सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 131–140

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 131–140

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श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) २३४ j में भी इनका ऐसा प्रयत्न देखा जाता है, देखिये उसके बल्कि नियोगखण्डन मनुस्मृति - प्रकरणमें श्रीतुलसीराम - स्वामीकी अर्थोंमें यह शब्द ' । केवल उसी में नहीं, भगवद्गीता तथा निरुक्तादिमें आदि ऐस ' तोड़ - मरोड़ अर्थ निकालने की चेष्टा करते हैं 1 । निरुक्तमें की हत्या. भी अपना मनमाना - पालीरत्न ( गुरुकुल काँगड़ी के स्नातक ) ने ' गन्धर्वाः, तनधर्मश श्रीचन्द्रमणि पितरो, देवाः, असुराः, रक्षांसि ' ( ३ | ८ | १ ) इन देव - पश्चजनोंका श्रर्थे ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासाश्रम तथा अनाश्रमका कि- श्रार्य. विचित्र अर्थं कर दिया है? । गीता में ' तदात्मानं सृजाम्यहम् ’ मरोड़ के अर्थमें कैसी चतुरताएँ करते हैं? । जहाँ इन लोगोंका यह तकी पुष्टि यन्त्र कुण्ठित हो जाता है, वहाँ प्रक्षिप्ततारूप नये य करते हैं: वाक्य वा प्रमाणका ही बहिष्कार कर डालते हैं । जहाँ जैसे कि-के - द्रष्ट बहिष्कारमें यह लोग अपनी सफलता नहीं देखते; वहाँ आलङ्का-निन्द्य - यल रिकताका बहाना बनाकर उसकी वास्तविकताको छिपा दिया नां भोगा । करते हैं । इत्यादि ( ७ ) अब हम पाठकोंका अधिक समय न लेकर कई आर्य-भुवन समाजियोंके अथें उपस्थापित करते हैं । विद्वान् लोग परीक्षण वं कर्मच करें कि क्या उनसे किये अर्थ ठीक हैं? हम यहाँ नमूना मात्र भी नहीं दिखलाएँगे । पहले आर्यसमाज के नेता स्वा. दयानन्दजीके ही यह एक का आदर्श देखिये-न्यायसे संस्कारविधिके १५४ पृष्ठमें ' इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनोभा । बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां करता नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' ( १४ | १ | ५४ ) यह अथर्व का मन्त्र विवाह-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वेदमन्त्र हत्याका दिग्दर्शन [ २३५ प्रकरणमें स्वा.द.जीने उद्धृत किया है । इसमें इन्द्र आदि देवताओंसे विवाहित नारीकी प्रजावृद्धि प्रार्थित की गई है । यह स्पष्ट मन्त्र है - इन्द्राऽग्नी, द्यावापृथिव्यौ मातरिश्वा, मित्रा-वरुणो, भगः, उभौ अश्विनौ, बृहस्पतिः, मरुतः, ब्रह्म, सोमः [ एते देवाः ] इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' यह अन्वय है । लेकिन इसमें पुराणसमर्थित देवयोनि तथा उसकी पूजा-प्रार्थना वैदिक सिद्ध होती है । इस अर्थके स्वीकार करने पर स्वा. दु. की अपनेसे निषिद्ध देवपूजाके सिद्ध हो जानेसे वे व्याघातदोषग्रस्त हो जाते हैं । अतः स्वामीजीने सोचा कि ऐसी चतुराईसे अर्थ करना चाहिये कि अपने मतकी हानि भी न हो, और अर्थ भी हो जाए । इधर यह स्वप्रमाणित वेदमन्त्र हैं, पुराणका यह श्लोक नहीं कि ' यह प्रक्षिप्त है ' कहने से इससे जान छूट जावे । वेदमें स्वामीने प्रक्षिप्तता मानी नहीं । यदि वे वेदमें भी प्रक्षिप्तता मान जाते; तो चेलोंको बहुत सुविधा हो जाती । कई ऐसे मन्त्र आ जाते हैं, जिनके अर्थपरिवर्तनमें सुविधा न होनेसे चेलोंकी शास्त्रार्थोंमें बहुत दुर्दशा होती है । ( यद्यपि श्राजकल कई चेले बालखिल्य, कुन्तापसूक्त, सामवेदके आरण्यक पर्व आदिको प्रक्षिप्त मानने शुरू होगये हैं ) यह सोचकर स्वा.द.जीने संस्कारविधिमें उक्त मन्त्रका अर्थ विचित्र किया । संस्कृतज्ञ विद्वान् स्वामीके अर्थकी युक्तायुक्तताको सूक्ष्मतासे सोचें । वह अर्थ यह है- ' हे मेरे सम्बन्धी लोगो! जैसे इन्द्राग्नी-An eGangotri Initiative

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२३६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) बिजुली और प्रसिद्ध अग्नि, द्यावापृथिवी सूर्य और भूमि, मातरिश्वा अन्तरिक्षस्थ वायु मित्रावरुणा - प्राण और उदान तथा भगः - ऐश्वर्य, अश्विना - सद- वैद्य और सत्योपदेशक, उभा- दोनों, बृहस्पतिः - श्रेष्ठ न्यायकारी बड़ी प्रजाका पालन करने हारा राजा, मरुतः - सभ्य मनुष्य, ब्रह्म - सबसे बड़ा परमात्मा और सोमः-चन्द्रमा तथा सोमलता श्रोषधीगण, सब प्रजाकी वृद्धि और पालन करते हैं, वैसे इमां नारीं - इस मेरी स्त्रीको प्रजया - प्रजासे बढ़ाया करते हैं; वैसे तुम भी वर्धयन्तु बढ़ाया करो ' । अब पाठक देखें । क्या मन्त्रमें ' जैसे - वैसे ' अर्थ बतानेवाला ' यथा - तथा ' पद है? क्या स्वामीने परमात्मा की यह त्रुटि निकाली? यहाँ अब स्वामीका ' इन्द्रं मित्रं वरुणं ' ( ऋ. १।१६४ । ४६ ) मन्त्र कहां गया कि वेद में इन्द्र, अग्नि आदि शब्दोंसे परमात्माका बोध होता है, देवविशेषोंका नहीं, और प्रार्थना परमात्मासे होती है, देवविशेषोंसे नहीं । मन्त्रका ' वर्धयन्तु ' देवताओंसे प्रार्थना करा रहा है, यद्यपि स्वामीने उसका गलत अर्थ कर दिया है । ' इन्द्र ' का यहाँ स्वामीने ' विजुली ' अर्थ कर दिया । मेध्य गौके प्रशंसा - सूक्त में ' इन्द्रः शिरो ' ( अथर्व. ६/७ १११ ) ' विद्युदु जिह्वा ' ( अ. ६।७ + १।३ ) यहाँ इन्द्रको गायके सिरमें तथा बिजुली-को उसकी जिह्वामें स्थित कहा है; अतः इन्द्र और विद्युत् भिन्न वस्तु सिद्ध हुए । ऋग्वेदमें बहुतसे सूक्त इन्द्रके हैं; तो क्या यह विद्य तुकी स्तुतिसे पूर्ण हैं? यदि ऐसा है; तो मूर्तिपूजा ' वैदिक वेदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन [ २० २३८ सिद्ध होगई । फिर मूर्तिपूजा करनेवाले सनातनधर्मियो अथ वैदिक कैसे कहा जाता है? ' इमां नारीं प्रजयाव वर्धयन्तु हुआ यहाँ वर्धन - क्रिया के कर्ता इन्द्र आदि हैं; और यहाँ प्रार्थनामें मन्त्र लोट् है । तब स्वयं जड़पदार्थसे सीधा, वा परमात्मा के उद्देश्यसे चाल पदार्थ वा देवतासे प्रार्थना करानेवाले वेदको भी । स्वामी प्राथ अवैदिक मान लेंगे? | क्या स्वामी जड़के पूजक वा प्रार्थक होकर वैदिक हो जाते हैं; और जड़के अधिष्ठातृदेवकी । ' जह पूजा. प्रार्थना करनेवाले सनातनधर्मी अवैदिक हो जाते हैं; क्या [ इन यह अपने घरका राज्य है, जो चाहा अर्थ कर दिया? | अप यदि जड़की प्रार्थना, स्तुति, नमस्कार वेदकी शैली कही । वह जावे; तो मूर्तिपूजा भी वैदिक होगई; नहीं तो वेदको भी मिथ्या- विध ज्ञानप्रसारक मानना पड़ेगा । ' दिव् ' का अर्थ ' सूर्य ' इसलिए किया गया है कि - यु - स्वर्गलोक कहीं वैदिक न हो जावे? मित्र-वरुणका प्राण - उदान अर्थ इसलिए कर लिया कि कहीं मित्र यह वरुण नामक देवता सिद्ध न हो जावें । उड़ा यदि कहा जावे कि- स्वामीजीने अपने किये अर्थ में बिजुली- नहीं अग्नि आदि से प्रार्थना नहीं की; किन्तु सम्बन्धियोंसे प्रार्थना की है; तब तो हमारी वह बात कि - ' स्वा. द. तथा उनके अनुयायी स्वेच्छानुसार वेदार्थको ' तोड़ - मरोड़ ' यन्त्रसे विकृत कर दिया वा करते हैं ' सत्य होगई । स्वामी वा उनके अनुयायियों से प्रष्टव्य अथ है कि- स्वामीने ' मेरे सम्बन्धी लोगो! ' यह पद कहांसे लिया! • सन्त वेदमन्त्रमें तो बहु है नहीं; क्या परमात्माकी भूलैसे छूट गया! वार CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २३८ ] वे इस मन्त्रके देवता हैं? क्योंकि - प्रतिपाद्य ' देवता ' अथवा क्याहै | और ' वर्धयन्तु ' इस प्रार्थनात्मक लोट - क्रिया के करता मन्त्रप्रतिपाद्य इन्द्र आदि हैं, वा सम्बन्धी? क्या यहाँ इस यह कारण नहीं कि - सनातनधर्मसम्मत देवताओंकी चालाकीका प्रार्थना यहाँ सिद्ध न हो जाए, क्योंकि - प्रयत्न करनेपर भी यहाँ इन्द्र आदिका ' परमेश्वर ' अर्थ सिद्ध नहीं होता । अब यहाँ ' जहाँ - जहाँ स्तुति, प्रार्थना... आदि लिखे हों, वहाँ - वहाँ [ इन्द्र आदि ] नामोंसे परमेश्वरका ग्रहण होता है ' ( स.प्र.१ पृ. ३ ) अपने इस नियमको स्वामीने व्यभिचारी सिद्ध कर दिया । यदि वह इन्द्र आदि देवविशेषोंको यहाँ मानें; तो उनका स्ववचन-विधात गला पकड़ता है । ‘ हे सम्बन्धी लोगो! जैसे ‘ ‘ “ मरुतः - सभ्य मनुष्य इस मेरी स्त्रीको प्रजासे बढ़ाया करते हैं. वैसे तुम ' भी बढ़ाया करो ' यह स्वामीजीका उक्त - मन्त्रका अर्थ भी विचित्र है । देवपूजा के उड़ाने में लगे हुए स्वामीने इस अर्थ में हो रहे हुए अनौचित्यको नहीं देखा! क्या वरकी स्त्रीको अन्य सभी मनुष्य [ क्योंकि ' यहाँ वर कह रहा है ] भी सन्तानसे बढ़ाते हैं? वैसे ही सम्बन्धी भी बरकी स्त्रीको सन्तानसे बढ़ावें? वह स्त्री वरकी पत्नी है, वा बाकी सभी सम्बन्धियोंकी भी कि वे उसे सन्तानसे बढ़ावें? अथवा क्या वर नपुंसक होता है कि वह अपनी पत्नीको . सन्तान द्वारा बढ़ाने की सम्बन्धियोंसे प्रार्थना करता है? क्या वाराङ्गनाके साथ वरका विवाह होता है कि अन्य सभ्य - मनुष्य 3 CC - 0. Ankur Joshi वेदमन्त्र- हत्याका दिग्दर्शन [ २३६ [ ' मरुतः ' का स्वामीने ' सभ्य - मनुष्य ' अर्थ किया है ] पहले उस पत्नीको प्रजासे बढ़ाते हैं; फिर सम्बन्धी उसे प्रजासे बढ़ाते हैं, फिर पति उसे प्रजासे बढ़ाता है । स्वामीजी धन्य हैं! शायद यहाँ भी वैबाहिक मन्त्रस्थित ' देवृकामा ' ( ऋ. १०/८५ ( ४४ ) पदके निज - कल्पित अर्थकी भांति ' नियोग ' का अर्थ स्मृति में आ जाने से उनने वरको अपनी स्त्री में अन्योंसे सन्तानकी प्राप्त्यर्थ प्रेरणा की हो; यह है वैदिकता!!! वास्तव में मरुत् देवविशेष हैं, मनुष्य नहीं, यह ' मरुतोंके देवत्वका विचार ' हमारे अन्य निबन्धमें देखना चाहिये । ' अश्विनौ ' का स्वामीने ' सद्वैद्य और सत्योपदेशक ' अर्थ कैसे किया? क्या यह छल देवयोनिसे अपना गला छुड़ाने के लिए नहीं है? क्या स्वामी अब अपने मान्य निरुक्तको भी नहीं मानते; जिसमें ' अथातो द्युस्थाना देवताः, तासामश्विनौ प्रथमागामिनी ' ( निरु. १२ १२ ) उन्हें लोकके देवता कहा है । ' सत्योपदेशक ' अर्थ तो कपोलकल्पनामात्र है; देवविशेष अर्थ क्यों नहीं किया; क्या इसलिए कि सनातनधर्मकी मानी हुई देवयोनि सिद्ध होती है? ' मरुतः ' का ' सभ्य मनुष्य ' अर्थ कहांका आविष्कार है? यहाँ भी स्वामीने ' अथातो मध्यस्थाना देवगणाः, तेषां मरुतः प्रथमागामिनो भवन्ति ' ( निरुक्त १११३ १-२ ) ' सप्त सप्त ( ४६ ) हि मारुतो गण: ' ( शतपथ २ | ५ | १ | १३ ) यह निरुक्त - शतपथ आदिके पन्नोंसे आँख बन्द कर ली । क्या मनुष्य ४६ होते हैं? Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२४० ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) ' मरुतो देवता ' ( यजुः १४/२० ) इस मन्त्रमें स्वामीने नज़र क्यों नहीं डाली कि मरुत् देवता हैं, मनुष्य नहीं । इस मेरी स्त्रीको प्रजासे बढ़ाया करते हैं, वैसे तुम भी बढ़ाया करो ' यह दो बार लिखे हुए ' वैसे ' शब्दको स्वामीने मन्त्र के किस पदसे लिया? ' बृहस्पति'का ' राजा'थें कैसे किया? यहां ' बृहस्पतिर्देवता इन्द्रो देवता ' ( यजुः १४/२० ) ' तद्-बृहतोः करपत्योश्चोर - देवतयो: ' ( वा. ६।१।१५७ ) इन वेद - वेदाङ्गके वचनोंको भी लोक - दृष्टिसे छिपा लिया!!! इसी पाण्डित्य पर आर्यसमाजियों को गर्व है कि- स्वामीजी वेदोंके बड़े विद्वान्, बल्कि - महर्षि तथा आप्त थे । अन्य भी इस मन्त्रार्थ में असङ्गतियां तथा अन्य मन्त्रोंसे विरुद्धताएँ हैं, पर विस्तारभय से हम छोड़ते हैं । ( ८ ) ऐसे ही अर्थोंसे स्वा.द. जीका यजुर्वेदभाष्य भरा हुआ हैं । स्वामी द्वारा ' अग्नि'का अर्थ कहीं परमात्मा, कहीं भौतिक ' अग्नि ' कहीं विद्वान्, कहीं कुछ अन्य अर्थ कर दिया जाता है । एक स्थान असत्य कहने पर दूसरे स्थान पर कई बार असत्य बोलना पड़ता है - यह स्वाभाविक है । इसी प्रकार उनके भाष्यमें ' इन्द्र'का अर्थ कहीं परमात्मा, कहीं ऐश्वर्ययुक्त नियोगी पुरुष, कहीं बिजुली, कहीं सूर्य, कहीं राजा, कहीं आत्मा, कहीं वायु ( सं.वि.पृ. २१८ ) और कहीं अन्य अर्थं कर दिया जाता है । इसी प्रकार ' अश्विनौ ’ का एक स्थान ' स्त्री - पुरुषो! ' ( स.प्र. ७१ पृष्ठ ), अन्य स्थान ' सद् वैद्य और सत्योपदेशक ' ( सं. वि. पृ. १५५ ), अन्यत्र ' सूर्य - चन्द्रको CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदमन्त्र - हत्याका दिग्दर्शन [ २४१ २४ जिसने उत्पन्न किया है, उस परमात्माकी ' ( सं.वि.पू. स किया है । इस प्रकार स्वामीने ' पितृ ' शब्दका २०३ ) ' प्रजा के रक्षक ' ( यजुः १६ । ४५ ) ' पिता आदि बड़े लोग ' अर्थ । श्र ' पितर लोग ' ( १६/५७ ) ' अन्नविद्या आदिके रक्षक जनक- ( १६४ ) । अध्यापक इस ' लोग ' ( १६५६ ) यह अर्थ किया है । यह दशा है एक प्रकरण कहीं ' पितृ ' का उनने ' विद्वान ' अर्थ किया । ' यम'का अर्थ की । क ‘ यथावन्न्यायकारी राजा ' ( यजुः १६।४५ ) और कहीं ' न्याय और कहीं । स्प योगसे युक्त सन्तान ’ ( १६।५१ ), कहीं ' मैजिस्ट्रेट ' और कहीं ' बाथ ' बह और कहीं परमात्मा अर्थ कर दिया कि - यमराजकी सिद्धिन श होने पावे | इस प्रकार स्वामीने सारे वेदको कलङ्कित कर डाला है । कोई विद्वान खाली हो; तो उसे ऐसी सूची बनानी चाहिये कि इन्द्र आदि देवोंका स्वामीने वेदके समान सूक्तों में, भिन्न - भिन्न सुक्तोंमें, संस्कारविधि, सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका-आदिमें क्या - क्या भिन्न अर्थ किये हैं, और वेदके एक ही मन्त्रका कहाँ - कहाँ एक - दूसरे से भिन्न अर्थ किया है । इससे पा बा चल जायगा कि - निजकल्पित सिद्धान्तकी रक्षा के लिए ही स्वामीने अ यह कल्पनाएँ की हैं; क्योंकि हम यह पहले ही कह चुके हैं कि जो न्यायालय में जाकर प्रश्न करने पर असत्य बोलता है; तब उस असत्य के बचाव के लिए उसे स्थान - स्थान पर परस्पर विरुद्ध असत्य भाषण करना पड़ता है; तब वह चतुर वकीलोंसे निगृहीत कर लिया जाता है । यही स्वा. द. कृत अर्थों की दशा है । वेदमें सध ० १६ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 135

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ २४१ २४२ ] श्रोत - प्रोत है । उसके प्रभावके दूरीकरणार्थ - जिससे पृ. २०३ ) सनातनधर्मं जम जावे - स्वामीने कल्पित अर्थ कर दिये का अर्थ अपनी दुकानदारी, और उनके अनुयायी दो - कदम उनसे भी आगे बढ़ गये, क्योंकि— ( १६४६ ) इस दुकानदारीसे उनको मान तथा धन प्राप्त होता था । अध्यापक इस सारी कल्पना तथा एक शब्द के भिन्न - भिन्न अर्थ करनेका करण की । कारण वही है, जिसे हम पहले कह चुके हैं कि जिस मन्त्रमें अर्थ स्पष्टरूपसे सनातनधर्म के सिद्धान्तकी मुद्रा हो; वहां यौगिकताका याय और' बहाना बनाकर प्राचीन - भाष्योंसे विरुद्ध, मन्त्रके देवतासे विरुद्ध, ' ' सिद्धि शब्दोंको तोड़ - मोड़कर रबड़की भांति उन्हें खींच - खांचकर, बालकी न खाल निकालकर निज कपोल कल्पित अर्थ कर दिये जाते हैं । ( ६ ) अब ' आलोक ' के पाठकगरण स्वामीजीका वेदभाष्य-डाला है । हिये कि ' निरुक्त ' के शब्दार्थपर कलम- कुठार चलता हुआ देखें । पहले हम भन्न - भिन्न निरुक्तका पूर्वापर दिखलाते हैं, जिससे पाठकोंको आगे समझने-भूमिका- में सुगमता रहेगी । एक ही निरुक्तमें तीन देवता गिनाये गये हैं- अग्निः पृथिवीस्थानः, ससे पता वायुर्वा इन्द्रो वा अन्तरिक्षस्थानः, सूर्यो द्युस्थानः ( ७५२ ) यहां स्वामीने अग्नि - देवताको पृथिवीस्थानी कहा है, यह लौकिक अग्नि है । के हैं कि फिर इन्द्रको अन्तरिक्षस्थानी ( मध्यम ) माना है । यह बिजुलीका है; तब अधिष्ठाता देवता है । सूर्यको द्युस्थानी ( उत्तम, सबसे ऊपर रविरुद्ध चुलोक में रहने वाला ) माना है, जहां ग्रह - नक्षत्रादि हैं । यह इन निगृहीत अवर ( अग्नि ), मध्यम ( विद्युत् ), उत्तम ( सूर्य ) ज्योतियोंका । वेद वर्णन है । नैरुक्तवाक्योंके श्रर्थका दिग्दर्शन [ २४३ फिर निरुक्तकार - श्रीयास्कने ' अग्निः पृथिवीस्थानः, तं प्रथमं व्याख्यास्यामः ' ( ७ | १४ | २ ) इसमें पृथिवीस्थानी अग्नि ( वन्दि ) के वर्णनकी प्रतिज्ञा की है । उसके तीन नाम बताये हैं- ' अग्निः, जातवेदाः, वैश्वानरः, इति त्रीणि पदानि ' ( ७ | २१ | १ ) यह तीनों श्रीयारकके मत में ' अग्नि ' के नाम हैं । फिर इनमें पहले ' अग्नि ' शब्दपर शङ्का उठाई गई है कि- ' सन मन्येत श्रयमेव अग्निरिति, अपि एते उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्येते ' ( ७/१७/१ ) इसका भाव यह है कि कोई पूर्वपक्षी ' अग्नि ' शब्दसे पार्थिव अग्निको न लेकर ऊपरकी दो ज्योति - विजुली और सूर्यको - ले ले; क्योंकि-' ततो नु मध्यमः ' ' अग्नि ' शब्द ' अभिप्रवन्त समनेव योषाः... श्रमिं ' इस मन्त्रमें विजुली ( मध्यम ) अर्थ में भी देखा गया है ( निरु. ७ । १७ । १ ) । ' समुद्रादूर्मिर्मधुमान् उदारत् ' इस अग्निलिङ्गक - मन्त्रमें ' अग्नि'का अर्थ ' सूर्य ' भी देखा गया है ' ( नि. ७/१७/२ ); वो अग्निका केवल ' पृथिवीस्थानी अग्नि ' ही अर्थ कैसे हो? इस श्राशङ्काका श्रीयास्कने समाधान इस प्रकार दिया है कि-' यस्तु सूक्त ं भजते, यस्मै हविर्निरूप्यते, अयमेव सोऽग्निः । निपातमेवैते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन भजेते ' ( ७/१८/२ ) इसका अर्थ यह है कि जिस अग्निका वेदसूक्तों में ' अग्नि ' शब्दसे वर्णन आता है, और जिसे हवि दी जाती है, वह तो यही पार्थिवाग्नि ही मुख्यरूप से है । हां, कहीं यदि ' अग्नि ' शब्दसे ऊपरकी ज्योतियों - विद्युत् वा सूर्य का ग्रहण आ जाता है, वह अर्थ मुख्यरूपसे न होकर गौण ( निपात ) रूपसे आता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 136

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२४४ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) पाठकोंने देख लिया कि यहां ' अग्नि ' शब्द से परमात्माका कुछ भी सम्बन्ध नहीं; किन्तु आग, बिजुली और सूर्य का प्रकरण है, किन्तु स्वा. द. जी यहां परमात्माका अर्थ करते हैं - यह आगे देखिये । आ.स. श्रीमङ्गलदेवजीने निरुक्तमें परमात्माका वन नहीं माना । इसी प्रकार अग्निवाचक ' जातवेदाः ' में भी वैसी शङ्का उठाई गई है कि - ' स ( शिष्यो ) न मन्येत अयमेव अग्निः [ जातवेदाः ] इति । अपि एते उत्तरे ज्योतिषी जातवेदसी उच्येते ' ( ७/२०१३ ) अर्थात् ' जातवेदाः ' ऊपरकी दो ज्योतियाँ - बिजुली - सूर्य - भी हो सकते हैं; केवल पार्थिव अग्नि ही अर्थ क्यों किया जाय? ' उसमें विद्युत् - वाचक ' जातवेदाः ' का मन्त्र ' अभिप्रवन्त... हर्यंत जातवेदाः ' यह उपस्थित किया गया है, और ' सूर्य ' वाचक ' जातवेदाः ' का ' दुत्यं जातवेदसम् ' मन्त्र उपस्थित किया गया है । ( नि. ७/२०१३ ) । इसका भी श्रीयास्कने वही पूर्वोक्त उत्तर दिया है कि- ' यस्तु सूक्तं भजते, यस्मै हविर्निरूप्यते, अयमेव सोऽग्नि-र्जातवेदाः । निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन भजेते ' ( ७ | २० | ४ ) इसका भी अर्थ वही पूर्व - जैसा ही है कि - ' जातवेदाः ’ मुख्यतया तो ' पार्थिव - अग्नि'का नाम है; हाँ, कहीं मध्यम - अग्नि ( बिजुली ) और उत्तम अग्नि ( सूर्य ) का नाम यदि ' जातवेदाः ' आया भी है; तो वह गौणरूपसे है । फिर तीसरा वैश्वानरकेलिए भी यही प्रश्न उपस्थित किया गया है । उसमें ' मध्यम इति आचार्याः ' ( ७/२२ । ३ ) कहकर CC - 0. Ankur Joshi Collection निरुक्तकी हत्या २४ [ २४५ ' वैश्वानरो दस्युं ' मन्त्र में वैश्वानरको विद्युदु - वाचक आशङ्कित किया गया है ( नि. ७ २३ १ ) । फिर पूर्व याज्ञिकॉका वाचक बताया गया है, उसमें भी बहुत मन्त्र तथा तर्क मत दिये सूर्य. | गये हैं; यह वहां शास्त्रार्थं है । श्रीयास्कने शाकपूणिके मतको लेकर ‘ वैश्वानर’को ‘ अग्नि’बाचक बताया है, और पूर्वोक्त - शङ्काका वही पूर्व - जैसा उत्तर दिया है कि- ' यस्तु सूक्त ' भजते, य घाल इविर्निरूप्यते, अयमेव सो- ( पार्थिवोऽग्निर्वैश्वानरः । निपातमेव को एते उत्तरे ( विद्युत् - सूर्यौ ) ज्योतिषी एतेन नामधेयेन भजेते ' ( ७ | ३१ | ४ ) इसका भी अर्थं वही पूर्व- जैसा ही है कि वैश्वानर मुख्य तो पार्थिव अग्निका नाम है । यदि कहीं उत्तर -ज्योतियों- कुछ दे विद्युत् या सूर्य अर्थमैं आ गया है; तो वह गौणता से है । विद्य अग्निका मन्त्र श्रीयास्कने ' अग्निमीले पुरोहितं ' दिया है । इसमें श्रीयास्कको पार्थिव अग्नि इष्ट है, पर स्वा. द. जीने मूर्ति प्रम पूजा के डर से इसका अर्थ ' परमात्मा ' कर दिया । इसपर पं ० केव महेशचन्द्र - न्यायरत्न ( प्रिंसिपल आफिशियेटिङ्ग संस्कृत कालेज ( गर कलकत्ता ) ने आक्षेप किया था कि- स्वामीजीने यहां अपने मान्य वाच निरुक्तकारकी भी अवहेलना कर दी; क्योंकि इस तथा ' अग्निः श्रीय पूर्वेभिऋषिभि: ' इस मन्त्रमें उनने श्रीयास्कानुसार पार्थिव श्रग्नि श्रीय अर्थं न करके परमात्माका अर्थं कर दिया । परन्तु स्वामीने ' भ्रान्ति - निवारण ' निबन्धद्वारा उनका प्रत्युत्तर दिया था । वहां प्रध ' अयं यज्ञेषु प्रणीयते, अङ्ग नयति, अग्निः पृथिवीस्थानः, वं क्यो प्रथमं व्याख्यास्यामः, स न मन्येत अयमेव अग्निरिति, अषि Gujarat. An eGangotri Initiative '

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २४६ 1 उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्येते, उत्तरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन एते आशङ्कित भजेते ' इन नैरुक्त - वाक्योंका ऐसा अर्दन - विमर्दन किया और मत सूर्य. बिजुली - सूर्यका प्राकरणिक अर्थ छोड़कर इनसे प्राकरणिक तर्क दिये ' परमेश्वर ' अर्थ करके ‘ मक्खीको मल - मलकर भैंसा ' बना देनेकी मतको चरितार्थता कर दी है । पाठक देखें कि एक बड़ी जमात खोलने-शङ्काका घाले लीडरने शब्दों के अर्थ में कैसी तोड़ - मरोड़ की है! प्रकरण-को भी छिपा दिया है, पूर्वपक्षको भी उत्तरपक्ष बना दिया है । पातमेव | ' आन्तिनिवारण ' में स्वामीने श्रीमहेशचन्द्रजीका पूरा पक्ष भजेते ' नहीं दिया । उनके निबन्धसे कहीं कुछ दे दिया, और उसपर वैश्वानर कुछ लिख भी दिया, जनताको दिखला दिया कि हमने प्रत्युत्तर गोतियों- दे दिया; वस्तुतः यह उत्तराभास ही है, यथार्थं उत्तर नहीं; ह विद्वान् पाठक स्वयं जान लेंगे । दया है । ' अग्निर्वै सर्वा देवता: ' ( निरु. ७११७१४ ) यह ब्राह्मणभागका मूर्ति प्रमाण निरुक्तमें इसलिए दिया गया था कि- ' अग्नि ' शब्द पर पं ० केवल अग्निवाचक नहीं है किन्तु इन्द्र ( विद्युत् ), सुपर्ण गरुत्मान् कालेन ( गरुडकी भांति तेज चलनेवाले सूर्य ) आदि सभी देवताओंका मान्य वाचक भी होता है । इसी ब्राह्मणकी बातको पुष्ट करने के लिए ' अग्निः श्रीयास्कने ' इन्द्रं मित्रं • आदि मन्त्र भी उपस्थित किया । अन्त में श्रीयास्कने वही पूर्व - प्रोक्त उत्तर दिया कि यह ठीक है कि - इन्द्र, स्वामीने सूर्य आदि देवताओंकी स्तुति ' अग्नि ' शब्दसे आती है, पर | वह प्रधानरूपसे नहीं, किन्तु गौणरूपसे आती है - ' निपातमेव एते उत्तरे नः, à क्योतिषी ( विजुली और सूर्य ) एतेन नामधेयेन भजेते ' ( ७११८२ ) अपि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. निरुक्तकी हत्यां [ III पाठकोंने अब यह प्रकरण सब समझ लिया । अब इसपर स्वामीजीका मत देखें । वे लिखते हैं-' इन्द्र ं मित्रं वरुणमग्निमाहुः अग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः ' इसमें ' अग्नि ' का पाठ दो बार है । इसका अभिप्राय यह है कि-' अग्नि ' शब्दसे भौतिक अग्नि और परमेश्वर दोनों का प्रहण होता है ' । पर यास्कके इस प्रकरणमें परमेश्वरका थोड़ा भी वर्णन नहीं । वहाँ तो अग्नि, विद्युत्, सूर्य - यही तीन ज्योतियाँ ( देवता ) प्राकरणिक हैं, ईश्वरका कुछ भी वर्णन नहीं । उक्त मन्त्रका देवता वैदिकयन्त्रालय अजमेर की ऋ. संमें ' सूर्य ' है, परमेश्वर नहीं । तब यास्कका नाम लेकर अपना मनमाना अर्थ करना - यह स्वामीजीका निरुक्त - कण्डिकासे बलात्कार हैं । स्वामी लिखते हैं- ' उत्तरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन भजेते ' ( नि. ७ | १८ ) इसका यह अर्थ है कि- अग्नि नाम करके भौतिक और परमेश्वर यह दो उत्तर - ज्योति गृहीत होते हैं, ( भ्रान्तिनिवारण ) यहाँ जनताकी आंखोंमें धूल मोंकी गई है । प्रकरणको तो छिपाया गया ही है, वहाँ का पाठ भी पूरा नहीं दिया गया है । यहाँ दो उत्तर - ज्योति बिजुली और सूर्य प्राकरणिक हैं, परमेश्वर नहीं - यह पहले हम प्रमाण देकर बता चुके हैं । भौतिक पार्थिव-अग्नि भला उत्तर- ज्योति कैसे हो सकती है, जबकि वह यास्कको इष्ट नहीं । यह है स्वामिकृत अर्थों का दिग्दर्शन!!! दुकान चल निकली है, जो कुछ कहते जाओ; अपने अनुयायी आँख मूँदकर मान ही लेंगे, समर्थन भी कर देंगे, परन्तु विद्वानोंकी दृष्टिमें यह An eGangotri Initiative

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२४६ ] श्रीसंनातंनघर्मालोक ( ८ ) असह्य अपराध है । ' अग्निर्वै सर्वा देवताः - इति निर्वचनाय ' इस वचनका अर्थ निरुक्तकार करते हैं जिनको बुद्धिमान लोग अनेक नामों से वर्णन करते हैं, जो कि अद्वितीय सबसे बड़ा सबका आत्मा है; उसीको अग्नि कहते हैं ' यह स्वामीजीके शब्द हैं, ऐसा निरुक्त-कारने कहीं भी अर्थ नहीं किया । यहाँ तो निरुक्तकारको बड़े आकारवाला सूर्य इष्ट है, प्राकरणिक भी वही है, उक्त मन्त्रका देवता भी ' सूर्य ' है । " इस अग्निनामधेयसे दोनों उत्तर- ज्योति अर्थात् अनन्त ज्ञान - प्रकाशयुक्त परमेश्वर और जो विद्युत्रूप भौतिक अग्नि है, इन दोनोंका यथावत् ग्रहण होता है " यह स्वामीजीके शब्द उनकी कपोल - कल्पनासे निकले हैं । ' निपातं ' का अर्थ निरुक्तमें ' गौणता ' होता है; ऊपरकी प्राकरणिक ज्योति ' सूर्य ' को स्वामीजी -ने निगल लिया; उसके स्थान परमेश्वरको बिठा दिया, यह है सच्चे अर्थों का दिग्दर्शन ( १ ) । पार्थिव - अग्निका निर्वचन श्रीयास्कने ' अप्रं यज्ञेषु प्रणीयते, ' अङ्ग ' नयति ' यह किया है, इसपर स्वामी लिखते हैं- ' अग्नि ' शब्द परमेश्वर और भौतिक पदार्थ में लिया जाता है - यह निरुक्त-का अभिप्रायार्थ है ' । जबकि यहाँ निरुक्तमें परमेश्वरका कोई प्रकरण नहीं; तब स्वामीका तद्विरुद्ध अर्थ करते जाना क्या निरुक्त - कण्डिकासे बलात्कार करना नहीं? । ' अग्निः पृथिवीस्थान: ' इस निरुक्तके वाक्य में इसी लौकिक CC - 0. Ankur Joshi Collection निरुक्तकी इत्या अग्निका वर्णन चालू है, यह हम पूर्व स्वामी प्रत्यक्ष पर भी धूल झोंकते हैं परमेश्वर व्यापक होनेसे पृथिवी स्थान स्वामी परमात्माको उत्तर - ज्योति बना रहे धर - ज्योति पृथिवीस्थानी बनाते हैं 1 । १५० सिद्ध कर चुके सनात । लिखते हैं देवदेव हैं-नहीं हो सकता ' स पराप्येत थे; अब परमेश्वर उन्हें धन्यवाद कि - व चाहिये कि उन्होंने मूर्तिपूजा भी स्वीकार कर ली । देव " बाला जब परमेश्वर स्वामीके अनुसार पृथिवीस्थानी भी है, ' यस्य पृथिव और शरीरम् ' ( शत. ) पृथिवीकी मूर्ति उसका शरीर है; तो परमेश्व प्रकाश पूजा पार्थिव मूर्ति में भी उसके व्यापक होनेसे इष्ट होगई । मनमा और न वस्तुतः ' पृथिवीस्थानः ' में श्रीयास्कको यही पार्थिवधप उत्तर उक्त प्रकरणमें इष्ट है, परमात्मा का वहाँ गन्ध भी नहीं । ' वह पहले पृथिवी शरीरम् ' ( शत. ) का अर्थ स्वामीने ' भ्रान्तिनिवारण ' ३ करने क किया है - ' जिस परमेश्वरके शरीर के समान पृथिवी है, जो पृथिवी अर्थ अ व्यापक होकर उसको नियममें रखता है ' यहाँ स्वामी ज्ञान न परमात्माका शरीर भी मान लिया, और उस परमेश्वरके शरीर अर्थ क समान पृथिवीको माना, सो उस पृथिवी - मूर्तिके द्वारा ' शब्दाय ईश्वरके शरीरकी पुजा करके मूर्तिपूजक - सनातनधर्मी बन जाएँ । ना स निरुक्तकारने ' यस्मै हविर्निरूप्यते ' ( ७ | १८ २ ) कहकर उस अनि एक सिर हवि देना भी कहा है; तो परमेश्वरको भी इससे हवि देश पढ़ता ह स्वामीजी पूर्ण मूर्तिपूजक बनें । अथवा यदि वे अग्निमूर्ति द्वा - वलात् ' वरुणाय स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा ' आदि मन्त्रोंसे इन नामों वा श्रविद्यर परमेश्वरको इषि देते हैं; तब भी वे मूर्तिपूजक बने, क्योंकि Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) २५० 1 सनातनधर्म में भी यही बात होती है, मूर्तिकेद्वारा देव बा चुके हैं: पूजा - अर्चना बलि आदि करनी मूर्तिपूजा होती है । देवदेवकी आगे लिखते हैं- ' स न मन्येत अयमेव अग्निरिति वामीजी कता परे प्राप्येत ( १ ) उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्येते ' इसका अर्थ यह है परमेश्वरई कि - वह अग्नि जो परमेश्वरका वाचक है, चूल्हेमें प्रत्यक्ष जलने न्यवाद देर वाला नहीं है, किन्तु जो कि अपने व्याप्यमें व्यापक विद्युत्रूप | जब और जो उत्तर अर्थात् कारणरूप ज्योतिःस्वरूप और सबका यस्य पृषि प्रकाशक है ” यहाँ भी निरुक्तके उक्त वाक्यका अर्थ गलत, अपना परमेश्वर मनमाना ही किया गया है, उक्त शब्दोंका न तो यह अर्थ है गई । और न यह तात्पर्य, और यह है भी पूर्वपक्षका ही वाक्य, इसका आगे श्र उत्तर दिया गया है कि - ' निपातमुत्तरे ज्योतिषी ' इस पर हम नहीं । ' चह पहले स्पष्टता कर चुके हैं - यह विद्वान - पाठकोंने स्वामीके अर्थ निवारण करने की शैली देख ली कि वे प्रमाण तो पुस्तकका दे देते हैं; पर जो पृथिवीरें अर्थ अपनी इच्छा से करते हैं । या तो उनको निरुक्तके अर्थ करनेका हाँ स्वामीरे ज्ञान नहीं था, या फिर असत्यका डर नहीं था कि जो चाहो रके शरीर अर्थ करते रहो । यही शब्दकी हत्या हो जाती है । यह है के द्वारा ' शब्दार्थहत्याका दिग्दर्शन ' । ऐसे उनके हजारों अर्थ दिखलाये बन जाएँ । आ सकते हैं; पर यहाँ उतना अवकाश कहाँ? स्वामीजी अपना उस अग्निको एक सिद्धान्त बना लिया करते हैं, चाहे वह वेदके विरुद्ध भी हवि देश पढ़ता हो; पर उसे वेदसे बलात् निकालने की चेष्टा करते हैं, नमूर्ति द्वारा वलात् निकालने में तोड़ - मरोड़ करते हैं, अथवा मन्त्रमें नामों वा श्रविद्यमान उस बातको बलात् शब्दका अध्याहार करके उसे क्योंकि CC - 0. Ankur Joshi वैदमन्त्र- हत्याका दिग्दर्शन [ २५१ Collection Gujarat. उसमें हूँ स देते हैं । एक उदाहरण हम उनका नियोगके मन्त्रार्थ-का देकर आगे चलेंगे । ( ख ) ' इयं नारी पतिलोकं वृणाना निपद्यत उप त्वा मत्यें! प्रेतम् । धर्म पुराणमनुपालयन्ती तस्यै प्रजां द्रविणं चेद्द घेहि ' इस मन्त्रमें नियोगका कहीं गन्ध भी नहीं है यह आगे बताया जायगा; पर स्वामीजीने यहाँ मन्त्रोंमें अविद्यमान भी पढ़ वा वाक्य मन्त्रार्थमैं हूँ से हैं; यह हम ' (? ) ' इस चिह्नसे बतावेंगे । ' इयं नारी - इयं विधवा नारी, प्रेतं मृतं पतिं विहाय (? ) पति-लोकं - पति - सुखं ( १ ) वृणाना- स्वीकर्तुमिच्छन्ती सती, मत्य! हे मनुष्य! त्वा - त्वामुपनिपद्यते त्वां पतिं प्राप्नोति (? ) । तव समीपं नियोग - विधानेन श्रागच्छति ( १ ) तां त्वं गृहाण (? ) अस्यां सन्ता-नानि उत्पाद ( १ ) । कथंभूता सा, धर्म पुराणं- वेदप्रतिपाद्य सनातनं धर्ममनुपालयन्ती सती, त्वां नियोगेन पतिं वृणुते (? ) त्वमपि इमां वृणु (? ) । तस्यै - विधवायें इह - अस्मिन् समये लोके वा, प्रजां घेहि त्वमस्यां प्रजोत्पत्तिं कुरु । द्रविणं - द्रव्यं वीर्यं च ( १ ) अस्यां घेहि अर्थात् गर्भाधानं कुरु (? ) ( ऋ. भा. भू. ) यहाँ पर ( १ ) इस चिन्हवाले पद स्वा. दयानन्दजीने वेद-मन्त्रार्थ में प्रक्षिप्त कर दिये है, मन्त्रमें इनका गन्ध भी नहीं है । इस विषय में स्पष्टता भिन्न निबन्धमें देखें । अव सत्यार्थप्रकाशमें स्थित ' उदीनारि! अभि जीवलोकं गतासुमेतमुपशेष एहि । हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभिसम्बभूथ ' इस मन्त्रका भी स्वा. दु.का किया अर्थ देखें । An eGangotri Initiative

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३५३ ] श्रीसनातनघर्मालोक ( ८ ) ( ग ) हे नारी - विधवे, तू, एतं गतासुम् - इस मरे हुए पतिकी आशा छोड़के (? ) शेषे - बाकी पुरुषोंमें से ( १ ) अभि, जीवलोकम्-जीते हुए दूसरे पतिको (? ) उपैहि - प्राप्त हो ( १ ), और उदीर्ध्व-इस बातका विचार और निश्चय रख ( १ ) कि जो हस्तग्राभस्य दिधिषोः - तुझ विधवाके पुनः ( १ ) पाणिग्रहण करनेवाले नियुक्त ( १ ) पति के सम्बन्ध केलिए नियोग होगा (? ) तो इदं - यह जनि -त्वम् — जना हुआ बालक ( १ ) उसी नियुक्त (? ) पत्युः- पतिका होगा । और जो तू अपने लिए नियोग करेगी; तो वह सन्तान ( १ ) तव - तेरा होगा । ऐसे निश्चययुक्त हो (? ) यहां स्वामीजीके ऐसे अप्रासङ्गिक वा गलत अर्थं करनेपर बड़ा खेद होता है । ( १० ) अब हम ऐसा आदर्श स्वा. द. जीके अनुयायियोंका भी दिखलाते हैं । श्रीभगवद्दत्तजी अनुसन्धाता बी.ए. अपने ' वैदिक-वाङ्मयका इतिहास ' द्वितीयभाग ( प्र. सं. ) ६२ पृष्ठमें ४ १/६२ न्यायसूत्रके वात्स्यायन - भाष्यको उद्धृत करते हैं; और उसका अर्थ करते हैं । — ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनु-ज्ञायते । ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरसः एतदितिहास - पुराणमभ्य-वदन् ' ं ` य एव मन्त्र ब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खलु इतिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति ' अर्थात् प्रमाणरूप - ब्राह्मणसे इतिहास और पुराणकी प्रामाणिकता जानी जाती है । वे यह अथर्वाङ्गिरस थे, जिन्होंने इतिहास - पुराण कहा था (? ) । जो मन्त्र CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदहत्या २५४ और ब्राह्मण श्रर्थात् मन्त्रार्थके द्रष्टा हैं, वही प्रवक्ता पुराण और धर्मशास्त्रके ' यहाँ अनुसन्धाताजीने हैं इ आय ' इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेद इति ' चिन्दुएँ से उन्हों , यह पाठ छिपा दिया इस पाठसे ही सारे इस वाक्यका अर्थ हुआ करता यह अर्थ है - ‘ ते वा खलु एते अथर्वाङ्गिरसः - श्रथर्ववेद है । । वाङ्म वेद के ब्राह्मण ) ने एतद् इतिहासपुराणम् ' इतिहासपुराणं ( अ ) प्रतिप वेदानां वेद इति अवदन् - इतिहासपुराणको पञ्चमवेद शीर्षक इस प्रकार प्रमाणभूत अथर्ववेदने जब इतिहासपुराण माना है । बीच-को पाँचर ( सन्ट वेद ' कहकर प्रमाण माना है; तब पुराण - इतिहासको श्रश्रमस मानना अयुक्त है ' यह पूर्वापर सारे प्रकरणका अर्थ है । लेकिन करते प श्रीभगवद्दत्तजीने उसे पाँचवाँ वेद मानना छिपा दिया था, ६ प्रपत यह अथर्वाङ्गिरस थे, जिन्होंने इतिहास और पुराण कहा थे ) । यह अर्थं कितना अशुद्ध है? ' । जब बी. ए. जी मन्त्र ब्राह्मणे द्वन्द्व मानते हैं; तब उनका ' मन्त्रार्थंका द्रष्टा ' यह अर्थ ठीक नहीं- पृथिव ' द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ' यह दोनों ही पद मन्त्र- ब्राह्मण के सा उन प सम्बद्ध हैं । तभी समुच्चय करानेवाला ' च ' सार्थक है । ' प्र अ पर्वत खलु इतिहासपुराणस्य ' से ' प्रवक्तारः ' का सम्बन्ध होने के पंख दो चकार व्यर्थ होते । वास्तव में ' द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ' यह दोनों ते [ ज ही पद मन्त्र - ब्राह्मण से अन्वित हैं, और इन दोनों का ही होनेस इतिहास - पुराण धर्मशास्त्रों में भी अनुषङ्ग है | सो अनुसन्धाताजी- एषां का प्रयत्न आर्यसमाज के बचावकेलिए ही है; क्योंकि अथर्ववैः पंखोंक ( ब्राह्मण ) के द्वारा इतिहास - पुराण पञ्चम वेद सिद्ध हो जावे; स भूयिष Gujarat. An eGangotri Initiative