सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 331–340
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 331–340
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श्रीसनातनधर्मांलोक ( 4 ) ६३० ] [ ६२६ पहले तक होती है । सो सप्तम - पदसे पूर्व तक कन्यात्व होनेसे कई कारण विशेषवश उस लड़कीका विवाह हो सकता है । इसीलिए स्मृति- में भी कहा है- ' पूर्व सप्तपदीविधेः, अधिगते दोषे विवाह के मुहूर्तमार्तण्ड, में वर्जनीय वरे वा मृते, देयाऽन्यत्र विवाहितापि च बलाद् यब्धा च योनिर्न नीको वेत् ’ । फलतः ‘ न चेत् सम्प्राप्तमैथुना ' इसका अर्थ यह हुआ कि— कन्या । जिसका मिथुनीभाव अर्थात् पतिसे पूर्ण - पत्नीत्व न हुआ हो; 7 चाहिये सप्तपदी नहीं हुई, उसके पतिके मरने पर अपूर्णविवाह होनेसे । तन पुनर्विवाह हो सकता है । जैसेकि कुल्लूकभट्टने कहा है - ‘ एवं च हुआ र दोनोंका सप्तपदीदानात् प्राग् भार्यात्वाऽनिष्पत्तेः, अनुशये जह्याद्, न -२५ ) ऊर्ध्वम् ' ( मनु. ८।२२७ ) । इस | ' मिथुनं बल्कि - नारदस्मृतिमें तो ऐसीको ' पुनर्भू ' कहा है । जैसेकि-होनेसे वुञ ' कन्यैवाक्षतयोनिर्या पाणिग्रहणदूषिता । पुनर्भूः प्रथमा प्रोक्ता पुनः - शिकिका ' । संस्कारकर्मणि ' । शास्त्रोंमें पुनर्भू की निन्दा आई है । फलतः विवाहरूप: प्रतिपक्षीसे दिये हुए पद्यमें उससे इष्ट विधवा - विवाह सिद्ध न त् सम्प्राप्त- हुआ । इस प्रकारके पद्य तो विवाह के आरम्भवाली एवं I विवाह- श्रसमाप्तविवाहवाली लड़कियोंकेलिए हैं, पूर्णरूपसे विवाहित द दूर हो स्त्रियोंके लिए नहीं । इसलिए इसका नाम ' विधवाविवाह ' भी कि मनुजी- नहीं है । यह ' उद्वाहितापि या कन्या ' पद्यकी व्यवस्था तो बता दी गई, अब शेष पद्योंकी व्यवस्था भी दिखलाई जाती है । १२२ ) तथा ( २ ) दूसरा पद्य यह है ' स तु यद्यन्यजातीयः - ' ऊढापि देया साऽन्यस्मै ' ( कात्यायन ) । इस पद्यमें विधवाविवाह तो नहीं है, सगाई एवं शायद संधवा - विवाह हो । तब इस पद्यको विधवाविवाह के मद कई स्मार्त श्लोक [ ६३१ पक्षपाती उपस्थित करनेके अधिकारी नहीं । वस्तुतः यहां भी ' ऊढा ' शब्द में पूर्वकी मांति ' आदिकर्म ' में ' क्त ' प्रत्यय है । अव अर्थ हुआ - ' विवाहयितुमारब्धापि सा अन्यस्मै विधिवद् देया ' । विवाहके आरम्भवालीका कारण-विशेषसे दूसरेके साथ विवाह भी सम्भव है, इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं । ' क्त ' प्रत्यय क्रियाके आरम्भको भी बताता है । ' ऊढा ' में भी ' क्त ' प्रत्यय है । इस विषय में पहले हम बहुतसे प्रमाणगर्मित उदाहरण दे चुके हैं । एक और भी उदाहरण इस विषयमें यहां देते हैं । वह यह है- ' अनुत्तमो रसो ह्येष प्रमीत ( मृत ) मपि चेतयेत् ' यहां ' प्रमीत ' शब्द में ' क ' प्रत्यय है, कि उक्त रस मृतको भी लाभ पहुँचाता है । जैसे ' उद्वाहितापि ' में ' क्त ' प्रत्यय और ' अपि ' है; और ' ऊढापि ' में ' क्त ' प्रत्यय और ' अपि ' है, वैसे ' प्रमीतमपि ' में भी ' क ' प्रत्यय और ' अपि ' है; सो जैसे यहां ' प्रमीतमपि ' में ' मर चुके हुए ' का ग्रहण नहीं, किन्तु ' मरनेके लगभग पहुँचे हुए ' का ग्रहण है, वैसे ही ' उद्वाहितापि ' तथा ' ऊढापि ' में मी यही समझना चाहिए कि- ' जिसका व्याह पूरा होनेके लगभग है ' । ' जिसका व्याह हो चुका यह अर्थ यहांपर नहीं । सो यहां सप्तपदीसे पूर्व वाग्दत्ता आदि अवस्थावाली कन्याका ग्रहण है, समाप्तविवाहा, भार्या हो चुकी हुईका यहां ग्रहण नहीं; पूर्ण-विवाहितामें वैवाहिक - मन्त्रोंका प्रयोग व्यर्थ है । इसके अतिरिक्त उक्त पद्यमें ' ऊढा'का पूर्ण - विवाहिता अर्थ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६३२ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( 5 ) मानने पर सगोत्रा - विवाहिताका भी जिसका उक्त पद्यमें उल्लेख है - पुनर्विवाह करना पड़ेगा । फिर ' भोगतस्तां परित्यज्य पाल-येज्जननीमिव ' इस पद्यके साथ उसका विरोध हो जायगा, क्योंकि — उस सगोत्रा - ऊढाको भोगको हटाकर उसका माताकी भांति पालना लिखा है, पुनर्विवाह नहीं । उक्त पद्यको प्राचीन टीकाकारों एवं निबन्धकारोंने वाग्दान-कालीन माना है । इस कारण श्रीभट्टोजिदीक्षितने ' चतुर्विंशति-मतसंग्रह’में ‘ ऊढापि’के ' अपि ' शब्दसे कैमुतिक - न्यायके द्वारा वाग्दत्ताका ही दूसरेको दान कहा है- पूर्णविवाहिताका नहीं । नहीं तो सगोत्रोढाके भी पुनर्विवाह करनेपर ' मातृवत् परिपालयेत् ' यह शास्त्रीय वचन व्याकुपित हो जावे । इस प्रकार पराशर - स्मृति की विद्वत्मनोहरा टीकामें भी उक्त पद्यको वाग्दानपरक माना है । इस प्रकार ' वीरमित्रोदय के संस्कार- प्रकरण में भी । ऐसा वसिष्ठका वचन भी मिलता है- ' कुलशीलविहीनस्य पढादि-पतितस्य च । अपस्मारिविधर्मस्य रोगिणां वेषधारिणाम् । दत्तामपि हरेत् कन्यां सगोत्रोढां तथैव च ' । यहां भी ' दत्तां ' का अर्थ वाग्दत्तां ' ही है । उक्त वशिष्ठवचनको शव्दकल्पद्रुमकोष, स्मृ-वितत्त्व, अपरार्का टीका, पारस्करके गदाधरभाष्य तथा वीर-मित्रोदयमें भी वाग्दत्तापरक ही माना है । ( ३ ) इसी प्रकार ' दत्तामपि हरेत् पूर्वां श्रेयांश्चेद् वर आव्रजेत् ' ( याज्ञवल्क्यस्मृति- १।३।६५ ) इस पद्यको भी विधवाविवाहप्रेमी व्यर्थ ही देते हैं; क्योंकि- यह पद्य विधवाविवाहको तो नहीं कह कई स्मार्त श्लोक [ ६३३ ६३४ रहा, किन्तु सधवाविवाहको कह रहा है । सधवा भी विवाहिता पुरुषोन नहीं; किन्तु वाग्दान की हुई ही यहां इष्ट है । ' सकृत् । अपवा प्रदीयते ' ( मनु. ६४७ ) ' प्रदानं स्वाभ्यकारणम् ' ( मनु कन्या ' कहा ह यहां पर श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है- ' यत् पुनः प्रथमं प्रदानं. ५/१५२ ) | यह व वाग्दा. नात्मकं तदेव भतुः स्वाम्यजनकम् । ततश्च चाग्दानाद् ही मा आरभ्य स्त्री भर्तृ ' परतन्त्रा ' । अर्थात् - वाग्दानसे उसका भर्ती कुछ स्वामी यः क हो ही जाता है । दण्ड्य ‘ अन्यदत्ता तु या कन्या पुनरन्यस्य दीयते ' ( अङ्गिराः ६५ ) अपवा इत्यादि - स्मृतिपद्योंमें ‘ दत्ता ' शब्द ' वाग्दान ' अर्थ में ही - चाहिये है । अतएव उक्त_याज्ञवल्क्यपद्यकी मिताक्षरा में भी कहा है— ( कप्रत्य ' तदा दत्तामपि हरेत्, एतच्च सप्तमपदात् प्राग् द्रष्टव्यम् ' । इस ( 8 प्रकार अपरार्क, स्मृतितत्त्व, पारस्करगृह्यसूत्रका गदाधरभाष्य, वचनोंस शब्दकल्पद्रुमकोष, वीरमित्रोदय, मनुस्मृति ( ८ २२७ ) पद्यकी जाता मेधातिथिटीका तथा ' न दत्त्वा ' ( मनु. ६७१ ) इस पद्यके राघ- आदि वानन्द आदि टीकाकार भी उक्त पद्यको वाग्दत्तापरक ही विचार हैं । करती ह इस विषयमें पराशरमाधवमें भी कहा गया है- ' यस्मै वाचा यह दत्ता, ततोऽन्यश्चेत् प्रशस्ततरो लभ्यते; ततस्तस्मै देया, नतु दुष्टाय निषेध: पूर्वस्मै, इससे विधवाविवाहकी शास्त्रीयता कट गई । इसीलिए कई का उक्तपद्यके पूर्वार्ध ' सकृत् प्रदीयते कन्या हरस्तां चौरदण्डभाक ' में अन्य वाग्दानकालीनता स्पष्ट है । तब उक्त पद्य न दत्त्वा कस्यचित् विवाहस कन्यां पुनर्दद्याद् विचक्षणः । दत्त्वा पुनः प्रयच्छन् हि प्राप्नोति पुराणक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) [ ६३३ पुरुषोनृतम् ' ( ६७१ ) इस वाग्दान परिवर्तन न करनेके मनुपद्यक वाहिता अपवादभूत है । इस प्रकार गौतमधर्मसूत्रमें भी ऐसा अपवाद 1 कन्या कहा है – ‘ प्रतिश्रुत्यापि अधर्मसंयुक्ताय न दद्यात् ' ( १ । ५ । २१ ) । ५५१५२ ) यह बचन स्मृतितत्त्व, पराशरमाधवीय आदि द्वारा वाग्दानपरक वाग्दा. ही माना गया है । नारदस्मृति में भी कहा है- ' दत्तां न्यायेन आरम्भ यः कन्यां वराय न ददाति ताम् । अदुष्टश्चेद्वरो, राज्ञा स स्वामी दण्ड्यस्तत्र चोरवत् ' ( १२/३३ ) यहां ' अदुष्ट ' शब्द दुष्टकेलिए श्रपवाद बता रहा है कि - वाग्दत्ता लड़की दुष्टको नहीं देनी राः ६५ ) प्रसिद्ध - चाहिये । फलतः स्मृतियोंमें ' दत्ता ' शब्द भी आदिकर्म में निष्ठा हा है- ( क्तप्रत्यय ) होनेसे विवाहसे पूर्वता ही बता रहा है । 1 इस ( ४ ) ' ऊढायाः पुनरुद्वाहं... कलौ पञ्च न कुर्वीत ' इत्यादि रमाप्य वचनोंसे जोकि अन्य युगों में विधवाविवाह न्याय्य सिद्ध किया पद्यकी जाता है, इसपर यह जानना चाहिये कि अब जब सत्ययुग, राघ श्रादि - युग नहीं हैं; तब विधवाविवाह उस समय होता था - यह कही विचार ही व्यर्थ है, प्रत्यक्षमें परोक्षकल्पना अन्याय्य हुआ करती है । वाचा यहां यह समझना चाहिये कि किसी बातके कलियुग में दुष्टाय निषेध होनेसे वह बात अन्य युगों में वैध नहीं हो जाया करती । इसीलिए कई कार्योंका किसी समय में साधारणरूपमें निषेध होता है; और अन्य समयमें विशेषरूपसे निषेध होता है । ' स्त्रीणां पुन-कस्यचित् विवाहस्तु ·... · · स्वातन्त्र्यं वा कलियुगे न कर्तव्यं कदाचन ' इस ब्रह्म-नाप्नोति पुराणके वचनमें इन बातोंको कलियुगमें करनेका निषेध है । कई स्मार्त इलोक [ ६३५ उक्त वचनमें कलियुग में स्त्री - स्वातन्त्र्यका भी निषेध किया गया है । तब इसका वह अभिप्राय नहीं कि अन्य युग में स्त्री सर्वथा ही स्वतन्त्र रहे । यदि यह अभिप्राय होता, तो ' न भजेत् स्त्री स्वतन्त्रताम् ' ( मनु. ५१४८ ) ' न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ' ( ६३ ) इत्यादि सैंकड़ों मनु आदिके वचन सर्वथा त्यक्तव्य हो जाते । परन्तु यह इष्ट नहीं है । मनुस्मृति सत्ययुगकेलिए मानी जाती है । जैसेकि – ' कृते मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः । द्वापरे शङ्खलिखिताः कलौ पाराशराः स्मृताः ' ( पराशर. ११२४ ) पर इससे मनुस्मृतिके धर्मोकी कलियुगमें और पराशरके धर्मोकी सत्ययुगमें अकर्तव्यता नहीं हो जाती । अनेक निबन्धग्रन्थोंमें आदित्यपुराण तथा बृहन्नारदीय पुराणके नामसे कलिवर्ज्य प्रकरण में ' कन्यानामसवर्णानां विवाहश्च द्विजातिभिः ' ‘ द्विजानामसवर्णासु कन्यासूपयमस्तथा ' इत्यादि वचन असवर्णा कन्या के विवाहनिषेधके मिलते हैं; तब इनका यह अभिप्राय नहीं कि - कलियुग में ही इनका निषेध है, अन्य युगों में नहीं । ऐसा माननेपर सत्ययुगकेलिए नियमित मनुस्मृतिके ' उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम् ' ( ३४ ) ' हीनजातिस्त्रियं मोहाद् उद्वहन्तो द्विजातयः । कुलान्येव नय-न्त्याशु ससन्तानानि शूद्रताम् ' ( ३।१५ ) इत्यादि सवर्णा विवाह-विधायक वचन सत्ययुग में अनादरणीय सिद्ध हो जायेंगे, पर यह इष्ट नहीं । नहीं तो ऐसे पद्य सत्ययुग - नियमित मनुस्मृति में लिखे ही न जाते । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६३६ } श्री सनातनधर्मा लोक ( ८ ) तब यहाँ तात्पर्य है कि- स्त्रीस्वातन्त्र्य आदिका निषेध तो सभी युगों के लिए है, परन्तु सत्ययुग आदिमें धर्मकी प्रधानता होनेसे स्वतन्त्र स्त्रियाँ भी अपना चारित्र बचा सकती थीं; परन्तु अब कलियुगमें अधर्मकी बहुत रुचि होनेसे स्वतन्त्रतावश स्त्री हा प्राप्त कर सकती है । इस कारण कलियुगमें यह निषेध विशेषरूपसे अनुसरण करना चाहिये – ' स्वातन्त्र्यं वा कलियुगे न कर्तव्यं कदाचन ' । इससे स्पष्ट है कि - शास्त्रोंमें कालविशेषका नाम न लेकर निषेध होनेपर कलियुगमें फिर उसका निषेध उसकी विशेषता बताता है । लोकमें भी कोई कहे कि - प्रातः असत्य नहीं बोलना चाहिये । पर इसका यह अभिप्राय नहीं कि- प्रातःकालसे भिन्न कालमें असत्य बोलनेसे पाप नहीं हुआ करता । इस प्रकारके लोक वा शास्त्रमें बहुतसे उदाहरण मिल सकते हैं । इस प्रकार स्मृतिकारोंने निर्णय किया है कि जो स्त्री विधवा होकर अन्य पतिसे सम्बन्ध चाहती है, यदि वह अक्षत-योनि है; तब अन्य पुरुषसे संस्कार होनेपर वह पुनर्भू जाती है । इसपर यह जानना चाहिये कि अन्य युगों में तो ' कामं तु क्षपयेद् देहं पुष्पमूलफलैः शुभैः । नतु नामापि गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते परस्य तु ' ( ५।१५७ ) इस प्रकार सत्ययुग - नियमित मनुस्मृति-के द्वारा विधवाविवाहके निषेध होने पर भी यदि कलियुग में उसका विशेषरूपसे निषेध न किया जाय; तव सत्ययुगमें तो धर्मप्रधानतावश कहीं पुनर्भूत्व हो जानेपर भी मर्यादा वा कई स्मार्त श्लोक ६३ | III मुख्य व्यवस्थाका अतिक्रमण आशङ्कित नहीं होता; वि कलियुग में तो धर्मकी प्रधानतासे कितना अनर्थ परन्तु सन तथा कितना मर्यादानाश हो सकता है - यह कौन नहीं मानेगा? कलियुग में स्वर तो वैसा निषेध न होनेपर फिर अक्षतयोनित्वकी मर्यादा भी टूट जावेगी, जैसे कि आजकल दीख रहा है । तत्र जो कि शास्त्रोंमें अन्य पतिको लेनेवाली विधवाको अप पुनर्भू कहा है, और पुनर्भूको निन्दित माना गया है; उसका लड पति तथा पुत्र निन्दित माने गये हैं; वह मर्यादा भी टूट यह जायगी । तब उस पुनर्भू का पतिव्रता स्त्रीकी अपेक्षा न्यून पद न रहेगा, बल्कि विषयी लोगोंकी वैसी स्त्रीसे बहुत सहानुभूति हो का जावेगी; और पतिव्रता- विधवाका ' पौराणिकी, कट्टरपन्थिन ' अप इत्यादि शब्दोंसे तिरस्कार वा उपहास जारी हो जायगा; बल्कि कर उसपर झूठे कलङ्क लगाये जाएँगे । इससे पतिव्रतधर्मकी मी सा हानि होगी । भविष्य में तो इससे भी बढ़कर अन्य अमर्यादित काम होने लग पड़ेंगे । यही रहस्य था कि - विशेष - निषेध कलि- की वर्ज्य किये गये हैं । जि इस विषय में प्रत्यक्षका अनुग्रह भी देख लीजिये । आर्य-समाज वा अन्य संस्थाओंने विधवाविवाह जारी किया । तब सम् उन लोगोंने यही लक्ष्य रखा था कि जो बालविधवाएँ हैं; वे हो अक्षतयोनि हैं, उन्होंने एक दिन भी पतिको नहीं देखा, इसलिए. के वे पुनर्विवाहके योग्य हैं । कलियुग में आर्यसमाजादि द्वारा की हिन हुई इस घोषणाका परिणाम क्या हुआ? | यही कि अब युवति- के CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६३८ ६३७ विधवाएँ भी व्याही जाती हैं, क्षतयोनि भी व्याही जाती हैं; परन्तु सन्तानवाली विधवाएँ भी व्याही जाती हैं । इसीके परिणाम-कितना स्वरूप सधवाएँ भी दूसरे पुरुषोंसे पुनर्विवाहित हो रही हैं । ऐसा होनेसे अव पतिव्रतधर्म बेचारा कहाँ रहेगा? टूट सवर्णविवाहका परिणाम देखिये- श्रीगान्धिजीने अपने वैश्य लड़के श्रीदेवदासका श्रीराजगोपालाचार्य ब्राह्मणकी नवाको लड़की से प्रतिलोमविवाह कराकर असवर्णाविवाह जारी किया, उसका यद्यपि पहले ला ० मुन्शीरामजीने भी अपने क्षत्रिय - लड़के टूट पद न श्रीइन्द्रचन्द्रका ब्राह्मणकुमारीसे व्याह कराया था; पर गान्धिजी-तहो का प्रभाव बहुत पड़ा । उसका परिणाम क्या हुआ? यही कि-न्थिन ' अपने वर्णकी योग्य जातियों वा प्रतिलोम जातियोंसे सम्बन्ध बल्कि करनेमें बाधा दूर होगई । अब तो हिन्दुओंके अहिन्दुओंके 7 भी साथ विवाह शुरू होगये । अरुणा ब्राह्मणी आसफ अलीकी पत्नी नदित बनी, श्यामकुमारी नेहरू जमीलखाँ की, इन्दिरा फीरोज - पारसी कलि- की, एक ब्राह्मणी अम्बेदकर अन्त्यज की । एक अन्य हिन्दु - लड़की जिसका एक मुसलमान से विवाह हो रहा था - देहलीमें विरोध आर्य- हुआ । वह यहांसे चली गई, और अन्यत्र जाकर उसने उससे तब सम्वन्ध कर लिया । इसीके फलस्वरूप व विवाहविधि भी समाप्त वे हो रही है । अथवा ' सिविल मैरिज ' कानून द्वारा बिना ही विधि-चलिए के विवाह किया जाता है, जिसमें लिखाना पड़ता है कि- मैं न 7 की हिन्दु हूँ, न मुसलमान, न ईसाई । मैं जातिहीन हूँ | इस प्रकार-के लोग ऐसा करके हिन्दुजातिकी संख्याको कम कर रहे हैं । कई स्मार्त श्लोक [ ६३ अब तो यह नियम ही हटाया जा रहा है - हिन्दुजातिको दूषित करनेकेलिए ' हिन्दुकोड ' कानूनको हिन्दुजातिपर वलात् लादा जा रहा है । पुरुषोंके कोमल मनों पर निम्नताका प्रभाव शीघ्र पड़ता है । यह सब स्वतन्त्रताके परिणाम हैं । कलियुग में कलिवर्ज्य - नियमोंके चालू करनेके यह परिणाम हैं । इससे कितने अनर्थ हो रहे हैं, पर हमारे प्राचीन महानुभाव दूरदर्शी तथा इन विषयों में अत्यन्त सप्रतिम थे । इसी कारण उन्होंने पहले समय में निन्दित तथा कई अनिन्दित परन्तु कठिन कार्योंका कलियुग में विशेषरूपसे निषेध किया, और कहा — ' ऊढायाः पुनरुद्वाहं ज्येष्ठांशं गोवधं तथा । कलौ पञ्च न कुर्वीत भ्रातृजायां कमण्डलुम् ' । इस प्रकार प्राचीनकालमें स्त्रियोंकी आवरण - प्रथा मी थी । कई इसके अपवाद भी थे । इस युगमें तो इस प्रथाकी अत्यन्त दृढता अपेक्षित है, पर आधुनिक अदूरदर्शी सुधारकाभार्सेने जहाँ - तहाँ इस प्रथामें शिथिलता करा दी है । देखिये- इसका फल क्या हो रहा है । पहले स्त्रियाँ अन्तःपुरमें रहती थीं; घरसे बाहर पैर न निकालती थीं, यही उनका पर्दा होता था । इस प्रथामें कुछ शिथिलता करनेपर उसमें यह परिवर्तन होगया कि किसी परपुरुषको देखकर वे वहांसे हटकर आढ़में हो जाती थीं । उसमें भी शिथिलता की जानेपर वे दूसरे पुरुषके सामने तो ठहरती थीं, परन्तु सभी ङ्गोंको कपड़ोंसे ढके रहती थीं । उसमें भी शिथिलता करने पर केवल मुखका ढकना यह घूँघट रह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६४० ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) गया । तब आनकल उस शिथिलताके परिणाममें मुख कुछ घूँघटसे निकला । फिर मुख पूरा बाहर आ गया; फिर सिर से कपड़ा भी हट गया । फिर भुजाएँ पसे बाहर आगई ' । तब निक्करके प्रचारसे उनकी जांघें बाहर आ गई । अब ऊरुभाग भी नंगा होगया है । अव छातीका ऊपरका भाग भी नग्न होगया । आगे इससे और तरक्की होगी । फिर स्त्रियाँ घर से निकलकर गलीमें बैठती थीं । फिर उनका बाजारमें आना जाना - शुरू हुआ; अब तो वस्त्र खरीदना, दुकानदारोंसे बातचीत, कपड़े आदि का मूल्य चुकाना - यह सव काम शुरू होगया है । पर - पुरुषोंसे वातचीत, पढ़ना, हाथ मिलाना आदि भी हो रहा है । इससे जो अनर्थ हो रहे हैं; सुधारकोंका उधर ध्यान नहीं है । वे सनातनधर्मके मारने में अपनी सफलता तथा अपने जीवनको धन्य मानते हैं । पर वह समय शीघ्र आवेगा, जो इनके गालोंपर थप्पड़ लगावेगा । तब वे प्राचीनोंकी दूरदर्शिता समझेंगे । तब स्त्रियोंको वे परतन्त्र एवं पर्दे में कर देंगे । कलिवर्ज्य नियमोंको फिर उन्हें कलिवर्ज्य करना पड़ेगा । अदूरदर्शी यह लोग दुष्फल मिलने पर फिर पछताते हैं । पर अब उधर कौन ध्यान दे? । आशा है- पाठकोंने चतुर्थ-प्रश्नके उत्तरका रहस्य समझ लिया होगा । ' आलोक ' पाठकोंने विधवाविवाहके विषय में दिये जाते हुए वैदिक एवं स्मार्तपद्योंका वास्तविक रहस्य समझ लिया । अब ' क्लीवे च च पतितेपतौ ' इस पराशर वचनपर विचार किया जाता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection नष्टे मृते प्रब्रजिते [ ६४१ ६४२ ( २० ) ' नष्टे मृते प्रत्रजिते क्लीबे च पतितेपतौ ' ' पत्य पूर्वपक्ष - पराशरस्मृतिका बहुत प्रसिद्ध ' नष्टे मृते प्रब्रजिते तो क्लीवे च पतितेपतौ । पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते होक ' ( ४।३२ ) यह पद्य जब तक विद्यमान है, तब तक विधवाविवाह पद्य कोई हटा नहीं सकता । इसमें पतिके नष्ट, मृत, संन्यासी सकत नपुंसक वा पतित होनेपर इन पाँच आपत्तियों में नारियोंके, यह लिए दूसरे पतिका विधान है । यह कितना स्पष्ट विधवाविवाहका प्रतिपादक पद्य है ( सुधारकगण ) लोप उत्तरपक्ष— ( १ ) यह पद्य भी सप्तपदीसे पूर्व तक पतिकी बाध मृत्यु आदि हो जावे, तब अन्य पतिका विधान करता है, पर वाद यह विधवाका पुनर्विवाह नहीं बताता है । इस पर विवेचना ६१ सुनिये — यहाँपर ' पतौ ' यह सप्तम्यन्त पद है । इस पद्यमें ‘ पतौ ’ में विवाद है । आर्यसमाजी यहाँ पर ' पतौ ' ही मानते हैं । चप सनातनधर्मी यहाँ पर ' अपतौ ' भी मानते हैं, ' पतौ ' भी । ' अपत ' ' अप पक्ष में प्रतिपक्षियोंकी ओरसे प्रश्न होता है कि- ' यहाँ पर ' पतिते अपतौ ' पाठ होनेपर ' एङ: पदान्तादति ' ( पा. ६१ २०६ ) चिह्न सूत्रसे पूर्वरूप करनेपर ' पतितेऽपतौ ' इस प्रकार आकृति होनी प्रमा चाहिये, परन्तु पुस्तकों में ' S ' यह चिन्ह नहीं पाया जाता है ' । पात इसपर हमारा तो यह मत है कि- प्रतिपक्षियोंके मतानुसार ' पती ' ' भ्यर मानने पर व्याकरण - सम्बन्धी दोष उपस्थित होता है, पर छेद ' अपतौ ' में कोई दोष नहीं आता । क्योंकि - ' पति ' शब्द अकेला कुतः हो, तो उसकी घि - संज्ञा नहीं हुआ करती । उसका सप्तमीमें उत्तर स ० ध ० ४१ Gujarat. An eGangotri Initiative
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६४२ ] श्रीसनातनघमोलोक ( 5 ) ६४१ ' पत्यौ ' बनता है । परन्तु ' पति ' शब्द यदि समासमें श्रा जावे, तो उसकी ‘ पतिः समास एव ' ( पा. १/४/८ ) इस सूत्र से घि - संज्ञा होकर ' भूपतौ ' बनेगा । पर यदि प्रतिपक्षीके अनुसार उक्त यते ' पद्य में ' पतौ ' यह पाठ है, तो विना समासके घि - संज्ञा कैसे हो विवाह सकती है? सो यहाँ सभी धर्मशास्त्रोंकी अनुकूलतासे ‘ अपतौ ’ सी, यह छेद है । लिए यहाँ ' पति ' के साथ नत्र का समास होकर और ' न ' का हिका लोप होकर ' अ ' वचता है । इस प्रकार समास होनेसे बिना तिकी बाधा घि - संज्ञा हो जाती है ' पतौ ' बन जाता है । उसके पर वाद ' पतिते अपतौ ' की सन्धिमें ' एङः पदान्तादति ' ( पा. चना ६।१।१० ९ ) से पूर्वरूप होकर ‘ पतितेपतौ ' यह प्रयोग बन जाता है । I ( २ ) कई साधारण - बुद्धिके व्यक्ति जो यह कहते हैं कि - ' क्लीवे sha च पतितेपतौ ' इस पद्यमें ' S ' यह चिह्न नहीं पाया जाता है; तब पतौ ' ' अपतौ ' यह छेद कैसे माना जाय? उनके ज्ञानार्थ कहना पड़ता पर है कि- ' S ' यह पूर्वरूप -बोधनकेलिए प्रयुक्त किया जाता हुआ २०६ ) चिह्न प्राचीन नहीं है, किन्तु आधुनिक है । इस विषय में होनी प्रमाण लीजिये । ' भ्यसोभ्यम् ' ( ७ । १ । ३० ) इस पाणिनिसून के है ' । पातञ्जलमहाभाष्य में इस प्रकार प्रश्नोत्तर - प्रक्रिया है - ' किमयं ' भ्यम् ' शब्दः, होस्विद् ' अभ्यम् ' - शब्दः? ( उक्त सूत्रमें ' भ्यम् ' पर छेद है, वा ' अभ्यम् '? इसपर प्रति वक्काने पूर्वपक्षी से पूछा कि ) कुतः सन्देहः? ( तुम्हें यह सन्देह ही कैसे उठा? पूर्वपक्षी उत्तर दिया- ) ' समानो निर्देश: - ( चाहे ' भ्यम् ' छेद करें, चाहे क्लीवे च पतितेपती [ ६४३ ' अभ्यम् '; दोनों दशाओं में ' भ्यसोभ्यम् ' इस प्रकार समान ही लिखा जावेगा, तब पूर्वोक्त सन्देह हो सकता है? ) । इससे स्पष्ट हुआ कि -पूर्वरूपमें ' S ' यह चिह्न नहीं हुआ करता; किन्तु पर ' अ ' को पूर्व ए, वा ओका रूप हो जाता है । यदि ' S ' का चिह्न भाष्यकारके समयमें होता; तो महाभाष्य में ' समानो निर्देश: ' कभी कहा ही नहीं जा सकता था । तब ' S ' यह चिह्न अर्वाचीन प्रतिफलित हुआ, केवल पूर्व के ‘ पतिते ' के ' ए ' का रूप, पूर्वरूप हो जाता है । भाष्यकारका समय छोड़ दीजिये, बहुत पुराना है; श्रीभट्टो-जिदीक्षित तो बहुत अर्वाचीन हैं । सत्रहवीं शताब्दी में हुए हैं । उन्होंने ' समुदाङ्भ्यो यमोग्रन्थे ' ( पा. १२३ | ७५ ) इस सूत्रको आत्मनेपद - प्रक्रियामें लिखकर उसकी वृत्तिमें ' अन्थे ' इति-च्छेदः ' यह लिखा है । यदि ' यमोऽग्रन्थे ' ऐसा लिखनेकी श्रीभट्टोजिदीक्षितके समय में भी परिपाटी होती; तो फिर श्रीदीक्षितजीको ' अग्रन्थे इतिच्छेदः ' लिखनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी । वस्तुतः पूर्वरूपमें ' 5 ' यह चिह्न लिखना है भी ही । ' एड: पदान्तादति ' ( ६ १ १०६ ) पाणिनिसूत्र से ' अ ' को पूर्वरूप - पूर्व ' ए ' ' ओ ' का रूप हो जाता है, अर्थात् ' ' की पृथक कोई आकृति नहीं रहती । तब ' S ' इस चिह्नकी आवश्य-कता ही नहीं । तब ' S ' यह चिह्न आधुनिक सिद्ध हुआ । केवल आधुनिक जनोंकी स्पष्टताकेलिए आजकल व्यवहृत होने लगा है । सो यदि ' पराशरस्मृति ' के ' क्लीवे च पतितेपतौ ' में वह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६४४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) चिह्न नहीं मिलता; तब इससे ' अपतौ ' यह छेद ही न निकल सके, ऐसी कोई राजाज्ञा नहीं है । महामहोपाध्याय वैयाकरण-धुरीण पं ० शिवदत्तजी शर्मा अपनी टिप्पणियों में पूर्वरूपसन्धिमें ' S ' यह चिह्न नहीं जोड़ते । आजकलके स्वा • भगवदाचार्य भी अपने संस्कृतभाष्योंमें पूर्वरूपमें उक्त चिह्न नहीं लगाते; तो क्या उनमें ' अ ' का छेद नहीं हो सकेगा? । ( ३ ) ' पति ' शब्दका ' डि ' में ' पत्यौ ' रूप बनता है, न कि ' पतौ ' । जैसेकि - पराशरस्मृतिमें भी ' पत्यौ ' ( ४ । १७-२४ ) ग्रह मुख्यपति - शब्दकी सप्तमीमें भी प्रयोग प्रयुक्त किया गया है । इसलिए फिर जो पराशरस्मृतिमें ' पतौ ' दीखता है, यह मुख्यपति-केलिए नहीं है, किन्तु औपचारिक ' पति ' केलिए ' अपतौ ' है । पति शब्दका ' ङि ' में ' पत्यौ ' रूप बनता है, न कि ' पतौ ' । परन्तु समासमें घि - संज्ञा हो जानेपर वैसा बन सकता है । तब नव - समासमें ' अपति ' शब्दकी घि - संज्ञा हो जानेपर सप्तमीमें ' अपतौ ' हो जानेसे उक्त पराशर वचनमें ' अपतौ ' छेद हो जाना सर्वथा युक्त है । इससे न कोई धर्मशास्त्र विरुद्धता होती है, और न कोई व्याकरणका विरोध वा तोड़मरोड़ । ( ४ ) नत्र के ' तत्सादृश्यम् १ अभावश्च २ तदन्यत्वं ३ तदल्पता ४ । अप्राशस्त्यं ५ विरोधश्च ६ नवर्थाः षट् प्रकीर्तिता: ' इस प्रकार छः अर्थ हुआ करते हैं । उनके क्रमसे उदाहरण हैं -१ अब्राह्मणः, २ अपापम् । ३ अनश्वः । ४ अनुदरा कन्या । ५ ' अपशवो वा अन्ये गोअश्वेभ्यः ' । ६ अधर्मः । इनमें ' अल्पता ' अर्थ भी नष्टे मृते प्रव्रजिते [ ६४५ बहुत प्रसिद्ध है, जिसका ' अनुदरा कन्या ' ' अनमित्रोऽयं आदिमें प्रयोग मिलता है । तब यहाँ भी ' अपति राजा ' ' ईषत्पत्ति ' है । ईपत्पतित्व बहुसम्मतिमें ' सप्तपदी ' का अर्थ यह ' से पूर्व तक हुआ करता है, अल्पसम्मतिमें चतुर्थीकर्म से पूर्वतक । ( सप्तपदी से पूर्व ) ' ईषत्पति ' के मरने आदिपर भी उस समय स विधवा नहीं कहाती । अतः उसका विवाह भी ' विधवाविवाह वह मुख्य पा ' नहीं होता । तभी ' अद्भिर्वाचा च दत्तायां म्रियेतोर्ध्वं वरो यदि । न च मन्त्रोपनीता च कुमारी पितुरेव सा ' ( वसिष्ठ १७१६४ ) इस प्रकारके पद्य स्मृतियोंमें मिलते हैं उस समय वह लड़की पिताकी मानी जाती है, और कुमारी ही मानी जाती है; पतिकी पत्नी नहीं । सप्तपदी पूर्ण हो जानेपर तो पति भी पूर्ण जाता है । उस समय उसपर पिताका अधिकार भी नहीं होता, तब पतिकी मृत्यु हो जानेपर वह विधवा कही जाती है, उसका विवाह भी स फिर शास्त्रानुसार नहीं हो सकता । इस प्रकार ' अपतौ ' में जहाँ न व्याकरणका विरोध नहीं पड़ता; वहाँ पर ' न तु नामापि गृह्णीयात् पत्य प्रेते परस्य तु ' ( मनु. ५/१५७ ) इत्यादि स्मृतियोंका विरोध भी नहीं पड़ता; क्योंकि उक्त पद्य पूर्ण पतिके विषयमें चरितार्थ हैं, तभी मनुके वाक्यमें ' पत्यो ' आया है, ' पतौ ' वा ' अपतौ ' नहीं । यह ' अपतौ ' के छेदवाला पक्ष सुगम है T । ( ५ ) अथवा ' पतौ ' मान लेनेपर भी ' पति ' शब्दसे पूर्ण-अभीष्ट नहीं । तभी श्रीभट्टोजिदीक्षितने ' चतुर्विंशतिमतसंग्रह ' के विवाहप्रकरणमें उक्त पद्यके ' पतौ ' का ' सम्भावितोत्पत्तिकपति-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६४६ [ ६४५ पूर्वस्मिन् वरे नष्टे ' यह अर्थ किया है । तब फिर प्रश्न होता वे राजा ' है कि- इस अर्थ में समास न होनेसे घि - संज्ञा न होगी; तो ‘ पतौ ’ का अर्थ प्रयोग कैसे बनेगा? । इस पर व्याकरणके माने हुए विद्वान्, यह पूर्व तक सिद्धान्तकौमुदीकी तत्त्ववोधिनी - टीकाके रचयिता श्रीज्ञानेन्द्र-स समय सरस्वतीस्वामीने पतिशब्दपर अच्छा प्रकाश डाला है । मुख्य देखे- ' अथ कथं ' नष्टे मृते प्रब्रजिते क्लीवे च पतिते विवाह ' पाठकगण पतौ ' इति पराशरश्च । अत्राहुः - ' पतिरित्याख्यातः पतिः । ' त् यदि । करोति तदाचष्टे ' इति णिचि टिलोपे ' अच इ: ' इति औणादिके 3 ) इस ' इ ' प्रत्यये ‘ णेरनिटि ’ इति णिलोपे च निष्पन्नोऽयं पतिशब्दः पिता की ' पतिः समास एव ' इत्यत्र न गृह्यते, लाक्षणिकत्वादिति ' अर्थात् पत्नी यहाँ ' पति ' शब्द लाक्षणिक है, ' पति ' शब्दव्यपदेश्य है, । उस नामधारी ' पति ' है, वास्तविक नहीं, प्रतिपदोक्त नहीं, तब ' पतिः पतिकी समास एव ' यह सूत्र भी उस लाक्षणिक- पतिशब्दमें प्रवृत्त भी नहीं होता । तब ‘ क्लीवे च पतिते पतौ ' यहाँका ' पति ' शब्द मी में जहाँ ‘ पतिरिति आख्यातः ' इस प्रकार पति - नामधारी, किन्तु वस्तुतः यात् विरोध ' अपति ' है । जैसे कि - मनुस्मृतिके ' यस्या म्रियेत ' कन्याया रितार्थ वाचा सत्ये कृते पतिः ' ( ε | ६६ ) इस पद्य में वाग्दान - कालीन - वरका अपतौ ' नाम भी ' पति ' रखा गया है, वैसा ही पराशरके पद्यमें भी जानना चाहिये । इस ' पति ' शब्दका भी अपूर्ण पति अर्थ में पति पर्यवसान हुआ करता है । ह ' के ( ६ ) अथवा पराशरके पद्य में ' अपतौ ' न भी माना जाय, रूपति- ' पतौ ' ही माना जाय, ' पतौ ' का अर्थ ' ईषत्पति ' न करके क्लीवे च पतितेपती । ६४७ ' पूर्णपति ' ही किया जाय, तब ' पतिरन्योविधीयते ' में ' पतिरन्यो-विधीयते ' इस प्रकार ' 5 ' का छेद करना पड़ेगा, ऐसे छेदका कारण अन्य धर्मशास्त्रवचनोंका तथा स्वयं पराशरप्रोक्क इससे अग्रिम पद्योंका सामञ्जस्य है । तब प्रश्न होगा कि लोकमें सुप्का सुपके साथ समास होता है, तिङके साथ नहीं; तब नत्र - समास आपने तिङ्के साथ लोकमें कैसे कर डाला? इसपर हम कहते हैं, कि जिस प्रकार आपने पाणिनि व्याकरणानुसार ' पत्यो ' प्राप्त होनेपर मी ' श्रार्षत्वात् ' ' पतौ ' को शुद्ध मान डाला था; उसी प्रकार हम भी ' छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति ' ( महाभाष्य नदी-संज्ञासूत्रमें स्थित ) इस परिभाषा के अनुसार ' सह ' ( पा. २ ( १४ ) में ' सह ' का योगविभाग करके पर्यभूषत् आदि छान्दस प्रयोगोंकी भान्ति ' विधीयते ' इस तिङके साथ सुप् - नत्र का समास कर डालेंगे । परन्तु नहीं, यहाँ हम छान्दसताकी शरण नहीं लेना चाहते । हम यहाँ नञ - समास करते ही नहीं, हम यहाँ ' नलोपस्तिङि क्षेपे ' इस वार्तिकसे नञ्के ' न ' का लोपमात्र करते हैं, शेष ' ' बचेगा; उसका ' एङ: पदान्तादति ' से पूर्वरूप होगा । ' न ' का लोप ' क्षेप ' अर्थ में ' पचसि जाल्म ' की भांति निन्दामें होगा । अर्थात् पतिकी मृतकता आदिमें अन्य पतिका विधान कुत्सित है, धर्मविरुद्ध है; यह सूचित होगा । तव भी विधवा-विवाह अधर्म प्रतिफलित हुआ । ( ७ ) अथवा न ' अपतौ ' छेद किया जाय, न ' पतौ ' का तत्त्वबोधिनीकारके अनुसार ' अपूर्णपति ' अर्थ किया जाय, न CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat, An eGangotri Initiative
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६४८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ' अविधीयते ' छेद किया जाय, सब बातें इस विषय में प्रतिपक्षी -की ही मानी जाएँ; तब भी हमारे पक्षकी हानि नहीं । यहाँ पर ' पति ' से वाग्दानकालीन पति ही पराशरको इष्ट है । जैसे मनुस्मृतिके ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ' ( ६६६ ) इस पद्यमें वाग्दानकालीन वरको भी जो अभी पूर्ण पति नहीं हुआ का नाम भी ' पति ' रखा गया है, वैसा ही पराशरके वचनमें भी जान लेना चाहिये । उसका कारण यह है कि-प्रदानं स्वाम्यकारणम् ' ( मनु. ५११५२ ) ( ' यत् पुनः प्रथमं प्रदानं वाग्दानात्मकं तदेव भर्तुः स्वाम्यजनकम् ' ( कुल्लूक ) के अनुसार वाग्दानसे ही वरको ‘ पति ' मान लिया जाया करता है । तब उस वाग्दानकालीन पतिके पूर्णपति न होनेसे उसके मरने आदिपर आपत्तिकाल मानकर अन्य पति से विवाह करना अशास्त्रीय नहीं । इस पद्यको विद्वन्मनोहरा आदि बहुत प्राचीन टीकाकारोंने वाग्दत्तापरक लगाया है । पूर्णपति अर्थ माननेपर भी श्रीमाधवाचार्य - सायणाचार्य आदि विद्वानोंने ' कलौ पश्च न कुर्वीत ' इत्यादि - वचनोंके बलसे कलियुगमें इसे अकर्तव्य माना है । ( ८ ) अथवा कई विद्वान् पराशरस्मृतिमें- ' नष्टे मृते प्रब्रजिते ' ( ४३२ ) इस पद्यके आगे ' मृते भर्तरि या नारी ब्रह्मचर्ये व्रते स्थिता । सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः ' ( ४ । ३३ ) ' तिस्रः कोट्योर्धकोटी च यानि लोमानि मानवे । तावत् कालं बसेत् स्वर्गे भर्तारं यानुगच्छति ' ( ४ | ३४ ) व्यालमाही यथा व्यालं नष्टे मृते प्रव्रजिते [ ६४ ९ बिलादुद्धरते बलात् । एवं स्त्री पतिमुद्धृत्य तेनैव सह पड़त ( ४।३५ ) इन पद्यों में सतीका ब्रह्मचर्य, तथा मृतकपति मोदते ' ' साम के साथ चितान्वारोहण देखकर इनको द्विजोंका धर्म तथा ' नष्टे इस मृते ' ' इस पत्यन्तरविधानको शूद्रपरक मानते हैं; तब भी उसकी स्मृ । कर्तव्यता सिद्ध हो जाती है । हम वस्तुतः ' नष्टे मृते ' की शुद्रपरकता सिद्ध नहीं । शुद्रकेलिए इसे भी विधवाविवाह करना अनिवार्य नहीं । मनुजीने शूद्रकेलिए रत्न कहा है - ' न शूद्रे पातकं किञ्चिन्न च संस्कारमईति । नास्या- कोप धिकारो धर्मेस्ति न धर्मात् प्रतिषेधनम् ' ( १०११२६ ) तो जब शुद्ध आ प्रायः शास्त्रीय विधि - निषेधसे वहिर्भूत है; जब उसका समन्त्रक अथ पाणिपीडन ही नहीं होता, जिसे विवाह कहा जा सके; तब ' पत ‘ पञ्चस्वापत्सु नारीणां ' के केवल शूद्र ही कैसे लक्ष्य हो सकते हैं? अ इधर इस पद्यमें ' प्रव्रजिते ' जिसका अर्थ संन्यासी है — इस कर लिङ्गसे यह पद्य द्विजपरक है, क्योंकि - संन्यासका अधिकार जब ब्राह्मणको ही नहीं होता, तब भला शुद्रको कैसे हो सकता या है? शुद्र तो ' न शयानः पतत्यधः इस न्यायसे पतित ही नहीं; क तब ' पतिते ' इस लिङ्गसे भी द्विजपरकता ही हुई । तब यह पद्य भी द्विजपरक है, वाग्दत्ताके वाग्दत्त पतिकी मृत्यु आदिमें ही ' य यह पद्य पत्यन्तरविधान अनुशिष्ट कर रहा है, विधवाविवाह नहीं । सो इस पद्य में चाहे ' पतौ ' माना जावे; चाहे अपतौ, दोनों ही पद सङ्गत हो जाते हैं । इन दोनों पदोंका चाहे यज्ञ ' पूर्णपति ', अर्थ किया जावे; चाहे ' पूर्णपति ' कोई बाधा नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative