सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 281–290
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 281–290
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ५३० ] ५२६ भी निषिद्ध होगया; तब इस मन्त्र में सुधारकों का सीका विधवाविवाह भी कैसा? यदि यहाँ ' कुमारी ' शब्द ' प्रथम-सीका विविवाह वयोवाचक ' है, तो १७-२४ वर्षीय कन्याका प्रतिपक्षिसम्मत ' उप ' विवाह खण्डित होगया । ‘ सेयमुभयतः - स्पाशा रज्जुः ’ । है, जैसे स्वा. द. जीने - सरपर छल किया अर्थ करते हुए भी हैं । अर्थ भी देखें | -हैं; ' हे विधवे नारि नाका ' स.प्र. ' में ' उदीर्ध्व नारि ' मन्त्रके अर्था-है, वैसे ही ऋ.मा.भू. में स.प्र. से मिन्न छलको नहीं छोड़ा । पाठक उनका वहाँका ! ( एतं गतासु ) गतप्राणं मृतं विवाहितं पतिं त्यक्त्वा (? ) [ यहाँ भी स्वामीने ' त्यक्त्वा ' शब्द वेदमन्त्रार्थमें प्रक्षिप्त कर दिया, वह मूलमें सर्वथा नहीं है ] ( अभि जीवलोकं ) जीवन्तं देवरं द्वितीयवरं पतिं ( एहि ) प्राप्नुहि [ यहाँ पर ' जीवलोक ' यह ' एहि ' क्रियाका कर्म ही नहीं है, किन्तु ' अभि ' का कर्म है ] ( उपशेषे ) तस्यैव सन्तानोत्पादनाय वर्तस्व [ सत्यार्थ-प्रकाशमें ' शेषे ' को ' सुप् ' बनाकर उसका स्वामीने ' बाकी ' अर्थ किया था, ' उप ' उपसर्गको ' एहि ' से जोड़ दिया था, यहाँपर भी सुप्का वैसा अर्थ कर दिया; और लिट् लकारके प्रयोगका त्र लोट् - लकारका अर्थ कर दिया; ' धातुका जो ' शयन ' अर्थ था; उसे छिपाकर ' वर्तस्व ' यह निर्मूल अर्थ कर दिया ' सन्तान ' अर्थ ! भी बीच में प्रक्षिप्त कर दिया ] ( हस्तग्रामस्य ) तत्सन्तानं (? ) य- विवाहे सङ्ग्रहीत (? ) हस्तस्य पत्युः स्यात् । [ यहाँ सत्यार्थप्रकाश-ब से विरुद्ध ' हस्तग्राभ ' से मृतक पति लिया है, दूसरा पति नहीं; CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग वा विधवाविवाह [ ५३१ परन्तु ' तत् सन्तानं ' ' इस अविद्यमान भी शब्दको बीचमें प्रक्षिप्त कर दिया । ' सन्तान ' इस पुलिङ्ग शब्दको नपुंसकलिङ्गमें बना दिया; ] । यदि नियुक्तपत्यर्थो नियोगः कृतः, तर्हि ( दिधिपोः ) तस्यैव सन्तानं भवेत् [ यहाँ भी स्वामीकी कपोलकल्पना है; क्योंकि - हस्त ग्राम और दिधिषु यह विशेषण मृतक पतिके ही हैं । यदि दोनोंकी भिन्नता होती; तो वीचमें भिन्न करनेवाला ' च ' होता; पर नहीं है, अतः यह अर्थ गलत है, स्वयं वर्धित है ] । ( तवेदं ) इदमेव विधवायास्तव ( जनित्वं ) सन्तानं (? ) भवति [ ' जन ' का अर्थ यहाँ ' जाया ' है, सन्तान नहीं ] हे विधवे! विगतविवाहितस्त्रीकस्य पत्युश्चैतन्नियोगकरणार्थं (? ) विवाहितपतिमरणानन्तरमिमं नियोगमिच्छ ( पद स्वामीने स्वयं प्रक्षिप्त किये हैं; ' उदीर्ध्व ' का ' यह अर्थ वनावटी कर दिया ] तथा ( अभिसम्बभूथ ) कृत्वा सुखसंयुक्ता भव (? ) [ यह शब्द मी कल्पित किये हैं, इसके अतिरिक्त लिट्लकारके अर्थ लोट्लकारका कर दिया, ' सुख - कल्पना ' यहाँ अपनी कपोल - कल्पना है, उनको इन सुखोंका रहता था ] । ) त्वं ( उदी-? ) [ यह सभी नियोगमिच्छ ' सन्तानोत्पत्तिं स्वामीने स्वयं इस प्रयोगका संन्यासीजीकी बड़ा विचार अब हम इस मन्त्रका वास्तविक अर्थ लिखते हैं, इससे -विधवाका नियोग वा विवाह अर्थकी निर्मूलता स्पष्ट हो जायगी । हम ' इयं नारी पतिलोकं वृणाना ' इस अथर्ववेदके मन्त्रसे विधवाका पतिके साथ अनुमरण बता चुके हैं; यह ' उदीर्ष्व नारि ' Gujarat. An eGangotri Initiative
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५३२ ] ' श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) उसके बादका मन्त्र है । जो नारी विवाहित पतिके छोटे - बड़े पुत्रादिका विचार करके पतिके अनुमरणमें समर्थ नहीं, अतः ब्रह्मचर्य एवं संयमसे जीवनयात्राका निर्वाह करना चाहती है; उसके लिए कौशिक-सूत्रानुसार ( ८० | ४५ ) यह दूसरा मन्त्र है । मृतक - पतिके पास वह विधवा जो पूर्वमन्त्रानुसार अनुमरणकेलिए लेटी हुई थी, वहांसे उसे उठानेकेलिए यह मन्त्र है- ' उदीर्ष्व नारि! अभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि । हस्तग्रामस्य दधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वममिसम्बभूथ ' ( अथर्ववेदसं. १८३२ ) यहाँ मृत्युका अधिष्ठाता ' यम ' देवता है - यह हम पूर्व कह चुके हैं । ऋग्वेदसं - में भी जहाँ यह मन्त्र आया है, वहाँ भी मृतकका प्रकरण है, जैसे-' परं मृत्यो! ' ( १०।१८।१ ) ' मृत्योः पदं ( २ ) ' इमे जीवा विमृतैः ' ( ३ ) ' अन्तर्मृत्यु ' दधतां ' ( ४ ) फिर ७-८ मन्त्रसे ' पितृमेध ' देवता है, जिसमें ' उदीर्ष्व नारि यह आठवां मन्त्र है । पितृमेध -मृतककर्मका नाम है, जैसेकि - ' गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेघं समाचरन् ' इस मनुके पद्यमें स्थित ' पितृमेध ' शब्दका अर्थ स्वा. दयानन्दजीने ' दाहकर्म ' ( स.प्र. २ पृ. १५ ) लिखा है । अव ' आलोक ' के पाठक उक्त मन्त्रका अर्थ देखें-हे नारि! - ऐ स्त्री, हस्तग्रामस्य दधिषोस्तव [ अस्य मृतस्य पत्युः ] - तेरे पाणिग्रहणकर्ता तथा तेरे गर्भके वा तेरे निधाता, परन्तु अब मरे हुए पतिका ( हस्तग्राभस्य, दधिषोः - यह दो विशेषरण उसी मृतक पतिके हैं, जो चितामें पड़ा है, जहांसे उसकी स्त्रीको नियोग वा विधवाविवाह ५३४ उठाया गया । पहले हम बता चुके हैं कि कौशिकसूत्रानुसार यहाँ मृतक पतिका उद्देश्य किया है । इसका कारण; इस मन्त्रके पूर्वार्ध में ' गतासुम् एतम् उपशेषे ' यहाँ यह है कि हमार मृतक पतिश II अथव वर्णन है कि - ' ऐ स्त्री, जो तू इस मृतक पतिके पास I लेटी हुई है ' । पर स्वामीने इस अर्थके हटाने के लिए अनुमरणार ' यह ' गतासुर | तोय एतम् अपहाय ' इस ‘ अपहाय ’ ( छोड़कर ) शब्दको स्वयं ही भार II कपोल - कल्पना से जोड़ दिया है । हम कह चुके हैं किस II शब्द सन्ता सूक्तका मृतक - कर्म में ही विनियोग है, कृष्णयजुर्वेद ( ते. प्रा. IIवह ६।१ ) में भी यहाँ ‘ पितृमेध देवता ' और अन्त्येष्टि कर्म में विदि भूतस योग माना गया है । आर्यसमाजसे प्रकाशित ऋग्वेदसंहिता लिट् भी इस मन्त्रका देवता ' पितृमेध ' है, और ' पितृमेध ' का घरे III निषेध ‘ अन्त्येष्टि ' है - यह हम स्वाद के प्रमाणसे भी कह चुके हैं । है, तव ‘ हस्तग्राभस्य ' दधिषोः ' यह विशेषरण उस मृत पतिके ही हैं । लिखा इससे उसकी पूर्व अवस्था दिखलाई गई है । अव उक्त मन्त्रश णात अर्थ यह हुआ कि - ऐ हे नारि! - ऐ मृतककी पत्नी!, हस्तग्राभस्य - तुम्हारा अपनी एवं पो जीवित अवस्थामें हस्तग्रहरण कर चुके हुए दधिषोः- धारण सं ग पालन करनेवाले, ( ' धारयितुः ' यह सायणने अर्थ किया है ) न कि त पत्युः - तेरे इस श्रंब मरे हुए पतिके [ यहाँ उस पत्नीके पतिडे क्रिया जीवन - समयका चित्र चित्रित किया गया है ] इदं जनित्वं इस कर दि जायात्व - पत्नीत्वको तू [ जनि स्त्रीका नाम होता है, जैसेकि अशुद्ध ' मंज्ञायां जन्या ' ( ४ | ४ | १२ ) इस पाणिनि - सूत्रके ' जन्या ' शब्दा साम CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) ५३४ ] ] [ सूत्रानुसार अर्थ भी यही है - जनी - वधू, तां वहति - प्रापयति - इति जन्या, यह है कि हमारी मुलतानी भाषामें इसे ' जज ' इसी कारण कहते हैं, क पति श्रथवा ' जनि ' सन्तानका नाम भी माना जावे; तब ' इदं जनित्वं ननुमरणाई ' यह तुम्हारी सन्तान ' यहाँ पूर्वसन्तानका भाव है, नियोग अर्थमें तो यह संगत हो ही नहीं सकता ' इदं जनित्वम् ' इसमें ' इदम् ’ अपनी शब्द सन्तानकी समीपताको बता रहा है; सो नियोगी कोई किस सन्तान तो लाता नहीं; अतः वहाँ ' इदं ' शब्द संगत न होनेसे ( वै. श्री. | वह अर्थ भी संगत नहीं ] अभिसम्बभूथ - प्राप्त कर चुकी [ यहाँपर मैं में विरि भूतसामान्य में ' छन्दसि लिट् ' ( ३ २ १०५ ) इस पारिणनि - सूत्रसे दसंहितामें लिट् है, और ' वभूथाततन्थ ' ( पा. ७ २२६४ ) इस सूत्रसे इट्का का निषेध होगया । अथवा यहाँ परोक्षभूतका भी वर्णन हो सकता है, जैसेकि ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ( पृ. ३७८ ) में स्वा.द.ने नके ही है लिखा है- ' लिटः कानज् वा ' ( ३ | १ | १०६ ) प्रकृतेपि लिटि पुन -क मन्त्रा णात् परोक्षार्थस्यापि ग्रहणं भवति । अव सम्पूर्ण अर्थ यह हुआ कि- ऐ नारी, तू इस मृतक पतिके, जिसने तुम्हारा पाणिग्रहण अपनी एवं पोषण किया था - इस पत्नीत्वको प्राप्त कर चुकी । रण एवं गतासुम् - मृतक, एतं - इस सामने स्थित पतिके पास, उपशेषे जो या है ) कि तू चितामें अनुमरणार्थं लेटी है [ ' उप शेषे ' यह यहाँपर तिङ्-के पति क्रिया है, सुप् नहीं; जोकि स्वा. द. ने इसका अर्थ स. प्र. में ' बाकी ' नित्वं इस कर दिया । इसमें स्वरशास्त्रकी साक्षी से भी स्वाद का उक्त अर्थ जैसे कि- P अशुद्ध है । उक्त मन्त्रमें ' उप शेष एहि ' यहाँपर ' उप ' ( अतिङ् - सुप् ) शब्दा के सामने ठहरे हुए ‘ शेषे ’ इस तिको ' तिङ्ङतिङः ' ( पा. ८ | १ | २८ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection सायण और विधवाविवाह [ ५३५ इस सूत्र से निघात ( सर्वानुदात्त ) हुआ है, वैसा ही ऋग्वेद तथा अथर्व के उक्त मन्त्रके पदपाठ में प्रत्यक्ष है- ' उप ' । शेषे । श्रा । इहि ' । फिर संहिता में ' स्वरितात् संहितायामनुदात्तानाम् ' ( पा. १२/३६ ) इस सूत्र से स्वरितके श्रागे पड़े हुए सभी अनुदात्तोंको प्रचय ( एकश्रुति ) होगया, उदात्तकी भांति प्रचयका चिन्ह भी नहीं होता । इस प्रकार ' शे ' को प्रचय होगया । तब ' पे ' इस अनुदात्तको भी प्रचय प्राप्त था; पर उसके सामने ' ' यह उदात्त है; तब ' उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतरः ' ( पा. १।२।४० ) इस सूत्र से अनुदात्तके चिन्हवाला अनुदात्ततर होगया । तब ' शेपे ' यह स्वर - शास्त्रानुसार तिक्रिया सिद्ध हो जानेसे उसे सुप बनाकर ' इस मरे हुएकी आशा छोड़के बाकी पुरुषोंमेंसे जीते हुए दूसरे पतिको प्राप्त हो ' ( स.प्र. प्र. ७१ ) यह ' वाकी ' का अर्थ करना स्वा. दयानन्दका अशुद्ध - प्रयत्न सिद्ध होनेसे खण्डित होगया । इसलिए स्वाद के अनुयायी भी श्रीतुलसीराम-स्वामी आदिने स्वामीके इस ' बाकी ' अर्थको अशुद्ध मानकर उसका अनादर कर दिया; क्योंकि उसे स्वीकृत वा अनुकृत नहीं किया । ] जीवलोकमभि – अपने स्वामीके जीवोंके लोक- जीवित पुत्त्रोंके संसारको अभिलक्षित करके अर्थात् उनके पालनार्थ उदीप्वं-यहांसे - चितासे उठ, एहि आ । [ यह पुत्रोंवाली मृतककी पत्नीको जो उसके साथ ही चितामें जलकर मरना चाहती थी - कहा जा रहा है । इससे यह भी सिद्ध होता है कि - यहाँ सती - प्रथा Gujarat. An eGangotri Initiative
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५३६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) स्त्रीकी इच्छानुसार थी; उसपर ज़ोर - जुल्म नहीं किया जाता था, उसको जबर्दस्ती नहीं जलाया जाता था - यदि उसे अपने संयम पर, अपने पातिव्रत्य पर विश्वास था, तब उसके जल जानेका प्रश्न ही नहीं उठता । जल जाना भी उसका सतीत्व, और संयम एवं पातिव्रत्यसे उसका जीना भी सतीत्व सिद्ध है ] उक्त मन्त्रका तात्पर्य यह है कि तू अपने पतिकी जनि - जाया हो चुकी । जायाका अर्थ है कि पति स्त्रीमें गर्भ - रूपसे प्रविष्ट होकर फिर नया बनकर दशवें मासमें पुत्र रूपसे उत्पन्न होता है । जैसाकि श्रुति - स्मृतिमें कहा है ' पतिर्जायां प्रविशति गर्भो भूत्वेह मातरम् । तस्यां पुनर्नवो भूत्वा दशमे मासि जायते । तज्जाया जाया भवति, यदस्यां जायते पुनः ' ( ऐतरेय ब्राह्मण ७११४, जाया-यास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः ' ( मनुस्मृति ( 15 ) अब भाव यह हुआ कि - ' ऐ नारी, जायारूप तुममें वह तेरा पति पुत्र रूपसे तुमसे उत्पन्न हो चुका; वह पुत्र तो तुम्हारा है ही, इसलिए अब तुम्हें मरने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि-तुम्हारे पतिका अंशावतार तो तेरे घरमें विद्यमान ही है, तू उसीका संरक्षण कर । इससे पुत्रवती स्त्रीका पतिकी मृत्युमें पत्यनुमरण अनिवार्य नहीं वेताया गया । इस प्रकार इस मन्त्रमें विधवाका अन्य पतिके साथ सम्बन्धका कोई गन्ध नहीं है । धन्य हैं ये प्रतिपक्षी, जो पतिका शव सामने पड़ा है; और वह विधवा ' प्रतिघ्नानाः सन्धावन्तु उरः पदूरावाघ्नानाः । अघा-रिणीर्विकेश्यो रुदत्यः पुरुषे हते ' ( अथर्व ११६ | १४ ) ' प्रतिघ्नाना नियोग वा विधवाविवाह | १३० १३८ मुखी कृधुकर्णी च क्रोशतु । विकेशी पुरुषे हते ' ११ | ६ | ७ ) इस वेदमन्त्रानुकूल अपने प्रियतम पुरुषकी ( अथवं. तब उस छाती पीट रही है, स्यापा कर रही है; कानोंसे जिसने मृत्युसे | बोधाय उतार दी हैं; सिर मुंडवा दिया है, रो - पीट रही है तेल वालियों [ ब्रह्मच बन्द कर दिया है; उसे श्मशान में ठहरे हुए बाकी, लगाना । हि गुर किसीको स्वामीजी स्वामी बना लेनेकेलिए आर्डर पुरुषोंमेंसे । एकपति बलात् अर्थका अर्थ कर रहे हैं! यह बहुत खेदकी दे रहे हैं । । छ अंग्रेज़ - अमेरिकन ' भी मृतककी सूखने देते हैं; बात है । इस ऋ विधबाका विचार करते हैं; पर यहाँ तो श्मशान में ही वैदिक! अर्थ नियोग - विधि पूरी करने केलिए आज्ञा हो रही है । ‘ ममेय एतदादिक मन्त्रोंमें विधवाविवाहकी गन्धमात्र भी न होनेसे में तो ‘ यः कश्चित् कस्यचिद्धर्मो मनुना संप्रकीर्तितः । स सर्वोऽभिदिनो यश्चैव वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( २७ ) इस मनुस्मृतिके तथा ' बेदार्थोंष- ( बृहत्प निबद्धत्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतम् । मन्वर्थ - विपरीता तु वा ( मनु. स्मृतिः सा न शस्यते ' इस बृहस्पतिके वचनसे प्रसिद्ध चारान मनुजीने- ' नौद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते कचित् । न ३ । १६ विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुन: ' ( ६६५ ) ' न द्वितीयश्च ( ३ । १६ मृत साध्वीनां क्वचिद् भर्तीपदिश्यते ' ( ५११६२ ) ' संस्थितं ( मृतकं ) च सज्ञेय न लङ्घयेत् ' ( ५।१५१ ) वेद में विधवाविवाह तथा विधवा - नियोग-विधव की सत्ता नहीं मानी है । उन्हींके अनुसार बृहत्पराशरस्मृतिमें भी कहा है- ' जीवन् वापि मृतो वापि पतिरेव प्रभुः स्त्रियाम माना ' सूर्या ( ४।४८ ) ( जीता हो, चाहे मर गया हो; पति ही स्त्रीका प्रभु है ) दिधि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) ५३८ ] ( अथर्ष. तब उसकी मृत्युमें उसका अन्य प्रभु - कैसे हो सकता है? । मृत्युसे बोधायन - पितृमेधसूत्रमें ( १ | १२ | १० ) ' यावज्जीवं प्रेत- ( मृतक ) पत्नी वालियाँ ] ' विधवाका यावज्जीवन ब्रह्मचर्य कहा है | ' मान्या न लगाना [ हि ब्रह्मचर्यम् गुरवः सर्वे एकपत्न्यस्तथा स्त्रियः ( महा. वनपर्व. २०५।५ ) यहाँ रुपमं से एकपतिका - स्त्रीकी माननीयता कही गई है । रहे हैं. अथर्ववेदके ' दधिषोः ' पदकी तरह ' दिधिषोः ' ( १०११८८ ) बात है । इस ऋग्वेदके पदका भी रक्षण - पोषण आदि रूपसे ' धारक ' ही कहीं श्रर्थ है; क्योंकि- वेद स्त्रीको वर द्वारा ही ' पोष्या ' बताता है— वैदिक! ' ममेयमस्तु पोष्या ' ( अथर्वं • १४। १ ५२ ) । निर्णयसागरीय - ॠ.सं. मैं तो यहाँ भी ' दधिषोः ' ही पाठ है । ' उपपत्याः सुतो यस्तु न होनेसे यश्चैव दिधिषूपतिः । परपूर्वपतेर्जातः सर्वे वर्ज्याः प्रयत्नतः ’ भिहितो ( बृहत्पराशर. ५।३६७ ) ' पौनर्भवश्च कारणश्च यस्य चोपपतिर्गृ'हे ' दार्थोप ( मनु. ३।१५५ ) ‘ यश्चार्येदिधिषूपतिः ' ( ३ | १६० ) एतान् विगर्हिता-तु चारान् अपाङ्क्षयान् द्विजाधमान् ।... उभयत्र विवर्जयेत् ' ( मनु. ३ १६७ ) ' परपूर्वा ( पुनर्भू ) पतिस्तथा । वर्जनीयाः प्रयत्नतः ' ( ३ ( ३ | १६६ ) ' पौनर्भवस्तथा वर्ज्य: ' ( प्रजापतिस्मृति ८३८४ ) ' भ्रातु-् वितीयश्च मृतस्य भार्यायां योऽनुरज्येत कामतः । धर्मेणापि नियुक्तायां तर्क ) सज्ञेयो दिधिषूपतिः ' ( मनु. ३।१७३ ) इत्यादि धर्मशास्त्रोंके वचनमें - नियोग विधवाविवोढा तथा उनके लड़केको निन्दित एवम् अपाङ्क्तेय स्मृतिम स्त्रियाम ' माना गया है । तैत्तिरीयब्राह्मण में भी उसकी निन्दा स्पष्ट है-प्रभु है ) ' सूर्याभिनिम्र क्तः कुनखिनि, कुनखी श्यावदति, श्यावदन् अग्रे-दिधिषौ, अदिधिषः परिवित्ते, परिवित्तो वीरहणि, वीरहा CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और विधवाविवाह [ ५३६ ब्रह्महरिण, तद् ब्रह्महणं नात्यच्यवत ' ( ३३२२८ ( १२ ), यहाँ अग्रे-दिधिषु, परिवित्ति, ब्रह्महत्यारा आदिको पापी कहा गया है । वादिप्रतिवादिमान्य मनुके अनुसार यह अपाक य ( पंक्ति में बैठनेके अयोग्य ) हैं । इनके साथ बैठनेसे एवं उस पंक्तिमें भोजन करनेसे क्या फल मिलता है - यह मनुजीके शब्दोंमें देखिये- ' अपाक ये-र्यदन्यैश्च... तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ' ( ३१७० ) ' अपाक्तदाने यो दातु:... ' ( ३१६६ ) ' भस्मनीव हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ' ( मनु. ३ । १८१ ) ' दिधिषूपपतिर्यः स्याद् अमेदिधिषुरेव च । पूर्वपूर्वस्तु गर्हितः ' ( महाभारत शान्तिपर्व ३४ ४ ) इत्यादि धर्म-शास्त्रीय वचनोंमें पुनर्भू, पौनर्भव, दिधिषू, दिधिषु आदि स्त्री-पुरुषोंकी स्पष्ट निन्दा होनेसे वह कर्म कर्तव्य कोटिमें नहीं आता, यतः अधर्म हो जाता है; तब इनके उपजीव्य वेदमें भी उसकी विधि नहीं आ सकती । इसलिए सुधाव्याख्या में ' दिधिषू ' की व्युत्पत्ति भी यही की गई है - ' दधाति पापम् ' यद्वा - दिधिं धैर्य स्यति - नाशयति ' ( अमर. ६६२३ ) सो धृति धर्मान है जैसेकि -मनुजीने ' धृतिः क्षमा दमः दशकं धर्मलक्षणम् ' ( ६६२ ) यहाँ सब अधर्मोंका मूल कारण अधृति होनेसे ' धृति ' को धर्मके लक्षणोंमें सबसे पूर्व कहा है, यह ठीक भी है; क्योंकि- क्षमा, दम, इन्द्रियनिग्रह, अक्रोध अस्तेय यह सभी धर्म धैर्यको छोड़ देनेसे भङ्गको प्राप्त होते हैं, अतः उस धैर्यके नष्ट करने से भी दिधिषमें अधर्म स्पष्ट है । स्वा. दयानन्दजीने भी अपने उणादि-Gujarat. An eGangotri Initiative
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५४० | श्रीसनातनधर्मां लोक ( 4 ) कोषमें ' दिधिषू ' का यही विग्रह किया है - ' दिधिं धैर्यमिन्द्रिय-दौर्बल्यात् स्यति - त्यजति- इति दिधिषू: ' ( ११६३ ) । इस कारण स्पष्ट है कि- वेद में ' दिधिषु ' का वह अर्थ नहीं है जिसे प्रतिपक्षी करते हैं, क्योंकि वहाँ तो उस मृतक पतिकी ही पूर्वावस्था - धारणपोषणका स्मरण करनेसे उसे दिधिषु, एवं ' दधिषु ' कहा गया है । कोई स्वतन्त्र जीवित - पुरुष वेदके उस प्रकरण में विवक्षित नहीं । प्रतिपक्षि गण वेद में ' दिधिषु ' का रूढ अर्थ कर भी नहीं सकते; क्योंकि वे वेदमें सभी शब्दोंको यौगिक मानते हैं, रूढि नहीं । यदि इस समय वे अपने अशुद्ध पक्षकी सिद्धचर्थ यहाँ ' दिधिषु, पुनर्भू ' आदि शब्दोंका स्मृति प्रसिद्ध रूढ अर्थ ही वेदमें लेते हैं, तो अथर्ववेदसं. के १५ वें काण्डमें ' ब्रात्य ' पूजा आई है, ' ब्रात्य ' मनु ( २।३६-४० ) आदिके अनुसार उपनयन - वेदाध्ययन-हीन ब्राह्मणका नाम है, तब क्या वैदिकम्मन्य प्रतिपक्षी भी उपनयन एवं अध्ययनहीन ब्राह्मणकी वेदानुसार पूजा मानेंगे? यदि ऐसा है, तो वे ब्राह्मणादिवर्णोंकी जन्मसे ही व्यवस्था वैदिक मानें; और गुणकर्मानुसारिणी वर्ण - व्यवस्थाको अवैदिक माननेका उद्घोष अपने समाजमें कर दें । स्मृति आदिमें वा वन्ध्या गायके दानका निषेध है; यदि वे इस प्रकार वेदमें भी वंशाका अर्थ वन्ध्या मान लें; तो अथर्वके वशासूक्त ( १०।१० ) के अनुसार वन्ध्या गायका दान करना भी वैदिक मान लें । अथर्व ( १११७ ) में ' उच्छिष्ट ' का भी वर्णन नियोग वा विधवाविवाह [ ५४१ ५४२ आता है; यदि वे वेदमें भी उच्छिष्टका अर्थ वही स्मृतिप्रसिद्ध ' द्विती ' जूठा भोजन ' - जिसका स्मृतियोंमें निषेध आया है - मानते तब दूसरेकी जूठन भी सेवन करके पूरे वैदिक बने है, विरुद्ध दिन - रात्रि, उषा के लिए ' पुनभू ' ( ऋ. ११६२१८, १ । १२३ ( २ ) । वेदमें लिखे आता है; तब क्या उसे विधवाविवाह करनेवाली शब्द रूढश मान लिया ' अम जायगा? यदि वे ऐसा नहीं मानते; तब वेद में भी ' दिधिपुका स्मृतिप्रसिद्ध अर्थ कैसे लेते हैं! यह उनको पता नहीं कि वेदमे स्वाथ ' इत्याचक्षते परोक्षेण, परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षविद्विषः ' कर उद्यत ( गोपथ. १ | १ | ) इत्यादि कथनानुसार परोक्ष शब्द भी कहे अनुर जाते हैं, उनका लोकप्रसिद्ध अर्थ करना अनिवार्य नहीं होता । मात्र इसके एक - दो उदाहरण भी देख लीजिये-भी निरुक्त दैवतकाण्ड ( ८।२०।१ ) में ' वनस्पते रशनया निय... नाम वहा देवत्रा दिधिषोर्हवींषि ' इस मन्त्रके ' दिधिषु ' कहा ' दातुः ' ही किया गया है । क्या वे फिर ' मातुर्दिधिषुमवूवं स्वसु- उसी र्जारः शृणोतु नः ' ( ऋ. ६ ५५ ५ ) इस मन्त्र में अपनी माताके ' सह दिधिषु - दूसरे खसम ( पति ) को और बहिन के जार ( उपपति ) को करन बुलाया करते हैं? क्या वे ' आशवो दिधिषवो ' ( ऋ. १०१७८ | ५ ) दिधि में मरुतोंको भी दिधिषु - विधवाविवोढा ही मानते हैं? ' अप ' दिधिष्वो विभृत्रा: ' ( ऋ. ११७११३ ) में प्रजाओं के उक्त विशेषणका पतित ' धारयित्र्यः ' अर्थ न करके दूसरे पति वाली अर्थ करेंगे? ' फलतः यहां ' दिधिषु ' का अर्थ ' दूसरा पति ' नहीं । यदि इत्या स्वामी जी वा उनके अनुयायी अमरकोष के अनुसार ' दिधिए'का पाप CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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[ ५४१ ५४२ ] प्रसिद्ध ' द्वितीय- पति ' नते है विरुद्धता करते वेदमें लिखे अनुसार शब्द रूढशब्द नहीं लिया ' अमरकोष'को श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) यह रूढ अर्थ करते हैं; तो अपने सिद्धान्तसे हैं; क्योंकि वे अपने वैदिकनिघण्टुकी भूमिका में वेदमें रूढि शब्द सर्वथा नहीं मानते; तब ' दिधि ' हो सकता । स्वामीने सत्यार्थप्रकाशके ४२ पृष्ठ जालग्रन्थ - अप्रामाणिक माना है; तब क्या वे अपने धपुका स्वार्थकी सिद्ध्यर्थ निघण्टु, निरुक्त, मीमांसा, व्याकरणको छोड़ - वेदमें कर अमरकोष तथा उसकी टीकाको भी प्रमाणित करनेकेलिए द्विपः उद्यत होकर ‘ यावज्जीवमहं मौनी ' तथा ' यद् वान्तं तदेव भुक्तम'का क अनुसरण करने जा रहे हैं? अमरकोषमें उस शब्दके उल्लेख-होता । मात्रसे उसकी कर्तव्यता कैसे हो जायगी? वहां तो विषके नाम कहें हैं; तो क्या विष भी खाइयेगा? स्वैरिणी - कुलटा स्त्रियोंके नाम भी वहां आए हैं; तो बनाइये सभी स्त्रियोंको कुलटा! यदि कहा जावे. कि- मनुस्मृति में भी ' दिधिषू ' का वर्णन है, तब तो उसी ( १।१७ ) में गर्भिणी - कन्या के विवाह में उत्पन्न पुत्रका नाम ' सहोढ ' माना है; तब क्या कुमारीको गर्भ कराके, उसका विवाह को करना मनुसम्मत हो जायगा? यदि नहीं; तब मनुजीने दिधिषूपति की भी निन्दा की है यह हम पूर्व बता ही चुके हैं । तब हैं? h ' अपत्यलोभाद् या तु स्त्री भर्तारमतिवर्तते । सेह निन्दामवाप्नोति एका पतिलोकाच्च हीयते ' ( मनु. ५।१६१ ) ' नौद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् । न विवाहविधावुक्त विधवावेदनं पुन: ' ( ६।६५ ) इत्यादिसे दिधिषुके पापी सिद्ध हो जानेके कारण विधवाविवाह् पु'का पाप सिद्ध हो गया । नियोग और विधवाविवाह [ ५४३ उक्त - वेदमन्त्रमें तो ' दिधिषु ' शब्द उसी समस्थित मृतक-पतिका विशेषण है; क्योंकि उसीको उद्दिष्ट करके मन्त्रका पाठ एवं विनियोग है, तब विशेषणोंके सदा यौगिक होनेसे ' दिधिषु ' शब्द भी यहां ' यौगिक ' सिद्ध हो गया । तब उसी मृतकके ही जीवलोक ( पुत्रादि - संसार ) के पालनार्थ ही उसका पतिका अनुमरण निषिद्ध करके उसे चितासे उठाया जाता है; उसके पुनर्विवाहार्थ वा नियोगार्थ नहीं, तभी मनुस्मृतिके पञ्चमाध्यायस्थित १५६-१५७-१५८-१५६-१६० - १६१ - १६२ श्लोकोंका वेदके साथ समन्वय होता है । इसीलिए वोधायनपितृमेधसूत्रमें भी विधवाका अन्य पति निषिद्ध होनेसे उसका पुनरग्न्याधान मी निषिद्ध किया गया है- ' नहि अस्या अपतित्वात् पुनरग्न्याधेयं विद्यते । विज्ञायते च — ‘ तस्मान्न ' का द्वौ पती विन्दते ' इति ( २ राष्टा ४ ) । इस प्रकार स्वा.द.जीका विधवानियोग अर्थ सुतरां खण्डित हो गया । स्वा. दयानन्द और विधवापुनर्विवाह । जो आर्यसमाजी आदि उक्त दोनों मन्त्रोंका अर्थ विधवा-विवाहपरक लगाकर वेदमें विधवाविवाह सिद्ध करते हैं; उनका तो स्वयं स्वा. द. जीने ही खण्डन कर दिया है । हम स्वा. द. जीकी विधवा - विवाह के विषय में सम्मति लिखते हैं--' [ वेदे ] स्त्रीपुरुषौ प्रति प्रश्नेन द्विवचनोचारणेन च एकस्य पुरुषस्य एकैव स्त्री कर्तुं योग्याऽस्ति, तथा एकस्याः स्त्रिया एक एव पुरुषश्च ' ( ऋभाभू. पू. २२२ ) ' अनेनापि एकस्याः- स्त्रिया एक एव CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालाक ( ८ ) ५४४ ] पुरुषस्य एकैत्र स्त्री च । अर्थाद् अनेक - स्त्रीभिः पतिर्भवतु, एकस्य अनेकैः पुरुषः सह एकस्याः स्त्रियाश्च सह विवाहनिषेधो नरस्य, तथा वेदमन्त्रेषु एकवचनस्यैव निर्देशात् ' ( ऋ. भा. [ विवाहनिषेधः ], सर्वेषु भू. पू. २२० ) यहां स्वा. द. जीने सभी वेदोंके मन्त्रोंमें एकवचन स्पष्ट निषेध कर दिया है; तब जो मानकर, स्त्रीको पुनर्विवाहका आर्यसमाजी वा स्वाद में निष्ठा रखने वाले वेदमें विधवाविवाह मानते हैं, वे या तो स्वाद जीको वेदानभिज्ञ मानते हैं; या स्वा. द. के अनुसार स्वयं वेदानभिज्ञ हैं । अन्य भी स्वाद के एतद्विषयक उद्धरण पाठकगण देखें-स्त्रीपुरुषयोरेकवारमेव विवाहः स्यात्, पुनरेवं नियोगश्च । ' कुमारयोः नैव द्विजेषु द्वितीयवारं विवाहो विधीयते, पुनर्विवाहस्तु खलु शूद्र - वर्णे एव विधीयते, तस्य विद्याव्यवहाररहितत्वात् ' ( ऋ. भा. भू. पू. २२२ ) यहां स्वामीने द्विजों में विधवाविवाहका निषेध किया है । उसे शूद्रोंमें माना है । अब सत्यार्थप्रकाशमें देखिये- ' ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य वर्णोंमें क्षतयोनि स्त्री क्षतवीर्य पुरुषका पुनर्विवाह न होना चाहिये ' स - प्र -४ पृ. ६ ' पुनर्विवाह में दोष- ( चौथा ) पतिव्रत और स्त्रीव्रत - धर्म नष्ट होना- इत्यादि दोषोंके अर्थ द्विजोंमें पुनर्विवाह वा अनेक विवाह कभी न होना चाहिये, ( पृ. ६६ ) यहां स्वा. द. जीने विधवाविवाह में पतिव्रत धर्मका नाश माना है । ' द्विजों में स्त्री और पुरुषका एक ही बार विवाह होना वेदादिशास्त्रोंमें लिखा है, द्वितीय बार नहीं ( स. प्र. ४ पृ. ७१ ) यहां स्वामीने वेदादिशास्त्रों में CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग वा विधवाविवाह [ ५४५ १४६ विधवा - विवाह नहीं माना । उन्होंने क्षतयोनिस्त्रीका पुनर्विवाह इन द नहीं माना यह पूर्व कह चुके हैं । विवाहिता स्त्री स्वा.द.के । कोई भी अक्षतयोनि नहीं रह सकती; क्योंकि वे गर्भाधान ग्र अनुसार मन्त्रो दिनमें ही विवाह कराते हैं । देखिये- करनेवाले ' जिस दिन ऋतुदान देना योग्य समझें, उसी दिन ' संस्कार घेहि पुस्तकस्थ - विधिके अनुसार मध्यरात्रि वा दश बजे अति विधि ' -विवा प्रसन्नतासे सबके सामने पाणिग्रहणपूर्वक विवाहकी विधिको किया एकान्त सेवन करें । पुरुष वीर्यस्थापन और स्त्री वीर्याकपेरणकी पूरा करके । सिंच विधि है उसीके अनुसार दोनों करें ' ( स.प्र. ४ जो विधव पृ. ५६ ) । अत्र इस विषय में संस्कार - विधि देखे – ' जब कन्या रजस्वला कर होकर शुद्ध हो जाय; तब जिस दिन गर्भाधानकी रात्रि निश्चित की हो; पुरुष उसमें विवाह करनेकेलिए प्रथम ही सब सामग्री जोड़ रखनी ग्यार चाहिये ( पृ. १३४ ) अब जब स्वामीने गर्भाधानवाले ही दिन मध्यरात्रि तक विवाहविधि पूरी करके आगे उसी समय एकान्नि- संस्क सेवनार्थ लिख दिया; स्त्रीको वीर्याकर्षणविधि भी बता दी; तत्र रिया वह अक्षतयोनि कहां रही? जब वह क्षतयोनि होगई; तो स्वामीके " पह अनुसार उसका पुनर्विवाह कैसे हो? आर्यसमाजके प्रसिद्ध सुपुत्र शास्त्रार्थ महारथी कहे जानेवाले श्रीरामचन्द्र - देहलवी भी अपने पाद एक पत्र में विधवाविवाहको द्विजकेलिए शूद्रकर्म, नीच कर्म मान ११ व हैं । और वे तो किसी भी स्त्रीको अक्षतयोनि नहीं समझते; तब बदल क्षतयोनिका विधवाविवाह कैसे हो सकता है? तब विधवाविवाह होगा वेदमन्त्रोंमें दिखलाना स्वा दयानन्दानुसार वेदानभिज्ञता है । अच्छ स ० ध ० ३५ Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) १४६ 7 [ ५४५ इन दो सुप्रसिद्ध मन्त्रोंका समाधान हम कर चुके, छाब अन्य पुनर्विवाह मन्त्रों पर भी विचार किया जाता है । व के अनुसार ( ३ ) ' पतिमेकादशं कृधि ' करनेवाले ' इमां त्वमिन्द्र! मीढ्वः! सुपुत्रां सुभगां कृणु । दशास्यां पुत्राना-वेहि पतिमेकादशं कृधि ' ( ऋ. १०१ ८५ ४५ ) यह मन्त्र भी विधवा के कार - विधि ' विवाह वा नियोग में दिया जाता है । इसका अर्थ भी विचित्र प्रसन्नता से किया जाता है । स्वा. द. जी लिखते हैं- ' हे ( मीढ्व इन्द्र ) वीर्य-रा करके सिंचने में (? ) समर्थ ऐश्वर्ययुक्त पुरुष (? ) तू इस विवाहित स्त्री वा की जो विधवाको (? ) सौभाग्ययुक्त कर, विवाहित स्त्रीमें दश पुत्र उत्पन्न ६ ) । अ कर और ग्यारहवीं स्त्रीको मान (? ) । हे स्त्री (? ) तू भी विवाहित हो पुरुष या नियुक्त (? ) पुरुषोंसे दश सन्तान उत्पन्न कर और की हो; ग्यारहवें पतिको समझ ' । न्ड़ रखनी इनके साम्प्रदायिक शिष्य श्रीरामचन्द्र देहलवी भी अपनी संस्कृताभिज्ञता (? ) सूचित करते हुए इस मन्त्रका अर्थ करके एकान्ति ग्यारह पतियोंके नए प्रकारको ' लिखते हैं दी; तब " पहले तीन पादों में तो पतिको आज्ञा दी गई स्वामी के प्रसिद्ध सुपुत्रा वा सुभगा कर, और इसमें दश पुत्र । वे कहते हैं कि है कि इस स्त्रीको उत्पन्न कर । चौथे 7 अपने पादमें स्त्रीको सम्बोधन किया है कि- तू ११ वां पति कर, अर्थात्. मान ११ तक पति कर । यदि इसमें पहले तीन पादोंको स्त्रीकेलिए-ते; त बदल दिया जावे; और चौथेको पुरुषकेलिए, तो उसका अर्थ यह विवाह होगा कि - हे स्त्री, तू इस पतिसे १० सन्तान उत्पन्न कर, इसको है । अच्छे पुत्र वाला और सौभाग्यशाली बना, और हे पति, तू नियोग वा विधवाविवाह [ ५४७ ग्यारहवीं स्त्री कर " । संस्कृतके विद्वानोंने देख लिया कि अपनी गलत वातको पूर्ण करनेकेलिए संस्कृत - भाषा वा श्रुतिक साथ कैसा वलात्कार किया गया है? जबकि यह मन्त्र विवाहसूक्तका है; और स्वामीकी संस्कार - विधिके अनुसार भी विवाहका है; और विवाह कुमारीका हो रहा है, न कि विधवाका तब इसमें विधवा कहांसे निकल पड़ी? ' एकादशं पतिं कृधि ' का ' ग्यारहवीं स्त्री ' अर्थ कैसे हो गया? ' हे स्त्री ' यह अर्थ वेदके किस मन्त्रसे निकल पड़ा? ‘ अस्यां पुत्रान् आघेहि’का तू नियुक्त पुरुषोंसे दश सन्तान उत्पन्न कर ' यह अर्थ किस कोष वा व्याकरणसे निकल पड़ा? ' गुरु तो गुड़ चेला चीनी हो गये के अनुसार दयानन्द - शिष्य श्रीदेहलवीजीने तो कमाल कर दिया । उक्त मन्त्रमें ' आधेहि ' ' और ' कृधि ' यह दो क्रियाएँ मध्यम पुरुषकी हैं; और एक ही सम्बोध्य इन्द्रको कही जा रही हैं । वर यहां ' इन्द्र ' ( देवता ) को यह प्रार्थना करे, यह सङ्गत है, और पूर्वापर - प्रकरणानुगृहीत है-यह हम आगे कहेंगे; पर वर यहां प्रतिपाद्य कैसे हो सकता है? वर यदि प्रतिपाद्य है, तो क्या उसीने अपना ग्यारहवाँ पति करना है कि जो कि - उसे कहा जा रहा है कि ' पतिमेकादशं कृधि ' । यदि स्त्री प्रतिपाद्य है, तो क्या उसीने पतिमें गर्भाधान करना है-जो कि उसे कहा जा रहा है कि- ' दशास्यां पुत्रान् आघेहि '? जबकि प्रतिपक्षीके अनुसार ' मीदव इन्द्र ' शब्द से वीर्य सेक्ता वर प्रतिपाद्य है, तो उसी मन्त्रके चतुर्थपादमें स्त्री सम्बोध्या कैसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Bujarat. An eGangotri Initiative
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५४८ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 5 ) हो गई? और उसका सम्बोधनपद इस मन्त्रमें कौनसा है? [ अब स्त्रीसे कहते हैं ] यह प्रक्षेप श्रीतुलसीरामने कैसे किया; जब वह मूलमन्त्रमें नहीं? यदि कहा जावे कि- ' मीढ्वः ' यह स्त्रीका भी सम्बोधन है; तो इसका अर्थ तो होगा कि वीर्य सींचनेवाली; तो क्या यह स्त्री अपना वीर्य पतिमें सींचेगी? पतिका गर्भाशय कहाँ है, जहाँ वह विपरीत -रतसे सींचेगी? उसका वीर्य कहाँ है, जिसे वह सींचेगी? उसकेलिए ' मीदुषी ' होता; ' मीढवान् ' नहीं । सम्बोधनमें ‘ मीदुषि ' होता, ' मीढ्यः ' नहीं? यदि वह ( स्त्री ) इस मन्त्रमें सम्बोध्य है; तो उस स्त्रीकेलिए ' त्वं ' इस प्रकार ' युष्मद् ' की प्रथमाका प्रयोग होता, पर यहां तो स्त्रीकेलिए ' इमां ' यह ' इदम् ' के द्वितीयाका ही प्रयोग है, न कि ' त्वं ' का । तब स्त्री सम्बोध्य कैसे हो सकती है? ' त्वं ' का प्रयोग यहांपर सम्बोध्य ' इन्द्र ' केलिए है-' इन्द्र ' यहां पति भी नहीं हो सकता; नहीं तो फिर ' पतिमेकादशं कृधि में असङ्गति पड़ती है, तब ' पति ' शब्द में द्वितीया नहीं आनी चाहिये । ' एकादशं ' इस डट्प्रत्ययका ' ग्यारहवें तक ' अर्थ भी किसी सूत्रसे नहीं हो सकता । ' एकादशानां पूरण एकादशः ' डटूप्रत्यय ग्यारहवें अर्थमें होता है; यदि प्रतिपक्षी इससे ग्यारह पति तक अर्थ लेते हैं; तो इस मन्त्रमें पूर्व दस पति कहाँ कहे गये हैं? इसमें तो ' दशाऽस्यां पुत्रान् ' दस पुत्र ही कहे हैं; दस पति नहीं । तब क्या ' पुत्र ' पतिका नाम है? यह मन्त्र विवाहका है; इसमें प्रतिपक्षी अपनी संस्कार - विधि देखें । जब यहाँ ग्यारहवां पति नियोग वा विधवाविवाह [ ५४१ विवाहमें कहा है; तो क्या दस पति उसके विवाहसे पूर्व क्या वह दश पतियोंका नियोग विवाहसे पूर्व ही हो होते हैं? ब ' कुमारी ' क्या तब ' विधवा ' होती है? | वस्तुतः असत्यके जाता है? वह राव नहीं हुआ करते । पांच जा ते ' दशास्यां पुत्रान् ' इस मन्त्रके चौथे पादकी पूर्ति इसमन्त्रका पा तृतीय पाद ही कर सकता है, इससे भिन्न तथा भिन्न प्रकरणका ग्या मन्त्र नहीं । तीसरे पादमें यहां दस पुत्र कहे गये हैं, दस पति नही नहीं । चतुर्थ पादमें ग्यारहवां ( एकादशः ) पति कहा गया है, एका वह पति एक ही सिद्ध हुआ; दश पुत्राः, एकादशःपतिः । वच पूर्वार्धमें ‘ इमां त्वमिन्द्र! मीढ्वः! सुपुत्रां, सुभगां कृणु ' यहाँ इन्द्र श्यक देवतासे स्त्रीकी दो वातकेलिए प्रार्थना की गई है, एक उसका क्रम सुपुत्रवती होना, दूसरा सुभगा होना । उसमें पुत्रोंके विषयमें पती तीसरे पादमें कहा गया है कि - ' दशास्यां पुत्रान् श्रधेहि इन्द्रदेव! ' यहां पुत्रोंकी संख्या दस बता दी गई । दूसरे सुप-गात्वके विषय में चौथे पादमें कहा गया है कि- ' पतिमेकादशं चतुर्थ कृषि हे इन्द्रदेव! ' अर्थात् हे इन्द्रदेवता! इस स्त्रीके ग्यारहवें वचन पतिको स्थिर कर, अर्थात् पति से इसका सौभाग्य स्थिर कर ' दश- दिया पुत्रोंके बाद ग्यारहवां पति एक ही हुआ; उसी एकसे उसका द्विती सौभाग्य स्थिर रहनेकेलिए कहा है । ' कृ'का अर्थ स्थापन मी वता होता है, जैसे कि - ' कुरु पदानि घनोरु! शनैः - शनैः ' क्योंकि- इसम कृ - धातु क्रिया - सामान्यवाची होती है! सौभाग्यदाता तो विवाह प्रथम पति ही होता है । नैयोगिक तो उस दुर्भगाका सौभाग्यदाना पतिक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative