सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 221–230
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 221–230
पृष्ठ 221
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ४१४ है, यही कर्मसङ्करताका दूसरा कारण है । रसे श्र कर्मसङ्करताका तीसरा कारण है मिश्र संस्कार | प्रकृतिके 1 तीन गुणवाली होनेसे मनुष्योंके सब कर्म सात्त्विक, राजसिक, तान्त हिर तामसिक इन तीन भागों में बँटते हैं । अन्य युगों में जब भावकी हुआ वा गम्भीरता थी, तब मनुष्योंमें प्रायः एक गुणके ही कर्म प्रबल एक मु होते थे, अन्य गुण दबे हुए रहते थे । इसलिए कर्मोंकी प्राकृतिक एमर गति प्रायः एक तरह की रहती थी । मनुष्य भी प्रायः मन, बारामुल वचन, कर्ममें एकतावश एक प्रकारकी प्रकृति वाले होते थे, था । ह परन्तु कलियुगमें भावगाम्भीर्यकी न्यूनतावश, देशकालका जोध मनुष्यकी प्रकृति पर प्रभाव होने से कलियुग में कर्मसंस्कार प्रायः उच्च - व मिश्रित होते हैं । सात्त्विक संस्कारके साथ राजसिक-भी कारत तामसिक कर्मोंके संस्कार भी रहते हैं । इसी प्रकार तामसिक-थे, परन मनुष्यों में भी दूसरे दो गुणों के कर्म भी दीखते हैं अर्थात् - इस नको मार युगमेँ प्रायः मिश्र - संस्कारसे युक्त पुरुष पैदा हुया करते हैं । प्राप्त हुआ, कर्म उच्च- मिश्र - संस्कार भी तीन प्रकार के होते हैं । एक स्थूल शरीर के के बाद ही द्वारा भोगे जाते हुए कर्म - संस्कार होते हैं, दूसरे सूक्ष्म शरीर में भीमद ही भोगे जाते हुए कर्म - संस्कार होते हैं । शरीर द्वारा किये = म में अपने कर्मका फल भोग शरीर द्वारा ही होता है, और मन - द्वारा किये स करते । हुए कर्मका फल मनमें ही होता है । जैसे मानसिक - पाप या सङ्गतियां कुत्सित - चिन्ताका फल मनमें ही दुःख आदि - रूप में मिलता है, " हो जाते व्यभिचार तथा हत्या आदि शारीरिक कर्मका फल स्थूल-बनी रहती शरीर द्वारा ही होता है; अतः सात्त्विक, राजसिक, तामसिक CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या गुणकर्मानुसार व व्यवस्था चल सकती है? [ ४१५ इन तीन प्रकारके कर्मोंके बीचमें जो कर्म स्थूल शरीर द्वारा भोगनेके योग्य हैं, उन्हीं कर्मो के बलसे माता - पिता द्वारा स्थूल शरीर मिलता है । जो कर्म सूक्ष्म शरीर द्वारा भोगनेके योग्य हैं, उनके अनुसार ही चिन्तकी वृत्ति होती है । पुरुष इन तीन प्रकारके कर्मों के अनुसार ही जन्म - जन्मान्तर पाते हैं, उन्हीं के अनुसार शरीर और चित्त की वृत्ति बनती है । जैसे कि यदि किसी पुरुषके मिश्रित - कर्मोंमें स्थूल शरीर से भोगनेके लायक कर्म तो सात्त्विक हों; परन्तु सूक्ष्म शरीरसे भोगने लायक अनेक कर्म तामसिक हों; तो उसका स्थूल शरीर ब्राह्मण माता - पितासे उत्पन्न होगा, किन्तु उसका बहुत - सा आचरण तामसिक - शुद्रकी भांति होगा | इस प्रकार यदि किसीके स्थूल शरीरसे उपभोक्तव्य कर्म तो तामसिक हों, परन्तु सूक्ष्म शरीरसे भोक्तव्य अनेक कर्म सात्त्विक हों, तब उस जीवका जन्म शुद्र माता - पिताके यहां होगा, किन्तु उसका बहुत आचरण सात्त्विक त्राणरणकी भांति होगा । आजकल कलियुगके प्रभावसे मिश्रित - कमेवाले पुरुष बहुत होते हैं; इसीलिए निम्न - वर्णोंमें भी अच्छे आचार वाले पुरुष मिलते हैं, और उच्च वर्णों में भी कुत्सित आचारवाले पुरुष दीखते हैं । आजकल चारों वर्णों में कर्मसङ्करताके यही तीन कारण होते हैं । तव कर्मसंकरमय इस कलियुग में कैसी व्यवस्था हो- इसपर कहा जाता है । -आदर्श वर्ण - व्यवस्थाकी बीजरक्षा अवश्य ही करनी पड़ेगी; क्योंकि - बीजरक्षा न करनेपर अनुकूल देश - कालमें फिर वर्ण-Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 222
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) धर्मकी पूर्ण - प्रतिष्ठा न हो सकेगी । तब वर्ण - व्यवस्थाके नष्ट होने पर तदाश्रित हिन्दुजातिकी सत्ता भी सर्वथा नष्ट हो जावेगी । तब उसमें व्यवहार ऐसा करना चाहिये कि - जिसका स्थूल शरीर शुद्ध अर्थात् उच्च कर्मका है; उसके द्वारा स्थूल शरीर से सम्बद्ध कर्म जो उच्चवरणँसे ग्राह्य हों; ले लेने चाहियें सूक्ष्म शरीर उन्नत है; उसके द्वारा सूक्ष्म कर्म कराना चाहिये । जैसे कि पूर्वोक्त कारणवश यदि कोई सम्बन्धसे ब्राह्मण हो; परन्तु उसका मन -निम्न हो; अर्थात् वह ब्राह्मण निर्बुद्धि या उसके साथ बैठकर ब्राह्मण खा सकता है, । इस प्रकार जिसका शरीरविषयक उन्नत ब्राह्मण स्थूल शरीर के बुद्धिरूप सूक्ष्म शरीर विषयासक्त हो; तब परन्तु यह अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि वह गुप्त वर्णसंकर न हो, गुप्त संकर होनेपर तो उसके साथ एक पंक्ति में भोजन: नहीं करना चाहिये; परन्तु यदि उस ब्राह्मणका सूक्ष्म शरीर हीन है अर्थात् यह निर्बुद्धि वा दुश्चरित्र है; तब शास्त्रीय उपासना- ज्ञान आदि सम्बद्ध कर्म उसके द्वारा नहीं कराने चाहियें; क्योंकि यह कर्म सूक्ष्म शरीर से सम्बन्ध रखते हैं, उसे श्राद्ध में भी नहीं खिलाना चाहिये, क्योंकि - शास्त्रमें विद्वान् ब्राह्मणको ही निमन्त्रणयोग्य बताया है, जिससे उससे मृतकके आत्माका कल्याण हो । यदि कोई शुद्र सूक्ष्म शरीर में उच्च है; तब उसके द्वारा वेदसे भिन्न अन्य शास्त्र सम्बद्ध कार्य लिया जा सकता है; क्योंकि — ऐसा विचार सूक्ष्म शरीर से सम्बद्ध है; परन्तु आपत्ति CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या गुणकर्मानुसार वर्ण व्यवस्था चल सकती है! कालमें ऐसा करना चाहिये, जबकि वैसा ब्राह्मण उ न मिल अवश्य ध्यान देना चाहिये; परन्तु उसके साथ एक स्थित होकर ब्राह्मण भोजन नहीं कर सकता; क्योंकि पत्र स्थूल शरीर शूद्रका है; इसलिए वह शरीरके कारण - उपर स्थूल शरीर के स्पर्शमें दोष आदिका सम्बन्ध अवश्य अपूर्ण है । है, इसलि ब्राह्मण उससे स्थूल शरीरका कार्य भोजनादिका नहीं ले यदि वह स्थूल शरीर से शूद्र है और सूक्ष्म शरीर से ज्ञानी सकते । है, बंद वह यथार्थ ज्ञानी तथा विदुर आदिकी भान्ति विचारवान् वह स्वयं भी ऐसा नहीं चाहेगा; क्योंकि जब कर्मकी विचित्रत होण उस उसे यह निम्नयोनि मिली है; इससे यह प्रमाणित होता है कि सम जन्ममें अन्य कर्मोंकी उन्नति में भी उसके स्थूल शरीर से सम्बद्ध च्चा मय कर्म कुत्सित थे; जिससे उसका स्थूल शरीर उसे शूद्र माता - पिता सन मिला । तब उसका कर्तव्य है कि- पूर्व - कर्मों के भोगका खून ( भ में उसी मर्यादासे निर्वाह करे, और सूक्ष्म शरीरसे छा आचरण करे, जिससे अग्रिम जन्म में स्थूल शरीर भी उसे उन्हा ' जा का मिले । इससे वर्ण - व्यवस्थाके प्राकृतिक सिद्धान्त प्र मात्र प्रहार नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करना अज्ञानका का सिद्ध है । स्थूल शरीरके ठीक - ठीक विचारसे जिस शरीरमें जै उसी योग्यता है; उस शरीरसे वैसा व्यवहार करना चाहिये । घार प्राचीन ब्राह्मणादियोंने भी ऐसा ही निर्वाह किया था । जाि उपनिषदोंमें कई ब्राह्मणों का कई क्षत्रियोंसे ब्रह्मविद्याका अध्यवर प्रोत्स आता है । शुकादिने जनकादिसे ब्रह्मविद्या सीखी थी; परंतु स ० घ ० २७ Gujarat, An eGangotri Initiative
पृष्ठ 223
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१८ ] श्रीसनातनघर्मालोक ( ८ ) उनके साथ उनका स्थूल शरीरसे सम्बन्ध कहीं नहीं कहा गया । मिलेग मनुजीने भी आपत्कालमें अब्राह्मण से अध्ययन कहा है ( २।२४१ ) । प यदि कोई शुद्र - शरीरधारी ज्ञानी और सच्चरित्र है; तब वह कि - उपुर नीतिका विषय सिखा सकता है, वेद पढ़ने - पढ़ानेका उसका अपूर्ण है । अधिकार न होगा । इसलिए क्षत्ता- विदुरने विदुरनीति कहकर भी है, इसलि ऐसे प्रसङ्गके उपस्थित होनेपर ब्राह्मण को बुलानेके लिए कहा था । - ले सकते । देखिये महाभारत – ‘ शूद्रयोनौ अहं जातो नातोऽन्यद् वक्तुमुत्सहे ' नी है, द ( उद्योग. ४१ | ५ ) ' ब्राह्मीं हि योनिमापन्नः सुगुप्तर्माप यो वदेत् ' ( ४१।६ ) बानू होगा । उसका कारण वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणके साथ स्थूल शरीर का विचित्रतारे सम्बन्ध है । उसका स्थूल शरीर शुद्र होनेसे अपूर्णतावश वेदो-है कि पूरे च्चारणका अधिकारी नहीं । यदि वह यथार्थ - ज्ञानी होगा; तो सम्बद्ध से मर्यादा - विघात करेगा भी नहीं । इस प्रकारके व्यवहारसे ता - पिता सनातन - धर्मका पालन और उससे भारतकी उन्नति होगी । गका खून ( भा.ध. स्वा. दु. ) उ फलतः गुण - कर्म से वर्ण - व्यवस्था आजकल नहीं चल सकती । उसे क्ष ' जातिमात्रोपजीविनाम् ' ( १२।११४ ) इस मनुवचनसे जाति-सद्धान्त पर मात्रता से भी ब्राह्मणत्वादिकी सिद्धि होनेसे वर्णव्यवस्था जन्मसे नका का सिद्ध होती है, वह परम्परासे भी चालू है, आजकल भी रमें जैसे उसीका प्रचालन ही सुविधापूर्ण है । हां, अपने वके गुणकर्म ये । धारण करनेवालेका सम्मान अच्छा होना चाहिये, जिससे किया था । जातिमात्रोपजीवियोंका अपने - अपने वर्णके अवलम्बन करनेमें का श्रभ्यवद प्रोत्साहन बढ़े । थी; परतु साम्प्रदायिक- सिद्धान्तचर्चा १३ आर्यसमाजका श्राद्ध तथा यमराज । सनातन हिन्दु धर्मके ' जन्मसे वर्णव्यवस्था ' तथा ' मृतकश्राद्ध ' यह दो मुख्य विषय हैं । इसमें वर्णव्यवस्था विषयपर तो पहले प्रकाश डाला चुका है । सनातनधर्म - सम्मत मृतक श्राद्धके तथा यमराजके विषयमें भी आर्यसमाज बहुत विरोध करता है; पर हमारा यह विचार है कि आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वा. द. पहले इस विषयको मानते थे, पर पीछे वे बदल गये । फिर उन्होंने अपने ग्रन्थोंमें उन विषयों में यत्र - तत्र सुधार कर दिया । पर सत्यको कहां तक छिपाया जा सकता है; अब भी उनके पुस्तकों में मृतकश्राद्ध तथा यमराजके बीज विद्यमान हैं; हम उनका स. घ. के म. म. गो. श्रीयदुकुलभूषणजी शास्त्रीकी शैलीसे विशदीकरण करते हैं । श्राद्धके विषयमें अन्य सामग्री पाठक ' आलोक ' के चतुर्थ - पञ्चम पुष्पमें देखें । १ स्वा. द. जीकी संस्कारविधि ११८ पृष्ठमें लिखा है- ' ब्रह्म-चारी स्नान कर, पीताम्बर धारण करके, सुगन्धयुक्त चन्दनादिका अनुलेपन कर, हाथमें जल ले अपसव्य और दक्षिणमुख होके ‘ ॐ पितरः शुन्धध्वम् ' ( पार. २।६ ) इस मन्त्रसे जल भूमिपर छोड़े ' । यहांपर हम प्रश्न रखेंगे, इसी स्वा. द. जी के लेख द्वारा ही मृतक-श्राद्धकी सिद्धि हो जावेगी । ( १ ) ' पितरः शुन्धध्वम् ' इस स्वा. द. जीसे प्रमाणित मन्त्र ' पितृ ' पदसे मृतक - पितरोंका ग्रहण है, या जीवितोंका? यदि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 224
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) श्रार्यसमाजका श्राद्धं तथां यंमराज जीवितका; तो कहना चाहिये कि मन्त्र पढ़कर जल पृथिवीपर क्यों डाला गया? यदि जीवितोंका शोधन करना था; तो उनके शरीरपर ही जल फेंकना चाहिये था! ( २ ) यहां पर ' पितरः ' यह बहुवचन है; तब बहुतसे पितर हाथमें रखे थोड़े से जल से शुद्ध कैसे हो सकते हैं? ( ३ ) और जीवित पितरोंके शोधनार्थ यज्ञोपवीत के बाएं करने ( अपसव्य, दाहिने कन्धे पर करने ) का तथा दक्षिण दिशा में मुंह करनेका क्या तात्पर्य है? क्या अपसव्य तथा दक्षिणाभिमुख मुख न करने से जीवित- पितरोंकी शुद्धि नहीं होती? ( ४ ) आपके जीवित - पित्तर दक्षिणसे भिन्न दिशा में क्यों नहीं बैठते? ( ५ ) स्वा. द. जी ने अपने यजुर्वेदभाष्य ( १६ अध्याय ) में इस मन्त्रकी व्याख्या यों की है - ' हे विद्वानो! आप लोग शुद्ध होकर हमको शुद्ध कीजिये ' । क्या स्वामीजीके अनुयायी बता सकते हैं कि - भूमिपर जल डालकर उन्होंने भूमिको शुद्ध किया, वा पितरोंको शुद्ध किया! और पितरोंने उन्हें किस विधिसे शुद्ध किया? ( ६ ) आप लोग विद्वानोंको ही देवता मानते हैं । यदि पितरोंका भी देवता अर्थ मानते हैं; तब देवता और पितरोंका क्या भेद रहेगा? यदि दोनों में भेद नहीं है; तो पञ्चमहायज्ञमें देवयज्ञ और पितृयज्ञमेंसे एकको हटा देना चाहिये । यदि हटा दो गे; तो ' पञ्चमहायज्ञ ' में ' प ' संख्या भी हटाकर ' चतुर्महायज्ञ ' शब्द रख दें | यदि श्रृद्धासे किये गये कर्मका नाम ' श्राद्ध ' हैं; तो क्या अतिथियोंकी भोजन आप, बिना श्रद्धा के देते हैं? यदि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रद्धासे देते हैं; तब पितृयज्ञ ( श्राद्ध ) तथा अतिथियज्ञमें भेद रहा? यदि नहीं रहा, तो पञ्चमहायज्ञों में पितृयज्ञ क्या । अतिथियज्ञों को भी पृथक् - पृथक् मत गिर्ने; तब ' त्रिमहायज्ञ तथा । ' | जारी करें । ( ७ ) यदि कहा जावे कि - ' पितृ ' पदसे जल, अग्नि वा सूर्यकी । किरणोंका ग्रहण है; तब उत्तर देना चाहिये कि जलके पृथिवी पर डालनेसे इनको क्या लाभ? तब जनेऊ दाहिने कन्वेयर करने तथा दक्षिण मुंह करनेका क्या उत्तर है? आप लोग जोकि इन्हें शुद्ध करते हैं, तब क्या पहले यह अशुद्ध थे १ जिन मृतक तथा दिव्य पितरोंका शास्त्रानुसार दक्षिण दिशासे सम्बन्ध है, और जिनका सारा कृत्य जनेऊ बाएं करके करने का शास्त्रों में निर्देश है; जिससे वे यहां सूक्ष्म होनेसे खिंच आते हैं; और सूक्ष्मतावश थोड़ेसे जलसे भी जिनका संस्कार वा तर्पण हो जाता है, क्या यहां उन पितरोंका ग्रहण नहीं? ( गो. य. कु. सु. ) ( ख ) गोभिलगृह्यसूत्र में कहा है- ' सव्यं बाहुमुद्धृत्य शिरोऽन-धाय दक्षिणांसे प्रतिष्ठापयति, सव्यं कक्षमन्ववलम्बं भवति, एवं प्राचीनावीती भवति ' ( १।२ ३ ) यह प्राचीनावीती ( अपसव्य ) की परिभाषा है । उसके आगे कहा है- ' पितृयज्ञे त्वेव प्राचीनावीती भवति ' ( १ | २ | ४ ) अब यहां पितरोंके कार्य में जनेऊ अपसव्य ( दाहिने कन्धे पर अर्थात् बाएं ) करना पड़ता है । और ' पितृ ' शब्द श्राद्धप्रकरणमें ‘ मृतपितरों ' का वाचक है - यह ' आलोक ' के चतुर्थ-पुष्पमें बताया गया है, कुछ अग्रिम पुष्पमें बताया जायगा; वव An eGangotri Initiative
पृष्ठ 225
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) यह अपसव्यता मृतकपितृकर्म में ही सिद्ध हुई । इस कारण ' शतपथ ब्राह्मण ' में मनुष्यसे भिन्न ही पितरोंके लिए कहा गया है — ' अथैनं पितरः प्राचीनावीतिनः सव्यं जानु आच्य उपासीदन् ' ( २ | ४ | २ | २ ) इसीलिए मृतकपितृकर्म भी प्राचीनावीती ( अपसव्य ) होकर करना पड़ता है । इसी कारण ' आपस्तम्बगृह्यसूत्र ' में भी कहा है- ' अपरपक्षे ( कृष्णपक्षे ) पित्र्याणि प्राचीनावीतिना ' ( १ | १ | ७-८ ) | आश्वलायन-श्रौतसूत्रमें भी कहा है – ' तेषां दक्षिणत उत्तानांङ्गुलीः करोति, • प्राचीनावीती तूष्णीम् – ' स्वधाः पितृभ्यः ' इति वा ( २।३ ) । वैखा-नसगृह्यसूत्रमें भी कहा है- ' प्राचीनावीती पित्र्याणि करोति ' ( १ । ४ ) । इसमें प्राचीनावीतीका यह लक्षण है - ' दक्षिणहस्तमुद्द्धृत्य उपवीतं धारयेद् - इति उपवीती । वाममुद्धृत्य प्राचीनावीती । कण्ठ - सक्त निवीती भर्वात ' ( वैखानसगृ. ११५ ) ' सव्ये प्राचीन आवीती ' ( मनुस्मृति २ ( ६ ) ' सव्ये प्राचीनावीतीति ' ( ब्राह्यायण-गृ. ११११८ ) ' कौशं सौत्र वा त्रित्रिवृद् यज्ञोपवीतम् आनाभेर्दक्षिणं बाहुमुद्धृत्य सव्यमवधाय शिरोऽवध्यात्, विपरीतं पितृभ्यः ' ( बोधायनधर्म. १ | ८ | ५-६ ) । ( ग ) यदि पितर, या मनुष्य या देवता भिन्न - भिन्न योनि वाले न होते; तो ' निवीतं मनुष्याणां प्राचीनावीतं पितॄणाम्, उपवीतं देवानाम् ' ( मीमांसादर्शन ३ | ४ | १ ) यह शास्त्रों में उनकी क्रिया में भेद न होता । ' प्राप्त एवार्थो यन्निवीतं मनुष्याणाम्, निवीतं हि मनुष्याः प्रायशः स्वार्थं कुर्वन्ति ' ( मीमां. ३ | ४ | २ ) यदि ऐसा है; CC - 0. Ankur Joshi Collection आर्यसमाजका श्राद्ध तथा यमराज [ ४२३ तो पितृकर्म में प्राचीनावीतिताके विधानसे पितर मनुष्योंसे भिन्न सिद्ध हुए । मृतक ही इस लोकसे पितृलोक जाकर भिन्न योनि प्राप्त करके ' पितर ' कहे जाते हैं, अतः पितृ - कर्म उन्हींका सिद्ध है, जीवित- पितरोंका नहीं; नहीं तो उसमें निवीतित्वका आदेश होता, परन्तु पितरों के लिए तो कहा है - ' यत् तावद् उपवीतं देवानामुपव्ययते ' इति, तत् प्रकृतयोर्दर्शपूर्णमासयोरुपवीतं विदधाति । यत् प्राचीनावीतं पितॄणामिति, तत् पितृप्रधा कर्मण प्राचीनावीतं विदधाति ' ( मीमां. शावर. ३।४७ ) ' निवीत-मयोग्यं देवकर्मरिण दर्शपूर्णं माससंज्ञके, मनुष्याणां ( ऋपिप्रभृतीनां ) हि तत् । तथा प्राचीनावीतं पितॄणां न देवकर्मणि । उपवीतं ( सव्यं ) तत्र ( देवकर्मणि ) योग्यम् ' ( मीमां. शाब. ३ । ४ । ६ ) । इसीलिए ही ' उपवीतं लिङ्गदर्शनात् ' ( ३ | ४ | ६ ) इस मीमांसाके सूत्रमें प्राप्त वृत्तिकारके सूत्रके वार्तिकमें ' मृताग्निहोत्रे हि पितृदेवत्ये श्रूयते, प्राचीनावीती दोहयते, यज्ञोपवीती देवेभ्यो दोहयते ' यहां पितृदैवत कर्ममें ' मृत ' शब्द स्पष्ट सुनाई पड़ रहा है । ( घ ) प्रथम - सत्यार्थप्रकाशमें स्वा. द. जीने कहा है- जैसे ' वाम - स्कन्धके ऊपर यज्ञोपवीत सदा रहता ही है; परन्तु उस यज्ञोपवीतको दाहिने हाथ के अंगूठा में लगा ले, इस क्रिया के करनेसे द्विजोंका नाम ' उपवीती ' होता है । सो सब देव - कर्मों को ' उपवीती ' होके करे । पूर्वाभिमुख होके देव - तर्पण करें । और देव-तीर्थसे कण्ठमें जब यज्ञोपवीत रखें, और दोनों हाथके अंगुष्ठा में यज्ञोपवीतको लगा देनेसे द्विजों की ' निवीती ' संज्ञा होती है । Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 226
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२४ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( 2 ) ब्राह्मतीर्थसे उत्तराभिमुख होके ऋषितर्पण करना चाहिये । और दक्षिणस्कन्धमें यज्ञोपवीत रखे, और वाम अंगुष्ठमें यज्ञोपवीत लगानेसे द्विजोंका नाम ' प्राचीनावीती ' होता है । दक्षिणाभिमुख, प्राचीनावीती और पितृतीर्थसे पितृ - कर्म तर्पण और श्राद्ध करना चाहिये । देवतर्पण में एक बार एक मन्त्र पढ़के एक अंजलि देवे, ऋषितर्पण में दो बार मन्त्र पढ़के दूसरी अंजलि देवें और पितृतर्पण में एक बार मन्त्र पढ़के एक अञ्जलि देवे, दूसरी बार मन्त्र पढ़के दूसरी अञ्जलि देवे, और तीसरी बार मन्त्र पढ़के तीसरी अञ्जलि देवे ' ( प्र. स. प्र. ३ समु. पृ. ४३ ) ( घ ) इस प्रकार जहां मृतक पितृकमें अपसव्य बताया गया है, वहां उसमें दक्षिणमुख करना भी कहा है । जैसेकि - ' दक्षिणतः पितृलिङ्ग ेन प्राचीनावीती अवाचीनपाणिः कुर्यात् ' ( आपस्तम्ब-धर्मसूत्र २ | ४ | ५ ) ' यत् प्राङ् तद् देवेभ्यो, यद् दक्षिणा तत् पितृभ्यः ' ( शत. १४।२।२।२८ ) ' एतस्यां ( दक्षिण दिशायां ) ह दिशि पितृलोकस्य द्वारम् ' ) शत. १३ | ८ | १ | ५ ) इन प्रमाणोंसे मृतपितरोंका दक्षिण-दिशासे सम्बन्ध है । इस प्रकार जब उन मृत पितरोंका आत्मा दक्षिणकी ओर जो उनका द्वार है - मुख करनेसे तथा जनेऊ के बाएँ करनेसे दिये हुए पदार्थोंके सूक्ष्म अंशसे तृप्त हो जाता है, जैसेकि वेद में इसके बीज मिलते हैं - ' तेभ्यो | मृतेभ्यो ] घृतस्य [ जलस्य ] कुल्या एतु मधुधारा व्युन्दती ' ( श्र. १८ | ४ | ५७ ) ' सर्वोन तान् अग्ने! आवद्द पितॄन हविषे अत्तवे ' ( अथर्व १८।२।३४ ) ' जीवो मृतस्य चरति स्वधामि: ' ( ऋ. १ | १६४ | ३० ), तब उनके CC - 0. Ankur Joshi Collection आर्यसमाजका श्राद्ध तथा यमराज नामसे दिये हुए जलसे भी उनका शोधन सम्भव थोड़ा जल भी सूक्ष्म हो जाने से सूक्ष्म- पितरोंके लिए है, क्योंकि पर्याप्त शाली हो जाता है । प्रतिपक्षियोंसे माने हुए जीवित-पितरोह कि • लिए तो यह सभी कुछ अनुपपन्न तथा व्यर्थ हो जाता जीवितश्राद्ध भी निरुपपत्तिक हो जाता है । है; श्र उन सभ २ स्वा. द. जीकी संस्कारविधि - नामकरणप्रकरण रह में लिखा है- ' जिस तिथि, जिस नक्षत्र में बालकका ( पृ. ६ ) उस तिथि और उस नक्षत्रके नामसे तथा उस नामसे घृतकी आहुति अग्निमें दें ' | उस पृष्ठकी वास्या तिथिके तथा मघानक्षत्रके देवता पितर उसमें प्रश्न हैं-( १ ) अमावास्या - तिथि तथा मघानक्षत्रके जीवित मनुष्य हैं; या भिन्न योनिवाले? यदि जन्म तिथिके देवता टिप्पणी में घर भोज बताये गये है । आ फल देवता पिटा कहा जावे दि नाभ भिन्न योनिवाले; तो अग्नि में घी की आहुति देने से उनकी बुर । कैसे होनेसे मृतकश्राद्ध सिद्ध हो ही गया । ( २ ) यदि कहा जाये हि आप अमावास्या - तिथि तथा मघाके देवता पितर जीवित- मनुष्य । आ हैं, तब उनका अमावास्या तिथि तथा मघा के साथ क्या सम्बन ( ७ ) है? क्या वे अन्य तिथियों में भाग जाते हैं? यदि नहीं; तबरे जीव अन्य तिथियोंके देवता क्यों नहीं माने गये? यदि अन जब तिथियोंमें वे घृतकी आहुति नहीं पाते; तो २६ दिनोंमें भूते । है? रहते हैं क्या? ( ३ ) यह जीते मनुष्य बिना कुछ अन्य वस्तु खारे मृववि आहुतिमात्रसे कैसे तृप्त हो जाते हैं? क्या अमित चतुथ Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 227
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
] श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) ४२६ है, क्यों इनसे भूखे जीवित पितर तृप्त हो जाते हैं? यदि ऐसा है, तो रविवारमें हवन हुए आयसमाजी फिर घरमें भोजन न च- पितरो किया करें? उनके मुखमें सभी जीवित रहता है, जो 1 जन्म हे प्रतिपक्षियोंके के देवनारे आवश्यकता भोजनको नहीं गये हैं । आज्ञा ही ऐसी फल क्या है? ( ६ ) यदि र्याद उसमें जीवित्तोंकी तृप्ति ही लक्ष्य थी; तो घी डालना चाहिये था । उस एक घीकी आहुतिसे पितर यदि तृप्त हो जाते हैं; तो क्या उन्हें अजीर्णं एक ही आहुति से तृप्त हो जाते हैं? ( ४ ) यदि पितर जीवित मनुष्य हैं; मन्त्र- पाठकी क्या है? क्या बिना मन्त्र पढ़े वा स्वाहा किये वे पचा सकते? ( ५ ) यदि कहा जावे कि - वेदकी है; तो आपके तके प्रधान सम्प्रदाय में इस आज्ञाका कहा जावे कि यहां पितर ही ऋतु हैं; तव ऋतु जावे कि नामसे आहुतिका क्या फल है? ऋतुएँ अमावास्याकी देवता उनकी कैसे हैं! क्या वे ऋतुएँ अन्य तिथियों में नहीं होतीं? क्या ऋतुएँ आपसे दिये हुए घीको खा लेती हैं? मन्त्र पढ़ने से क्या वे - मनुष्य आ जाती हैं? और मन्त्र न पढ़नेसे क्या वे लौट जाती हैं? या सम्बन ( ७ ) पर्याप्त प्रयत्न करनेपर भी क्या प्रतिपक्षी इन पितरोंको हीं; उबरे जीवित सिद्ध कर सकते हैं? ( ८ ) अथर्ववेदसं. ( १८ | ४ | ५७ ) में यदि अन जब मृत पितरोंके नामसे घृत - प्रवाहके डालने से उनकी तृप्ति लिखी नोंमें भूले है? हमारी अमावास्या जबकि - चन्द्रलोकके ऊपर प्राप्त हुए हमारे - वस्तु खारे मृतपितरोंकी आत्माका मध्याह्नकाल है; यह हम ' आलोक'के भि चतुथ - पुष्प में पितरोंका समय - विभाग दिखलाकर सिद्ध कर चुके CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रार्यसमाजका श्राद्ध तथा यमराज [ ४२७ हैं तो क्या अमावास्या के पितर मृतक सिद्ध न हुए? ३. स्वा.दु.जीकी संस्कारविधिके बलिवैश्वदेवप्रकरण ( २१३ पृष्ठ ) में लिखा है- ' पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नम: ' इससे दक्षिण-दिशामें क्षार और लवणान्न छोड़कर बने हुए पाकसे एक पत्तल वा थाली में भाग धरना । यदि भाग घरने के समय कोई अतिथि आजाय; तो उसीको दे देना, नहीं तो अग्निमें घर देना ' । यहाँ प्रष्टव्य है कि - ( १ ) यहाँ ' पितृ ' पदसे जीवितका ग्रहण है या मरों का? या किरण ऋतु आदिका ग्रहण है? यदि जीवितोंका; तो जीवित- पितरोंके नामसे दक्षिण - दिशामें रखा हुआ अन्न अतिथिको देनेसे वा उसे तृप्त करनेसे या अग्निमें डालनेसे क्या जीवित - पितरों की तृप्ति होती है? यदि नहीं; तो आप यह व्यर्थ कर्म क्यों करते हैं? यदि कहा जावे कि - जीवित-पितरोंके नामसे अतिथिको खिलानेसे, वा उस पाकको अग्निमें डालने से, हमारे जीवित- पितरोंकी तृप्ति होती है; तो एकके भोजनसे दूसरेकी तृप्ति हो जाना क्या आपने नहीं माना? क्योंकि वह भोजन खाया तो अतिथिने; वह विष्ठा भी बन गया; तब उससे आपके जीवित- पितरोंकी तृप्ति कैसे हुई? यदि आपने एकके भोजनसे दूसरेकी तृप्ति स्वीकार कर ली; तो मृतक-पितरोंके नामसे ब्राह्मणादिके भोजनसे आप क्यों घबराते हैं? ( २ ) पितरोंके पाकको दक्षिणदिशा में रखने से क्या यह कर्म मृतकों का सिद्ध नहीं हुआ? आपके जीवित पितरोंका मृतकोंके पति यमराजकी दक्षिण दिशा से क्या सम्बन्ध है? ( ३ ) यदि कहा Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 228
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२८ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) जावे कि- ' पितृ ' पदसे ऋतु, किरण आदि गृहीत होते हैं; तो ऋतु-आदिके नामसे अतिथिको खिलानेसे क्या लाभ? इनका भाग दक्षिणदिशा में ही क्यों रखा गया; क्या ऋतुएँ दक्षिण दिशा में ही रहती हैं? ( ४ ) यदि यहाँ ' पितृ ' पदसे जीवित माता - पिता-आचार्य आदि लिये जाते हैं; तब उनका भाग उन्हींको खिलाना उचित था; अतिथिको क्यों खिलाया जाता है? ( ५ ) दयानन्दी लोग रक्षकों को भी पितर मानते हैं; तब तो आर्यसमाजियोंके पितर बहुत हो जायँगे । एक पिता पैदा करने-वाला लिया जायगा, दस पिता नियोगके भी होंगे, इस प्रकार ११ पितर बढ़े । और फिर पितामह, प्रपितामहों का भोजन भी आदिष्ट किया गया है । तब जितने पिता होंगे; उतने ही पितामह तथा प्रपितामह होंगे । इनकी स्त्रियाँ भी माता, पितामही, प्रपितामही इत्यादिको खिलाना लिखा है । सत्यार्थप्रकाशके ४ थें समुल्लासके अनुसार पण्डित, वैज्ञानिक, व्यापारी, वैद्य, श्रमादक-भोजन करनेवाले, घी - दूध आदि खानेवाले, न्यायाधीश आदि अन्य पितर भी होंगे । इस प्रकार न्यूनसे न्यून सौ पितर बनेंगे । संस्कार - विधिमें ‘ ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः ' इत्यादि मन्त्रसे पितरोंके नामसे भोजनका एकभाग दक्षिणदिशा में रखा जाता है; तब उक्त पितरोंकी फौज उस थोडेसे अन्नसे कैसे तृप्त होगी? ( ६ ) यदि कहा जावे कि हम इनकेलिए दूसरा प्रबन्ध करते हैं, तों स्मरण रखना चाहिये कि - प्रत्येक गृहस्थको यह नित्यकर्म आदिष्ट किया है; तब सर्वसाधारण वा गरीब लोग इस कर्म को कैसे CC - 0. Ankur Joshi Collection आर्यसमाजका कर सकेंगे? यदि वे न कर सकें; वा स्वा.द.जी की आत्माको? इससे सिद्ध है कि यहाँ किन्तु यहाँ मर चुके हुए और ऐसी प्रक्रिया से वे इस लोकमें श्राद्ध तथा यमराज ४३ उस पापका फल निर्धन को ि ( गो. य. कु. भू. ) चुके जीवित- पितरोंका सिरि प्रहण नहीं पितृलोक में गये हुओंका आकृष्ट हो जाते हैं नहीं पूर्वजोंने अनुभूत किया था । जैसे कि आजकल पर यह लोकांन स पड़ विशारद मृतकोंको विशेष - वस्तुओं द्वारा बातचीतकेलिए हुए प्रकर हैं, वैसे हमारे पूर्वज शुष्क - संवाद के लिए तो नहीं; किन्तु तृप्तिकेलिए उक्त प्रक्रिया से विद्वान - ब्राह्मण के माध्यम से थाल बुलाते थे । वे सूक्ष्म जीव होनेसे हमारे जीवात्मा की कोई स्थूल - भोजन के सूक्ष्म अंशसे भी तृप्त हो जाया करते हैं; क्यों घर वे पितर एक देव - विशेष होते हैं, जैसे कि - ' अष्ट विकल्प है लिख इस सांख्यतत्त्वकौमुदीकी ५३ कारिकाके अनुसार पि जाए देव - सर्गके अन्तर्गत होता है । और देवताओंके अशन ( मोक्ष ) देते केलिए कहा गया है- ' न वै देवा अश्नन्ति, न पिर्यान्त, एक अमृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ' ( छान्दो. ३ ६ १, ३ ६ १ ) ' देवता ले समा खाते - पीते नहीं; वस्तुका अमृत ( सूक्ष्म अंश ) देखकर अनु जाया करते हैं । सो मृतकपितृश्राद्ध में सोपपत्तिकता होनेसे सं ठीक है । जीवितों की सेवा तो होती है; पर उनका नाम श्र न्याय यह विशेष कम नहीं माना जाता । न उनका कोई दक्षिदर नौकर वा अपसव्य जनेऊसे कोई सम्बन्ध होता है । न उनका मानि दिशा वा पार्वणश्राद्धसे कोई सम्बन्ध है । Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 229
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ४३० ] आर्यसमाजका यमराज । नौको सि स्वा. दयानन्दजीके लेखसे ही हम मृतक - श्राद्ध सिद्ध कर चुके अब हम उन्हीं के लेखसे मृतकपितरोंके पति यमराजक सिद्धि, करते हैं । स्वा. द. जीने यमराज से भी अपने बचाव के लिए हण नही काह भिन्न अर्थोकी कल्पना बहुत स्थानपर की है; पर सफलता प्राप्त ई - यह नहीं की । अन्ततः यमराजको माननेकी फाँसी गले में बलात् पर लोकशि पड़ ही गई है । स्वामीने अपनी संस्कारविधिके बलिवैश्वदेवके केलिए प्रकरण में २१२-२१३ पृष्ठोंमें लिखा है— बु किन्तु १ ‘ औं सानुगाय यमाय नम: ' इस मन्त्रसे एक पत्तल वा उन् ध्यमसे थाली में दक्षिण दिशा में भाग धरना । यदि भाग धरनेके समय मा की म कोई अतिथि आ जावे, तो उसीको दे देना, नहीं तो अग्निमें हैं; क्यों घर देना ' । इस प्रकार ' सत्यार्थप्रकाश ' ( ६२ पृष्ठ ) में भी स्वामीने कल्पो लिखा है । यदि सनातनधर्मसे माने हुए यमराजको न माना पितृ; तो बहुत सी अनुपपत्तियाँ आती हैं । हम उनका विवरण शन ( मो देते हैं । ' आलोक ' - पाठक देखें । इसमें प्रश्न हैं-न्ति, एव ( १ ) ' सानुगाय यमाय नमः ' यहाँपर ' यम ' पदसे आय-' देवता ले समाजियोंको क्या इष्ट है? ( २ ) यदि स. प्र. के ४ समु. ६१ पृष्ठके नकर तृत अनुसार यम न्यायाधीश ( मैजिस्ट्र ेट ) का नाम है; तो उसका होनेसे गं बलि - वैश्वदेवसे क्या सम्बन्ध? ( ३ ) क्या सानुग ( नौकरों - सहित ) नाम न्यायाधीश बलिं गृह में फीका भोजन करने आते हैं? क्या - दक्षिण नौकरों - संहित ' वह एकप्राससे तृप्त हो जाते हैं? ( ४ ) दक्षिण-नका मानि दिशामें वह अन्न क्यों रखा जाता है? क्या मैजिस्ट्रेट दूसरी श्रायैसमाजका श्राद्ध तथा यमराज [ ४३१ दिशामें नहीं खाता? ( ५ ) क्या एक पात्रमें मैजिस्ट्रेट नौकरोंक साथ इकट्ठा होकर नौकरोंकी जूठन खाता है, और तृम हो जाता है? ( ६ ) यह सब समाजियोंके लिए नगरोंमें नित्यका कर्म है । प्राय: ५-६ मैजिस्ट्रेट रहते हैं; तब नौकरों सहित मेंजिस्ट्र ेट क्या एक ग्रास भोजनके लिए घर - घर में घूमते रहते हैं? तब प्रजाका न्याय उनकी घोरसे श्रायप्रतिनिधिसभा या निराकार - भगवान्? ( ७ ) जिस गांव में मैजिस्ट्र करती है, वहांके दयानन्दी ेट नहीं रहते; कैसे करते हैं । ( ८ ) यदि कहा जावे कि - संस्कारविधिके मैजिस्ट्र ेटको तो नहीं खिलाया जाता अनुसार यह ग्रास ; किन्तु अतिथिको; तो यह तो असभ्यता हुई कि न्यायाधीशके नाम रखा हुआ अन्न अतिथि-को खिलाया जावे? ( ६ ) न्यायाधीशके नामसे रखा हुआ यदि अतिथिको खिलाया जावे; तो क्या न्यायाधीश भोजन जावेगा? ( १० ) यदि ' यम ' यह यहां वायुका तृप्त हो तो वायु देवताका अन्न अतिथिको नाम कहा जावे; क्यों दिया जाता है? क्या वायु दक्षिणदिशा में ही रहती हैं, अन्य दिशामें नहीं? वायुके अनुग ( नौकर ) कौन हैं; क्योंकि - सानुग यसको ग्रास दिया गया है । ( ११ ) यदि ' यम ' यह परमेश्वरका नाम कहा जावे; तो क्या ईश्वर उस ग्रासको खाता है? क्या वह दक्षिणदिशा में ही रहता है? तब आप ऐसा करते हुए अपनेसे निन्दित किये जाते सूर्तिपूजकों से कैसे भिन्न हैं? हुए ( १२ ) यदि ' यम ' यह दिनका नाम है; तब दिनके नौकर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 230
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४३२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) कौन हैं? क्या दिन दक्षिण दिशामें रहता है? तब तो अन्य दिशाओं में रात होती होगी? दिनका अन्न अतिथिको देने से दिनको क्या लाभ १ ( १३ ) ' यम ' यह यदि समयका नाम है; कहना चाहिये कि समय के नौकर कौन - कौन हैं? तब दक्षिण में कैसे रहते हैं? उसके नामसे प्रास देनेवाले आप अपने सिद्धान्तानुसार वैदिक धर्मी कैसे हैं? ( १४ ) यदि ‘ यम ’ शब्दका अर्थ ' धर्म ' है, या सूर्य, अथवा वायु, या मृत्यु; उसपर भी प्रतिपक्षियों पर पहलेकी भांति प्रश्न उपस्थित होते हैं । ( १५ ) अथवा ' यम ' शब्दका अन्य अर्थं भी किया जावे; तो पहले उसके नौकरोंके लिये सोचना पड़ेगा, फिर उनका सम्बन्ध दक्षिण दिशा से सिद्ध करना पड़ेगा; तब ही उसे अन्न देना उपपन्न होगा । फिर भी उसे न देकर अतिथिको देने से एक के खाने से दूसरेकी तृप्ति माननी पड़ेगी । २. संस्कारविधिके अन्त्येष्टि - प्रकरण ( २६४ पृष्ठ ) में यमाय स्वाहा, अन्तकाय स्वाहा, मृत्यवे स्वाहा, ( ५७-५८-५६ ) इन तीन मन्त्रोंसे शवके ऊपर घृतका फेंकना बताया है । उसमें प्रश्न हैं— ( १ ) यहाँ ' यम ' पदंसे क्या इष्ट है? यदि ' मैजिस्ट्रट ' अर्थे है; तब श्मशान में उसकी क्या आवश्यकता? उसका नाम लेकर शव पर घी डालने में क्या लाभ है? और ' स्वाहा ' शब्दकी क्या आवश्यकता है? ( २ ) यदि ' यम ' पदसे ' वायु ' इष्ट है; तब मन्त्र पढ़ते हो? यदि वायुको ही शुद्ध करना था; तो घी डाल देना ही काफी था । क्या मन्त्रपाठके बिना वायु शुद्ध नहीं होती? CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रार्यसमाजका श्राद्ध तथा यमराज ४३४ या घी की धारा रुक जाती है? लोग किसी मन्त्रमें यमका ' वायु ' अर्थ भले ही ' तो वायु नहीं । वायु अर्थ कहीं हो जानेपर हो; पर ' वैल भिन्न - देवविशेष यमकी स्वतन्त्र - सत्ता हटाई भी अन्तरि पृथु ( विस्तीर्ण ) होनेके कारण नहीं जा सकती । आकाशका नाम पृथिवी श्री जब सकता है; पर क्या इससे आकाशसे पृथक् पृथिवीको जावेगा? क्या ' यमस्य दूतौ चरतौ जनाँ अनु ' ( अथवं मानान्दो तब पर तुङ्गनासिक ( ऊँची नासिकावाले. १८२/१३ ) , असुतृप्त ( प्राणोंसे होनेवाले ) यमके दूत क्या वायुके ही हैं? क्या ' यो समर स प्रथमो मर्त्यानां ' ( अथर्वे. १८/३/१३ ) यहाँ यमका अर्थ बाबु सकता है? क्या वह मनुष्यों में पहले मरा था? इस प्रचर अथर्ववेदके ( १८ | ३ | ६६ ) मन्त्रमें ' तिलमिश्रित हव्यका यमराज श्रनुमोदन करे ' क्या यहाँ वायुका अर्थ सम्भव है? र्याद वायुके पास पितरोंका निवास मानें, तो क्या बा उत्तर- दिशा में नहीं रहती? तब यम - वायुकी दक्षिण में स्थिति क्यों कही गई है? इससे यमके वायु- अर्थ में बहुतसी अनुर पन्नताएँ आती हैं । तब स्वा. दु.जी वा उनके अनुयायियों यह व्याजमात्र है । यदि श्मशान में शव के परमाणुओंके शोधना शवके ऊपर हवनका आपका उद्देश्य हैं; तब घर की टट्टियों में उनके परमाणुओं के शोधनार्थं उस स्थान के ऊपर, गली में रखे हुए म्युनिसिपलिटीके कूड़े के पीपोंमें समन्त्रक हवन आप लोग क्यों नहीं करते? जैसे शव के ऊपर वायुके नामसे हवन आप स ० ध ० २८ Gujara An eGangotri Initiative