सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 41–50

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 41–50

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t ' ५४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण [ ५५ एडल अन्तर्गत होते हैं । यही वास्तविकता है । यही सनातनधर्मका हम सिद्धान्त - सूत्र है । इस सूत्रका अब इम भाष्य करते हैं, पाठक करते हैं इसमें पूरा ध्यान दें । का ( २ ) वेदके स्थूलरूप से दो भाग हैं, एक मन्त्रभाग, दूसरा ब्राह्मणभाग । यह दोनों मिलकर ही सम्पूर्ण - वेद बनता है । आजका उपनिषद् एवं आरण्यक ब्राह्मणभाग के अन्तर्गत हो जाते हैं । फिर वेदके चार भेद हुआ करते हैं - १. ऋग्वेद, २. यजुर्वेद, ना श्री नही चार खाएँ है है, है । ोंमें यही वेद हैं, यह है ११३१ न चार - संहिता जैसे नादादि विषय में वेद में ३. सामवेद और ४. अथर्ववेद । इन चारों भेदोंकी ११३१ संहिता हुआ करती हैं । और इन ११३१ संहिताओंके इतने ही ब्राह्मण हुआ करते हैं । इतने ही ब्राह्मणोंके इतने ही आरण्यक और इतनी ही उपनिषदें भी हुआ करती हैं । यह सम्पूर्ण साहित्य ही चार वेद हैं । हां, उसमें ११३१ संहितात्मक भाग मन्त्रभाग कहा जाता है, और उतना ही ब्राह्मण, उपनिषद् एवं आरण्यक रूप भाग ब्राह्मणभाग कहा जाता है । उक्त मन्त्रभाग के प्रयोगार्थं उतने ही श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र तथा धर्मसूत्र भी हुआ करते हैं । इसे कल्प कहा जाता है । यद्यपि यह भाग वेदका सहायक है, तथापि पौरुषेय होने से इसे वेदसे भिन्न माना जाता है । यह सव निरूपण हम यथाक्रम करते हैं । — ( ३ ) ' सर्वानुक्रमणी ' कीं वृत्तिकी भूमिकामें षड्गुरुशिष्यने कहा है – ' एकविंशत्यध्वसंयुक्तम् ऋग्वेदमृषयो विदुः । सहस्राध्वा सामवेदो यजुरेकशताध्वकम् । नवधाऽऽथर्वणोऽन्ये तु प्राहु: पञ्चदशाध्वकम् ' । यहाँ ऋग्वेदकी २१ शाखाएँ, सामवेदक १०००, CC - 0. Ankur Joshi यजुर्वेदकी १०१ तथा अथर्ववेदकी ६ शाखाएँ तथा किसी अन्यके मतमें १५ शाखाएँ स्वीकृत की गई हैं । ' अन्ये ' कहने से इस मतमें अरुचि सूचित की गई हैं । तव ६ शाखाएँ सिद्धान्तपक्ष हुआ । ( ख ) इस प्रकार ' प्रपञ्चहृदय ' ग्रन्थके वेद - प्रकरण नामक द्वितीय - प्रकरण में कहा गया है - ' बाहूच एकविशतिधा, यजुर्वेद एकोत्तरशतधा, सामवेदः सहस्रधा, अथर्ववेदो नवधा ' यहाँपर भी वही बात कही गई है । इस प्रकार चारों वेदोंकी ११३१ संहिता सिद्ध हुई । ( ग ) वादिप्रतिवादिमान्य व्याकरणमहाभाष्यकार श्रीपतञ्जलि -मुनिने भी पस्पशाह्निकमें ' सर्वे देशान्तरे ' इस वार्तिककी व्याख्या करते हुए चारों वेदोंकी ११३१ शाखाएँ ( संहिताएँ ) मानी हैं । उनके यह शब्द हैं — ' चत्वारो वेदाः साङ्गाः सरहस्या, बहुघा भिन्नाः । एकशतम् ( १०१ ) श्रध्वर्यु ( यजुः ) शाखाः । सहस्रवर्त्मा ( १००० ) * सामवेदः । एकविंशतिधा ( २१ ) बाहवृच्यम् ( ऋग्वेदः ) । नवधा ( ६ ) आथवणो वेदः ' । * ' सहस्रवर्त्मा ' का अर्थ ' सहस्रशाखावाला ' है । जैसे कि - महाभारत-में शान्तिपर्वमें - ' सहस्रशाखं यत्साम ' ( ३४२ ६७ ) । कूर्मपुराण में - ' सामवेदं सहस्रण शाखानां प्रविभेद सः ' ( पू. ५२/२० ) । तब ' ऐतरेयालोचन ' के १२७ पृष्ठमें ' सहक्ष प्रकारका सामगान ' यह श्रीसामश्रमीका अर्य ठीक नहीं । ' चत्वारो वेदा बहुधा भिन्ना: ' इस भाष्यके पाठमें शाखा अर्थ ही है । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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५६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण इसका अर्थ स्वा. द. जीने ( सं ० १६३८ में बनाये ) अपने ' नामिक ' के ४ थ पृष्ठमें ) यह किया है - ' साङ्गोपाङ्ग वेद अर्थात् एक सौ एक व्याख्यान ( १ ) युक्त यजुः । हज़ार व्याख्यान ( १ ) युक्त साम । इक्कीस व्याख्यानयुक्त ऋक् । नव व्याख्यान ( १ ) युक्त अथर्ववेद | इस स्वामीके अर्थके अनुसार भी चारों वेदोंकी शाखा ११३१ सिद्ध होती हैं । इसके विरुद्ध अपने अन्य ग्रन्थोंमें स्वामी वा उनके किसी शिष्यने ४ वेद और ११२७ शाखाएँ मानी हैं - यह उनका स्ववचन- विरोध है । अब यही मत आर्य-समाजको मान्य है । यही अब स्वामीका मत कहा जाता है-जैसाकि आयँसमाजी विद्वान् श्रीराजारामजी शास्त्रीने अपने अथर्ववेद भाष्यकी भूमिका में पृ ० १ में कहा है – ' श्रीस्वामि-दयानन्द सरस्वतीका मत यह है कि शाकल्य संहिता - ऋग्वेद, माध्यन्दिन - संहिता यजुर्वेद, कौथुम संहिता - सामवेद, शौनकीय-संहिता अथर्ववेद है ' । महाभाष्यके अनुसार चारों वेदोंकी ११३१ संहिता होती हैं । ' महाभाष्य ' के शाकल, वाजसनेय, संहिताएँ शाखा हैं, चार वेद बनते हैं । ( ३ ) आशय यह वैसे ‘ ऋग्वेद ' आदि बाचक ‘ देद ' शब्दसे उक्त वचनमें यह नहीं कहा गया कि वर्तमान कौथुम, शौनक संहिता ही वेद हैं, और अन्य किन्तु सभी शाखाएँ ( संहिताएं ) मिलकर ब्राह्मणभाग इन्हीं में अन्तर्भूत हो जाता हैं । है कि - जैसे ' वेद ' शब्द समुदायवाचक है, शब्द भी समुदायवाचक हैं । जैसे समुदाय-ऋक्, यजुः, साम और अथर्व यह चार अबयब मिलकर भी लिये जाते हैं; और ' समुदायेषु हि स प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्ते ' इस महाभाष्यकी पस्पशा वि स्थित उक्तिसे ऋक्, यजुः आदि चारोंमें एकका नाम भी स कहा जाता है, जैसे माता - पिता के समुदाय से उत्पन्न पुत्र श्रद्ध क नामक पिताका पुत्र भी कहा जाता है, कभी दोनोंका भी । जाता है, कभी माताके नामसे भी कहा जाता है, जैसे क पाण्डवः, कौन्तेयः, श्रीहर्षकविने नैषधचरितके प्रत्येक स अन्तमें अपने माता - पिता दोनोंका नाम कहा है; वैसे स ऋग्वेदादि शब्द भी समुदाय - शब्द हैं । यह अपनी स संहिताओं को मिलाकर भी बोले जा सकते हैं, और एक संहिता से भी कहे जा सकते हैं । सार यह है कि ऋग्वेद की सारी २१ संहिताएँ समुदाया ' ऋग्वेद संहिता ' नामसे कही जाती हैं; और अलग - अ ' ऋग्वेदशाकल्यसंहिता, ऋग्वेदवाष्कलसंहिता ' आदि भिन्न 215 नामोंसे भी भिन्नता बतानेकेलिए कही जाती हैं; और पूर्वो न्यायसे वे भिन्न - भिन्न भी ऋग्वेद नामसे भी कही जा सकती है । सां इस प्रकार यजुर्वेदकी सभी १०१ शाखाएँ समुदायरूप से ' यजुर्वे सा संहिता ' नामसे भी कही जाती हैं, पृथक - पृथक् वे शाख हो ' यजुर्वेद - माध्यन्दिनी ( वाजसनेयी ) संहिता, यजुर्वेद का एव संहित का & ' यजुर्वेद- काठकसंहिता, यजुर्वेद - मैत्रायणीसंहिता नामसे भी छ ही जाती हैं । उनमें यजुर्वेदके विषय में यह जानना चाहिये कि -यजुर्वेद यज CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 43

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१८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) पुहि दो भेद होते हैं, कृष्णयजुर्वेद और शुक्लयजुर्वेद । कई विद्वानोंका पस्पशा विचार है कि प्राचीन यजुर्वेदका मन्त्रभाग ब्राह्मणभागके साथ म भी सङ्कीर्ण हो जानेसे और अनुक्रमसे पाठ न होनेसे उससे यज्ञ-पुत्र! कर्मक अनुष्ठानका मार्ग दुर्ज्ञेय हो जाता है; अतः उसका नाम का भी । कृष्णयजुर्वेद रखा गया । परन्तु शुक्लयजुर्वेद में भी यद्यपि है, जैसे कात्यायनसर्वानुक्रमणी के अनुसार तथा उवट - महीधरादिके = येक स अनुसार ' देवा यज्ञं ' ( १६।१२- ३१ ) ब्राह्मणानुवाको विशतिरनुष्टुभः ; वैसे सोमसम्पत् ( २ ) ' अश्वस्तूपरो ' ( २४ | १ ) ब्राह्मणाध्यायः ' ( २ ) पनी ' ब्रह्मणे - ब्राह्मणम् ' ( ३०।५-६ ) इति द्वे कण्डिके तपसेऽनुवाकश्च और एक ( तपसे कौलालम् - इत्यादि अध्यायसमामि तक ) ' ब्राह्मण ' है, पर थोड़ा है उसमें दुर्ज्ञेयता नहीं पड़ती; अतः उसे ' शुक्ल ' कहा जाता मुदाय है । पर दोनों ही कृष्ण - शुक्ल संहिताओंके मन्त्रभागमें अन्तर्भूत लग - अ होनेसे तदन्तर्गत ब्राह्मणको भी मन्त्रभाग ही कहा जाता है; भिन्न -ि जैसे कि - मन्त्रभागकी सार्थकता के प्रकरण में निरुक्त ( १/१५/८ ) में और पूर्वो ‘ अग्नये समिध्यमानाय अनुन हि ' इस कृष्ण यजुर्वेद- मैत्रायणी सकती है । संहिता - स्थित ब्राह्मणको भी ' मन्त्र ' ही माना गया है । जैसेकि -' यजुर्वे सामवेद ( कौथुम ) संहिता के आरण्यकको भी मन्त्रभागान्तर्गत वे शाख होनेसे ' मन्त्र ' ही माना जाता है । जैसेकि - वाजसनेयी एवं एव संहित काव यजुः- संहिता में ' ईशोपनिषद् ' उपनिषद् होती हुई भी ' मन्त्र ' से भी ही मानी जाती है । महाभाष्य - आदि प्रामाणिक ग्रन्थों में जोकि यजुर्वेदको १०१ शाखाएँ बताई गई हैं; उनमें दोनों ही शुक्ल - कृष्ण यजुओं की संहिताएँ मिलाकर ही १०१ कही गई हैं । उनमें शुक्तकी - यजुर्वेद CC - 0. Ankur Joshi वेदस्वरूपनिरूपण [ ५६ वाजसनेयी - काव आदि १५ संहिताएँ; और शेष ८६ संहिताएँ कृष्ण - यजुर्वेदकी होती हैं यह सर्वसम्मत बात स्मरण रख लेनी चाहिये । इस प्रकार सामवेदकी सभी १००० शाखाएँ समुदायरूपसे सामवेदसंहिता कही जाती है; और पृथक - पृथक ' सामवेद - कौथुम-संहिता, सामवेद - जैमिनिसंहिता आदि कही जाती हैं । इसी भांति अथर्ववेदकी सभी नौ शाखाएँ समुदायरूपसे ' अथर्ववेद-संहिता ' के नामसे कही जाती हैं; और अलग - अलग ' अथर्ववेद-शौनकसंहिता, अथर्ववेद- पैप्पलादसंहिता ' आदि नामोंसे कही जाती हैं । यह ११३१ संहितारूप भाग वेदका ' मन्त्रभाग ' कहा जाता है; उसी वेदका अन्य भाग ब्राह्मणभाग कहा जाता है । यह दोनोंके पृथक् - पृथक् नाम हैं । और मिलकर दोनों वेद कहे जाते हैं; और ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्ते ' इस भाष्यकारानुमोदित - न्यायसे पृथक् - पृथक् भी वेद कहे जाते हैं । तब मन्त्रभागकी जितनी संहिता होती हैं; उतने ही ब्राह्मण, उतनी ही उपनिषदें और उतने ही आरण्यक होते हैं । यह सब अपौरुषेय, नियतानुपूर्वी तथा नियतपदप्रयोगपरिपाटी वाले होनेसे वेद हैं । यही प्राचीन - मत है । इस कारण आर्यसमाजी पण्डित श्रीराजाराम शास्त्रीने श्रौतसूत्रकारोंका मत दिखलाते हुए अपनी अथर्ववेदभाष्यभूमिका के प्रथम - पृष्ठमें लिखा है - वैदिक-साहित्यके दो भाग हैं, मन्त्र और ब्राह्मण । जिनमें मन्त्रोंका Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 44

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६० ] श्रीसनातन धर्मालोकं ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण ६ संग्रह है, वे मन्त्र - संहिताएँ कहलाती हैं और जिनमें ब्राह्मणोंका संग्रह है, वे ब्राह्मण कहलाते हैं । आरण्यक और उपनिषद् ब्राह्मणभागके परिशिष्ट होनेसे ब्राह्मणके अन्तर्गत माने जाते हैं । यह सारा साहित्य मिलकर वेद कहलाता है । यह कात्यायन आदि श्रौतसूत्रकारोंका मत है ' । इस प्रकार वेदकी संख्या बहुत हो जानेसे ही यजुर्वेद तैत्तिरीय ब्राह्मणमें कहा है – ' अनन्ता वै वेदाः ' ( ३ | १० | ११ ( ४ ) वेदोंकी अनन्तता यही है कि - ११३१ मन्त्र, इतने ही ब्राह्मण, इतने ही आरण्यक, इतनी ही उपनिषदें । इनका अन्त पुरुषकी आयुमें नहीं हो सकता । आर्यसमाजके मत में केवल चार पोथियोंका नाम वेद होनेसे अनन्तता नहीं हो सकती । अतः उसका मत उक्त वचनसे विरुद्ध होनेसे भी ठीक नहीं । इन्हीं ११३१ संहिताओंके उतने ही अङ्ग, उतने ही श्रौतसूत्र, उतने ही धर्मसूत्र और उतने ही धर्मशास्त्र हुआ करते हैं । इसीलिए स्वा.द.जीने सं ० १६३३ की संस्कारविधि में शाकल्य, वाजसनेय, कौथुम, शौनक संहितारूप चार वेदोंके आश्वलायन, पारस्कर, गोभिल और शौनकगृह्यसूत्रोंका तत्तत्संस्कारोंमें मन्त्र एवं सूत्रों-का संग्रह किया था । ( ४ ) वेदके बाहुल्यमें यह भी एक प्रमाण है कि यदि वेद वर्तमान चार पोथियाँमात्र होतीं, तो उनके प्रयोगोंके सिद्ध करनेमें क्या कठिनता थी; अनायास ही पाणिनि उनकी सिद्धि कर डालते । लौकिक - व्याकरणमहासमुद्र की सिद्धि पाणिनिने CC - 0. Ankur Joshi Collection अष्टाध्यायी में सीमित सूत्रोंसे कर डाली; तब इन चार पोक्षि के प्रयोगोंकी सिद्धिकी व्यवस्थामें कोई कठिनाई नहीं परन्तु जो कि- श्राचार्यने ' बहुलं छन्दसि, छन्दस्युभयथा ' बहुत सूत्र बना डाले, ‘ बहुल ' कहने से उनकी बहुतायत क्षे व्यवस्था में कठिनाई देखकर उनकी अव्यवस्थितता सूचित दी, श्रीपाणिनिके ही अभिप्रायको लेकर भाष्यकार श्री ' छन्दसि दृष्टानुविधिः, छन्दसि सर्वे विधयो विकल्प्यन्ते ' भग परिभाषाएँ बनाईं, इससे वेद अनन्त सिद्ध होता है । तब १ उप संहिताओं, ११३१ ब्राह्मणों उतनी ही आरण्यक एवं उपनिष हैं; वेद होनेसे उसमें स्वतः आनन्त्य सिद्ध होनेसे उसका पर ग्रह पासकनेसे बहुत बहुलता वाले सूत्र तथा परिभाषाएँ वर ( 31 पड़ीं, इससे वेद चार पोथियों में सिद्ध न होकर अनन्तपार भिन होता है । इसलिए सम्पूर्ण वेदको पढ़नेकेलिए ४८ वर्षका वा नियत किया गया; बल्कि भारद्वाज ऋषिने तो कई मनुष आ माँगी थी । इससे वेदोंकी अनन्तता सिद्ध होती है । पैदा चार पोथियाँ माननेपर तो उनकी समाप्ति बहुत थोड़े सम चार वेदों हो जाए । उसकेलिए लम्बी - लम्बी अवधियाँ व्यथें हो दीव इससे भी सिद्ध है कि- संहिता - ब्राह्मणात्मक सारा ही वेद ऋग्व केवल ४ पोथियाँ नहीं । इसीलिए ही ' काठकगृह्यसूत्र ' में ४ ॥ कहते सूत्रकी व्याख्या करते हुए श्रीदेवपालने कहा है- ' स हि । ब्राह्मणज्ञो विद्वान् यमुपनयते स एतेषां प्रसिद्धानां वेदानामन शाखायुक्तानां मध्ये यथेच्छ मेकं ह्रौ त्रीन वा अधीते सर्वर Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 45

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६२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण [ ६३ पोषि खचितान् ' । नहीं इतने बढ़े वैदिक - साहित्य में सूत्रग्रन्थ तथा स्मृतियां पौरुषेय नथा ' होनेसे और नियतपदप्रयोग - परिपाटीवाले न होनेसे वेद नहीं यत हो कहे जाते, किन्तु उनसे भिन्न ही होते हैं, इसीलिए ' छन्दोवत् सूचित सूत्राणि भवन्ति ' इन परिभाषाओंसे उन्हें वेदवत् बताया गया श्र है, वेद नहीं । अतः वे स्वतः वेदसे भिन्न हो गये । ' ऋग्वेद नन्ते ' भगवोऽव्येमि, यजुर्वेद सामवेदमाथर्वणं ( ७।१।२ ) इस छान्दोग्य-तब १ उपनिषदुके नारद - वाक्यमें तो ऋग्वेद - आदि शब्द समुदायपरक उपनिष हैं; उनसे ऋग्वेदादि की सभी संहिताओं तथा सब ब्राह्मणोंका सका पा ग्रहण है - यह हम छठे सुमनमें बता चुके हैं; इसीलिए मनु. षाएँ वर ( ३।२ ) पद्यकी टीका में श्रीकुल्लूकभट्टने भी लिखा है- ' वेदशब्दोऽयं तपार भिन्न - वेदशाखापरः । स्वशाखाध्ययनपूर्वक - वेदशाखात्रयं द्वयमेकां का वा शाखां मन्त्र- ब्राह्मण क्रमेण श्रधीत्य ' । मनुष परन्तु स्वा.द.जी तथा उनके अनुयायियोंने यहाँ बड़ी भ्रान्ति - है । पैदा कर दी है । वे केवल वर्तमान में मिलनेवाली ऋग्वेद संहितादि ड़े म चार पोथियोंको चारों वेद और अवशिष्ट संहिताओं को इन हो वेदोंकी शाखाएँ प्रचारित करते हैं । परन्तु उनका मत ' बालू की दीवार ' है; क्योंकि — जिसका नाम स्वामीने ' ऋग्वेद ' कहा है, वह ऋग्वेदकी ‘ शाकल्य - संहिता ' है । इस प्रकार जिसे वे ' यजुर्वेद ' ' मैं ४ कहते हैं, वह उसकी वाजसनेयी ( माध्यन्दिनी ) संहिता है । जिसे - ' सहि वे ' सामवेद ' कहते हैं. वह सामवेद की ' कौथुम - संहिता ' है, जिसे निदानामन * ‘ श्रीसनातनधर्मालोक’के छठे सुमनका मूल्य १० ) है । वे ' अथर्ववेद ' कहते हैं, वह उसकी शौनक - संहिता नामक शाखा है । जैसे शाखासमृह में शाखी अलग नहीं मिलता. वैसे ही ऋग्वेदादि भी अपनी शाखासे अलग नहीं मिलते । इस प्रकार स्वा.द. सम्मत ' वैदिक धर्म ' सर्वथा नष्ट हो गया, क्योंकि वे शाखाओं को वेद इस कारण नहीं मानते; कि - शाखाएँ ऋषिप्रोक्त हैं, और वेदका व्याख्यान हैं । इसके अनुसार तो उनसे माने हुए वेद भी शाखा होनेसे ऋषिप्रोक्त तथा वेदका व्याख्यान ही होंगे, तब स्वा. द. के मत में वेदके अत्यन्ताभाव होनेसे उनका मूल - सिद्धान्त ' वैदिक धर्म ' नष्ट ही हो गया । तब उनका सम्प्रदाय भी निर्मूल ही हुआ । वस्तुतः वेद संहिताएँ सभी शाखाएँ ही हैं । इसीलिए ' ऋग्वेदविद् यजुर्विश्च सामवेदविदेव च ' ( १२।११२ ) इस मनुपद्य की व्याख्या में श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है- ' ऋग्यजुःसामवेद-शाखानां येऽष्येतारस्तदर्थज्ञातारश्च ' । इस प्रकार ' ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च । एष ज्ञेयस्त्रिवृद वेदो यो वेदन स वेदवित् ' ( ११।१६४ ) यहाँ भी श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है-' ऋच ऋङ्मन्त्राः यजू ंषि - यजुर्मन्त्राः सामानि - वृहद्रथन्तरादीनि नानाप्रकाराणि । एषां त्रयाणाम् पृथक - पृथक मन्त्र ब्राह्मणानि एप त्रिवृद वेदो ज्ञातव्यः । य एनं वेद स वेदविद् भवति ' । इस प्रकार मन्त्र और ब्राह्मण मिलकर वेद हुआ करता है - यह सिद्ध हो गया । पहले प्रत्येक शाखाके साथ वेदकी संहिता, तथा उसके ब्राह्मणका नाम लिखा हुआ करता था, स्वामीने यह परिपाटी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 46

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६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण लुप्त कर दी, इससे अब पण्डित भी भ्रममें रहते हैं । वे केवल इन्हीं वर्तमान चार शाखाओं को तो वेद तथा अन्य शाखाओंको केवल शाखा और ब्राह्मणको ब्राह्मण ही मानते हैं । ( ५ ) ' वैदिक वा मयका इतिहास ' ( प्रथमभाग ७२ पृष्ठ ) में उसके प्रणेताने ऋग्यजुः- सामाथर्वाणश्चत्वारो वेदाः साङ्गाः सशाखाः चत्वारः पादा भवन्ति ' ( १।१२ ) इस नृसिंह पूर्वतापिनी-उपनिषद्की कण्डिका में वेदसे पृथक् ' शाखा ' शब्दको देखकर इस प्रकार भवस्वामी के ' तच्छाखानामपि... ' शाखा वेदके अवयव हैं, इस पक्षको अशुद्ध बताया है, पर यह भ्रममान है । ' सशाखो वृक्षः ' कहने से क्या शाखाएँ वृक्षसे भिन्न हो जाती हैं? ' राहोः शिरः ' कहनेसे क्या राहु और शिर यह दोनों पृथक् - पृथक् हो जाते हैं? ‘ पटस्य तन्तवः ' कहें; तो क्या पट और तन्तुमें भेद हो जावेगा? जैसे शाखाओंसे भिन्न वृक्षकी सत्ता नहीं हुआ करती, वैसे वेद - वृक्ष भी अपनी शाखाओं से भिन्न सत्ता नहीं रखता । शिरसे भिन्न राहु कोई वस्तु नहीं, तन्तुसे भिन्न पट कोई वस्तु नहीं । इस प्रकार वेद भी शाखाओं से भिन्न कोई वस्तु नहीं । उपनिषद्का उक्त वचनं तथा महाभाष्यकार के ' एकशतमध्वर्युं-शाखा: ' इत्यादि वाक्यमें कोई विलक्षणता नहीं । चारों वेदोंकी ११३१ शाखाएँ हुआ करती हैं; यह आजकलकी प्रसिद्ध वेदोंकी चार पोथियाँ भी शाखाएँ ही हैं; जिनके नाम क्रमशः शाकल्य, वाजसनेयां, कौथुम, शौनक हैं- यह हम पूर्व कह चुके हैं । यदि कहा जावे कि यह अन्य शाखाओं का मूल है - यह भी ठीक नहीं; CC - 0. Ankur Joshi Collection मूल तो छिपा रहता है, वह दिखाई नहीं देता; यह मूल के दीख रहा है, सो मूलवेद बीजरूप परमात्मा के पास ही है; ये तथा अन्य उसी वेदकी शाखाएँ ही हैं, जो दीख रही है । इस प्रकार ‘ सशाखाश्चत्वारो वेदा: ' इस उपनिषद् के वचनं भी शाखाएँ वेदसे पृथक् सिद्ध नहीं होतीं, किन्तु वेद अवयव ही सिद्ध होती हैं; इसीलिए अमरकोष ( २०४१ ) की रामाश्रमी - टीकामें हैमके प्रमाणमें कहा है- ' शाखा द्रुर्मा वेदांशे ' । इस प्रकारके अन्य वचनोंमें भी कहीं तो गो - चलीव न्यायका, अथवा ब्राह्मणवसिष्ठ न्यायका, वा ब्राह्मण परिवार न्यायका अथवा ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता श्रवयवेद वर्तन्ते ' इस महाभाष्योक्त न्यायका, तथा ' वेदस्य शाखा: ' राहोः शिरः ' इस व्यपदेशिवद्भाव ( अभेद में काल्पनिक से व्यवहार ) न्यायका अनुसरण किया गया है- यह सम्यकृतद जान लेना चाहिये । ( ६ ) स्वा. द. जीने अपने ' नामिक ' के पूर्वोद्धृत- वचनमें य चार वेदोंकी ११३१ शाखाएँ मानी हैं; तथापि शाखाओं व्याख्यान माना है; पर यह ठीक नहीं । तैत्तिरीय - काण्वादि शाखाएँ हैं; उनमें स्वा. द. जीसे अभिमत चार वेद- पोथियों व्याख्या नहीं; किन्तु वे भी उन उन संहिताओं के स्वतन्त्र मन हैं । यदि वे वा उनके अनुयायी शाखाओंको वेद नहीं मानते तो वे शाखाओंसे अतिरिक्त वेदों को कहीं ढूँढ दिखलाएँ । क्य शाखाओंसे भिन्न भी शाखी कहीं मिल सकता है? उनके मा स ० ध ०५ Gujarat. An eGangotri Initiative

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६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मूल केहै हुए चार वेद भी तो चारों वेदोंकी एक - एक शाखा हैं - यह हम पूर्व निर्देश कर चुके हैं । रही है । ' शाखाके वेद - व्याख्यान होने के आर्यसमाजी पक्ष में हम अपने वचनो समय के आर्यसमाज के विद्वान स्वा. हरिप्रसाद ' वैदिकमुनि ' की तु वेद आलोचना उनके ' वेदसर्वस्व ' ( प्रथम भाग ) के ४३ पृष्ठसे उद्धृत करते ( २ | ४ | ११-हैं । उसमें यह लिखा है- ' जब यह प्रत्यक्ष देखने में आता है कि-सब शाखा -ग्रन्थों में कोई ग्रन्थ व्याख्यान और व्याख्येय नहीं है, चली व किन्तु काचित्क पाठभेद और पाठ -न्यूनाधिक्यको छोड़के सब एक - दूसरे के समान हैं, तब ११३१ में चार शाखा व्याख्येय वे और शेष ११२७ [ शाखा ] व्याख्यान हैं, यह कल्पना करना और शाखाः । मानना कैसे समञ्जस कहा जा सकता है? वास्तव में महाभाष्य-निक भ कृत् पतञ्जलिमुनिका उक्त [ ११३१ शाखा वाला ] लेख शाकल यकृत आदि प्रवचनकर्ता - ऋषियोंके भेदसे वेदोंके ११३१ भेदोंको कहता है ' । नमें यद्य ' ऐतरेया लोचन ' में श्री सत्यव्रतसामश्रमी ने भी कहा है- ' भिन्न-खाओ देशकालव्यक्तिलिखितानां बहुतरादर्शपुस्तकानामवश्यम्भावी एव एवादि पाठभेदादिभावः, तथाभूतपाठभेदादिहेतुक एव शाखानां भेदः ' । पोथियों उक्त दोनों उद्धरणोंमें हमारी पूर्णतया तो सहमति नहीं; तन्त्र मन नहीं तो कृष्ण शुक्ल संहिताओं में बहुत भेद कैसे होगया? तब ह्रीं मानते तो मनुष्य - कल्पित पाठभेदवश सभी शाखाएँ [ आजकी चारों एँ । क्य संहिता भी साथ ] पौरुषेय हो जाएँगी; और मन्त्र न रह उनके मा सकेंगी । जहाँ ऊह ( परिवर्तित ) किये हुए मन्त्रको भी मन्त्र नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण [ ६७ कहा जाता, तब वहाँ पाठभेदसे भिन्नको तो भला मन्त्र कैसे कहा जा सकेगा; और फिर भिन्न - भिन्न शाखा पूर्ण वेद हो जाएँगी; क्योंकि- भिन्न - भिन्न शास्त्राओं में भिन्न - भिन्न मन्त्र भी दीखते हैं; तब किस शाखाका पाठ परमात्मासे प्रोक्त और प्रामाणिक है, और किसका नहीं; इसमें विनिगमना ( एकपक्ष-निर्णायक -युक्ति ) के न होनेसे सभी संहिताएँ ( शाकल - वाजसनेयी-कौथुमी शौनकी आदि वादियोंसे अभिमत संहिताएँ भी ) अप्रमाण हो जाएँगी । और फिर ११३१ पाठभेद ही नियत क्यों हुए । आजकल भी पाठान्तर मिलते हैं; वह भी स्वतन्त्र शाखा क्यों न हो जावे? वस्तुतः थोड़े भेदसे भिन्न शाखाका रखना भी व्यर्थ है । अब बहुत सी शाखाएँ लुप्त हैं, यदि मिल जावें; तो उनमें पर्याप्त भेद दिखलाई पड़े । काठक- मैत्रायणी आदि शाखाओं में वाज-सनेयी - तैत्तिरीय संहिता आदिसे बड़ा भेद प्रत्यक्ष ही है । वस्तुतः जिस - जिस ऋषिने समाधिद्वारा मूल - परमात्मा से जो - जो मन्त्रसंहिता जिस - जिस मन्त्ररूप से प्राप्त की; वह स्वतन्त्र ही शाखा वा स्वतन्त्र ही मन्त्र मानना पड़ता है, वहाँ व्याख्यान-व्याख्येयता कुछ भी नहीं । तव जिस कुलने जिस ऋषिकी श्रद्धावश उससे दृष्ट संहिता मुख्य मान ली; कुल - परम्परासे उस-उसमें वही चलती रही । वही उसमें वेदरूपमें मानी गई, उसीका शेष ब्राह्मण भी उसीमें अन्तर्गत माना गया । श्रीवेदव्यासने उनका सङ्कलन यज्ञानुसार कर दिया । कई मन्त्र इस यज्ञमें Gujarat. An eGangotri Initiative

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६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण जितने बार भिन्न - भिन्न कर्मकेलिए प्रयुक्त किये जाते थे, वे मन्त्र भी उतने बार पढ़े । हाँ, अपनी संहिता में दृढ निष्ठार्थ कहीं - कहीं अन्य संहिताओंकी पौरुषेयता भी निन्दार्थवादवश कर दी गई; जिससे साधक अन्यनिष्ठ होकर ' इतो भ्रष्टस्ततो नष्टः ' न्यायका उदाहरण न बन जावे । यही शैली श्रीवेदव्यासने भिन्न - भिन्न देवके पुराणोंमें भी रखी; और अनन्य निष्ठतार्थ कहीं - कहीं भिन्न - भिन्न देवका निन्दार्थवाद भी रख दिया गया । वहाँ भी वास्तव में निन्दा निन्दा न होकर ' नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम् ' इस न्यायसे अनन्य निष्ठा में पर्यवसित हो जाती है । • यदि पूर्वपक्षी लोग यह बात न मानें; किन्तु उन ११२७ शाखाओंको इन ४ शाखारूप वेदका ही व्याख्यान मानें; और इन शाकल आदि ४ शाखाओंको ही मूल वेद मानें तो उनकी मानी हुई वाजसनेयी आदि चार शाखाओं में भी बड़ी गड़बड़ी उपस्थित हो जाएगी । वे देखें । उनकी मानी हुई ऋग्वेद ( शाकल्य ) संहिता में इस प्रकारके ४०० लगभग मन्त्र हैं जो बार - बार आते हैं । सामवेद ( कौथुम ) संहिता में १८२४ मन्त्र हैं; उनमें ७५ को छोड़कर शेष सब ऋ.शा.सं.में आते हैं । यजुर्वेद ( वाजसनेयी ) संहिता में भी . ऋ.सं. के बहुत से मन्त्र आते हैं; बल्कि यों कहना चाहिये कि -आधी यजुर्वेद संहिता ऋ.सं. से ली गई है । आर्यसमाजी श्री-शिवशङ्करकाव्यतीर्थके मत में यजुर्वेदसं के अपने मन्त्र ६८७ हैं, CC - 0. Ankur Joshi Collection शेष ६८७ ऋसं.से लिये गये हैं । इस प्रकार अथर्ववेद ( शौनव संहिता में ५६७७ मन्त्र हैं । उनमें श्रीपाददामोदरसात चलेक मतसे ७०० यह अथर्व.सं. की अपनी मन्त्र - संख्या है; शेष: मन ऋग्वेदसंहिता आदिसे गृहीत हैं । वहाँके १२०० मन्त्र तो साक्षा घटसं. के १, ८, १० तथा दूसरे मण्डलोंसे संगृहीत हैं । २० फाण्डके १४३ सूक्त १२ वें. सूक्तको छोड़कर सभी ऋसं. से गृहीत हैं । १४ वाँ काण्ड प्रायः ऋसं. के १० म मण्डल से लिये विवाहसम्बद्ध मन्त्रोंसे पूर्ण है । १८ वाँ काण्ड ऋसं.के १०३ मण्डल से निकाले हुए मन्त्रोंसे युक्त है । इस प्रकार यदि प्रतिपक्षी - लोगों के स्वसम्मत चार वेदों संहिताओं में बहुत सी समानता है; और वे उन्हें वेद मानते हैं । और अपने - अपने मन्त्रको उस - उस वेदसंहिताका अपना स्वतन्त्र मन्त्र मानते हैं; वैसे ही अन्य संहिताओं में भी थोड़ी - थोड़ी विलक्षणता होनेपर उन्हें भी उन संहिताओंके स्वतन्त्र मन्त्र मानें, और उन्हें वेद मानें; तथा उनकी भिन्नताकी चरितार्थव भिन्न- कुलोंके अध्ययनार्थं मानें । सभी व्यक्ति सभी संहिताएँ तो नहीं पढ़ सकते; इसलिए सभी को स्वकुलपरम्परावश चारों वेदोंकी अपनी कुलानुसृत चार संहिताओंको पढ़ना चाहिये ॥ अपनी संहिताओंमें दृढ निष्ठा रखते हुए भी अन्य कुल की संहिताओं को अपने किसी ग्रन्थमें उनकी मानुषिकता का निन्दार्थवाद देखकर भी उन्हें सम्मानकी दृष्टिसे देखना चाहिये; और उन्हें वेद ही मानना चाहिये । इस प्रकार थोड़े भी भेदमें Gujarat. An eGangotri Initiative

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७० ] श्रीसनातनंघम लोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपणं [ ७१ शाखाभेदकी चरितार्थताकी सफलता है । तब श्रीविश्वरूपद्वारा बालक्रीडा ( १७ ) में ' न हि मैत्रायणी शाखा काठकस्य अत्यन्त - विलक्षणा ' इस उल्लेखको देखकर ' इससे शाखाएँ वेदके अवयव नहीं ' यह अपने ' वैदिक वाङ्मय-का इतिहास ' के प्रथमभाग ( प्र.सं. ) के ७३ पृष्ठमें सिद्ध करते हुए उसके प्रणेता आर्यसमाजी अनुसन्धाता महाशय प्रत्युक्त होगये । ' न हि अत्यन्त - विलक्षणा ' से सिद्ध होता है कि कुछ विलक्षण है; और अन्य शाखाएँ तो इन शाखाओं से बहुत विलक्षण हैं । अथवा थोड़ा भी भेद हो, तथापि सामवेदसे ऋग्वेदकी भांति प्रतिपक्षियोंको सभी शाखाओं को अपनी शाखाओंकी भांति वेद मानना ही चाहिये । इस प्रकार श्रीवैदिकमुनि तथा श्रीसामश्रमीके वचनसे यह तो सिद्ध हो ही गया कि - शाखाएँ स्वा. दयानन्दा-नुसार व्याख्यान नहीं; किन्तु स्वतन्त्र वेद हैं । ( ७ ) स्वा.द.के शाखाओं को वेद - व्याख्यान कहने की पुष्टि करने के लिए जो कि आर्यसमाजिक अनुसन्धाता महाशय ने ' वैदिक-वाङ्मयका इतिहास ' ( प्रथमभाग पृ ० ७३-७४-७५ ) में वर्तमान वेदसंहिताओंके पदोंकी अन्य शाखाओंके मन्त्रोंमें कहीं - कहीं पर्यायवाचकता दिखलाई है कि ' ऋग्वेदमें एकपाठ है - ' सचिविद सखायं ' ( १०।७१।६ ) इसीका व्याख्यान ' तैत्तिरीयारण्यक ' में है-' सखिविदं सखायं ' ( ३ | १, २ १५ ( १ ); यजुर्वेद में एक पाठ है- ' भ्रातृ-व्यस्य वधाय ' ( १ | १८ ) इसीका व्याख्यान कारवसं में ' द्विषतो बधाय ' ( १ | ३ ) है ” यही शाखाग्रन्थोंका व्याख्यानग्रन्थ होना और मूलवेद न होना बताया है; ' इतिहास ' कारका यह मत ठीक नहीं । ऐसी बात तो उनकी मानी हुई संहिताओं में भी दीखती है; तो क्या वे उन्हें मूल - वेद न मानेंगे? देखिये-( क ) यजुर्वेद ( वाज. ) सं. ( १६/६० ) में ' ये अग्निष्वात्ता ये अनग्निष्वात्ताः ' यह पद है, और ऋग्वेदशा.सं. ( १०।१५ / १४ ) में तथा अथर्ववेद शौ. सं ( १८/२/३५ ) में ' ये अग्निदग्धा ये अनग्नि-दग्धाः ' यह ' अग्निष्वात्त ' पदकी व्याख्या है, शेष सारा ही मन्त्र समान है; क्या यहाँ भी प्रतिपक्षी अपनी ऋॠसं. तथा अथर्वसं.को यजुर्वेदका व्याख्यान मानकर उन्हें यजुः की शाखा और उनका मूलवेद न होना मान लेंगे? - प्रतिपक्षी कुछ अन्य भी वेदोंके उदाहरण देखें । ( ख ) ॠसं. में ' अघासु हन्यन्ते गावः ' ( १०८५ | १३ ) मन्त्र है, और अथर्व-सं.मैं ' मघासु इन्यन्ते गावः ( १४ | १ | १३ ) है; तो क्या इस थोड़ेसे भेदमें प्रतिपक्षी अथर्वको ऋसं की व्याख्या मानकर उसे मूलवेद न मानेंगे? ( ग ) ' प्रजापते! न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव ' ( ऋ. १०।१२१।१० ) यहाँ ' विश्वा जातानि ' पाठ है, यजुर्वेदवा.सं.में विश्वा रूपाणि परिता बभूव ' ( २३।६५ ) और अथर्वशौ.सं.में ' विश्वा रूपाणि परिभूर्जजान ' ( ७८५ ( ८० ) | ३ ) यह पाठ है, शेष सारा मन्त्र समान है । ( घ ) इस प्रकार यजुःवा.सं.में ' ऊरू तदस्य यद् वैश्यः ' ( ३१।११ ) यह पाठ है पर अथर्ववेद-शौ.सं. में ' मध्यं तदस्य यद् वैश्यः ' ( १६ ६ ६ ) यह थोड़ा ही भेद है, शेष समानता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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७२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ( ङ ) इस प्रकार ' बाहू राजन्यः कृतः ' ( ३१।११ ) यह यजुः वा.सं. में तथा ' बाहू राजन्योऽभवत् ' यह अथर्व शौ.सं. ( १६ / ६ / ६ ) में पाठ है । ( च ) यजुर्वेदीय ( वा.सं. ) पुरुषसूक्तमें ' उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ' ( ३१।२ ) यह पाठ है, परन्तु अथर्वसं.में उनका व्याख्यानरूप मन्त्र इस प्रकार है- ' उताऽमृतत्वस्येश्वरो यदन्ये-नाभवत् सह ' ( १६।६।४ ) यहां ' ईश्वर ' यह ' ईशानः ' की स्पष्ट व्याख्या है । ( छ ) ' स भूमि सर्वतः स्पृत्वा ' ( ३१।१ ) यद्द् यजुः वा. में पाठ है; सामवेद- कौथुमसं. ( आरण्यक. ६।४।३१ ) में ' सर्वतो वृत्वा ' यह पाठ है । ( ज ) ' ततो विराडजायत ' ( ३१।५ ) यह ( यजुर्वेद वा.सं. ) में पाठ है; उसीका व्याख्यानरूप पाठ ' बिराडप्रे समभवत् ' ( १६ ६ ६ ) अथर्व सं. में है । ( झ ) यजुर्वेदसं. में * पादोस्य विश्वा भूतानि ' ( ३१।२ ) यह पाठ है, और सामवेदसं. में ' पादोस्य सर्वा भूतानि ' ( आरण्यकपर्व ६ | ४ | ५ ) यह पाठ है, ' विश्वा ' की ' सर्वा ' यह व्याख्या है । तो क्या यहाँ स्वसम्मत वेद-संहिताओंमें भी व्याख्यान - व्याख्येयता मानकर आर्यसमाजी विद्वान् अथर्ववेदशौ.सं. तथा ' साम. सं. को मूल वेद न मानेंगे? वास्तव में यह उनका निर्मूलपक्ष है । कुछ अन्य मन्त्र भी इस विषय में देखें- न ( ) एतावानस्य महिमा ' ( ३१।३ ) यह यजुः. सं. में पाठ है, और ' तावानस्य ' ( आर. ६ । ४ । ६ ) यह साममें पाठ है । ( ट ) ' ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि ' ( ३१।४ ) यह यजुः सं. में पाठ है, और ' तथा विष्वङ् व्यक्रामद् अशनानशने अभि ' ( ६ | ४ | ४ ) यह सामसं. में पाठ है । ( ठ ) ' वैवस्वतं दुबस्य ' ( ऋ. १०।१४ | १ ) सङ्गमनं जनानां यमं वैदस्वरूपनिरूपणं ७४ सङ्गमनं जनानां यमं राजानं का इस ' दुवस्य ' पदकी व्याख्या- ' वैचार राजानं हविषा सपर्यंत ' ( अ. १८३ ॥ न ' सपर्यंत ' है । ( ड ) इदमापः! प्रवहत यत् किञ्च दुरितं म यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम् ' ( ऋ ० १०१६८ ) इ न्य अनुवाद यजुर्वेदसं. में देखिये - ' इदमापः प्रवहत अवद्य च । च यत् । यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम् । आपो द्या तस्मादेनसः पवमानश्च मुञ्चतु ' ( ६१ ) । ( ढ ) उदीर्ष्वतः पति क्य ह्येषा विश्वावसुं नमसा ईले ' ( ऋ. १०८५/२१ ) इसीकी व्याख शुर ‘ उत्तिष्ठ इतो विश्वावसो! नमसा ईडामहे त्वा ' ( अथर्व.सं. १४ | २ || व्य यह मन्त्र है । तब क्या इन व्याख्यान - व्याख्येयताको देखा दे अर्वाचीन मतवाले अपने वेदोंको भी शाखा मानकर शा वेदत्वसे हटा देंगे? इस विषयमें जो उनका उत्तर होगा, व अ न्य शाखाओं में पर्यायवाचक पद रखने पर भी समझते चाहिये । रच क्या ' एष वोऽमी राजा ' ( यजुः वा. सं. ६४०,१०।१८ ) । वा वादी से सम्मत मूल पाठ में ' एष वः कुरवो राजा, एष पश्चा राजा ' ( यजुःका.सं. ११३ | ३ ) ' एष वो जनते राजा ' ( यजुः कार कर वि सं. १५/७, मैत्रायणीसं. ११ ६ ६ ) ' एष वो भरता राजा ' ( क इस तै.सं. १ | ८ | १० | १२ ) यह शाखान्तरके पाठ पर्यायवाचकाल श व्याख्या कही जा सकती है? ' ततो न विचिकित्सति ' ( यजुःवाः शा ४०।६ ) इस पाठके स्थान पर ' ततो न विजुगुप्सते ' ( यजुःकाण्वा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative