सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 211–220

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 211–220

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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ३६४ यह निकलें; ऐसी दशा में राजसभा वा विद्यासभा न्यून - वर्णवाले सकता घट पुत्रोंके माता - पिता केलिए क्या प्रबन्ध करेगी? अथवा क्या सभा स्थायिकोष में न्यूनाधिकता के समीकरणकेलिए अनाथ ४७ ) ६६ ऋ. लड़के - लड़कियों को भी रखेगी? भिन्न - भिन्न देशके बालक क्या ७/१४३ भिन्न - भिन्न देशमें बांटे जावेंगे, या अपने - अपने देश में? यदि पुत्र बदर का परिव माता - पिताओं वाले पुत्र न्यूनतावश न मिलें; कीको अ तो क्या वे स्वीकार करेंगे कि उनके बालक तो अन्य माता-उसे बु पिताओं को दिये जाएँ; पर वे स्वयं निस्सन्तान रहें । ऐसी दशा में व्यवस्था उनकी इस अवस्था में सेवा तथा भोजन आदिका प्रबन्ध होकर मिट्ट कौन करेगा? III I इस प्रकार यदि किसी वर्णकी लड़कियाँ भी किसी खाल या पहा कम निकलें; और दूसरे वर्णकी अधिक निकलें; उनके विषयमें होगा- भी यही प्रश्न उपस्थित होंगे, जो पहले बालकोंके विषयमें किये व्यक्ति अ गये हैं । और फिर कोई कन्या २४ साल तक विद्या पढ़े, और नहीं क ब्राह्मणी हो जावे; और उसका पिता वैश्य सिद्ध हो जावे; तब क्याि उस युवतिको अन्य गुण - कर्मसे ब्राह्मण बने हुए को दे देना पड़ेगा । तब क्या उसका विवाह भी वही करायेगा? इससे उसे समाजव क्या लाभ होगा? और वही उस कन्या पर अनुरक्त हो जावे, यकी सूई वा उसका पुत्र; यह भी हो सकता है; क्योंकि वह लड़की उनके अङ्ग अङ्गसे तो पैदा हुई हुई नहीं; तब उसका उत्तरदायी कौन गुरुकुल होगा? । कम संख स्वा.द. के सिद्धान्तानुसार गुरुकुलसे आनेपर इन लड़का-CC - 0. Ankur Joshi क्या गुणकर्मानुसार वर्ण - व्यवस्था चल सकती है? [ ३६५ लड़कियों का विवाह होना चाहिये । यदि लड़कियाँ किसी वकी अधिक तथा किसी बकी न्यून निकल पड़ें, तो ऐसी दशा में बहुत लड़का - लड़कियोंको अपने वर्णानुकूल पति - पत्नी प्राप्त न होनेसे कांरा रहना पड़ेगा । कामदेव प्रवल हुआ करता है; तव गुरुकुल से लौटने पर यदि ब्रह्मचर्य का पालन न हो सके; तब उन्हें क्या करना चाहिये? स्वाद के अनुसार उनका नियोग भी नहीं हो सकता; क्योंकि वे विधवा - विधुर नहीं । स्वामीने कुमार - कुमारियोंका नियोग नहीं माना । तब वे क्या करें - यह दयानन्दियोंको कहना पड़ेगा । ( ३ ) तीसरी आपत्ति यह है कि गुणकर्मानुसार वर्ण व्यवस्था चालू करने पर स्त्रियोंको अपना पति भी बदलना पड़ेगा । जैसेकि - किसी गुणकर्मानुसार बने हुए ब्राह्मणने वैसी ब्राह्मण-कन्याके साथ विवाह किया; परन्तु दैवयोगसे यदि वह ब्राह्मण या वही ब्राह्मणी कर्मपरिवर्तनवश पतित होकर शूद्र वा वैश्य हो जाएँ; तब उन्हें क्या करना चाहिये? यदि वह ब्राह्मण या ब्राह्मणी पतित स्त्री वा पतित पुरुषको न छोड़ें; तो मनुके अनुसार यह प्रतिलोम - सम्बन्ध होगा । शुद्रसे प्रतिलोम - सम्बन्धसे वैश्या-में, क्षत्रियामें, तथा ब्राह्मणी में उत्पन्न सन्तानें क्रमशः आयोगव, क्षत्ता तथा चाण्डाल होंगी । चाण्डालोंका निवास नगरसे बाहर करना पड़ेगा और मनु ( १०/५१ ) के अनुसार अस्पृश्यता एवं व्यवहारभेद भी करना पड़ेगा । जिन घरोंमें ऐसी सन्तान होगी; उनकी कैसी दशा होगी - यह समझदार लोग समझ सकते हैं । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ऐसी दशा में स्त्रीको उस अपने पतिको छोड़ देना पड़ेगा । पतिको छोड़ देनेपर उसकी सन्तान पतिको पालनी पड़ेगी वा पत्नीको? योग्य - अवस्था हो जानेपर वह सन्तान किसकी होगी? पतिकी वा पत्नी की? वा सर्कार की? यदि पत्नी उस सन्तानको पाले; तो उस बालक के खान - पानका प्रबन्ध कौन करेगा? यदि वह सन्तान पतिको दी जावेगी, तब अब उस पत्नीको सन्तान पैदा करनी आवश्यक है वा नहीं? यदि आवश्यक है; तब सन्तान नियोगसे की जावेगी, या पुनर्विवाह के द्वारा? स्वा. द. जीके अनुसार उसका विवाह ही असम्भव है; क्योंकि — उनने सधवाविवाहकी आज्ञा कहीं नहीं दी । ऐसी दशा में केवल नियोग सम्भव है । नियोग भी किसी ऐसे ब्राह्मणके साथ होगा, जिसकी स्त्री शुद्र वा वैश्य होगई । यदि नियोगके बाद भी उसकी कामपिपासा शान्त न हो; तब ऐसी दशा में उसके लिए अन्य पति विहित होगा या नहीं । यदि पुनर्विवाहके बाद भी दैवयोगसे उसके उस पतिका वर्णं भी गुण - कर्मोंके परिवर्तनसे बदल जावे; तब ऐसी दशाकी उपस्थितिमें उसे अन्य पतिके विधानकी आज्ञा होगी या नहीं? इस प्रकार पति तथा पत्नियोंका परिवर्तन होता रहेगा । ऐसी दशा में सतीधर्म में जो आघात लगेगा, उसके स्मरणसे ही हृदय व्याकुल हो जाता है । जिस पतिव्रत धर्मके गौरव से भारतवर्षका गौरव हुआ और जहाँकी पवित्र हिन्दुजाति इस हीन - दीन दशामें भी समस्त संसार में ज्ञानकी गुरु होकर घोर - विप्लवको CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या गुणकर्मानुसार वर्णं व्यवस्था वल सकती है ] ! | ३६८ सहती हुई अपनी सत्ताको प्रतिष्ठापित करने में समर्थ चाहिये हिन्दुगौरवका सूर्य अस्त हो जानेसे पवित्र भारतको हुई, फिर गुए अज्ञानान्धकाररूप नरकमें परिणत कर देगा, जिसमें ( 8 ) दारिद्रय, तथा अविद्या आदि पिशाच पिशाचियाँ नाचा मनपर सतीधर्मपर प्रहार करनेसे जैसे अन्य जातियाँ विज्ञ पड़ेंगी ॥ काल के गाल में समा गई; वैसे पवित्र हिन्दु जातिकी हो जाए; भी धर्म के प्रहारस्वरूप वसी दशा उपस्थित होगी । गृहलाई पर भनु श्मशानं हो जायगा; घरकी लक्ष्मी अपने स्वरूपको छो होगी, पिशाची बनकर उस श्मशान में नाचेगी । शुद्ध - प्रेमकी: ' गीता ' म सूख जावेगी । मदन - दावानल भीषणरूपसे जलेगा: पतन्ति पतिके देहका हवन होगा । रिक्त प्राय यदि दैवयोग से नियुक्त पतिका वर्णं भी बदल जावे; 1 नष्ट हो ज स्त्रीका गर्भपात हो जावे; तब फिर कैसे किया जावेगा! जायन्ते पुनर्नियोग कर सकेगी; वा नहीं? यदि नहीं तो क्यों? ( १०/६१ ) प्रकार एक ही स्त्री बहुत पुरुषोंके आरोहणकी शकटी चाहिये कि जावेगी । यदि आर्यसमाजी ऐसी दशामें उत्तर दें कि चाहिये व . वो पहले अवस्था में न तो नियोग हो सकता है, न पुनर्विवाह: इस ब पर ब्रह्मचये ही उचित है ' इसपर प्रतिवक्तव्य यह है कि-आर्यसमाजियोंके कथनानुसार विधवाका पुनर्विवाह इस ( ५ ) इस सिद्ध उचित है कि उसके लिए ब्रह्मचर्य पालन कठिन है, और व्यभि क्योंकि म की सम्भावना भी होती है; तब उक्त सधवाके विषयमें भी हैं आर्यसमा सम्भावना क्यों नहीं होगी? तब इस मतके अनुयायि Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ३६८ ] कि पहले इस विषयपर पूर्ण विचार - विमर्श करलें; म. चाहिये फिर गुणकर्मानुसार वर्ण - व्यवस्थाके प्रचारका शोर करें । भारतको जिसमें ( ४ ) चौथी आपत्ति यह है कि - गुणकर्मानुसार वर्णं - व्यवस्था नाचा मानेपर स्त्रियोंकी भांति पुरुषों को भी अपनी स्त्रियाँ बदलनी याँ विद्या पहेंगी । जैसेकि यदि किसी ब्राह्मण की स्त्री गुणकर्मानुसार शूद्रा तकी भी हो जाए; तब ब्राह्मणको वह स्त्री छोड़नी पड़ेगी । ऐसा न करने पर मनु ( ३।१४-१५-१७-१८-१९ ) के अनुसार ब्राह्मणकी अधोगति पको गृहस्वा होगी, और वर्णसङ्कर - सन्तान उत्पन्न होगी; जिसके विषयमें की मन्दा ' गीता ' में कहा गया है - ‘ सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । लेगा; पतन्ति पितरो ह्य ेषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ' ( १ | ४२ ) । इसके अति-रिक्त प्रायः देखा भी जाता है कि वर्णसङ्कर जाति कालान्तर में नष्ट हो जाती है । तभी मनुजीने कहा है- ' यत्र त्वेते परिध्वंसा जावे जायन्ते वर्णदूषकाः । राष्ट्रिकैः सह तद् राष्ट्रं क्षिप्रमेव विनश्यति ' जाग ( १० । ६१ ) । स्त्री - त्याग करनेपर आर्यसमाजियों को व्यवस्था देनी क्यों? चाहिये कि उस पुरुषको अब अन्य विवाह वा नियोग करना शकटी- चाहिये वा नहीं? ऐसी दशा में वही प्रश्न पुरुषोंकेलिए भी होंगे; जो पहले स्त्रीके विषय में कहे गये हैं । उनका उत्तर इन मत-इ; इस बालों को देना चाहिये । है कि ( ५ ) गुणकर्मणा वर्ण - व्यवस्था में पाँचवीं आपत्ति यह है कि-वाह र व्यभि इस सिद्धान्तके अनुसार कोई पुरुष वर्णसङ्कर नहीं हो सकता; पथमें भी क्योंकि मनुके सिद्धान्त से जो वर्णसङ्कर कहलाने योग्य है, वह आर्यसमाजानुसार गुरुकुल में प्रविष्ट होकर गुणकर्मानुसार यदि अनुयाबि CC - 0. Ankur Joshi क्या गुणकर्मानुसार वर्णव्यवस्था चल सकती है? [ ३६६ उत्तम वर्णवाला होगया; तो वर्णसङ्कर कौन रहेगा? यदि कहा जाय कि वर्णसङ्कर सन्तान उत्तम वर्णे प्राप्त करनेकी अधिकारिणी नहीं; तब आर्यसमाजका गुणकर्मणा वर्ण - व्यवस्थाका सिद्धान्त स्वतः खण्डित होगा | तब ' जन्मना वर्ण व्यवस्था ' यह सनातन-धर्मका सिद्धान्त स्वतः सिद्ध हो जायगा । तब आर्यसमाजी विद्वानको प्रत्युत्तर देना पड़ेगा कि उनके सिद्धान्त के अनुसार वर्णसङ्करका क्या लक्षण है? उनके मत में उसकी उत्पत्ति कैसी है? उनके मत में उसके गुणकर्म क्या हैं? उसका वर्ण परिवर्तित हो सकता है या नहीं? नहीं तो क्यों नहीं? ( ६ ) छठी आपत्ति यह है कि गुणकर्मानुसार वर्ण - व्यवस्था मानने पर पुरुषोंके वर्णका निश्चय नहीं हो सकेगा । जैसेकि-आर्यसमाजमें जो वकील हैं, बाबू हैं, स्कूल- मास्टर हैं, जिन्होंने बेद न पढ़कर अन्यत्र श्रम किया है, अथवा जो उपदेशक हैं, केवल दलीलबाजी कर सकते हैं, संस्कृत भाषाको नहीं जानते; उनका क्या वर्ण होगा? जन्मना व व्यवस्था माननेवालोंके सिद्धान्तानुसार तो वे जिस - जिस वर्ण में उत्पन्न हुए; वहीं उनका वर्ण है; पर आयँसमाजके अनुसार जब तक उनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय आदिके गुण - कर्म नहीं हैं: तबतक उनकी गणना उस - उस वर्ण में नहीं हो सकती । वकील ब्राह्मण नहीं हो सकते; क्योंकि-उन्होंने ब्राह्मणोंका वेद पढ़ना - पढ़ानारूप मुख्य कर्मका पालन नहीं किया; ब्राह्मणसे विरुद्ध सदा असत्यका ही व्यवहार करते हैं । क्षत्रिय होनेकेलिए युद्ध आदि क्रियाओंकी आवश्यकता हुआ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४०० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) करती है, वह उनसे तो दूर होते हैं । वैश्य होनेकेलिए भी वाणिज्य आदि कर्मोंकी आवश्यकता होती है । शुद्र होने के लिए भी द्विजोंकी सेवा तथा शिल्प आदिकी अपेक्षा हुआ करती है, परन्तु वकील आदियों में इन कर्मोंके न होनेसे वे आर्यसमाज में किसी भी वर्ण में नहीं गिने जा सकेंगे; इसलिए वे अवर्णं वा वर्णसङ्कर होंगे । इस प्रकार उनकी पत्नियाँ भी अवर्ण होंगी । ( ७ ) सातवीं आपत्ति यह है कि - गुणकर्मानुसार वर्ण - व्यवस्था माननेपर आर्यसमाज - सिद्धान्त के अनुसार नियोगसे उत्पन्न सन्तान नियुक्त - पुरुष वा नियुक्त - स्त्रीकी कैसे हो सकती है? यदि नियोगसे उत्पन्न सन्तानका गुरुकुल से लौटने पर वर्ण बदल जाए; तब वह सन्तान अपने नियुक्त पिता वा नियुक्त माताके पास तो स्वा. द. के सिद्धान्त के अनुसार रह नहीं सकती । तब वंशोच्छेदन हो जायगा । जिस उद्देश्यसे नियोग हुआ; वह अभिप्राय भी सिद्ध न हुआ । ' भक्षितेपि लशुने न शान्तो व्याधिः ' ( शास्त्रनिषिद्ध लहसन, व्याधिको दूर करनेकेलिए खाया, फिर भी व्याधि न गई । यदि कहा जावे कि परिवर्तन में अन्य सन्तान मिलेगी; तब फिर नियोगसे क्या लाभ हुआ? ऐसे भी तो जिसे सन्तानकी आवश्यकता हो; वह दत्तकपुत्र भी ले सकता है; ( यद्यपि वेदकी उसमें भी सम्मति नहीं ) उस दशा में स्वा. द. - कल्पित नियोगकी आवश्यकता नहीं रहती । हाँ, वहाँ कामास्वाद न मिलेगा - यह त्रुटि रहती है । एक यह प्रश्न भी होगा कि कोई पुरुष अपनी CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या गुणकर्मानुसार वरण व्यवस्था चल सकती है ? [ ४० ) सन्तान के बदले में नियोगसे उत्पन्न दूसरे की सन्तान ले इस दशामें विवाहोत्पन्न सन्तान और नियोगोत्पन्न ले; तो! समान हो सकती है? सन्तान क्या ( 5 ) आठवीं आपत्ति गुण - कर्मसे वर्ण - व्यवस्था में कि — उस दशामें मनुष्योंको किसी प्रकारका भी भय न यह रहे है । जैसे कि - यदि ब्राह्मण या क्षत्रिय - कुमार किसी नीच वैश्वा आसक्त होकर गिर गया; अथवा यदि कोई पुरुष विलायत गया; वहाँ किसी मेमसे उसका सम्बन्ध होगया; और वह क्षा । मेमको लेकर भारत में लौटा; कुछ दिनोंके बाद वह समाब सम्मिलित होगया । उसका विवाह भी अब आर्यसमाी । वैदिक - विवाह कहते हैं । गुण - कर्मानुसार आर्यसमाजने ध्ये ब्राह्मण - क्षत्रियादि वर्णं बना दिया; अब आर्यसमाज उत्तर दे कि - यदि कोई आर्यसमाजी, बिना वैदिक - विवाह किये, किसी स्त्री से सम्बन्ध कर ले; तब वह पतित होता है, वा नहीं? यदि । नहीं; तब विना विवाह किये समागम पाप है - यह नियम नहीं गया? । यदि कहा जाये कि ऐसा करना पाप है; तब आर्य- । समाजी जो इस प्रकार की शुद्धि करते हैं; उसमें ध्यान क्यों नहीं देते? यदि शुद्धिके समय उसके गुण - कर्म ब्राह्मण के समान हैं; तब वे ब्राह्मण क्यों नहीं कहे जाते? इस प्रकार गुण - कर्मानुसार वर्ण - व्यवस्था करने पर अन्य भी आपत्तियाँ उठ सकती हैं । उन्नतिकी सीमाकी व्यवस्था जन्मानुसार न रखनेसे हिन्दुसमाज में घोर अशान्ति, पारस्परिक Gujarat. An eGandove २६. क व अ त ग पर A

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४०२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ Yop ईर्ष्या - द्वेष आदि सभी दुर्गुण फैलेंगे; वर्णसङ्कर - प्रजाकी उत्पत्तिसे ले श्राद्ध - तर्पण आदिके बन्द हो जानेसे देश में स्वास्थ्यनाश, दुर्भिक्ष न्तान क्या आदिके कारण अधःपतनको प्राप्त हुई हिन्दुजाति दिनोदिन अधोगतिको प्राप्त हो जावेगी । गुण - कर्मानुसार वर्ण - व्यवस्था यह है इस देशमें न पहले कभी रही, न ही भविष्य में कभी चल सकती न रहेगा । है, न ही वर्तमानकालमें चालू है । तब आर्यसमाजियोंको उचित वेश्याने है कि वे अपने कपोल - कल्पित इस सिद्धान्तको वापिस लें; विलायत क्योंकि उनकी तथाकथित वर्ण - व्यवस्था कभी चल ही नहीं वह सकती । प्रत्युत यह वर्ण - व्यवस्था उन्हींको लब्जित करनेवाली, समाजरे तथा उनके पक्षका विघात करनेवाली होगी । अतः उन्हें भी र्यसमाजी सनातनधर्मकी भांति ' जन्मसे वर्ण - व्यवस्था तथा गुण - कर्मसे जने से प्रतिष्ठाका तारतम्य ' यह अपना सिद्धान्त बना लेना चाहिये । उत्तर दे इससे हिन्दुजातिकी दृढता तथा सम्मानकी सम्भावना है, इससे न्य किसी कोई श्रव्यवस्था भी नहीं होगी । ( स्वा. दयाल. ना. स. ) 1? यदि गुणकर्मद्वारा वर्ण - व्यवस्था माननेपर पिता - पुत्रके वर्णभेद यम कहीं हो जाने से, पिता के पुत्रोंके परिवर्तन विषयपर हमने जो दोष बताये हैं, इसपर आर्यसमाजके लीडर श्रीरामचन्द्रजी देहलवी अपना मत बताते हैं कि लड़का गुरुकुल में २५ वर्ष रहेगा; उसके के समान स्नातक बनकर आने तक पिता वानप्रस्थाश्रममें चला जायगा; तब उसके पिताका घर उस स्नातकका हो जावेगा; उससे कोई र गड़बड़ी नहीं होगी, और लड़कियोंका अदल - बदल नहीं होगा । ' व्यवस्था परन्तु देहलवीजीकी यह बात ठीक नहीं, और अपने स्वामीसे नारस्परिक क्या गुणकर्मानुसार वर्ण - व्यवस्था चल सकती है? [ ४०३ भी विरुद्ध है । विद्याका पढ़ना २५ वर्ष तक ही हो, यह भी आवश्यक नहीं । एक वेद पढ़कर भी विद्या समाप्त कर देना, वा जब अपनी विद्या समाप्त करदे; तब भी ब्रह्मचर्य व्रत समाप्त कर दे - यह पक्ष भी शास्त्रों में आया है । देखिये मनुस्मृतिमें लिखा है - ' तदर्धिकं पादिकं वा, ग्रहणान्तिकमेव वा ' ( ३१ ) इम्रपर श्री कुल्लूकभट्टने कहा है- ' यावता कालेन उक्तावघेरूध्वंम् श्रधो वा वेदान् गृह्णाति; तावत्काले व्रताचरणम् ' अर्थात यदि पहले भी विद्या समाप्त कर लेता है; तब तक ब्रह्मचर्य व्रत रखे, फिर समावर्तन कर ले | पारस्करगृ. में भी यही कहा है- ' यावद्ग्रहणं वा ' ( २।५।१५ ) । वाराहगृह्यसूत्र के छठे खण्डमें भी कहा है- ' यावद्ग्रहणं वा ' । बोधायनधर्मसूत्र में भी कहा है- ' ग्रहणान्तं वा, जीवितस्याऽस्थिर-त्वात् ' ( १ | २ | ४ ) इत्यादि । तब उक्त - नियम न होनेसे लड़का पिताके पास आ सकता है । वेदादिशास्त्रोंकी भी इसमें साक्षी है - यह आगे देखिये | यदि प्रतिपक्षीके अनुसार पिता गृहस्थाश्रम में नहीं होगा; तब यदि कोई स्नातक आया भी सही; तब पिता वहाँ न होने उस लड़केको ले ही न सकेगा; तो पुत्र - परिवर्तन भी क्या होगा? और स्वा.द. के अनुसार लड़का गुरुकुलमें होनेसे पिताकी सेवा भी न कर सकेगा; परन्तु सेवा करना स्वामीने भी माना है; तब उनके अनुसार लड़केका घरमें होना मानना पड़ेगा । यदि उस पिताके लड़केका वर्णं बदल गया; तो वह भिन्न - वर्ण वाला CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४०४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) हो जाने से अपनेसे भिन्न - वर्ण वाले पिताके घरका अधिपति भी नहीं हो सकेगा । और भिन्न स्नातक यदि उस घर के मालिक पिता के समान वर्णवाला हो भी सही; पर देहलवीजी के अनुसार उस पिताके घरमें न होनेसे और दूसरे लड़केको स्वीकृत न कर सकनेसे वह भिन्न भी उस घरका स्वामी न बन सकेगा । यदि प्रतिपक्षीके कथनानुसार वह घर पितासे तथा पुत्रसे हीन रहेगा; तो ' गृहस्थस्तु यदा पश्येद् वली पलितमात्मनः । अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ' ( ६२ ) यह मनुका पद्य कब चरितार्थ होगा? वह पिता जब स्नातक - पुत्रको ही नहीं देख सकेगा; तब उस पुत्रके पुत्रको ही स्मृति एवं वेदानुसार घरमें कैसे देख सकेगा? । स्मृतिने तो अपने पौत्रका घरमें होना दिखला ही दिया; वेद भी यही दिखलाता है । देखिये - ' इहैव स्तं मा वियौष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम् । क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिः ( पौत्रैः ) मोदमानौ स्वे गृहे ' ( ऋ. १०/८५/४२ ) इस वेदमन्त्र के अनुसार जब माता - पिताका अपने घरमें पुत्र - पौत्रोंसे खेलना कहा है; वह प्रति-पक्षी के अनुसार कैसे संगत हो सकेगा? ' तब तो स्वा.द.जीसे प्रोक्त अन्य पुत्र ग्रहण भी प्रतिपक्षीके अनुसार निर्विषय जायगा । ' पुत्रेषु भार्या निक्षिप्य ' ( ६३ ) यह मनुवचन भी प्रतिपक्षीके अनुसार निर्विषय हो जायगा कि ( पुरुष अपनी स्त्री को अपने पुत्रों-के जिम्मे करके चला जावे ) । यह कब चरितार्थ होगा? जो उस पिताके अन्य लड़के होंगे; वे भी तो प्रतिपक्षीके अनुसार क्या गुणकर्मानुसार वर्णव्यवस्था चल सकती है ? [ ४ गुरुकुल में चले जाएँगे - यदि वे भी भिन्न - भिन्न वके उस पिताके घर की बाँट कैसे होगी? वस्तुतः होगये; दे यह स्वा.द.बी लटका तथा प्रतिपक्षीकी दलीलबाजी निमूल एवं शास्त्रविरुद्ध ज आश्रम विभाग भी २५-२५ वर्ष का पूरा हो, यह भी है । भी आवश्वा नहीं है, इसपर श्रीकुल्लूकभट्टने मनुस्मृतिमें प्रकाश डाला है । देखिये— ४१ मनुपद्यकी टीका में वे लिखते हैं- ' चतुर्थमायुषो भा माद्यम् ' इत्युक्तं ब्रह्मचर्य - कालोपलक्षणार्थम; अनियत परिमार भार देख त्वाद्- ( आयुका चौथा भाग २५ वर्ष ब्रह्मचर्यं हो - यह केन कालका उपलक्षणमात्र इष्ट है, निश्चित २५ वर्ष नहीं; क्योंकि. परिमाण निश्चित हो ही नहीं सकता ) आयुषश्चतुर्थभागस्य दुर्द्वार श्रा त्वात् ( कितनी आयु है - जब यह पता नहीं; तो उसका चतुर्द भाग भी तो निश्चित नहीं हो सकता ) ' न च शतायुर्वै पुरुषः ' इति राग इति श्रुतेः पञ्चविंशति - वर्षपरत्वम्, षट्त्रिंशदाब्दिकं ब्रह्मचर्यमित्यादि विष विरोधात ( यह भी नहीं कहा जा सकता कि आयु १०० व चतु बताई गई है, उसका चौथाई २५ वर्ष हो; क्योंकि फिर ३६ तक भी मनुजीने वेद पढ़ना कहा है- उसमें वे २५ वर्ष वा । कहत चौथाई कैसे घटेगी? यदि कहो कि आयु बढ़ जावेगी । वह आजतक किसी भी आर्यसमानी - ब्रह्मचारीकी १०० वर्षसे वक्ति पादिव ८० वर्षसे भी आयु बढ़ती नहीं देखी गई; तब वहाँ चौथाईरी स्वीक व्यवस्था कैसे हो सकेगी? ) तस्माद् आश्रम- समुच्चय पक्षमाधिये । वेद ब्राह्मण उक्त ब्रह्मचर्यकाले जन्मापेक्षाद्य यथाशक्ति गुरुकुले स्थिता CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 217

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४०६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) होगये द्वितीयमायुषश्चतुर्थभागं गृहस्थाश्रममनुतिष्ठेत् ' ( खो ब्रह्मचारी है जितने तक सम्भव हो गुरुकुल में पढ़कर फिर गृहस्थाश्रममें आ दू.जी जावे । ) ' गृहस्थस्तु यदा पश्येत् ' ( ६।२ ) इस मनुके पद्यकी टीकामें नविरुद्ध है । भी श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है— इत्यनियतत्वाद् द्वितीयमायुषो भाग-मित्यपि गार्हस्थ्यकालपरमेव ' ( अर्थात् - वह बात भी निश्चित नहीं डाला है कि - वह पौन्नको कब देखेगा; सो यहाँ ' द्वितीयमायुषो भागं ' का भाव यह है कि - जितना समय वह गृहस्थाश्रम में रहे; पौत्र न्युपो मार देखकर फिर वानप्रस्थकी तैयारी करे ) । - परिमार इसी प्रकार ' तृतीयं भागमायुषः १ ( ६३२ ) इस मनुपद्यकी टीकामें भी कु.भ. ने स्पष्टता की है - ' अनियतपरिमाणत्वाद क्योंकि आयुषस्तृतीयभागस्य दुर्विज्ञानात् तृतीयमायुषो भागमिति रागक्षया-दु बधि वानप्रस्थकालोपलक्षणार्थम् । एवं वानप्रस्थाश्रमं विषय-का चतुर्थ रागोपशमनाय कञ्चित् कालमनुष्ठाय ' चतुर्थमायुषो भागम् ' ( ४ | १ ) रुपः ' इति इति शेषायु: -काले विषयसङ्गान् त्यक्त्वा परिव्राजकाश्रममनु-व्यमित्यादि । तिष्ठेत् ' । इसमें भी वही भाव है कि श्रायुके निश्चय न होने से १०० वर्ष चतुर्थभाग पूरा २५ वर्षं का नहीं हो सकता । ३६ वर्षे पं. बाबा जब मनु पादिक ब्रह्मचर्य भी तथा ग्रहणान्तिक ब्रह्मचर्यं भी नावेगी - पर कहते हैं, यह हम पूर्व लिख चुके हैं; उस समय स. प्र. के अनुसार पैसे दक्ति वह ब्रह्मचारी १७ वर्ष का होगा; क्योंकि- स्वा. द. जी ने स.प्र. में चौथाई पादिक ब्रह्मचर्यं नौ वर्षका माना है ( ३ समु. ) यह प्रतिपक्षीको भी क्षमाणि स्वीकृत करना पड़ेगा; और उक्त समय विवाह भी । क्या एक-ले स्थिता वेदके ग्रहीता को भी प्रतिपक्षी ब्राह्मण मान लेगा वा नहीं? क्या गुणकर्मानुसार वर्ण व्यवस्था चल सकती है? [ ४०७ स्वामीने चतुर्वेद ज्ञाता एवं पूर्ण विद्वानको ब्राह्मण माना है । तब वह पादिक ब्रह्मचारी वैसा न होनेसे ब्राह्मण कैसे होगा? अथवा उसे ब्राह्मण मानने पर भी क्या क्षत्रियके उस लड़के को कोई ब्राह्मण स्वीकार कर लेगा? तब ऐसा होनेपर घरमें पिताके विद्यमान होने से हमसे पहले की कही हुई दुर्दशाएं स्वतः उपस्थित होंगी; और उन दुर्दशाओं का हल प्रतिपक्षी खोज भी नहीं सकेगा । स्ववीर्योत्पन्न न होनेसे वह पिताका कृत्रिम पुत्र अपने कृत्रिम - पिताकी लड़की पर ही जिसका परिवर्तन प्रतिपक्षी के अनुसार न भी माना जावे; प्रतिपक्षीकी ही इष्ट दुस्सम्भावना - वश आसक्त हो जावे; तब क्या वह उस कृत्रिम - बहिनसे विवाह कर सकेगा, वा नहीं? और वह अपने पूर्व - पिता के कुलवाली भी नहीं होगी और उस लड़केने गुरुकुलमें होनेसे उस लड़की को पहले देखा हुआ भी नहीं होगा; फिर वह स्वामीके इस कथन-से कि - ( प्रश्न ) अपने गोत्र वां भाई - बहनोंका परस्पर विवाह क्यों नहीं होता? ( उत्तर ) एक दोष यह है कि इनके विवाह होने में प्रीति कभी नहीं होती; क्योंकि - जितनी प्रीति परोक्ष पदार्थ में होती है, उतनी प्रत्यक्षमें नहीं, और बाल्यावस्थाके गुणदोष भी विदित रहते हैं, तथा भयादि भी अधिक नहीं रहते । दूसरा जब तक दूरस्थ एक दूसरे कुलके साथ सम्बन्ध नहीं होता, तब तक शरीर -आदिकी पुष्टि भी पूर्ण नहीं होती । तीसरा दूर - सम्बन्ध होने से परस्पर - प्रीति, उन्नति, ऐश्वर्य, बढ़ता है, निकट से नहीं ' ( संस्कार-विधि पृ. १२८ ) इस प्रतिपक्षी के स्वामीके वचनसे परोक्ष उस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 218

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४०६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) लड़की से प्रीति- जनक होनेके कारण विवाह हो सकेगा, वा नहीं? क्या यह भाई - बहनका वा एक गोत्रका विवाह माना जायेगा, वा नहीं? यदि वह उसकी बहिन नहीं मानी जावेगी; इस लिए विवाह हो सकेगा - यह कहा जावे; तो उसका स्वीकार-कर्ता पिता भी उसका पिता न माना जा सकेगा; और वह भी उसका पुत्र न बन सकेगा । तब स्पष्ट है कि यह पुत्र - परिवर्तन बड़ी अव्यवस्था पैदा करनेवाला होनेसे जहां शास्त्रीय नहीं, वहां व्यावहारिक भी नहीं । फलतः अन्य कुलसे पैदा हुए और अब स्नातक बनकर आये हुए युवक- पुत्रको गोत्रकी भिन्नतावश वा वैसे भी कोई लेगा ही नहीं; किन्तु उस पुत्रको ही बलात् किसीके गले मढ़ना पड़ेगा, अथवा उस युवकको ही अपना पिता ढूँढना पड़ेगा, श्रथवा वही भिन्न - वर्ण वाला अपने पिताका घर ले लेगा - यह भी ठीक नहीं । दूसरे वर्ण वाले पिताके घर में भिन्न - वर्ण वाले पुत्रका भला गुणकर्मवादियोंके मतमें क्या अधिकार हो सकता है? फलतः गुणकर्मणा वर्ण - व्यवस्थामें इस प्रकारकी अन्य भी बहुत सी अव्यवस्थाएँ आ सकती हैं; और आ पड़ेंगी, जिनका समीकरण असम्भव होगा । तभी तो आर्यसमाज में भी — स्वा. द. जी द्वारा कहे हुए पुत्रपरिवर्तनको उन्मत्तवाक्य - जैसा समझकर उनके अनुयायी भी. उसकी उपेक्षा करते हैं । कहीं भी गुण-कर्मानुसार पुत्र - परिवर्तन नहीं किया जाता । इसी कारण बहुत प्रयत्न करनेपर भी आर्यसमाज में भी गुणकर्म - कृत वर्णव्यवस्था क्र्या गुणकर्मानुसार वर्णं - व्यवस्था चल सकतीहै । ४१० Ci चालू नहीं हुई; अतः आप लोग वर्णव्यवस्था तो अवताको प्रोत्साहन दे रहे हैं । उसमें यही दूर रही वह उसमें कोई लक्ष्य न होनेसे यह अन्धेरेमें कारण है उनका डण्डा फकनेक द्वारा हो रहा है, हानिके अतिरिक्त कुछ भी लाभ यह परिवर्तन स्वेच्छामूलक हैं इसमें नहीं हो रहा | अव्य , शास्त्रमूलकता नहीं है ' अ दत्तक पुत्रके कादाचित्क वा काचित्क होनेसे और । होगा में उसके लेनेसे तथा समानगोत्री होनेसे फिर ट समाज में I उतनी अव्यवस्था सम्भव नहीं; आपकी इस व्यवस्थाके कहीं सार्वदिकता, सार्वकालिकता तथा सार्वत्रिकतावश बड़ी वस्थाओंका साम्राज्य रहेगा । अनेक कलह जारी होंगे श्र उच्च-। श्र कारण दुःसम्भावनाएँ ( पृ. ३७२-३७३ ) पुष्ट होंगी, बहुत कुल च विचार हो जाएंगे । हूँ, १ यदि लड़कियोंका गुणकर्मानुसार वर्णं पुत्रकी भान्ति न बहु कलिय जाएगा; तब इस प्रतिपक्ष - सिद्धान्तकी स्वेच्छामूलकता ह वह र अव्यवस्थापादकता स्पष्ट सिद्ध हो गई । लड़की न भी बदले सिद्धान पर वह गैर - घरका २५ वर्षंका परिवर्तित वर्णवाला युवा बदा -शि घर आ जाएगा; तब क्या वह उसको औरस- भगनी सम सकेगा? क्या उसकी उस पर वाद्यभिमत दुःसम्भावना न होगी! हास उन लड़कियोंका गुणकर्म बदलनेपर भी उनका व क्यों की जानेसे बदला गया? यदि नहीं बदला गया; तो प्रतिपक्षी के पा परस्पर खण्डन हो गया । यदि बदला जाता है, तो भिन्न - वर्णवाली ऐसा उसमें भिन्न - वर्ण वाले अपने पिताका अधिकार ही क्या रहेगा ॥ पैदा हो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative

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j श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ४१० पिता तथा उसका भ्राता भी यदि भिन्न - वर्णके हो गये, र रही वह लड़की में अधिकार न रहने से शास्त्रमें प्रोक्त पिता के र है । उनका उस निर्विषय कलेके द्वारा पुत्रीका दान भी बन जाएगा । यह ऐसी हो स व्यवस्थाकी गांठें हैं, जिनको कोई खोल नहीं सकेगा । आशा रहा । ' आलोक ' - पाठकोंने यह विषय भली- भान्ति समझ लिया नहीं । फिर छोट होगा । नाव में प्रकरणवश यह भी विचारना चाहिये कि - अन्य वर्णोंमें वस्याके कहीं उच्च वर्णोंके गुणकर्म दीखते हैं; और कहीं ब्राह्मणादि बड़ी उच्च - वर्ण भी अपने आचरणोंसे गिरे हुए दीखते हैं, उसमें गे । श्रा कारण क्या है, और कैसी व्यवस्था होनी चाहिये? इसमें विचार करनेपर प्रतीत होता है कि- इसमें तीन कारण सम्भव चर हूँ, १ वर्णसङ्करता २ आरूढ - पतन और ३ मिश्र - संस्कार । न्न कलियुग है तमोगुणप्रधान । इसमें पापका स्रोत प्रबल वेगसे बह लकता बह रहा है । इसमें नियोग एवं विधवाविवाहादि वैषयिक-का भी बद सिद्धान्तोंके प्रबल प्रचार किये जानेसे स्त्रियों में सदाचारविषयक दृढ - शिक्षा के न रह जानेसे, या कुसंगतिवश, अथवा आजकलके युवा लड़ नानी सम नये सम्प्रदायोंके विषमय उद्गारोंके प्रभाववश पातिव्रतधर्मका T न होगी! हास होगया है । पुरुषोंमें भी विषयविलासकी कामना बढ़ क्यों नही जानेसे परस्त्रीगमनकी प्रवृत्ति भी बहुधा होगई है । आजकल के पा परस्पर गहरे - मित्र अपनी स्त्रियाँ एक - दूसरे से सम्भुक्त कराते हैं-- वर्ण वाली ऐसा सुना जाता है । इन कारणोंसे वर्णसङ्कर प्रजाएँ भी बहुधा रहेगा । पैदा हो जाती हैं; तभी कर्मसङ्करता भी बढ़ गई है । क्या गुणकर्मानुसार वर्ण - व्यवस्था चल सकती है? [ ४११ उदाहरणरूपसे यह जानना चाहिये कि कोई कुलीन ब्राह्मणी गुप्तरूपसे किसी शूद्रादि उपपति से सम्बन्ध करके पुत्र पैदा करे; तब बद्द पुत्र पूर्णं - त्राह्मणके गुणकर्मों को कैसे प्राप्त कर सकता है? विषय के गुप्त होनेसे किसीको पता नहीं लगा, और वह सन्तान ब्राह्मण कही जाती है । तब उसके कुछ कमें ब्राह्मणकी भांति होंगे, और बहुतसे शुद्रकी भांति होंगे । इस प्रकार शूद्रामें भी ब्राह्मणके व्यभिचार - द्वारा उत्पन्न सन्तान साधारण - शुद्रसे विलक्षण कर्म करेगी । उसमें ब्राह्मणके कर्म भी दीख सकते हैं । कलियुगके प्रभावसे आजकल ऐसा बहुधा देखा जाया करता है, जिससे नीच - कुलोत्पन्न भी ब्राह्मण जैसे दीखते हैं; और उत्तम-कुलोत्पन्न भी शूद्र - जैसे दीखते हैं । दूसरा कारण है - आरूढपतन । कर्मोंका भोग संस्कारोंकी प्रबलतानुसार होता है । मनुष्य अपने जीवनमें विविध - कर्मोंको करता है, त्रिगुणात्मक प्रकृतिके राज्यमें सात्त्विक, राजसिक, तामसिक विविध कर्म हुआ करते हैं । उनमें जो कर्म बहुत प्रबल होता है; वही प्रारब्ध बनकर पहले फल देने लगता है । भगवानने गीतामें कहा है- ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था श्रघो गच्छन्ति तामसाः ' ( १४ | १८ ) इस सिद्धान्तके अनुसार यदि कोई मनुष्य ऐसे कर्म करे, जिनसे उसने स्वर्ग पाना है, या ऐसे कर्म करे जिनसे उसने पृथिवी में मनुष्य जन्म प्राप्त करना है, अथवा ऐसे अनेक कम-को करे, जिनसे उसने पशुयोनि प्राप्त करनी है, इन तीनों प्रकारके CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४१३ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) कर्मों में जो कर्म बलवान होंगे, वे ही उसकी मृत्युके समय प्रारब्धकर्म बनकर उसके चित्तरूप आकाशका आश्रय करेंगे । उन्हीं के अनुसार उनका जन्म होता है । इसी कारण भगवद्-गीता में कहा गया है - ' यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय! सदा तद्भावभावितः ' ( ८६ ) इसलिए कहा जाता है - ' अन्ते या मतिः या गतिः ' । मृत्युके समय साधारणतया सूक्ष्म शरीर दुर्बल होता है; तब उस दुर्बल सूक्ष्म शरीर में वे ही कर्म आश्रित होते हैं, जो प्रबल होते हैं । जीव उनसे भावित होकर वैसी योनिको प्राप्त होता है । इससे यह सिद्धान्त निकलता है कि कोई पुरुष अन्य कर्म श्रेष्ठ करे, और कई निकृष्ट कर्म करे, और वे ( निकृष्ट ) कर्म प्रबल हों, तब उन निकृष्ट - कर्मोंका भोग पहले होगा । जैसे कि - किसी ब्राह्मणने ब्राह्मणयोग्य अनेक सुकमे किये; किन्तु प्रारब्धमूलक मोहवश कुछ कर्म शुद्रसदृश भी यदि किये; वे यदि बहुत प्रबल हैं; तो मृत्यु- समय में वे शूद्रयोग्य कर्म उसके प्रारंब्ध होकर उसे शुद्रशरीर में पैदा करेंगे । इन शुद्रकर्मों के भोगके बाद यदि पूर्व जन्ममें किये हुए हुए ब्राह्मरणयोग्य कर्म प्रबलतम हो जावें; तब उसका पुनर्जन्म ब्राह्मणके घर में होगा; परन्तु शूद्र माता - पिता द्वारा शूद्रशरीर प्राप्त होने पर भी पूर्वजन्ममें अनेक कर्म ब्राह्मण-जैसे करनेसे उनका संस्कार भी उसके कर्माशय में बना रहेगा । इस प्रकार वह साधारण - शूद्रसे अनेक प्रकारसे उन्नत रहेगा, क्योंकि उसके कर्माशय में स्थित ब्राह्मणयोग्य कर्मोंका प्रभाव भी CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या गुणकर्मानुसार वर्ण व्यवस्था चल सकतीहै? [ ४१ उसके चित्तमें अवश्य ही संक्रान्त रहेगा । वह शरीर है, शुद्र है, परन्तु भाव वा आचार में ब्राह्मणसदृश से अस्त्र होगा । श्रीमद्भागवतमें जडभरतका जो पूर्वजन्मका वृत्तान्त हि ती है, वह जन्म इस प्रकारके श्रारूढ - पतनके कारण I महाराज भरत बहुत तपस्या करने पर भी मरने से पूर्व हुआ का गम इतने आसक्त हो गये कि वे उसीको स्मरण करते एक मु || इस कारण दूसरे जन्म में मृग बने, परन्तु वे सर्वसाधारण हुए मर गरे उच्चतम थे, क्योंकि - तपस्याका संस्कार उनके चित्तमें - मृगये । वच था । ल प्रकार अन्यान्य - जीवोंमें समय - समय पर असाधारण जो पह पर दीखती है, मनुष्योंमें भी जोकि दूसरे वर्णोंमें कभी उच्च - वाद म भांति गुणकर्मस्वभाव दीखते हैं; उसमें आरूढपतनका भी कार जाना जा सकता है । वे कर्म पूर्वजन्म में उच्च वर्गां के थे, परन ता कई प्रबल - कर्म उन्होंने नीच वर्णकी भांति किये, जिनका प्रभार मद्र स्थूल शरीर में पड़ने से स्थूल शरीर तो निम्न वर्ण में प्राप्त हुत्रा, परन्तु चित्तमें उच्च - संस्कार के प्रसारवश आचार वा कर्म उच्च-वर्णकी भांति दीखते हैं । जैसे भरतराजा मृगयोनिके बाद ही द्वा फिर पूर्व तपोबल से भरतमुनि हुए; वैसे ही ऐसे पुरुष भी मन्द-कर्मका भोग नीच वर्ण में समाप्त कर आगामी जन्म में अपते horo कर्माशय के दूसरे उच्च कर्मोंके कारण अच्छे वर्णको प्राप्त करते हैं । कलियुग तमः -प्रधान है, इसमें देश, काल तथा सङ्गतिवा विरुद्ध हैं, अतः कलियुग में अच्छे पुरुषोंसे भी पापकर्म हो जाते B व्या हैं, अतः कलियुग में आरूढपतनकी पर्याप्त सम्भावना बनी रही श Gujarat. An eGangotri Initiative