सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 191–200

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ३५४ ] ३५ श हो जाते हैं, क्योंकि यह अर्थवाद हैं; वर्ण - परिवर्तनमें केंगे । अब विश्रान्त तात्पर्य नहीं हुआ करता । यहाँ वृत्तका अर्थवाद है जैसे है । इनका के वनपर्व ( ३१३।१०६ ) में, अथवा याज्ञवल्क्यस्मृतिमें, -' ( शूद्र ) यह महाभारत बात प्रथम - उत्तरपक्षमें पाठक देखें ।; ' ब्राह्मण. इसके अतिरिक्त शुद्रको ब्राह्मण कहा भी नहीं जा सकता, क्योंकि— ' ब्राह्मोऽजातौ ' ( पा. ६ | ४ | १७१ ] इस सूत्र के अनुसार ब्राह्मणके ज्ञः शूद्रेप अपत्य ( सन्तान ) तथा उस जातिवालेको ही ब्राह्मण कहा जाता कर्मा भी है; पर वह शुद्र तो किसी ब्राह्मणकी सन्तान नहीं; इसी कारण के समान ' सकृदाख्यातनिर्ब्राह्या ' इस महाभाष्यके वचनानुसार ब्राह्मण-( २१६ | १४ ) जाति कहा भी नहीं जा सकता । तब उसे ब्राह्मण कैसे कहा जा महाभाष्यके सकता है? स्पष्ट है कि वहां ' ब्राह्मण ' का अर्थ ' ब्राह्मणसदृश ' है, वत् ' यह वास्तविक ब्राह्मण नहीं । भी इसके अतिरिक्त ' यस्तु शुद्रो दमे ' यह आक्षिप्त - पद्य महाभारत में वैसा नही धर्मव्याध के लिए कहा गया है । महाभारत स्वयं उस जन्ममें उसे शूद्र मानता है; दूसरे ही जन्ममें उसका वर्णपरिवर्तन मानता है । प्रत्युत्तर दे जैसे कि-र भी सभी ला - विहीनः ' व्याघस्त्वं भविता क्रूर! शूद्रयोनौ इति द्विज! ' ( २१५।३१ ) ' विद्या- शूद्रयोन्यां वर्तमानो धर्मज्ञो हि भविष्यसि ' ( २१६ ४ ) ' जातिस्मरस्त्वं छानुसार भविता स्वर्गे चैव गमिष्यसि ' ( ५ ) शापक्षये तु निर्वृत्ते भवितासि आदि नहीं पुनर्द्विज: ( ६ ) एतन्ते सर्वमाख्यातं यथा मम पुराऽभवत् । अभि-नहीं बांध तश्वापि गन्तव्यं मया स्वर्गं द्विजोत्तम! ' ( ८ - ९ ) इसमें स्पष्ट द तात्पर्यमें । दिखलाया गया है कि वह मरने पर ही ब्राह्मण से शुद्र वर्ण में वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार [ ३५५ आया, और फिर मरनेके बाद ही शुद्रसे ब्राह्मण बना, जीवनमें नहीं । इस विषय में ' आलोक ' - पाठकोंको जानना चाहिये कि कई शूद्र पूर्वजन्म में ब्राह्मण होते हैं; शाप आदि कारणवश आरूढ-पतित होते हैं, इस प्रकार कई पूर्व जन्ममें शूद्र होते हैं; इस जन्ममें पूर्वकर्मवश पतितारूढ त्राह्मण होते हैं । जैसे कि - वेदान्त-दर्शन शाङ्करभाष्यमें कहा है – ' येषां पुनः पूर्वकृत संस्कारवशाद् विदुर- धर्मेव्याध ( जिसका प्रकरण चालू है ) प्रभृतीनां [ स्वयं ] ज्ञानोत्पत्तिः, तेषां न शक्यते फलप्राप्तिः प्रतिपेदधुम् ' ( १ । ३ । ३८ ) । अथवा वैसे अपनी माता में छिपे रूपसे त्राह्मणद्वारा वा शूद्र द्वारा उत्पन्न होते हैं; यही कारण होता है कि - शूद्रोंका तथा ब्राह्मणों का अपने स्वभाविक गुणकर्मों से अन्यथाभाव देखा जाता है । परन्तु उनका उस जन्ममें वर्णंपरिवर्तन नहीं होता । होगया समाधान | जो कि -'शुद्रे चैतद् भवेल्लक्ष्यं ' यह महाभारतका अनुशासन-पर्वका पद्य दिया जाता है, इसका प्रत्युत्तर ' शूद्रे चैतद् भवेल्लक्ष्म ' इस वनपवेके पद्यकी भांति है । अतः विस्तारकी यहां आवश्यकता नहीं । गुणकर्मकृत - वर्णव्यवस्था जिनका सिद्धान्त है; उन्हें याद रखना चाहिए कि उनके अनुसार पुरुष जन्मसे ब्राह्मण वा शुद्र नहीं कहा जा सकता, किन्तु २५ वें वर्ष में गुणकर्मकी परीक्षाके बाद ही उसे ब्राह्मण वा शुद्र कहा जा सकता है । तब उसके लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि यह ब्राह्मरण था, अब शुद्र होगया । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 192

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३५६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) शूद्र था, अब ब्राह्मण हो गया । ' यह ब्राह्मरण था, यह शूद्र था ' यह शब्द ही बतला रहे हैं कि - वर्णव्यवस्थाका सिद्धान्त जन्म से ही है । अवशिष्ट यह है कि - निकृष्ट - गुणकर्मसे ब्राह्मण कहीं शूद्र कहा गया हो, और शुद्र उत्कृष्ट कर्मोंसे कहीं ब्राह्मण कहा गया हो, यह कैसे? उसमें उत्तर यह है कि वहां उसकी निन्दा वा प्रशंसा मैं तात्पर्य हुआ करता है; उसके वर्णपरिवर्तनमें नहीं - यह हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं । ' द्विजे तद् लक्ष्यं न विद्यते, स ब्राह्मणो ब्राह्मणो न, ऐसा कहना ' अपशवो वा अन्ये गो- अश्वेभ्यः ' की तरह प्रशस्तता तात्पर्य रखता है, ब्राह्मणत्वके अभाव में नहीं । वह प्रशस्त ब्राह्मण है, शुद्रके समान है, शुद्र नहीं है - यह आशय है । इस प्रकार ' न वै शूद्रो भवेत् शूद्रः ' यह भी अर्थवाद है । जन्मना वर्णव्यवस्था में ही ' यह ब्राह्मण, ब्राह्मण नहीं है, शुद्र, शुद्र नहीं है ' ऐसा कहा जा सकता है । गुणकर्मणा वर्णव्यवस्था में तो यह वाक्य ही असङ्गत हो सकता है । उसके द्वारा शाब्दबोध ही नहीं हो सकता, ' सति हि कुडये चित्रं भवति ' । यदि उनके अनुसार वह शुद्र ब्राह्मण हो गया; तब उसका यज्ञोपवीत कव होगा १ उसका गर्मसे अष्टम - वर्ष कहां से लाया जायगा? यदि उक्त पद्य गुणकर्मसे वर्णव्यवस्था करनेवाला होता; तो भीष्म भी युधिष्ठिर को ब्राह्मण कहते; युधिष्ठिर भी अपने आपको ब्राह्मण कहते, और ब्राह्मणोंसे रक्त - सम्बन्ध करते । पर जब महाभारत-को यह दोनों ही बातें इष्ट नहीं हैं; तव हमारा ही पक्ष CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्थागत भ्रान्ति परिहारं [. २५० महाभारतको इष्ट है । महाभारतको उसी जन्म में वर्णपरिवर्तन इष्ट नहीं है । देखिये उसकां मतङ्गोपाख्यान । तब नीचे प्रतिपक्षियोंसे दिये जाते हुए अनिर्दिष्टसङ्केत प्रमाणों पर विचार भी होगया । वे यह हैं - ' जात्या न क्षत्रियः प्रोक्तः क्षतात् त्राणं करोति यः । चातुर्वण्यै - बहिष्ठोपिस एव क्षत्रियः स्मृतः ' । न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतं न च सन्ततिः । कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम् ' ( वन. ३१३ ) ' न कुंलेन नं जात्या वा द्वाभ्यां वा ब्राह्मणो नहि । चाण्डालोपि व्रतस्थश्चेद् ब्राह्मणः स युधिष्ठिर! सर्वेपि योनिजा मर्त्याः स्रमांसाः सपुरीषकाः । न जातिदृश्यते तावद् गुणाः कल्याण-कारकाः ' ( अनु. ) इन तत्तत् - स्थलों में न मिले हुए पद्योंका भी समाधान इसी रीति से समझ लेना चाहिये । जैसे- ' अपना वतन कश्मीर है, अपना वतन स्वर्ग है ' ऐसा कहनेपर भी अपना वतन ( देश ) कश्मीर वा स्वर्ग नहीं हो जाता; किन्तु यहां कश्मीरकी सदृशतामें लक्षणां हुआ करती है; वैसे ही ' चातुर्वर्ण्यं वद्दिष्टोषि क्षतात् त्राणं करोति यः । स क्षत्रिय इति स्मृतः ' इत्यादिमें भी श्रवणकी क्षत्रिय सदृशता इष्ट है; जैसेकि पातञ्जलमहाभाष्यमै कहा गया है — ' अन्तरेणापि वतिमतिदेशो गम्यते । तद् यथा-एष ब्रह्मदत्तः । अब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्तं इत्याह तेन मन्यामहे - ब्रह्मदत्त-वदु अयं भवति ' ( २ | ३ | ६६ ) जो ' वह ' न हो; उसे ' वह ' कह दिया जावें; वह ' वह ' न होकर ' उस जैसा ' माना जाता है । यह ठीक है भी, ' चातुर्वर्ण्य - बहिष्ठो पि ' यह शब्द स्वयं वर्ण - व्य-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 193

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श्रीसनातन धर्मालीक ( ८ ) [ • ३५७ ३५८ ] जन्मसे बता रहा है । उक्त श्लोक उस पुरुषको जब वर्ण से परिवर्तन वस्था रहा है; तब उसे क्षत्रिय वर्ण कैसे कह रहा है? बाह्य कह ' क्षत्रिय ' यह तो वर्णका तथा उससे उत्पन्न उस जाति वालेका एस. नाम है । इससे स्पष्ट है कि- व बाह्य, तथा क्षत्रिय जातिमें क्षत्रियः न पैदा हुएका क्षतत्राणसे क्षत्रिय कहना वर्ण- दृष्टिसे नहीं है, स एव किन्तु शाब्दिक दृष्टिसे है । कई इस प्रकारकी ओषधियाँ भी हैं, नन्ततिः । जो क्षतसे संरक्षण करती हैं, कुत्ता आदि भी अपनी जीभ से २३ ) ' न चाटकर क्षतसे रक्षा कर दिया करते हैं; पर यह सब क्षत्त्र कहे डालोपि जा सकते हुए भी मुख्य- क्षत्रियवर्णंमें नहीं माने जाते । इस मर्त्याः प्रकार ' चाण्डालोपि व्रतस्थश्चेद् ब्राह्मणः स युधिष्ठिर!, न स कल्याण- शुद्रो भवेत् शूद्रः, ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ' इत्यादि पद्योंकी व्यबस्था का भी भी जान लेनी चाहिये । ' न जातिदृश्यते तावद गुणाः नवतन कल्याणकारकाः ' यह श्लोक हमारे भी विरुद्ध नहीं । हम भी ना वचन मानते हैं कि- गुण पुरुषोंके रमीर की हिष्ठोषि करते हैं, पर वे स्वरूप नहीं दिमें भी स्वरूप तो वस्तुका जाति ही भाष्य में हुआ करता है । यदि दीखती; तो इससे उसका यथा-कल्याणकारक, सम्मानदायक हुआ बनाते, केवल उत्कर्षापकर्ष करते हैं, बनाती है । जाति पदार्थका प्राणप्रद-वह जाति किसीके मुँह पर नहीं अभाव नहीं हो जाता । गाय में भी गोत्व जाति उसके माथे पर नहीं लिखी I । इससे गोत्वका अभाव ब्रह्मदत्त-ह ' कह नहीं हो जाता । हाँ, यदि वह दूध देती है, उसमें सौम्यता, ता है । स्निग्धता आदि हैं; तो वह अच्छी गाय है । यदि उसमें यह -व्य- गुण नहीं हैं - वह कठोर है, सींग मारती है, दूध नहीं देती; तब वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहरि [ ५६ वह पत्थरकी शिला नहीं बन जाती । साधारण गाय ही कही जाती है । इस प्रकार यदि कोई ज्ञानी - शूद्र कहीं ब्राह्मण कहा गया हो; वहाँ ' ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणः स्मृतः ' ' ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: ' इस प्रकार वहाँ लाक्षणिक ही ' ब्राह्मण ' शब्द है, जाति - शब्द नहीं; वह वास्तविक नहीं; क्योंकि - ' ब्राह्मोऽजातो ' ( पा. ६ | ४ | १७१ ) इसके अनुसार वह शूद्र ब्राह्मणकी सन्तान ब्राह्मणत्वके न होने से वास्तविक ब्राह्मण नहीं हो सकता । तब वर्णो व्यवस्था जन्मसे ही सिद्ध हुई । ( १७ ) पूर्वपक्ष - ' वैश्य - कमे च यो विप्रो लोभमोहव्यपाश्रयः । ब्राह्मण्यं दुर्लभं प्राप्य करोत्यल्पमतिः सदा । स द्विजो वैश्यतामेति वैश्यो वा शूद्रतामियात् । स्वधर्मात् प्रच्युतो विप्रस्ततः शूद्रत्व-माप्नुयात् ' २२३।१६-१७ ) इस ब्रह्मपुराणके वचनसे कर्मणा वर-व्यवस्था सिद्ध होती है । उत्तरपक्ष - प्रतिपक्षी इससे पूर्वका पद्य छोड़ देते हैं; जिससे अर्थंका अनर्थ हो जाता है । वह यह हैं- ' यश्च विप्रत्वमुत्सृज्य क्षत्रधर्मान्निषेवते । ब्राह्मण्यात् स परिभ्रष्टः क्षत्रयोनौ प्रजायते ' ( २२३।१५ ) । इसमें जन्मान्तरकी गतिका प्रकरण है कि कौन-कौन व किस - किस कमेसे अग्रिम - जन्म में किस - किस योनि में प्राप्त होता है । तब उक्त - पद्य में योनिमें जन्म कहनेसे स्पष्ट रूपसे अन्य जन्ममें वर्णका परिवर्तन स्वीकृत किया गया है, इस जन्ममें नहीं; क्योंकि-योनिमें जन्म अवके कर्मसे नहीं हो सकता । इससे यहाँ जन्मसे ही वर्ण - व्यवस्था सिद्ध होती है । इसी कारण ही उक्त CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 194

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३६० ] श्रीसनातन धर्मा लोक ( ८ ) वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार ३६२ पुराण में उक्त अध्यायमें ही ' ब्राह्मण्यं देवि! दुष्प्रापं निसर्गाद् ब्राह्मणः शुभः । क्षत्रियो वैश्य शूद्रौ च निसर्गादिति मे मतिः ' ( २२३।१२ ) यहाँ स्वभावतः जन्मसे ही वर्ण माने गये हैं, गुण-कर्मसे नहीं । इससे प्रतिपक्षीका पक्ष खण्डित होगया । ( १८ ) पूर्व - वीतहव्य क्षत्रिय महाभारत ( अनुशा. ३० | ५३ ) मैं ब्राह्मण होगया हुआ माना गया है; तब वर्ण - व्यवस्था गुण-कर्मसे ही सिद्ध हुई । उत्तर — उस स्थलमें गुणकर्मका तो गन्धमात्र भी नहीं; किन्तु भृगुऋषिका वचनमात्र वहाँ कारण बताया गया है । जब राजा प्रतर्दन वीतहव्य - क्षत्रियको मारने आया; तब वह भय से ब्राह्मण-समाज में घुस गया । ब्राह्मणोंने भी ' शूद्र - विट् - क्षत्र- विप्राणां यत्रर्तोक्तौ भवेद् वघः । तत्र वक्तव्यमनृतं तद्धि सत्याद् विशिष्यते ' ( ८ | १०४ ) ( जहाँ सच कह देने में ब्राह्मण, क्षत्रिय आदिका वध हो जाय; वहाँ सत्य ही कह देना चाहिये, वह असत्य उस समय सत्य से भी बढ़कर हुआ करता है ) मनुजीके इस वचनके अनुसार ' नेहास्ति क्षत्रियः कश्चित् सर्वे हीमे द्विजातयः ' ( महा. अनु. ३०/५३ ) ( यहाँ कोई क्षत्रिय नहीं है, सभी ब्राह्मण हैं ) यह असत्य बोलना ही ठीक माना गया । भृगु ऋषिने प्रतर्दन के आगे उसकी क्षत्रियता छिपाकर उसे भी अन्योंकी भांति ब्राह्मण कह दिया । यहाँ गुणकर्मका गन्ध भी नहीं; किन्तु वचनमात्रसे ही वह ब्राह्मण बन गया — ‘ भृगोर्वचनमात्रेण स च ब्रह्मर्षितां गतः । वीत-हव्यो महाराज! ब्रह्मवादित्वमेव च ' ( अनु. ३० | ५७ ) । क्या CC - 0. Ankur Joshi Collection कहने मात्र से ही प्रतिपक्षी ब्राह्मणता मान लेंगे? यदि तो उन्हें जन्मसिद्ध - वर्ण - व्यवस्था में भी सन्देह ऐसा है है-चाहिये, क्योंकि वहाँ भी ' सकृदाख्यातनियोंह्या ' नहीं कार दौर्बल इस वादिशः वादिमान्य वररुचि एवं पतञ्जलिके कथनसे ब्राह्मणोंकि देखी मुखोत्पत्ति के कारण ब्राह्मण कहे जाने मात्र से ही उनके पूर्वपुरुष भी व वंशपरम्पराको भी उत्पत्तिमूलक ब्राह्मण माना गया । पीछे तेषां इस प्रचा जन्मसे ही वर्ण - व्यवस्था सिद्ध हुई । इस कथासे प्रतिपक्षियों जैसा गुणकर्मणा वर्ण - व्यवस्था अपना सिद्धान्त भी छोड़ देना चाहिए क्योंकि - वीतहव्यके गुणकर्म तो क्षत्रियोंके थे, ब्राह्मणके नहीं । तब यह अपवाद सिद्ध हुआ । अपवाद से सिद्धान्त नहीं है ब्रह्मण जाया करता । इसस इस रीति से अन्य पुराण - इतिहासके पद्योंकी व्यवस्था में होने स्वयं जान लेनी चाहिये । उसमें यह भूलना नहीं चाहिये कि ' द्वयोर्द्वधे स्मृतिवँरा ' ( व्यासस्मृति १४ ) ( स्मृति और पुराणों I विरोध में स्मृति की बात माननीय होती है । ) ' लोकवृत्तमितिहाङ व्यवस पुराणस्य लोकव्यवहार - व्यवस्थापनं [ प्राधान्येन ] धर्मशास्त्र इस प विषयः । तत्रैकेन न सर्वं व्यवस्थाप्यते इति यथाविषयम् [ हुआ स्वविषये ] एतानि [ पुराणेतिहास - धर्मशास्त्राणि ] प्रमाणारि नहीं च इन्द्रियादिवत ' ( ४ | १ | ६२ ) इस न्यायदर्शनके प्रमाणसे पुरा वहाँ इतिहास प्रधानता से लोकवृत्तके बतानेवाले हैं; पर लोकव्यवहार चाहि की व्यवस्था धर्मशास्त्रके अधीन मानी गई है । इतिहास में हो नहीं धर्मशास्त्रोंसे विरुद्ध आचरण भी कभी देखे जाते हैं; पर रे Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 195

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ३६२ ] योग्य नहीं होते । इसलिए गौतमधर्मसूत्र के आरम्भ में कहा दि ऐसा है ' दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः, साहसं च महताम्, न तु दृष्टोर्थो वरो नहीं कर है- ' ( १ | १-२ ) अर्थात् इतिहासमें बड़ोंकी धर्मविरुद्धता भी दौर्बल्यात् इस वाद देखी जाती है, बहू आचरणीय नहीं । आपस्तम्ब - धर्मसूत्रमें के पूर्वपुरते भी कहा है- ' दृष्टो धर्म व्यतिक्रमः साहसं च पूर्वेषाम् ( २।१३ ( ७ ) उनके पीछे तेषां तेजोविशेषेण प्रत्यवायो न विद्यते ' ( २/१३८ ) तदन्वीक्ष्य । इस प्रचा प्रयुञ्जानः सीदति अवरः ' ( २/१३ ६ ) इसका भी अर्थ पूर्व-प्रतिपक्षियों जैसा है । देना चाहिए ( १६ ) पूर्वे – ' न विशेषोस्ति वर्णानां सर्वं ब्राह्ममिदं जगत् । रण के नहीं । ब्रह्मणा निर्मितं तत्तु कर्मभिर्वर्णतां गतम् ( महा. शान्ति. १८८ १० ) त नहीं हो इससे कर्म॑से वर्णोंकी व्यवस्था सिद्ध होती है । वहीं सुफेद अङ्ग होनेसे ब्राह्मणता, लाल होनेसे क्षत्रियता, पीले होनेसे वैश्यता, व्यवस्था में काले होनेसे शुद्रता बताई गई है; सो हमारे ( वादीके ) पक्षकी चाहिये कि पुष्टि है । र पुरा उत्तर- इस विषय में कुछ तो ' आलोक ' के चतुर्थेपुष्पमें वर्ण-तमिविज्ञाय व्यवस्था के विषय में पाठक देखें । कुछ यहाँ भी लिखते हैं-धर्मशाल इस पद्यसे प्रतिपक्षियों की कुछ भी सिद्धि नहीं है । ब्रह्मासे बना विपयम् [ हुआ होने से यह जगत् शब्दसे ब्राह्म है - इसमें कुछ भी अनुपपत्ति प्रमाणात नहीं आती । तब ब्रह्माने उनमें कर्मसे वर्ण - व्यवस्था की । कर्म से पुरा वहाँ सृष्टि के अनादि कालारव्ध होनेसे पिछले जन्म के सम कव्यवहार चाहियें; क्योंकि - सृष्टिके समय में उनका ऐहिक कर्म कोई भी तिहास में नहीं था । तब इससे प्रतिपक्षियोंकी इष्टसिद्धि कुछ भी नहीं । हैं; पर CC - 0. Ankur Joshi वर्गव्यवस्थागत भ्रान्ति परिहार [ ३६३ सो यहाँ पूर्वजन्मके कर्म ही विवक्षित है; क्योंकि वे ही इस जन्ममें मूल होते हैं । उन्हीं के अनुसार उस वर्णवाले पिताके घर में उसके वैसे शुक्र के द्वारा जन्म प्राप्त होता है । इसलिए वह भी उसी वर्णं वाला हुआ करता है । जोकि महाभारतमें वर्दी वर्णोंकि सुफेद, लाल, पीला, काला वर्ण दिखलाकर वर्णों का परिवर्तन दिखलाया जाता है, उसमें यह जानना चाहिये कि - जैसे कि - साङ्ख्य तत्त्वकौमुदीके ' अजामेकां लोहित शुक्लकृष्णां ' इस मङ्गलाचरणमें प्रकृतिके तीन रंग शुक्ल, लोहित, दिखलाये गये हैं; जो अर्थ वहां है, वही यहां भी हैं । यो सुफेदसे प्रकृतिका सत्त्वगुण, लालसे रजोगुण, कालेसे तमोगुण इष्ट है । ब्राह्मणमें भी शुक्लवर्णसे सत्त्वगुण इष्ट है, क्षत्रिय में लाल रंगसे रजोगुण इष्ट है । वैश्यमें रक्त ( रजोगुण ) तथा कृष्ण ( तमोगुण ) वर्णके मिलने से पीलापन दिखलाया गया है । शुद्रमें कृष्ण - वर्ण से तमोगुण विवक्षित है । जैसे कि - महाभारत में - ' कामभोगेप्रिया-स्तीक्ष्णाः क्रोधनाः प्रियसाहसाः । त्यक्त - स्वधर्मा रक्ताङ्गास्ते द्विजाः क्षत्रतां गताः ' ( १८८ | ११ ) इसका यह भाव है कि - ब्रह्माने पहले ब्राह्मण सृष्टि की । वे ही ब्राह्मण जब अपने धर्मको छोड़कर कामभोग आदिमें लग गये; तीक्ष्ण, साहसी एवं रजोगुणावलम्बी हो गये; वे दूसरे जन्म में क्षत्रिय हो गये । ' गोभ्यो वृत्तिं समास्थाय पीताः कृष्युपजीविनः । स्वधर्मान् नानुतिष्ठन्ति ते द्विजा वैश्यतां गताः ' ( १२ ) हिंसानृतप्रिया लुब्धाः सर्वकर्मोपजीविनः । कृष्णाः शौच परिभ्रष्टाः, ते द्विजाः शुद्धतां Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 196

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३६४ ] श्रीसनातनधर्मा लोक ( ८ ) गताः ' ( १३ ) इत्येतैः कर्मभिर्व्यस्ता द्विजा वर्णान्तरं गताः ' ( १४ ) अर्थात् पूर्वं सृष्टिवाले ब्राह्मण जब अपने धर्मको छोड़कर गौओंकी वृत्ति धारण करके खेतीका उपजीवन करते लगे; वें अन्य जन्ममें वैश्य बने, और जिन आदिम ब्राह्मणोंने शौच छोड़ दिया, हिंसा और असत्य उनके प्रिय हो गये; वे अन्य जन्म में शुद्र हो गये । इस प्रकरणका वादीके अनुसार ही यह अर्थ किया जावे कि - ब्रह्माने एक प्रकारकी ही सृष्टि अर्थात् ब्राह्मण सृष्टि कीं; उनमें ब्राह्मण तो प्रतिपक्षियोंके अनुसार भी ब्रह्मासे सृष्ट होने से ब्राह्मण हुए । तब ब्राह्मणवणें तो जन्ममूलक बना । तब वे ही ब्राह्मण अपना नियत कर्म छोड़कर कर्मकी विचित्रता से अन्य जन्म में क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बने । कर्मोंका फल अप्रिम जन्ममें मिला करता है - यह हम अन्यत्र निर्णीत कर चुके हैं । वायुमें आकाशका गुण शब्द भी है; पर इससे आकाश और वायु एक नहीं हो जाते । जैसे - आकाशसे वायु और वायुसे अग्नि और अग्निसे जल और जलसे पृथिवी हुई, वैसे सब वर्णोंसे प्रधान होनेसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए । ब्राह्मणोंसे ही क्षत्रिय और क्षत्रियोंसे वैश्य और वैश्योंसे शुद्र हुए । इसके अतिरिक्त श्वेत अङ्गवालोंकी रक्ताङ्गता, पीताङ्गता और कृष्णाङ्गता इस जन्ममें कैसे हो सकती है? तब यहां जन्मान्तरमें ही यह परिवर्तन मानना पड़ेगा । अथवा उक्त रीति से इन वर्णोंसे सत्त्वगुण आदि माननेपर भी स्वभावके न नष्ट होनेवाला होने से CC - 0. Ankur Joshi Collection वव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार ३६६. इस जन्म के समाप्त होनेपर दूसरे जन्ममें ही स्वभावका तथा जन्मूलक - वर्णका परिवर्तन होता है । तब हमारा परि वर्णव्य सिद्ध हुआ, क्योंकि उक्त - श्लोकों में इस जन्ममें है । उ क्षत्रियादिकता नहीं कही गई । ही रु का है; इसके अतिरिक्त ' आदिदेवसमुद्भूता ब्रह्ममूलाऽक्षयाऽन्यः माननं सा सृष्टिर्मानसी नाम धर्मतन्त्रपरायणा ' ( १८८ श्रधीन | २० ) बद्द वात्स्य अध्यायके अन्तिम - पद्यद्वारा उसे मानसिक - सृष्टि कहा गया ॥ शास्त्र मानस - सृष्टिमें मैथुनसृष्टि - सीमित मर्यादा भी नहीं । व्यवस् क्योंकि — वहां उत्पत्तिमूलक वरणें नहीं होता; उसमें परिस भी च होनेपर भी हमारे पक्षकी कोई हानि नहीं होती । है; इस ' अक्षया अव्यया, धर्मतन्त्रपरायण ' यह ब्रह्माकी मानसिक सुपि याज्ञव विशेषण हैं; इससे हमारे ही पक्ष अन्य- जन्ममें वर्ण शास्त्रार वर्तनकी सिद्धि है; क्योंकि यदि वह सृष्टि उसी जन्म में धर्म है- ' प हीन हो गई और उसी जन्ममें उसमें वर्णोंपरिवर्तनरूप ( विकार ) और क्षय हो गया; तब वह सृष्टि अव हो है, जा अव्यय और अपना धर्म छोड़नेसे धर्मतन्त्र - परायण कैसे हूं! वर्ण के इस प्रकार पूर्वोत्तर - सामञ्जस्य से अन्य जन्ममें ही उक्त श्लो जन्म वर्णपरिवर्तन फलित हो रहा है । हैं । द ( २० ) पूर्वपक्ष - शुक्रनीति में कहा है- ' न जात्या ब्राह्मणक पर इस क्षत्रियो वैश्य एव च । न शुद्रो न च वै म्लेच्छो भेदि वही कर्मेभिः ' ( १ | ३८ ) ब्राह्मणास्तु समुत्पन्नाः सर्वे ते किं नु ब्राह्मणः न वर्णंतो न जनकाद् ब्राह्मं तेजः प्रपद्यते ' ( १।३६ ) इन श्लो Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 197

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 197 का मूल पृष्ठ
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श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) ३६६ 1 सिद्ध होती है, जन्मसे नहीं । नावका परि व्यवस्था गुणकर्मसे यह वचन धर्मशास्त्रका नहीं है, किन्तु अर्थशास्त्र-हमारा ही उत्तरपक्ष- अर्थशास्त्रका वचन धर्मशास्त्रसे विरुद्ध हो तो नही है; अतः यदि माननीय नहीं होता नाऽक्षयाच्य अधीन हुआ करती २० ) ह वात्स्यायनभाष्य में विषय: ' । कहा गया शास्त्रस्य नहीं है व्यवस्था करनेवाला । क्योंकि -लोक - व्यवहारकी व्यवस्था धर्मशास्त्र के है । जैसेकि न्यायदर्शनके ४ । १/६२ सूत्रके कहा है – ' लोकव्यवहार व्यवस्थापनं धर्म-इससे धर्मशास्त्र ( स्मृति ) ही लोकव्यवहारकी माना जाता है । नीति तो कभी धर्मविरुद्ध उसमें परिव भी चल पड़ती है, नीतिमें धर्माऽधर्मका विचार बहुत कम होता होती । है; इसलिए वह धर्मशास्त्र के मुकाबिले में माननीय नहीं । इसीलिए सिद्धि याज्ञवल्क्यस्मृति में कहा है – अर्थ ( नीति ) शास्त्रात तुं बलवद् घर्मं-ममें वर्ण शास्त्रमिति स्थितिः ' ( व्यवहाराध्याय २१ ) । मनुस्मृति में भी कहा = ममें धर्मन है- ' परित्यजेद् अर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ ' ( ४ । १७६ ) । वर्तनरूप बस्तुतः उक्त नीतिवचन कमँकी प्रशंसार्थवादका परिचायक - अक्षय है, जातिवादका खण्डक नहीं । शास्त्र अथवा हम अपने - अपने कैसे वर्ण के कर्मके निषेधक नहीं । तथापि पहले ब्राह्मण आदि वर्ण उक्त श्लो जन्म से होते हैं; पीछे उनके भिन्न - भिन्न कर्म नियत किये जाते हैं । देवदत्तको छः गणित के प्रश्न हल करनेकेलिए दिये गये; ब्राह्मणश्क पर इसका यह आशय नहीं कि जो उन छः प्रश्नोंको सिद्ध करे; भेदिता गुरु वही देवदत्त हो जाय । देवदत्त यदि उन्हें हल न करे; तो वह देवदत्त ही न रहे यह नहीं हुआ करता; किन्तु देवदत्त उन इन श्लोकों प्रश्नको हल न करनेसे निन्दित माना जाता है; पर कहा देवदत्त वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार [ ३६७ ही जाता है, अन्य नहीं । यदि हल कर ले; तब भी देवदत्त ही कहा जाता है; हां, वह अच्छा देवदत्त कहा जाता है । बसोंमें लेडीकी नियत सीट पर पुरुष जा बैठे; तो वह स्त्री ( लेडी ) नहीं हो जाता, और स्त्री लेडीसे भिन्न सीट पर जा बैठे; तो बद्द स्त्रीसे भिन्न नहीं हो जाती । इस प्रकार प्रकृतमें भी समझ लें । वास्तव में शुक्रनीतिके उक्त वचन में ऐहिक जन्मके गुणकर्म इष्ट नहीं है; किन्तु पूर्वजन्मके; इससे सनातनधर्म के पक्ष की हानि नहीं; किन्तु पुष्टि ही है । ' न जात्या ब्राह्मणश्चा ' इस पद्यका तात्पर्य यह है कि — बिना ही कारण ब्राह्मण आदि नहीं होता, किन्तु ब्राह्मण - आदियोंकी भिन्नता के मूलकारण पूर्वजन्म तथा इस जन्मके गुणकर्म ही होते हैं । इसीलिए ही इससे पूर्वके श्लोक में शुक्रनीति में कहा है- ' कर्मैव कारणं चात्र सुगतिं दुर्गतिं प्रति । कर्मैब प्राक्तनमपि ' ( १।३७ ) यहां पूर्वजन्मोंके कर्मोंको भी कारण माना है । इसी प्रकार ' प्राक् ( पूर्व ) कर्मफलभोगार्दा बुद्धिः सञ्जायते नृणाम् । पापकर्माणि पुण्यं वा कर्तुं शक्तो न चान्य-था ( १।४५ ) बुद्धिरुत्पद्यते तादृग् यादृक् कर्मफलोदयः । सहाया-स्वादृशा एव यादृशी भवितव्यता ' ( १ | ४६ ) " प्राक् कर्मवशतः सर्वे भवत्यैवेति निश्चितम् । तदोपदेशा व्यर्थाः स्युः कार्याकार्यप्रबोधकाः ' ( १।४७ ) । यहाँपर सभी - कुछ पूर्वजन्म के कर्मोंके कारण बताया गया है । तब शुक्रनीतिको भी पूर्वजन्म के कर्मानुसार व-व्यवस्था इष्ट है— यह सिद्ध हुआ । इसलिए वहां स्पष्ट कहा है— ' फलोपलब्धिः प्रत्यक्षहेतुना नैव दृश्यते । प्राक्कर्महेतुको सा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) तु, नान्यथैवेति निश्चयः ' ( १५१ ) देवे पुरुषकारे च खलु सर्वं प्रतिष्ठितम् । पूर्वजन्मकृतं कर्मेहार्जितं तद् द्विधा कृतम् ' ( १ । ४६ ) हम भी ऐहिक - जन्म के कर्मोंको अकर्तव्य नहीं मानते; तब शुक्रनीति के वचनसे हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । शुक्रनीति भी अपने जातिके नियत कर्मोंका आचरण कहती है- ' स्व-जात्युक्तषर्मो यः पूर्वैराचरितः सदा । तमाचरेच्च सा जातिर्दण्ड्या स्याद् अन्यथा नृपैः ' ( ४ | ३७६ ) जातिवर्णाश्रमान् सर्वान् पृथक चिह्न: सुलक्षयेत् ' ( ४ । ३७७ ) । ( २१ ) पूर्वपक्ष-- मनुस्मृति में मनुद्वारा सृष्टि निरूपित की गई है; तब एकसे चार वर्ण कैसे होवें? अतः यहां गुणकर्मसे ही व्यवस्था सिद्ध है । उत्तरपक्ष - ऐसा नहीं । उसमें सृष्टिका प्रारम्भ इस प्रकार कहा है- ' लोकानां तु विवृद्धयर्थं मुखबाहूरुपादतः । ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत् ' ( १।३१ ) यहां ब्रह्मा के मुख - बाहु-ऊरु - पांव इन अङ्गों द्वारा चार वर्णोंकी सृष्टि कही है । उसमें यह कारण है कि जब महाप्रलय होता है, तब सृष्टि परमात्मा में प्रविष्ट होती है । तब सृष्टिकी उत्पत्तिके समय में अपने पूर्वजन्म-कर्मके अनुकूल ब्रह्मारूप परमात्मा के उन - उन अङ्गोंसे उन - उन वर्णों की उत्पत्ति होती है । इसलिए ' सिद्धान्त शिरोमणि ' के गोलाध्याय भुवनकोशनिरूपणमें प्रलय के वर्णन के समय में कहा है-' ब्राह्मे लये ब्रह्म - दिनान्तकाले भूतानि यद् ब्रह्मतनुं विशन्ति ' CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार [ ( ६३ ) उसमें इसके प्रणेता श्री भास्कराचार्येने स्वयं ही किया है - ' तत्र [ ब्राह्मलये ] अक्षीणपुण्यपापा एव यह भाष वशेन ब्रह्मशरीरं प्रविशन्ति । तत्र मुखं ब्राह्मणाः बाह्नन्तरं लोकाः कार , क्षत्रियाः द्वयं वैश्याः पादद्वयं शूद्राः [ प्रविशन्ति ] । ततो निशावसाने । : सृष्टिं चिन्तयतो मुखादिस्थानेभ्यः कर्मेपुटान्तरत्वाद् । ब्राह्मणादयस्तत एव निस्सरन्ति ' । इस प्रकार पूर्वजन्मके कर्मोंसे मुख आदि स्थानों द्वारा उत्पत्ति होनेसे वर्णव्यवस्था जन्मसे ही सिद्ध होती है । व मनुस्मृतिके अनुसार ( ११३२ ) ब्रह्माने अपने देहके दो माग किये; तब विराट्की उत्पत्ति हुई । तब विराट्ने मनुको किया । ( १ । ३३ ), और मनुने दस प्रजापति उत्पन्न किये ( १।३४-३५ ) । मनु भी प्रजापति थे, परमात्मावतार थे, जैसाकि मनुस्मृति में कहा है – ' एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ' ( १२ । १२३ ) । तब दुख प्रजापतियोंने देवसृष्टि तथा ऋषि- सृष्टि की ( १३६ ), और यक्ष आदियोंकी सृष्टि की ( ३७ ) । तच पशु - पक्षी तथा मनुष्यों की सृष्टि की ( १।३६ ) । चार वर्णं तो पहले हो चुके थे; तब यहाँ मनुष्य उनसे अतिरिक्त प्रवर्ग इष्ट हैं । ११३६ पद्यमें कीट आदिकी सृष्टि कही है । इसके लिए मनुस्मृति में कहा है- तर ' एवमेतैरिदं सर्वं मन्नियोगान्महात्मभिः । यथाकर्म तपोयोगात् ज सृष्टं स्थावर - जङ्गमम् ' ( १ | ४१ ) यहाँपर ' यथाकर्म सृष्टम् ' यह पा शब्द स्पष्ट ही पूर्वजन्मके कर्मोंकी कारणता बताता है, क्योंकि- व सृष्टिके समय उनके अबके कर्म कैसे हो सकते हैं? इसीलिए इस Gujarat. An eGalinative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ३७० ] as कर्म कहे हैं; फिर सृष्टि I । कर्म स्पष्ट पूर्वजन्म के ही हैं; यह भाष तभी मनुष्य - पशु आदिकी सृष्टि बताई गई है । फलतः इससे लोकाः काढ बादियोंकी इष्ट - सिद्धि कुछ भी नहीं । रं क्षत्रियाः निशावसाने ( २२ ) पूर्वपक्ष-- यदि ब्राह्मणादि - जातिका परिवर्तन इस जन्ममें नहीं होता; तब जो ब्राह्मण ईसाई या मुसलमान हो दान्तरत्वाद् जाता है; आप उसे ब्राह्मण क्यों नहीं मानते, वा उससे व्यवहार स्थानों क्यों नहीं करते? । द्वारा है । उत्तरपक्ष - ईसाई या मुसलमान यह उन - उन सम्प्रदायको दो स्वीकार कर लेनेवाले पुरुषका नाम है, जैसे आर्यसमाजी । को भाग पैदा उस सम्प्रदाय के स्वीकार कर लेनेसे वह उस नामसे कहा जाता उत्पन्न किये है । पर ब्राह्मण - आदि वर्णं तो उसका नहीं बदलता, शेष प्रश्न जैसा कि है कि उससे व्यवहार न करनेका; इसपर जानना चाहिये कि-प्रजापतिम् ' जैसे विष्ठा आदिसे दूषित घट घटत्व - नामसे रहित नहीं होता; सृष्टि की । किन्तु अव्यवहार्यं ही होता है, वैसे ईसाई होगये हुए ब्राह्मणका - पशु - पक्षी ब्राह्मणत्व भी नष्ट नहीं होता; केवल वह व्यवहारार्हं नहीं ले हो चुके होता । ब्राह्मणी जब रजस्वला होती है; तब वह अस्पृश्य अथवा २। ३६ पामें अव्यवहार्य होती है; पर इससे उसका वर्ण नहीं बदल जाता । कहा है- भी वह ब्राह्मण वैध प्रायश्चित्त करनेपर फिर उसी अपनी तपोयोगा जाति में व्यवहायें हो जाता है । जिस ब्राह्मण के घर में सूतक-सृष्टम् वह पातक आदि अशौच होता है, वह ब्राह्मण अस्पृश्य वा अव्य-क्योंकि- बहायें होता है, पर उसका वर्णपरिवर्तन उससे नहीं हो जाता । इसीलिए इस प्रकार उसकी गुणकर्मोंसे उत्कृष्टता - निकृष्टता तो होती है; CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार [ ३७१ पर इस जन्ममें उसका वर्णपरिवर्तन नहीं होता । ब्राह्मण - शब्द उत्तमताका पर्यायवाचक नहीं होता; और शूद्र - शब्द नीचताका पर्यायवाचक नहीं होता । शूद्र भी उत्तम और ब्राह्मण भी नीच हो सकता है । नीच होनेपर भी ब्राह्मण, ब्राह्मण ही रहता है, शुद्र उत्तम होनेपर भी शुद्र ही रहता है । गाय विष्टा खानेसे गाय ही रहती है, सूकरी उत्तम पदार्थ खानेसे भी गाय नहीं होती! ( २३ ) पूर्वेपक्ष - ' वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ' इत्यादि वचनोंसे ब्राह्मणोंने उत्तम अधिकार अपनेलिए रख दिया । यदि कोई निम्न वर्णं उत्तम गुणकर्मों को करे; फिर भी वह निम्न ही कहा जाता है । यदि ब्राह्मण नीच कर्म भी करे; फिर भी उसे उत्तम माना जाता है; क्या यह पक्षपात नहीं? उत्तरपक्ष — शास्त्र दूसरेके कर्म करना निषिद्ध करता है । उत्तम - अधमता, नीच - उच्चता पृथक् वस्तु है, ब्राह्मणत्वादि पृथक् वस्तु है । ब्राह्मण के साथ भी नीच यह विशेषण जोड़ा जा सकता है । शुद्रके साथ भी उत्तम विशेषण जोड़ा जा सकता है; पर वर्णव्यवस्था में परिवर्तन नहीं होता । जिन ब्राह्मणोंपर प्रतिपक्षी उक्त दोष लगाते हैं कि उन्होंने ऐसे शास्त्र - वचन बना डाले हैं; पर उन प्रतिपक्षियोंको याद रखना चाहिये कि उन्हीं ब्राह्मणोंने संसारके राज्यका अधिकार क्षत्रियोंको, और संसारका धनकोप वैश्यों को सौंप दिया, और अपने लिए कौपीनादि धारण करना तथा तपोधन वा त्यागी बनना, शास्त्रोंके अनुसन्धान में रहकर अपने शरीरको भी दुर्बल कर देना, और वैराग्य तथा अन्तमें संन्यासका Gujarat. An eGangotri Initiative

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३७२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) अधिकार भी अपने लिए रख दिया । यदि यहाँ श्रब्राह्मणमण्डली पक्षपात समझती है; तब इस विषय में परिवर्तन कर देना चाहिये । अपना सारा राज्य और सारा धन प्रतिपक्षी क्षत्रिय-वैश्य, ब्राह्मणोंको दे दें; स्वयं वे विरक्त, कौपीनधारी तपस्वी एवं संन्यासी बन जावें, तब अपने - आप उनसे उपक्षिप्त पक्षपातका प्रश्न दूर हट जावेगा । वस्तुतः निम्न भी ब्राह्मणका जो सम्मान किया जाता है, और उत्तम भी शुद्रका वैसा सम्मान नहीं किया जाता; उसमें कारण हमारी आस्तिकता है, पूर्वजन्म और पुनर्जन्म में हमारा विश्वास है । हम वैसे ब्राह्मण तथा वैसे शूद्रके पूर्वजन्मके सुकर्म-का सम्मान और दुष्कर्मका अपमान करते हैं । वर्तमान - कर्मोंका फल तो वे पुनर्जन्म में वर्णपरिवर्तन हो जानेपर स्वयं ही प्राप्त कर लेंगे । हम परोक्षवाद माननेवाले आस्तिक हैं, परन्तु प्रतिपक्षी तो प्रत्यक्षमात्र माननेवाले नास्तिक ही हैं, जो नाममात्रसे पूर्वजन्म और पुनर्जन्म मानते हैं, वास्तवमें नहीं । ( २४ ) पूर्वपक्ष- - जब मनुष्य जातिमें सदा सर्वत्र व्यभिचारंकी सम्भावना है; तो बताया जावे कि जो पुरुष जिसको अपना पिता कहता है, वह पुरुष उसी पिताके वीर्यसे उत्पन्न हुआ है, इसको वह किस प्रमाणसे प्रमाणित करेगा? यदि कोई यह कहे कि उसकी माताका कहा प्रमाण हो सकता है, जो वीर्य -दाताकी सांक्षिणी: हैं, पर माताका कहा भी सन्देहास्पद हो सकता है । सम्भव है वह किसी परपुरुषसे गर्भवती हुई हो; वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार [ ३७ | और उसे अपने पति के नामसे ही प्रसिद्ध करती चली हो । शास्त्रों में वर्णित जितने भी प्रतिबन्ध हैं; वे आ रही दुराचारको मनुष्यों में ज्यादा से ज्यादा रोकने के लिए हैं, वे व्यभिचारखी सम्भावनाको न्यून तो कर सकते हैं, उसका अत्यन्ताभाव सकते । इससे वीर्यके आधारपर मानी हुई जन्मगत नहीं कर व्यवस्थाका सिद्धान्त भी वालूपर भित्तिके समान है । वर्ण. ( श्रीरामचन्द्र - देहलवी, आर्यसमाजोपदेशक ) उत्तरपक्ष – व्यभिचारकी सम्भावनाके उन्मूलनार्थं इमारे प्राचीन - ऋषि - मुनियोंने जो उपाय बताये थे, उनके अनुसरण से वैसी सम्भावना नहीं रहती; उन उपायोंको सनातनधर्म मानता है, और उनका अनुसरण करता है; अतः उसमें वैसी सम्भावना नहीं हो सकती; पर जो आजकलके अर्वाचीन सम्प्रदाय - उनसे विरुद्ध कामज - नियोग, विधवा - विवाह के लिए प्रोत्साइन, २४ वर्ष-की ऋतुमती लड़कीका विवाह, स्त्री - स्वातन्त्र्य, महिलाओंकी आवरण - प्रथाका त्याग, स्त्रियोंको पुरुष समाज के साथ आन्दोलन आदिकेलिए भेजना, युवक - पुरुषों द्वारा स्त्रियोंको पढ़ाना आदि सनातनधर्म - विरुद्ध सिद्धान्त माननेवाले तथा उसका अनुसरण करने वाले हैं, इस लोकसे भिन्न स्वर्ग - नरकादि लोकोंको मानने-वाले नहीं हैं; उन्हीं में उक्त सम्भावना शत - प्रतिशत हो सकती है । उसमें अन्य भी एक कारण है - ' या दुर्हार्दा युवतयः ' ( To १४/२/२६ ) इस मन्त्रका स्वा. द. जीने संस्कारविधि ( पृ. १७८ ) में यह अर्थ किया है - ' जो दुष्ट हृदयवाली अर्थात् दुष्टात्मा स्त्रियाँ हों; जो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative