सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 271–280
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 271–280
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श्री सनातनधर्मालोक ( 5 ) ५१० ] ' दि ( ) धिषोः ' यह दोनों विशेषण सामने पड़े हुए मृतक पति के ( श ६३ ) सि द ही बतला रहे हैं, किसी अन्य के नहीं । अन्य के विशेषण ये हो है । ही कैसे सकते हैं? विवाह होने पर ही पति होता है । जब उस श्राया है । बीसे मृतक भिन्न कोई अन्य उससे विवाहित है ही नहीं, तब कभी नहीं वह पति ही कैसे हो सकता है? यहाँ पर तो पति मृतक है और उसके अन्त्येष्टिकर्ममें मन्त्रका विनियोग है, तब यह सारा मृतक सायरा माघ पतिका ही वर्णन है । अथर्ववेद में सायण ने ' दधिषोः ' का ताल बनारे- ' धारयितुः ' अर्थ किया है । ऋग्वेदमें उसने ' दिधिषोः ' का पुत्रो भ्राता ' गर्भस्य निधातुः ' यह अर्थ किया है । ये दोनों विशेषरण मृतक - पति अमिपल के ही हैं, अतः इनसे मृतककी पूर्वावस्था स्मृत कराई गई है । - परन्तु कृष्णयजुर्वेद ‘ तैत्तिरीयारण्यक ' में सायणाचार्यने स्मार खिसमूहम ' दिधिषोः ' का मृतकके भविष्यत् जन्मके विचारसे ' पुनर्विवाहेच्छो: ' णिग्राहव यह रूढ लोकप्रसिद्ध अर्थ किया है । उसमें क्या रहस्य है- यह त्वमभिसम्ब प्रतिपक्षी लोग धैर्यसे सुनें । वह रहस्य यह है कि अपने भाष्य-स्थित प्रमाणों से श्रीसायणने सिद्ध किया है कि पतिव्रता नारी किया करते पारलौकिक पतिलोकको चाहती है । इधर उसने यह भी दिखलाया देखकर बहुत है कि उसके सतीत्वके प्रभावसे उसका पति जन्मान्तर में उसका पति हैं जैसाकि होता है, यह अथर्ववेदके ' इयं नारी ' मन्त्रके सायणभाष्यमें पहले लिखा है । दिखलाया ही जा चुका है । श्रीमाधकविने भी यह सूचित किया चारते । है - ' सतीव योषित् प्रकृतिः सुनिश्चला पुमांसमभ्येति भवान्त-ये हैं । ि रेष्वपि ' ( शिशुपालवध १।७२ ) । अतः सायरणका यह आशय है ग्रामस्य ' को कि तेरा यह पति जन्मान्तरमें भी तेरे सतीत्वके प्रभावसे तेरे ही साथ CC - 0. Ankur Joshi Collection सायण और विधवाविवाह [ ५११ पुनर्विवाह चाहता है, इसलिए यह तेरा भावी ' दिधिषुः श्रर्थात् अन्य जन्ममें ' यही तेरा दूसरा पति ' है । इसी तरह ' तस्यै प्रजां द्रविणं चेह घेहि ' यहाँ पर भी तथा परलोक वा स्वर्गमें भी पुनर्जन्ममें तुम्हीं इसके पति बनकर इसे प्रजा वा धन दो । यह मृतक पति-को मन्त्रद्वारा कहा जा रहा है । तब परलोक वा पुनर्जन्म में उस स्त्रीका पुनर्विवाह उसी ( मृतक ) पतिके साथ सिद्ध हुआ । जन्मान्तरमें वा इस लोकमें यही तुम्हारा पति होगा, या लोकान्तरों-में भी यही तेरा पति होकर तुम्हें पुत्र वा धन देगा; इससे स्वर्ग वा पुनर्जन्ममें उसी [ मृतक ] पतिके साथ पुनर्विवाह सिद्ध हुआ । इसलिए यही मृतक उसका ' दिधिषु ' पति है । श्मशानमें कोई अन्य पति नहीं बताया गया; क्योंकि श्मशानमें यह घटना नहीं हो सकती; हाँ, स्वा.द. जीके स.प्र. में किये हुए अर्थसे वैसा आभास होता है, पर सायणभाष्यमें तो ऐसी कोई बात नहीं । विधवाविवाहके प्रेमी अमेरिका आदि देशोंमें भी कत्र सूखनेके बाद ही विधवाका पुनर्विवाह हुआ करता है । इसमें एक घटना प्रसिद्ध है कि वहाँकी एक स्त्री कत्रको पंखा कर रही थी, उसे स्वा. रामतीर्थने देखा, और उसके पातिव्रत्यको सराहा । पीछे स्वा.रा.ती. को पता लगा कि कत्रके सूखनेसे पहले यहाँ विधवा अपना पुनर्विवाह नहीं करा सकती; अतः जल्दी कब्र सुखानेके-लिए वह रमणी पंखा कर रही थी । प्राचीन धर्मप्राण सतीधर्मके आग्रही भारतमें भला श्मशानमें दूसरे पतिके साथ विवाहकी चर्चा ही कैसे हो सकती है? Gujarat. An eGangotri Initiative
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] श्री सनातनधर्मालोक ( 4 ) ५१२ सायणाचार्य तो अभी मरे हुए पतिकी ही जन्मान्तरमें उसी ही साथ ' पुनर्विवाहेच्छा ' बतलाकर ' सतीको अन्य जन्ममें भी फिर पत्नीके यही पति मिलता हैं ' - यह वेदका स्वारस्य बतला रहे हैं; तब फिर विधवाविवाहका गन्ध भी कैसे हो सकता है? यहाँ पर यहाँ ' पुनर्विवाहेच्छो: ' उस स्त्रीके मृतक पतिको ही लक्ष्य करके कहा जा रहा है कि - ऐ स्त्री तेरा मृतक पति पुनर्जन्ममें भी तुम्हींसे पुनर्विवाह करना चाहता है, अतः यह तेरा मृतक पति तेरा ' दिधिषु ' है । सो सायणाचार्य सतीका द्वितीय जन्ममें भी वही पति - जो अब मृत है - होना मानते हैं, इसलिए उक्त मन्त्रार्थ में उसी मृतकको ' दिधिषु ' कह रहे है; यह ' दिधिषु ' शब्द श्रीसायणके आरण्यक-के मन्त्रके अर्थ में उसी मृतक पतिका विशेषण है, किसी अन्य जीवितका नहीं । नये जीवितका तो उससे प्रथम ही विवाह होगा, पुनर्विवाह नहीं । नियोगपक्ष में तो पुनर्विवाहकी कोई बात ही नहीं । इस प्रकार सायणाचार्यके अथर्ववेदादिके भाष्योंको लोकदृष्टिके सामने न रखना वा उसे छिपाकर ' तैत्तिरीयारण्यक ' के ' पुनर्विवाहेच्छो: ' इस सायरणके पदमात्रसे जो प्रतिपक्षी लोग विधवाविवाह सिद्ध करना चाहते हैं, उसका रहस्य पाठकोंने समझ लिया होगा । जो यह कहें कि स्त्री पति भरे पीछे २०-३० साल जीती रहे; तो उसका मृतक पतिसे मेल कैसे होगा? इस पर जानना चाहिये कि -देवलोकमें जानेसे यहाँका वर्ष उस ( मृतक ) के लिए एक दिन हो जाता है; तब उस देवकेलिए यह देरकी बात नहीं होती । उस स्त्रीके मरने तक वह देवलोक में ही रहता है, CC - 0. Ankur Joshi Collection सायण और विधवाविवाह तब वह मृतक स्त्री भी उसी लोकमें पहुँच जाती मनुस्मृति में पतिलोकमें प्राप्तिकी बात है ( ५/१५६ है, यही उसी । श्रीश्यामजी शर्मा काव्यतीर्थ के " अथर्ववेदका , १६५ ) । मैंने नहीं देखा, इस कारण उसका भाष्य नहीं दिया " सायणभात का वास्तविक आशय सुनिपुरण- पाठकोंने इस बार समझ लिया होगा अव क्या काव्यतीर्थ - महाशय वा अन्य प्रतिपक्षियोंका । है कि वे सायणको विधवाविवाहपोषक यह साहस कह सकें? हम उन्हें वा उनके सहवर्गियोंको आमन्त्रित करते हैं कि वे सायणभाष्यरे अपना अभिलषित अर्थ निकालें । हमने सायणके सव माघ प्रस्तुत कर दिये हैं । अब उनका यह व्याज नहीं हो सकता कि ' मैंने अमुक मन्त्र वा अमुक संहिताका सायणमाष्य नहीं देखा । ' इधर काव्यतीर्थ महाशय वा उनके सहवर्गियोंसे यह भी निवेदन है कि ' इयं नारी ' तथा ' उदीर्ष्व नारि! ' इन दो मन्त्रो पूरा लिखकर तथा उनका अन्वय एवं प्रत्येक पदका मिन्न - मित्र । अर्थ तथा तदनुसारी भावार्थ लिखें, जिससे विधवाविवाह सिद्ध हो । यहां तो स्पष्ट प्रत्यक्ष हो गया कि इन मन्त्रों में विधवाविवाह-का गन्ध नहीं, किन्तु सतीधर्मका वर्णन है । आगे " या पूर्वं पतिं वित्त्वा ", " सनात् दिवं परिभूमा विरूपे पुनर्भुवा युवती ", " उच्चा व्यख्यत् युबतिः पुनर्भूः ”, “ विधवेव देवरम् ”, “ नैकस्या बहवः सह पतयः ”, “ उत यत् पढवो दश स्त्रिया: " इन मन्त्रोंसे जो उन्होंने विधवाविवाह सिद्ध करना चाहा है, इन सबका उत्तर इसी पुष्पमें अन्यत्र पाठक देख लें । Gujara. An eGangative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ५१४ ] यही दिवं परिभूमा ' ' उच्चा व्यख्यद् युवतिः इन मन्त्रों उस शेष सनाद् दिया जाता है । २ ) । पर संक्षेपसे विचार सायणमात्र पहला मन्त्र यह है — ‘ सनाद् दिवं परिभूमा विरूपे पुनर्भुवा इस बा युवती स्वेभिरेवः । कृष्णेभिरक्तोषा रुशद्भिर्वपुर्भिरा चरतो अन्या-जिया होगा न्या ' ( ऋ. ११६२२८ ) इसमें पुनर्भूः, तथा युवति शब्द किसी यह । नहीं हैं; अतः रूढ भी नहीं हैं । यह तो रात्रि और साहस स्त्रीकेलिए लिए हैं, उनके विशेषण हैं; अतः यौगिक हैं, क्योंकि— हम उन्हें उपके माध्वसे विशेषरण सदा यौगिक हुआ करता है । मन्त्रमें भी यह स्पष्ट है । सव माघ यहां पर विरूपे, पुनर्भु चौ युवती , यह द्विवचन हैं; अतः वह रात्रि सकता कि तथा उषा दोनोंकेलिए है । मन्त्रके उत्तरार्ध में दोनोंकी तुलना की देखा गई है । उसमें ‘ अक्ता ' रात्रिका नाम है; और ' उषाः ' उषाका । यह भी निघ ( १७ ) में रात्रिका नाम ' अक्तुः ' भी आया है ' नक्ता ' दमन्त्रो भी । सो प्रकृत - मन्त्र में ' न'का छान्दस लोप होकर ' अक्ता ' वचता मिन्न- मित्र है; अथवा ‘ अक्तु: ’ का ‘ अक्ता ' यहां छान्दस शब्द है । अतः इन ह सिद्ध मन्त्रोंमें रान्नि एवं उषाका वर्णन ही सिद्ध हुआ । इसी कारण बाविवाह- पूर्वार्धमें जो उन्हें ' विरूपे ' भिन्न - भिन्न रूप ( काला और सुफेद ) वाला बताया गया है, उत्तरार्ध में उसकी स्पष्टता इस प्रकार आई म है । ‘ कृष्णेभिर्वपुर्भिः अक्ता, रुशद्भिः दीप्तिमद्भिर्वपुर्भिरुपा । पुनर्भू ", जब इस प्रकार — उक्त मन्त्रमें रात्रि एवं उषाका वर्णन सिद्ध यत् पठनो हुआ; तव ' पुनर्भु'चौ ' का अर्थ भी यौगिक हुआ कि - पुनः - पुनर्भ-द्ध करना वन्त्यौ - प्रतिदिवसं जायमाने ' । अर्थात् यह रात एवं उषा प्रतिदिन देख लें । वार - चार हुआ करती हैं - यह प्रत्यक्ष बात है । ' युवती ' का अर्थ है CC - 0. Ankur Joshi Collection सायरा और विधवाविवाह [ ५१५ नित्यतरुयौ ' अर्थात् यह दोनों नित्यकी तरुणी हैं, कभी वृद्ध नहीं होती ' यह अर्थ निकलता है; तब यहां विधवाविवाहका गन्धमात्र भी नहीं । इसीलिए वहां श्रीसायणाचार्यने भी लिखा है— ' विरूपे – शुक्लकृष्णतया विषमरूपे, पुनर्भुवौ – पुनः पुनः प्रतिदिवसं जायमाने, युवती - तरुण्यौ रात्र्युपसी, द्युलोकं भूमिं च चिरकालादारभ्य स्वकीयै र्गमनैः पर्यावर्तेते ' । यहां रात्रि एवं उपा दोनों स्त्रीलिङ्ग ही दिखलाई गई हैं । वे रात एवं उपा पुनः-पुनः हुआ करती हैं, इसी कारण उनको यौगिकतासे पुनर्भू कहा गया है । यहां किसी पुरुषका वा दम्पतीका वर्णन नहीं है । यह दिनका भी वर्णन नहीं है, क्योंकि - दिन होनेपर रात्रि नहीं हुआ करती; यहां तो रात्रि और उपाका वर्णन है । अतः यहां विधवाविवाहका गन्धमात्र भी नहीं । तव यहां ' पुनर्भे पुरुष और पुनर्भू स्त्री - इन दोनोंको कैसा व्यवहार करना चाहिये-इसका निर्देश इस मन्त्रमें हैं ' यह अपनी पुस्तकके १३ पृष्ठमें लिखनेवाले काव्यतीर्थ श्रीश्यामजीका खण्डन हो गया । इसी प्रकार ' उच्चा व्यख्यद् युवती पुनर्भू रोपा अगन् प्रथमा पूर्वहूतौ ( ऋ. १११२३।२ ) इस मन्त्रका देवता उषा है. कोई विधवा नहीं । मन्त्रमें ' ओषा, - उपाः ' यह तो स्पष्ट है । यहां श्रीसायरणा-चार्यने लिखा है- ' उपाः कीदृशी सा युवतिः - मिश्ररणशीला नित्य - यौवना वा, पुनर्भू:: - - पुनः पुनर्भवनशीला; प्रतिदिनं वर्तमान-त्वात् । सा उषाः प्रथमा- मुख्या देवयजनदेशं प्रत्यागच्छति ' । सो यहां किसी मानुषी - स्त्रीका वर्णन न होनेसे यहां भी विधवा-Gujarat. An eGangotri Initiative
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५१६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) गन्धमात्र भी नहीं । प्रतिपक्षी वेदमें यौगिक शब्द विवाहका उन्हें रूढ कैसे करने लगे? और फिर ' पुनर्भू ' मानते हैं, यहां शब्द यहां विशेष्य न होनेसे, विशेषण होनेसे और विशेषणके यौगिक होनेसे यहां प्रतिपक्षियोंका तो सर्वथा खण्डन हो सदा होनेसे नित्यकी युवति है, वह रातके अन्तरमें गया । उषा, देवता फिर - फिर आती है; अतः पुनर्भू है । तब इसमें विधवाविवाह अर्थ करते हुए काव्यतीर्थ महाशयका खण्डन हो गया । प्रकार जो कई व्यक्ति ' विधवेव देवरं ' ( ऋ. १०।४०।२ ) इस मन्त्रका ' शयने यथा मृतभर्तृका नारी देवरं पतिभ्रातरमभिमुखी-करोति, यथा च सर्वं मनुष्यं योषा - सर्वा नारी संयोगकालेऽभि-मुखीकरोति ' यह सायणभाष्य दिखलाकर उससे कई विधवा-विवाह सिद्ध किया करते हैं; इसकी स्पष्टता तो इस पुष्पमें भिन्न पंखुरीमें देखें; यहां संक्षेप यह है कि यहां ' विधवेव देवरम् ' में विधवाविवाह तो नहीं, किन्तु विधवा नियोग सिद्ध हो सकता है; वह भी वाग्दत्ता ( सगाईकी हुई ) विधवाका; जिसका निर्देश मनुजीने ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः । तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवर ' ( ६६६ ) इस पद्यमें किया है । बस्तुतः यह मनु - वचन उक्त ' विधवेव देवर ' मन्त्रांशका अनुवाद है । अतः यहां ' कन्या ' शब्द आया है । तब वाग्दत्ता - विषयक होनेसे प्रतिपक्षियोंकी इससे कुछ भी इष्ट - सिद्धि नहीं । कलियुग-केलिए व्यवस्थापित पराशर स्मृति में विधवा - वाग्दत्ताके इसी नियोगको विवाहपरक माना गया है; जो अव भी हुआ करता CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग वा विधवाविवाह [ M ५१ है । विशिष्ट स्पष्टता अन्यत्र देखें । जैकस्या ' समाधान भिन्न पुष्पमें होगा । बहवः सह पतयः वर्णन अर्थ ( १७ ) नियोग वा विधवाविवाह के प्रसिद्ध वेदमन्त्र आजके युगके आर्यसमाजी ( 1 ) शब्द नवयुवक लोग स्वा. द.वी ( अस पुस्तकोंके प्रभावमें पड़कर नियोग वा विधवाविवाहको ५ ( ) वैदि समझते हैं । वे दो निम्न वेदमन्त्रोंको तो इस विषयमें माम मानते हैं । उनमें पहला मन्त्र यह है- ब्रह्मद । संस्थ ( १ ) ' इयं नारी पतिलोकं वृणाना निपद्यत उप त्वा मर्त । ' संस प्रेतम् । धर्मं पुराणमनुपालयन्ती तस्यै प्रजां द्रविणं चेह साथ ( १८ । ३ । १ ) यह अथर्ववेद ( शौ. ) संहिताका मन्त्र है । दूसरा मद ऋग्वेद संहिताका यह है - ( २ ) ' उदीर्ध्व नारि! अमि जीवों गतासुमेतमुप शेष एहि । हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनितः मभिसम्बभूथ ' ( १० | १८८ ) इनमें कई व्यक्ति उक्त मन्त्र सूत्र सायणभाष्यसे विधवाविवाह सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं; उत्सर जा विचार तो गतनिबन्ध में किया जा चुका है । इस प्रकार अन भी कई मन्त्र वे दिया करते हैं - वे यह हैं - ( ३ ) ' पतिमेकादर्श कह कृधि, ( ४ ) ' देवृकामा ' । ( ५ ) ' विधवेव देवरम् ' । ( ६ ) ' या पू पत पतिं वित्त्वा अथान्यं विन्दते परम् ' । ( ७ ) ' तुरीयस्ते मनुष्यज्ञाः । ' वो ( ८ ) ' उत यत्पतयो दश स्त्रिया: ' ( ६ ) ' अन्यमिच्छस्व सुभगे! पि मत् ' । इस विषय में यहाँ कुछ विचार उपस्थित किया जाता है । अ ( १ ) ' इयं नारी पतिलोकं वृरणाना ' । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ५१८ ] सह इनमें पहला मन्त्र तो विधवाका पतिके साथ सती होनेका स्पष्ट पत रहा है; तिसपर भी जो लोग इससे विधवाविवाहका वर्णन कर अर्थ निकालने का साहस करते हैं; हम स्पष्ट कह देते हैं कि - वे शब्दशास्त्रके ज्ञानसे शून्य हैं । नहीं तो ' कन्या विन्दते पतिम् ’ मन्त्र ( १ ). १४/२/२२ ) ' कन्या युवानं विन्दते पतिम् ' ( अ. ११/७ स्वाद जीर ( ( ५ ) ।१८ ) इन वेदके वचनोंके साथ, तथा ' अमुकगोत्रोत्पन्नामि-माममुकनाम्नीमलङ्कृतां कन्यां प्रतिगृह्णातु भवान् ' ( स्वा. द. संस्कारविधि पृ. १४० ) ‘ कन्या अग्निमयक्षत ' ( पारस्करगृ. ११६ ) ' संस्कारविधि पृ. १५८ ) इत्यादि स्वाद के वेदानुकूल वचनोंके त्वाम साथ उक्त वेदमन्त्रका विरोध पड़ेगा, क्योंकि ' कन्या ' का अर्थ चेह वेहि ' अविवाहिता ' होता है, वेदानुसार अविवाहिताका विवाह होता दूसरा मन म जीवले है, विवाहिताका नहीं । तव व्याघात हो जानेसे ' तदप्रामाण्यम् अनृतव्याघातपुनरुक्तेभ्यः ' ( न्यायदर्शन २ | १ | ५६ ) इस पूर्वपक्ष-पत्युर्वनित मन्त्र सूत्रकी ही विजय हो जायगी; अर्थात् वेद ही अप्रमाण हो हैं; उसर जायगा । परं ऐसा नहीं है । प्रकार अन्न वस्तुतः ' इयं नारी ' यह मन्त्र प्रेत ( मृतक ) मर्त्य ( मनुष्य ) को तिमेकादर्श कहा जा रहा है । कौशिकसूत्र ( ८० । ४४ ) में इस मन्त्रका विनियोग ६ ) या पूर्व पत्नीका मृतक पति के साथ संवेशन ( लेटाने ) में है । इसलिए मनुष्यज्ञाः । ' वोधायनपितृमेधसूत्र ' में भी इसकेलिए कहा है- ' अथास्य भगे! प ( मृतकस्य ) भार्यामुपसंवेशयति ' इयं नारीति ' ( ११७७, १1८ । १ ) । जाता है । आर्यसमाजी श्रीराजारामजी शास्त्रीने भी अपने अथर्ववेदभाष्य में लिखा है – ' इयं नारी ' इससे पत्नीको चितापर मृतकके समीप CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग वा विधवाविवाह [ ५१६ लिटाता है ' ( पृ. ८०३ ) । इस सूक्तका देवता भी यम है, जो देवता है । इसमें पितृकर्म वा पितृमेध वर्णित मृत्युका वेदानुसार है । जो स्पष्ट मृतककी अन्त्येष्टि होती है । इस प्रकार कृष्णयजुर्वेद-तैत्तिरीयारण्यक ' ( ६१ ) १३ ) में भी इस मन्त्रका देवता ' पितृमेध कहा है, तथा अन्त्येष्टि - कर्म में इसका विनियोग कहा है । जब ' इस मन्त्रका मृतककर्म से सम्बन्ध है; तो यहाँ विधवाका जीते हुए पुरुषके साथ विवाहके वा नियोगके अर्थका सम्बन्ध ही क्या है? । इसलिए अथर्ववेदसं के सायणमाध्यमें भी लिखा है--' भार्यां प्रेतेन ( मृतेन ) सह संवेशयेत् ' ( ऋ. १८३१ ) | केवल यहीं नहीं, वल्कि - ' आश्वलायनगृह्यसूत्र ' में भी यही इस मन्त्रका विनियोग बताया है- ' प्रेतं संवैशयन्ति उत्तरेण, उत्तरतः पत्नीं संवेशयन्ति ' ( ४ / २ / १५-१६ ) । इस कारण जब इस मन्त्रका किसी भी प्रकार विधवाविवाह वा नियोग अर्थ हो ही नहीं सकता; तब स्पष्ट है कि - स्वाद जीने अपने पक्षकी सिद्धिकेलिए श्रुतिसे बलात्कार किया । जो पद उसमें नहीं थे; वे भी इसमें बलात् हूँ से- यह श्रुतिपर सचमुच अत्याचार है । प्रतिपक्षियोंकी इच्छा जो स्वैराचार करें, पर उसे श्रुति पर बलात् क्यों लादते हैं? देखिये स्वा.द.जीका किया इसमें अर्थ ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' में, जहाँ उन्होंने अर्थ में अपने ही शब्द हूँ से हैं; हम उनमें (? ) यह चिन्ह जोड़ेंगे, पाठक सावधानता से देखें-( इयं नारी ) इयं विधवा नारी ( प्रेतं ) मृतं पतिं विहाय (? ) ( पतिलोकं ) पतिसुखं (? ) वृणाना स्वीकर्तु मिच्छन्ती सती ( मर्त्य ) हे मनुष्य! Gujarat. An eGangotri Initiative
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५२० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ( त्वा ) त्वामुपनिपद्यते - त्वां पतिं प्राप्नोति (? ) तव समीपं नियोग-विधानेन श्रागच्छति (? ) । तां त्वं गृहाण (? ) अस्यां सन्तानानि उत्पादय (? ) कथम्भूता सा - - ( धर्मं पुराणं ) वेदप्रतिपाद्यं सनातनं धर्ममनुपालयन्ती सती, त्वां नियोगेन पतिं वृणुते (? ) त्वमपि इमां वृणु (? ) । ( तस्यै ) विधवायै ( इह ) अस्मिन् समये लोके वा ( प्रजां घेहि ) -त्वमस्यां प्रजोत्पत्तिं कुरु । ( द्रविणं ) द्रव्यं - वीर्यं च (? ) अस्यां घेहि, अर्थात् गर्भाधानं कुरु ( १ ) । यहाँपर (? ) इस चिन्हबाले पद स्वाद जीने वेदमन्त्रमें अर्थ -द्वारा प्रक्षिप्त कर दिये हैं । मन्त्रमें इनका गन्धमात्र भी नहीं है । यह सूक्त अन्त्येष्टिमें मृतपितृकर्म में विनियुक्त है कि - ' इयं नारी ' मन्त्रसे पत्नी चितामें लेटती है; इस कारण यहाँ ' मर्त्य ' यह उसी मृतकका साभिप्राय सम्बोधन है; उसीका ' प्रेतं ( मृतं ) त्वा ' यह कर्म पद है । उसीकी क्रिया ' उपनिपद्यते ' है कि - ऐ मनुष्य! तुझ मरे हुएके पास यह नारी लेटी है ' यह अन्वयार्थ है । ' त्वा ' यह विशेष्य तथा ' प्रेतं ' यह विशेषरण है; पर स्वाद ने अपनी निरङ्कुशतासे इन विशेषण - विशेष्योंको विच्छिन्न कर दिया, और ' प्रेतं ' में ' विहाय ' पदको अपनी कपोलकल्पनासे बीचमें प्रक्षिप्त कर दिया । इसी मृतकका पर्यायवाचक शब्द अग्रिम मन्त्रमें ' गतासुम् एतं ' यह है, उसमें ' एतद् ' शब्दके ग्रहणसे इस मन्त्रमें भी उसी गतासु ( मृतकपति ) का वर्णन है, किसी जीवित- पुरुषका वर्णन यहां सर्वथा नहीं । तब यहां जीवित अन्य मनुष्यका ग्रहण करना और नियोगका अर्थं करना स्वा. द. जीका छल है, और अपने प्रमाणित नियोग वा विधवाविवाह [ ५२1 ५२२ गृह्यसूत्रोंसे विरुद्ध है । जीवितकेलिए ' मर्त्य ' यह सम्बोधन साभिप्राय हो जाता है । जब यही स्वामीकी कपोलकल्पनासे भी वीय प्रसूत है; तो आगे किया हुआ स्वामीका अर्थ तो सर्वथा । करन ही सिद्ध हुआ, ' छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्नम् ' । यहाँ असत्य क्या यह विशेष्य, विशेषण ' प्रेतं ' कर्मका है, और उसी ' प्रेतं ' ' त्या ' यह क्रिया ' उपनिपद्यते ' थी; पर विशेषण - विशेष्य ‘ प्रेतं ’ ‘ त्वा ' का ' त्या ' से जीवित पुरुषको ग्रहण क्रिया बना दी और विच्छिन्न यह अपनी कपोलकल्पनासे बढ़ा दी, कर्मकी नियो स्वामी दयानन्दजीने छलवलसे है; परस्पर सम्बन्ध विच्छिन्न करके सस करके ' उपनिपद्यते ' यह उस २७ हुए ' प्रेतं ' पदकी क्रिया ' विहाय ' विध जिसका मन्त्रमें गन्ध भी नहीं । धर्म यह पुराणोंमें प्रक्षेप - प्रक्षेप चिल्लाया करते हैं; पर स्वयं अपने पाल प्रमाणित वेदमें दिन - दहाड़े में ही प्रक्षेप कर रहे हैं; हा हन्त!! हन्त ' नियोग विधानेन आगच्छति ' यह वाक्य मी स्वाद जीकी आज नियोगसे पूर्ण मस्तिष्क की उपज है, मन्त्रमें उसका लेश भी नहीं । क्या ' तां त्वं गृहाण अस्यां सन्तानानि उत्पादय, त्वमपि इमां कान वृणु ' यह वाक्य भी स्वामीने स्वयं मन्त्रार्थमें हठात् प्रक्षिप्त किये मन्त्रव हैं, मन्त्रमें इनका वाचक कोई भी पद नहीं । ' द्रविणं ' का ' वीर्य ' C अर्थ भी उन्हींकी कल्पनासे प्रसूत है, नहीं तो उससे ' प्रजा ’ हम प्र यह शब्द पूर्वं न होता । वीर्यसे पूर्व उनके मतमें प्रजा असम्भव करने है । अथवा प्रजाकी उत्पत्ति कह देनेपर फिर पीछे वीर्याधानका इति कथन व्यर्थ है । यदि ' द्रविण ' का अर्थ ' वीर्य ' है; तो ' तदस्मासु पालन द्रविणं घेहिं ' ( यजुः २६।३ ) मन्त्र में भी क्या स्वामी अपने में हरणान CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५२२ ] श्रीसनातन धर्मालांक ( ८ ) II न भी धानकी प्रार्थना करेंगे? ' घेहि ' का अर्थ मन्त्र में ' पालन ना करना ' है, गर्भाधान नहीं; अन्त्येष्टिमें गर्भाधानका प्रसंग ही सत्य क्या? जो कि नियोगकेलिए स्वामीने ' सनातनं धर्मं पालयन्ती ' यह शब्द लिखे हैं; वे भी उनके पक्षको काटते हैं; क्योंकि कर्मकी नियोग सनातनधर्मका पालन नहीं, किन्तु सनातनधर्मके विरुद्ध वलसे है; जैसे कि ' यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे ' सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( मनुः ) । ( मनुस्मृति उसकी २ | ७ ) इस प्रकारसे प्रशंसित मनुजीने कहा है- ' नान्यस्मिन् विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः । अन्यस्मिन् हि नियुञ्जाना नहीं । धर्मं हन्युः सनातनम् ' ( ६।६४ ) यहाँ नियोग करना सनातनधर्मका अपने पालन न कहकर ' सनातनधर्मका हनन ' बताया गया है । हा न्त!!! हन्त! इस प्रकारके छलमलसे मलिन साधारण - जनको भी चीकी आज ' महर्षि ' माना जाता है, अज्ञताकी इससे अन्य पराकाष्ठा क्या हो सकती है, जहाँ इस प्रकारके निर्मूल अर्थको बिना कान - पूँछ हिलाये स्वीकार कर लिया जाता है । अब हम उक्त मन्त्रका वास्तविक अर्थ बताते हैं । ' इयं नारी ' यह मन्त्र मृतकके प्रति कहा जा रहा है, जैसा कि जा ' हम पूर्व सिद्ध कर चुके हैं । पुराणं धर्मं - सनातनधर्मको [ इस अर्थ भव करनेमें शतपथका प्रमाण है – ' ये ऽत्र स्थ पुराणा ये च नूतना नका इति, येऽत्र स्थ सनातना च ये अधुनातनाः ' ( ७ | १ | १ | २ ) अनुपालयन्ती मासु पालन करती हुई, सनातन धर्मका आचरण करती हुई, ' पतिलोकं वृणाना - मृतकपतिसे गन्तव्य पारलौकिक स्वर्गादि लोकको CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग वा विधवाविवाह [ ५२३ वरण करती हुई, अर्थात् तुम्हारे पीछे मरना चाहती हुई [ जैसेकि - इसी मन्त्र के आशय से मनुजीने लिखा है- ' पाणिग्रहस्य साध्वी स्त्री... पतिलोकमभीप्सन्ती ' ( श १५६ ) ' सा भर्तृ लोकमाप्नोति ' ( ५।१६५ ) ' पतिलोकात् ' ( ४१६१ ) ' इहाप्रयां कीर्तिमाप्नोति, पतिलोकं परत्र च ' ( मनु. ५।१६६ ) ‘ या ब्राह्मणी सुरापा भवति, नैनां देवाः पतिलोकं नयन्ति ' ( महाभाष्य ३ ( २ ) ' तस्माद् यत्रैव पतिस्तत्र जाया ' ( शत. १२८२६ ) इत्यादि प्रमाणोंसे पतिलोक परलोकमें इष्ट है; क्योंकि - ' सती च योषित् प्रकृतिश्च निश्चला पुमांसमभ्येति भवान्तरेष्वपि ' ( शिशुपालवध ११७२ ) सती स्त्री परलोकमें भी पतिलोकको प्राप्त करती है ] इयं नारी- तुम्हारे पास लेटी हुई यह स्त्री, ' हे मर्त्य! [ ' मर्त्य ' यह सम्बोधन मृतककेलिए सामिप्राय है ] - ऐ मरणधर्मवाले! ' प्रेतं त्वाम् – मरे हुए तुम्हारे पास, उपनिपद्यते - लेटी हुई है, तुझ मृतकके साथ चितामें अनुमरणार्थ लेटी है । [ ' मृतक शरीरका नाम प्रेत है ' यह स्वा. दयानन्दजीने स.प्र. २ समु. १५ पृष्ठमें लिखा है । शतपथमें भी लिखा है-' यदा उत्क्रामति, अथ ह एतत्पुरुषो म्रियते । तस्मादु ह एतत् प्रेतमाहुः ' ( १० | ५ | २ | १३ ) । न्यायदर्शनमें भी लिखा है- ' प्रति - पूर्व-शरीरं जहाति - म्रियते । प्रेत्य च पूर्वशरीरं हित्वा ' ( | ४ १ | १० ) इससे स्पष्ट है कि - प्रेत - यहाँ मृतकवाची ही है; तभी इससे अग्रिम ( अथर्व १८३२ ) मन्त्रमें उसका पर्यायवाचक ' गताऽसुम् [ गतप्राणम् ] एतं ' यह आया है ' उत्पन्नस्य क्वचित् सत्त्वनिकायं मृत्वा या पुनरुत्पत्तिः, स प्रेत्यभावः ' ( १ | १ | १६ ) न्यायदर्शनके इस Gujarat. An eGangotri Initiative
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५२४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) वाक्यमें भी ' प्रेत्य ' का अर्थ ' मृत्वा ' ( मरकर ) यही किया है । तस्यै - उसकी [ यहाँपर ‘ षष्ठयर्थे चतुर्थीति वाच्यम् ' ( २।३।६२ ) इस छान्दस - वार्तिकसे वेदमन्त्रमें ' या खर्वेण पिबति तस्यै खर्वः ' इस महाभाष्यके उदाहरणकी तरह चतुर्थी षष्ठी विभक्तिके अर्थमें है ], उस इस नारीकी हे प्रेत - मृतक! इह- इस लोकमें विद्यमान अर्थात् – तुझसे उत्पन्न; प्रजा - सन्तानको, और तुमसे प्राप्त द्रविणं-धनको घेहि - पाल, उसका पालन - पोषण - संरक्षण कर [ ' हुधान् धारणपोषणयोः ( जु. उ. अनि. ) यह धातु यहाँ है, जिसका अर्थ धारण - पोषण है, और धारण - पोषण पूर्व विद्यमानका होता है, इस प्रकार यहां पूर्व - विद्यमान सन्तान एवं धनका पोषण मृतकसे प्रार्थित हो रहा है ] । सम्पूर्ण अर्थं एवं तात्पर्य यह हुआ कि — ऐ मृतक अर्थात्-इस लोकको छोड़कर परलोकमें गये हुए आत्मा! यह तेरी स्त्री तुझसे गन्तव्य पतिलोककी प्राप्त्यर्थ तेरे पास चितामें अनुमरणार्थ लेटी हुई है; यह तो तेरे साथ सती हो जाएगी, तेरे लोकको प्राप्त होगी; पर इसकी तुझसे प्राप्त सन्तान एवं धनका इस प्रकार रक्षण कर, जिससे यह सन्तान और धन स्थिर रहे । यह यहांसे मृतक हुए, इस लोकके शरीरको छोड़कर परलोकमें गये हुए आत्मासे प्रार्थना है, यहांके किसी जीवित पुरुषसे प्रार्थना नहीं; क्योंकि यहां उसका कोई प्रसङ्ग नहीं; हां उसके घर वालों-संरक्षकोंको इसके सन्तान एवं धनका संरक्षण स्वयं ही उद् चोधित -हो जाता है । जैसे कि कहते हैं कि - ऐ उस्तरे! इस वच्चेकी नियोग वा विधवाविवाह ५२१ [ १२५ हिंसा न करनी जहां - यह तुरके अभिमानी देवताको चूडाकरणमे होते प्रार्थना हो जाती है; वहां छुरेके चलाने वाले हजामको बोधन मिल ही जाता है कि इस बच्चेका सिर सावधानतासे भी उद् मूंडना कि इस बच्चेको छुरा लग न जावे । अस्तु । यहां मृतक यह प्रार्थना करनेका कारण यह है कि सूत्र हो जानेपर, इस शरीरके छूट जानेपर ' जीवानामायुः प्रतिर मृतक जी त्वमग्ने! पितॄणां लोकमपि गच्छन्तु ये मृताः ' ( अथर्व, १२२४५ ) वेदन यहां मृतकका पितृलोकमें गमन कहा है । इससे उस मृतवत्री प्रका आत्मामें बड़ी शक्ति आ जाती है, उसका विभु स्वरूप इसी यथा समय तो अर्थात् ऐहिक - शरीर छोड़ने पर ही प्रकट हुआ कर स्थूल है । इसी शक्तिके कारण अथर्ववेद सं. ( १८ । ३ । १०-४४ ) आदि आच मन्त्रोंमें मृत - पितरोंसे रक्षाकी बहुत प्रार्थना की गई है । उस शक्ति कारण यह है कि जैसे घड़े में पड़े हुए दीपककी प्रकाश - शकि [ लक है, त स्थगित, सीमित होती है, उसका प्रकाश इधर - उधर फैल नहीं सकता; घड़ेसे दीपकके बाहर होनेपर तो उसकी प्रकाश - शक्ति बाहर अपन बड़ी तीव्र हो जाती है- सारा कमरा वा स्थान प्रकाशित हो जाता है, वैसे ही स्थूल लौकिक- शरीरसे आच्छन्न आत्माकी मी हट ज विभुत्वशक्तिका प्रकाश स्थगित हो जाता है, और स्थूल मानुष- प्रकट जाती शरीरमुक्त आत्माकी भी बहुत बड़ी विभुत्वशक्ति प्रादुर्भूत हो ' जाती है । मृतक पितरोंका पितृत्व पान्तीति पितरः - यह संरक्षण इ प्रार्थन भी उसी समय सार्थक होता है; तभी परलोक - विद्याविशारद जाने लोग - जिस रोगीकी चिकित्सामें यहांके डाक्टर सफल नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ५२६ होते; वे परलोक प्राप्त आत्माओं से उसके आरोग्यकी श्रोषधि करण उसका उपयोग करके उस रोगीको स्वस्थ करनेमें सफल श्री उद् हो पूछकर जाते हुए देखे गये हैं । मानवासे स्वा. शङ्कराचार्यने भी स्थूल शरीरमुक्त आत्मा में अपने ब्रह्म-सूत्रके भाष्य में बड़ी शक्ति मानी है । वह पाठ यह है - ' सोपि -मृतक जीवस्य ज्ञानैश्वर्यतिरोभावो देहयोगाद् – देहेन्द्रियमनोबुद्धिविषय-तु प्रतिर वेदनादियोगाद् भवति । अस्ति चात्र उपमा - ' यथा अग्नेर्दहन-१२ | ४५ ) प्रकाशनसम्पन्नस्यापि अरणिगतस्य दहनप्रकाशने तिरोहिते भवतः; मृतककी यथा वा भस्माच्छन्नस्य [ अग्नेर्दहनप्रकाशने तिरोधीयेते, तथा इसी स्थूलदेहाच्छन्नस्य आत्मनोपि ज्ञानैश्वर्यतिरोभावो जायते ] । करता - आचार्यने यहां बहुत अच्छा दृष्टान्त दिया है कि अग्निमें दहन आदि शक्ति भी है और प्रकाश - शक्ति भी । पर जब वह अरणि उसका [ लकड़ी ] में होती है; या उसके अङ्गारोंपर भस्म आई हुई होती है, तब अग्निदहन एवं प्रकाश स्थगित होते हैं; अरणिसे III III बाहर जाने पर तथा अङ्गारोंसे भस्म हटा देनेपर अग्निक श - शक्ति अपनी स्वाभाविक - शक्ति प्रकट हो उठती है, वैसे ही स्थूल शरीर हो जाता की सी हट जानेपर परलोक - प्राप्त आत्माकी भी स्वाभाविक विभुत्वादि - शक्ति प्रकट हो उठती है, तब उससे संरक्षरणादिकी प्रार्थना भी सङ्गत हो मानुष भूत हो जाती है, क्योंकि - स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्ममें शक्ति बहुत बढ़ जाती है । संरक्षण इससे मृतक पतिके प्रति उसकी सन्तान एवं धनके संरक्षणकी वैशारद प्रार्थना भी समूल सिद्ध हो जाती है, क्योंकि - स्थूल शरीर हट ल नहीं जानेसे उसकी ऐश्वर्यशालिता - ईश्वरता प्रकट हो जाती है । इससे नियोग वा विधवाविवाह [ ५२७ हमसे कहा हुआ अर्थ समूल सिद्ध हुआ । क्योंकि यह सतीधर्म-का प्रतिपादक मन्त्र है, विधवाविवाहका तो इसमें कहीं गन्ध ही नहीं । सती - धर्म ही पुराण - धर्म माना गया है । महाभारतमें कहा गया है - ' एको भर्ता स्त्रिया देवैर्विहितः कुरुनन्दन ' ( सभापर्व ६८।३५ ) ' दीर्घायुरथवाऽल्पायुः सगुणो निर्गुणोपि वा । सकृद् वृतो मया भर्ता द्वितीयं न वृणोम्यहम् ' ( वनपर्व २६४/२७ ) यही सतियोंका धर्म है - जिसे सावित्रीने कहा था । इस सतीधर्मको एक कवि प्राकृतिक बताता है- ' शशिना सह याति कौमुदी, सह मेघेन - तडित् प्रलीयते । प्रमदाः पतिमार्गगा इति प्रतिपन्न ह विचेतनैरपि ' । स्वा ॰ दयानन्दजीने भी ' द्विजों में स्त्री और पुरुष -का एक ही बार विवाह होना वेदादि - शास्त्रों में लिखा है - द्वितीय चार नहीं ' ( स.प्र. ४ पृ. ७१ ) यहां विधवाका विवाह निषिद्ध किया है, विवाहका भाव है पतिसे योग । विधवा - विवाह वा नियोग कहीं भी पुराणधर्म नहीं कहा गया । यह वेनराजासे प्रवर्तित होनेसे आदिमान् अर्वाचीन है, पुराण अर्थात् प्राचीन नहीं । इसे पाठकोंने स्पष्ट अनुभूत किया होगा कि इस मन्त्रमें विधवाके पत्यन्तरका गन्ध नामको भी नहीं । अब इस विषयमें दिये जाते हुए दूसरे मन्त्रको भी ' आलोक ' - पाठक देखें । ( २ ) ' उदीष्वं नारि । ' ' उदीर्ष्व नारि ' इस मन्त्रको सम्पूर्ण पहले लिख ही चुके हैं, अब पहले उसपर स्वा. द. जीका अर्थ उद्धृत करते हैं; अर्थ में - जहाँ उन्होंने मूलसे कुल बढ़ाया है, " प्रक्षेप किया है, वा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५२८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) गलत किया है; उसपर हम ' (? ) ' यह चिह्न अङ्कित करेंगे, विद्वान् पाठक सावधानतासे इसका भी निरीक्षण करें-' हे ( नारी ) विधवे, तू ( एतं गतासुम् ) इस मरे हुए पतिकी आशा छोड़के (? ) ( शेषे ) बाकी पुरुषोंमेंसे (? ) ( अभि, जीव-लोकम् ) जीते हुए दूसरे पतिको (? ) ( उपैहि? ) प्राप्त हो, और ( उदीर्ष्व ) इस बातका विचार और निश्चय रख (? ) कि - जो ( हस्तग्राभस्य दिधिषोः ) तुझ विधवाके पुन ( १ ) पाणिग्रहण करनेवाले नियुक्त (? ) पतिके सम्बन्धकेलिए नियोग होगा (? ) तो ( इदं ) यह ( जनित्वम् ) जना हुआ बालक ( १ ) उसी नियुक्त (? ) ( पत्युः ) पतिका होगा । और जो तू अपने लिए नियोग करेगी; तो वह सन्तान (? ) ( तव ) तेरा होगा, ऐसे निश्चययुक्त ( अभि-सम्बभूथ ) हो (? ) [ यहाँपर ' लिट् ' का अर्थ ' लोटू ' लकारका किया गया है । ] ( स.प्र. ) ४ समु. पृ. ७१ ) यहाँ संन्यासीजीके ऐसे अप्रासङ्गिक वा गलत अर्थ करनेपर बड़ा खेद होता है । इस निर्मूल अर्थको देखकर स्वा.द.जीसे श्रद्धा सर्वथा हट जाती है; पर आर्यसमाजमें कई विद्वान् हैं; ऐसे अर्थके अनर्थको देखते हुए भी उन्हें ऋषि महर्षि कहते हैं; और उनपर श्रद्धा रखते हैं, यह देखकर उनकी विद्वत्तापर बड़ा खेद आता है । यहाँ तो स्वामीजी ईश्वरकी बनाई हुई पुस्तकके ईश्वरसे अभीष्ट अर्थ करते हुए ईश्वरसे भी न डरे कि कहीं इससे वह हमारी अकालमृत्यु न करादे? । स्वामीके अर्थ में प्रष्टव्य है कि- ' गतासुम ' के अर्थ में ' आशा CC - 0. Ankur Joshi Collection सायण और विधवाविवाह [ ५२३ ५३० छोड़के ' यह किस पदका अर्थ है? ' शेषे ' यह क्रिया है विध ही मन्त्रमें निघात ( सर्वानुदात्त ) स्वर है ' उप ', उसीका विध उपसर्ग है; लेकिन स्वामीने उस ' शेषे ' को सुबन्त यह उसीका वयो का ' एहि ' से योग करके या तो अपनी अनभिज्ञता बनाकर ' उप ' विव प्रकट की है अथवा संस्कृत अशिक्षित जनताकी आँखों में धूलि प्रक्षेप, किया है । यह तो उनके अनुयायी जान सकते हैं; जो प्रसङ्ग वस न होने-पर भी उनके अर्थोंमें बलात् स्वर- व्यत्यय बताया करते हैं । हाथ अन्य भी जो प्रक्षेप अपने अनर्थरूप अर्थ में स्वामी ने किये हैं, अथ जिनपर हमने (? ) यह चिन्ह दिये हैं, उनके लिए यहाँ लज्जाका स्थान है! स्वामीके अनुयायी तो स्मृति - पुराणादिमें प्रक्षेष त्यक बताया करते हैं; अब तो उनके स्वामीजी ही स्वार्थसिद्ध्यर्थं प्रचि वेदमें भी प्रक्षेप करनेकेलिए तत्पर हैं; अत्यन्त खेद!!! विद्वान् जीव लोग स्वामीकी इस लीलाको घृणादृष्टिसे देखते हैं । यही ' वेद- जीव मन्त्रार्थ- हत्या ' हुआ करती है । का कई उनके अनुयायी इस मन्त्रमें उनके किये हुए नियोग प्रक अर्थकी अनुपपन्नता देखकर ' विधवाविवाह ' अर्थ करते हैं, वह कि भी ठीक नहीं । एक मन्त्र है- ' आ नो अग्ने! सुमतिं सम्भलो गमेदिमां कुमारीं, सह भगेन ' ( अथर्व २३६।१ ) दूसरा मन्त्र है-- ' मा हिंसिष्टं कुमार्यम् ' ( अ. १४ | १ | ६३ ) यह विवाह - सम्वद्ध मन्त्र हैं । इनमें प्रष्टव्य है कि - ' कुमारी ' शब्दका क्या अर्थ है? यदि यहाँ ' कुमारी ' का ' अविवाहिता ' अर्थ है, जैसेकि महाभाष्य-में लिखा है- ' कुमारी अपूर्वपतिः पतिमुपपन्ना ' ( ४/२/१३ ); तब स ० ध ० ३४ Gujarat. An eGangotri Initiative