सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 181–190
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 181–190
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ३३४ ] ' ब्राह्मी वी | इसलिए भिन्न - भिन्न वर्णवाले पति - पत्नीके वीर्य एवं उ rust रजके संयोगमें शास्त्रोंमें वर्णसङ्कर की उत्पत्तिमानी गई है; और अर्थ न होने श्रवर्ण पति - पत्नीके शुक्र- शोणितके योगसे उस अबकी ही में उत्पत्ति कहने से मनुजीके मतमें शुक्र - शोणित के द्वारा ही ब्राह्मण श्रीमेन शरीर की उत्पत्ति कही गई है, गुणकर्म द्वारा नहीं । तब तस्य इ ‘ ब्राह्मीयं क्रियते तनु: ' इस मनुके पद्यके अर्थ में स.प्र. में ' ब्राह्मी'का ः कर्मभिः ' ब्राह्मणका ' यह अर्थ करना अशुद्ध ही है । ' संस्कारविधि'के २३७ तनुः- देह कहा पृष्ठमें स्वामीने उक्त मनुपद्य के ' ब्राह्मी ' पदका ' ब्रह्म सम्बन्धी ' शुद्ध है-ना क्रियते ॥ ही किया है । घवानन्दने ( ११ ) पूर्वपक्ष - [ ऋषभदेवस्य ] एकाशीतिः ( पुत्राः ) कर्म-नन्दन ने कहा विशुद्धा ब्राह्मणा बभूवुः ' ( भाग. ५ | ४ | १३ ) यहाँ क्षत्रियपुत्रोंको ' ब्राह्मण ' कहनेसे गुणकर्मसे वर्णव्यवस्था सिद्ध हुई । कि जाति उत्तरपक्ष - यहाँपर ' ब्राह्मणाः ' का ' ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मणः ' के अनुसार यह ' शाब्दिक - ब्राह्मण ' अर्थ है । विशेष स्पष्टता अन्यत्र देखनी चाहिये । इ.जीने ५१ यह भी जानना चाहिये कि कहीं ब्राह्मण में भी ' अब्राह्मण ' नहीं होता ' शब्दका प्रयोग देखा जाए; वहाँ उसकी निन्दामात्र इष्ट होती है । जीने कहा में भी ' ब्राह्मण ' शब्दका प्रयोग देखा जाए; वहाँ न सम्भूता स्तुतिमात्र इष्ट होती है, वैसा वर्ण - परिवर्तन नहीं | २२ | ६ तथा ब्राह्मणीमें | १ | ११ पाणिनिके सूत्रमें महाभाष्य में कहा गया है- ' सर्वे । तो यह शब्दा गुणसमुदाये वर्तन्ते - ब्राह्मण, क्षत्रियो, वैश्यः, शुद्र इति ' । रेंज रें ( यहाँपर ब्राह्मणादिको गुणोंका समुदाय ' कहा है; वह गुणका वर्णव्यवस्थागत भ्रान्तिपरिहार [ ३३५. समुदाय यह है - ) ' तपः श्रुतं च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मणकारकम् । तपः श्रुताभ्यां यो हीनो जाति ब्राह्मण एव स: ' [ यहाँ ' योनि'का श्रर्थं ' ब्राह्मणसे ब्राह्मणीमें जन्म ' यह है, ऐसा कैयटने लिखा है- ] तथा गौरः, शुच्याचारः, पिङ्गलः, कपिलकेश इत्येतानपि श्रभ्यन्त-रान् ब्राह्मण्ये गुणान् कुर्वन्ति ' । इससे स्पष्ट है कि — जो ब्राह्मणसे ब्राह्मणी में उत्पन्न हुआ है; और जो तपस्वी एवं श्रुत ( अध्ययन ) सम्पन्न है; वही पूर्ण - त्राह्मण है । जिसमें योनि ( ब्राह्मणसे ब्राह्मणी में जन्म ) तो हो; परन्तु तप और श्रुत न हो, वह जाति - ब्राह्मण कहा जाता है । ' गुणसमुदाय-रूपमें ही ब्राह्मणत्व सिद्ध होनेपर योनिरूप गुणके अवयवमें ब्राह्मण शब्दका प्रयोग कैसे हो सकता है - इस प्रश्नमें भाध्यकार कहते हैं - ' समुदायेषु च वृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि वर्तन्ते ( समुदायवाचक शब्द अवयववाचक भी होता है ) । तद् यथा-पूर्वे पञ्चालाः, तैलं भुक्तम्, घृतं भुक्तम्, शुक्लो, नीलः, कपिलः, कृष्ण इति ( ' घी ' यद्यपि समुदायवाचक - सारे संसारके घीका वाचक है; तथापि ' घी खाया ' में ' घी ' थोड़े घीका भी नाम होता है ) । एवमयं समुदाये ब्राह्मणशब्दः प्रवृत्तोऽवयवेष्वपि वर्तते - जातिहीने गुणहीने च ' ( इस प्रकार योनि, तप और श्रुतका समुदायवाचक भी ब्राह्मणशब्द इन तीन गुणोंकी पूर्णता न होनेपर भी ' ब्राह्मण ' नामसे कहा जाता है ) इससे स्पष्ट है कि - गुणसमुदायसे हीन योनिमात्र ब्राह्मणमें भी ' ब्राह्मण ' शब्द प्रवृत्त होता है । गुणहीनमें भाष्यकार उदाहरण CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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३३६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) देते हैं —– ' अन्ब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठन् मूत्रयति, अब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठन् भक्षयति ' यहाँ ब्राह्मण में भी प्रयुक्त हुआ नव् ' तत्सादृश्यम-भावश्च तदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्यं विरोधश्च नर्थाः षट् प्रकीर्तिताः ' यह प्रशस्त अर्थवाला है; नहीं तो भाष्यकारका ' समुदायेषु वृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि वर्तन्ते ' यह वाक्य व्यर्थं हो जावे, ' अब्राह्मणोऽयम् ' यह वाक्य उक्त - न्यायका ही उदाहरण है । इसलिए यहाँ कैयटने लिखा है - ' तपः श्रुतयोरभावाद निन्द-याऽत्र अब्राह्मणशब्द - प्रयोग: [ न तु ब्राह्मण जात्यभावात् ], तत्र जातिमात्रे अवयवे समुदायरूपारोपाद् ब्राह्मणशब्द - प्रयोगः, नवा तु स्वाभाविकी तपः श्रुतयोर्निवृत्तिर्योत्यते ' अर्थात् यहाँपर तप और अध्ययन न होनेसे उसे निन्दासे अब्राह्मण कहा है । जातिरूप एक अवयवको समुदाय मानकर उसे ब्राह्मण कहा गया है, नन यहाँ उसके तप और श्रुतके अभावको बता रहा है । इससे सिद्ध हुआ कि जहाँ ब्राह्मण के लिए भी अब्राह्मणशब्द-का प्रयोग हो; वहाँ उसकी गुणहीन होनेसे निन्दा ही इष्ट होती है । वहु होता जाति - ब्राह्मण ही है - ' तपः श्रुताभ्यां यो हीनो जाति ब्राह्मण एव स: ' इस महाभाष्यके प्रमाण में यहाँ योनि वाले ब्राह्मणकेलिए वैसा कहा गया है; नहीं तो तपः श्रुतसे हीनकेलिए ' जातित्राह्मण ' शब्द न होता, किन्तु ' शूद्र ' शब्द होता । तब प्रश्न उपस्थित होता है कि जैसे भाष्यकारने तप और श्रुतसे ह्वीन ब्राह्मण - योनिजातको ब्राह्मण माना है; निन्दासे उसे CC - 0. Ankur Joshi Collection वव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार [ ३३० त्राह्मण शब्द से कहा है; वैसे ही उसके मतसे योनिद्दीन तप और श्रुतसे युक्त क्षत्रियादिमें भी ब्राह्मरण - शब्दका परन्तु । हो सकता है; इस विषय में भाष्यकार कहते हैं- प्रयोग इ इट ' ' जातिहीने सन्देहाद् दुरुपदेशाच ब्राह्मणशब्दो वर्तते ' यहाँ भाष्यकारका आशय है कि - तप और श्रुतसे युक्त परन्तु योनिहीन यह आदि वास्तव में तो जातिब्राह्मण नहीं होता; क्योंकि जैसे क्षत्रिय । | ' तपः-श्रुताभ्यां यो हीनो जातित्राह्मण एव स: ' यहाँ योनि वाले तप - श्रुतसे रहित ब्राह्मणकेलिए जातिब्राह्मण कहा है, वैसे योनि परन्तु हीन परन्तु तप - श्रुतसे युक्त क्षत्रियादि जातिब्राह्मण हुआ करता है - यह भाष्यकारने कहीं नहीं कहा; इसलिए वह होता तो जाति-क्षत्रियादि ही है, क्योंकि उसमें मुख्य आधार योनि ( ब्राह्मण से ब्राह्मणीमें जन्म ) नहीं होता; परन्तु उसमें स्तुतिकेलिए गुण-ब्राह्मण वा कर्म - ब्राह्मण शब्द आता है ( जैसा कि ऋषभदेव के पुत्रोंके लिए ' कर्मविशुद्धाः ' शब्द है ) वा ब्राह्मणशब्द आता है; जे वहाँ उपचार ( गौणता ) होता है, वास्तविकता नहीं । वहाँ उच्च शब्द [ ब्राह्मण ] प्रशंसार्थवाद होता है, और निकृष्ट ( शूद्रादि ) शब्द निन्दार्थवाद होता है । योनि, तप, श्रुत इन तीन गुणों में श्राधार-भित्ति वा प्रधानगुण योनि क्षत्रियादिमें न होनेसे उसे ब्राह्मण उपचारसे कहा जाता है; इसीलिए महाभाष्यके मर्मज्ञ श्रीकैयटने भी उक्त वाक्यके व्याख्यान में कहा है- ' तत्र स्तुत्या ब्राह्मणशब्दस्य प्रवृत्तिरध्ययनादि - गुणसद्भावप्रतिपादनाय ' । यहाँ भ योनिको गुणसमुदायरूप माना है, जैसेकि - परमाणु पदार्थक स ० ध ० २२ Gujarat. An eGangotri Initiative
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[ ३३० हीन परन्तु प्रयोग दृष्ट ' जाविहीने कारका यह न क्षत्रिय वैसे ' वप: ' ले परन्तु से योनि-आ करता तो जाति-( ब्राह्मण नए गुए. षभदेव के ता है; ठो उच्च शब्द द ) शब्द श्राधार-ब्राह्मण श्री कैयट हाणशब्दस्य कारने पदार्थ के ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) TE प्राणप्रद - धर्म होनेसे यद्यपि जाति - शब्द हैं; तथापि वैशेषिकदर्शन-में अपनी परिभाषा से उन्हें ' गुण ' शब्द से कहा गया है ( देखिये काव्यप्रकाश २ य उल्लास ), वहाँ ' गुण ' शब्द भाक्त ( गौण ) होता है; वैसे इस महाभाष्यके वचनमें योनि, पदार्थका प्राणप्रद - धर्मं होनेसे जातिशब्द है; तथापि उसे गौणता से ' गुण ' कहा गया है । फलतः क्षत्रिय - ऋषभदेव के पुत्रों में भी ' ब्राह्मण ' शब्द स्तुति-मानसे कहा गया है; वह वैसा वर्ण - व्यवस्थापक नहीं; इसलिए वहाँ ‘ कर्मविशुद्धा ब्राह्मणाः ’ शब्द आया है । बल्कि - महाभाष्यकार तो कहते हैं - जातिहीने सन्देहाद् भवति ब्राह्मणशब्द - प्रयोगः, दुरुपदेशाद् वा ' ( जातिहीनमें सन्देह ( शक ) से वा गलत कहनेसे ब्राह्मणशब्दका प्रयोग होता है । इसमें महाभाष्यकार उदाहरण देते हैं - ) ' सन्देहात् तावद् - गौरं शुच्याचारं पिङ्गलं कपिल-केशं दृष्ट्वा अध्यवस्यति ब्राह्मणोऽयमिति । श्रमुष्मिन् अवकाशे ब्राह्मणोऽयमिति; तत्र सन्देहाद् ब्राह्मणशब्दो वर्तते । जातिकृता ( जात्यभावकृता - इत्यर्थ इति कैयट: ) चार्थस्य निवृत्ति: ' इस भाष्य के सन्दर्भ से शुद्ध आचारसे ब्राह्मण होने का खण्डन कर दिया गया है । यहाँ भाष्यकारने अच्छे आचार वाले तथा कपिल - केश में ( जो ब्राह्मणकी निशानी है ) ब्राह्मण शब्दका प्रयोग सन्देह से माना है । इससे स्पष्ट है कि उसके मत में योनि वाला ( ब्राह्मणसे ब्राह्मणी में उत्पन्न ) ही ब्राह्मण होता है । आगे भाष्यकारने अब्राह्मण में ब्राह्मणशब्दका प्रयोग किसीके गलत कहने के कारण माना है - ' दुरुपदेशाच्च - दुरुपदिष्टमस्य वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार [ ३३६ भवति - श्रमुष्मिन् अवकाशे ( स्थाने ) त्राह्मणः, तम् आनय । स तत्र गत्वा यं पश्यति, तमध्यवस्यति त्राह्मणोऽयमिति । ततश्च पश्चादुपलभते - नाऽयं ब्राह्मणः । श्रब्राह्मणोऽयमिति निर्ज्ञातं तस्य भवति । तत्र दुरुपदेशाच्च ब्राह्मणशब्दो वर्तते, जातिकृता च अर्थैस्य निवृत्तिः । श्रातश्च सन्देहाद् दुरुपदेशाद्वा ' इस सन्दर्भसे गुणकम - कृत वर्ण - व्यवस्था जो प्रतिपक्षियोंको इष्ट है - खण्डित हो जाती है । इस प्रकार जानना चाहिये कि जहाँ ब्राह्मण में भी अब्राह्मण-शब्दका प्रयोग है, वहाँ निन्दार्थवाद विवक्षित होता है, और जहाँ अब्राह्मण में भी ब्राह्मणशब्दका प्रयोग हो; वहाँ स्तुत्यर्थवाद, वा सन्देह, वा गलत कथन समझना चाहिये; क्योंकि वहाँपर ' ब्रह्मणः - ब्राह्मणस्य अपत्यं जातिर्ब्राह्मण: ' यह वास्तविक अर्थ कभी किया नहीं जा सकता । इस कारण वहाँ ब्राह्मण वा अब्राह्मण शब्दको यौगिक वा पारिभाषिक ही जानना चाहिये, वास्तविक नहीं | ( १२ ) पूर्वपक्ष - ' तस्मान्न गोश्ववज्जातिभेदोस्ति देहिनाम् ' ( भविष्य. ब्राह्म. ४० ३४ ) इस प्रमाणसे निश्चित है कि- मानवों में ब्राह्मणादि जातिभेद नहीं; क्योंकि गाय घोड़े में भिन्न - भिन्न आकृति - भेद जैसे है, वैसे ब्राह्मण - शुद्रादिमें नहीं । उत्तरपक्ष- यदि गाय घोड़े आदिकी भांति ब्राह्मणादिमें जाति-भेद नहीं; तब इसमें हमारा भी आग्रह नहीं; परन्तु अवान्तर-जातिभेद तो है ही । जैसे गाय घोड़े की पशुजाति समान है, वैसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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३४० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ब्राह्मण - शुद्रकी भी मनुष्य जाति समान है । जैसे पशु - जातिकी समानतामें भी अवान्तर गाय- घोड़ा यह जातिभेद है; वैसे ब्राह्मण - शूद्रके मनुष्यत्व - जातिकी समानतामें भी अवान्तर ब्राह्मण - शुद्रत्व जातिभेद भी है ही । इसीलिए महाभाष्यमें भी ' आकृति - प्रहरणा जातिः ' यह जातिका सामान्य लक्षण होनेपर भी ब्राह्मण और शुद्रके जातिभेदको बतानेवाला ' सकृदाख्यात-निर्माह्या ' यह भिन्न जातिका लक्षण किया गया है । इसमें स्पष्टता अन्यन्त्र देखें | पूर्वपक्ष - परन्तु कई लोग यह न मानकर कहते हैं कि-जातिका लक्षण ' समानप्रसवात्मिका जातिः ' ( २/२/७० ) यह न्यायदर्शन में किया है । इसका यह अर्थ है - जो धर्म अनेक व्यक्तियों में समान बोध पैदा करता है, वह जाति है । यह गौतममुनिसे प्रोक्त जाति लक्षण - ब्राह्मण आदि वर्णों में संगत नहीं होता, क्योंकि - जिनसे जातिका बोध हो सकता है, वे अवयव - संस्थान ब्राह्मण आदियों में अन्य क्षत्रियादिसे विलक्षण नहीं । जैसे मनुष्यत्व जातिके बोधक कान, नाक आदि अङ्ग-संस्थान मनुष्यों में समानरूपसे मिलते हैं, वे अन्य वानरपशु आदियों से विलक्षण हैं । इनसे प्रत्येक मनुष्य व्यक्तिमें स्थिर मनुष्यत्वरूप एक धर्मं प्रकट होता है, जिसे जाति कहते हैं । परन्तु ब्राह्मण - आदि वर्णोंमें वैसे एक - दूसरे से विलक्षण अवयव-संस्थान नहीं प्राप्त होते, जिनसे ब्राह्मणत्वादिरूप धर्म प्रकट होवें, जिन्हें हम जाति कह सकें । अतः ब्राह्मणादि जाति नहीं । CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार [ उत्तरपक्ष – वस्तुतः उक्त गौतमसूत्रका यह अर्थ है ि धर्म अनेक व्यक्तियोंमें अर्थतः वा शब्दतः एकाकार प्रसूत करे, उसे जाति कहते हैं । घी, तेल, लाख वृक्ष बुटि आदि अनेक व्यक्तियोंमें होने वाले द्रव्यत्व,, पत्थर - रूप एक धर्म नैयायिक लोग जाति मानते हैं, परन्तु पूर्वपक्षीकी की हुई सूत्रकी व्याख्या - रीतिसे उक्त जातिलक्षण घट न सक्ने उदाहरण में अव्याप्त हो जाता है । सिद्धान्त में भिन्न - मित्र आकारतामें घी द्रव्य है, तल द्रव्य है, लाख द्रव्य है - इत्यादि शब्दगत एक आकारको लेकर समान बुद्धि उत्पन्न हो जानें श्रीगोतम - कृत जातिका लक्षण ठीक घट जाता है, किन्तु अर्थम एकाकारकी बुद्धिके स्थलमें उन धर्मोंके प्रकाशक अवयवसंस्थार हुआ करते हैं । शब्दगत एकाकारकी बुद्धिस्थल में उन धर्मक वोधक शास्त्रों में भिन्न - भिन्न रीति से वर्णित किये गये हैं । जैसे-घी, लाख आदि कार्य, भिन्न - भिन्न जिन अपने कारणों से उत्तः । हुए; वे अवश्य एक - दूसरे से विलक्षण होंगे । अभिन्न कारण! कार्यकी उत्पत्ति माननेपर कभी जलसे भी घी उत्पन्न हो जाये । पर ऐसा नहीं । तब कारणोंकी भिन्नता के लिए जो भेदक घरे स्थिर किये जावेंगे; वे सभी जातिरूप ही होंगे । इस अनुमार प्रमाणसे द्रव्यत्व आदि जातियोंकी सिद्धि हो जाती है । इस प्रकार ब्राह्मण आदि जातियोंका बोधन जिस उपावसे । किया जा सकता है; वह ' लिङ्गानां च न सर्वभाक्, सकृदाख्याक निर्माया ' इस व्याकरणके वार्तिकसे कहा गया है । जो शद Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) ३४२ ] Lan न हो; जैसे - शुक्ल आदि शब्द विशेष्यनिघ्न होकर है किन् सर्वलिङ्गी तीनों लिङ्गों में रहते हैं, इनसे भिन्न हों, एक व्यक्तिमें संकेत कार बुद्धिय करनेसे उसके अन्य व्यक्तियोंमें कहने के बिना भी जो शब्द वृत्त, पत्थर व्यवहृत हो; वह जाति कही जाती है । अर्थात वे शब्द जाति-एक धर्म बोधक होते हैं, जैसे - ब्राह्मण आदि शब्द । कभी यह संकेत की हुई उ किया जावे कि - यह देवदत्त ब्राह्मण हैं, पीछे उसके परिवारकेलिए नसक्ने यह संकेत दिया जावे कि — यह इसका पुत्र वा भाई है; तब श्रोता भिन्न - मित्र बिना ही कहनेके उन सभीको ब्राह्मण मान लेगा । इस कारण है - इत्यादि ब्राह्मण आदि जाति - शब्द सिद्ध होगये । हो जाने शुक्ल आदि शब्द तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं; अतः वे कन्तु अर्थम वयवसंस्थान पूर्व - कथनानुसार जातिशब्द नहीं; किन्तु गुणशब्द हैं । इस प्रकार उन धर्म विशारद, शास्त्री, बी. ए., एम. ए. आदि शब्दों में ‘ सकृदाख्यात-हैं । जैसे- निर्ग्राह्यता ( अर्थात् बी. ए. के पुत्र भ्राता आदि बी. ए. नहीं कहे से जा सकते ) न होने से यह भी जातिशब्द नहीं हैं; किन्तु अनेक न - कार व्यक्तियों में प्रयोज्य उपाधि शब्द हैं । निष्कर्ष यह है कि जो शब्द हो जाते समान श्रेणी के अनेक व्यक्तियोंका बोधक हो; जैसे गाय घोड़ा भेदक ब आदि; वे जातिशब्द कहे जाते हैं । जैसे गोशब्द सास्ना ( गल-इस अनुमा कम्वल ) आदि सदृश अवयव वाली अनेक व्यक्तियोंका बोधक है; जैसेकि - द्रव्यशब्द पृथिवी भी द्रव्य, घी भी द्रव्य, जल भी जस उपावसे द्रव्य, इन समान - श्रेणी वाले वस्तुओंका बोध कराता है; इस सकृदाख्याक प्रकार ब्राह्मणशब्द देवदत्तमें ब्राह्मणत्व - संकेत के बाद उसके पुत्र, जो शब्द पौत्र, सहोदर आदि समान - श्रेणी वाले अनेक व्यक्तियोंका बोध वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार [ ३४३ कराता है; इस प्रकार क्षत्रिय आदि शब्द भी वैसे ही ( जातिशब्द ) हैं । तब यह सब गोत्व, द्रव्यत्व तथा ब्राह्मणत्व आदि गोतम-सूत्र के अनुसार भी जाति ही हैं । शेष उक्त गोतमके जाति - सूत्र की स्पष्टता पाठक ' आलोक ' के छठे पुष्पके २१ वें निबन्धमें देखें । ( १३ ) पूर्वपक्ष - ' एभिस्तु कर्मभिर्देवि! शुभैराचरितैस्तथा । शुद्रो ब्राह्मणतां याति वैश्यः क्षत्रियतां तथा । ' ( मद्दा. अनुशा. १४३।२६ ) इस प्रमाणसे कर्मसे शुद्रकी ब्राह्मणता और वैश्य की क्षत्रियता कही है; तब वर्ण - व्यवस्था गुण - कर्मसे सिद्ध हुई । उत्तरपक्ष – ‘ एभिस्तु कर्मभि: ' इस पद्यमें शूद्रादिकी ब्राह्मणता, क्षत्रियत कही है । यहाँ तल प्रत्यय हैं, ' ब्राह्मणतां याति का ' ब्राह्मणभावं गच्छति, तद्धर्मं प्राप्नोति ' यह अर्थ है- ब्राह्मणो ' भवति ' यह अर्थ नहीं । ' अलकेंदंशनेन अलर्कतां याति ' यहाँ अलक- पागल कुत्तेका नाम है । सो उसके काटने से मनुष्यका ' अलर्कता ' इस तल्ं प्रत्ययसे ' उस धर्मवाला ' अर्थ होता है, बहु साक्षात् कुत्ता नहीं बन जाता । ' तद्भिन्न होनेपर उसके बहुत धर्मों वाला होना तद्भाव हुआ करता है, ' तस्य भावस्त्वतलौ ' ( पा. ५।१।११६ ) तल् प्रत्यय तद्भाव अर्थ में हुआ करता है । तद्भाव सायका नाम भी होता है । जो जातियाँ जिस - जिस जातिके धर्म वाली होती हैं; वे उन - उनके सदृश हो जाती हैं; वह वह नहीं हो जातीं । पशुके आचारसे ' पुरुषकी ' पशुता ' पशु - सदृशता-को बताती है, साक्षात् पशु होनेको नहीं । पापाचार होनेसे पाप-जातीय के समान हो जाता है, प्रायश्चित्तसे वह शुद्ध हो जाता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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३४४ ] श्रीसनातनधर्मालीक ( ८ ) वर्णैव्यं वस्थागत - भ्रान्तिपरिहार ३४६ कुत्तेके विषसे दूषित हुआ हुआ पुरुष उपचार से स्वस्थ हो जाता है । वस्तुतः उक्त महाभारतीय - पद्य जन्मान्तरकेलिए है, इस जन्मकेलिए नहीं - यह उस प्रकरण में स्पष्ट है । वहाँ कहा है-' एते योनिफला देवि! स्थानभागनिदर्शकाः ' ( १४३।५३ ) यहाँ यह सब योनिके फल दिखलाये हैं । योनिप्राप्ति जन्मान्तर में होती है । ( १४ ) पूर्वपक्ष - ' शूद्रोपि - आगम सम्पन्नो द्विजो भवति संस्कृतः । एतैः कर्मफलैर्देवि! न्यूनजाति - कुलोद्भवः ' ( महा. अनु. १४३।४६ ) यहाँ तो स्पष्ट ही शुद्रका ब्राह्मण बन जाना कहा है; यहाँ तो ' तल् ' प्रत्यय भी नहीं । अतः वर्ण - व्यवस्था गुण - कर्मसे ही है । उत्तरपक्ष — यह पद्य ' साहित्य सङ्गीतकला - विहीनः साचात् पशुः पुच्छविषाणहीनः ' ( नीतिशतक १२ ) इस पद्यकी भांति अर्थवाद-मात्र है, अतः यहाँ अक्षरार्थ में तात्पर्य नहीं । इसके अतिरिक्त ' लोकवृत्तमितिहास - पुराणस्य, लोकव्यवहार - व्यवस्थापनं धर्म-शास्त्रस्य विषयः । तत्रैकेन न सर्वं व्यवस्थाप्यते इति यथाविषय-मेतानि प्रमाणानि इन्द्रियादिवत् ' ( इतिहास - पुराणका विषय है । लोकों का आचरण बताना, परन्तु लोक व्यवहारकी व्यवस्था बताना धर्मशास्त्रका विषय है । एकसे सारी व्यवस्थाएँ नहीं हुआ करतीं; अतः पुराण तथा धर्मशास्त्र आदि अपने - अपने विषयमें अधिक प्रमाण हैं ' ४ | १ | ६२ ) इस ' न्यायदर्शन ' के कहने से तथा ' तयोर्द्वैषॆ स्मृतिर्वरा ' ( पुराण तथा स्मृतिके विरोध में स्मृति-वचन अधिक माननीय होता है ' ११४ ) इस ' वेदव्यासस्मृति'के CC - 0. Ankur Joshi Collection वचनसे, तथा ' अथ हाऽस्य वेदमुपशृण्वतः त्रपुजतुभ्यां पुराय प्रतिपूरणम् ' ( गोतमस्मृति १२ / १ ) एकमेव तु शूद्रस्य श्रो समादिशत् ।.. शुश्रूषामनसूयया ' ( मनु. १/६१ ) न प्रभुः वैश्य दद्याद् न चास्योपदिशेद् धर्म ' ( मनु. ४/८० ) इत्यादि शूद्राय म ब्राह्मग वचनोंसे उक्त - इतिहासका वचन बाधित हो जाता है । धर्मशा इसी कारण ' वेदान्तदर्शन ( १ | ३ | ३८ ) शाङ्करभा श्रीव्यासका आशय शूद्रके वेदाध्ययनके निषेधमें प्रकट कर्मण ि गया है - ' इतश्च न शूद्रस्याधिकारः, यदस्य स्मृतेः श्रवणाध्ययन क्षत्रिय प्रतिषेधो भवति । वेद - श्रवण - प्रतिषेधो वेदाध्ययनप्रतिषेघस्तर करते ज्ञानानुष्ठानयोश्च प्रतिषेधः शूद्रस्य स्मयेते । श्रवरण - प्रतिषेधस्तार ‘ अथास्य वेदमुपशृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम् ' । पशु । महाभ वा एतच्छ्रंमशानं यत् शूद्रः, तस्मात् शूद्र - समीपे नाध्येतव्य इस इति । अतएव अध्ययन - प्रतिषेधः । यस्य हि समीपेपि नाध्येत संवाद भवति, स कथमश्रुतमधीयीत? भर्वात च वेदोच्चारणे जिह्वाच्छे मानुष्य धारणे शरीरभेद इति । अतएव च श्रर्थाद् श्रर्थज्ञानानुष्ठाः संशय प्रतिषेधो भवति । ' न शूद्राय मतिं दद्यात् ' इति । द्विजातीनारि स तव व्याऽव्ययनं दानमिति ' ( पशुद्राधिकरण में ) इस विषय में स्पष्टता लभते ' आलोक ' के तृतीय- पुष्पमें तथा अन्यत्र देखें | ततस्त्रि तत्रैव इस प्रकारका शूद्र आगम सम्पन्न ही कैसे हो सकता है!! और संस्कृत - द्विज कैसे हो सकता है? वस्तुतः उक्त महाभारत योनिक पद्य भी जन्मान्तरमें वर्ण - परिवर्तन बताता है, इस विषय चाएड अनुशासनपर्वका १४३ अध्याय देखना चाहिये, इस प्रकार छ Gujarat. An eGangotri Initiative
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जतुभ्यां श्रो श्य प्रभुः न शूद्राय मह दि धर्मशब्दे श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ३४६ ] २२३ वा अध्याय भी देखना चाहिये । पुराण ( १५ ) पूर्व पक्ष - ' शूद्रयोनौ हि जातस्य वैश्यत्वं लभ्यते ब्रह्मन्! क्षत्रियत्वं तथैव च । ब्राह्मण्यमभिजायते ' ( महा. वनपर्व. २१२/११ ही जन्म में वर्णपरिवर्तन सिद्ध हो जाता है सद्गुणानुपतिष्ठतः । आर्जवे वर्तमानस्य ) इस वचनसे एक । इसी प्रकार ' शुद्रे चैतद् भवेल्लक्ष्म ' यह महाभारतका अनुशासनपर्वका पद्य भी शाङ्करमान्य कर्मणा वर्ण - व्यवस्थाको बताता है; इस प्रकार ' जात्या न - प्रकट हिर क्षत्रियः प्रोक्तः ' इत्यादि महाभारतके पद्य भी इसी पक्षको सिद्ध गाध्ययनार प्रतिषेधस्तदुर्द उत्तरपक्ष — यहां भी वर्णपरिवर्तन जन्मान्तरमें इष्ट है, क्योंकि— महाभारतके सिद्धान्तमें अन्य - जन्म में ही वर्णपरिवर्तन होता है, ' पशु ॥ इस जन्ममें नहीं । इसकी स्पष्टता अनुशासनपर्व में इन्द्र - मतङ्ग-प नाप्येवनं संवादमें मिलती है । उसके पद्य यह हैं - ' तियग्योनिगतः सर्वो जिह्वाच्छे | मानुष्यं यदि गच्छति । स जायते पुल्कसो वा चाण्डालो वाऽप्य-संशयः ' ( २८ | ६ ) पुल्कसः पापयोनिर्वा यः कश्चिदिह लक्ष्यते । नानुष्ठानवे द्विजातीनामि स तस्यामेव सुचिरं मतङ्ग! परिवर्तते । ( ७ ) ततो दशशते काले जय में स्पष्टत लभते शुद्रतामपि । शूद्रयोनावपि ततो बहुशः परिवर्तते ( ८ ) । ततस्त्रिंशद्गुणे काले लभते वैश्यतामपि । वैश्यतायां चिरं कालं सकता है!! तन्त्रैव परिवर्तते । ततः षष्टिगुणे काले लभते ब्रह्मबन्धुताम् ' ( १० ) । इनका अर्थ श्री सातवलेकरने इस प्रकार लिखा है- ' तिर्यक्-महाभारत विषय योनिके ज़ीव यदि मनुष्यत्व प्राप्त करें, तो वे पहले पुल्कस अथवा इस चाण्डाल होके जन्म ग्रहण करते हैं ।... फिर वह उस ही योनि में प्रकार CC - 0. Ankur Joshi वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार ( III बहुत समय तक बार - बार भ्रमण किया करता है । फिर सहस्र-वर्षके अनन्तर शुद्रत्व लाभ करता है । शूद्रयोनिमें भी वह अनेक बार परिभ्रमण करता है, फिर तीसगुणा समय बीतने पर वैश्यत्व प्राप्त होता है; वैश्य - योनिमें भी बहुत समय तक उसे बार - बार जन्म लेना पड़ता है । अनन्तर साठ गुणा समय बीतने पर क्षत्रिय होकर जन्म लेता है, क्षत्रिययोनिमें भी बहुत समय तक उसे परिभ्रमण करना होता है ( ६-१० ) अनन्तर षष्टिगुणा समय बीतनेपर ब्रह्म - बन्धुता प्राप्त होती है ' । जब महाभारतका यह सिद्धान्त है; तब उससे विरुद्ध आभासित होने वाले पद्योंकी भी अर्थवाद होनेसे जन्मान्तर में वर्णं परिवर्तनमें चरितार्थता समझनी चाहिये । और फिर ' शूद्रयोनौ हि जातस्य ' यह वचन वादीके पक्षको काटता भी है, क्योंकि - यहांपर वर्ण - व्यवस्था जन्मसे सिद्धान्तित की गई है । ' जात्या न क्षत्रियः प्रोक्तः ' इत्यादि अविज्ञातस्थल वाले पद्य कर्मप्रशंसाके अर्थवाद हैं । ' शुद्रे चैतद् भवेद् लक्ष्म ' के विषय में अग्रिम - उत्तरपक्ष में देखें । ( १६ ) पूर्वपक्ष – ( क ) ' यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततो-स्थितः । ते ब्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद् द्विजः ' ( महा. वन. २१६/१४ ) इस पद्यसे वृत्त द्वारा शुद्रकी ब्राह्मणता बताई गई है । ( ख ) ' शूद्रे चैतद् भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते । न वै शुद्रो भवेत् शूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ' ( शान्तिपर्व १८६८ ) इन महाभारतके प्रमाणोंसे गुणकर्मणा वर्णव्यवस्थाकी स्पष्ट पुष्टि है । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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३४८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) उत्तरपक्ष - यहां प्रतिपक्षियोंको बताना चाहिये कि -महाभारतको क्या गुणकर्मसे वर्ण- परिवर्तन सिद्धान्त इष्ट है? उन्हें इसमें स्पष्ट मानना पड़ेगा कि नहीं । प्रतिपक्षी लोग महाभारतीय इतिहासको तो वैयासिक ( व्यासकृत ) मानते हैं; पर उपाख्यानोंको वैयासिक मानते हैं । वे जिन एतद्विषयक पद्योंको बड़े संरम्भसे दे रहे होते हैं; वे मूल - इतिहासोंके न होकर उपाख्यानोंके होते हैं; तब वे पद्य उनके ही मतानुसार अवैयासिक होनेसे प्रमाणभूत कैसे हो सकते हैं? अथवा प्रमाण द्दों भी; तथापि उनकी मूल - इतिहाससे सङ्गति लगा कर अर्थ करना पड़ेगा । मूल - इतिहासको देखिये— । महाभारतने क्षात्रकर्म स्वीकृत किये हुए भी द्रोणाचार्य और कृपाचार्यको क्षत्रिय न कहकर उन्हें जन्मसे ब्राह्मण होनेसे ही ब्राह्मण कहा है । अश्वत्थामामें तो न ब्राह्मणोचित कर्म थे. न गुण ही । उसने क्षत्रिय गुण - कर्म ही स्वीकृत कर रखे थे । उसका स्वभाव ही इतना क्रूर था कि उसने सोते हुए ही द्रौपदीके पुत्रोंको मार दिया और पाण्डवोंको निर्वंश करनेके लिए उत्तराके गर्भपर भी अस्त्र छोड़ दिया, और धृष्टद्युम्नको पशुकी भांति मार डाला । ब्राह्मणोंका गुणकर्म तो शम, दम, क्षमा आदि होता है, वह उसमें नहीं था, यह स्पष्ट है; ऐसा होनेपर भी महाभारत ने उसे क्षत्रिय नहीं माना, बल्कि ' ब्राह्मणस्य सतश्चैव ' ( सौप्तिकपर्व १६।१७ ) उसे जन्म - ब्राह्मण होनेसे पाण्डवोंने मनु ( ८ ३८० ) के अनुसार नहीं मारा । और देखिये - महाभारत के मुख्यपात्र पाण्डव हैं; उनमें CC - 0. Ankur Joshi Collection व्यवस्थागत भ्रान्ति परिहार युधिष्ठिर के ही गुणकम देखिये । क्या उसमें शम धर्म, क्षमा आदि ब्राह्मणके योग्य गुणकर्म नहीं, दम, र भीमसेनने भी कहा था- ' घृणी ( दयालुः थे, जिसके ) ब्राह्मणरूपोसि क्षेत्रेषु जायथाः ' ( महा. वन. ३५/२० ) ( तुम दयावाले समान हो, क्षत्रिय जातिमें कैसे पैदा हुए? ( कितना ब्राह्म ' सव रूपसे वर्ण व्यवस्था की जन्म- मूलकता में प्रकाश डाला यहां अन्त भीमसेन तो पूर्णक्रोधी था; परन्तु महाभारतने विरुद्ध गया है । कहा वाले भी दोनोंको क्षत्रिय ही माना है; वल्कि - ' युद्धे चाप्यपलाय गुण गया विर ( गीता १८ | ४३ ) इस महाभारतसे समर्थित क्षत्रिय - कर्म से नि कर्ण आदिके युद्ध में भागते हुए भी युधिष्ठिरको वरि महाभारतद्वार १६५ क्षत्रिय ही माना गया है । वध कर्णको देखिये — क्या उसमें पूर्ण क्षत्रियके गुणकर्म नहीं है. वह तो था ही जन्मसे क्षत्रिय; परन्तु उत्पत्तिका रहस्य ज्ञात र शब होनेसे सर्वसाधारण उसे जन्मसे सूतपुत्र मानते थे । इससे है कि- महाभारतको वर्णव्यवस्था जन्मसे ही इष्ट है, गु कमेसे उसको वर्ण - परिवर्तन इष्ट नहीं । अन्य देखिये - महाभारत ब्राह में आदिपर्व में २६ अध्याय में अपने धर्म - कर्म से हीन व्य ब्राह निषादोंके आचार वाले ब्राह्मणको भी ब्राह्मण माना गया है; और ब्राह उसके निगलनेके समय गरुड़ के गले में दाह दिखलाया गया है । विप्र अन्य भी महाभारतका अभिप्राय देखिये - ' ब्राहाणो मक पार देशीयः कश्विद् वै ब्रह्मवर्जितः । ग्रामं वृद्धियुतं वीक्ष्य प्राविरुद्ध ४७ भैक्ष्यकाङ्क्षया ' ( शान्तिपर्व १६८। ३० ) यहाँ ब्राह्मणकर्म से वर्जिः दध Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातन धर्मलोक ( ८ ) ३५० ] म माना गया है । इसलिए उस ब्राह्मणने स्वयं भी , दम, सर को भी ब्राह्मण द्विजश्रेष्ठ! नास्मि वेदविदप्यहम् | वित्तार्थ-थे, जिसके था- ' निर्धनोरम कहा विद्धि मां द्विजसत्तम । ( १६८ । ५० ) । वहाँ एक नाले रूपोसि हि सम्प्राप्तं, ब्रह्मण्य, सत्यसन्ध, और दान में लगे हुए भी ' सर्ववर्णंविशेषविद् ना यहां शबरको ब्राह्मण नहीं कहा गया, किन्तु दस्यु ( १६८ | ३१ ) डाला गया कहा अन्त्यज गया - है । उस ब्राह्मणका एक विधवासे रमण भी दिखलाया रुद्ध है । गया है- ' प्रादात् तस्मै स विप्राय... नारीं चापि बयोपेतां भर्त्रा गुणध । प्य पलायन विरहितां तथा । एतत् संप्राप्य हृष्टात्मा दस्योः सर्वं द्विजस्तथा । - कर्म से विर तस्मिन् गृहवरे राजन्! तथा रेमे स गौतमः ' ( १६८।३४ ) । हाभारतद्वार १६८ | ३७ पद्यमें उसी ब्राह्मणको हिंसापटु, दयाहीन, प्राणियों के वधमें लगा हुआ, और दस्युओं के समान दिखलाया है; फिर भी कर्म नहीं उसे ब्राह्मणके पर्यायवाचक ' विप्र ' ( ४६ ) तथा ' द्विज ' ( ४८ ) है ह्रस्य ज्ञात शब्दसे कहा गया है ॥ इससे उसके पास शूद्रान्नपरिवर्जक, ब्रह्मण्य, और वेदपारग एक ष्ट है, गुरु ब्राह्मण आया ( १६८।४०-४१-४२ ) इस शुभकर्माको भी महाभारत-- महाभारत में ' ब्राह्मण ' कहा गया है, और उस दुष्टगुणकर्मा गौतमको भी हीन ब्राह्मण कहा गया है — ' विप्रोऽगच्छत गौतमः ' ( १६६।११ ) । वह गया है; और ब्राह्मण उस गौतम - विप्रको डांटने लगा - किमिदं कुरुषे मोहाद ना गया है । विप्रस्त्वं हि कुलोद्भवः । पूर्वान् स्मर द्विजज्ञातीन् प्रख्यातान् वेद-हाणो म पारगान् । तेषां वंशेऽभिजातरत्वमीदृशः कुलपांसनः ' ( १६८ | ४६-य प्राविरद ४७ ) । उस गौतम - ब्राह्मणने अपने आश्रय एवं धनदाता पक्षीका कर्मसे वर्जिक बंध भी कर दिया ( १७२।३-४ ); इस प्रकार कृतघ्न ( १७२ ( २ ) भी, वर्णव्यवस्थागत भ्रान्ति परिहार [ ३५१ पापाचार, पापकर्मा, पापात्मा, पाप - साधन ( १७०२/१८ ) भी, ब्रह्मबर्चसहीन, स्वाध्यायसे उपरत, केवल गोत्रको जाननेवाले ( १७११३, १७२।८ ) भी शूद्रा - पुनर्भु द्वारा सन्तान उत्पन्न करने से नरकाधिकारी ( १७३ | १६-१७ ) भी उस गौतमको उसी महाभारत-ने ' अयं वै जन्मना विप्रः ' ( १७१।७ ) द्विजाधम ( १७२ = ) ' सिक्त्वा-ऽमृतेन तं विप्रं ' ( १७३ | १३ ) इस प्रकार ब्राह्मण कहा है, शुद्र नहीं । इससे महाभारतके मतमें भी वव्यवस्था जन्म से ही सिद्ध होती है । गुण - कर्मसे वर्णपरिवर्तन महाभारतको इष्ट नहीं । तब उससे विरुद्ध प्रतीत होनेवाले कई पद्य यदि महाभारत में मिलें; तब स्पष्ट है कि वे अर्थवाद हैं । उनका केवल कमेकी प्रशंसामात्रमें तात्पर्य इष्ट है, वर्णपरिवर्तनमें नहीं । अब ' यस्तु शुद्रो दमे सत्ये... तं ब्राह्मणमहं मन्ये ' इस महा-भारतीय पद्यकी महाभारतसे ही कही हुई उक्त कसौटी से परीक्षा कीजिये । यह पद्य महाभारतका सिद्धान्तपक्ष नहीं है, किन्तु तं ब्राह्मणमहं मन्ये ' से एक व्यक्तिका कथन है- यह स्पष्ट है । और ‘ तं ब्राह्मणं मन्ये ' का अर्थ भी ' ब्राह्मण मानता हूँ ' यह नहीं है, किन्तु ' ब्राह्मणवत् मन्ये ' है, कि मैं उसे ब्राह्मणकी भांति मानता हूँ । यदि प्रश्न किया जाय कि इसमें ' वति ' प्रत्यय नहीं हैं, तव बिना भी वति प्रत्यय के ' भांति ' अथ कैसे माना जाए? इसका उत्तर यह है कि- ' वर्ति ' प्रत्ययके बिना भी ' वति ' का अर्थ हो जाता है | देखिये इसपर महाभाष्य - ' अन्तरेणापि वतिमतिदेशो गम्यते । तद् यथा - एष ब्रह्मदत्तः । अब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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३५२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) तेन मन्यामहे - ब्रह्मदत्तवद् अयं भवति ' इति ( १ / २ / १,२ | ३ | ६६ ) जो ब्रह्मदत्त नहीं था; उसे ब्रह्मदत्त कहा गया; इसका भाव यह माना गया कि वह ब्रह्मदत्तकी भांति है । इस प्रकार. एक अब्राह्मण शुद्रको जो कि ब्राह्मण कहा गया; इससे वह ब्राह्मणवत् ( ब्राह्मण-के समान ) माना जाता है, वास्तविक ब्राह्मरण नहीं । इसीलिए तो उक्त - पद्यके वक्ताने कहा था- ' कर्मदोषश्च वै विद्वन्! आत्मजाति-कृतेन वै । कश्चित् कालमुष्यतां वै ततोसि भविता द्विजः ' ( २१६।१२ ) अर्थात् तुम मरनेपर अन्य जन्ममें ब्राह्मण बनोगे । नहीं तो ब्राह्मणयोग्य गुणकर्मवाला होनेपर उसे अभी ही ब्राह्मण क्यों नहीं कहा गया? । यदि प्रतिपक्षी कहे कि यह आपकी जबर्दस्ती है कि आपने ' तं ब्राह्मण महं मन्ये ' का ' ब्राह्मणवत ' अर्थ कर दिया? वह न वो वक्ता पात्रको विवक्षित है, न महाभारतकारको; इसपर हम कहते हैं - ऐसा नहीं | हमारा ही अर्थ वक्ता, महाभारत के पात्रको भी विवक्षित है, और महाभारतकारको भी विवक्षित है । परन्तु प्रतिपक्षी -जैसे व्यक्ति दूसरोंके ट्रैक्ट देखकर उसकी लिखी बात को अपना सिद्धान्त बना लिया करते हैं । उस प्रमाणको मूलप्रन्थ में नहीं देखते । यदि देखते भी हैं; तो उसका पूर्वापर-प्रकरण नहीं देखते । यदि उसे भी देखते हैं; तब वहाँ स्वयं निष्पक्ष विचार नहीं करते । वे तो अपने अशुद्ध पक्षको सरसरी नज़र से उस पद्यमें देखकर इतने प्रसन्न हो जाते हैं कि उनमें निष्पक्ष विचारकी शक्ति ही नहीं रह जाती । जब प्रतिपक्षी CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्थागत भ्रान्तिपरिहार [ ३५ ३ निष्पक्ष दृष्टि डालेंगे; तब उन्हें प्रत्युत्तर स्वयं सूकेंगे f प्रतिपक्षी देखें कि - उस पद्यसे हमारा ही पक्ष सिद्ध होता । श्रव । इ है । वक्ता पात्र के २१६ १४ इस प्रतिपक्षीसे दिये पद्यमें ' तं ब्राह्मणमहं मन्ये ' यहां ' ब्राहाणं ' का पूर्वोत्तर - प्रकरण ( ई ) । से ' ब्राह्मण. | सदृश ' ही अर्थ इष्ट है | देखिये - इससे पूर्वका पद्य - ' वाह्मणः पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु । दाम्भिको दुष्कृतः प्राज्ञः । शूद्रेप | सदृशो भवेत् ' ( २१६।१३ ) यहाँपर निकृष्ट- गुणकर्मा में ब्राह्मणको शूद्र नहीं कहा; किन्तु ' शूद्रेण सदृश: ' ' शूद्रके समान कहा है; तब इसके अग्रिम पद्य ' तं ब्राह्मणमहं मन्ये ' ( २१६ | १४ ) मैं भी वक्ता - पात्रको अपने पूर्वके पद्य के अनुरोधसे, तथा महाभाष्यके पूर्वोदधृत वचनके अनुसार ' ब्राह्मण- सदृशम्, ब्राह्मणवत् ' यद् अर्थ इष्ट है- यह अतीव स्पष्ट है । नहीं तो वही वक्ता पूर्वपद्यमें भी वैसे ब्राह्मणको ' शुद्रसदृशं ' न कहकर ' शूद्रं ' कहता; पर वैसा नहीं कहा I अब प्रतिपक्षी अपना सारा बुद्धिबल लगाकर प्रत्युत्तर है; यहां ‘ सदृश ' शब्द साक्षात् दीख रहा है । सदृश होनेपर भी सभी - वे व्यवहार नहीं हुआ करते । ' साहित्य - संगीत कला - विहीनः साक्षात् - पशुः पुच्छविषाणहीनः ' ( नीतिशतक १२ ) ' विद्या- श विहीनः पशुः ' ( नीतिशतक १२ ) इन श्लोकोंके अनुसार भ विद्यादि- हीनको साक्षात् पशु मानकर उसे खली भूसा आदि नहीं पु खिलाया जाता, अथवा उसे पशु - शाला में खूँटीमें नहीं बांब त दिया जाता । ऐसे शब्द केवल निन्दा - प्रशंसा आदि तात्पर्य में स ० ० २३ Gujarat. An eGangotri Initiative