सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 411–420
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 411–420
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[ ७८७ ७८८ | श्रीसनातनधर्मालीक ( 5 ) वादनवाचक नहीं । यदि अभिवादनार्थक होते; तो प्रत्यभिवादनमें इनका प्रयोग न किया जाता । अभिवादन ( नमस्कार ) प्रत्य-लोक ' के भिवादन ( आशीर्वाद ) तो वहांपर छोटेके द्वारा बड़ेको हाथ हमने जोड़नेसे और बड़ेके द्वारा छोटेके प्रति दाहिना हाथ ऊपर ह प्रत्य- करने से हुआ करता है - यह भेद तो प्रत्यक्ष है । शेष इष्टदेवके - प्रयोग-स्मरणमें वा कुशलप्रश्नमें वा शुभाशंसामें तो छोटे - चड़ेका कोई नाम्प्रदा प्रयोग भेद नहीं हो सकता । इसीलिए अपने इष्टदेवके स्मरणार्थ ' जय-करने से श्रीकृष्ण ' आदि तथा अंग्रेजी जानने वालोंमें ' गुडमार्निंग ' आदि उभयपक्षसे कहा जाता है । परन्तु नमस्कार - आशीर्वादमें हना- वात तो उभयपक्षमें समता नहीं हो सकती । छोटा बड़ेको नमस्कार तो करता है, बड़ेको आशीर्वाद नहीं देता । बड़ा छोटेको आशीर्वाद तो देता है, पर उसे नमस्कार नहीं करता । तब इसमें I १६६२ उभयपक्षंसे भिन्न - भिन्न व्यवहारको बताने वाला भिन्न - भिन्न शब्द में कोई ही रखना पड़ेगा; इसमें एक शब्द नहीं हो सकता | ' नमस्ते'को प्रतिपक्षी भी ' अभिवादन ' - वाचक मानते हैं; पर उभयपक्षसे प्रत्युत्तर र्देश कर अभिवादन नहीं हुआ करता; एक पक्षसे अभिवादन ( नमस्कार ) परन्तु दूसरे पक्ष से प्रत्यभिवादन ( आशीर्वाद ) होता है; सो ; इसमें प्रत्यभिवादन में भिन्न शब्द ही रखना पड़ता है, यह वात अभिवादन - प्रत्यभिवादनके वाक्योंको देखनेसे भी स्फुट हो शब्दों को जाती है । इस विषय में ' आलोक ' १-२ पुष्प ( पृ. १४२-१४४, पर ऐ १४८-१५५ ) में देखना चाहिये । परन्तु परस्परं भगवान्का नाम , अमि स्मरण करना - कराना शास्त्रीय भी है, देखिये- ' परस्परानुकथनं नमस्तेपर विचार | ७८६ पावनं भगवद्यशः ' ( श्रीमद्भा. १११३ ३० ) ' स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघोघहरं हरिम् ' ( ३१ ) । यही वादिप्रतिवादिमान्य गीता मी सूचित किया है- ' सततं कीर्तयन्तो भगवद्-माम ' ( ६।१४ ) यह बात वेदानुकूल भी है । इस विषय में ' आलोक ' १-२ पुष्प प्र. १४२-१४४, पृ. १४८–१५५ में देखना चाहिये । " इन सब बुराइयोंको देखकर ऋषि दयानन्दने एकमात्र ' नमस्ते ' वैदिक शब्दके व्यवहारका आदेश दिया है " । यह प्रतिपक्षकी वात तव ठीक होती; जबकि यह एक पद होता, और यह वेदमें आदेश दिया जाता कि - ' सम्मेलन - समये उमयपक्षतः परस्परं ' नमस्ते ' इति वाच्यम् ' । पर वेदादि - शास्त्रोंमें ' नमस्ते ' यह कहीं भी एक शब्द नहीं कहा गया, और न वेदमें ' नमस्ते ' ही करनेका आदेश है; तब प्रतिपक्षका पक्ष सिद्ध, सिद्ध न हुआ । क्या प्रतिपक्ष आदरार्थक बहुवचनमें, अथवा बहुत लोगोंकेलिए दिये गये बहुवचनमें ' नमस्ते ' कहीं दिखला सकता है? यदि नहीं; तब ' नमस्ते ' यह एक वैदिक शब्द कहां हुआ? किसी वैदिक पदानुक्रमणिका वा पदसूचीमें, किसी भी पदपाठ वा घनपाठ आदिमें ' नमस्ते ' शब्द ही नहीं मिलता; तब ' नमस्ते'को प्रतिपक्षका वैदिक-शब्द कहना निर्मूल पक्ष है, " ऋषि दयानन्द द्वारा पुनः प्रवर्तित ' नमस्ते ' इस वैदिक शब्दका " इन प्रतिपक्षके शब्दोंसे यह ' नमस्ते ' शब्द दयानन्द वा उनकी समाजेसे प्रवर्तित सिद्ध हुआ । इसमें ' पुमः ' शब्द प्रयुक्त है । पहले इसका कहीं नियमित प्रयोग नहीं रहा । क्या प्रतिपक्ष ' नमस्ते ' का एक शब्द रूपमें तथा अभिवादन-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७६० ] श्रीमनातनधर्मालोक ( ८ ) यभिवादनमें इसका सर्वत्र प्रयोग कभी दिखला सकता है? इस विषय में १-२ पुष्पका १११ पृष्ठ देखना चाहिये! तब ' नमस्ते ' का विरोध " साधारण जनोंको बहकानेलिए " नहीं है, और न इसके विरोधी “ केवल ऊटपटांग अभिप्राय " व्यक्त करते हैं, जैसेकि प्रतिपक्षीने लिखा है, किन्तु वस्तुस्थितिके प्रदर्शनार्थ है । मालूम होता है कि- विद्वान् होते हुए भी प्रतिपक्षने यह लेख केवल कट्टर आर्यसमाजियोंको प्रसन्न कर देनेके लिए लिख दिया है । अपने अनुयायियोंसे वेदके - महान् विद्वान् माने जाते हुए स्वा. द. जी भी तो ' नमस्ते ' का सर्वत्र प्रयोग नहीं करते थे 1 ( ख ) प्रतिपक्षीने ' नमस्ते ' शब्दका अर्थ ' अशी ' भी लिखा है, पर इसमें मूल - प्रमाण न देनेसे उक्त कथन निर्मूल सिद्ध हुआ । २ जोकि प्रतिपक्षीने लिखा है कि- " जब संस्कृत भाषा व्यवहारकी भाषा थी; तव युष्मत् शब्दका प्रयोग बड़ोंक लिए भी व्यवहृत होता था । पञ्चावी भाषा में आज भी बड़ोंके लिए ' वाडे, वाडा ' शब्दों का प्रयोग होता है, परन्तु कोई भी इसे बुरा नहीं मानता । यही स्थिति पुराकालमें युष्मत् शब्दके प्रयोग-की भी थी " इसपर वक्तव्य यह है कि - युष्मद्शब्दका बहुवचन यदि बड़ेकेलिए किया गया हो; वहाँ तो आदर अर्थ होनेसे कोई उद्बोज -नीय बात नहीं । तब पंजाबी भाषाका ' त्वाडा, तुसाडा ' यह उदाहरण ' विषम है, क्योंकि - ' त्वाडा, त्वाडे ' यह बहुवचनमें है । एकवचनमें ' तेड़ा ' होता है, वह बड़ेको नहीं कहा जाता । इसी प्रकार CC - 0. Ankur Joshi Collection नमस्तेपर विचार [ ७११ यू ० पी ० की हिन्दीमें बड़ेको ' तुम, तुम्हारा ' तो कहा जाता है, तू, तेरा यह एकवचन बड़ेकेलिए प्रयुक्त नहीं किया जाता । प्राचीनकाल में बड़ेके लिए युष्मद्का एकवचन इतिहास में भले ही प्रयुक्त हो, परन्तु धर्मशास्त्रानुशिष्ट नहीं । धर्मशास्त्रमें तो ' त्वंकारं च गरीयसः ' ( मनु. ११/२०३ ) इस प्रकार बड़ेको ' स्वं, तव, ते ' आदि प्रयुक्त करना ठीक नहीं माना जाता । इस विषय में ' आलोक ' का १-२ पुष्प पू. १३४-१३७, १८७ - १८८, १८६, २३०-२३४ देखना चाहिये । ३ गीतामें जो अर्जुन द्वारा श्रीकृष्णको ' ते ' आदि शब्दसे कहा जाता है, वहाँ श्रीकृष्णका परमात्मा होनेके कारण है । परमात्माको अब भी ' जिधर देखता हूँ, उधर तू ही तू है ' इसमें हिन्दी ' में भी ' तू ' कहा जाता है, अंग्रेजीमें भी उसे Thou, Thy आदि कहा जाता है । या फिर ' स्तुतौ कवीनां त्वंकारयुक्ता हि गिरः प्रशस्ता: ' इस प्रकार कवितामें, या पुरानी अंग्रेज़ी आदि में व्यवहृत होता था । अव वह अव्यवहार्य है, इसी प्रकार कहीं प्राचीन संस्कृतमें होता हुआ भी युष्मद्का एकवचन व्यवहारमें अब प्रयुक्त नहीं । प्रतिपक्षी क्या अपने गुरु आदि वा माननीयको संस्कृत या हिन्दी में ' तू तूने, त्वया, तुभ्यं ( ते ) तव ( ते ) ' आदि तथा अंग्रेजीमें Thou, Thy आदि कभी लिखता - चोलता है? यदि नहीं; तब आदरणीय व्यक्तिकेलिए प भी ' नमस्ते ' ठीक न हुआ । ४ रुद्राध्यायमें ' नमस्ते ' की भरमार तो नहीं, जैसाकि प्रति-Gujarat. An eGangotri Initiative
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७६२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) [ ७११ पक्षीने लिखा है । इससे प्रतीत होता है कि- प्रतिपक्षीने ता है, ' बात ' नमस्ते ' के ट्रैक्टों से ली है, स्वयं रुद्राध्याय यह जाता । देखनेका ( यजुः १६ अ ० ) में भले कष्ट नहीं किया । हाँ, उसमें ' नमः ' की भरमार तो है नमें तो ही, ' नमो वः ' भी उसमें है, तो प्रतिपक्ष भी ' नमस्ते ' में आग्रह छोड़कर ' त्वं, ‘ आलोक विषय में क्योंकि • २३०- सर्वनाम भी देना शब्दसे देखा जा है । ' नमः ' का प्रचार करे, वह भी बड़ेकेलिए, इसपर ' ( १-२ ) पृ. १६१ देखिये । ' ते ' ( तुभ्यं ) का मोह छोड़े; वह अनिवार्य नहीं । भिन्न - भिन्न स्थलमें भिन्न - भिन्न जोड़ने पड़ते हैं । आदरणीयको आदरार्थ बहुवचन पड़ता है, इसपर ' आलोक ' ( १-२ ) का पृ. ६६-१०२ में सकता है । बड़ेकेलिए श्रीमत् भवत् शब्द आदिका इसमें प्रयोग भी किया जाता है । युष्मदुके एकवचनका ' नमस्ते ' के , Thy अतिरिक्त प्रतिपक्षी तथा उसके सम्प्रदायके व्यक्ति कहीं भी, रयुक्ता कभी भी, किसी भी भाषामें प्रयोग नहीं करते, तब केवल अंग्रेजी ' नमस्ते ' केलिए ही बल देना - यह साम्प्रदायिक आग्रह है । प्रकार ' स्तेनानां पतये नमः ' में भी प्रतिपक्षी ' नमः ' को अभिवादनार्थक कवचन नहीं मानते । इसके विषय में ' आलोक ' ( १-२ पुष्प ) पृ. २१७-२२३ आदि में देखना चाहिये । नं ( ते ) ' नमः परर्णाय ' में यदि प्रतिपक्षी पत्तेकेलिए नमस्कार मानता कभी है; तो वेद में मूर्तिपूजा आजाने से प्रतिपक्षको उसे वैदिक मानना के लिए पड़ेगा । यदि यहाँ ' नमः ' का अर्थ प्रतिपक्ष कुछ अन्य मानता है; तब उसके अनुसार ' नमः ' शब्द अभिवादनार्थक सिद्ध न प्रति- हुआ; तब वह ' नमस्ते ' का प्रयोग अभिवादनार्थक कैसे मानता CC - 0. Ankur Joshi Collection नमस्तेपर विचार [ GET है? तब मूर्तियों को भी ' श्रार्यसमाजी ' हाथ जोड़कर ' नमस्ते ' कहा करें, भले ही उसका अर्थ वह ' नमः पर्णाय ' की मान्ति कुल अन्य करदें । हाथ जोड़कर नमस्कार करना स्वामी वेदानन्दजी भी मानते थे; और इसमें वेदका प्रमाण भी देते थे, इसके लिए ' आलोक ' का १-२ पुष्प १५७ पृष्ठ देखना चाहिये । ५ " अथर्व में ' नमस्ते यातुधानेभ्यः ' ( ६२।१३ ) में पीड़ा पहुँचाने वालोंकेलिए भी ' नमस्ते ' का प्रयोग है " यह प्रतिपक्षकी बात साम्प्रदायिक दृष्टिसे हैं, वैदिक दृष्टिसे नहीं । यहाँ ' यातु-धानों ' को ' नमस्ते ' का प्रयोग नहीं है, उनके बहुवचन होनेके कारण एकवचन वाला ' नमस्ते ' वहां कभी प्रयुक्त हो ही नहीं सकता । नहीं तो ' नमो वः पितरः, पितरो नमो वः ' ( यजुः २ ( ३२ ) में भी ‘ नमस्ते पितरः ' यह वेदमें होना चाहिये था, पर नहीं है । तब उक्त मन्त्रमें ' ते ' से इष्ट एकवचनान्त मृत्यु है कि हे मृत्युः तेरे यातुधानोंको नमः नमस्कार हो ' यहाँ उन्हें नमस्कार की गई है, ' नमस्ते ' नहीं । यहांके ' नमस्ते ' में ' ते ' का अर्थ ' तव ' है, वह ' नमः ' से सम्बद्ध नहीं; क्योंकि- ' नमः ' के योगमें चतुर्थी होती है; परन्तु यहाँ सम्बन्धमें षष्ठी है- ' हे मृत्यो! तव यातुधानेभ्यो नमः ' । देखिये - उक्त पूरा मन्त्र । इस विषय में ' आलोक ' ( १-२ पुष्प पृ. ४४-४६ ) में देखिये । अब यहाँ बहुवचनमें ' नमस्ते ' कहाँ रहा, जो कि प्रतिपक्षने लिखा है कि - ' यहाँ पीड़ा पहुँचाने वालों ( बहुवचनमें ) केलिए ' नमस्ते ' का प्रयोग है ' । ' हाँ, ' नमः ' वेदमें बहुत आया है, वह भी माननीयोंके लिए, इसपर ' आलोक ' १-२ Gujarat. An eGangotri Initiative
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७ ९ ४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 4 ) पुष्प पृष्ठ १६१ देखिये । सो ' नमः ' का अर्थ है ' नमस्कार ' । इसमें ' उच्चैस्तरां वा वषट्कारः ' ( पा. १२/३५ ) इस ज्ञापकसे समुदायको भी निर्देश अर्थ में ' कार ' प्रत्यय है । तब ' सम्पूर्ण आर्ष वाङ्मयमें ' नमस्कार ' पदका प्रयोग अत्यल्प है ' ऐसा पृ ० ४१ में प्रतिपक्षका कथन ठीक सिद्ध न हुआ । ६ गार्गी - द्वारा याज्ञवल्क्यको ' नमस्ते ' कहनेके विषयमें ' आलोक ' ( १-२ पुष्प ) पृ ० १६२-१६३ में देखिये । अभिवादन-प्रत्यभिवादन दोनोंमें यदि ' नमस्ते ' वैदिक है, तो याज्ञवल्क्यने गार्गीको ' नमस्ते ' क्यों नहीं कहा? इससे स्पष्ट है कि- ' नमः ' का प्रयोग आशीर्वादमें नहीं होता । और न ' नमस्ते ' का परस्पर दोनों पक्षों की ओरसे प्रयोग होता था । ( ख ) कठोपनिषद् में यम - द्वारा नचिकेताको नमस्कार करनेका कारण ' आलोक ' ( १-२ ) पृ ० १२१-१२५, १६४-१६६ में देखिये । इसमें अतिथि होनेके कारण ' नमः ' का प्रयोग है, और आयु एवं अनुभवमें छोटे होनेके कारण ' ते ' का प्रयोग है । ७ तै ० ना ० में यदि नचिकेताने ' नमस्तेस्तु भगवः ' ( ३।११।८ ) कहा; तो ' नमः ' का तो गुरुको कहनेमें हमारा कोई विवाद नहीं; शेष है ' ते ' । तो यह ऐतिहासिक होता हुआ भी धर्म शास्त्रीय नहीं । फिर प्रतिपक्षीको चाहिये था कि उसी तै. ब्रा. से ही गुरुका भी नचिकेताको ' नमस्ते ' का प्रयोग दिखलाता । इसी प्रकार अन्य भी प्रमाणोंमें प्रतिपक्षीको ' नमस्ते ' का उभयतः प्रयोग दिखलाना चाहिये । जब तक वह दोनों श्रोरसे ‘ नमस्ते ’ का CC - 0. Ankur Joshi Collection नमस्ते पर विचार | II % प्रयोग अपने दिये उदाहरणों में न दिखला सके; तब तक उसका पक्ष असिद्ध ही रहेगा । इससे स्पष्ट है कि दोनों ओरसे ' नमस्तेवाद ' यह साम्प्रदायिक है, शास्त्रीय नहीं, न ही ऐतिहासिक है । ८ महाभारतसे जो कि ब्राह्मणों द्वारा धृतराष्ट्र ( क्षत्रिय ) केलिए ' नमस्ते ' का प्रयोग प्रतिपक्षने दिखलाया है, इसका प्रत्युत्तर ' आलोक ' १-२ पुष्प पृ. ११२-११३, १६७-२०१ में देखना चाहिये । यह एक ब्राह्मणने कहा, बहुत ब्राह्मणोंने नहीं । वह भी अपनी ओरसे नहीं, किन्तु क्षत्रिय प्रजाका वचन ही अनूदित किया है । प्रजा राजाको बड़े होनेसे ' नमः ' कहती है । समष्टिकी दृष्टिसे उसके छोटे होनेसे उसे ' ते ' भी कह सकती है । तथापि ऐतिहासिक आचरण है । कई आर्यसमाजी ऐतिहासिक आचरण पुराणादिसे दिखला रहे होते हैं, जो शास्त्रविरुद्ध होते हैं; वे आचरणीय वा विधिरूप नहीं हो जाते; वैसे यहाँपर भी समझ लें । ६ आगे रामायण आदि से प्रतिपक्षने जो ' नमस्ते ' के उद्धरण दिये हैं; उन्हें दोनों ओरसे दिखलाना चाहिये था । जैसे यदि विश्वामित्रने वसिष्ठसे कहा कि- ' नमस्तेस्तु गमिष्यामि ' तब वसिष्ठजीको भी उसे ' नमस्ते ' कहना चाहिये था । जब नहीं कहा तो स्पष्ट है कि यह प्रतिपक्षका पक्ष अत्यन्त दुर्बल है । ' नमस्ते ' परस्परके व्यवहारार्थ नहीं है । १० जो कि कहा जाता है कि- ' पौराणिकोंकी मान्य पुस्तकों में भी ' नमस्ते ' भरा पड़ा है । ' यह भी ठीक नहीं; क्योंकि उनमें Gujarat. An eGangotri Initiative
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७६५ ७ ९ ६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) का पक्ष छोटे - बड़े उभयपक्षसे ‘ नमस्ते ' कहीं नहीं आया; और उभयपक्षमें यह व्यवहारसाम्य भी कभी नहीं आया । श्रीमद्भागवतमें यह पद्य आये हैं — ‘ भगवाँस्तत्र बन्धूनां पौराणामनुवर्तिनाम् । यथाविध्युप-क्षत्रिय ) संगम्य सर्वेषां मानमादघे । प्रह्वाऽभिवादनाऽऽश्लेषकर स्पर्श-इसका स्मितेक्षणैः । आश्वस्य चाऽऽश्वपाकेभ्यो वरैश्चाभिमतैर्विभुः । देखना स्वयं च गुरुभिर्विप्रैः सदारैः स्थविरैरपि । आशीर्भिर्युज्यमानो वह भी ऽन्यैर्बन्दिभिञ्चाविशत् पुरम् ' ( १।११।२१-२२-२३ ) यहाँ पर या है । श्रीकृष्णका बड़ोंके आगे झुकना ( प्रह्न ) और नमस्कार करना, हम जोलियोंसे आलिङ्गन वा हाथ मिलाना, साधारणोंको मुस-पे यह कानके साथ देखना, और गुरुओं से आशीर्वादप्राप्ति - यह भिन्न-चरण भिन्न व्यवहार आया है, सबसे नमस्ते कहना वा कहा जाना हैं; वे कहीं नहीं आया इस प्रकार महाभारतादिमें भी छोटे चड़ोंका भी भिन्न - भिन्न व्यवहार आया है, एतदर्थ ' आलोक ' ( १-२ ) पृ. ११५-११६ देखना चाहिये । उद्धरण ११ सीताने जो राक्षसको ' नमस्ते ' कहा है, सो राक्षसयोनि -यदि देवयोनिके अन्तर्गत होनेसे मनुष्यसे उन्नत है, तब उसे नमस्कार-तव हीं कहा नमस्ते ' इतकों में - उनमें में कोई दोष नहीं । और डरके मारे भी हो सकता है । शेष रहा ' ते ' सो परमात्मा, नदी, वृक्षादि को युष्मद् - शब्दका एकवचन क्योंकि वे मानुषी व्यवहारसे दूर होते हैं । १२ पद्मपुराण ( सृष्टिखण्ड १७/१५० ) से महादेवद्वारा पार्वतीको ' न ' चापराधं भूयोऽहं वैसा कहना सम्भव देवता, दैत्य, राक्षस, दिया ही जाता है । प्रतिपक्षकी ओर करिष्ये तव सुव्रत! CC - 0. Ankur Joshi Collection नमस्तेपर विचार [ ७२७ पादयोः पतितस्तेऽहं क्षम देवि! नमोस्तुते ' यह नमस्ते दिखलाया गया है, पर यहाँ ' नमस्ते ' है कहाँ? यहाँ तो ' नमोस्तु ते ' है, यहाँ ' अस्तु ' का व्यवधान है, प्रतिपक्षी लोग तो ' नमस्ते ' के हामी हैं; उसमें थोड़ा भी व्यवधान सहन नहीं करते । तब इससे प्रतिपक्ष-का पक्ष सिद्ध न हुआ । यदि वे ' नमः -ते ' में व्यवधान सहन करते हैं, तब यह ' नमस्ते ' प्रतिपक्षके अनुसार ' वैदिक - शब्द ' न रहा; परिवर्तनीय होगया । तव भी प्रतिपक्षका पक्ष छिन्न होगया । इस विषय में पूरा उत्तर आलोक ( १-२ ) पृ. १२८-१३३, १७५-१७६ में देखें । यहाँ महादेव - पार्वतीका वर्णन नहीं है । स्पष्ट है कि यह प्रमाण नमस्तेके ट्रैक्टोंसे विना मूलपुस्तक देखे दे डाले गये हैं केवल कुछ रूठे आर्यसमाजियोंको प्रसन्न करने-केलिए । १३ अग्निदेवको यदि ' नमस्ते ' कहा गया है, उसमें कोई विवाद नहीं । मानुषी व्यवहारमें विवाद है । देवता, ऋषि, मुनि, दैत्य, राक्षस, वृक्ष आदि अमानुष योनियोंको तो मानुषी व्यवहारसे दूर होनेसे युष्मद्का एकवचन दिया ही जाता है । इस प्रकार मन्दालसाका कृष्णके प्रति, वृक्षके प्रति, बराहका विष्णुके प्रति, देवीके प्रति अष्टावक्र ऋषिके प्रति भी समझ लें, फिर उन लोगोंने मन्दालसा आदिको ' नमस्ते ' नहीं कहा । अतः प्रतिपक्षका पक्ष प्रसिद्ध ही रहा । ' वृक्षको नमस्ते ' ऐसा शीर्षक रखना भी अयुक्त है, क्योंकि- ' नमस्ते ' एक पद नहीं । ' वृक्षको नमः ' यह लिखना चाहिये । वृक्षको नमस्कार मानकर मूर्तिपूजा Gujarat. An eGangotri Initiative
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७६८ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) नमस्तेपर विचार L VEE भी अपना लेनी चाहिये । १४ इसी प्रकार ' कुत्ते आदि प्राणियोंके लिए ' नमस्ते ' पदका ' प्रयोग ' यह वाक्य भी गलत है, क्योंकि- ' नमस्ते ' यह एक पद नहीं । प्रतिपक्षके अनुसार वेदमें चोरोंकेलिए, हिंसकोंके लिए ' नमस्ते ' का उपयोग क्या अभिवादनकेलिए है? यदि नहीं; तब ' नमस्ते ' प्रतिपक्षके अनुसार अभिवादनवाचक न रहा । तब ' नमस्ते ' को अभिवादन - प्रत्यभिवादनार्थक सिद्ध करते हुए यह अप्रसक्त - कथन कैसे? १५ जो कि प्रतिपक्ष लिखता है - ' जब बड़े छोटोंको ' नमस्ते ' कहेंगे; तब ' नमः ' का अर्थ होगा- आशीर्वाद ' इसमें प्रतिपक्षने कोई मूल प्रमाण नहीं दिया, जिससे ' नमस्ते ' का अर्थ आशीर्वाद भी सिद्ध होता हो । प्रतिपक्षके अनुसार पद्मपुराण सृष्टिखण्ड ( १७११५० ) में महादेवजी जो कि पार्वतीकेलिए कहते हैं-' पादयोः पतितस्तेऽहं क्षम देवि! नमोस्तु ते ' तब क्या इसका प्रतिपक्षके मतमें यह अर्थ है कि हे देवि! मैं तेरे पाँवोंमें पड़ता हूँ, तुम्हें आशीर्वाद हो; मुझे क्षमा करो ' । यह असम्बद्ध बात है, क्या आशीर्वाद देनेवाला आशीर्वाद लेनेवाले छोटेके पाँव मी पड़ता है, और उससे क्षमा भी माँगता है? | यदि नहीं; तब वहाँ प्रतिपक्षके अनुसार यह अर्थ कैसा हुआ? । वस्तुतः यहाँ अन्य रहस्य है, यहाँ ' नमः ' शब्द अभिवादन- प्रत्यभिवादन-वाचक नहीं । एतदर्थ ' आलोक ' ( १-२ पुष्प ) पृ. १२८-१३३ में देखना चाहिये । CC - 0. Ankur Joshi Collection तस्करोंके लिए ' नमस्ते ' का प्रयोग प्रतिपक्षने वज्र - वाचक माना है, तो क्या वे चोरोंको भी घरमें आनेपर उन्हें ‘ नमस्ते ’ कहते हैं? यदि उन्हें इसका अर्थ पता लग जावे कि - यह ‘ नमस्ते ’ कहकर हमारा वज्रसे दण्ड चाहते हैं; तब क्या वे डण्डा मारकर पहलेसे ही प्रतिपक्षके सिरका कचूमर न निकाल देंगे? । वस्तुतः ' नमः ' के वज्र आदि वैदिक - कोषके अर्थ लोकमें कभी नहीं किये जा सकते? नहीं तो ' जलं पिब ' के स्थानपर प्रतिपक्षी ' पुरीषं पिब ' भी कहा करें, जिसका वैदिक कोषमें ' जल ' अर्थ है । कुत्तोंको ' नमः ' का अर्थ यदि अन्न किया जाता है; तो क्या आर्यसमाजी व्यक्ति कुत्तोंको भी ' नमस्ते ' कहा करते हैं? यदि वे चोरों वा कुत्तोंको ' नमस्ते ' नहीं कहते; तो स्पष्ट है कि ऐसा कहना वैदिक - विधान नहीं । केवल उन्हें दण्ड वा अन्न दे दिया जाता है । उन्हें ' नमस्ते ' शब्द कहनेका कहीं भी आदेश नहीं । वृक्षों को भी क्या आर्यसमाजी ' नमस्ते ' कहते हैं? यदि हाँ, तो यह मूर्तिपूजा होगई? यदि उन्हें यह ' नमस्ते ' मूर्तिपूजा नहीं मालूम होती; तो वे मन्दिरकी मूर्ति के आगे भी ' नमस्ते ' कहां करें । · १६ ' प्रतिपक्ष कहता है- ' नमस्कार ' शब्द आर्ष - वाङ्मयमें अत्यल्प मिलता है ' । पर जब वेदमें ' नमस्कार ' शब्द आता है-( अथर्व ४ | ३६१६, ७११०२ ( १०७ ) । १ ) तब अल्पताका प्रश्न ही नहीं उठता । वेद में ' गुरुकुल ' शब्द तो अत्यल्प तो कहाँ, बल्कि आता ही नहीं; तब आर्यसमाज उस अवैदिक शब्दको हटा क्यों नहीं देता? | जब वेदमें ' नमः ' की भरभार है; तब ' नमः ' Gujarat. An eGangotri Initiative
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८०० J श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) L vee शब्दको निर्देश अर्थमें ' उच्चैस्तरां वा वषट्कारः ' ( पा. १ | २ | ३५ ) न वाचक इस ज्ञापकसे बर्णसमुदायको भी ' कार ' प्रत्यय हुआ । तब यह ' नमस्ते ' अवैदिक तो सिद्ध न हुआ । ' नमस्ते ' ‘ प्रणाम ' शब्दमें ' वेदादिमें प्रसिद्ध ' नमः ' की मूल धातु मारकर ‘ णम प्रहृत्वे ' को ‘ प्र ’ उपसर्ग लगाकर घन् प्रत्ययमें प्रयोग है; वस्तुतः तब यह भी वेदविरुद्ध तो सिद्ध न हुआ । भी नहीं तिपक्षी १७ " जहाँ देखो वहीं प्राचीन साहित्यमें परस्पर अभिवादन -के लिए ' नमस्ते ' का ही प्रयोग मिलता है ' यह टङ्कारापत्रिकाके है । तो क्या ' नमस्ते ' निबन्धक लेखकका उपसंहारवाक्य है । यह ठीक नहीं । ? यदि परस्पर छोटे - बड़े दोनोंका अभिवादन नहीं हुआ करता; किन्तु - ऐस छोटेका अभिवादन और बड़ेका प्रत्यभिवादन ( आशीर्वाद ) दिया हुआ करता है । उनमें एक शब्द कभी हो भी नहीं सकता, और नहीं । हुआ भी नहीं करता । प्रतिपक्षके वाक्यमें परस्पर नमस्तेका ही प्रयोग मिलता है, इसमें ' ही ' शब्द गलत भी है । नहीं तो नहीं प्रतिपक्षने जितने ‘ नमस्ते ' के प्रयोग दिखलाये हैं, वे एकतरफा करें । हैं, दूसरे पक्ष से प्रतिपक्षने उन उनका ' नमस्ते ' का प्रयोग नहीं दिखलाया; और न ही प्रतिपक्ष दूसरे पक्ष वाले व्यक्तियों द्वारा महै- ' नमस्ते ' का प्रयोग दिखला सकता है । प्रतिपक्षने जितने १५-१६ नही एक ओरके नमस्तेके प्रयोग दिखलाये हैं; उसी उसी पुस्तकसे बल्कि १५-१६ दूसरोंकी ओरसे मी ' नमस्ते ' दिखलावे । यदि वह हटा परस्पर दोनों ओरसे सभी में ' नमस्ते ' का प्रयोग नहीं दिखला ' नमः ' सका; तब उसका पक्ष स्वयं ही वालूकी मित्ति रहेगा । ' नमस्तेही ' CC - 0. Ankur Joshi Collection नमस्तेपर विचार । ८०१ में ' ही ' शब्द इसलिए भी गलत है, वेदादिमें ' नमः, नमस्कारः, नमामि नमो वः, नमोवाकः, नम - उक्ति: ' भी आते हैं; वे भी बड़ेकेलिए | इसपर देखिये ' आलोक ' ( १-२ पुष्प ) २२४-२२६ पृष्ठ । वेदमें ' नम - उक्ति ' श्राई है ' नमस्ते - उक्ति ' नहीं आई । इस विषयमें १-२ पुष्प ८६ पृष्ठ देखें । तब ' नमस्ते ' वाद वेदविरुद्ध हुआ । अभिवादनार्थमें ' नमः ' तो प्रसिद्ध है, परन्तु ' ते ' अभि-वादनार्थक नहीं; अतः वह ' नमः ' से टूट गया; तब उसका कथन वेदानुसार अनिवार्य नहीं । नहीं तो ' नमो वः पितरो ' ( यजुः २१३२ ) में भी ' नमस्ते पितरः ' क्यों नहीं आया? अतः स्पष्ट है कि- ' नमस्ते ' कोई नियत शब्द नहीं । ' नमः पर्णाय ' ( यजुः १६४६ ) ' नमः कुल्याय ' ( ३० ) ' नमः शुष्क्याय ' ( ४६ ) ' स्तेनानां पतये नमः ' ( २० ) ' ब्राह्मणेभ्य इदं नमः ' ( अथर्व. ६२/१३ ) इत्यादि प्रतिपक्षी-से दिये हुए उक्त प्रमाणोंमें ' नमस्ते ' क्यों नहीं आया? इस ' नमः ' के प्रयोग वेदमें प्रचुरतम मात्रामें आये हैं, ' नमस्ते ' के प्रयोग तो उनके मुकाविलेमें अत्यल्प हैं । अतः ' नमः के साथ ' ते ' का प्रयोग अनिवार्य न होनेसे ' ते ' ' नमः ' से टूट गया । अतः ' नमः ' का ही प्रयोग वैदिक सिद्ध हुआ । शेष है ' ते '; सो वह कहीं - कहीं इतिहासमें होनेपर भी ऐतिहासिक - आचरण धर्मशास्त्रविरुद्धतावश एकान्त मान्य न होनेसे अनुकरणीय वा अनुसरणीय नहीं । जैसे कि ऋलृक्सूत्रके माघ्यमें आया है-' अनुकरणं हि शिष्टाऽशिष्टाप्रतिषिद्धेषु, यथा लौकिक - वै दिकेषु ' । ' ते ' ( युष्मद्द्वे एकवचन ) की धर्मशास्त्रविरुद्धता हम ' आलोक ' Gujarat. An eGalth Tinitiative
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८०२ | श्रीसनातनघमोलोक ( ८ ) ( १-२ ) पुष्पमें बता चुके हैं ( पृ. १३४-१३७ ) । ' नमः ' का प्रयोग वेदानुसार बड़ेको आता है, जैसे कि - यजाम ( पूजग्राम ) इद् नमसा ( नमः शब्देन ) वृद्धमिन्द्रम् ' ( ऋ. ३ | ३२ | ७ ); वह भी अभिवादन अर्थमें आता है. वृद्ध इन्द्रको आशीर्वाद नहीं दिया जाता । ' ज्यायांसमभिवादयन् ' ( मनु. २।१२२ ) । ' अभिवाद्य हरीन् वृद्धान् ' ( वाल्मी. किष्किं. ६७१८ ) तब ' नमस्ते ' का ही प्रयोग आर्यसमाजका ‘ नमस्ते ' को साम्प्रदायिक शब्द सिद्ध करता है । आर्यसमाजी लोग अपने सम्प्रदाय में उसका प्रयोग भले ही करें, पर इसमें वैदिकता तो सिद्ध न हुई । नहीं तो यदि वे युष्मद्की सब विभक्तियोंका एकवचन वड़ेके लिए ठीक मानते हैं; तो अपने गुरुओंको, पूज्य अन्य पुरुषोंको संस्कृत, हिन्दी, वा उर्दू - अंग्रेजी आदिमें ' त्वं, त्वां, त्वया, तुभ्यम, त्वत्, तव, त्वयि, तू तूने, Thou आदिका प्रयोग क्यों नहीं देते? उसका प्रयोग न करने-से ' ते ' की वैदिकता भी सिद्ध न हुई । हाँ, प्रतिपक्षीने केवल आर्यसमाजियों को प्रसन्न कर देनेकेलिए यह लेख लिखा हो; तो उससे हमें कोई विरोध नहीं । सब अपने - अपने विचारों में स्वतन्त्र हैं । तब ' नमस्ते ' - बाद वैदिक शिष्टाचार वा शास्त्रीय-आचार नहीं यह सिद्ध होगया । CC - 0. Ankur Joshi Collection ( ३ ) पुराणोंको सत्य सिद्ध करनेवाली घटनाएँ [ गत ७ म पुष्पमें कुछ घटनाएँ लिखी जा चुकी हैं । शेष ८० ८ म पुष्पमें दी जा रही हैं । इसके संग्रहकर्ता भक्त रामशरणदास हैं । - सम्पादक. ] दि सत्यके चमत्कारोंकी घटना अर जब प्रतिपक्षी लोग पुराणों में पढ़ते हैं कि – अमुक मुनिको सम सत्य बोलनेके कारण वा सिद्धि होगई कि जो कुछ उसने घट वह बात सत्य हो गई । किसीको पत्थर वा वृक्ष होनेको कहा कह, वि - कृप घट प स प्र Gujarat. An eGangotri जगद्गुरु Initiative क व f क जी के पास लेखक प
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एँ Ac ८०४ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) हैं । शेष शरणदास aye दिया; तो वह वैसा हो गया । पर श्राजके अविश्वासी प्रतिपदमें असत्यवक्ता होने से इन बातों पर विश्वास नहीं करते | थोड़ा समय सत्यव्रत लेने का क्या चमत्कार हुआ; इस पर पाठक निम्न क मुनिको घटना पढ़ें । सने कहा, नको हमारे स्थान पर भारतके सुप्रसिद्ध धर्माचार्य अनन्तश्री-कह विभूषित श्रीमज्जमद्गुरु- शङ्कराचार्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर श्री स्वा. - कृष्णबोधाश्रम जी महाराज पधारे । आपने इसी सम्बन्धी एक घटना सुनाई कि— एक बार हम अपने गुरुदेव श्रीपरमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीस्वामी चैतन्याश्रमजी महाराज के साथ विचरते हुए परीक्षितगढ़ में पहुँचे । वहां के प्राइमरी स्कूल के हैडमास्टर श्रीन्यादरसिंह जो साधुसेवी थे, हमारे पास आये, और अपने यहां भिक्षाकी प्रार्थना की । हमें वह घर ले गये । भिक्षाके बाद प्रार्थना की, कि- महाराज! मेरा विचार सत्य बोलनेके नियम लेने का है, सो आप करा दीजिये । यह सुनकर हमारे गुरुजी प्रसन्न हुए; परन्तु कहा कि-कलियुगमें ऐसा नियम निभाना बड़ा कठिन है । पर उन्होंने जब बहुत आग्रह किया, तो उन्हें एक वर्षकेलिए सत्य बोलनेका नियम करा दिया गया । और वे सत्यका नियम बड़ी तत्परता से करने लगे । कुछ मासके बाद सत्यने अपना चमत्कार दिखाना प्रारम्भ कर दिया; और उनमें वाकसिद्धि भी होनी शुरू होगई । एक दिन वे नित्य की भांति स्कूल पढ़ाने गये; तो उस दिन CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंकी घटनाएँ [ 50 % स्कूलका एक छात्र बड़ी उद्दण्डता कर रहा था । शिकायत होनेपर हैडमास्टर महोदयने ज्योंही उसे श्रांखे उठाकर देखा; तो मटसे वह छात्र एकदम बेहोश होगया । इससे सभी आश्चर्यचकित रह गये । जब सत्य - नियमका पालन करते हुए उन्हें वर्ष होनेको श्राया; तो उनके पास एक व्यक्ति आया और कहा कि मेरी पत्नी एक वर्ष से बुलानेपर भी नहीं था रही; आप अपनी श्रोरसे एक पत्र लिखें कि तेरा पति बहुत सख्त बीमार है । यदि तुम्हें पतिका मुख देखना हो; तो तुरन्त यहाँपर चली चाओ । हैडमास्टर ने कहा कि तुम मुझसे ऐसा न लिखवात्रो, नहीं तो तुम्हें सख्त बीमार होना पड़ जायगा । पर उस व्यक्तिने न माना; और उक्त पत्र लिखवा ही लिया और कहा कि मुझे कुछ भी नहीं होगा । पत्र लिखवाकर उस व्यक्तिने लेटरबक्समें डाला ही था कि- स्वस्थ होते हुए भी वह बीमार पड़ गया । उसकी पत्नी अपने गांवसे चलकर उसके पास बहांसे आई, तो देखा कि-पत्रकी बात ठीक है । उसके आनेपर उसके पतिकी मृत्यु हो गई, और उसे केवल उसका मुख देखनेका ही अवसर आया । स्वस्थ मनुष्य अपनी मूर्खतामूलक जिदसे अपनी मृत्यु आप बुला ली । जब थोड़ेसे सत्यका यह प्रभाव है; तो पूर्ण सत्यव्रतीका क्या प्रभाव न पड़ेगा? योगदर्शन में लिखा है- ' सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ' । यह उन्होंने अपने आचरणसे चरितार्थ कर दिया । जो जीवनभर Gujarat. An eGangotri Initiative
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८०६ | श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) सत्य बोले; तो उसके चमत्कारोंका वर्णन कैसे किया जा सकता है? २. भविष्यवाणी पुराणों में ऋषि - मुनियोंकी भविष्यवाणियोंकी बातें आती हैं; उन्हें सुनकर प्रतिपक्षी उनपर विश्वास नहीं करते । आज हम ' तेज ' ( आर्यसमाजी पत्र ) के उपसम्पादक ( बक्शसह राई ) के पुत्रकी भविष्यवाणीके सम्बन्धकी घटना रखते हैं-नई दिल्ली ३१ जनवरी । यहां एक १५ वर्षक वालकने कई दिन पहले २६ जनवरी १६६१ को अपनी मृत्युकी भविष्य वाणी करके सबको आश्चर्य में डाल दिया, जब भविष्यवाणी के अनुसार ही उस दिन उसकी मृत्यु होगई । बालकका नाम जयहिन्दकुमार था । १५ वर्ष पूर्व २६ जनवरीको ही वह पैदा हुआ था । ( हिन्दुस्तान १–२–६१ ) । जब ऐसा है तो तपस्वियोंकी भविष्यवाणीमें भला क्या सन्देह होगा? ३. दैवी चमत्कार ( रहस्यमय श्रावाज ) पटना २० मई । चित्रपुर ( जिला हज़ारीबाग ) का एक परिवार रहस्यमय आवाज से आतंकित है । अपने मकान के बन्द कमरेमें उनसे कोई भयानक आवाजसे कुछ मांगता है । गत दो वर्षोंमें ६ तोले सोना, १ सेर चांदी और ६०० रु ० इस आवाज़की भेंट किये जा चुके हैं । गत सप्ताह इस लालची आवाजने ११११ ) रु ० की मांग की । इतनी रकमका प्रबन्ध नहीं हो सका । इसके CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराणोंकी घटनाएं । ८०७ ८० बाद मकान - मालिककी ३ बर्षीय बच्चीकी मृत्यु होगई । ( आई. मि एन. ऐस. नवभारत २१-५-६१ ) मुम ४ छप्राछत वा अन्नदोष की बातें । एक हमारे शास्त्रोंमें भंगी, चमार, कंजर आदिके हाथका खाना बल निषिद्ध किया गया है । रजस्वला स्त्रीके हाथका खानेसे तथा फ़िर सुनारका अन्न खानेसे मनुष्यकी बुद्धि किस प्रकार भ्रष्ट होजाती पड़ है, अमुक साधुने सुनारका अन्न खा लिया; तो उसका मन सोनेके हारपर चलायमान होगया; यदि सैंकड़ों इस सम्बन्धकी घटनाएं प्रश् प्रसिद्ध हैं, पर जिन्हें छुवाछूतको हटाना चाहनेवाले प्रतिपक्षी बाह झूठ बताते हैं; और वे सभीका हाथका खाते हैं, और कहते हैं मैं कि- इससे हमारा कुछ नहीं बिगड़ता " । हम इसपर विख्यात कि-आर्यसमाजी - संन्यासी श्रीआनन्दस्वामी सरस्वतीकी सुनाई घटना लिखते हैं । जिन्होंने मुझे सुनाया था कि— किया एक बार महात्मा हंसराज जी ( सुप्रसिद्ध आर्यसमाजी ) लेकर मौन आश्रम श्री हरिद्वारमें ठहरे हुए थे । वहीं एक वानप्रस्थी भंडार भी कई वर्षों से रह रहे थे । प्रातः ३ बजे उठकर ध्यानका अभ्यास आप किया करते थे, और उन्हें इसमें पर्याप्त सफलता भी मिल चुकी अन्नद थी । एक दिन वे जोर - जोरसे रोते हुए महात्मा हंसराजजीके वानप्र पास जाकर कहने लगे कि महाराज! मैं आज लुट गया, मेरा दूर हु सर्वस्व चला गया । हंसराजजीने पूछा कि क्या धन चोरी होगया? पूरा कहते विवरण बताइये - वानप्रस्थीने बताया कि मैं प्रतिदिन निय-Gujarat. An eGangotri Initiative