सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 321–330
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 321–330
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६१० ] ६०६ वेद अन्य पतिकी इच्छाकेलिए प्रेरित करता है; वह विवाहसे देगा? नियोगसे? यहाँ तो न नियोगका नाम कहा है, न विवाहका र - पुरुषके वा ही । यदि वादी कहे कि यहाँ विवाह है; तो क्या सधवाविवाह हुई; मी वादीके अनुसार वेदसम्मत है? यदि वह कहे कि - यहाँ - पुरुषसे नियोग है; तो नियोगमें तो वीर्यसेक्का पति नहीं बनता; पुरुषके क्योंकि वह उसकी ( पाति रक्षतीति पतिः ) रक्षा नहीं करता; की क्या किन्तु वीर्य - निषेक करके उसी समय चला जाता है; तो उसे सरा भी. यहाँ पति कैसे कहा? इसके अतिरिक्त यमका वृद्धत्व आदिसे चन क्यों या असामर्थ्य उक्त मन्त्रके पूर्वोत्तर - मन्त्रों में कहे हुए यमीके वाक्यसे वेदने भी विरुद्ध पड़ता है कि - ' अन्या किल त्वां परिष्वजाते लिघु-कम्मन्व दि नहीं; जेव वृक्षम् ' ( १०।१०।१३ ) जब वह वृद्ध अपने आपको मैथुनमें दिने तो समर्थ जानता है; तब उसकी पत्नी तो उसे मैथुनमें असमर्थ विशेषरूपसे जानती होगी; तभी तो वह परपुरुषसे कुलवधूत्वके अयोग्य कर्मको करनेमें प्रवृत्त होगई; तब वह उस वृद्ध वा क- ' बी नपुंसकको ' दूसरी स्त्री आपसे मैथुन करेगी यह कैसे कह त्पत्ति-नोत्पत्ति सकती है - यह वादी नहीं विचारते, इससे उनका अर्थ खण्डित हो रहा है । वह यह जानती हुई भी फिर उसे ' सख्या ( सख्य-का है? चामीको सम्भोगकेलिए ) वावृत्याम् ' ( ऋ. १०११०११ ) ' पतिः [ सन् ] तन्वम् ? उसे श्रविविश्याः ' ( मुझसे सम्भोग कर ) ( १०११०१३ ) ' समाने योनौ सहशेय्याय ' ( समान शय्यामें इकट्ठे सोवो ) ( ७ ) ' तन्वा मे तन्वं आज्ञा संपिष्टग्धि ' ( मुझसे सम्भोग कर ) ( ११ ) यह कैसे कहती है? इस जो कि प्रकार फिर - फिर सम्भोगार्थ प्रेरणा स्वा. दयानन्दसम्मत उसकी CC - 0. Ankur Joshi Collection यमयमीसूक्त [ ६११ वार्धक्यादिवश अशक्तिका खण्डन कर रही है; किन्तु समर्थ भी यम भाई होनेसे उसको निषेध करता है - यह वेदका अभिप्राय है । ' किं भ्राताऽसद् यद् अनाथं भवति [ स्वस्त्रादिकं ], किमु स्वसा [ भगिनी, यस्यां सत्यां भ्रातरं ] निर्ऋतिः [ दुःखं ] निगच्छात् ' ( वह भ्राता क्या हुआ, जोकि उसके होनेपर वहिन दुःखी हो, वह वहिन क्या, जिसके होनेपर भी माईको दुःख हो ) ( १०११०१११ ) इस यमीके वाक्यसे तथा ' न वा उ ते तन्वं संपि-पृच्यां पापमाहुर्यः [ भ्राता ] स्वसारं [ भगिनीं ] नि गच्छात् ।... अन्येन मत् प्रमुदः कल्पयस्व, न ते भ्राता सुभगे! वष्ट्य'तत् ' ( १०।१०।११ ) [ मैं तुझसे संगम नहीं करूँगा, जो माई भगिनी-गमन करता है, उसे पापी कहते हैं । तू मुझसे अन्यसे रंग-रेलियाँ मना ( विवाह कर ), तेरा भ्राता यह नहीं चाहता ) इस यमके वाक्यसे दोनोंका बहिन - भाई होना प्रत्यक्ष- सिद्ध है । यदि वह वृद्ध होनेसे उसमें शुक्र - निषेकमें असमर्थ था; तो ' अहं ते तन्वा तन्वं न संपिपृच्याम्, हे सुभगे! तव भ्राता एतद् न वष्टि ' यह यम न कहता । यह तो रेतः सेचन - सामर्थ्य होनेपर भी वहिन होनेसे ' पापमाहुर्यः स्वसारं ' इत्यादि वाक्योंसे पाप मानकर ही यमने अनिच्छा वताई, असामर्थ्यसे नहीं । वह भी पतिकी नपुंसकता - मूलक असमर्थता जानती हुई उ पतिको पूर्वोक्त - वचन न कहती; यह परम स्पष्ट है । यम भी उसे भ्रातासे भिन्न पुरुषसे संयोगार्थ कहता है- ' यमि! श्रन्य उ त्वां Gujarat. An eGangotri Initiative
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६१२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) परिष्वजाते लिबुजेव वृक्षम् ' ( १४ ) यमी भी उसे वैसा ही कहती है - ' अन्या किल त्वां... परिष्वजाते लिबुजेव ( लतेव ) वृक्षम् ' ( १३ ) दोनों स्थान अर्थं समान है । इससे स्पष्ट सिद्ध हो रहा है कि दोनों ही मैथुनमें समर्थ थे; परन्तु यमी तो अपने और यमको गर्भमें इकट्ठा निवास होनेसे ( १०।१०१५ ) दम्पति दिखलाती है; परन्तु यम विद्वान् होनेसे भाई - बहनके संयोगमें पाप बताता है । इससे उसकी बहिन यमी अविदुषी, न पढ़ी - लिखी, मुग्धा और एतद्विषयक ज्ञानसे हीन दिखलाई गई है । वह अविदुषी होनेसे दोनोंका समान - गर्भ में निवासवश ही दोनोंको पति - पत्नी समझती है; पर विद्वान् भाई यमने उसके अज्ञानको दिखलाकर उसका प्रत्याख्यान कर दिया । यह इसमें नहीं कहा जा सकता कि - " मुसलमान भी चाचे-मामेकी लड़की लेते हुए भी बहिनको बचाते हैं; वेदमें बहिनके विषयमें ऐसा कैसे आवे "; वेदको सर्वादिम माना जाता है । उसीने हमें सबसे पूर्व कर्तव्याकर्तव्य बतलाना है । जैसे सनातनधर्मसभा आदिके नगर कीर्तनोंमें दो लड़के परस्पर कवितामें संवाद करते हुए ठहरते हैं; एक गिलासमें पानी डाल-कर उसे शराब बतलाता हुआ उसे पीता है, उसके स्वादका बखान करता है, उसके लाभ बताता है; और दूसरा शराबके दोष बताकर उसकी निन्दा करता है; तब वह दूसरेकी की हुई निन्दासे प्रभावित होकर स्वयं भी शराबके न पीनेकी प्रतिज्ञा यमयमीसूक्त ६१ [ ६१३ करता है, बल्कि उस शीशेके गिलासको भी सबके गिराकर तोड़ दिया करता है, इससे यह नहीं सामने कि- पहला लड़का सचमुच शराब पीता था कहा जा सकता । यह तो केवल लोगों को शराबकी बुराई बतलानेकेलिए यह नाटक इस है, वैसे वेदकी तथा तदनुगामी पुराणादि - शास्त्रोंकी रचा जाता का होती है कि कोई कल्पित वा परम्परासे आई हुई यह शैली आख्यायिका इत को उपस्थित करके स्वाभिमत - सिद्धान्तको उत्तरपक्षमें कर दिया वृद्ध जाता है । इसीको निरुक्तकारने कहा है- ' ऋपे ष्टार्थस्य प्रीति- सक र्भवति आख्यानयुक्ता ' ( १०११०१२ ) अर्थात् दृष्टार्थ- सिद्धान्ताभिह पर ऋषि ( वेदादि ) की किसी अर्थकी सिद्धचर्थ उपाख्यानके कहने में आ प्रीति अर्थात् रुचि हुआ करती है; पुराण- इतिहासमें सारा अनु यही तो प्रकार है । इसीका नाम भूतार्थवाद हुआ करता है; श्रा तब इस यम - यमीके आख्यान ( भूतार्थवाद ) से ' भ्रातृ - भगिनीका किन परस्परविवाह न हो ' यह सिद्धान्तित किया गया है; तब प्रति- ( 8 ) पक्षियोंका पूर्वोक्त उपालम्भ निस्सार हो जाता है; तथा पूर्व ( १-बतलाये गये पूर्वोत्तर - प्रकरणसे वादीका अर्थ भी निरस्त होगया । ( १२ इस सूक्तसे वेदने एक ढंग से भाई - बहिनके विवाहका निषेध घार कर दिया है - यह तात्पर्य है । ' जायेव पत्ये ' ( १०/१०/७ ) यह उपमा भी यम - यमीका पति - पत्नीत्व काट रही है - यह हम पूर्व बता चुके हैं । इसी प्रकार पति - पत्नी होनेपर वह ' पतिस्तन्वमा-विविश्याः ’ ( १०।१०।३ ) ‘ भ्राता तू पति बनकर मुझसे सम्भोग कर ' यह यमी न कहती । इससे यमका भाई होना स्पष्ट है, पति CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६१४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) [ ६१३ पति होनेपर फिर ' पतिः ' कहना व्यर्थ था । के सामने प्रतिपक्षीगण अपने साम्प्रदायिक- सिद्धान्तके साधनमें मस्त जा सकता तो होकर इस पर ध्यान नहीं देते कि यदि पति यम वृद्ध और केवल इसीसे असमर्थ होता और इसी कारण अपनी युवति - स्त्रीकी यह चा जाता कामपूर्ति के योग्य अपने आपको न समझता; तो यह बात वह शैली ज्यायिका- इतनी न जान सकता, जितनी कि उसकी पत्नी । क्योंकि - वह कर दिया वृद्ध भी क्यों न हो; वह उसके श्रङ्गमें शुक्रका सेचन तो कर ही सकता है; शुक्रोत्सर्गसे उसे थोड़ा - बहुत आनन्द भी हो सकता है, प्रीति-वन्ताभिज्ञ परन्तु उसके शीघ्र पतनवश उसके द्वारा उसकी युवति - पत्नीको कहने में श्रानन्द नहीं आ सकता । तब जब उसकी स्त्री उसके संयोगके में सारा अनुभवसे यह जानती है कि- इसके मैथुनसे मुझे आनन्द नहीं ता है; आता, तब इस अनुभव वाली भी वह उसे पुनः पुनः क्यों कहे गिनीका कि – ‘ पतिः तन्वमाविविश्याः ( अ. १८१३ ) [ भवान् ] आदधीत ' व प्रति- ( १ ) ' तन्वं रिरिच्यां ' ( ८ ) ( विवृहाद् अजामि ( अभगिनीत्वम् ) ' था पूर्व ( १० ) ' कामसूता बहु एतद् र ( ल ) - पामि; तन्वा मे तन्वं संपिपृग्धि ' होगया । ( १२ ) [ अर्थात् तुम मुझसे सङ्गम करो; मैं कामिनी होकर तुम्हें निषेध घार - चार कहती हूँ ] और यह क्यों कहे- ' बतो बतासि यम! ७ ) यह नैव ते मनो हृदयं चाऽविदाम ' ( अ. १८११५ ) अर्थात् मैं तुम्हें हम पूर्व नहीं जान सकी । इत्यादि; इसके उत्तरमें ही यम यह कैसे कहता तन्वमा- है - ' न ते नाथं ( नाथः ) यमि! अत्राहमस्मि... भ्राता [ त अह-सम्भोग मस्मि, अतः- ] न ते तनू ं तन्वः संपिपृच्याम् ' ( १३ ) ( मैं तेरा नाथ-नष्ट है, पति नहीं हूँ, किन्तु भ्राता हूँ; अतः तुमसे संगम नहीं कर सकता ] CC - 0. Ankur Joshi Collection यमयमीसूक्त [ ६१५ इस प्रकार पुनः - पुनः यमीके द्वारा मैथुनकी प्रेरणा मैथुन में योग्यता ( यौवन ) सिद्ध हो रही से यमकी इकट्ठे पैदा हुए थे - यह वेदमें है; क्योंकि दोनों ही दम्पती ही स्पष्ट हैं- ' गर्भे तु नौ जनिता कर ' [ प्रजापतिने गर्भ में ही हमें पति - पत्नी बनाया ( ऋ. १०१०१५,. १८ ११५; ) तब उनमें है ] ' जैसा कि प्रतिपक्षी कहते एक वृद्ध नहीं था, हैं, वे नित्य हैं । देवता उत्पन्न होते हुए ही युवा होते युवा ही रहते हैं । यमन्यमी दोनों देवता थे- यह वेदमें स्पष्ट है; अतः यह वार्धक्यका वहाना निःसारहै । इससे यह भी सिद्ध हो रहा है कि वह उसे नहीं जानती थी । प्रतिपक्षीके अनुसार यदि यम वृद्ध पति था; तो क्या यमी उससे अभी - अभी व्याही थी कि वह उसके वृत्तको नहीं थी, और उसको पुनः पुनः मैथुनार्थ कहती जानती थी? तब क्या वेद वृद्धके साथ भी युवतिका विवाह सिद्धान्तित करता है? यदि वह उससे यौवनमें ही विवाहित हुई; तो उसका पति तो वृद्ध होगया, और वह युवति ही रही - यह कैसे? क्या वह स्वा. दयानन्दके अनुसार ४८ वर्ष ब्रह्मचारी रहा; और क्षत्रिय होनेसे ११ वर्ष उपनयनसे पूर्वकालके थे, इस प्रकार ५६ वर्षके स्वप्नदोष-वाले उसने यमीसे विवाह किया; और वह मैथुन करता हुआ थोड़े ही समयमें नपु ंसक होगया? यदि ऐसा है तो यमी उसका वृत्त जानती होगी, तब वह उससे मैथुनार्थ पुनः पुनः कैसे कहती थी? इसीसे प्रतिपक्षीका यहांका पक्ष वालूकी भित्ति सिद्ध होता है । प्रतिपक्षी, तथा उसका स्वामी तथा उसके सम्प्रदायके व्यक्ति Gujarat. An eGangotri Initiative
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६१६ } श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) सभी मिलकर एकमत होकर भगवती श्रुतिसे बलात्कार करते हैं - यह बहुत लज्जाकी बात है । यमकी यमी — यहांपर ' पुंयोगादाख्यायाम् ' ( पा. ४ | १ | ४८ ) इस सूत्र ङीप् प्रत्यय होता है । इसका अर्थ यह है- ' पुंयोगाद् तोर्यत् प्रातिपदिकं स्त्रियां वर्तते पुंस आख्याभूतम् तस्माद् ङीष् प्रत्ययो भवति ' ( काशिका ) ' या ' पुमाख्या पुंयोगात् स्त्रियां वर्तते, ततो ङीषू ( सिद्धान्तकौमुदी ) ॥ ' स्त्रीलिङ्गमें वर्तमान पुरुषके योग कहने में प्रातिपदिकोंसे ङीष् प्रत्यय हो ' ( स्त्रैणतद्धितमें स्वा. दयानन्द ) ’ । ‘ पुं'सा योगः पु'योगः, तस्माद्धेतोर्यत् प्रातिपदिकं स्त्रियां वर्तते, ततो ङीष् भवति ' ( कैयटः ) । यहां पति - पत्नीभाव नहीं कहा गया, किन्तु पु ंलिङ्ग शब्दके योगसे स्त्रीलिङ्ग विवक्षित होनेपर ङीष् कहा गया है । जैसे कि आर्यसमाजिधुर्य श्रीब्रह्म-दत्तजी जिज्ञासुके शिष्य श्रीदेवप्रकाश पातञ्जलने ' अष्टाध्यायी-प्रकाशिकाके २३३ पृष्ठमें प्रकृत - सूत्रकी व्याख्यामें कहा है-" पुःयोगाद् हेतोर्यत् प्रातिपदिकं स्त्रिया आख्यायां वर्तते, तस्मात् ङीष् प्रत्ययो भवति । पुरुषसे सम्बन्धके कारणसे जो प्रातिपदिक स्त्रीलिङ्गको कनैमें समर्थ होता है; उस प्रातिपदिकसे ङीष् प्रत्यय होता है " । तब यहां कन्या तथा बहिन एवं पत्नी भी उदाहर्तव्य हो जाती हैं, केवल पत्नी नहीं । इसके वार्तिकका ' गोपालिका ' यह शब्द भी गोपालकी बहिन तथा बालिका में प्रयुक्त होता है । इसका प्रमाण यही है कि- इसी सूत्रका ' सूर्याद् देवतायां यमयमीसूक्त ६१८ चा ' यह वार्तिक है । इसका उदाहरण भाष्यकारने ' सूर्यस्य स्त्री सूर्या ' । यहां भी ' स्त्री ' का अर्थ ' पत्नी लिखा है- यहां ' स्त्री ' ही है । स्त्री शब्द ' पत्नी'का पर्यायवाचक ' नहीं, किन्तु । तो स ' पत्नी पाणिगृहीती 1 च द्वितीया सहधर्मिणी नहीं होता । तो क्य ( मर. २२२२६ ) इन पत्नीके पर्यायोंमें ' स्त्री ' । भार्या जाया ' किसी गया । तब ' स्त्री ' यह सामान्य शब्द बला ' ( अमर २ २ २ ) इत्यादि । तब है, बहिन भी, केवल पत्नी नहीं । है । इसलिए मनुस्मृतिमें जातमात्र ( ३।४६ ) लिखा है । शब्द नहीं बताया विवाह है । जैसे कि - ' स्त्री योषिद- । होती स्त्री ' कन्या ' भी हो सकती होना वहां प्रकरण देखना पड़ता पाट लड़कीका नाम भी ' स्त्री ' है अत्र वेदमें ' सूर्या ' देखनी चाहिये, जिसे वेदाङ्गकेअनुसार ' सूर्यस्य स्त्री ' कहा गया है, वह वेद में सूर्य की पत्नी है, वा लड़की क्योंक वा वहिन? ‘ तं वां रथं वयमद्य हुवेम अश्विनौ! यः सूर्यां वह्नितं ' क्योंक ( अथर्व ० २०।१४३।१ ) यहां ' सूर्या ' का अश्विनोंके रथपर आरोहण जिस-बताया गया है । ऋग्वेदसं ० में ' युवोः [ अश्विनोः ] रथं दुहिता है । सूर्यस्य ' ( ऋ. १।११७ । १३ ) ' आ वां [ अश्विनोः ] रथं दुहिता सूर्यस्य ' ( १।११६।१७ ) ‘ सूर्यां यत् पत्ये शंसन्तीं सविता [ तस्याः पिता सूर्यः ] तक ह अददात् ' ( ऋ. १० । ८५।९ ) एतदादिक मन्त्रोंके संवादसे ' सूर्या'- वादी का ' सूर्यस्य दुहिता ' यह अर्थ निकला । तब ' पु ंयोगाद् ' इस बाहु ' सूत्रके वार्तिकसे सिद्ध हुई सूर्य की स्त्री सूर्या वेदमें ' सूर्यकी पत्नी ' सामथ नहीं, किन्तु ' सूर्यकी लड़की ' सिद्ध हुई । हुए भ ‘ यं ( गन्धं ) संजभ्रुः सूर्याया विवाहे अमर्त्याः ' ( अ. १२ | १ | २४ ) वृषमत CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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1 श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) [ ६१७ ६१८ लिखा यहां सूर्याके विवाह में देवताओंने गन्ध तैयार की यह कहा है । है-डीं तो सूर्या यदि सूर्यकी लड़की नहीं है, किन्तु सूर्यकी पत्नी है, , किन्तु तो क्या सूर्यकी पत्नीका विवाह भी फिर हुआ? ऐसा सम्भव नहीं, होता । किसीकी कन्या वा बहिनका तो विवाह होता है, परन्तु किसीकी पत्नीका ह्रीं जाया ' विवाह नहीं होता । इससे सिद्ध हुआ कि - सूर्यकी कन्या भी ‘ सूर्या ’ बताया योषिद होती है, बहिन भी उसकी ‘ सूर्या ' होती है । तब यम - यमीका भाई - बहिन • सकती होना भी उक्त सूक्तसे कभी कट नहीं सकता । तब प्रतिपक्षीका पक्ष ना पड़ता कट गया । वेद - मन्त्रोंमें पूर्व कहे प्रकार से भाई - बहन होना स्पष्ट ' स्त्री ' है; तब प्रतिपक्षी तथा उसके स्वामीका जीवित - नियोगपक्ष भी खण्डित होगया । अनुसार प्रतिपक्षीके दाम्पत्य - पक्षमें यहां व्यभिचार भी सिद्ध है; लड़की क्योंकि यहां केवल दम्पति उपस्थित हैं, कोई समा नहीं की गई; वहति ' क्योंकि — ‘ अन्यमिच्छस्व ' यह परिवार जनों की अनुपस्थिति में आरोहण जिस किसी भी वीर्यसेच कके ग्रहण में स्वातन्त्र्य कर दिया गया दुहिता है । हमारे पक्ष में तो ' अन्य ' से ' भ्राता से भिन्न गोत्रवाले ' का अर्थ सूर्यस्य ' है, अतः कोई दोष नहीं । इसमें भ्रातृसम्बन्ध जितनी पीढ़ियों-. 7 सूर्यः ] तक हो सकता है, उसका निषेध भी अन्तर्गर्मित हो गया । यहां ' सूर्या'- वादीके मतमें जिस किसी भी वृषभ - वीर्यसेचन समर्थके आगे इस बाहु फैलाना कहा है । उस पुरुषकी आकृतिसे तो वीर्यसेचन-पत्नी ' सामर्थ्य नहीं जानी जा सकती; क्योंकि — ऊपरसे युवा दीख रहे हुए भी शीघ्र पतनवाले हो सकते हैं; तब क्या उस स्त्रीको उसके ११२४ ) वृपभत्वकी परीक्षाकी भी आज्ञा मिल जाएगी! इसके अतिरिक्त CC - 0. Ankur Joshi यमयमीसूक्त [ ६१ ९ उस वृद्धकी स्त्री भी वृद्धकल्प होगी, तब क्या वह अपनी श्रायुसे छोटे -युवाको ग्रहण करेगी, या अपनी आयुसे अधिक-अपनी पतिकी आयुवालेको? यदि वैसे वृद्धको; तब उसकी वृषभता – वीर्यसेचनसामर्थ्य वह किस ढंगसे जानेगी? हमारे पक्षमें तो ‘ वृषम'का अर्थ ' मनोरथका वर्षक- पूरक ' होगा; उसमें कोई दोष नहीं । फलतः इस यम यमीसूक्त में पति - पत्नी अर्थ करनेपर जहां श्रुतिसे वलात्कार होता है; वहां दोष भी उपस्थित होते हैं । अतः वादीका पक्ष कट गया । नहीं तो फिर वेदा-नुसार बहिन - भाईके विवाहका निषेध किसी सूकसे सिद्ध न होगा | सर्वानुक्रमणीमें यहां भाई बहिनका संवाद कहा है-‘ वैवस्वतयोर्यमयम्योः संवादः, षष्ट्ययुग्मिर्यमी मिथुनार्थं यमं प्रोवाच । स तां नवमीयुग्भिरनिच्छन् प्रत्याचष्टे ' ( १०।१० ) । वेदार्थ-दीपिकामें षड्गुरुशिष्यने भी कहा है- ' विवस्वत्सुतयोर्यमयम्योः परस्परं संवादः । वैवस्वती यमी वैवस्वतं भ्रातरं मिथुनार्थं - मैथुनाथं प्रोवाच - प्रणयेन उक्तवती । ततः स यमस्तां यमीं स्वसारम् अनिच्छन् मनसैव अकार्यमिति रतिस्पृहारहितः सन् प्रत्याचष्टे-मास्म मां वाधिष्ठाः, अन्यं भजस्वेति ' । आर्यसमाजके श्रीचन्द्र-मरिण पालीरत्न, श्रीराजाराम शास्त्री, तथा श्रीपाददामोदर सातवलेकर आदि भी उक्त सूक्त भ्रातृ - भगिनीपरक लगाते हैं । अमरोहा ( मुरादाबाद ) शास्त्रार्थ में ( १६ मार्च १६२२ ) आर्यसमाजी श्री आर्यमुनिने ' अन्यमिच्छस्व ' मन्त्रको नियोगार्थक नहीं माना, Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६२० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) किन्तु व्यभिचारिणी स्त्रीको तलाक ' अर्थ माना है, इनकी लीला विचित्र है । श्रीजयदेवविद्यालंकारजीने अपने अथर्ववेदभाष्यमें श्रुतिसे बड़ा बलात्कार किया है, फिर भी वे उसमें सफल नहीं हो सके । उनके अर्थ में कोई भी सङ्गति नहीं । बनावटी अर्थ में ऐसा होना स्वाभाविक ही होता है । ' प्रियतम, प्रियतमे ' ऐसे सम्बोधन स्वयं घड़ लिए हैं । ' न ते भ्राता वष्ट्ये तत् ' तेरा भाई यह नहीं चाहता - इस सीधे अर्थकी जगह - यह असमर्थ पति तेरा भ्राता ही सही, यह शरीर - सम्पर्क आदि कार्यको नहीं चाहता ' यहाँ पतिको भी वृद्ध होनेसे भ्राता बना देना - यह कितनी असभ्यता है, यदि वह नपुंसक है, तो शरीर - सम्पर्कको यह शब्द कहना ही भित्तिचित्र है । स्त्रीको बहिन बनाना, फिर उसे ' प्रियतमे ' कहलाना कितना असङ्गत है? क्या दोनोंका विवाह विच्छेद होगया कि अब पति - पत्नी न होकर भाई - बहिन होगये? फिर नियोगसे उत्पन्न सन्तान ही उसकी कैसे होगी - जब वह उसकी स्त्रीकी सन्तान नहीं; किन्तु बहिनकी सन्तान है? बहिनको दूसरेके घर भेजा जाता है; पर वादी लोग नियोग अपने घर में कराते हैं - वहिन हो जानेपर वहाँ उसका उसके नियोगसे क्या सम्बन्ध? ' ते तनू ं तन्वा न संपिपृच्याम् ' का अर्थ किया है- ' तेरे शरीरको अपने शरीरसे... ' सम्पर्क नहीं कराऊँ [ जव वह नपु ंसक है- तो यह उसकी मनाही करनी क्या अर्थ रखती है '? ] क्योंकि-विद्वान् इसको ' पापमाहुः यः स्वसारं निगच्छात् - पाप कहते हैं CC - 0. Ankur Joshi Collection यमयमीसूक्त ६२ [ ६२१ कि - जो अपनी बहिनका भोग करे; क्योंकि यदि मैं श स्वसुः शयने शयीय- तेरा भाई होकर अपनी बहिनकी भ्राता सेजपर सो जाऊँ तो मेरे हृदय और चित्तका यह असंयत - संयमभङ्गहै [ जबकि वह नपु ंसक है; तब उससे हो ही कैसे सकता है? । तेरा भाई हो कर ' अर्थसे स्पष्ट हो रहा है कि यह भाई वहनका संवाद है - पति - पत्नीका नहीं; फिर पति - पत्नीका कैसे कहा जाता है, पति - पत्नी भला भाई - बहन कैसे हो सकते हैं? ] आगे वे महाशय लिखते हैं- ' संयम वा तपस्या के कारण पति - पत्नीमें भाई - बहनकी भावना हो, तो भी स्त्री पुनः संयोग भ्र करे (? ) ' नष्टे मृते प्रब्रजिते ' इस पराशरके विधानमें ' प्रब्रजिते ' इसका यही मन्त्र आधार है ' यह अस्पष्ट तथा असंगत है — यह सव कृत्रिमताका फल है । विद्वान् पाठकोंने देखा होगा - ऐ बलात्कार श्रुतिसे जो इन लोगोंने किया है, उसका कारण साम्प्रदा-यिक- दुराग्रह है ' | पराशरके वचनका २० संख्यामें विवेचन होगा । जा कई शेरसिंह आदि आर्यसमाजी तो इस दुराग्रह से भी अन्य अधिक भयङ्कर दुराग्रहको अपनाते हैं । वे इन मन्त्रोंमें आये हुए भ्राता, स्वसा आदि शब्दोंका अर्थ वेदमें यौगिक अर्थका बहाना करके भर्ता, तथा स्त्री अर्थ करते हैं । यह तो श्रुतिसे सीमातीत बलात्कार है । वेदमें केवल यौगिक शब्द नहीं होते । किन्तु यौगिक भी तथा योगरूढ भी तथा रूढ भी शब्द हुआ करते । हैं, एतदर्थ हमारा भिन्न निबन्ध द्रष्टव्य है । भ्राता तथा स्वसा आदि × ‘ क्या वेदमें केवल यौगिकता है? ' इस पुष्पमें ५ म संख्या में देखें । Gujarat. An eGangotri Initiative
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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६२२ [ ६२१ योगरूढ है; प्रकृतका विरोध पढ़नेसे इनका यहाँ पति - पत्नी भ्राता शब्द सम्भव है । यौगिकता की भी सीमा हुआ करती है । सेजपर में भी ' भ्राता ' का ' मर्ता ' और ' भर्ता ' का अर्थ ' भ्राता ' समङ्ग प्रतियोगिता, है ' पति ' का अर्थ ' पिता ' और ' पिता ' का अर्थ ' पति ', ' पत्नी ' का $ अर्थ ' माता ' और ' माता ' का अर्थ ' स्त्री ' नहीं हुआ करता । नहीं चहनका तो फिर भाषाशास्त्र भी बाधित हो जाए, बड़ी उच्छृङ्खलता खड़ी हा जाता हो जाए? फलतः ' यम - यमीसूक्त ' जीवितके नियोगका वाचक नहीं; किन्तु कारण भ्रातृ - भगिनीसंवाद है, जिससे इकट्ठे घरमें रहनेवाले भाई-नः संयोग प्रब्रजिते ' बहिन आपसमें कुटेब न कर लेवें; इसलिए उन्हें डराया गया है;. ' और ऐसा करना पाप बताया गया है । हमने पाठकोंके समक्ष -यह सब नियोग - विषयक जो वेदमन्त्र दिये जाते हैं- उनका सम्यक् कि ऐसा समाधान कर दिया । अव स्मार्त प्रमाणों पर कुछ विचार दिया साम्प्रदा होगा । जाता है । श्री अन्यये हुए ( १६ ) विधवाविवाहपरक कई स्मार्त श्लोक ( १ ) बहाना कई आजकलके अन्वेषक कई स्मार्त श्लोकोंसे विधवाविवाह सीमातीत सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं, वे पूर्वपक्षरूप पद्य यह हैं— । किन्तु ( १ ) ' उद्वाहितापि या कन्या न चेत् सम्प्राप्तमैथुना । पुनः करते हैं, संस्कारमत यथा कन्या तथैव सा ' ( नारद ) ( जिस कन्याका आदि विवाह हो चुका हो, और मैथुन न हुआ हो, उसका पुनर्विवाह में देखें । हो सकता है, वह कन्या जैसी है ) । ( २ ) ' स तु यद्यन्यजातीयः CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाहपरक कई स्मार्त श्लोक । ६२३ पतितः क्लीव एव च । विकर्मस्थः सगोत्रो वा दासो दीर्घामयोपि वा । ऊढापि देया सान्यस्मै सहाभरणभूषिता ' ( कात्यायन ) ( यदि वह अन्य जाति वाला सिद्ध हुआ हो, पतित, नपुंसक, विकर्मा, समानगोत्र वाला, शूद्र वा दीर्घ रोगी सिद्ध हुआ हो; तो व्याही भी लड़की को भूषणोंसे सजाकर दूसरेसे विवाह दे । ( ३ ) ' दत्तामपि हरेत् कन्यां श्रेयाँश्चेद् वर श्रव्रजेत् ' ( याज्ञवल्क्य ) ( यदि अच्छा वर मिल जावे, तो व्याही मी कन्याको उस पतिसे लेकर उस श्रेष्ठ वरसे व्याह दे ) । ( ४ ) ' स्त्रीणां पुनर्विवाहस्तु देवरात् पुत्र-सन्ततिः । स्वातन्त्र्यं वा कलियुगे न कर्तव्यं कदाचन ' ( ब्रह्मपुराण ) ‘ ऊढायाः पुनरुद्वाहं ज्येष्ठांशं गोवधं तथा । कलौ पञ्च न कुर्वीत भ्रातृजायां कमण्डलुम् ' ( आदित्यपुराण ) इसमें कलियुग में विधवाविवाह आदिके निषेधसे मालूम होता है कि अन्य युगों में विधवाविवाह ग्राह्य था; उसे इस युगमें भी करना चाहिये ' । उत्तरपक्ष - ( १ ) ' उद्वाहितापि या कन्या ' इस पहले पद्यका चौथा पाद है - ' यथा कन्या तथैव सा ' । इसीसे सिद्ध हो रहा है कि- विवाह कन्या कुमारी ( जो अविवाहित हो ) का ही होता है, कन्या ( पूर्णविवाहिता ) का विवाह नहीं होता । श्रीमनुजीने मी कहा है - ' पाणिग्रहणिका [ वैवाहिका ] मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाऽकन्यासु क्वचिन्नृणां, लुप्त - [ विवाह ] धर्मक्रिया हि ताः ' ( ८।२२६ ) विधवा पहलेसे विवाहित होनेसे अकन्या होती है, इसलिए वह फिर विवाह के योग्य भी नहीं हो सकती । इससे प्रतिपक्षीसे सिद्धान्तित विधवाविवाह. तो खण्डित होगया । यदि प्रतिपक्षी Gujarat. An eGangotri Initiative
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६२४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) इस पद्यको मानता है; तब उसे विधवाविवाहका आग्रह छोड़ देना चाहिये । यदि वह इस पद्यको स्वयं नहीं मानता; केवल हमें इससे विधवाविवाहकी सिद्धि बताता है; तब हम इसकी व्यवस्था बताते हैं । ( क ) यह वचन नारदका नहीं है, किन्तु ' लघुशातातपस्मृति ' ( ४४ ) का है । यह पद्य विवाह हो चुकी हुईका विवाह नहीं बताता, किन्तु व्याही जाती हुईके विवाहकी अपूर्णता में वरकी मृत्यु आदि हो जानेपर उसका विवाह बताता है । यह वचन सप्तपदीसे पूर्वका है । सप्तपदी में विवाह पूर्ण हो जाता है । जैसेकि -मनुजीने कहा है- ' पाणिग्रहरिणका मन्त्रा नियतं दार - लक्षणम ' । तेषां निष्ठा तु विज्ञेया विद्वद्भिः सप्तमे पदे ' ( ८।२२६-२७ ) पाणिग्रहणके मन्त्र ही विवाह होता है, उनकी समाप्ति सप्तपदी-में होती है । उस समय वह कन्या न रहकर भार्या हो जाती है; पर इस पद्यमें ‘ कन्या ' शब्द आया है । व्याही जा चुकी हुई को ' कन्या ' नहीं कहा जाता । अतः उक्त पद्यसे सनातनधर्मके सिद्धान्तमें कोई क्षति नहीं पड़ती । इसमें स्पष्टता देखिये-( ख ) उक्त पद्यमें ' उद्वाहिता ' पदमें क्त प्रत्यय आदि - कर्म अर्थ में है, अर्थात् वहाँ उक्त पदमें ' क ' प्रत्यय भूतकाल में नहीं है, किन्तु जिस लड़कीका विवाह शुरू हुआ है, वैसी कन्या यहाँ इष्ट है- ' उद्वाहिता - उद्वाहयितुमारब्धा ' । इस अर्थ में लिङ्ग ( ज्ञापक ) है ' कन्या ' शब्द | शब्द के अर्थ में जब सन्देह हो; तो उस समय ' संयोगो विप्रयोगश्च साहचर्यं विरोधिता । अर्थः CC - 0. Ankur Joshi Collection कई स्मार्त श्लोक [ ६२५ प्रकरणं लिङ्ग शब्दस्यान्यस्य संनिधिः ॥ सामर्थ्यमौचिती देशः कालो व्यक्तिः स्वरादयः । शब्दार्थस्यानवच्छेदे विशेषस्मृतिहेतवः वाक्यपदीय २२३१६-३१७ ) यह संयोग आदि १४ पदार्थ विशेष स सहायता दिया करते हैं । तब उक्त स्मृति - पद्य में ' उद्वाहिता ' प के साथ ठहरा हुआ ' कन्या ' शब्द ' शब्दस्यान्यस्य सनिधिः त हेतुके बलसे कन्याके विवाहकी भूतकालीनता वा समाप्ति इस वा पूर्णता नहीं बता रहा, किन्तु उसके बिवाहके प्रारम्भ बा पूर्णताको बताता है, क्योंकि- विवाह पूर्ण हो जानेपर उसके लिए ' कन्या ' शब्द नहीं रहता; तभी ॠसं. ( ११६६४ ) मन्त्रकी व्या ख्या करते हुए श्रीसायणाचार्यने वेदका अभिप्राय यह कहा है - ' विवाहसमये अग्नौ लाजादिद्रव्यहोमे सति तासां कन्यात्वं निवर्तते । ह ( ग ) अब आदिकर्म में क्त प्रत्यय होता है— इसकी स्पष्टता देखिये — कृदन्तप्रकरणमें सिद्धान्तकौमुदीमें एक वार्तिक आया है - ' आदिकर्मणि निष्ठा ( क्तः ) वाच्या ' । यहाँ ' कर्म'का अर्थ है - ' क्रिया ' । क्रियाके आरम्भ में क्त प्रत्यय करो - यह भाव है । इस वार्तिकके नये रूपमें बनाने में श्रीकैयटने ( ३२।२।१०२ सूत्रके महाभाष्यके प्रदीपमें ) कहा है – ' आद्येषु क्रियाक्षणेषु भूतेष्वपि सर्वस्याः कियाया भूतत्वाभावाद् निष्ठा न प्राप्नोतीति वचनम् ' ( क्रिया आदिम क्षण कुछ बीत जानेपर भी सारी क्रिया न बीतनेसे भूतकालमें होने वाला क्त प्रत्यय प्राप्त नहीं था; तभी यह वार्तिक बनाया गया है । ) स ० ध ० ४० Gujarat. An eGangotri Initiative
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[ ६२५ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६२६ ती देश: इस विषयमें उद्योतमें श्रीनागेशभट्टने स्पष्टता की है - ' सम्पूर्ण-तिहेतवः ' व्यपवृक्तत्वे हि भूतव्यवहारः ' ( सारी क्रिया बीत जाने समूहस्य विशेष पर ही भूतकालका व्यवहार होता है । ) यही लघुशब्देन्दुशेखर हिता ' के तथा सिद्धान्तकौमुदीकी तत्त्वबोधिनी टीकामें स्पष्ट किया गया घः'इस है । यहां पर बालमनोरमा टीकामें इस प्रकार स्पष्टता की है— माप्ति वा ' प्रकृतः कटः । दीर्घकालव्यासक्तायाः कटाद्युत्पादन - क्रियाया रम्म वा श्रारम्भकाल - विशिष्टांश आदिकर्म । तत्र विद्यमानाद् धातोर्निष्ठा -सके लिए वक्तव्या । तत्र आद्येषु क्रियाक्षणेषु भूतेष्वपि क्रियाया भूतत्वा-की व्या- भावाद्भूते निष्ठा [ क्तः ] न प्राप्ता - इति आरम्भः । यह कहा इससे बढ़कर स्पष्टता और क्या हो? । इसका आशय यह कन्यात्वं है कि- क्तप्रत्यय भूतकाल में होता है, जिसका अर्थ होता है कि-यह क्रिया हो चुकी । परन्तु ' प्रकृतः कटः ' का अर्थ यह नहीं है स्पष्टता कि - चटाई बन चुकी; किन्तु यह है - ' बनने शुरू होगई है ' । सो या क्रियाके आरम्भिक कई क्षरण बीत जानेपर भी क्रिया समाप्त न का अर्थ हो चुकनेसे भूतकालमें होनेवाला क्त प्रत्यय क्रियामें नहीं हो नाव है । सकता । तब इस वार्तिकसे उस क्रियाके आरम्भिक कुछ क्षण २ सूत्रके बीत जानेपर भी उक्त क्रियामें ' क्त ' प्रत्यय हो जाता है । भूतेष्वपि वचनम् ' इस पर सूत्रकार कहता है- ' आदिकर्मणि क्तः कर्तरि चः क्रिया न ( पा. ३ | ४ | ७१ ) अर्थात् — आदि क्रियाका क्त प्रत्यय कर्तृवाच्यमें तभी भी हो जाता है । स्वाद जीने भी आख्यातिक ( पृ. ३३७ ) में लिखा है — ' आदिकर्म ( प्रथमक्रिया ) में धातुसे निष्ठासंज्ञक प्रत्यय [ क्त ] कहना चाहिये ( ११८ ) | आदिमें जो क्त प्रत्यय विहित है, CC - 0. Ankur Joshi Collection कई स्मार्त श्लोक [ ६२७ वह कर्ता और भाव - कर्म में हो ( ११८१ ) इस प्रकार स्पष्ट होगया कि- ' उद्वाहितापि या कन्या'का ' प्रकृतः कटः कटः कर्तुं मारब्धः-की भान्ति ' उद्वाहयितुमारब्धा या कन्या ' ( जिसका विवाह शुरू है ) यह अर्थ है । तव पूर्वपक्षीसे इष्ट भूतकालका अर्थ खण्डित हो गया । ( घ ) अथवा - ' उद्वाहितापि या कन्या का ' उद्वाहृयितुमिष्टा ' अर्थ भी है कि- जिसके विवाह करनेकी इच्छा है, ऐसी लड़की । इस अर्थमें ‘ आशंसायां भूतवच्च ' ( पा. ३ | ३ | १३२ ) यह भूतकालीन क्त - प्रत्यय भविष्यत्कालमें होता है । इसके उदाहरण देखिये । ( क ) मुद्राराक्षसके आरम्भ में चाणक्यके लिए ' मुक्तां शिखां परिमृशन ' छोड़ी हुई शिखाका छूना कहा है । वें में चाणक्यने ' मया पूर्णप्रतिज्ञेन केवलं वध्यते शिखा ' इस उपान्तिम-पद्यमें प्रतिज्ञा पूर्ण करके शिखा बांधी है; परन्तु उससे पहले ३ य अमें चन्द्रगुप्तके साथ बनावटी झगड़े में कहा है- ' शिखां मोक्तु ' बद्धामपि पुनर्धावति करः ' यहां ' बद्धामपि शिखाम् ' में क्त प्रत्यय कहा है, पर यहां शिखा वांधी नहीं गई थी, तब यहां भूतकालीन क्त - प्रत्यय कैसे प्रयुक्त किया गया? यहां यही उत्तर है कि - ' बद्धां ’ का अर्थ है — ' बन्धुमिष्टाम् ' अर्थात् बान्धी जानेवाली । यहां आशंसाके भविष्यत् कालीन होनेपर भी भूतकी भान्ति ' क्त ' कर दिया गया । ( ङ ) इस प्रकार ' उद्वाहितापि या कन्यामें भी ' उद्वाहिता ' इस क्वान्तपदका ‘ उद्वाहयितुमिष्टा ' ( जिसका विवाह होनेवाला Gujarat. An eGangotri Initiative
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६२६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) है ) यह अर्थ भी हो सकता है । जैसे कि किरातार्जुनीयमें ‘ भवत्कृतां भूतिमपेक्षमाणाः ’ ( ३।४६ ) यहां ' भवत्कृताम् ' का अर्थ भूतकालका नहीं है, किन्तु ' भवता करिष्यमाणाम् ' यह भविष्य-त्कालका अर्थ है । ( च ) यहां अन्य प्रसिद्ध उदाहरण भी देख लीजिये –'प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ' ( गीता १।२१ ) यहां ' शस्त्रसम्पात-के प्रवृत्त होनेपर गीताका आरम्भ कहा है । ' प्रवृत्ते ' में ' क्त ' प्रत्यय है, पर इसे भूतकालमें नहीं माना जा सकता; नहीं तो ' योत्स्य-मानान् अवेक्षेहं ' ( १।२३ ) इस अर्जुनके वाक्यमें ' योत्स्यमानान् ’ इस भविष्यत् कालका प्रयोग न होता । और शस्त्रसम्पातके प्रवृत्त होनेपर ७०० श्लोकोंकी गीताका सुनाना भी असम्भव होता । अतः ' प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते ' का क्त प्रत्यय भी निकट-भविष्यत्कालका बोध करा रहा है कि- ' शस्त्रसम्पातकी तैयारीके समय ' । इस प्रकार ‘ उद्वाहितापि या कन्या ' का अर्थ भी ' कन्या-विवाहकी तैयारीके समय ' यह है । ( छ ) ' प्रिये लोकान्तरं गतासि ' ( उत्तररामचरित म अङ्क ) यहां ' गतासि ' इस ' क्त ' प्रत्ययका ' गमिष्यन्ती ' यह अर्थ हैं । क्योंकि उत्तररामचरित सुखान्त होनेसे उसमें लोकान्तरगमन नहीं दिखलाया गया हैं । ( ज ) ' भो मित्र! सञ्जातोऽयं तावन्मम मृत्युः ' ( पञ्चतन्त्र मित्रसं - में ) चित्राङ्ग कह रहा है । यहां ' सञ्जातः ' के क्तका भूतकाल अर्थ नहीं; किन्तु ' सञ्जनिष्यमाणः ' यह भविष्यत्का अर्थ है । CC - 0. Ankur Joshi Collection कई स्मार्त श्लोक ६३० [ ६२ ९ ( झ ) इस सारे उल्लेखका यह तात्पर्य है कि पहल वचनों में ' मनोदत्ता, वाग्दत्ता, व्याही जानेवाली कई स्मृति-आरम्भ वाली कन्याएं भी पुनर्भू मानी जाकर विवाहमें , विवाहके वर्जनीय मानी गई हैं; पर उसके अपवादभूत इस वचनमें वैसीको चेत बताकर उसे विवाहसंस्कारके योग्य बता दिया गया है । कन्या । ( ञ ) अब ‘ न चेत् सम्प्राप्तमैथुना ' की परीक्षा करनी चाहिये । इसका अर्थ है - ' न समाप्त विवाहा ' जिसका विवाह समाप्त न हुआ । हो । ' मिथुन'का अर्थ ' विवाह ' है, विवाह होनेपर दोनोंका सप्तप जोढ़ा बनना है । ' द्वन्द्वाद् वैर मैथुनिकयो: ' ( ४ । ३ । १२५ ) इस पाणिनिसूत्र में भी ‘ मैथुनिका ' पदका अर्थ विवाह है । ' मिथुनं हि दम्पतिकर्म - क्रियानिष्पादनम् ( मनोज्ञादिमें पाठ होनेसे बु प्रत्यय होगया ) । इसका उदाहरण दिया जाता है - ' कुत्सकुशिकिका ' । संस्क इसका अर्थ तत्त्वबोधिनीमें लिखा है- ' कुत्सकुशिकयोर्विवाहरूपः । प्रति सम्बन्धोऽर्थः । वैसे ही शातातपके वचनमें भी ' न चेत् सम्प्राप्त-हुआ मैथुना ' का ' असमाप्तविवाहसम्बन्धवती ' अर्थ है । विवाह- अस सम्बन्ध सप्तपदी तक पूर्ण हो जाता है; तब ' कन्या ' शब्द दूर हो स्त्रिय जाता है, और ' भार्या ' ( स्त्री ) शब्द आजाता है, जैसे कि मनुजी- नहीं का वचन ( ८२२७ ) पीछे लिख चुके हैं । दीग ( ट ) अमरकोषके अनुसार ' मैथुनं सङ्गतं रते ' ( ३ | ३ | १२२ ) तथा ' सम्बन्धे सुरते युग्मे राशौ मिथुनमिष्यते ' इत्यादि वचनोंसे साऽन ' सम्बन्ध'का नाम भी ' मैथुन ' होता है । सम्बन्ध सगाई एवं शाय विवाहके आरम्भसे हो जाता है । उसकी अवधि सप्तम - पदसे Gujarat. An eGangotri Initiative