' अर्थ क्यों नहीं मान लेते, जबकि वह वहाँपर ठीक संगत होता है? इस कारण यहाँ हमारी वह बात सिद्ध होती है कि यह लोग यौगिकता के बहाने मन्त्रोंके पदोंकी तोड़मरोड़ करके निज - कल्पित दिया करते हैं, यही होती है ' वेदमन्त्रहत्या ' । ( १३ ) इसी प्रकार स्वामी दयानन्द आदि मन्त्रों में दे॒वतावाद मानकर भी अर्थ उसका देवतावादसे विरुद्ध कर डालते हैं । वहाँ स्वप्रमाणित निरुक्तादिका भी अनादर कर दिया करते हैं । जैसे कि - ' द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं ' ( ऋ. १।१६४।४८ ) इस मन्त्रका देवता ' संवत्सरात्मा कालः ' है, उन्होंने अपने वेदभाष्य में तथा क्या सनातनधर्म परिवर्तन हो सकताहै? ३६६ । स्वप्रकाशित मूलवेदमें भी यही देवता माना है । इसका क यह हुआ कि इस मन्त्र में ३६० दिन तथा नहीं संवत्सर ( वर्षे ) का वर्णन है । निरुक्तमें भी १२ मासो नहीं इस मन्त्र केलिए लिखा है- ' द्वादश प्रधयः- इति मासानाम् षष्टिश्च शतानि संवत्सरस्य अहोरात्रा: ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ( ट. २०७ ) कर डाला; उसकी ३६० कीलें और की है कपोल - कल्पना!!! सो यह विद्वानोंका कर्त्तव्य है वेदमन्त्रोंकी हत्या की जा रही है, द्द व त्रीि आते ( ४/२७११ ) पर स्वा.द. फकीर में ' हवाई जहाज ' का रहता १२ दवजे बता दिये । बदलत इ कि यौगिकता केबहाने पुराना अपने अर्वाचीन वा मनमाने सिद्धान्त जो उनसे तोड़ - मरोड़ करके निकाले दयान वत्ती ह रहे हैं; इनको रोकें । नहीं तो वेदोंकी दुरवस्था परिवर्त हो जाएगी - औ कहना इन लोगोंकी इस कार्यवाहीसे वेदोंको ही लोग अप्रमाण मानते श्राश्रय लग जाएँगे । एकमात्र जहाज ( ६ ) क्या सनातनधर्ममें परिवर्तन हो सकता है? हुए क्या सनातनधर्म संघटनका विरोधी नहीं है, इसका स्वरूप है । देखिये-संघटनमय है । सनातनधर्म के द्वारा इतनेसे ही संघटन प्रत्यक्ष जो धर्म है कि हम दूसरे वर्णके धर्म - कर्म एवं वृत्तिपर डाका न डालते चलनेवा हुए अपने - अपने वर्णके धर्म एवं कर्त्तव्य एवं वृत्तिका अनुसरण फेंक देग करते हुए संसार - यात्राका निर्वाह करते हैं । सनातनधर्म के स्वरूप जो पर हमें विचार करना है । सनातनधर्म आदि - अन्तवाला धर्म यिक का CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 147

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) इसका नहीं है । हम उस घर्मके अनुयायी हैं, जिसका उदय अस्त कभी २ मासों नहीं होता । केलिए कहते हैं कि सनातनधर्म क्या वस्तु है? सनातन से हवै से श्राते सुधारक हुए धर्मका अनुसरण ठीक नहीं है । यह तो ' लकीरका त्रीि - स्वा. फकीर ' होना है । समय परिवर्तनशील होता है; अतएव बदलता दु. ज ' का रहता है । समयकी परिवर्तित परिस्थिति के अनुसार धर्म भी दिये । बदलता रहता है ' । इसपर कुछ विचार किया जाता है । यह ठीक है कि - आज के बहाने पुराना समय नहीं है । कभी मट्टीका दीया, देसी तेल, रूईकी न दयानन्द बत्ती द्वारा साधारण प्रकाश दिया करता था । इसमें अनेक निकाले परिवर्तन हुए । आज बिजलीकी लाईट मिलती है । सुधारकोंका जाएगी श्री कहना है कि क्या आज भी टिमटिमाते हुए मट्टी के दीपकका माय मानते श्राश्रयण बुद्धिमत्ता है? कभी बैलगाड़ी चलती थी, यही एकमात्र सवारी थी । आज रेलगाड़ी, ट्राम, मोटर, हवाई-जहान आदि विद्यमान हैं । आजकी पुरानी लकीरको पीटते है । हुए क्या बैलगाड़ी से यात्रा करनी चाहिये? सुधारक कहते हैं--स्वरूप ही देखिये- समयका प्रवाह बहुत प्रबल होता है, उसके अनुसार प्रत्यक्ष जो धर्म चलेगा; वह स्थिर रहेगा । समयकी गति से विरुद्ध नडाल चलनेवाला धर्मं स्थिर नहीं रह सकता । समय उसे उठाकर परे फेंक देगा ' । अनुसरण के स्वरूप जो लोग ऐसा कहते हैं, उनके दृष्टिकोण में धर्म एक साम-चाला धर्म कि कानून है । कानून परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं । क्या सनातनधर्म में परिवर्तन हो सकता है? I III उनके परिवर्तनार्थं व्यवस्थापक सभाएँ नियत की जाती हैं । इसलिए वे कहते हैं कि इस बीसवीं शताब्दी में सृष्टिकी आदि-की मनुस्मृति प्रमाण नहीं हो सकती । नवशिक्षित मनुस्मृति तथा सनातनधर्मके नाम से ही संकुचित होते हैं । वे नवयुगकी शिक्षाको पसन्द करते हैं, और कहते हैं कि जब तक सनातन-धर्म में परिवर्तन न होगा, तब तक उसमें कोई सार नहीं रहेगा । यूनान, मिश्र आदि देशोंकी प्राचीन संस्कृति तथा प्राचीन धर्मको प्रमाणित करके वे कहते हैं कि वहांके धर्मोंमें परिवर्तन होगये हैं; तब हमारे धर्म में भी परिवर्तन क्यों न हो? ( २ ) ' आलोक ' पाठक सोचें कि क्या ऐसा कहने वाले सच कहते हैं? यदि हम इस विषय में गम्भीरता से विचार करें; तब सबसे पूर्व विचारणीय यह होगा कि धर्म है क्या? क्या धर्ममें परिवर्तन होता है; अथवा धर्म सनातन होता है? यदि धर्म बदलता रहने वाला पदार्थ है; तो हमें भी उसमें परिवर्तन करना पड़ेगा; परन्तु देखा यह जाता है कि - सनातन - धर्मका तब तक परिवर्तन नहीं होता; जब तक धर्मी ( धर्मवाले ) का लोप न हो जाए । तभी कहा गया है- ' धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः । यत् स्याद् धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः ' । यह ठीक भी है; क्योंकि- ' धर्म ' शब्द संस्कृत भाषाका है; उसकी सिद्धि धृन घातुके आधार पर है । संसारकी प्रत्येक जड़-' चेतनात्मक वस्तुका स्वरूप अपने धर्मके आधार पर अवलम्बित है । यदि वस्तुका धर्म न रहे; तब वह वस्तु अपने स्वरूपसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 148

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२६८ ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) गिर जाती है; इसी कारण धर्म - विरुद्ध कर्मको पातनका कारण होनेसे ' पातक ' कहा जाता है । देखिये- अग्निके बिना किसीका भी कार्य निर्वाह नहीं होता । उस अग्निके प्रकट करनेके भी कई तरह के प्रकार होते हैं । पहले अग्नि अरणिमन्थनके द्वारा प्रकट की जाती थी जैसे कि - आजकल यज्ञ आदियों में की जाती है । अग्निके प्रकट करनेके प्रकार कैसे - कैसे बदले; इसमें प्रमाण इतिहास में भरे पड़े हैं । आज विज्ञानने दियासलाईके घिसनेसे अग्नि प्रकट करनेका प्रकार आविष्कृत किया है । आगे इससे भी अच्छा प्रकार ढूँढा जावेगा । आजकल ' लाईटर ' से सिगरेट जला ली जाती है; आजकल ' हीटर ' में बिजलीका बटन दबाकर आगको प्रकट करके उससे यथायोग्य कार्य ले लिया जाता है । पर यह सब परिवर्तन केवल प्रकारोंमें हुआ है । अग्निके धर्म में परिवर्तन कुछ भी नहीं हुआ । अग्निका सनातन - धर्म उष्णता है; वह अब भी वैसा है । बाह्य साधन तो बदल सकते हैं; पर धर्म नहीं । वह तो सनातन है । अब जलकी प्राप्तिके साधनोंमें भी बड़े परिवर्तन होगये हैं; पर धर्म जलका भी वही सनातन है, जो लाखों वर्षोंसे था । उसका धर्म प्यास बुझाना और शीतलता है । क्या उसमें परिवर्तन हुआ है? नहीं; वह तो यथावत् है । प्रकाशके भी प्रकार बदल गये हैं । प्रकाशका धर्म है अन्वेरेको दूर करना । बहु भी सनातन - धर्म अब भी वैसा है । जब कोई भी जड़ वा CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या सनातन धर्म में परिवर्तन हो सकता है २७० ! [ २६६ चेतन, पशु वा पक्षी अपने सनातन धर्मको नहीं लेने प क्या मनुष्य ही ऐसा निकृष्ट है कि वह अपने बदलता; ब रहना सनातन छोड़ देता है? | यदि ऐसा करता है; तो उसे - धर्मको पड़ेगा प्रिय नहीं है, वह उस आत्मा के भोग - साधन शरीरको अपना आत्मा | f ही कालकवलित कराना चाहता है । इससे सिद्ध है कि अकालमें । आदि भी अपना सनातनधर्म न छोड़ना चाहिये । अपने मनुष्यको नया त्यागसे अग्नि, अग्नि नहीं रह जाती, भस्म हो जाती सनातनधर्मके । पहले जल नहीं रह जाता, कीचड़ वा भाप बन जाता है । वृक्ष है; जल प, बिश्ले धर्म पुष्प - पत्रादिसे रहित होकर स्थाणु ( हूँठ ) हो जाता भी नह तब मनुष्य अपने सनातनधर्मके है । त्यागसे मनुष्य कैसे रह सकता घ है? धर्म वही है जो एक स्वरूपमें रहे । किस गाय सनातनसे घास खाती है और दूध देती है । शेर सनातनसे ही शिकारको पसन्द करता है । कोयलकी मधुर क्यों? अनादिकाल से वैसी चली आ रही है । इस प्रकार भाषा धर्म में चेतन किसी भी वस्तुका सनातनधर्मे जब जढ़- थे । कभी भी नहीं बदलता; तब क्या मनुष्य ही एक निम्न है, जो बार - बार धर्मका परिवर्तन मुहम्म करे? यह ठीक नहीं, उसे भी धर्म में दृढ रहना चाहिये; अन्यथा कि - पुर वह अपने स्वरूपका नाश कर बैठेगा । प्रकारका भी परिवर्तन अनुसर उचित नहीं होता । मट्टी के दीपकको छोड़कर जो कि - बिजुलीका पैगम्ब हो सक दीपक लिया जाता है, उसमें कैसी पराधीनता है? बिजली के इनके विकृत होनेपर दीपावली के दिन सारा नगर ही अन्ध- कोई परभी कारमय हो जाता है । चक्कीको छोड़कर गेहूँ पीसने की मशीनके Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २७० ] [ २उसमें विकृति आनेपर घर में अन्न होते हुए भी भूखा लेने पर जवाब पड़ेगा अथवा उसका निस्सार जला हुआ आटा खाना - धर्मको रहना पड़ेगा, जिससे अपेक्षित पुष्टि नहीं होगी । आत्मा नियम बदलते रहते हैं । सरकार के प्रतिनिधि राष्ट्रपति अकालमै श्रादिका शासनकाल पाँच वर्षोंके बाद बदल जाता है । यदि - मनुष्यको नया प्रतिनिधि आकर परिस्थिति में परिवर्तन देखे, अथवा तनधर्म के पहलेके कानूनके बनानेके समयमें की गई असावधानताका है; जल विश्लेषण करे; तब जाकर कानून बदलता है; नहीं तो कानून अपने भी नहीं बदलता । नाता है । धर्मको ही लीजिये । ईसाइयोंसे पूछिये कि आपके पूर्वज ह सकता किस धर्मको मानते थे? । वे कहेंगे कि उनके पूर्वज यहूदी धर्म-को मानने वाले थे । पर अब वे उस धर्मको नहीं मानते । यह है । शेर क्यों? इसलिए कि - नये पैगम्बर ' ईसा ' के आनेके पीछे पहलैके भाषा धर्म में परिवर्तन होगया । मुसलमान पहले ईसाई धर्मको मानते जड़- थे । आज भी वे ईसाको पैगम्बर मानते हैं; परन्तु हज़रत बदलता; मुहम्मदके इस्लामधर्मके प्रचारके पीछे वे आवश्यक मानते हैं सरिवर्तन कि पुराने धर्मका अनुसरण न करके नये ' इसलाम ' धर्मका अन्यथा अनुसरण किया जावे । इसका यह अभिप्राय हुआ कि नये रिवर्तन पैग़म्बरके आनेपर पुराने पैगम्बरके स्थापित धर्ममें परिवर्तन जुलीका हो सकता है । परन्तु हमारे सनातनधर्मका ' पैगम्बर ' कहाँ है? इसका तो अन्ध- कोई भी ' नवी ' वा ' प्रैगम्बर ' नहीं । यदि है भी; तो वह शीन CC - 0. Ankur Joshi क्या सनातनधर्म में परिवर्तन हो सकता है? [ २७१ अनादि - सिद्ध परमेश्वर हैं । उसका नया ' पैगम्बर ' नया परमेश्वर जब तक न आवे; तब तक सनातनधर्म में परिवर्तन नहीं हो सकता । न तो ईश्वर बदलता है; न ही उस द्वारा धर्म बनाने के समय कोई त्रुटि रही । तब उस ईश्वरसे जारी किये सनातनधर्म-में भी परिवर्तन क्यों वा कैसे हो? सनातनधर्म नहीं बदलता | हाँ, सम्प्रदाय वा मत बदलते रहते हैं; क्योंकि वे मनुष्योंसे प्रवर्तित किये जाते हैं । वह मानुषी धर्माभास स्वयं ही परिवर्तन-शील रहेगा; किन्तु सनातनधर्म प्रकृति - सिद्ध ईश्वरीय नियम-नियन्त्रित धर्म है; इसी कारण इसमें परिवर्तन भी कभी नहीं होता । जो पदार्थ पहले तमोगुणी थे; वे अब भी वैसे हैं; इसलिए मद्य आदि तमोगुणी पदार्थ जो वर्जित हैं; वे आज भी वैसे ही छोड़ने योग्य हैं । तब फिर धार्मिक बन्धनोंमें शिथिलता कैसे हो? हम देखते हैं कि- सनातनधर्मकी छोटी से छोटी बातको भी जब वैज्ञानिक कसौटीमें कसा जाता है; तत्र वह खरी उतरती है । जैसे गोबर के लेपको ही ले लीजिये I । तीस - चालीस वर्षों से पहले हमपर उपहास किया जाता था कि- हिन्दुओंके पूर्वजोंने यह पशुकी टट्टी लेपके लिए क्यों नियमित की है? कोई उत्तम वस्तु उन पूर्वजोंके ध्यानमें नहीं आई; तब वे गोबर से कार्य न करते; तो किससे करते? उनको गोवर के स्थान सीमेण्ट-से कार्य लेना चाहिये था; जिसके उपयोगको न जानते हुए ही पुराने लोग गोबरका उपयोग करने लगे ' पर आज वैज्ञानिकोंने Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२७२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) सिद्ध कर दिया है कि - गोबर में ऐसा अद्भुत विशेष गुण विद्यमान है जो कि बाहरी दोषको संक्रान्त करनेका अवसर ही नहीं देता । वैज्ञानिकोंके ध्यानमें यह बात अभी आई है; पर हमारे प्राचीन महानुभाव तो यह सनातन काल से ही जानते थे; इसीलिए गोबरका लेप करते थे । जिस घरमें शालग्राम तथा तुलसी और गाय न हो; उस घरको इमारी सभ्यतामें श्मशानके समान माना जाता है । बङ्गालमें एक यूरोपियनने कुछ भूमि खरीदी थी । उसमें बगीचा लगाना चाहा । उसने देखा कि मजदूर लोग वहां दो दिन काम. करनेमें ही मलेरिया - चुखारसे पीड़ित हो जाते हैं । अपने एक भारतीय मित्रकी सम्मति से उसने बगीचेके चारों ओर तुलसी लगाई । ऐसा करनेपर उस स्थानसे मलेरियाका प्रकोप हट गया । यह बात यूरोपियनोंके लिए नई हो सकती है; पर सनातनधर्मी लोग तो तुलसीको सनातनसे ही तीन प्रकार के तापोंको दूर करने वाली मानते हैं । ( ३ ) अब वर्णव्यवस्थाको ही लीजिये । प्रत्येक वर्णके खान-पान एवं आचार के नियम अलग - अलग हैं । एक वर्णका सम्बन्ध यदि दूसरे वर्णके साथ हो; तो वर्णसङ्करता हो जाती है, जिसे आजकल गाली माना जाता है । आजकल इस वर्णसङ्करता के लिए कई व्यक्तियोंकी उत्कट अभिलाषा रहती है । वे इसी में भारतकी उन्नति समझते हैं । डा ० गौडने वर्णसङ्करी कानूनको पारित करनेकेलिए महान् परिश्रम किया था । अन्तमें वह उसे पास CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या सनातनधर्म परिवर्तन हो सकता है? k कराकर ही प्रसन्न हुए थे । अमेरिकाके डा ० इब्राहीमने विषय में ३५ साल तक निरन्तर रिसर्च करके आविष्कार किया था । यह यन्त्र रक्त परीक्षा करके एक यन्त्र कि - अमुकका स्वभाव कैसा है? वह अपने माता बताना हुआहुआ है या नहीं? इस यन्त्रमें दो ' पेण्डुलेम - पिता यदि सगोत्र स्त्री - पुरुषका रक्त डाला जावे तो ' हैं । इसे , उसका स्पन्दन जाता है । विभिन्न दो जातियों का रक्त डालें; तो उनकी स अत्यन्त तीव्र होती है । पर जिस रक्त सम्बन्ध में शास्त्रकी गति है, वहां कुछ भी विशेष परिवर्तन नहीं होता । अनुमति इसमें उक्त डाक्टरने यह परिणाम निकाला था कि- नैकलि सम्बन्धसे या तो कुल लुप्त हो जाता है, या सन्तान निर्बुद्धि होत है । दूसरे प्रकारके सम्बन्धसे उत्पन्न सन्तान में माता - पिता अवगुण तो सारे आएँगे; परन्तु गुण नहीं आवेगा । तीसरे शास्त्रानुमत - सम्बन्धमें सब ठीक रहता है । मनुस्मृतिसें में । देखिये- यही लिखा है या नहीं? बीसवीं शताब्दीका विहार । आज जो कुछ कहता है; सनातनधर्मने उसीकी लाखों वर्षोंसे I ही शिक्षा दे रखी है । ( ४ ) और देखिये- जितने देवता हैं, सभीकेलिए पृथक् - पृथक् स्तोत्र हैं, जिनका भक्त लोग ध्यानपूर्वक उच्चारण करते हैं, आप यहां कहते हैं कि यह किसलिए? इसपर सुनिये - वि एक यूरोपियन - स्त्री काला बोर्ड और चाक तथा बिजुलीको तारको जोड़कर मनो - विनोदार्थ गानेकेलिए शुरू हो गई । कुछ सघ ० १८ Gujarat. An eGangotri Initiative