सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 11–20

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 11–20

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( ङ ) तक्ष किया जाता है, उसे विफल किया जावे । इस प्रन्थमालाका एक t तो प्रत्यक्ष फल यह निकला कि पहले जो हमने इस महाग्रन्थ-I की स.ध, विषयक लेखमाला ' सिद्धान्त ' । ' सन्मार्ग ' आदि पत्रों में TE, निकलवाई थी, स.ध. के चोटी के नेताओंोंने अपनी पुस्तकों में हमारे उन लेखों का खूब उपयोग लिया भी सका दूसरा प्रत्यक्ष फल हमारी ग्रन्थमालांकी यह हुआ है-टोंक ( राजस्थान ) के च.ना. मन्दिर के महन्त श्रीसीतारामदास-मेरे के जीने एक कट्टर दयावन्दी जो कि छोटे - छोटे ट्रैक्ट निकाल कर बहुत ओछेरूपसे स. घ. की आलोचना करता रहता है; और दूर अपनेको दयानन्दी - समाजका ' अप्रतिभट ' मानता है, उसेको पत्र - व्यवहार द्वारा पराजित कर दिया उसकी लेखनी बन्द दिया करा दी । महन्तजीने मुख्यतया हमारी ग्रन्थमाला को उसका पज्ञ कारण बताया है । बल्कि १०० ) देकर ग्रन्थमाला की सहायता I भी की है । लिए अन्य सन्जन दक्षिणके विद्वान् श्रीपद्मनाभ्रराव हैं; वे भी है, हमारी प्रन्थमालोको चाव से पढ़ते हैं, और इसके सहायक भी भी' हैं, वे भी पत्रव्यवहारद्वारा आर्यसमाजियों का वेदविषय में सिद्धान्त काटकर उन्हें चुप करा रहे हैं । पूर्वप्रक्षियोंका मूल्य मत केवल छल और धूर्ततापर अवलम्बित होता है । यदि मर्थ पाठकगण इस ' ग्रन्थमालाका मनोयोगद्वारा अध्ययन करेंगे, तो वे भी स.ध.के विरोधियोंको चुप कराने में सक्षम हो सकेंगे ॥ इस ग्रन्थमालाचे गुणज्ञ श्री दुर्गादित्तजी त्रिपाठी महोदय का कि-आत्यन्तिक वियोग हमें बहुत दुःखी किया करता है मुण CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ( च ) सहायता के नियम इस ग्रन्थमाला के संरक्षकके लिए १००० ) रु ० नियत है । संरक्षकका चित्र एक बार छपता है, और नाम प्रत्येक प्रन्थके प्रकाशनमें छपता है । सम्मान्यसहायक के लिए ५०० ), तथा मान्य-सहायक के लिए २५० ) और साधारण सहायककेलिए १०० ) नियत हैं । पूर्व के तीनों सहायकोंके पास ग्रन्थमाला नियमसे जाती है । अर्थदान कोई जितना भी चाहे, कर सकता है । सहायता मेरे नाम विद्यालय के पते पर भेजनी चाहिये, या लाजपतनगरमें मेरी पुत्र - वधू श्रीकिरणकान्ताके नामसे । इस पुष्पमें अनेक शङ्काओं का समाधान दिया गया है । अधिकारी निष्पक्ष विद्वानोंसे प्रार्थना है कि - विचार में जहां - कहीं कुछ त्रुटि दीखें, तो उस विषय में सूचना दे दिया करें । किसी प्रश्न के उत्तरमें हमारी अपेक्षा किसी सज्जनको अच्छी सू स्फुरित हो; तो वे भी सूचित कर देनेका कष्ट करें । अन्तमें संव सहायकों को धन्यवाद देता हुआ इस ' आमुख ' को पूर्ण करता हूँ और आशीर्वाद भी मांगता हूँ कि मैं सनातनधर्मके इस प्रचारकेलिए स्वस्थ बना रहूँ । इस बार वर्षाऋतुमें ग्रन्थ तैयार होनेसे जिल्दका खराब होजानेका डर था; अतः जिल्द नहीं रखी गई है । निवेदक-श्रीव्यास - पूर्णिमा दीनानाथशास्त्री सारस्वतः [ प्रिंसिपल रामदल संस्कृत महाविद्यालय • दरीवाकलां, देहली- ६ ] An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक तथा ग्रन्थकारके विषय में विद्वानांके हार्दिक भाव । ( १ ) श्रीगुरुजीका आशीर्वाद । - - ' ' मैंने ' आलोक ' ग्रन्थमाला पू विचार और परीक्ष्य दृष्टिसे देखी है । जनतोद्बोधक इस मालामें सध पत्र वेदादिशास्त्रोंके आधारपर सिद्ध किया गया है । वादियोंके कुतकका युक्तियुक्त - तर्कों द्वारा निरसन किया गया है । यह माला आपके नामको सदा जीवित रखेगी । इसके पुष्पोंकी सुगन्ध लेनेसे घोर नास्तिक भी आस्तिक हो जाएँगे । पहलेके पं. ज्वालाप्रसाद वा भीमसेनजी आदिका कार्य इतना पर्याप्त न रहा, जितना इस ग्रन्थमालासे हो रहा है । इसमें यह विशेषता भी देखी गई है कि इसमें विपक्षियोंके श्राक्षेपों का उत्तर इस प्रकार ः युक्तियुक्त - तकों और वेदादिशास्त्रोंके प्रमाणों द्वारा दिया जाता है । क्रिप्स के पक्ष की सत्यता ठीक जान ली जा सकती है । आक्षेपोंका उत्तर वाग्मितासे दिया जाता है । सध से विमुख भी इससे स.ध. की छत्रछाया में आ सकता है । ' भूयश्च शरदः शतात् इस वेदोक्तिद्वारा स.ध.की सेवाकेलिए आपकी आयु शतवर्षसे भी अधिक हो ( श्रीजगन्नाथ-शास्त्री सारस्वत ' वेदगीता ' प्रन्थके लेखक, न्याय - विद्याभूषण ) । ( २ ) श्रीसारस्वतजी लेखबद्धशास्त्रार्थ में इस समय सर्वोत्तम शास्त्रार्थी हैं । आर्यसमाजके बड़ेसे बड़े विद्वानोंको आप अनेक CC - 0. Ankur Joshi Collection ( ज ) बार परास्त कर चुके हैं । आपका बनाया ' सनातनधर्मा लोक ' हों नामक बृहद् ग्रन्थ स.ध. का विश्वकोष कहा जा सकता है । इस ग्रन्थका प्रमाणसंग्रह अभूतपूर्व है । एक ही ग्रन्थद्वारा स.ध. के मा अनेक विषयों का परिज्ञान प्राप्त करनेकेलिए यह गुरुका काम नि देता है । भगवान आदरणीय पं. जीको चिरजीवी करे, जिससे गवे वे अपनी प्रतिभा द्वारा स.ध. के नये - नये साहित्यका प्रकाशन शा करते हुए प्रतिपक्षियोंका मुख - मुद्रण करते रहें ' ( शास्त्रार्थ- महारथी विश ( पं. माधवा. शा. ) पृ. ५५ में । देव ( ३ ) ' आलोक ' के आठों पुष्प देखकर सचमुच बड़ी ही विश्व प्रसन्नता हुई ।... ये सभी ग्रन्थ स ध के ज्ञानकोष हैं, जिनमें हिन्दुधर्मके गूढ़ सिद्धान्तों, वा उनके मुख्य विषयोंका सारगभित ७ भ निरूपण किया गया है । हिन्दी में अब तक ऐसे ग्रन्थोंका प्रभाव ही पीने था । सभी ग्रन्थ आपकी गहरी विद्वत्ता, घोर परिश्रम, चिलक्षण विश्व प्रतिभा और महती सूझ - बूझके परिचायक हैं, जिनके प्रकाशनसे महत धार्मिक वा आध्यात्मिक जगत्का बहुत उपकार हुआ है । शङ्का आपकी इस महान् सेवाकेलिए आध्यात्मिक जगत् आपका शाख सदैव ऋणी रहेगा । स.घ.के विरोधियोंके लिए यह ग्रन्थ मुंहतोड़- नवी जवाब है हीं, पर जो भौतिकवादी हमारे स.ध.को अवैज्ञानिक यह मानते हैं, उनकेलिए भी वैज्ञानिक रहस्योद्घाटन करके आपने तीर सचमुच सोनेमें सुगन्ध कर दिया है । ऐसे उच्चकोटि के ग्रन्थोके ( श्रीर प्रकाशनकेलिए मैं हार्दिक साधुवाद देता हूँ । आप दीर्घजीवी हो, इसी प्रकार अपनी चमत्कारिक लेखनीद्वारा धर्मकी सेवा में संलग्न रहकर जनता - जनार्दन के आध्यात्मिक विकासमें सहायक वाव Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 13

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( झ ) लोक हों । ( वल्लभदास विन्नानी ' व्रजेश ' कलकत्ता ) । इस ( ४ ) ( एक प्रख्यात ग्रन्थकार की सम्मति ) ' आलोक ' ग्रन्थ-च. के मालायाः सर्वेपुष्पाणि यथावत् परिशीलयतो मम अन्तरात्मा काम नितान्तं प्रमोदमावहत् । श्रीमतां तर्कपद्धतिं, पाण्डित्यजन्यां इससे गवेषणा सरणिं चावलोक्य कस्य विपश्चितः स्वान्तं न नितान्तं शव शान्तिमालभते? सनातन - धर्मस्य तत्त्वानामाविष्करणाय इमे ग्रन्था रथी विशदं समर्थाः प्रमापकाश्चेति को विद्वान् नहि मनुते ।... ( बल-देवोपाध्यायः, पुराणेतिहास - विभागाध्यक्षः, वाराणसेय संस्कृत-ही विश्वविद्यालयः, वाराणसी । जनमें ( ५ ) सभी पुष्प पढ़े, अपने - अपने स्थानपर सभी श्रेष्ठ हैं । मित म पुष्पको तो पढ़ते - पढ़ते इतना तन्मय हो जाता हूँ कि खाने-वही पीनेकी सुध भी भूल जाती है । यह ग्रन्थमाला वास्तवमें स.घ.का नक्ष विश्वकोष वा महाभारत वा कल्पवृक्ष ही है । इन पुष्पों की एक महती विशेषता है कि - एक - एक शङ्काके समाधानमें कई - कई है । शङ्काओं का समाधान हो जाता है । नृसिंहवधका तात्पर्य, तामस-पका शास्त्र, गोभक्षणका तात्पर्य, नियोग और मैथुन आदिमें नवीनसे इतोड़- नवीन रिसचं रखी गई है, ऐसी रिसर्च आजतक विद्वानोंने नहीं दी । निक यह रिसचं शास्त्रीजीकी प्रकाण्ड विद्वत्ता, विशाल अध्ययन, आपने. ती दर से तीक्ष्ण बुद्धि, बारीकसे बारीक सूझकी परिचायिका है । = थोंके ( श्री इन्दुशेखर सिंह - एक अध्यापक ) हो सेवा में ( ६ )... पुराण हिन्दुसंस्कृतिका प्रधान अङ्ग हैं । इनपर देशी वा विदेशी लोगोंने जो आक्षेप किये हैं, उनका उत्तर जिस सभ्य हायक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ( ञ ) शैली, वा महती गवेषणासे आपने दिया है, आजतक किसीने ऐसा साहस वा परिश्रम नहीं किया । ' सारस्वतकुलभूषण ' आप धन्य हैं । ( श्रीगङ्गाराम रिटायर्ड अध्यापक, कादियां ) । ( ७ ) भवतामायूंषि यशांसि च वर्धन्ताम् इत्यनवरतं कामया-महे ।... आप जैसे उत्साही, तपस्वी तथा धर्मप्रारण मानवोंपर ही आज स.ध. कृतास्पद है ।... आपकी इस प्रयत्नशीलतासे हम सन्तुष्ट हैं, परमात्मा आपको इस कार्य में सफलता दे । ( ज.गु. - श्रीरामानुजाचार्य अनन्तश्री अनिरुद्धाचार्य महाराज, डभोई । ) ( ८ ) एक आर्यसमाजीके शब्द । '... पुराणोंपर आक्षेपों का उत्तर बन नहीं सकता । केवल लीपापोती ही की जा सकती है । उसमें पं. माघ, जीकी अपेक्षा आप अधिक सफल प्रतीत होते हैं ' ( डा. श्रीराम आर्य, कासगंज ) । ( ६ ) बौद्ध अनेक होनेपर भी शङ्कराचार्य भगवान् एकाकी ही थे । आप अकेले ही सब नास्तिकोंके मुखस्तम्भनकेलिए पर्याप्त हैं । ' ( स्व. श्री दुर्गादत्तजी त्रिपाठी ' सिद्धान्त स. सम्पादक ) । ( १० ) आप जो कुछ लिखते हैं, उसका लोगोंपर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ता है । ( श्रीहनुमानप्रसाद पोद्दार ' कल्याण ' सम्पादक ) । ( ११ ) आप साक्षात् सरस्वती के अवतार हैं । इस समय सत्य ' सारस्वत ' शब्द आपमें समन्वित है । आप साक्षात् जाग्रत् विद्यामूर्ति हैं । आपकी प्रकाण्ड, पूर्ण विद्वत्तासे अतिप्रसन्नता है । हमारे आत्मामें आपकेलिए अत्यादरणीय स्थान हैं ' ( श्रीदुर्गादत्त आहिताग्नि, चतुर्वेदविद्यालय, ऋषिकेश, देहरादून ) । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 14

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[ ए ] ( पुराणेतिहास - चर्चा ) १३. पुराणोंपर आक्रमण का प्रत्युत्तर + ( ख ) कात्यायनादिके वचनका समाधान ( ग ) मुर्देसे सन्तान (? ) आदि ( घ ) यम - यमी संवाद ( शेष अंश ) ( वेद - चर्चा ) १४. वेदोंकी अक्षरसंख्या ( प्रालोचना ) १५. अवतारवादपर आलोचना १६. शिवलिङ्ग - पूजा क्यों? १७. मूर्तिपूजा - मीमांसा १८. कुतके - कर्तन ( सैद्धान्तिक चर्चा ) १६. साम्यवादविषयक - संवाद २०. पर्वतों के पंख ( परिशिष्ट ) पौराणिक घटनाएँ समाचारपत्रों में + इसमें बहुतसे प्राक्षेपों का समाधान आगया है ६३०-७५१ ७५२-७८३ ७८३-७९ ३ ७६३-८११ ८११-८३३ ८३३-८६३ ८६३-८८८ पद- ६१८ ६१८-६२५ ६२५-६६४ ६६४-६८४ ६६५-६६२ - पृ. ४६३ - २१ इसी प्रकार ' गोर्न पर्व विरदा ' ( ऋ. [ त्रुटिपूर्ति भी श्रीसायणने ' गो ' का भ्रथं ' पशु ' किया है । १।६१।११२ यहाँ ) यहाँ ' गाय ' अर्थ करेगा? । ५३८ - ९ जब वे घृताचीके देखनेसे क्या वादी, तब ऐसे वृद्ध क्लीब व्यक्ति स्त्री - संगमें भला समर्थ कैसे स्खलित होगये ६६२-१७ यदि वेदमें विमान तथा तार का वर्णन हो सकते थे? वर्णन क्यों नहीं आया, आया है, तब उसमें रेडियो - टेलिवीजन श्रादिका यह प्रश्न भी हो सकता है । ] CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 15

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' श्री सनातनधर्मा लोक'- प्रणेता-श्री दीनानाथ शर्मा शास्त्री सारस्वतः विद्यावागीश, विद्याभूषण, विद्यानिधि, प्रिंसिपल रामदल संस्कृत महाविद्यालय, दरीचा कलां, देहली -६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ह ) ' ( इतिहास - पुराण, वेद एवं सैद्धान्तिक चर्चा ) ( १ ) मङ्गलाचरणम् 1 पत्त्रो नगजातिहारी कुमारतातः शशिखण्डमौलिः । केशसम्पूजितपादपद्मः पायादनादिः परमेश्वरो नः । ११ " ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ( कृष्णयजु ० सैत्तिरीयारण्यक १०1१ ) ' शिवा नः शन्तमा भव सुमृडीका सरस्वति! ' मा ते युगोम संहसः ( प्र ० ७७६८३ ) सविता पश्चात्तात् सविता पुरस्तात्, सवितोत्तरात्तात् सविताचरात्तात् ५ ' सविता नः सुवतु सर्वताति, सविता नो रासतां दीर्घमायुः ' । ( ऋ ० १०१३६११४ ) " नः सूर्य उरुचक्षा उदेतु, शं नश्चत्तत्रः प्रदिशो भवन्तु । षां नः पर्वता नयो भवन्तु, शं नः सिन्धवः शमु सन्त्वापः । '

श्रीसनातनधर्मावि.लोकोऽयं सम्प्रकाशते ।

समांस्यनेन दूरे स्टुर्धर्ममार्गः स्फुटो भवेत् ॥१ ॥

पूर्व पञ्चाप ( मुल्तान ) वास्तव्य इदानीं देहलीं श्रितः इमं ग्रन्थं विनिमर्चति श्रीदीनानाथनामकः । २ । सारस्वतस्य तस्याऽयं प्रयत्नः शास्त्रिरणो महान् । साफल्यमेतु पूर्ति च भगवत्कृपया भृशम् 1३ । ( ऋ ० ७३५१८ ) 1 CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 16

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श्रीसनातनधर्मालांक ( ६ ) २ ] इतिहास - चर्चा-( २ ) क्या हनुमानादि वानर, नर थे? ( १ ) ' श्रीसनातनधर्मालोक ' प्रन्थमालाके आठ पुष्पोंके प्रकाशन-सुमन पाठकोंके समक्ष प्रस्तुत है । इसमें के बाद यह नवम, पुराणचर्चा, इतिहासचर्चा, कण्टक - शोधन, पुराण- इतिहासचर्चा , सैद्धान्तिकचर्चा - यह छः स्तम्भ रखे गये हैं; तदनुकूल वेदचर्चा ग्रथित किये जाएँगे । पहले - पहल इतिहासका एक निबन्ध इसमें रखा जा रहा है कि- ' क्या हनुमानादि प्रसिद्ध विषय इसमें मनोयोग देकर देखें । वानर, नर थे? ' | ' आलोक'- पाठक इसे आजकलमें उठनेवाली शङ्काओं का बहुत प्रकारसे समाधान इसमें किया जायगा | आजकल प्रच्छन्न - बौद्ध प्रतिपक्षी जव रामायणादि इतिहास-किसी विषयको अपनी संकुचित बुद्धिमें प्रविष्ट होते में वर्णित पहले तो ' गप्प ' वा ' प्रक्षिप्त ' कहकर उसे नहीं देखते; तब अपना गला बहिष्कृत करना चाहते हैं । फिर भी जब उससे नहीं देखते, तब प्रकारान्तरसे उसका समाधान करनेकी छूटता करते हैं । उस समय वे ग्रन्थकारसे विरुद्ध निर्मूल चेष्टा करनेमें भी नहीं हिचकते; आ रही हुई असङ्गतियोंका कल्पनाएँ भी वे विचार नहीं करते । प्रकारके विषयों में ' हनुमानादि वानर थे, वा नर ' ( २ ) इस वे यह कहते हैं कि-यह भी एक प्रश्न उपस्थित होता है । इसमें CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? ' हनुमानादि रामके सैनिक, मनुष्य थे । वस्तुतः बन्दर नहीं थे । होन चनमें रहनेवाले होने से उन्हें उपहाससे वानर कहा जाता था । मुनि वे पशु नहीं थे, खरे - खासे मनुष्य थे । केवल नागरिक सभ्यता गृहा न होने से वे पशु बुलाये जाते थे । वनवासी ( जंगली ) होने से ही फल-कुरूप थे | कूदने - फांदने में होशियार थे, इसीलिए रीछ - वानर वान आदि कहे जाते थे । अथवा वे वानर - नामक एक क्षत्रिय कन्द मानुषी जातिवाले थे । ' नही इस प्रकारकी कल्पनाएँ वे इसलिए करते हैं, क्योंकि और रामायणमें वर्णित वानरोंका कर्म उनकी दृष्टिमें बन्दरोंके योग्य वनव प्रतीत नहीं होता; परन्तु एकदेशी बुद्धि तथा कूपमण्डूक दृष्टि आर रखनेवाले वे लोग यह विचारनेका कष्ट नहीं उठाते कि जैसे तो प रामायणवर्णित उनका कार्य वानरगरणसाध्य नहीं; वैसे ही उनके मनुष्य वर्णित कार्य मनुष्यसाध्य भी नहीं - यह विचार करनेसे स्पष्ट हो पूर्वव जाता है । तब फिर वे ग्रन्थकारके अभिप्रायसे विरुद्ध उन्हें मनुष्य भी क्यों कहते हैं? इस छासङ्गतिको वे क्यों नहीं ' वान विचारते? । वे श्रीराम सेनाके रीछ - वन्दरोंको आजकलके वनमें रीछ - वन्दरोंकी तराजुसे तोलना चाहते हैं । रामायणके निणय- सभी को ताक पर रखकर अपना नवीन निर्णय देते हैं कि- ' वनवासी काण्ड मनुष्य होनेसे इन्हें वानर कहा जाता था ' पर उनकी यह धारणा वलीम नितान्त ही भ्रान्त है । हम रामायणको मथकर इस विषय में आये उसके दिङ्मान उद्धरण देंगे । अमर ( ३ ) उन्हें यह स्मरण रख लेना चाहिये कि यदि ' वनवासी ' ( १७५ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 17

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[ ४ ] श्रीसनातनधर्मानो ( ६ ) थे । होनेसे ही उन्हें ' वानर ' कहा जाता था; तब त्रनवासी सब ऋषि-था । मुनि तथा वानप्रस्थी लोग जो कि - ' वनसम्बन्धि फलादिकं राति-न्यता गृह्णाति ' ( हनुमान् आदि बन्दर थे या मनुष्य ' पृ ० १२७ ) वनके ही फल - अन्न आदि खाया करते थे, ग्राम्य अन्न फलादि नहीं; नरवानर क्यों नहीं कहे गये? १४ वर्ष वनमें रहते हुए और वनके त्रिय कन्दमूल फल खाते हुए भी श्रीराम - लक्ष्मणको ' वानर ' क्यों नहीं कहा गया? और वनमें रहती हुई तथा वनमें छोड़ी गई कि. और वहीं रहती हुई श्रीसीताको ' वानरी ' क्यों नहीं कहा गया? योग्य वनवासी होनेसे वन्य, वा वनी, वा वनवासी, वा वनेचर, वा आरण्यक तो कहा जाता है, परन्तु ' वानर ' नहीं । ' वानर ' यह जैसे तो पशु जातिका रूढ वा योगरूढ नाम है । इसलिए उसे अमरकोषमें उनके मनुष्यवर्ग में न कहकर सिंहादिवर्ग में रखा गया है । तव प्रतिपक्षियोंकी हो पूर्व कल्पना निर्मूल है । उन्हें ( ४ ) इसके अतिरिक्त हनुमानादिको रामायणादिमें केवल नहीं ' वानर ' शब्दसे नहीं कहा गया; जिससे उन्हें उपहाससे अथवा लके वनमें निवासवश ' वानर ' कहा गया हो; बल्कि वे वानरोंके - सभी पर्यायवाचकोंसे भी बुलाये गये हैं । अमरकोषके द्वितीय-ज्यासी काण्डमें सिंहादिवर्गके ३ रे पद्यमें - ' कपि - प्लवङ्ग - प्लवग - शाखामृग-रणा वलीमुखाः । मर्कटो वानर: कीशो वनौकाः ' यह नौ नाम बन्दरोंके य आये हैं । दसवाँ बन्दरोंका प्रसिद्ध नाम ' हरि ' भी है, जिसे अमरकोषके ३ यकाण्ड नानार्थवर्ग में ' शुकाहि कपि - भेकेषु हरिर्ना ' सी ' ( १७५ ) कहा गया है । रामायण में इन सभी नामोंसे उन्हें, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat हनुमानादि वानर नर थे? { " कचित नहीं, किन्तु सर्वत्र, किसी विशेष समय में नहीं, किन्तु सभी समयोंमें, एक बार भी नहीं, किन्तु बार - बार बुलाया गया है । हाँ, अमरकोषके अर्वाचीन होनेसे, और वाल्मीकिरामायण-के अत्यन्त प्राचीन होनेसे, उसमेंके कई नाम रामायण में प्रयुक्त न किये गये हों, या हमारी दृष्टिसे च्युत होजानेसे हमें रामायण में न मिले हों, यह अन्य वात है, पर उपहाससे वा वनवासी मनुष्य होनेसे यह नाम नहीं रखे गये, यह आगे सम्यक्तया सिद्ध किया जायगा । उपहास वार - बार नहीं होता, नहीं तो वैरस्य हो जाता है । बार - वार ' वनवासी ' कहना भी व्यर्थ वा निन्दनीय हो जाता है । पर यहाँ तो उनकी प्रशंसा ही आई है । स्वाभाविकतामें तो बार - बार वैसा कहने से भी वैरस्य नहीं होता । ( ५ ) वैसे तो हनुमान आदिके साथ उक्त नामका प्रयोग रामायण में सैंकड़ों बार मिलता है: पर हम विस्तारभयसे दो - दो वा तीन - तीन ही वचन देंगे । पाठक दिङ्मान देखें । - पहले हम आक्षेप्ताओंके आचार्य स्वा ० द ० जी के ' संस्कृतवाक्यप्रवोध ' से एक वाक्य देते हैं — ' अयं महाहनुत्वादनुमान् वर्तते ' यह वन्दर बड़ी ठोडी वाला होनेसे हनुमान् है ' ( प्राम्यपशुप्रकरण पृ ० ४४ ) यह वाक्य हनुमानको बन्दर सिद्ध कर रहा है । जैसाकि वाल्मी. ६।२८।१५ में हनुमान्का इतिहास है, इन्द्रके वज्रके लगनेसे हनु टूटकर बड़ी होजानेसे हनुमान नाम हुआ । नहीं तो स्वामीजी इसे किसी मानुषी प्रकरण में रखते, ग्राम्यपशुप्रकरण में . An eGangotri Initiative

पृष्ठ 18

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श्रीसनातनधर्मालक ( 2 ) हनुमानादि वानर नर थे? [ v नहीं । अस्तु । अब ' आलोक ' पाठकगण वाल्मीकिरामायण के प्रमाण देखें । १ कपिः- ' संगग्य कपि मुख्येन ' ( किष्किन्धा. २।१२ ) ' कपिः ---हनुमान् ' ( २/२६ ) ' कपिरूपं परित्यज्य हनूमान् मारुतात्मजः ( ३२ ) इन स्थलोंमें हनुमानकेलिए बन्दरके प्रथमपर्यायवाचक ' कप ' शब्दका प्रयोग है । २ प्लवङ्गमः -'तौ त्वया ( हनुमता ) प्राकृतेनेव गत्वा ज्ञेया प्लवङ्गम! ' ( कि. २।२४ ) हनूमन्तं प्लवङ्गमम् ' ( ३१४३ ) अहं हि मातङ्गविलासमामिना प्लवङ्गमानामृषभेण धीमता ' ( २४ | ४० ) यहाँपर हनुमान् श्रादिकेलिए ' प्लवङ्गम ' शब्द का प्रयोग है, जो बन्दरका दूसरा पर्यायवाचक है । व्याकरणानुसार विहङ्ग-विहङ्गमकी भांति प्लवङ्ग - प्लवङ्गम दोनों शब्द बनते हैं । ३ प्लवगः । — ' हनुमान् प्लवमोत्तमः ' ( कि. ४ ३ ) ' सुग्रीवः प्लवगाधिपः ' ( २।५ ) तं दृष्ट्वा प्लवगं ' ( १/८२ ) इन स्थलों में हनुमा-नादिकेलिए ' प्लवग ' शब्द आया है, जो बन्दरका ही ३ रा पर्याय-वाचक है । श्रीबाणभट्टके हर्षचरितमें सुग्रीवका नाम श्लेषालङ्कार-में ' प्रवरसेन ' आया है - प्रवे - प्लवने रसो - रागो येषां ते प्रवरसाः, प्लवङ्गा वानराः - तेषामिनः - स्वामी । सो उसे भी सुग्रीव तथा उसकी सेना बन्दर इष्ट है, तभी तो उसने ' कपिसेनेक सेतुना ' लिखा है, ' कपिं वन्दर का नाम होता है, वनवासी मनुष्यका नाम नहीं । ४ शाखामृग: । - ' अहो! शाखामृगत्वं ते व्यक्तमेव प्लवङ्गम! CC - 0. Ankur Joshi Collection ( कि. २।१७ ) ‘ ततः शाखामृगाः सर्वे, ( २/१० ) ' शाखामृग श्रेष्ठो रहा ( १।१६३ ) यहाँ सुग्रीव - हनुमानादिकेलिए वन्दरका क्रम प्राप्त ४ र्थ पर्यायवाचक ‘ शाखामृग ' शब्द आया है । कोई मनुष्य अं जाति बानर वा उसके पर्याय वाचकोंसे नहीं कही जाती । यह व ' शाखामृग ' के ' मृग ' शब्दसे पशु होना स्पष्ट है । मनुष्य मृग, वा मुख ' शाखामृग ' नहीं कहा जाता । जाते ( ख ) जो लोग इसमें दृष्टान्तस्वरूप नाग, सर्प, सर्पसत्र आदि उसे में जनमेजयका ‘ एक मनुष्य जातिविशेषोंसे युद्ध ' अर्थ बताते हैं भी यह सब उनकी निर्मूल कल्पनामात्र हैं, नहीं तो वहाँ उसके कहा पर्यायवाचक ‘ भुजङ्ग, भुजङ्गम, भुजग, सर्प यदि न होते । जो जाति इसमें ' मत्स्यराज विराट ' आदि मनुष्य जातिका उदाहरण देते प्रमाण हैं, यह उनका विषम उपन्यास हैं । यह तो अवश्य एक देशका, आदि नाम था - यह मछली वाचक नहीं । नहीं तो इन बन्दरोंकी तरह । दास न उसके पर्यायवाचक मीनपति, झषपति आदि भी आते, पर नहीं नहीं आते । इसी प्रकार कहीं ' वत्स ' देश आया हैं, वहाँ भी ' बड़ा ' वाचक अर्थ नहीं, क्योंकि उसके पर्यायवाचक नहीं दिये गये; पर अतः य रामायणादिमें तो वानरादिके पर्यायवाचक आये हैं । तवप्रतिपि विषम दृष्टान्त होने से यहाँ उनकी बात नहीं घटती । हे ( ग ) हाँ, मनुके साथ जहाँ ' मत्स्य ' का वर्णन आता है, वहानामसे विशेष मछली ही गृहीत होती है, क्योंकि वहाँ उसके पर्यायवाच देखे जाते हैं । मनुस्मृति ( ७/१६३ ) पद्य में ' कुरुक्षेत्राँश्च मत्स्यांश्च '. ५ यहाँ बहुवचन तथा अन्य देशोंका साहचर्य भी देशका नाम बता कटमात्र Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 19

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[ " = ]. श्रीसनातनधर्मालांक ( ६ ) ये रहा ' है, अतः यह वादियोंका दृष्टान्त भी विषम है । - प्राप्त ( घ ) भविष्य पुराण में ' गुरुण्डा वानराननाः ' से भविष्यद्वारा नुष्य. अंग्रेजोंको ' वानरानन ' कहा है, वानर कहीं नहीं कहा; अतः ती । यह वादियोंका दृष्टान्त भी विषम है । अब भी प्रायः अंग्रेजों का वा मुख वानरोंकी भांति मालूम होता है । पर वे वानर नहीं कहे जाते । इसी प्रकार महाभारत में ' विडालाक्ष ' एक राजा है । यहाँ द- उसे बिल्लेकी भांति आंखों वाला तो कहा है, ऐसे तो आजकल. ते हैं भी मिलते हैं; पर उसे बिलाव जाति वाला नहीं कहा, वा नहीं उसके कहा जाता; और फिर यह नाम है । हाँ, आजकल कई नाग जो जातिके पुरुष कहे जाते हैं; वे अवश्य यहाँ मनुष्य हैं । इसका दे प्रमाण यही है कि उनके साथ उनके पर्यायवाचक ‘ सर्प, भुजङ्ग ’ टाका, आदि नहीं कहे जाते । श्रीहरदयाल नाग, कलकत्ताके डा ० काली-तरह दास नाग आदि कभी सर्प वा फरणी, सांप वा वैसी आकृतिसे नहीं नहीं कहे जाते; पर रामायण में वानरोंको उनके सभी पर्याय-वाचकोंसे तथा वैसी आकृति, वैसी प्रकृतिसे वर्णित किया गया है; पर अतः यहाँ दृष्टान्त - दान्तके वैषम्यवश इन दृष्टान्तोंके देने वाले तब प्रतिपक्षियोंका पक्ष निराधार है । कहीं भी कोई मनुष्य जाति,. चाहे वह वनवासी हो, कपि, प्लवङ्ग, प्लवग, शाखामृग आर्दि बहानामसे नहीं कही गई । अव ' आलोक ' पाठक क्रम प्राप्त वानर-श्व पर्यायवाचक ' क्लीमुख ' शब्द रामायण में प्रयुक्त देखें । ५ वलीमुखः ।— ' यावन्न लङ्कां समभिद्रवन्ति वलीमुखाः पर्वत--तामात्राः । दंष्ट्रायुधाश्चैव नखायुधारच ' ( युद्ध १४१३ ) ' समुत्पत्य CC - 0. Ankur Joshi हनुमानादि वानर नर थे? { 2 Collection Gujarat. वलीमुखा: ' ( २०३१ ) यहां पर बन्दरोंको उनके पर्यायवाचक ' वलीमुख ' नामसे कहा गया है । यदि यह यहां मनुष्य जाति इष्ट होती; तो यहाँ बन्दरका पर्यायवाचक न दिया जाता । यदि कहीं आजकल किसी मनुष्य जातिका ' वानर ' यह नाम आता भी हो, तथापि वहां उसके पर्यायवाचक कपि, वलीमुख आदि नहीं आते; और उसे ' वन्दर ' भी नहीं कहा जाता । परन्तु रामायणमें वानरके सभी पर्यायवाचक तथा उनके नखायुध-दंष्ट्रायुध आदि चिह्न एवं पशुत्व आ जानेसे यहाँ कोई मनुष्य जाति सिद्ध न हुई; तब प्रतिपक्षीका पक्ष निर्मूल हो गया, क्यों क मनुष्य नखायुध वा दंष्ट्रायुध नहीं होते । ( ख ) अव और भी देखिये । - वादीको हमने ' प्रतिपक्षी ' कहा हैं । यहां हमने भी उसे पक्षी जाति वाला नहीं बताया । यदि वैसा इष्ट होता; तो हम उसे प्रतिविहङ्ग, ' प्रतिखग ' आदि पर्यायवाचकोंसे कहते; पर नहीं कहते; तत्र रामायणके जाम्बवान आदि रीछ, हनुमानादि वानर, जटायु आदि पक्षियोंके जिनके प्रायः सभी पर्यायवाचक रामायणमें आये हैं; उन्हें मनुष्य बनाने की प्रतिपक्षियोंकी कल्पना विषम दृष्टान्त होनेसे कट गई । ६ मर्कट – बन्दरके छठे पर्यायवाचक ' मर्कट ' शब्दका प्रयोग हमें रामायण में नहीं मिला । या तो हमारी दृष्टिसे च्युत हो गया हो, अथवा यह शब्द कदाचित् अर्वाचीन होनेसे प्राचीन रामायणमें उस कालमें प्रयुक्त न होता हो । जैसे ' पिङ्ग ' यह बन्दरका नाम ( कि. २६/२५ आदि स्थलोंमें ) मिला है, पर An eGangotri Initiative

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सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 20 का मूल पृष्ठ
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१० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) श्राजकलके कोषोंमें प्रायः प्रयुक्त नहीं । यदि उस समय ' मर्कट ' शब्द वानरों केलिए प्रयुक्त हुआ करता, तो वाल्मी ० में वानरोंके अन्य नामोंकी भांति यह नाम भी अवश्य मिलता, परन्तु ' नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं कविदन्यतोपि ' की प्रतिज्ञा करनेवाले गो ० तुलसीदासने अपने ' मानस ' में ' पुनि जाइ पुकारे स्थलोंपर उसका प्रयोग किया है । वाद राजपुरुषोंने रावण को कहा है ( लङ्काकाण्डके १ दोहेकी चौपाई ५ ) ७ वानरः –‘वानर ' शब्द जो वाचक है, रामायण में स्थान - स्थान श्रेष्ठं परिवार्योपतस्थिरे ' ( किष्कि, हनुमान नाम वानरः ' ( ३४ ( ३८ ) यह हनुमानने अपना परिचय दिया है । प्रभु ' मर्कट बल भूरि ' इत्यादि यह अदयकुमारके मरने के । ' धावहु मर्केट विकट वरूथा ' में भी प्रयोग मिलता है । बन्दरका ७ वां प्रसिद्ध पर्याय-पर मिलता है । हरयो वानर २२८ ) ' अहं सुग्रीवसचिव श्रागन्तुक श्रीराम के आगे वानर कामरूप ( इच्छानुकूल किसी भी रूपके बनानेकी शक्ति वाले ) होनेसे मनुष्यका आकार भी धारण कर लेते थे; तभी हनुमान्ने ब्राह्मण - मनुष्यका रूप धारण कर लिया, जिसे श्रीवाल्मीकिने कहा है- ' कपिरूपं परित्यज्य .. भिक्षुरूपं ततों भेजे ' ( किष्कि. ३।२ ) तभी गो. तुल. के मानस में श्रीरामने उसे ' विप्र ' कहा है । ब्राह्मण - मनुष्य समझने से श्रीरामने ( कि. ( २८-२६ में ) उसे ' वेद - वेदाङ्गका पण्डित ' कहा है । ( ख ) उस समय कामरूप होनेसे हनुमान्ने राम - लक्ष्मणका परिचय पानेकेलिए बन्दरकी आकृति हटाकर ब्राह्मण - मनुष्य की CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ ११ १२ आकृति कर रखी थी, तब उसमें प्रतिपक्षीका यह कहना कि बाल " ( १ ) यदि हनुमानजी की आकृति बन्दरोंजैसी थी, तो ब्राहारणका ' जा भिक्षुक - जैसे वस्त्र पहन लेनेसे वह आकृति कभी छुप नहीं र्नियु सकती । फिर रामजीने आकार - प्रकारसे उसे ब्राह्मण कैसे उपा समझा? ( २ ) यदि मनुष्यकी आकृति हनुमानकी नहीं थी, कहा श्रीरामसे यह कहनेकी आवश्यकता क्यों हुई कि - ' मैं हनुमान अज्ञव नाम वानर हूँ ' ( हनुमान. दि वानर. पू. १०२ - १०३ ) यह आक्षेप राव कट गया. और व्यर्थ भी सिद्ध होगया, तभी तो हनुमान द्वारा कि श राम - लक्ष्मणका परिचय प्राप्त होजानेपर फिर आगे रूपं जैसे परित्यज्य वानरं रूपमास्थितः ' ( कि. ४ ३४ ) उसे भिक्षु - मनुष्यका कृतव रूप छोड़कर हनुमान्का अपना स्वाभाविक वानररूप धारण कर सर्वेपि लेना लिखा है । केवल वस्त्र पहरनेके भेदसे वन्दरकी ब्राह्मणता ' वन्द नहीं जानी जा सकती थी । न यह हम कहते हैं, न ही रामायण नमो कहती है; यह तो वादीका लटका है, वहाँ वैसा वेष करना नहीं । रूप भ लिखा, किन्तु सारा रूप करना लिखा है । भिक्षुका भी रूप तथा कुछ भ वानरका भी रूप वादी के सभी तर्क सिद्ध होगई । ( ग ) जो कि पहचान न सके; प्रतिपक्षीकी वात करना रामायण में लिखा खण्डित होगये । हनुमान् कहा जाता है कि- ' यदि तो श्रीरामकी सर्वज्ञतापर ऐश्वयो है, वेष नहीं । इससेऐसा आदिकी वानररूपता कामर त बन्दरको भी श्रीराम । एक दोष आता है ', यह व्यवह तो व्यर्थ है । श्रीराम तो वास्तविकता जानते हुए स्त्रीपा भी सर्वत्र अनजान से बनकर लीलामात्र कर रहे थे । जैसे कि Gujarat. An eGangotri Initiative