श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मालोक ९
9 Shri Sanatana Dharma Lok Vol-9 By Devnath Sharma Shastri 1966 New Delhi - Sanatan Dharmalok Karyalay · 522 पृष्ठ · 53 खण्ड
In English
Sanatana Dharmalok Volume 9
This is the ninth volume of a series titled Shri Sanatana Dharma Lok, written by Dinanath Sharma Shastri. The text aims to defend Sanatana Dharma against criticisms and objections found in various Puranas and histories.
This book answers
- How to defend sanatana dharma against critics?
- Refutations of objections regarding puranas and history?
- Sanatana dharma encyclopedia volume 9?
विषय सूची
- - 9 सनातनधर्मासोक CC - 0, Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiatives ( CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative ' CC… 1–10
- ( ङ ) तक्ष किया जाता है, उसे विफल किया जावे । इस प्रन्थमालाका एक t तो प्रत्यक्ष फल यह निकला कि पहले जो हमने इस महाग्रन्थ-I की स.ध, विषयक लेखमाला '… 11–20
- ११ १२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वाल्मी.रा.में रामावतार धारण करते हुए विष्णु भगवान के लिए का ' जानन्नपि ' ( जानते हुए भी ) कहा है- ' ततो नारायणो… 21–30
- ३२ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) होने से इससे उनकी वीरता भी उपपन्न हो सकती है । उनकी इससे निन्दा नहीं हो जाती । तब उनकी वानरता सिद्ध हो ही गई… 31–40
- ५२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सुश्री उसमें असम्भवकी क्या बात? जो बात अपनी संकुचित - बुद्धि में न जम सके; तब क्या उसे मूल लेखकसे विरुद्ध अपनी इच्छा-लेखक… 41–50
- [ ७ ७२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) उस उद्धरण दिये संक्षेपसे समाधान दिया जा रहा है । सेल ( ४८ ) ' मन्त्रविद् विजयैषिणी ' ( ४/१६ १२ ) यहाँ विजयकी इच्छुका… 51–60
- 31 ६२ ] श्रीमनातनधर्मालोक ( ६ ) हास्वर वस्तुतः यह सब कल्पनायें निरी निकम्मी वा निःसार हैं । फिर मनुष्योंने रीछका कौनसा चेहरा लगाया था? शरीर पर दशहरी रोम… 61–70
- १०३ १०८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) नास उस लड़के के वापिस आनेके टाइममें स्वयं उन्हें लेने चले जा सकते दी, हैं… 71–80
- १२८ । श्रीसनातनधर्मालोक ( ह ) को प्रमाण मानता ही है, तो उनने अपनी रामायणकी टीका में ‘ रेमिरे मुदिताः ’ ( १-७७-१४ ) का मैथुनार्थ नहीं किया, किन्तु '… 81–90
- [ १४८ ] श्री सनातनधर्मालोक ( १ ) सुश्रुतमें कन्या- गर्भाधानावस्था [ १४ ९ द जी: में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ६६८-७११ तथा पृ. ६८० भी देखना चाहिये; त् जिसपर वादी… 91–100
- [ १६७ श्री सनातनधर्मालोक ( १ ) १६८ ] तक पुरुषके यौवनका २१ से प्रारम्भ माना गया है; उस गणनासे अनुकूल स्त्रीका भी यौवन १२ वर्षसे माना जावेगा… 101–110
- [ in १८८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) दृष्टिकोण ' पोडशवर्षा पत्नीमावहेत् ' यही पाठ कन्या विवाह विषयमें पूर्व इ स्वामीजी के समय होता, तब स्वा.द.जी स.प्र. वा '… 111–120
- [ २०७ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २०८ दी भी स्पष्ट कर दिवा कि - चतुर्थीकर्म में गर्भाधान नहीं होता; किन्तु चतुर्थी ऋतुकालके पञ्चमादि दिनोंमें होता है… 121–130
- [ २२० ] श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) २२८ प्रतिपादक वरके यथासमय प्राप्त न हो सकने के कारण ) शास्त्र - विहित आयुमें कन्याका विवाह नहीं कर सकता, तब वह पूर्वोक्त… 131–140
- य २४८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) । इसंस्कार ( १२१ पृष्ठकी टिप्पणी ) में नक्षत्रादिका विवाह में विचार कल्पना-युक्त 5 एवं प्रमाण माना है… 141–150
- [ २६७ २६८ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 1 ) . से प्रपनी करने वाले ही दिन विवाह - संस्कार माना है; पर फिर सं.वि. के को या तो विवाह संस्कार के अन्त ( पृ. १६६ ) में… 151–160
- श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) २६. २८८ ] लगे अब तो ' सर्वनाशे समुत्पन्ने ह्यर्धं त्यजति पण्डितः । अर्धेन पने - हा! कार्य सर्वनाशो हि दुस्सह: ' इस नीतिका आचरण करू… 161–170
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३०८ ] अनुपातसे कन्याविवाह हो । लड़कों का १६ वर्षे दरहे है, वहां उसी चाहिये… 171–180
- [ श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) ३२८ हो सके । थीं । हमने उसमें स्वामीका कापड़ी होना वा औदीच्य ब्राह्मण धानाने होना, जो दूसरोंका मत था; वह दे डाला था… 181–190
- ३४८ ] भी मीमांसादर्शनसे सूचि भत्ताके नापितसे है । यह बात प्रकृत थाह स्थान ' ग्रस्त है; श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) विरुद्ध बताता है… 191–200
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ३६८ ] कार बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विज- कर्मणः ' ( २/१०३ ) स्वा. द. जी की अम तथा शुद्रवद् उनके अनुयायी मनुजीके इस पद्यको प्रमाणित… 201–210
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) [ s ३८८ ] तब उसके २१ पति कैसे हो गये? अव वादी स्वयं बतावे ट गया कर्म,… 211–220
- ४०८ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 4 ) ड़ा विगर्हिताचारान् अपाङ्क्तयान् नराधमान् । द्विजातिप्रवरो विद्वान् की स्थान उभयत्र विवर्जयेत् ' ( मनु. ३ | १६७ ) ' भस्मनीव… 221–230
- | श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ४२८ दीनद महामद मुसलमानी मुहम्मदसे भिन्न हैं, स्वा. द. का उदाहरण अप्रतिम भी हमने दिया था; वादी बेचारा इसपर चुप्पी लगा गया; तव वे… 231–240
- श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) 885 1 तो भूदेव वह शूद्र ( अनार्य ) हो, चाहे आर्य ( शूद्रातिरिक्त ), कहा, चाहे त्रैवर्णिक हो -- इस प्रकार यह मन्त्र ठीक सम्बद्ध हो… 241–250
- श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) ४६८ ] देखकर पालीरत्नजीका गलत थ न मानकर उक्त मन्त्रमें बात वादीको गङ्गा आदि नदियोंका नाम ही मानना चाहिये; और वेदमें कह डियोका उनका… 251–260
- YES ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) सही घर देना - वादीने यह अर्थ किसका निकाला? फिर जो लोग, और वैश्यरूपधारी शिवका खाट पर सोनेका ' पृथक-तुका महानन्दा सोना ' अर्थ… 261–270
- श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) ५०४ / यह बेरस ऐसे वाक्य तो अब भी दीवारोपर चिपके इश्तिहारोंमें त मिलते हैं कि- ' टाटा मिलमें मज़दूरोंकी चर्बी खूनका हवन ' लिखे करण… 271–280
- श्री सनातनधर्मालोक ( 8 ) २४ / उसे ' स्वपाकी ' ( पृ. २११ ) लिखा है; तब अर्थ में श्वपाकी कैसे नहीं, स वादीने? वे तो शक्तिनामक ब्राह्मण ऋषिके लड़के थे, '… 281–290
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५४४ ] भी कई बातों का ज्ञान प्राप्त होगा । पथका अन्य ). में स्वामीने ' सह नाववतु सह नौ भुनक्तु का श्राशा ( १ ऋभाभू अर्थ लिखा है- (… 291–300
- श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) १६४ ] यकोपनिष जावेंगे? अब प्रकरण पर आइये-दजीने तब विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा- अत्र ' पुराण ' शब्दः कस्य दारवस्थ ( यहां पर पुराण -… 301–310
- श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) १८४ ] कोई ( १२ ) टं. प. के सम्पादक ' द्विर्वचनेचि ' सूत्रमें श्रीदीक्षित कसूत्रमें 1 न ' पदान्त ' सूत्रसे ' न ' की अनुवृत्ति मानकर… 311–320
- श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) for / ६०३ अपने बहनोई अर्जुनकी मदद करनामात्र था । उनका उद्देश्य कवि लोक - कल्याण और गीताकी बताई कसौटीको पूरा करना यताम्… 321–330
- श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) | ६२३ ६२४ / हो जाता है; वैसे विद्युतूरूप परमात्मामें भी तार भी भेद समझना चाहिये । होता है… 331–340
- श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) है ' । जब ऐसा है, तो परमात्माने पुराणोंको जाने, वह जीव पहले ही प्रकट कर दिया था… 341–350
- [ श्रीसनातनधर्मालोक ( e ): · · ६६ । कामाचा ' देता है- ' अन्यमिच्छस्व सुभगे! पतिं मत् ' तब से । मम… 351–360
- श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) [ ६ ९ ३ ६८४ ] विष्यद्- खड़ी कर दी हैं; न वह पुराण दयानन्दियोंसे पीछेका वर्णनमें कल्पनाएँ है… 361–370
- श्रीसनातनधर्मालोंक ( ९ ) 1 जन्माग्ने!... ' गुरुकुलके स्नातक आर्यसमाजी रमात्मा ' श्रभवत् । परमत्र - विद्यालङ्कारजीने अपने ' संस्कारप्रकाश ' कैसे कर… 371–380
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ७२४ ] उसकी प्रामाणिकतापर एक भीषण प्रहार किया रिदानेर भविष्यपुराणने भागवत में कृष्णको गोपियोंका सुरतनाथ ' ( १० | ३२ | २ ) है… 381–390
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७४३ ७४४ ] विना । ब्राह्मणको नमस्कार कराया । ' वामनो द्द विष्णुरास ' ( शत. ऋषि ( ५ ) इससे वामनको यज्ञपुरुष - विष्णु बताया गया है… 391–400
- श्रीसनातनधर्मालांक ( C ) ७६४ ] श्रतः ' ( ३ । २६ ) । इस विषय में पूरी स्पष्टता आलोक ' ' ( ६ ) में अज्ञानाम् में ' क्या प्राचीन भारत में गो - वध होता था '… 401–410
- J श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ७५४ न कहकर ' शव ' ही कहा जाना ठीक समझा ' इस महाभाष्यके उदाहरण में ( ४ | १ | ४८ ) कुलम् प्रदेशको भी ' कूप ' कहा गया है… 411–420
- I श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) | 50 % ८०४ अपने नियाद कर रहा है । यदि यमी पत्नी होती; तो पतिको को ag रतावश क्यों न समझ पाती? जब जानती है कि - मेरा पति यम नपुंसक… 421–430
- श्रीसनातनधर्मालोक ( T ) ८२४ ] चार मान लेगा? | सार वेद ( १६ ) प्रलयमें वादी अपने वेदोंको जैसा नहीं? यदि मानता है; तब उसके वेद की कोई तब ' देवस्य पश्य… 431–440
- | श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) | ८४३ ६४४ कामादयोऽनेन - इति भर्गः, भृजी भर्जने न्यङ्क्वादि-के! तुम | सृज्यन्ते ( ) ही थे; तब पर- स्त्रियोंमें कभी आसक्त न होने… 441–450
- | श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ८६४ कि- शिवपुराण, देवीभागवत तथा ब्रह्मवैवर्तादि में स्पष्ट है, यह - ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २३३ में संकेत दे चुके हैं ), पार्वती की… 451–460
- श्रीसनातनधर्मलोक ( १ ) ४ | उसकी निन्दा करता है । ( ४८ ) ' राम के समय मूर्तिपूजा नहीं थी । इसपर जो भविष्य-वादीने वचन दिया है, उसका प्रत्युत्तर वादी आलोक '… 461–470
- १०३ ६०४ | श्रीमनातनधर्मालोक ( 8 ) समा सकेगा? जीव, ( ७ ) ' शिवजी मोहनीसे भोग करने लगे ' यह बूढ़े बाबाकी इस्थता बात असत्य है । इसमें कोई प्रमाण नहीं… 471–480
- ६२४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) साथ एक ही समय में अनेक पुरुषों के विवाहकी सनातनप्रथा थी । जैसे कि- जटिला, वार्त्ती आदिकी… 481–490
- ४४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( १ ) ऊचु: - हेअर, हेअर, हेअर - इति विवाहसंस्कारविधिः समाप्तः । २३ सु ० - यही तो शुद्ध वैदिकविवाह होगा… 491–500
- ९ ६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) करूँगा । मैं आपको प्रणाम करता हूँ, आशीर्वाद दीजिये, मैं इसमें सफल हो जाऊँ… 501–510
- ६८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ε ) कई वर्षों तक गर्भमें पड़े रहनेका वर्णन आया है, उसमें असम्भव का प्रश्न न रहा । २ बालिका भी मां… 511–520
- CC - 0. Ankur Joshi Collection Guiarat AneGangotri initiative CC - 0 Ankur Joshi Collection Gujarat, An eGangotri Initiative 521–522