सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 421–430

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 421–430

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| श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ८०८ मितरूपसे ब्रह्मरन्ध्रमें ध्यान लगाया करता हूँ, पर आज ध्यान में मुझे नित्यकी भांति ज्योति नहीं दिखाई दी, और उसके स्थान एक लाल वस्त्र पहने युवति दिखाई देने लगी । मैंने उसे मानसिक-बलसे हटाने का बहुत प्रयत्न किया, परन्तु वह न हट सकी । फिर मैंने कई बार ध्यान लगाया, परन्तु वह ज्योति न दिखलाई पड़ी । महात्माजी, मैं तो लुट गया । उसके मनके अव्यवस्थित होनेके विषयमें दुस्सङ्गति आदिके प्रश्न पूछे गये । अन्तमें पूछा गया कि कल आप क्या आश्रमसे बाहर गये थे, यदि हां, तो वहां क्या किया? ' उत्तर मिला कि-मैं एक भंडारे में भोजन करने गया था । श्रीहंसराजजीने कहा कि - पता लगाओ कि भण्डारा करनेवाला कौन और कैसा था? वानप्रस्थीने पता लगाकर कहा कि एक व्यक्तिने यह भंडारा किया था । उसने अपनी एक युवति कन्याका दस हजार रुपये लेकर एक वृद्धके साथ विवाह किया । उनमें दो हज़ार रुपये से भंडारा किया । म. हंसराजजीने कहा कि वही शोचनीय लड़की आपके ध्यानमें आई । यह अन्नदोषके कारण हुआ । अब इस अन्नदोषको दूर करनेकेलिए १ । लाख गायत्रीका जप करो । वानप्रस्थीजीने ऐसा ही किया तब जाकर उस बुरे अन्नका प्रभाव । दूर हुआ; और पूर्व जैसा ध्यान लगना प्रारम्भ हुआ । हमने आनन्दस्वामीसे प्रश्न किया कि शुद्ध आहार किसे कहते हैं? उन्होंने कहा- शुद्ध आहारके दो अर्थ हैं – १ कमाई बेक हो, अर्थात् किसीका लहू चूसकर या किसीको कोई CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंकी घटनाएँ 1908 पहुँचाकर धन न कमाया गया हो । पूरी सात्त्विकतासे वृद्धि अथवा शारीरिक श्रम द्वारा धन या अन्न एकत्रित किया गया हो । २ आहारकी पवित्रताका दूसरा अर्थ यह है कि उसके बनाने में पूरी शारीरिक एवं मानसिक पवित्रताका प्रयोग हो । अन्नमें दूसरेके मनकी भावनाओंका प्रभाव मी श्रा जाता है, उस खानेवालेको भी वह प्रभावित करता है, नौकरों आदि द्वारा वा होटलोंमें बनाये गये भोजनमें वह माता, बहिन, पुत्रियोंसे बनाये गये अन्नकी भांति पवित्र भावनाएं और पवित्रता नहीं होती, अतः वह अन्न हानि पहुँचाता है, इस प्रकार नीच-जातियोंके मनुष्यके हाथका भोजन करनेसे मी मन दूषित हो जाता है, उपनिषद् के ऋषिने कहा है- ' आहार - शुद्ध सत्त्वशुद्धिः, सत्वशुद्धीघ्र वा स्मृतिः । स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ' ( छान्दो. ७।२६।२ ) आहारकी शुद्धिसे बुद्धि शुद्ध होती है, उससे स्मृति अच्छी बनती है, तब हृदयकी ग्रन्थियां टूट जाती हैं, तब साधक मोक्षका अधिकारी हो जाता है । इस प्रकार जिस किसी मी मनुष्यके हाथका बना अन्न खानेसे शारीरिक रोग भी हो जाते हैं, मन भी दूषित हो जाता है । यह हैं भोजनके सम्बन्धमें विचार एक आर्यसमाजी संन्यासीके, इससे पुराणोंके एतद्विषयक सिद्धान्तकी सत्यता सिद्ध होती है । ५ विचित्र उत्पत्तियाँ पुराणोंमें अद्भुत उत्पत्तियां सुनकर प्रतिपक्षी उनपर आक्षेप Gujarat. An eGangotri Initiative

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८१० | श्रीमनातनधर्मालोक ( ८ ) करते हैं; अब इस विषयकी प्रत्यक्ष घटनायें सुनिये-१ तीन आंखों, दो मुंह वाला बच्चा । दतिया | यहां एक काछी परिवारकी एक बकरीके ऐसा बच्चा उत्पन्न हुआ है; जिसकी तीन आंखें हैं, और दो मुख हैं । यह बच्चा २१ फरवरीको प्रातः उत्पन्न हुआ, तथा अभी तक जीवित है । उसे देखनेकेलिए सैंकड़ों व्यक्तियोंकी भीड़ पशु-चिकित्सालय में लगी रहती है । ( वीर अर्जुन २५-२-६१ ) २ गायके पेटसे राक्षस चन्देसर ( आज़मगढ़ ) । मड़मा गांवके फेरु केवटकी गायने दस मासका १ बच्चा दिया, उसकी बड़ी आंखें, तथा ऊंचा ललाट, मुखाकृति एक छोटे बालकसे मिलती - जुलती है । हाथ - पैर छोटे-छोटे उसके धड़में जुड़ेसे दिखाई देते हैं । दान्त बड़े - बड़े बाहर निकले हुए हैं । वह दो घंटे तक जीवित रहा । ( प्रभात दैनिक मेरठ २० दिसम्बर १६६० ) ३ पूंछ वाली लड़की देहरादून ( डाकसे ) । क्लीमेंट टाऊन पुलिस क्षेत्रके अन्तर्गत फाण्डवाला ग्राममें एक गोरखामहिला ने ऐसी लड़कीको जन्म दिया है, जिसकी पीठपर १ ॥ फुट लम्बी पूंछ है । सैंकड़ों लोग देखने आ रहे हैं ' ( हिन्दुस्तान १३.७.६० ) । ४ चार आंखों वाली बालिका । कैराकास १६ जनवरी । ज्ञात हुआ है कि आजसे १६ दिन पूर्व पश्चिमी वेनेजुलाके पैरा गई थोपाक्षेत्रमें चार नेत्रों वाली CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An पुराणोंकी घटनाएँ [ ८११ १२ बालिकाने जन्म लिया | इसमें और भी विशेष बातें दिखाई दी हैं । ( वीर अर्जुन २०-१-६१ ) एक दूस ५ महिलासे सांप । घटनाव बुलन्दशहर १० सितम्बर । मालूम हुआ है कि- मुहल्ला ( मारुति दालमंडीमें एक महिलाके पेटसे एक बच्चेके स्थानपर सर्प पैदा I हुआ है, जो चमड़ेकी थैलीमें बन्द बैठा हुआ था । सर्पे जिन्दा कुंडी था ' ( दैनिक हिन्द मेरठ ११.६.६० ) । उसकी ६ परलोककी बातें । जीवन कई लोग पुराणों में कही परलोककी बातोंपर विश्वास नहीं करते । अब वे निम्न घटनाएं सुनें । - मिला १ एक खटीक -स्त्रीन े परलोकमें क्या देखा? १. अभी पूरे पच्चीस वर्ष नहीं हुए, ननुहड बस्ती में एक जानुकी नामकी खटीक - महिला बीमार हुई, महीनों बीमार पड़ी रहकर रा दो हिचकियों में उसका प्राणान्त होगया । उसका पति सीताराम इ जीवित था । जब लोग अर्थी बांध रहे थे कि उधर से जानुकीकी चीखनेकी आवाज़ आई । पूछनेपर उसने बड़ी दूर ऊंचेसे पटक म देनेकी चर्चा करते हुए बताया कि यहांसे दो काले आदमी मुझे सड़कप ले गये, एक घूढ़े बाबा जो तख्तपर बैठे थे — के सामने उपस्थित बन्दरि किया । देखते हुए ही बाबाने उन लोगोंसे कहा कि — इसे क्यों तिलक लाये हो; दूसरी जमुनिया है, उसे लाओ । उन्होंने मुझे वहांसे नीचे पटक दिया ' । यह बातें सुनकर लोग अपने तर्क प्रयुक्त करने लगे कि इसे कोई सपना आया है । दो घंटे पश्चात् ही ल विषय eGangotri Initiative

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-१२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) एक दूसरी बुढिया जमुनिया नामकी लोधराजपूत मर गई | इस घटनाके दस वर्षसे भी अधिक पीछे जनुकिया जीवित रहीं ( मारुति संजीवन १० अंक अक्टू ० ५६ ) दूसरी घटना । नैनीताल ८ जनवरी । रानाघाट ( गढ़वाल ) के किडी ग्रामके निवासी हरदत्तके मृत घोषित किये जाने के बाद उसकी अन्तिम क्रियाकी तैयारी हो रही थी कि उसमें पुनः जीवनके चिह्न दीख पड़ने लगे । उसने आंखें खोलीं और कहा कि- मुझे श्रीहनुमान् जी का मन्दिर बनानेका दैवी आदेश मिला है । उसने मन्दिर बनवाना शुरू कर दिया है ( नवभारत , ॰ १. ६० ) ७ पशुपक्षियोंकी भगवद्भक्ति । रामायणमें आता है कि - काकभुशुण्डी पक्षी भगवान्‌के भक्त । इसपर लोग गप्प बताते हैं । इसपर निम्न घटनाएं सुने -१ भक्तिन बन्दरिया । मथुरा ( डाकसे ) । थाना सहपऊ ( मथुरा ) के एटा - मथुरा मढ़कपर स्थित मढाका गांवके पास बम्बेके पुलपर एक भगतिन बन्दरिया रहती है । यह प्रतिदिन बम्बेमें नहाकर मिट्टीका तिलक लगाती है । बिना नहाये कुछ नहीं खाती । बसड्राईव से खिलाने के लिए परांठे या चने लाते हैं । ( हिन्दुस्तान २.६.६१ ) २. ईश्वरभक्त बकरी । ललितपुर, २ नवम्बर । यहाँ एक बकरी लोगोंकी चर्चाका त्रिषय बनी हुई है । यह नित्य प्रातः ७ से ६ तक एक मन्दिरलेCollection, Gujarat. पुराणोंकी घटनाएँ [ ८१३ द्वारपर खड़ी हो जाती है, और तन्मय हो पूजन एवं शास्त्रप्रवचन सुननेके बाद अपने मालिकके यहाँ चली जाती है । इस दौरानमें ८ से ६ बजेके बीच उसके एक थनसे दूध मी गिरता है । लोग इसमें पूर्वजन्मका संस्कार मान रहे हैं ( वीर अर्जुन ३-११-६० ) १. रविव्रती काली कुत्तिया । फर्वरी १६६० को हमारे स्थानपर परमगोभक्त ला ० हरदेव-सहायजी तथा जीवदया - मण्डलके ज ० ना ० मानकरजी, अहिंसा पार्टीके महामन्त्री श्रीअमृतलाल जिन्दल तथा सुप्रसिद्ध आर्य-समाजी चौ ० सुखदेवसिंह जी आदि, ८०० गायें लेकर इस ओर आये हुए कसाइयों का पता लगाने आये थे । इनमें चौधरीजीने हमें निम्न घटना सुनाई कि- मैंने एक काली कुत्तियाको रविवार-के दिन व्रत - उपवास करते देखा है । मैंने पो ० भट्ट कलाँ ( हिसार ) में हिन्दी पाठशाला में पढ़ाते हुए जीराम नामके नम्बरदारके यहाँ उक्त कुत्तिया देखी थी । उस दिन वह भूलकर मी अन्न - जल ग्रहण नहीं करती थी । उसे देखकर सभी चकित होते थे । उसे व्रत रखनेका ज्ञान कैसे होगया, यह मैं नहीं जानता । २. रविवारको व्रत रखन े वाला कुत्ता । डेहरी ऑनसोन ( डाकसे ) । स्थान डा ० रामगोविन्दपथ ( ईदगाह् ) में एक कुत्ता रविवार उपवास करता है । उसके स्वामीका कहना है कि कोई स्वादिष्ट पदार्थ भी क्यों न रख दिया जाय, वह उस ओर देखता तक नहीं । अनेक लोगोंने उसकी परीक्षा की । Anmaica ( हिन्दुस्तान १६-५-६१ )

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८१४ ] श्रीसनातनघमालोक ( ८ ) १. कुत्तेकी स्वामिभक्ति । कपूरथला ( डाकसे ) | अमरगढ़ ( संगरूर ) में एक कुत्तेने मालिककी चिता में जलकर जान देदी । बताया जाता है कि-उसके मालिककी ट्रैक्टरकी पैट्रोलकी टंकीमें जलनेसे मृत्यु होगई । जब उसकी चितामें आग लगाई गई; तो कुत्तेने उसमें कूदनेकी कोशिश की, परन्तु लोग उसे बाँधकर गाँवमें ले गये । थोड़ी देर बाद कुत्ता गाँवसे भाग खड़ा हुआ; और उसने जलती चितामें कूदकर अपने प्राण दे दिये ( हिन्दुस्तान ८-२-६० ) ८. पुनर्जन्म तथा देवाराधनसे पुत्र प्राप्ति । आजकी अर्वाचीन विचारधारा वालोंको अपना सब कुछ बुरा प्रतीत होता है । विदेशोंका वे सभी अच्छा समझते हैं । वे खड़े होकर पेशाब करते हैं; साबुनसे टट्टीके हाथ धोते हैं । मुर्दोंको विजलीसे फूँक देनेकी योजना बना रहे हैं । शास्त्रानुसार दाह न करनेसे कितने दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं, आशुतोष भगवान् शंकरकी उपासनासे पुत्र - प्राप्ति और मनोवाञ्छित फल मिला करता है- इत्यादि बातों को वे नहीं मानते । हम इस सम्बन्धकी घटना ' आलोक ' पाठकोंके समक्ष रखते हैं-मार्च सन् १ ९ ६० को हमें ऋषिकेशके योगिराज स्वा ० सत्या-नन्दसरस्वतीजीके शिष्य स्वा ० मदनानन्दसरस्वतीजीके दर्शनका अवसर मिला । आपने प्रसंगवश कहा कि हमारे शास्त्र - पुराणोंकी सभी बातें अक्षर - अक्षर सत्य हैं; पर आजकलके पाश्चात्य सभ्यता-CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंकी घटनाएँ । ८१५ के रंगमें रंगे प्रतिपक्षी इन्हें माननेकेलिए तैयार नहीं, यह देशका महान् दुर्भाग्य है । पुराणोंकी सत्यताका जीता - जागता प्रत्यक्ष प्रमाण मैं आपके सामने हूँ । एकाक्षी योगिराज दाहिने लेखक मेरा जन्म १६४२ सं ० में हुआ । मेरी माताजी की ४ लड़कियाँ हुई, पर लड़का कोई नहीं हुआ, इससे वे चिन्तित रहतीं थीं; और भगवान् से प्रार्थना करतीं । किसी साधुके कहने से उन्होंने पुत्र - प्राप्तिके निमित्त शङ्कर पूजा प्रारम्भ कर दी । आशुतोषने पूजा स्वीकार की । पर एक कर्म विरुद्ध भी होगया । अकस्मात् हमारे पूज्य बाबाका ६० वर्षमें शरीर पूरा होगया । हमारे उधर सूर्यास्त के समय मुर्दा फूँकना निषिद्ध है । पर हमारे घर वालोंने उनका सूर्यास्तमें ही दाहकर्म कर डाला । उसका दुष्परिणाम उन्हीं बाबाको मुझ पोतेके रूपमें एकाक्षरूपमें भोगना पड़ रहा है । Gujarat. An eGangotri Initiative

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८१६ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) एक दिन हमारी माताजीको पूज्य बाबाने स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि तुम लोगोंने हमारा दाहकर्म सूर्यास्तके समय किया, अतः वह कर्म भ्रष्ट होगया । शंकर - पूजनसे तुम्हारे पुत्र होगा; और हम ही तुम्हारे पुत्र बनकर एकनेत्ररूपमें पैदा होंगे । स्वप्नकी भविष्यवाणीके बाद मेरी माताको गर्भ रहा, और मैं उत्पन्न हुआ । मेरा नाम मदन रखा गया । बड़ा होनेपर मैं अपने बाबा होनेका सबूत देने लगा । रिश्तेदारोंको पहचानता, अपने कपड़े लाठी आदि पहचानता । माताने इधर ध्यान न देकर उसे भूत - प्रेतका आवेश समझा, हमारा पालन - पोषण बहुत कम कर दिया । जब मैंने अपने बाबा - जन्मके गाड़े हुए रुपये बताकर सबके सामने उखाड़कर दिखाये; तब सब चकित रह गये; तब उन्हें बाबाका पोतेके रूप में अवतरणका विश्वास हुआ । इस प्रकार अन्य भी पूर्वजन्म-की बातें बताकर चमत्कार दिखाये | बादमें माताजी ने हमारे कान विंधवा दिये; जिससे हम पूर्वजन्मकी बातोंको भूल गये । फिर हम सब कुछ कुछ छोड़ - छाड़कर ऋषिकेशके योगिराज स्वा. सत्यानन्दजी की शरण आगये । उन्होंने हमारा नाम मदनानन्द सरस्वती रखा । और उन्होंने गीता - उपनिषद् आदि पढ़ाकर मुझे परमार्थपथका पथिक वना दिया मेरे जीवनकी घटनाओंसे शास्त्र - पुराणोंकी सभी बातें अक्षर अक्षर - सत्य सिद्ध होती हैं । मन्त्र शक्ति. ( १ ) एक काले नागसे डसे हुए व्यक्तिको जिसकी नाडी प्रायः CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंकी घटनाएँ । ८१७ छूट ही चुकी थी; कन्नौज के तहसीलदार श्रीरणवीरप्रसादजीने मन्त्रवल से जिला दिया । वोसियों व्यक्तियों के देखते - देखते मृत्युन्मुख रोगी स्वस्थ होगया ( हिन्दुस्तान २.१.५५ ) ( २ ) गारुड़ी मन्त्रका चमत्कार । हमारे पास प्रख्यात पुप्फभिन्न स्वा. फूलचन्द्र जी जैन मुनि पधारे थे । आपने गारुडी मन्त्रके चमत्कारकी एक घटना सुनाई -नीमका थाना ( जयपुर ) में एक परोपकारी श्रीगणेशराम छाबरा रहते थे, वे गारुड़ी - विद्याके पारगामी थे । वे चाहे जहां पर बैठे हों; और गारुड़ी मन्त्र बोल दें; तो चारों ओरसे दौड़ - दौड़कर सांप उनके पास आने लगें, और दूसरा मन्त्र बोल ; दे तो वे चले जाएं । उनके एक मित्रने भी एक बार यह चमत्कार देखा था । उस गांव में एक नीमका वृक्ष था, जिसके नीचे लोग आराम किया करते थे । उसके मालिकने रुपयोंके लोभसे उसे एक बढ़ईको छावरा जीके निषेध करनेपर भी बेच दिया | जब वह बढ़ई उस वृक्षको काटने लगा, तो छाबरा जीने गारुडी मन्त्र पढ़ दिया, जिससे वहां सांप ही सांप आगये । बढई माग गया; वृक्ष कटनेसे बच गया । जिसे सांप काट दे उसे छात्रराजी मन्त्र द्वारा अच्छा कर देते थे । मन्त्रशक्तिके चमत्कार न मानने वाले इधर ध्यान दें । परिशिष्ट समाप्त होनेसे यह अष्टम पुष्प समाप्त किया जाता है I । अब तक परमात्मा की कृपासे आठ पुष्प प्रकाशित हो चुके । Gujarat. An oapnitiative

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८१८ ] श्रीसनातनघमालोक ( ८ ) आगे भी सहायक लोग इस ' आलोक ' ग्रन्थमालाकी यथापूर्व सहायता करते चलें; तथा अन्य महोदय गत पुष्पोंके बिकवानेमें प्रयत्न करते चलें; तो अग्रिम पुष्प शीघ्र प्रकाशित होकर यह प्रन्थमाला शीघ्र पूर्ण हो जाए; आशा है सहायक एवं प्रचारक इधर ध्यान देंगे | अग्रिम पुष्पकेलिए पाठक एक वर्षके बाद ही पत्रव्यवहार शुरू करें; हां, सहायक लोग सहायता अभीसे भिजवाना प्रारम्भ कर दें; जिससे नवम पुष्पका कार्य शीघ्र प्रारम्भ किया जा सके । इति पूज्य श्री पं ० शीतललालशमं - श्रीगोरीदेवीतनुजनुषा मुलतानस्थ- स ० ध ० संस्कृतकालेज भूतपूर्वाध्यक्षेण, देहली ( दरीबा -कलस्य संस्कृतमहाविद्यालयाध्यक्षेरण ' विद्यावागीश, विद्याभूषरण-श्रीदीनानाथशर्मशास्त्रिसारस्वतविद्यानिधिना प्रणीतस्य संस्कृतमहा-ग्रन्थस्य ‘ श्रीसनातनधर्मालोक'स्य हिन्दीग्रन्थमालायाम् अष्टम - सुमनो-बिकासः सम्पूर्णः । ६ * पहलेके सात पुष्प मँगाकर उक्त ग्रन्थमालाका सेट पूरा कर लीजिये । आगेके नवम पुष्पकेलिए सहायता- द्रव्य भेजकर ग्रन्थमालाके शीघ्र पूर्ण करनेमें सहयोग दीजिये । CC - 0. Ankur Joshi Collection हैं, है यक जो 11 2ft: 11 श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाका परिचय प्रणेता पं ० दीनानाथशास्त्री सारस्वत विद्यावागीश इस ग्रंथमालाको १००० ) देने वाले इसके संरक्षक माने जाते उनका चित्र छपता है, प्रत्येक प्रकाशनमें उनका नाम छपता । ५०० ) प्रदाता इसके सम्मान्य - सहायक, २५० ) दाता मान्य - सहा-और १०० ) देने वाले साधारण सहायक माने जाते हैं । महोदय स्थायि ग्राहकता का शुल्क ५ ) पांच रुपये पूर्व जमा करायेंगे, उन्हें सब पुष्प पौने मूल्यमें दिए जाएंगे । प्रथम - द्वितीय पुष्प- ( परिवर्धित - द्वितीयावृत्ति ) आजकल ' नमस्ते शब्दके प्रचारक इसका वैदिक होनेका दावा करते हैं । हमने म प्रथम - द्वितीय पुष्पमें इस पर विस्तीर्ण विचार दिया है । ' नमस्ते ' E विषयक - ट्रैक्ट में जितने मिल सके, उन पर आलोचना भी कर दी है । साढ़े तीन सौ पृष्ठोंकी सजिल्द एवं सुन्दर इस पुस्तक १ का मूल्य चार रुपये है । ४ ) क तृतीय पुष्प - इसमें स्त्री - शूद्रोंके वेदाधिकार पर विचार करते इ हुए ' यथेमां वाचं कल्याणीं ' मन्त्रके वर्तमान- प्रचलित अर्थ की त आलोचना करके उसका वास्तविक अर्थ, हारीतकी ब्रह्मवादिनी द ' गोभिलसूत्र ' के ' यज्ञोपवीतिनीं ' पदका रहस्य, ' दुहिता मे पण्डिता वा जायेत ', ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ', ' ब्रह्मचर्येण कन्या, पंचजना त्य मम होत्रं जुषध्वम् ' आदि बहुतसे प्रमाणोंके वास्तविक अर्थ श बताकर, ऐतरेय - महिदास, कवष - ऐलूष, कक्षीवान्, सत्यकाम- व जाबाल, सूत, वाल्मीकि, शबरी आदि शूद्र थे वा शूद्र- इस पर ग विचार किया गया है । इसकी प्रथमावृत्ति समाप्तप्राय है । इसे अभी - अभी मंगा लें, द्वितीयावृत्ति छपना प्रारम्भ होने पर इसका मूल्य वढ़ जायगा । शीघ्र मिल भी नहीं सकेगी । सजिल्द मूल्य ३ || ) प्र अ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 427

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८२० | श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) चतुर्थं पुष्प — इसमें हिन्दु - शब्द की वैदिकता, वेद - विषयमें भारी भूल, महाभाष्यकार के मत में वेदका स्वरूप, वर्ण - व्यवस्था गुण - कर्म से है, वा जन्मसे, डा ० भगवानदास के मतपर विचार, पता मृतकश्राद्ध तथा पितरों का टाइमटेबल, उसमें ब्राह्मण - भोजन हैं हा- । वैदिक है या अवैदिक - मूर्तिपूजा एवं अवतारवादका रहस्य, क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं, नवग्रहों के प्रचलित मन्त्रोंका ग्रहोंसे मा सम्बन्ध कैसे है, ग्रहण और उसका सूतक - इत्यादि अनेकों विषयों पर बड़े सुन्दर विचार दिये गये हैं । पाठक इसे शीघ्र नस्ते मंगावे । ५०० पृष्ठसे अधिककी सजिल्द सुन्दर पुस्तकका मूल्य ६ ) है | स्ते 'कर पंचम - पुष्प — इसमें हिन्दुधर्मके मुख्य विषय चोटी- जनेऊ, तक १६ संस्कार, सन्ध्याके सभी अङ्गों पर विचार, मालाकी मणियों की १०८ संख्या क्यों?, यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व क्या है— करते इत्यादि अनेकों विषयों पर विचार करके प्रातः से रात्रिशयन तक के आचारोंकी वैज्ञानिकता बताई गई है । इसके बाद दिनी दीपमाला, होली आदि वर्षके प्रसिद्ध पर्वोके वैज्ञानिक - रहस्य बताकर, श्रीगणेशका वैदिक देवत्व तथा श्रीमहीधरके ' गणानां डता नना वा ' मन्त्र के भाष्य पर - जिसपर प्रतिपक्षियों की ओरसे घोर -अर्थ शोर मचाया जाता है- विचार करके, ओङ्कारका महत्त्व बताया गया है । इसमें १२५ विषयों पर सुन्दर विचार दिये राम- पर गए हैं । इस सुन्दर एवं सजिल्द साढ़े नौ सौ पृष्ठकी पुस्तकका इसे मूल्य- १० ) नका षष्ठ- पुष्प - इसमें सनातन धर्म तथा वेदका स्वरूप दिखलाते हुए ब्राह्मणभागके अवेदत्व पर किये जाने वाले तर्कों पर युक्ति- ) प्रमाण द्वारा विचार करके, वेदाधिकारिविचार, ' देव मन्दिरों में अन्त्यज- प्रवेश पर वैदिक - दृष्टि ' दिखलाकर ' ढोल गंवार शूद्र पशु CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रन्थमालाका परिचय [ ८२१ नारी ' मानस की इस प्रसिद्ध चौपाईके आलोचना की गई है । फिर ' क्या विविध श्रर्थ तथा उनकी था, इस विषय पर दिये जाते प्राचीन - भारतमें गोवध होता दोसौ पृष्ठों में विचार किया हुए वेद - पुराणोंके प्रमाणों पर पौने वेद - विरुद्ध अंश गया है । इसके बाद ' क्या पुराणोंमें है? ' इस पर विचारते हुए वृन्दाका पतिव्रतभङ्ग चन्द्रमाका गुरुपत्नीगमन, अगस्त्यका समुद्रपान, पुरुषसे स्त्री ' आदि बहुतसे विषयों, स्त्रीसे पुरुष, चाल्यचरित्र एवं राधा - कृष्ण के परस्पर पर विचार कर श्रीकृष्णके के विषय में पूर्ण - मीमांसा की गई - सम्बन्ध तथा कुब्जा आदि कथाओं है, और पुराणों की शङ्कित पर प्रत्यक्ष अखबारी सचित्र घटनाएं दी गई हैं । इसके बाद सैद्धान्तिक चर्चा में वर - व्यवस्थाकं विषयमें ब्राह्मणोऽस्य ' मुखमासीत् ' के अर्थ पर किये जाते हुए तर्कों पर विचार करते हुए ' ब्राह्मणादि क्या वर्ण नहीं हैं ' – इस पर तथा ' चातुर्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ' पर भी विचार करके पुस्तक समाप्त कर दी गई है । यह पुस्तक विद्वानों तथा जिज्ञासुओंके लिए अत्यन्त उपकारक सिद्ध होगी । सजिल्द मूल्य १० ) । सप्तम पुष्प - इसमें पौराणिकचरित्रपर्यालोचन तथा ' पुराण-परिचय ' का परिचय विस्तीरूपसे बताकर एक पूर्वपक्षीके ३१ प्रश्नोंके सर्वाङ्गीण उत्तर देकर, पुराण - सम्बन्धी अनेक आक्षेपोंके परिहार दिये गये हैं । फिर अवतार सम्बन्धी १६ कुतकको काटकर विविध २१ आक्षेपोंका प्रत्युत्तर दिया गया है । फिर ' क्या गणेश तथा रुद्र अग्नि हैं- इसपर विचार कर सत्यनारायण-व्रतकथापर किये जाते हुए आक्षेपोंपर विचार किया गया है । इसके बाद पराशर मत्स्यगन्धासमागमपर विचार करके, श्रीसीता-रामकी वैवाहिक आयु तथा ' द्रौपदीका एक पति था वा पाँच ' इत्यादि विषयमें विस्तीर्ण विचार दिये गये हैं, जिनका पाठकों Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 428

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 428 का मूल पृष्ठ
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८२२ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) पर भारी प्रभाव पड़ेगा । वेदचर्चा में वेदस्वरूपनिरूपण बताते हुए ' वेदसंज्ञाविमर्श, चुनौतीका उत्तर, नीरक्षीरविवेचन, विष्णु-पुराणकी आलोचना आदिपर लिखा गया है । इस प्रकार इस पुष्पमें २० के लगभग प्रतिपक्षियोंकी पुस्तकोंपर आलोचना दी गई है । इस एक ही पुस्तकसे आपको पुराणोंके सम्बन्धमें पचासों प्रश्नोंका समाधान प्राप्त होगा । यह अभी - अभी १००० के लगभग पृष्ठों में छपी पुस्तक सभीकेलिए संग्राह्य है । मूल्य १० ) अष्टम पुष्प – इसमें वेदस्वरूपनिरूपण, स्त्री - शूद्रोंके वेदाधि-कारपर विचार, क्या वेदमें केवल यौगिकता है? वेदार्थके साधन, क्या गीता वेदखण्डक है? वेदमन्त्रहत्याका दिग्दर्शन आदि विषयों पर विस्तीर्ण विचार रखकर, ' क्या गुणकर्मानुसार वर्णव्यवस्था चल सकती है - यह दिखलाकर. आर्यसमाजका श्राद्ध एवं यमराज, नियोग में मैथुन होता है वा नहीं? क्या सायणाचार्य विधवाविवाह मानते थे- यह स्पष्ट करके नियोग वा विधवा-विवाहपर दिये जाते हुए सभी प्रसिद्ध मन्त्रोंपर विचार, यमयमी -सूक्त, ' क्लीवे च पतितपतौ ' में ' पतौ ' है या ' अपतौ '? यह दिखलाकर तलाकपर भी विचार दिखलाया गया है । परिशिष्ट में अष्टग्रहयोग पर भी विचार किया गया है । ८०० से अधिक पृष्ठकी सजिल्द एवं सुन्दर पुस्तकका मूल्य ८ रु ० ५० पैसा है । नवम पुष्पके विषयोंकी रूपरेखा भी दी जा रही है । इसमें वेदचर्चांमें वेददोहनरहस्य, तर्क और प्रमाणमें मान्यतर कौन है? संन्यासाश्रमकी प्राचीनता, द्वैतवाद एवम् अद्वैतवादका सामञ्जस्य । सिद्धान्तचर्चा में वर्णव्यवस्था जन्मना, कर्मणा वर्ण-व्यवस्थामें हानि, श्राद्धमीमांसा, श्राद्धगतभ्रान्तिनिवारण, मूर्ति-पूजाविषयक -संवाद, कन्याविवाहवयोविमर्श, बाल्यविवाहवयो-CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रन्थमालाका परिचय [ ८२३ विमर्श, स्त्रियोंकी आवरणप्रथामें वेदादिशास्त्रोंका नारीविषयक आक्षेपपरिहार मत, भारतोय-मुक्तिमें अपुनरावृत्ति मानवीय | स्वाद के नियोगका समीक्षण, विषयकसंवाद ।, साम्यवाद (? ), साम्यवाद-पुराणचर्चामें - पर्वतों के क्या पंख रामायण और महाभारतसे अर्वाचीन है । जीवित होना, सिर कटनेपर उनका काटना वैदिक, मृत कूपमण्डूकोंके कोषमें भी जीवित रहना । असम्मवशब्द मैथुनके बिना भी । प्रकृतिके नियम सामान्यशास्त्र । स्थूल-विष्णुकर्णमलोद्भूतत्वपर सन्तान । सृष्टिकी विलक्षण उत्पत्तियाँ उत्पत्ति, नारद आदिका विचार । रक्तवीजके रक्तसे असुरोंकी । आकाशगंगाकी स्थिति आकाशमें जाना उतरना । आकाशमें का सूर्यको पकड़ना । एकसे अधिक मुखोंका सम्भव । हनुमान्-पत्थरोंका तैरना । क्या हनुमानादि मनुष्य थे? समुद्रपर । क्या कुम्भकर्णकी निद्रा असम्भव जवानी देना, मरे हुएका संजीवन, है? बूढ़ेको जीवनकी उपपत्ति । अन्तर्धानकी पुरुषोंका दीर्घाकार । दीर्घ-ढक देना और अका सिद्धि में प्रमाणोपपत्ति, सूर्यका आदिका वृत्तज्ञान वापिस आना । बिना देखे भी युद्ध आग्नेय, वायव्य, सम्मोहन । भविष्यत्का ज्ञान । शिवडमरू से १४ सूत्र । पर विचार आदि अस्त्र । गोवर्धन पर्वतके उठाने-तथा दूसरोंके | समुद्रमन्थन सम्भव । देवताओं आदिकी बहुशरीर सम्भव शरीर बना लेनेमें शक्ति, प्रह्लाद आदिका चरित्र अमीसे आदि विषय हैं । इस पुष्पकेलिए अपनी भेजना प्रारम्भ कर दें । सहायता ' परिचय ' एवं ' प्रेरणा ' विद्यावागीश श्रीदीनानाथशास्त्री सारस्वतमहोदय ' श्रीसनातनधर्मांलोक ' महाग्रन्थ द्वारा प्रणीत लिखित है | यह सनातनहिन्दुधर्मके संस्कृतमें १० हज़ार पृष्ठोंमें ujarat. An eGangotri Initiative प्राचीन अर्वाचीन साहित्या-

पृष्ठ 429

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ८२४ | [ ८२३ र्णयको मथकर लिखा गया है; अतः यह सनातन हिन्दुधर्मका ‘ विश्वकोष ' एवं ' महाभारत ' सिद्ध हो सकता है । इसे १००० ) भारतीय- देकर इसके संरक्षक बनें । आपका चित्र छपेगा, और आपका मीक्षण, ना प्रत्येक प्रकाशनमें छपेगा । अथवा ५०० ) देकर इसके म्यवाद- सहायक बर्ने । आपका इसमें चित्र छपेगा । Eat है? सम्मान्य- २५० ) देकर इसके मान्य - सहायक बनिये | अथवा न्यूनसे न्यून मृतकका १०० ) देकर इसके साधारण सहायक बनिये । इस प्रकार वशब्द आपके सहयोग से ' आलोक ' ग्रन्थमाला प्रकाशित होकर भ्रान्त-स्थूल- जनोंकी धार्मिक - शङ्काओं को दूर करने वाली सिद्ध हो सकेगी । त्तियाँ । अब तक इसके पुष्प तथा पाँच सहस्रके लगभग पृष्ठ छप सुरों की चुके हैं । विद्वानों एवं गुणज्ञोंने इस ग्रन्थमालासे अपना पूर्ण-काशमें • परितोष व्यक्त किया है, और इसकी समय - समय पर, संरक्षकता नुमान्- भी स्वीकृत की है । आप भी इसके कमसे कम मुद्रपर एवं सहायता बनें । इतना सम्भव न हो तो इस ग्रन्थमालाको बूढ़े को १०० ) के सहायक खरीदें; तथा दूसरोंसे खरीदवायें । इसका प्रचार दीर्घ- स्वयं मूल्य देकर मिटेंगी, धर्मसेवा भी होगी । करें । सभी शङ्काएँ प्रकाशनमें ही लगेगा । आपका रुपया केवल इस ग्रन्थमालाके हो जाएँ; तो उसमें युद्ध इसके कमसे कम १०-१२ पुष्प भी विकसित । श्रतः हुत्र । भी स ० ध ० की पर्याप्त सुगन्ध आपको मिल सकेगी । इससे काने- शीघ्रता से इसकी सहायता स्वयं करें, वा दूसरोंसे करवावें रीर हिन्दु - जातिको धार्मिक - नवजीवन प्राप्त होगा । रित्र नता T-पुस्तकों के मंगाने वा पत्रव्यवहारका पता-नारायणशर्मा ' राजीव ' सारस्वत शास्त्री, प्रभाकर ( एम ० ए ०, द्वि ० ) फर्स्ट बी ० १६ लाजपतनगर ( नई देहली- १४ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 430

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CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative