सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 31–40
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 31–40
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३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) नहि मंगलमथशब्दवाच्यं क्वचित् प्रसिध्यति । न चाऽप्रसिद्धार्थ - कल्पनं न्याय्यम् । ' अथ ' शब्दश्रवणमात्रार्थकं तु मङ्गलम् । न च तस्य स्वार्थे समन्वय उपपद्यते, शब्दार्थत्वाभावात् । शब्दार्थो हि वाक्यार्थे समन्वीयते, न च कार्य न वा ज्ञाप्यम् ।... ' श्रतो न मंगलवचनोऽथशब्दः ' । अर्थात् ' अथ ' यहाँ मङ्गलवाचक नहीं, किन्तु ' आनन्तर्य ' वाचक है । तब स्वाद से ही उद्धृत उक्त दर्शनोंके भाष्यस्थ वचनों वा अपने ही वचनोंसे ' अथ ' शब्दकी मङ्गलार्थकता स्वयं कट गई । तब ' श्रीगणेशाय नमः ' इत्यादि द्वारा मङ्गलाचरण करनेवालों-को विरुद्ध मङ्गलाचरण करनेवाला बताना यह स्वामीका कथन अनुपपन्न सिद्ध हुआ, जबकि दार्शनिकोंने ' अथ ' शब्दको मङ्गल-बाचक नहीं रखा, किन्तु ' श्रनन्तर्य ' श्रर्थवाला रखा है । पर यदि वे स्वामीके अनुसार मङ्गलाचरण पक्षवाले थे; तो उन्होंने गणेशादिका मङ्गल ग्रन्थारम्भसे पूर्व ही कर लिया होगा; अथवा त्रिकालज्ञता से आगे के विघ्नोंको न देखकर तन्निवारणार्थं मङ्गलाचरण पिष्टपेषण समझा होगा; पर आगेके विद्वानोंने आगे समयकी अल्पज्ञता देखकर तथा शिष्यशिक्षार्थं किसी श्रीगणेशादिदेवको नमस्कार करनेके मङ्गलकी प्रवृत्ति कर दी -यह कोई विरुद्धता नहीं हुई; क्योंकि- मङ्गलके अविगीत - शिष्टा-चारविषयक होनेसे विघ्नोंके न होनेपर भी शिष्टाचार - पूर्ति मात्र हो ही जाती है । ( ७ ) आगे स्वा.द.जी प्रश्नोत्तर करते हैं - ( प्रश्न ) जैसे अन्य CC - 0. Ankur Joshi Collection मङ्गलमें विघ्नवारण [ ३५ ग्रन्थकार लोग आदि, मध्य और अन्तमें मङ्गलाचरण करते हैं, वैसे आपने कुछ भी न लिखा, न किया ' ( उत्तर ) ऐसा हमको करना योग्य नहीं; क्योंकि जो आदि, मध्य और अन्त में मङ्गल करेगा; तो उसके ग्रन्थमें आदि, मध्य तथा अन्तके बीच में जो कुछ लेख होगा, वह श्रमङ्गल ही रहेगा ' ( स.प्र. १ पृ. १२ ) यह दण्डी दयानन्दजीका अद्भुत तर्क है । जिस दएडीने आशैलीमें मङ्गलाचरणके ' अथ ' श्रादिमें सिद्ध करनेकेलिए स.प्र. के १३ वें पृष्ठ में सबसे पहले ' अथ शब्दानुशासनम् ' यह व्याकरणमद्दा-भाष्यका प्रमाण प्रतिष्ठा के साथ उदधृत किया; उस दण्डी ( संन्यासी ) ने उक्त प्रश्नके उक्त उत्तरको लिखते हुए उसी व्या-करणमहाभाष्यके प्रणेता श्रीपतञ्जलिके ऊपर भी अपना दण्ड फेंक दिया । श्रीपतञ्जलिने ' सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे ' इस वार्तिककी व्याख्या करते हुए ' सिद्ध ' शब्दको वार्तिककार श्रीकात्यायनका आदिम-मङ्गल सिद्ध किया है । श्रादिम - मङ्गलकी आवश्यकता बताते हुए भाष्यकारने कहा है- ' माङ्गलिक आचार्यो महतः शास्त्रौघस्थ मंगलार्थे सिद्धशब्दम् श्रादितः प्रयुङ्क्ते । मंगलादीनि हि शास्त्राणि प्रथन्ते ' । इससे उन लोगों का भी खण्डन होगया; जो व्यक्ति ' सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे'को वार्तिककारका आदिम वार्तिक न मानकर ' रक्षोहागम ' इसे वार्तिककारका प्रथम वार्तिक बताते हैं । नहीं तो ' किं न महता कण्ठेन नित्यशब्द एवोपात्तः; यस्मिन्नु-पादीयमानेऽसन्देहः स्यात् ' इससे प्रतिपक्षी सिद्धान्तीको ' नित्य ' Gujarat. An eGangotri Initiative
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३६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मङ्गलमें विघ्नवारण ३८ शब्द रखनेकेलिए दबा रहा था; उसपर भाष्यकारने ' सिद्ध ' शब्दको आदिमें मङ्गलार्थक बताकर वादीको परास्त कर दिया । यदि ' रक्षा ' - यही आदिम वार्तिक होता; तब वादीका प्रश्न उपस्थित होता कि- आदिम - वार्तिक तो ' रक्षोहागम ' आ चुका है; आदि मङ्गलाचरण ' रक्षा ' शब्दसे वहीं होता; यहाँ करनेपर तो आदिका मङ्गल न होकर मध्यका मङ्गल हो जायगा । पर वादीका यहाँ यह प्रश्न न होनेसे सिद्ध हुआ कि - आदिम वार्तिक यही है; उसका आदिम मङ्गल भी यही है । इसी प्रकार तृतीयाह्निकमें ' वृद्धिरादैच् ' ( १।१।१ ) इस पाणिनि-सूत्रमें ' संज्ञाशब्द- वृद्धि आदिमें क्यों आया; अन्य गुण आदि संज्ञाओं की तरह अन्तमें क्यों नहीं आया ' इसपर भी भाष्यकार-ने ' वृद्धि ' को पाणिनिका श्रादिममङ्गलार्थक बताया- ' एतदेकमा -चार्यस्य मङ्गलार्थं मृष्यताम् । माङ्गलिक आचार्यो महतः शास्त्रौघस्य मङ्गलार्थं वृद्धिशब्दमादितः प्रयुङ्क्ते, मंगलादीनि ह शास्त्राणि प्रथन्ते ' । यहाँ भी उन व्यक्तियोंका खण्डन होगया, जो कि - ' अथ शब्दानुशासनम ' को पाणिनिका आदिसूत्र मानते हैं, और ' अथ ' शब्दको मङ्गलार्थक मानते हैं । नहीं तो फिर वादीका प्रश्न उपस्थित हो जाता है कि - पाणिनिका ' वृद्धिरादैच् ' आदिमसूत्र तो है नहीं; आदिमसूत्र तो उसका ' अथ शब्दानु ' है, और वहाँ मंगलाचरण हो चुका है, फिर यहाँ ' वृद्धि ' शब्द में • आदि - मंगलकी व्यर्थता है - यह तो मध्यका मंगल है; इसपर भाष्यकार प्रत्युत्तर न दे सकते । पर उक्त प्रश्न नहीं किया गया; CC - 0. Ankur Joshi Collection क्योंकि – ' अथ शब्दा ’ – यह पाणिनिका सूत्र नहीं था । अतः मड सिंग है कि - ' वृद्धिरादैच् ' ( १ | १ | १ ) ही पाणिनिका आदि - सूत्र है, ' वृद्धि ' शब्द ही आदि - मंगल है | आ आ इसी प्रकार भाष्यकारने ‘ भूवादि ' ( १ | ३ | १ ) सूत्र में ' भूवादी नम वकारोऽयं मंगलार्थः प्रयुज्यते ' यह कहकर ' मांगलिक आचा ( ल महतः शास्त्रौघस्य मंगलार्थं वकारमागमं प्रयुङ्क्ते । मंगलादी उन मंगल मध्यानि, मंगलान्तानि शास्त्राणि प्रथन्ते. अध्येता मंगलयुक्ता यथा स्युः ' यहाँ भाष्यकारने शास्त्रके आदि, मा कर तथा अन्तमें मङ्गलाचरणका अनुशासन किया है । तीसरे पादा आदि - सूत्र होनेसे इसी में ' भू ' यह महाव्याहृतिका आदि फ मङ्गल, जैसेकि - धातुपाठ में भी इसी कारण ' भू ' धातु रखी एं आ है । ' व ' मध्यका मङ्गल, और अन्तिम ' व ' फिर अन्तका मङ्ग कर सिद्ध होता है । ' पुच्छादिषु धात्वर्थे इत्येव सिद्धम् ' इस दशग पच के अन्तिम गणसूत्रमें ' सिद्ध ' शब्दो ग्रन्थान्ते मङ्गलार्थः’य बत श्रीदीक्षितने लिखा है । फलतः श्रीपाणिनि - कात्यायन- पतञ्ज आचार्य आदिके अनुसार आदि, मध्य, अन्त में विशेषतः आदि अ में मङ्गलाचरण होना आवश्यक तथा आर्षशैली है, यह ि अ होता है । उसपर ' जो आदि, मध्य और अन्त में मङ्गल करेग तो उसके प्रन्थमें आदि, मध्य तथा अन्तके बीच में जो कु दे म लेख होगा - वह अमङ्गल ही रहेगा ' यह उनपर दण्डी दयानन्द कर जीका तर्क- दण्ड फेंकना उन स्वप्रमाणित आचार्योंपर खुद सन आक्रमण है । इस प्रकार तो दर्शनोंकी आदिमें ' अथ ' शब्द Gujarat. An eGangotri Initiative
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३८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मङ्गलमें विघ्नवारण [ ३ मङ्गलार्थक सिद्ध करते हुए मुएडीजीने उन्हींके ग्रन्थोंमें अमङ्गल अतः सिद्ध करके उनका तथा अपना भी मुण्डन कर दिया । नहीं तो है, आदिमें भी उनको ' अथ ' शब्दसे मङ्गलाचरण सिद्ध करनेकी आवश्यकता क्या थी? क्या इसलिए कि इससे ' श्रीगणेशाय ' भूवादी नमः का खण्डन हो जावे? वस्तुतः स्वामीकी उक्त युक्ति तुच्छ श्राचा ( लचर ) है । आदि - मध्य - अन्तमें मङ्गल होजानेसे उसका प्रभाव गलादी उनके आगे - पीछेके स्थलों में स्वतः हो जाता है, तथा माना जाता है । लोग प्रातः, मध्याह्न, सायंकालके मङ्गलार्थ त्रिकाल संध्या दि करते हैं; तो अवशिष्ट काल क्या अमङ्गल हो जावेगा? पादा ( ८ ) सांख्यदर्शनमें लिखा है- ' मङ्गलाचरणं शिष्टाचारात्, फलदर्शनात्, श्रुतितश्च ' ( २१ ) इसका अर्थ यह है कि - मङ्गलका रखी आचरण करना चाहिये; क्योंकि - शिष्ट लोग इसका आचरण काम करते हैं, इसका फल भी देखा गया है, श्रुति भी मङ्गलकी दशगणी पक्षपातिनी है; परन्तु स्वा. द. जीने इसके अर्थ में श्रुतिसे कैसा र्थः य बलात्कार किया है, यह देखना चाहिये । - पत ‘ मङ्गलाचरणं शिष्टा – यह सांख्यका वचन है । इसका यह न्तः आदि अभिप्राय है - जो न्याय, पक्षपातरहित, सत्यवेदोक्त ईश्वरकी यह सिर आज्ञा है, उसीका यथावत् सर्वत्र और सदा आचरण करना ल करेगा मङ्गलाचरण, न कि — कहीं मङ्गल और कहीं अमङ्गल लिखना । जो कुछ देखिये महाशय महर्षियोंके लेख को — ' यानि अनवद्यानि दयानन्द कर्माणि तानि सेवितव्यानि, नो इतराणि ' ( तै. उ. ७/११ ) हे नर खुल सन्तानो! जो अभिनन्दनीय अर्थात् धर्मयुक्त कर्म हैं, वे ही ' शब्दको CC - 0. Ankur Joshi तुमको करने योग्य हैं, अधर्मयुक्त नहीं ' ( स.प्र. १ पृ. १२-१३ ) यहाँ तो मुण्डी ( संन्यासी ) जीने साङ्ख्यसूत्रका भी मुण्डन कर दिया । सांख्यसूत्रने मङ्गलाचरणको प्रमाणित सिद्ध किया था, पर स्वामीने उसे सर्वथा उड़ा ही दिया । स्वामी के अनुसार तो दार्शनिकोंने माङ्गलिक ' अथ ' शब्दको भी आदिमें व्यर्थ ही रखा; क्योंकि- स्वामी के मत में यह मङ्गल ही नहीं; किन्तु सत्यका आचरण ही मङ्गल है, और कुछ नहीं । उसीका स्वामीके मत में सर्वत्र आचरण करना ही मङ्गलाचरण है; तब तो केवल आदिमें ही ' अथ ' शब्दसे मङ्गल करते हुए दार्शनिक मुनि भी स्वामी के मतमें ' अनार्ष ' सिद्ध हुए । स्वामीजी धन्य हैं । उनने स्वयं ही स.प्र. की आदिमें ' सच्चिदानन्देश्वराय नमोनमः ' और सं. वि. की आदि में ' नमोनमः सर्वविधात्रे जगदीश्वराय ' यह मङ्गलाचरण करके अपने से विरुद्धता कर दी; नहीं तो यदि स्वामीने सर्वत्र असत्य - खण्डन तथा सत्यका मण्डन ही किया है, यही उनका श्रीतुलसीराम - स्वामीके मतसे मङ्गलाचरण है, तब वह तो उनके अनुसार सम्पन्न ही है; फिर स्वामीने पृथक् मङ्गलाचरण क्यों किया? क्या यहाँ स्वामीने ' यावज्जीवमहं मौनी ब्रह्मचारी तु मे पिता । माता तु मम वन्ध्यासीद् अपुत्रश्च पितामह: ' इस
श्लोकको चरितार्थ नहीं किया? मङ्गलाचरणके विषय में स्वामी
अपने एक भी सिद्धान्त में स्थिर न रहे, गिरगिट की भांति उनने मङ्गलका रङ्ग भी बदल दिया, और अपने वचनमें व्याघात कर दिया - यह ' आलोक ' पाठक विद्वान् स्वयं यहाँ सूक्ष्म दृष्टि डालें । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मङ्गलमें विघ्नवारण ' यहाँ प्रष्टव्य है कि - स्वामीने जो उक्त सांख्यसूत्रका यह अर्थ किया; वह सूत्र के किन शब्दोंका है? क्या किसी प्रमाणको लेकर उसका मनमाना अर्थ करना ही उसकी व्याख्या होती है? भोज आदि तो पहले से ही - ' दुर्बोधं यदतीव तद्धि जहति स्पष्टार्थ -मित्युक्तिभिः, स्पष्टार्थेष्वतिविस्तृतिं विदधति व्यथैः समासादिकैः । अस्थानेऽनुपयोगिभिश्च बहुभिर्जल्पैर्भ्रमं तन्वते - श्रोतणाम् इति वस्तुविस्वकृतः प्रायो हि टीकाकृत: ' इस प्रकार टीकाकारोंकी निन्दा करते हैं कि वे बेठिकाने अनुपयोगी बकवादोंसे श्रोताओं वा द्रष्टाओंको भ्रममें डाल दिया करते हैं; स्वामी तो उनसे भी बढ़ गये कि - मूलशब्दके अर्थको भी वे अपनी कपोल - कल्पनासे करने लगे । धन्य हैं वे ' परिव्राजकाचार्य ', क्या यही ' सत्यका सर्वत्र यथावत् आचरण ' है? स्वामीसे प्रष्टव्य है कि उन्होंने मङ्गलाचरणके प्रकरणमें ' यानि अनवद्यानि कर्माणि ' यह प्रमाण कैसे उधृत किया? ' वेदमनूच्य आचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति ' ( १ | ११ | १ ) इस प्रकरण ( तै. उ. ) में क्या पुस्तकोंके मङ्गलाचरणका कोई वर्णन था जोकि वे ऐसा वर्णन करने बैठे? खेद! जब हम स्वामीको प्राचीन - साहित्य पर इस प्रकार छुरी चलाते हुए पाते हैं; और फिर उनके अनुयायियोंको उनका अनुमोदन करते पाते हैं; तो उससे हमें बहुत दुःख होता है । ( ६ ) कुछ सनातनधर्मी मङ्गलार्थ ' श्री ' लिखा करते हैं; उनपर स्वामीके अनुयायी आक्षेप करते हैं कि- मङ्गलाचरणमें ' अथ ' अथवा ' ओम् ' लिखना चाहिये ' उनसे प्रष्टव्य है कि - ' अथ ' शब्दका अर्थ ' मङ्गल ' न होने पर भी जब आप उसे मङ्गलार्थ भी मानते हैं, तब ‘ श्रीः ' पर आक्षेप कैसे? ' श्री ' शब्द तो स लि माङ्गलिक है । ' श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ ' ( यजुः वा. सं. ३१।२३ " स यहाँ वेदने ' श्री ' को परमात्माकी पत्नी बताया है, तब अ स्मरण मङ्गल क्यों न हो? इस कारण किरातार्जुनीय तर का शिशुपाल वध आदि अन्त में ' श्री ' वा लक्ष्मी शब्द मङ्ग प्रयुक्त हैं । आक्षेप्ताओं के स्वामीने भी स. प्र. के १ म समुल्ला यह ( १० पृष्ठ ) में लिखा है - ' श्रिञ् सेवायाम् ' इस धातुसे ' श्री ' शा निर सिद्ध होता है, ' यः श्रीयते - सेव्यते सर्वेण जगता विद्वद्भिर्योगिभिः स श्रीरीश्वरः । लक्ष दर्शनाङ्कयोः - इस धातुसे लक्ष्मी - पदसि गय होता है । यो लक्षयति पश्यति अङ्कते चिह्नयति चराचरं जग अथवा वेदैराप्तैर्योगिभिश्च स लक्ष्मीः सर्वप्रियेश्वरः ' । यहाँपर ‘ श्री ' शब्दमें ‘ य्वन्तमेका क्षरम् ' ( १२ ) इस श्रीपाणिकिं लिङ्गानुशासन के सूत्र से और लक्ष्मी में ' ईकारान्तश्च ' ( १० ) झ ( स. सूत्रसे स्त्रीलिङ्ग है । तभी तो ' श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ ' ( वार्ड ३१।२२ ) इस यजुर्वेद मन्त्रमें उन दोनोंको पत्नी कहा है । आ ' पत्नी ' की ' पत्युर्नो यज्ञसंयोगे ' ( पा. ४ १ ३३ ), इस वेदाङ्गके सूत्रो आ सिद्धि है । स्वामीने यहाँ अपने प्रमाणित पाणिनिकें तीन सूत्रों पर विरुद्ध पुंलिङ्गका अर्थ क्यों किया? तब उनका अर्थ वेद चार वेदाङ्गसे विरुद्ध होनेसे अमाननीय है । ईश्वर अर्थ माननेप प्रम ' श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ ' ( यजुः वा. सं. ३१/२२ ) इस मन्त्रमें दे नही ईश्वर मानने पड़ेंगे अथवा हम यदि यह आपत्ति न भी उठावें, ता CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४३ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मङ्गलमें विघ्नवारण [ ४३ मङ्गलाई भी यदि स्वामी ' श्री ' शब्दसे परमात्माको लेते हैं, तो मङ्गलके-तो स लिए वा. द. के लिखे ' सच्चिदानन्देश्वराय नमोनमः ' के अनुसार -. ३१ ' सर्वं जगत् के विद्वानोंसे सेवनीय ' ' श्री ' शब्द के उल्लेख से सनातनधर्मी उस आक्षेपयोग्य कैसे हो सकते हैं? जोकि ' ओम् ' शब्दकेलिए यत कहा जाता है; तो वेदकी आदिमें ही ' ओम् ' शब्दको छोड़कर मङ्गल ' अग्नि ' आदि शब्द क्यों रखा गया? ' अग्निमीले ' ( शा. १ | १ | १ ) समुल्ला यही मन्त्र है, उसमें ' ओम् ' प्रक्षिप्त है; क्योंकि वह मन्त्रके श्री ' श नियत वर्णोंकी संख्यासे बहिर्भूत है, छन्दकी दृष्टिसे भी बहिर्भूत योगिभि है; क्योंकि - अनुक्रमणिका में यहाँ ' भुरिक् ' गायत्री नहीं माना पद गया है । गायत्री २४ अक्षर होनेपर होता है; यहाँ २४ अक्षर हैं रंजग ही । इसलिए वेदकी पदानुक्रमणिकाओं में ' ओम् ' की १११११ • संख्या नहीं | यह स्वा. द. ने भी स्वयं स्वीकार किया है कि-' अग्नि, इटू, अग्नि, ये ' यह शब्द वेदोंकी आदि में लिखे हैं ' पाणिनि ( स.प्र. १ समु. पृ. १३ ) १० ) इ ' ओम् ' शब्दकी महिमाको सनातनधर्मियोंके वेद - उपनिषद् ' ( वा. ) कहा है आदि ही स्पष्टतया सिद्ध करते हैं । तब सनातनधर्मी लोग आदिमें मंगलार्थं ' ' ओम् ' लिखें, वा ' श्री ' इसमें वे ही प्रमाण हैं; के सूत्रा पर अपने आपको ' वैदिक ' माननेवाले और वेदोंकी केवल इन्हीं न सूत्रों चार पोथियोंको वेद माननेवालोंके पास अपने वेदका कौनसा वेद एवं प्रमाण है, जिससे आदिमें ' ओम् ' का लिखना आवश्यक बताया माननेपा हो । ' ऋचो अक्षरे ' इस मन्त्र में भी उसका आदिमें उल्लेख न्त्रमें दे नहीं माना गया । संस्कारविधि ( पृ. २८४ ) में तथा सत्यार्थप्र.. ठर CC - 0. Ankur Joshi ( ४१ पृष्ठ ) में तो इसका ' ओम् ' परक अर्थ किया ही नहीं गया है । यदि ' ॐ अग्निमीले ' वा ' श्र अग्निमीले ' इस प्रकार लिखा जावेगा; तो या तो अशुद्ध होगा; क्योंकि- ' म् ' को अनुस्वार ' अच् ' ( स्वर ) सामने होनेपर नहीं हो सकता । या फिर अच् ( स्वर ) परे होनेपर भी ' ॐ ' अथवा ' श्रीं ' यह लिखना गणेश की मूर्ति सिद्ध होगा; जिसे हम पञ्चमपुष्पके आदिम एवम् अन्तिम निबन्धमें सिद्ध कर चुके हैं; जिसे दयानन्दानुयायी ' पौराणिक ' मानते हैं । पहला हिस्सा ' गणेश ' के गजाननकी सूँड होगी, I ऊपरका अनुनासिक उसका ' बालचन्द्र ' होगा; वा ऊपरका ' अनुस्वार ' उसका ' मोदक ' होगा । इससे स्पष्ट है कि वेदके अतिरिक्त आदि में कोई ' ओम् ' लिखे वा ' श्री '; इसमें उसकी इच्छा ही प्रमाण है । वस्तुतः तीन वेदोंके सारस्वरूप ' ओम्'के अत्यन्त श्रेष्ठ होनेसे सनातनधर्मी उसका सर्वसाधारण स्थलमें प्रयोग नहीं करते । क्योंकि वे उसमें सभीको अधिकृत नहीं मानते | सनातनधर्मियोंको जो वस्तु अत्यन्त प्रिय होती है; उसे वे ' गोपनीयं, गोपनीयं, गोपनीयं प्रयत्नतः ' सर्वसाधारण स्थल में प्रयुक्त नहीं करते, नहीं तो वह वस्तु गौण हो जाती है । इसी आशय से वे इसका वेदसे अतिरिक्त स्थलमें साधारणतया प्रयोग नहीं करते । इस विषय में ' आलोक ' के पञ्चमपुष्पकी अन्तिम कलिका में देखें | ( १० ) आश्चर्य तो यह है कि- स्वा. द. जीने ' नारायणाय नमः ' इस मंगलाचरण को भी आक्षेप्य माना है । वे स.प्र. ८ पृष्ठमें Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) लिखते हैं — ' आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ' ( मनु. १।१० ) जल और जीवोंका नाम ' नारा ' है; अयन अर्थात् निवासस्थान हैं जिसका, इसलिए सब जीवोंमें व्यापक परमात्माका नाम नारायण है ' । यदि ' नारायण ' यह परमात्मा के अर्थवाला है; तो आदिमें उस परमात्माका स्मरण मंगल क्यों नहीं? क्या स्वामीने सं.वि.की आदिमें तथा स.प्र. की भूमिकाकी आदिमें परमात्मा के नाम सच्चिदानन्द वा ईश्वर के स्मरणका मंगल नहीं किया? ( ११ ) उक्त मनु - पद्यके व्याख्यान के अवसर पर भी स्वामीने भूल की है, उसमें भी विद्वान् दृष्टि डालें । उक्त श्लोकका स्पष्ट एवं वास्तविक अर्थ तो यह है कि- ' नारायण ' में दो पद हैं, नार और अयन । मनुजी कहते हैं- अप् ( जल ) को ' नारा ' कहा जाता है । तब यह प्रश्न होता है - क्यों? मनु इसका कारण बताते हैं कि - ' आपो वै नर - सूनवः ' अर्थात् जल नर - ' सहस्रशीर्षा पुरुषः ' ( यजुः ३१।१ ) इस मन्त्र में प्रसिद्ध पुरुष - परमात्माके सुनु - पुत्र-स्थानीय हैं, उसके शरीरसे उत्पन्न हैं- ' सोभिध्याय शरीरात् स्वात् ··· अप एव ससर्जादौ ' ( मनु. ११८ ) इसीलिए शाकुन्तल-नाटकके आदिमें भी लिखा है- ' या सृष्टिः स्रष्टुराद्या ' जो स्रष्टा पुरुषकी आदिम सृष्टि है अर्थात् जल । इसी कारण जल ' नार ' कहे जाते हैं; क्योंकि - ' नर ' शब्दसे तद्धिती अण् प्रत्यय है; पूर्व - अच्को वृद्धि है । मङ्गलमें विघ्नवारण [ m आगे मनुजी कहते हैं - ताः ( वे जल ) यद् अस्य ( जो उ परमात्म - पुरुषके ) अयन - निवासस्थान हैं; इसलिए परमात्माको ' जलशायी ' कहा जाता है; ' तेन नारायणः स्मृत: ' इससे उसका नाम ' नारायण ' है । ‘ ताः ' से ' आपः ' लिये जाते हैं; क्योंकि ' तद् ' शब्द पूर्वको निर्दिष्ट कर रहा होता है । वह पूर्व है- ' आ नाराः ’ ‘ अप् ’ शब्द । ‘ अप् - सुमनः समा - सिकता - वर्षाणां बहुत च ' ( २६ ) इस पाणिनीय लिङ्गानुशासन के सूत्र से ' अप् ' शब्द a स्त्रीलिंग और बहुवचनमें होता है । इससे ' ता: ' इस स्त्रीलिङ्गं प्रथमाके बहुवचनान्तपदसे पूर्व ठहरे हुए ' आप ' पदका ग्रहण है । अर्थात् - जलशायी होनेसे परमात्माका नाम ' नारायण ' होता है । ' देवशयनी ' एकादशी प्रसिद्ध ही है; जब नारायण भगवान् उन जलोंको अपना निवासस्थान बनाते हैं । अब स्वा.द.जीका अर्थ देखिये, जिसे हम पहले उधृत कर चुके हैं । वे लिखते हैं- ' जल और जीवोंका नाम नारा है ' । विद्वान् यहाँ देखें - ' जल और जीवोंका ' यह अर्थ स्वामी कहांसे लाये? क्या ' आपो नारा इति प्रोक्ताः का यह अर्थ है? क्या यह अर्थ कभी हो सकता है? इस प्रकारके निजी अर्थ करने-वालोंको आजकल ' महर्षि ' पदवी दे दी जाती है यह है कलियुग की निरंकुशता!!! वे अयन अर्थात् निवासस्थान हैं जिसका, इसलिए सब जीवोंमें व्यापक परमात्माका नाम नारायण है ' । हा खेद! पहले तो स्वामीने नाममात्रसे सही, जलका नाम लिख दिया, उपसंहारमें तो उसे भी छोड़ दिया ॥ केवल ' जीवों में CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative
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[ म ४६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ( जो उस नात्माको व्यापक ' यह अर्थ कर दिया । ' जीवोंमें ' यह स्वामीने मनुपद्यके उसका किस पदका अर्थ किया यह प्रष्टव्य है । यदि वे मनुजीका क्योंकि प्रमाण न लिखते; तब उनके सम्प्रदाय के चेले, बिना ननु नच - ' आप किये उस अर्थको मान लेते, परन्तु यहाँ मनुका प्रमाण देकर उसके अर्थमें अपनी कपोल - कल्पना लादना - यह उनकी लीला है, बहुत जैसा कि वे अपने वेदभाष्य में भी कर गये हैं । यहाँ हम आर्य-' शब्द समाजी श्री तुलसीरामजीका उक्त मनुपद्यका अर्थ देते हैं, इससे स्वामीके अनुयायी जानें कि- स्वामीका अर्थ कैसा है? ' अपू'को ग्रह ' नारा ' कहते हैं, क्योंकि नर - परमात्मासे उत्पन्न हुआ है । वह रायण ' नारा ' प्रथम स्थान है जिसका, इस कारण परमात्माको नारायण नारायर कहते हैं ' कैसा यह स्पष्ट उत्कृष्ट अर्थ है? और स्वाद का कैसा अनर्गल अर्थ है? धृत कर ( १२ ) यही स्वामीजी लिखते हैं- ' यो धर्म्यान् शब्दान् है । गृणाति - उपदिशति स गुरुः ' स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात ' कहांसे ( योग, समाधि. २६ ) जो... सृष्टिकी आदि में अग्नि, वायु, ? क्या आदित्य, अङ्गिरा और ब्रह्मादि गुरुओंका भी गुरु इसलिए करने परमेश्वरका नाम गुरु है ' ( स.प्र. पू. ६ ) ' शिवु कल्याणे ' इस युग धातुसे ' शिव ' शब्द सिद्ध होता है । ' बहुलमेतन्निदर्शनम् ' इससे जिसका, ' शिवु ' धातु माना जाता है । जो कल्याणस्वरूप और कल्याणका है ' । करनेद्दारा है, इसलिए उस परमेश्वरका नाम शिव है ' ( पृ. १२ ) का नाम ' सृ गतौ - इस धातुसे सरस् उससे मतुप् ङीप् प्रत्यय होने से ' जीवों में ' सरस्वती ' शब्द सिद्ध होता है । सरो- ' विविधं ज्ञानं विद्यते यस्यां CC - 0. Ankur Joshi मङ्गलमें विनवारण [ ४७ Collection Gujarat. चितौ सा सरस्वती ' जिसका विविध ज्ञान अर्थात् - शब्द, अर्थ, सम्बन्ध प्रयोगका ज्ञान यथावत् होवे, इससे उस परमेश्वरका नाम सरस्वती है ' ( पृ. ११ ) यहाँ स्वामीने गुरु, शिव, सरस्वतीको परमात्माका नाम माना है, फिर १३ पृष्ठमें ' श्रीगुरुचरणार-विन्दाभ्यां नमः, शिवाय नमः, सरस्वत्यै नमः ' इत्यादि मङ्गला-चरणका विरोध किया है, व्याघातके कारण स्वामीजी स्वयं खण्डित हो गये । ' शिवु ' धातु स्वामीने स्वयं घड़ी हैं । ' शिव ' शब्दकी तो ' सर्व... शिव ' ( १।१५३ ) इस उणादिसूत्र से शी धातुको वन्प्रत्यय और हस्व करनेपर सिद्धि होती है, ' शेते प्रलय-समये अस्मिन् जर्गादति शिवः ' । इसी प्रकार अन्य धातुएँ भी स्वामी स्वयं घड़ दिया करते थे - ' गप्पम'को ' गट मिथ्याभाषणे'-से ' प ' प्रत्यय द्वारा सिद्ध कर के उनने शोलेतुरके विज्ञापनमें प्रयुक्त किया है- जबकि गप् धातु होती ही नहीं । यदि ग्रन्थकार ' श्रीगुरवे नमः ' लिखते हुए परमात्माको न भी लें, किन्तु अपने शिक्षकको भी लें, तब भी उन्हें आदिमें नमस्कार करने में जहाँ मङ्गल है, वहाँ कृतज्ञता भी है । स्वामीने भी अपने गुरु श्री विरजानन्दकी कृतज्ञतार्थ अपने सत्यार्थप्रकाश, संस्कार - विधि आदि पुस्तकोंकी पुष्पिका में उन्हें बहुवचनसे आहत किया है । बहुवचन के लिए स्वामीने आर्याभिविनय ( पृ.४१ ) में लिखा है — ' बहुवचनमादरार्थम् ' । इस प्रकार अन्य पुरुष भी यदि गुरुजीका आदिमें स्मरण करके उनका सत्कार करते हैं; तो वे क्या अपराध करते हैं? An eGangotri Initiative
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४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मङ्गलमें विघ्नवारण आश्चर्य तो यह है कि- स्वामीने स. प्र. के ११ वें समु. २०० पृष्ठमें मूर्तिपूजा के खण्डन प्रकरण में ' आचार्यदेवो भव ' ( तैत्ति. १ | ११ ) इस प्रमाणको देकर ' तीसरा आचार्य जो विद्याका देनेहारा है, उसकी तन, मन, धनसे सेवा करनी । ये... मूर्तिमान देव जिनके सङ्गसे... सत्य शिक्षा विद्या और सत्योपदेशकी प्राप्ति होती है, ये ही परमेश्वरको प्राप्त करनेकी सीढ़ियाँ हैं - इनकी सेवा न करके जो पाषाणादि मूर्ति पूजते हैं, वे अतीव पामर नरकगामी हैं, यह कहा है, और फिर ' आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः ' ( २।२२५ ) इस मनुजी के अनुसार ब्रह्मकी मूर्ति - गुरुकी आदिमें नमस्कार करनेका खण्डन करके क्या अपने आपको अपने शब्दों में ' पामर और नरकगामी ' नहीं बनाया? इससे उन्होंने अपनी आप्तता समाप्त कर दी । ( १३ ) कई स्वा. द. के श्रद्धालुओं का यह भी कथन होता है कि-आदिमें वेदमन्त्रसे ही मङ्गलाचरण होना चाहिये, अतः ' श्रीगणेशाय नमः ' आदिमें लिखना ठीक नहीं ' इसमें उनसे पूछना चाहिये कि - स्वामीने स.प्र. की भूमिकाके तथा प्रथम समुल्लास के आरम्भ में ' सच्चिदानन्देश्वराय नमो नमः ' यह मङ्गलाचरण लिखा है । सं.वि. के आरम्भ में ' नमो नमः सर्वविधात्रे जगदीश्वराय ' और उसकी भूमिका में ' नमो नमः सर्वशक्तिमते जगदीश्वराय ' यह लिखा है । क्या यह ' श्रीगणेशाय नमः ' का अनुकरण नहीं? उनके अनुसार लिखना किस वेद में लिखा है? क्या यह ' परोपदेशे पाण्डित्यम् ' नहीं? आप ' सच्चिदानन्देश्वराय CC - 0. Ankur Joshi Collection नमः ' लिखें; यह तो वैदिक मङ्गलाचरण हो जाय? य सनातनधर्मी ' श्रीगणेशाय नमः, नारायणाय नमः ' लिख दें, वहां अवैदिकता हो जाए या आर्ष ग्रन्थ - विरुद्धता हो जाय । यह कहाँका न्याय है? कौनसे ऋषिने ' सच्चिदानन्देश्वराय नमः यह स्वामी- जैसे शब्द लिखे हैं? यदि नहीं कहे वा लिखे; आप भी आर्ष - शैलीसे विरुद्ध मङ्गल करते हुए अपने परस्प विरुद्ध वचनोंसे खण्डित होगये । अथवा स्वामीने ' सच्चिदानन्देश्वराय नमो नमः ' यह मंगल इसलिए लिखा हो कि आगे उन्होंने इस नामको परमेश्वरार्थक माना है । तब क्या उन्होंने कभी ' शनैश्चराय नमः, राहवे नमः, केतवे नमः ' अपनेसे स्वीकृत ईश्वरार्थक इन शब्दों से भी मंगल किया, वा वे कर सकते हैं? यदि नहीं; तब क्या उनसे लिखे हुए कई नाम परमात्माको प्रिय हैं और कई अप्रिय हैं? इससे स्पष्ट है कि- स्वामीने कई शब्दों के अर्थों में जो जबर्दस्ती की है-उसे उनका आत्मा बलात्कार मानता है । नहीं तो ' परमेश्वर ' शब्दके स्थान में ' शनैश्चर ' आदि नमस्कार के लिए क्यों नहीं चुने गये? अथवा ' श्रीगणेशाय नमः ' तथा ' नमो नारायणाय ' यह परमेश्वरार्थक नामोंसे मंगलाचरण क्यों नहीं किया? अथवा करने वालों को वे क्यों आक्षिप्त करते हैं? अब स्वामीका वेदमन्त्र से मंगलाचरणका आदर्श भी । देखिये- उन्होंने ' सत्यार्थप्रकाश ' के आरम्भ में ' शं नो मित्रः ' से शुरू करके ' नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो अवतु वक्तारम् ' तक Gujarat. An eGangotri स ० ध ० Initiative ४.
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५० ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) मङ्गलमें विघ्नवारण [ ५१ कृष्णयजुर्वेद ( तैत्तिरीयारण्यक ७ । १ । ११ ) का मन्त्र रखा है । ' संस्कारविधि'के आरम्भ में ' सह नाववतु ' यह भी उक्त पुस्तक ( तै. आ. ८ | १ ) का ही मन्त्र लिखा है । इस प्रकार ऋग्वेदादि-भाष्यभूमिका के आरम्भ में भी स्वामीने ' सह नाववतु ' यह उक्त मन्त्र ही लिखा है । अब स्वाद तथा उनके अनुयायियोंसे पूछना है कि क्या वे कृष्णयजुर्वेद तथा आरण्यकको वेद मानते हैं? यदि हाँ; तो स्वामीने केवल शुक्लयजुर्वेदकी वा.सं.को ही वेद कैसे माना? कृष्णको साथ क्यों नहीं रखा? उसीकी शाखा तैत्तिरीयसंहिता आदि तथा तैत्तिरीय आदि ब्राह्मण, तथा आरण्यक, उपनिषद् आदि हैं । यदि कृष्णयजुर्वेद उनके मत में वेद नहीं; तो अपने तीनों पुस्तकों में अपने अभिमत वेदके मन्त्रसे ही मंगल न करके अपने अनुसार अवैदिक मन्त्रोंसे ' मंगल क्यों किया? यदि उनके मत से वेदभिन्न मन्त्रका या अपने बनाये हुए वाक्यका आरम्भमें मंगलरूपमें उल्लेख करने पर भी उनकी वैदिकता अक्षुण्ण रहती है; तो सनातनधर्मी भी वेदभिन्न किसी पद्य वा गद्य मन्त्रसे मंगल करते हुए क्यों वैदिक वा आर्ष-व्यवहार वाले नहीं? क्या आप जो कुछ करें, वह वैदिक है, और सनातनधर्मी जो वैदिकता भी करें; वह पौराणिकता है? हा खेद! दण्डी जी! आपने अपने अर्वाचीन - मत ( आ.स. ) को जारी करके भारत में कलहका सूत्रपात किया । हमें उनकी बुद्धिपर आश्चर्य होता है - जो आँखें बन्द करके अपने स्वामीके अप्रमाण भी वचनको, बिना ननु - नच किये मान लेते हैं. और सनातनधर्मके प्रामाणिक भी वचनों पर उपहास करते हैं । ( १४ ) इस निबन्धसे सिद्ध हुआ कि सभी लोग चंगी भगवानके अंगभूत अपने इष्टदेवको नमस्कार, प्रार्थना आदि मंगलाचरण करनेमें स्वतन्त्र ही हैं । न वहाँ उनमें उनको वेद रोकता है, न कोई आर्ष शास्त्र । वेद स्वयं ही भिन्न - भिन्न देवोंका सेवन करता है, यह हम अन्यत्र बतलाएँगे । उसमें कारण यह है कि - वेदने द्विजोंका अपनी रुचि के अनुकूल हित करना है । अपनी - अपनी रुचिके अनुकूल प्रकारभेद सर्वत्र होता ही है । इससे उसको उलाहना नहीं दिया जा सकता । नहीं तो पाणिनि, कात्यायन, गोतम, वात्स्यायन आदि मुनि तथा अन्य उपनिषद् आादिके द्रष्टा, तथा ' शतपथब्राह्मण ' के आदिमें ' व्रतमुपैष्यन ' आदिके वक्ता श्रीयाज्ञवल्क्य आदिको उन्मत्त वा अवैदिक मानना पड़ेगा । पर ऐसा नहीं हो सकता । इससे, विरुद्ध लिखते हुए स्वा. द. जीकी ही अल्पश्रुतता, साम्प्रदायिक दृष्टि खण्डन-व्यसनिता, तथा सनातनधर्मसे द्वेषदृष्टि ही अपराधिनी है, इसमें अपने इष्टदेवका मंगल करनेवालोंका तथा सनातनधर्मका कोई अपराध नहीं, यह कहकर हम आगे ' वेदचर्चा ' प्रारम्भ करना चाहते हुए इस विषयको पूर्ण करते हैं । X X X CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वैदस्वरूप निरूपण t ( ३ ) वेदस्वरूप - निरूपण ( क ) ( शाखाओं ( संहिताओं ) का वेदत्व ) ( १ ) वेदका परिमाण - निरूपण वेदस्वरूप के अन्तर्गत हो जाता है । उसका विचार ' आलोक ' पाठकोंके समक्ष प्रस्तुत किया जाता है । इसका परिचय द्विजों, विशेषतः ब्राह्मणोंके लिए अवश्य अपेक्षित है, पर खेद है कि उनका इधर ध्यान नहीं । इस विषय-में वे दूसरोंसे सुन - सुनकर वैसा मान लिया करते हैं, उस पर स्वयं अनुसन्धान नहीं करते । मनुस्मृतिमें सम्पूर्ण वेदको धर्मका मूल माना है - ' वेदोऽखिलो धर्ममूलम् ' ( २।६ ) तब जब तक वेदकी इयत्ताका ज्ञान न हो; तब तक धर्मका पूर्णं ज्ञान कैसे हो सकता है? यदि केवल आर्यसमाजादिमें प्रसिद्ध वेदकी चार पोथियोंको सम्पूर्ण - वेद माना जावे; तो उससे हिन्दुधर्मके सभी सिद्धान्तोंकी प्राप्ति नहीं हो सकती । इसी कारण प्राचीन ऋषि - मुनियोंका सिद्धान्त था कि-११३१ शाखा ( संहिता ) त्मक मन्त्रभाग तथा उतना ही ब्राह्मण-भाग, जिसमें आरण्यक - उपनिषद् आदि अन्तर्गत होते हैं; यह दोनों भाग मिलकर ही वेद हैं । परन्तु आजकल ' वेदका स्वरूप वा परिमाण कितना है ' इस सम्बन्धमें बड़ी भ्रान्ति चालू है । उसमें एक कारण आर्यसमाज * शाखाओंका वेदत्व कुछ ' आलोक ' के ४ थे पुष्पमें, तथा ब्राहाण-भागका वेदत्व छठे सुमनमें श्रा चुका है; श्रव पाठक संहिताओं का वेदत्व इसमें देखेँ ॥ ४ र्यं पुप्पका मूल्य ६ ) और छठेका १० ) है । CC - 0. Ankur Joshi Collection है; और दूसरा कारण स्वयं सनातनधर्मी पण्डित - मण्डल है जो वैदिक वाङ्मयकी ओर ध्यान ही नहीं देता । हम विषयको शास्त्रोंकी सहायता से कुछ स्पष्ट करनेका प्रयत्न करते? पाठक इधर अवश्य ध्यान दे; क्योंकि यह सनातनधर्मेंका: सिद्धान्त है । आर्यसमाजके प्रचारसे जनताको पता लगा कि आजका जो ऋग्वेद संहिता, यजुर्वेद संहिता, सामवेद संहिता श्री अथर्ववेद संहिता नामक चार पोथियाँ मिलती हैं, यही चार वेद हैं । अन्य काठक - संहिता आदि १ ९ २७ इन्हीं की शाखाएँ है वे वेद नहीं हैं । इनसे भिन्न शतपथ आदि ब्राह्मणभाग है, भी वेद नहीं हैं । बहुतसे पर -प्रत्यय - नेयबुद्धि सनातनधर्मी परि भी यही जानते - मानते हैं । वस्तुतः यह मत अज्ञानमूलक है । आर्यसमाजके प्रवर्तक स्वा. द. जीने भी अपनी पुस्तकों में यह लिखा है - जिससे यह भ्रान्ति फैली कि यही ४ पोथियाँ वेद हैं शेष ११२७ शाखा हैं । लेकिन इसमें शास्त्रीय - निष्कर्ष यह है कि- वेद चार हैं, उनकी शाखाएँ ( संहिताएँ ) ११३१ हैं । ११३१ संहिताएँ ही मिलकर चार वेद हैं, वेदकी केवल वर्तमान चार पोथियाँ चार वेद नहीं । सो जैसे वर्तमान वाजसनेयी संहिता यजुर्वेद है, वैसे मैत्रायणी - संहिता आदि भी यजुर्वेद हैं । जैसे वर्तमान शौनक - संहिता अथर्ववेद हैं, वैसे अन्य पैप्पलादादि-संहिता भी अथववेद है । इस प्रकार चारों वेदोंके विषय में जानना चाहिये । इसमें ब्राह्मणभागके उतने ग्रन्थ भी वेद में Gujarat. An eGangotri Initiative