सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 21–30

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 21–30

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११ १२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वाल्मी.रा.में रामावतार धारण करते हुए विष्णु भगवान के लिए का ' जानन्नपि ' ( जानते हुए भी ) कहा है- ' ततो नारायणो विष्णु-नहीं । नियुक्त सुरसत्तमैः । जानन्नपि सुरान् एवं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत् | कैसे उपाय: को वधे तस्य ' इत्यादि ( १।१६।१-२-३ ) देवीभागवतमें भी कहा है- ' सर्वज्ञोपि हृतां मत्वा रावणेन दुरात्मना ' ( ४/२०/५० ) मान श्रज्ञवद् विचचारासौ पश्यमानो वने वने । जानकीं न विवेदाथ प रावणेन हृतां वलात् ' ( ४।२५।१२ ) यहां स्पष्ट कर दिया गया है द्वारा कि श्रीराम सर्वज्ञ होते हुए भी अज्ञताका नाटक खेल रहे थे । नुरूपं जैसे कि अन्यत्र कहा है- ' तथापि मानुष देहमाश्रितः परमेश्वरः । नका कृतवान् मानुषान् भावान् ' ( ५ | १ | १३ ) मानुषं जन्म संप्राप्य गुणाः कर सर्वेपि मानुषाः ' ( ४ | २५७ ) ( घ ) तब प्रतिपक्षीका यह लिखना कि-' बन्दर ब्राह्मणोंवाला वेष बनाकर जावे, तो उसे ' कपिराजाय पता नमो नमः ' कहते, यह व्यर्थ है । ब्राह्मणोंवाला वेष नहीं; किन्तु यण रूप भी ब्राह्मण - मनुष्यवाला कर रखा था । उस समय पूछ आदि तथा कुछ भी वानरत्वका लिङ्ग नहीं रखा गया । श्रणिमा आदि आठ ऐश्वर्यों को स्वतःसिद्ध रखनेवाले देवताओंके अवतार वानरोंमें ऐसा करना असम्भव भी नहीं; क्योंकि वे देवावतार एवं पता कामरूप थे; उस समय मनुष्याकृति ब्राह्मण बनकर गये थे; अन्य तो सैकड़ों स्थानोंमें उन्हें ' कपि ' कहा ही है । ( ङ ) श्रीराम के लिए राम एक व्यवहार करना चाहिये था, ' मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् ' वाला यह व्यवहार नहीं " यह वादीका कहना भी गलत है । नाटक में हुए स्त्रीपात्र बने हुए भी पुरुषको अपना पुरुषपन प्रकट नहीं करना कि CC - 0. Ankur Joshi अनुमानादि वानर नर थे? [.3 Collection Gujarat. पड़ता । इसीका नाम ' लोकलीलावत्ता ' होता है । तभी तो वहाँ हनुमान्का ' भिक्षुरूपं परित्यज्य वानरं रूपमास्थितः । पृष्टमारोप्य तौ वीरौ जगाम कपिकुञ्जरः ' ( कि. ४ | ३४ ) रामका पता लग जानेसे मनुष्यभिक्षुका वेष नहीं, किन्तु रूप छोड़कर फिर हनुमान्का अपना बन्दरवाला वेष भी नहीं, किन्तु बन्दर चला रूप करके राम - लक्ष्मणको अपने कन्धेपर उठा ले जाना कहा है, पर प्रतिपक्षी इन पद्योंको छिपा दिया करते हैं, क्योंकि इनसे उनका पक्ष खण्डित होता है । ' वानरोऽहं महाभागे! दूतो रामस्य धीमतः ' ( सुन्दर. ३६/३ ) यहाँ भी सीताको हनुमान अपनेको रामका दूत ' वानर ' कह रहा है । ' सत्यं राक्षस! राजेन्द्र! शृणुष्व वचनं मम । रामदासस्य दूतस्य वानरस्य विशेषतः ' ( ५।५१२१३८ ) यहाँपर भी रावणको अपना वानर होना बताया जा रहा है । इसपर रामाभिराम ( तिलक ) टीकाने लिखा है- ' स्वस्य नर- रक्षोऽतिरिक्त जात्यन्तरत्वेन अपक्षपातो न्याय्य - वक्तत्वं च सूचितम् ' अर्थात् मैं न मनुष्य हूँ, न राक्षस, किन्तु इनसे भिन्न जातिवाला वानर हूँ; अतः मेरा वचन निष्पक्ष होगा । यहां भी हनुमान्की वानर होनेकी स्पष्टता है । ८ कीश: - ' कीश ' शब्द वाल्मी में नहीं मिला । इससे वाल्मी. रा. की प्राचीनता सिद्ध हो रही है । यह शब्द कदाचित् पीछे चालू हुआ हो । कोषकार सामयिक शब्दों का भी प्रयोग कर दिया करते हैं । इस शब्दकी व्युत्पत्ति है- ' क: - वायुः, तस्य An eGangotri Initiative

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१४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हनुमानादि वानर नर थे? अयमिति किः ( ' अच इ: ' ( पा. ४१६५ ) स कि: - हनुमान् ईशो-S स्य स कीशः वानरः ' । हनुमान के पक्षमें इसकी व्युत्पत्ति यह होगी - ' की इति शब्दमीष्टे कीशः ' ( मूलविभुजादित्वात् कः ) । वाल्मी. रा. के भाष्यकार गो. तुलसीदासने ' कह लंकेस कवन तैं कीसा ' यहाँ ' कीश ' शब्दका प्रयोग किया है - रावरण अङ्गदको कहता है - हे कीश - वन्दर! तू कौन है, अपना परिचय दे । ६ वनौकस् — ' त्वद्गतानि च सर्वेषां जीवितानि वनौकसाम् ’ ( किष्कि. ६७/३५ ) ' वनौकसा ( हनूमता ) ' ( सुन्दर. ३२/१४ ) इत्यादि स्थलोंमें ‘ वनौकस् ' शब्दका श्रीवाल्मीकिने प्रयोग किया है, जो बन्दरोंकेलिए योगरूढ है ' । ' स्नेहादरण्यौकसः ' शाकुन्तलमें कण्वमुनिने अपनेको ' अरण्यौकाः ' कहा है, पर वे मनुष्य होनेसे ' वानर ' न तो कभी कहे गये, न माने गये । इसलिए रामायण में वानर बन्दर ही थे, मनुष्य नहीं । १० हरि: - ' हरिश्रेष्ठ! ' ( सुन्दर. २/११० ) ( किष्कि. ४४ | १३ ) ' हरिश्रेष्ठः ' ( सुग्रीवः ) ( किष्कि. ६७१३५ ) इत्यादि स्थलोंमें हनुमान् श्रादिके लिए ' हरि ' इस बन्दरके प्रसिद्ध दशम पर्यायवाचक ' हरि ' शब्दका प्रयोग किया गया है । ( ६ ) इस प्रकार जब हनूमानादि सिंहादिवर्गस्थित वानरपशु जातिके दस पर्यायवाचकोंसे बार - बार बुलाये गये हैं, तब स्पष्टतया वे वानर ( बन्दर ) सिद्ध हुए । ' वा- कश्चिद् नरो वानरः ' यह शब्द श्रीरामादि नरोंकेलिए कहीं भी नहीं आया; वनवासी-मनुष्योंके लिए भी कभी नहीं आता; क्योंकि वे ' किञ्चिद् नर ' CC - 0. Ankur Joshi Collection न होकर ' खरे - खासे नर ' होते हैं । पर बन्दरोंको तो $ मनुष्य ' अर्थात् मनुष्य - सदृश होनेसे ' वानर ' कहना ठीक ही है । च इन दस नामों वाली मनुष्य जाति तो चाहे वह वनवासी क्यों न हो, आकृति - व्यङ्ग्या न होनेसे ' आकाशका फूल ' हैं, कछवी. G का दूध है, खरगोशका सींग है, वालूकी दीवार है, कछवेका रोम है, कौवेका दाँत है, वालूका तेल है, साँपका कान है । बाँझका लड़का है, गन्धर्वो का नगर है, मृगतृष्णाका पानी ' है । अ राम सैनिकोंकी वानररूपता में रामायण में इतने प्रमाण हैं, जिन्हें क हमने अपनी रामायणमें चिह्नित कर रखा है, यदि हम उन सबका संग्रह करें; तो ' श्रीसनातनधर्मालोक ' का एक बड़ा पुष्प स उन्हींसे भर जाय, और उन्हें मनुष्य सिद्ध करना चाहते हुए वादियोंको ' शतचन्द्र ' नभरतलम् ' दीखने लगे । पर हम स्थाना-भाववश ' स्थालोपुलाक ' न्यायसे थोड़े प्रमाणोंको दे रहे हैं । ' आलोक ' पाठक सावधानतासे उनका मनन करें । ज ' हम जो कहा यह कपि न. हें कोई । वानररूप धरे सुर कोई ' इ ( मानस सुन्दर. २५ दोहे के बाद ) इसमें भी उनका मनुष्य - वेष न बताकर वानररूप कहा है । तब ' वनवासी होनेसे वे वानर थे ' भी यह प्रतिपक्षियोंकी बात उनकी अपनी कपोलकल्पना से अधिक प्रा मूल्य नहीं रखती । यह उनका नया, परन्तु ज्रङ्क खाया हुआ इसीलिए निकम्मा यन्त्र है । ' वनवासी ' होनेसे उन्हें ' वानर ' सर कहा जावे, तो ' तौ शोणितातौ युध्येतां वानरौ वनचारिणों श ( वाल्मी. ४।१६।३० ) यहाँ सुग्रीव एवं वालीकेलिए ' वानर ' और Gujarat. An eGangotri Initiative

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१६ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 1 ) ' वनचारी ' शब्दोंमें पुनरुक्ति दोष अनिवार्य होता । अलग महण करनेसे वानर - यह पशुजातिमें रूढ शब्द सिद्ध है । ( ७ ) अव ' आलोक ' पाठकगण अन्य भेदक शब्द भी देखें । ' एवमेकान्तसंपृक्तौ ततस्तौ नरवानरी ' ( कि. ७ | २४ ) इस प्रकार चहुत स्थलोंमें श्रीरामको ' नर ' और सुग्रीवको ' वानर ' कहा गया है । दोनों वनत्रासी थे । यदि श्रीवाल्मीकिमुनिको यह दोनों, प्रतिपक्षियोंके अनुसार मनुष्य इष्ट होते; तो नर - वानर यह भेद करने की कोई आवश्यकता नहीं थी । दोनोंके वनवासी होनेसे ( जैसे कि रामकेलिए भी ' वनगोचरः ' ( ६।११३ । ६ ) शब्द आया है ) समान ही ' वानर ' शब्दका प्रयोग हो जाता, वा दोनोंको ' नर ' होनेसे उन्हें ' नर ' कहा जाता । एक को मनुष्य तथा दूसरेको उसके मुकावलमें ' वनवासी ' नहीं कह सकते, बानर ही कहना न्याय्य एवं सङ्गत हो सकता है । क्योंकि जातिकी प्रतिद्वन्द्विता में जातिशब्द ही रखा जाता है । ' वनवासी ' जातिशब्द नहीं । इससे अत्यन्त ही स्पष्ट है कि - श्रीवाल्मीकिको वानर नरोंसे भिन्न योनिवाले ही इष्ट थे । नहीं तो वे वनवासी होनेसे रामको भी ' नर ' न कहकर ' वानर ' ही कहते; पर नहीं कहा गया; छातः प्रतिपक्षियोंकी एतद्विषयक युक्ति निर्मूल है । ( ८ ) ' तौ आसीनौ ततो दृष्ट्वा हनूमानपि लक्ष्मरणम् । शालशाखां समुत्पाट्य विनीतमुपवेशयत् ' ( ४/८/१४ ) यहाँ पर शालवृक्षकी शाखा उखाड़कर बैठानेसे हनूमानकी बन्दरोंवाली प्रकृति स्पष्ट होनेसे उनकी वानरता प्रत्यक्ष है । नहीं तो यदि वे मनुष्य होते; CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. हनुमानादि वानर नर थे? [ १७ तो कुर्सी वा चौकी रखते । ( ६ ) ' संस्तूयमानो हनुमान् व्यवर्धत महावलः । समाविध्य च लाङ्गलं हर्षाद् बलमुपेयिवान् ' ( कि. ६७।४ ) यहाँ हनुमानका पूँछ फटकारना भो दिखलाया गया है; क्या मनुष्यकी पूँछ भी हुआ करती है? | स्पष्ट है - उसे वन्दर बताया गया है । श्रीसातव-लेकरजी जो कि इस पुच्छके विषय में नई कल्पना किया करते हैं; उसपर अन्तमें विचार होगा । इसी प्रकार " तस्य लागुल-माविद्धमतिवेगस्य पृष्ठतः ' ( सुन्दर. ११३२, ११५६ ) स्फोटयत्यतिसं-रब्धो लाङ्गलं च पुनः पुनः । यस्य लागुलशब्देन स्वनन्ति प्रदिशो दश । एष -- युवराजोऽङ्गदो नाम ' ( युद्ध. २६।१६-१७ ) यह सारण राक्षस अङ्गद - वानरका वर्णन कर रहा है । ' यस्य वाला बहु-व्यामा दीर्घे - लाङ्गलमाश्रिताः ' ( २७ ) यहाँपर एक वानरके पूँछके बाल बताये गये हैं । इसी प्रकार २७/२ आदि बहुत स्थलोंपर वानरोंकी पूँछ स्पष्ट है । ' हनूमानपि तेजस्वी क्षितौ आविध्य लाङ्गलं ' ( ५।४२।३० ) ' हनूमान् मारुतात्मजः । पुच्छम् आस्फोटया-मास ( ३१ ) ' ननाद सुमहानादं लांगूलं चाप्यकम्पयत् ' ( ५।५७ / १७ ) इत्यादि रामायणीय पद्योंमें हनुमान् आदिके पूँछ फटकारनेसे उनका वानरत्व स्पष्ट है । ( १० ) कई लोग कदाचित् सन्देह करें कि - हनुमान्की पूंछ शायद वास्तविक न होकर आलङ्कारिक हो, परन्तु वे अपना सन्देह दूर करनेकेलिए वाल्मी. रा. में वर्णित पूंछकी घटना देखें, जिससे लङ्कादाह हुआ | ' कपीनां किल लांगूलमिष्टं भवत्ति Aengotri Initiative

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१८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) भूषणम् । तदस्य दीप्यतां शीघ्र ं तेन दग्धेन गच्छतु ' ( सु. ५३।३ ) यह हनुमानके लिए रावणने कहा था कि - बन्दरोंको अपनी पूंछ बहुत प्यारी एवं उनकी भूषणस्वरूप होती है । इसकी उस पूंछको जला दो, तब राक्षसोंने भी वैसा किया । इससे हनुमान्-की पूंछका वर्णन स्वाभाविक हैं, कृत्रिम वा आलङ्कारिक नहीं । किन्हीं भी वनवासी मनुष्योंकी न तो पूछ होती है, और न उनकी इष्ट भूषण ही होती है । अव पाठकगण राक्षसों - द्वारा हनुमान्की पूंछका जलाना देखें— ( ख ) ' तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसाः कोपकर्कशः । वेष्ट तस्य लागूलं जीर्णैः कार्पासिकैः पटैः ' ( ५३।६ ) ततस्तस्य वचः श्रुत्वा मम पुच्छं समन्ततः । वेष्टितं शरणवत्कैश्च पटैः कार्पासिकैस्तथा ' ( २५८ | ११२ ) यहाँ पर हनुमान् अपने पुच्छ - दहनका वृत्तान्त सुना रहा है । ' संवेष्टयमाने लाङ्गले व्यवर्धत महाकपिः ' ( ५ । ३७ ) ( जब पूंछमें पुराने चीथड़े बांधे जा रहे थे, तब हनुमान्ने अपने-आपको बड़ा बना लिया । ) लांगू लेन प्रदीप्तेन राक्षसान् तान् अताडयत् ' ( ८ ) दीप्यमाने ततस्तस्य लाङ्गूलाये हनूमतः ' ( २२ ) हनूमज्जनकश्चैव पुच्छानलयुतोऽनिलः ( वायुः ) ( २८ ) यहां पर हनुमानका पिता वायु बतलाया गया है; इससे जो कि वादी लोग उसे मनुष्य बतानेकी चेष्टा करते हैं; उनका खण्डन हो गया; उसमें कोई सङ्गति भी नहीं लगती । इसी प्रकार ' अञ्जलिं प्राङ्मुखं कुर्वन पवनायात्मयोनये ' ( ५११६ ) यहां भी पवनको हनुमान्का योनि ( कारण ) बताया गया है; भिन्न - भिन्न पर्यायवाचक ( अनिल, CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ १६ २ पवन ', वायु आदि ) उसे वायु देवता बता रहे हैं । अतः प्रति पक्षियोंका पक्ष संगत हो पाता है; वहां क्या उसका मनुष्य नि पिता बैठा हुआ था? 5 या ' दह्यमाने च लाङ्गले चिन्तयामास वानरः ' ( ५३/२६ ) शिशि- she रस्येव सम्पातो लांगूलाग्र प्रतिष्ठितः ( ३० ) यो ह्ययं सम लांगूले दीप्यते हव्यवाहनः ' ( ५४ | ५ ) प्रदीप्तमग्निमुत्सृज्य लांगूलाग्रे she / प्रतिष्ठितम् । ननाद हनुमान वीरो ' ( ५४ । २० ) इहागतो चानररूप. धारी रक्षोपसंहारकरः प्रकोप: ' ( ३६ ) लङ्कां समस्तां सम्पीड्य श्री लाङ्गलाग्निं महाकपिः । निर्वापयामास तदा समुद्र हरिपुङ्गवः S ( ५४ | ४६ ) च मे दहति लांगूलं कथमार्यां प्रधयत्ति ( ५५/२६ ) इस भ प्रकरणमें पूंछसे प्यार करनेसे हनुमान स्पष्ट वानर सिद्ध होते य हैं, नर नहीं । नरकी पूंछ नहीं होती । राक्षसों द्वारा हनूमान्को द वानररूपधारी काल वताया गया है । यहाँ पर ' वानरवेष ' नहीं भ भ दिखलाया गया है, किन्तु वानर रूप दिखलाया गया है । यहाँ ल स्वाभाविक वर्णन हैं, कृत्रिम नहीं । वनवासी मनुष्यों की पूंछ भी नहीं होती, और पूंछ उनका इष्ट भूषण भी नहीं होती । यह प पुच्छलीला स्पष्टतया हनुमान्की वानरताकी ही परिचायक है । ( ११ ) केवल रामायणमें ही हनुमान्‌को वानर वा पुच्छयुक्त नहीं बताया गया है; बल्कि महाभारतमें भी कहा गया है-' विज्ञाय हनुमान् कपिः ' ( वनपर्व २४६/६५ ) महाकायो हनूमान् नाम वानरः ' ( ६६ ) ग्रास्फोटयच्च लाङ्गलम् इन्द्राशनिसमस्वनम् ' + ( ७० ) यहां हनुमानका पुंछ फटकारना लिखा है । ' तस्य लाङ्गल -Gujarat. An eGangotri Initiative_

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२० ] श्री सनातन धर्मालोक ( ६ ) निनद ' ( ७१ ) लाङ्गूलास्फोटशब्दाच्च ' ( ७२ ) स लाङ्गूलरवः ' ( ७३ ) यहाँ पूंछ फटकारने का शब्द लिखा गया है । ' लाङ्गलेनोर्ध्वगतिना ध्वजेनेव विराजितम् ' ( ७८ ) यहाँ पर पूंछका ऊपर उठाना लिखा है, जो गाय - भैंस आदिकी भांति बन्दरोंका भी स्वाभाविक होता है, मनुष्योंका कभी नहीं हो सकता । हनूमानुवाच - ' वानरोऽहम् ' ( १४७ | ५ ) ' रामायणेति विख्यातः श्रीमान् वानरपुङ्गवः ' ( ११ ) प्रसीद नास्ति मे शक्तिरुत्थातुं जरया-ऽनघ! ममानुकम्पया त्वेतत् पुच्छमुत्सार्य गम्यताम् ' ( १६ ) हनूमान् भीमसेनको कहता है कि मेरी पूंछ हटाकर चले जाओ । रामा-कालके हनुमान् चिरजीवी होनेसे महाभारतकालमें भी दीख रहे हैं । ' पुच्छं प्रगृह्य तरसा ' ( १८ ) भीमसेन हनुमानकी पूंछको न हिला भीमः पुच्छं महाकपेः [ हनूमतः ] ' ( १६ ) लाङ्गूलोद्धरणोद्धुरः । कपेः पार्श्वगतो ( १४८ | ११ ) इससे भीमसेन लज्जित हो पद्योंमें हनुमान्की पूंछका वर्णन होनेसे कहने से हनुमान् बन्दर ही थे, जंगली हो गया । परन्तु महाबलवान् भी सका । ' नाशकच्चालयितुं यत्नवानपि तु श्रीमान् भीमस्तस्थौ व्रीडानताननः ' गया । इन महाभारतके और कपि, वानर आदि मनुष्य नहीं; यह सिद्ध ( ख ) यदि प्रतिपक्षी डार्विनके अनुयायी हों; उनके मतमें मनुष्योंका मूल यद्यपि वानर हो सकते हैं; तथापि वर्तमान मनुष्य उनके मत में भी पुच्छ - रहित हैं, परन्तु रामायण - महा-भारतमें उनकी पुच्छका वर्णन होनेसे वे वर्तमान - मनुष्य सिद्ध CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ २१ न हुए । कई मद्रासी त्राह्मण कहते हैं कि यह वानर द्रविड़ लोग वा अनार्य थे, उनके उपहासकेलिए उनकी पूंछ रामायणादि आर्यसाहित्यमें जोड़ दी गई है: पर यह ठीक नहीं । यदि श्री-वाल्मीकिको हनुमानादिकी अनार्यता सिद्ध करनां वा उनका उपहास करना इष्ट होता, तो उन्हें रामायणके श्रेष्ठ पात्रों में स्थान न दिया जाता; और उन्हें ' आर्य ' ( कि. २५/३० ) न कहा जाता । वस्तुतः शङ्काकर्ताओंके मस्तिष्कोंको पाश्चात्य वा अनार्य लोगोंने खरीद रखा है, जिससे स्थान - स्थानपर उन्हें विपरीत शङ्काएँ घेरे रहती हैं । ( १२ ) स्वा. द. जीसे सम्मानित शुक्रनीतिमें भी हनुमान द्वारा लङ्काकी अशोक - वाटिकाके तोड़नेके सङ्केतमें हनुमानको वानर सिद्ध किया है - ' रावणस्य च भीष्मादेर्वनमङ्गं च गोग्रहे । प्राति-कूल्यं तु विज्ञातमेकस्माद् वानराद्, नरात् ' ( ११५६ ) यहाँ वानर-से रावणके वन ( अशोकवाटिका ) के भङ्गकी कथासे हनुमानका सङ्केत है, क्योंकि उसीसे उसका सम्बन्ध है । और भीष्मका विराटके गोग्रहणमें ' नर ' अर्जुनसे पराभवका वृत्त सङ्केतित है । इससे हनुमानका नरसे भिन्न वानर होना स्पष्ट सिद्ध होगया । ( १३ ) निकुञ्च्य कर्णौ हनुमान उत्पतिष्यन् महाबलः ' ( सुं. १।३६ ) यहाँ हनुमानका उछलने के समय कान सिकोड़ना उसका वानरत्व बता रहा है, मनुष्यमें उछलनेके समय कान सिकोड़ना असम्भव है । प्रतिपक्षियोंके पक्षकी रीढ़ की हड्डी इससे टूट गई । सौ वर्ष लगाकर भी वे कभी मनुष्योंका कान सिकोड़कर Gujarat. An eGangotri Initiative

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२२ ] श्रीसनातनचमलोक ( ९ ) उछलना सिद्ध नहीं कर सकते । जब ऐसा है; तो वे किस मुंहसे हनुमानादिको मनुष्य सिद्ध करनेकी निर्मूल चेष्टा किया करते हैं । ऐसे प्रमाणोंको तो वे छिपा दिया करते हैं । बाहरी बातें कि - ' अजी, उनके मकान थे; वे वस्त्र पहनते थे, उनके पलंग थे, सोनेके गहने पहरते थे ' - यह बताकर वे उन्हें मनुष्य सिद्ध करनेकी असफल चेष्टाएँ किया करते हैं । परन्तु यह व्यर्थ है: स्पष्ट वानरादिकी प्रकृति दिखलानेसे; और स्पष्ट शब्दों में वानर कहनेसे उनका पक्ष गिर जाता है । हाँ, यह अवश्य है कि वे प्राकृत ( साधारण ) वानर नहीं थे, किन्तु अप्राकृत ( विशेष ) वानर थे । देवयोनिसे सीधे वानरयोनिमें आनेसे वे रामायणा-नुसार विशेष वानर थे । इसलिए जब वे वानर कुम्भकर्णको देखकर भाग रहे थे; तब अङ्गदने उन्हें कहा था कि- ' आत्म-नस्तानि ( अप्राकृतानि ) विस्मृत्य वीर्याणि - अभिजनानि च । क गच्छत भयत्रस्ताः प्राकृता वानरा यथा ' ( ६ ६६ ५ ) अर्थात् तुम लोग - दिव्य वानर भी प्राकृत ( साधारण ) बन्दरोंकी भांति क्यों भाग रहे हो; अपने उन अप्राकृत बल तथा अभिजन- मूलजाति-को क्यों भूल गये हो? इससे रामायणीय वानरोंके वानररूप होनेपर भी रामायणको उनकी अप्राकृत वानरता ही सिद्धान्त-रूपेण इष्ट हैं । यह वादी वा आक्षेप्ता याद रखें । वे वाल्मी.रा.के अनुसार देवयोनिसे सीधे वानरयोनि में आये थे; अतएव अप्राकृत-तावश उनके मकान, राज्य, मुकुट आदि भी हो सकते थे; CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ २३ २४ इस विषयपर अन्तमें प्रकाश डाला जायेगा । इस वास्तविकताका ज्ञान न होनेसे, या उसे छिपा देने से वादी जनताके भ्रमका ह कारण बनते हैं । उस ( १४ ) ' चक्र: किलकिलामन्ये प्रतिगर्जन्ति चापरे । कचिद् । उच्छ्रितलांगूला प्रहृष्टाः कपिकुञ्जराः । श्रयताञ्चित - दीर्घारिण युद्ध लांगूलानि प्रविव्यधुः ' ( २५७१४२, ४३ ) यहाँपर रामायणीय अ बन्दरोंका किलकारी मारना, तथा पूंछ ऊँचे उठाकर खुश होना, अ वा पूंछ फटकारना ऐसा जो वर्णन पाया जाता है; वह मनुष्यमि कभी नहीं हो सकता । कदाचित् वनवासी मनुष्य बनावटी पु पूछ लगा भी लें; तथापि वह उनकी पूंछ स्वभावसे उड़ाई नहीं वा जा सकती; या स्वाभाविकतया नीचे नहीं की जा सकती; जैसे कि बन्दर, गाय - भैंस, घोड़ा आदि करते हैं । परन्तु यहाँ स्वाभा- या क विकतासे पूछ उठाना कहा गया है; अतः यहाँ बन्दर भी I स्वाभाविक विवक्षित हैं, वनावटी नहीं । और फिर यहाँ व वन्दरोंकी किलकारी भी उनके स्वाभाविक वानरत्वको बता ह रही है । ( १५ ) लाङ्गल चक्रो हनुमान् शुक्रदंष्ट्र: ' ( ५ | १ | ६० ) यहाँ हनु-मान्को सुफेद दाढ़ोंवाला कहा है । मनुष्यकेलिए ' दन्त ' शब्दका प्रयोग होता है, दंष्ट्रात्रोंका नहीं । यह वानरोंके लिए प्रयुक्त होता है; और पूँछका चक्र भी उनके वानरत्वका परिचायक है । जो कि प्रतिपक्षी कहते हैं कि- ' रामायण में हमको एक स्थान पर भी वानरियोंकी पूँछका उल्लेख नहीं मिला ' । खेद! जब Gujarat. An eGangotri Initiative

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२३ २४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) का हनुमान - आदिकी पूँछका वर्णन रामायण में स्पष्ट मिलता है, का उसे तो प्रतिपक्षी छिपा लेते हैं, अब वानरियोंकी पूँछ ढूँढ़ने जा रहे हैं । उन वन्दरियोंका पूरा वर्णन आया ही कहाँ हैं? उनका वद् • युद्ध में जाना ही कहाँ कहा है? उनकी कूद - फांद, वृक्षोंका तोड़ना णि आदि कहा ही कहाँ है? जब कभी कूद - फाँद वा लड़ाईका वर्णन आता है, तभी प्रसङ्गानुसार पूँछ भी वर्णित की जाती है, पर इन ना, वारियों का ऐसा वर्णन आया ही नहीं है; तब यदि उनका उन पुरुषों - बन्दरों जैसा वर्णन नहीं आया; तब उनकी पूँछ भी कैसे वत होती? हीं अथवा कामरूप होनेसे वानरियोंने पूँछ न रखी हो; तो यह भी सम्भव हो सकता है । हाथियोंके बाहरी दाँत होते हैं; T- कई हथनियोंके नहीं होते । मोर - मोरनीका बड़ा भेद कलगी आदिका स्पष्ट रहा करता है, इस प्रकार उन देवांश वानर वा वानरियोंका भेद होनेसे वानर वा वानरियोंका पूँछ होने न होने का भेद सम्भव है । अतः स्त्री - पुरुषका यदि वानरोंमें कुछ पूँछ आदिका भेद कहा है; उसमें हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं? का जोकि पूछा जाता है कि- ' वानर जिन देवों, ऋषियों, गन्धर्वो की सन्तान थे, उन देवोंकी पूँछ थी, या नहीं? यदि नहीं; तब उनकी सन्तानकी पूछ भी मिथ्या ही है ' अब पाठक इसपर र देखें । ' हिन्दुस्तान ' पत्रके १३-७-६० के में एक गोरखा ब महिलाकी पूँछवाली लड़की पैदा होनेका वृत्त छपा था । उड़ीसा के CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ २५ गञ्जाम जिलेमें एक पूँछवाली लड़की पैदा हुई थी, उसकी पूँछ काटने के लिए उसे वैरामपुरके हस्पतालमें ले जाया गया था ' ( संस्कृतम्, अयोध्या १६६४ । ४७ ) । न तो इन सन्तानोंकी मांकी पूँछ थी, न बापकी; पर सन्तानोंकी थी; तब इससे प्रतिपक्षी की युक्ति कट गई । ' वीर अर्जुन ' ( १६-११-६० ) में एक चार सींगवाले बच्चे के पैदा होनेका समाचार था । इस प्रकार उसीके २-७-५४ के अङ्कमें भी सींगवाले एक लड़केकी जो बन्दर जैसे रूपवाला था - उत्पत्ति दिखलाई गई थी, पर माँ - वापके सींग नहीं थे, न वन्दरोंवाली आकृति थी; इससे वादीका पक्ष कट गया । रामायणके हनुमानादि पात्र वानर रूपमें क्यों हुए, इस विषय में इस निबन्धके अन्तमें प्रकाश डाला जायगा । ( १६ ) ' आस्फोटयामास चुचुम्व पुच्छं, ननन्द, चिक्रीड, जगौ, जगाम । स्तम्भान् अरोहद्, निपपात भूमौ निदर्शयन् स्वां प्रकृति कपीनाम् ' ( सुन्दर. १०।५४ ) इस पद्यमें पूँछ फटकारने एवं चूमने, खम्भोंपर कूदकर चढ़ने, कूदने - फांदने, नीचे गिरने आदि क्रीडासे हनुमान्की वानरता दिखाई गई है । ' यहां यदि " कपीनां प्रकृतिं निदर्शयन् ' होता, तव भी कथश्चित हनुमानादिको मनुष्य कहा जा सकता; पर ‘ स्वां कपीनां प्रकृतिं निदर्शयन् ' यहां ' स्वां ( अपनी ) कपीनां प्रकृतिं ' शब्दसे उनका वानर होना अतीव स्पष्ट है । रामाभिरामने यहाँ लिखा है- ' आस्फोटपुच्छचुम्बनादि-र्जातिधर्मः । सर्वा अपि एताः चेष्टा उपांशु इति बोध्यम् । एवं-चेष्टायां हेतुः – स्वां कपीनां प्रकृतिं निदशेयन्निति ' अर्थात् यह सब Gujarat. An eGangotri Initiative

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२६ ] श्रीसनातनधर्मालांक ( ६ ) बन्दर - जातिके स्वाभाविक धर्म हैं, वही हनुमान कर रहा था । वनवासी मनुष्यों में यह बात स्वाभाविकतासे नहीं होती । हाँ, यदि शङ्ककोंको यहां वनमानुष विवक्षित हों; तब वे भी पशु ही होते हैं, वे मनुष्य कैसे हो सकते हैं? पहले श्लोकोंमें पूँछ का पर्यायवाचक ' लांगृल ' शब्द था; पर यहां साक्षात् ' पुच्छ ' शब्द है । क्या वादियोंने कहीं क्षत्रिय वा वनवासी मनुष्यों की पूँछ भी देखी है । इस पद्य में वानरोंकी स्वभावोक्ति दिखलाई गई है । यह उस समयका वर्णन है, जब हनुमानने मन्दोदरीको सीता समझा; और प्रसन्न होकर उक्त क्रीड़ा की । मनुष्यों में ऐसी स्वाभाविकता कभी नहीं होती । तब हनुमानादिको मनुष्य बताना ‘ वालुकाभित्ति ' है । ( १७ ) अन्य भेदक श्लोक देखिये - लङ्कामें हनुमान सीताके प्रथम मिलनेके समय सोचता है- ' हं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः । वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम् ' ( ५/३०/१७ ) । यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् । रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ' ( १८ ) ( यदि मैं वानर होकर मानुषी वारणी संस्कृतको ब्राह्मणकी तरह बोलने लग जाऊँगा, तो सीवा डर जायगी ) यदि हनुमान् सचमुच मनुष्य होते; तब मानुषी वाणी संस्कृत बोलनेसे उससे सीता डरती ही क्यों? हाँ, मनुष्यसे भिन्न बन्दर होनेसे फिर मानुषी भाषा संस्कृत होनेसे सीताको उससे डर हो सकता था कि - रावण ही कदाचित् ऐसा रूप बनाकर आया है । इसलिए हनुमान् मनुष्यसे CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ २० भिन्न वावर - योनिवाले सिद्ध हो गये । यहाँपर प्रतिपक्षी लोग ' यदि वाचं प्रदास्यामि ' यह १८ वां स पद्य तो देते हैं, पर ' अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषत: ' इस १७ वें पद्यकी – जिससे हनुमान की वानरता स्पष्ट प्रकट होती है, और सीताको उसी वानरका संस्कृत बोलनेसे डर जो उत्पन्न हो जाता है, वादी चोरी कर लेते हैं, जनताके सामने नहीं देते । यह उनके पक्षकी दुर्बलताका प्रबल प्रमाण है । वैसे तो by श वे हमसे पूर्व उदाहृत किये तथा आगे बताये जानेवाले को F5 ) लोकदृष्टिमें रखते नहीं, फिर अनुसन्धानमें आलसी लोग यदि she उनके पक्षके हामी बन जावें; यह सम्भव है, पर अनुसन्धान- ico ह दृष्टि वढ़ जाने पर वादियों का पक्ष जनदृष्टि में विश्वरत हो जायगा ॥ ह ( १८ ) अन्य स्पष्ट भेद देखिये - ' सीता हनुमान से पूछती है- र ' क्व ते रामेण संसर्गः कथं जानासि लक्ष्मणम् । वानराणां नराणां च कथमासीत् समागमः ' ( ५३५२ ) ( तेरा श्रीरामसे मेल कहां म हुआ? नर और वानरोंका मेल कैसे हुआ? इससे स्पष्ट है कि हनुमानादि नरोंसे भिन्न योनिवाले वानर थे । यदि हनुमान् न मनुष्य होते; तव सीताका यह प्रश्न असंगत था; क्योंकि- ( ६ वादियों के मतवाली क्षत्रिय वा वनवासी जाति भी तो नर होगी । क अथवा वनवासी होनेसे इस समय राम भी वादियों के अनुसार रा वानर कहे जाते; तब भेदक वाक्य कैसे? आजकलके दयानन्दी न टीकाकार हनुमानादिकी मनुष्यता सिद्ध करने के लिए रामायणकी क टीका में सर्वत्र ' वानर ' का ' वनवासी मनुष्य ' अर्थ करते हैं, यह Gujarat. An eGangotri Initiative

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२८ ] श्रीमनातनत्रलोक ( 8 ) सब वाल्मीकिसे विरुद्ध अकाण्ड - ताण्डव है । छलसे वे कब तक वां काम चलायेंगे? ' वानराणां नराणां च ' में भेदक ' च ' भी दोनोंके ' नर ' होनेपर व्यर्थ होता । इससे हनुमानादिकी मनुष्ययोनिसे इस भिन्न वानर योनि स्पष्ट सिद्ध हुई । ' नरवानरौ ' ( ४/७/२४ ) में हो द्विवचन भी दोनोंकी भिन्नताका साक्षी है । ( १६ ) अन्य देखिये - ' स्वप्नो मयाऽयं विकृतोऽय दृष्टः, तो शाखामृगः शास्त्रगणैर्निषिद्धः । ( ५ ३२६ ) सीता कहती है कि— मुझे आज शास्त्रनिषिद्ध शाखामृग ( बन्दर ) का सपना आया ि है- ( ५।३४।२२ ), तब यहाँ हनुमान स्पष्ट मनुष्य - भिन्न वानर सिद्ध R- हुए; क्योंकि - मनुष्यका स्वप्न शास्त्रनिषिद्ध नहीं । यह स्वप्न II हनुमानके विषयमें था । जागती हुई भी वह मूर्छामें स्वप्न समझ हैं- रही थी । यदि वह हनुमान् वानर न होता, किन्तु मनुष्य होता; गां तो सीता ' रूपांन्तरमुपागम्य स एवायं हि रावण: ' ( ५ | ३४ | १ ) हनु-मानके अन्य ( वानर ) रूपधारी रावणकी शङ्का न करती । ( २० ) अब और देखिये- ' तत्र तौ कार्तिसम्पन्नौ हरीश्वर -! नरेश्वरौं ( ५।३५।३२ ) ' नर - वानर राजानौ स तु वायुसुतः कपिः ' न् ( ६ | ३७ | १ ) यहाँ पर सुग्रीवको बन्दरोंका तथा श्रीरामको मनुष्यों-7-71! का राजा कहा है । अन्य स्पष्ट पद्य देखिये - ' मानुषो राघवो राजन्! सुग्रीवश्चं हरीश्वरः ' ( ५/५११२७ ) यदि रामायणकारको र नरवानरों की समान ही योनि इष्ट होती; तो ' नरेश्वरौ ' ही कहना पर्याप्त था; वा श्रीरामके भी वनवासी होनेसे दोनोंको की ' वानरेश्वरौ ' ही कहा जाता; परन्तु दोनोंको भिन्न - भिन्न कहने से ह CC - 0. Ankur Joshi हनुमानादि वानर नर थे? [ e Collection Gujarat. हनुमानादिकी मनुष्यसे भिन्न वानर - योनि सिद्ध हुई । इस प्रकारके भेदक पद्य रामायण में बहुत मात्रामें मिलते हैं । ( २१ ) ' वयं वनचरा राम! मृगाः ( पशवः ) मूलफलाशिनः । एषा प्रकृतिरस्माकं पुरुष ( मनुष्य ) स्त्वं नरेश्वर । ' ( ४/१७/३० ) यहाँ पर वाली वानर अपनेको पशु ( बन्दर ) तथा रामको मनुष्य कहकर दोनों की भिन्न योनि बता रहा हैं । तब नर-बानरोंकी भिन्नता सिद्ध हो ही गई । इसी प्रकार ' नहीयं हरिभि-र्लङ्का प्राप्तुं शक्या कथञ्चन । देवैरपि सगन्धर्वैः किं पुनर्नर - वानरः ' ( ६२०१२ ) सुग्रीवके प्रति रावणके इस सन्देसेसे नरों और वानरोंका भेद स्पष्ट है । इस प्रकारके पद्य बहुत मात्रामें मिलते हैं । ( २२ ) ' मानुषं धारयन् रूपमात्मनः शिखरे स्थितः । दुष्कृतं कृततान् कर्म त्वमिदं वानरोत्तम! ' ( ५ | १ | १०४ ) यह पर्वत -मान से कह रहा है कि मनुष्यरूप धारण करके ऐ बन्दर! तू ने यह बड़ा कठिन कार्य किया है । यदि हनुमान मनुष्य होते; तो उनको मनुष्यरूप धारण करनेकी क्या आवश्यकता थी? वे तो तव स्वतः ही मनुष्य थे । इससे स्पष्टतया वे वानर थे; तभी वानरका पर्वतके अनुसार मनुष्यरूप धारण करना कठिन था; इसी कारण उसका, सम्बोधन ' वानरोत्तम ' आया है । यदि कहा जावे कि - वे नागरिक पहनावा नहीं पहरते थे; इसलिए ' वानर ' कहे गये, यह भी व्यर्थ है; जब कि प्रतिपक्षी युक्त इतका वस्त्र पहनना, भूषण पहनना, सिरपर मुकुट

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३० ] श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) रखना, छत्र और चामर रखना, चाँदी - सोनेके पलंग रखना, नगर में रहना, पालकी पर चढ़ना, जूने पहनना आदि नागरिक पहरावा मानता है, तब उन्हें वानर क्यों कहा गया है? इससे स्पष्ट है कि वे मनुष्य नहीं थे । हां, वे आजकलके प्राकृत बन्दर भी नहीं थे; किन्तु देवयोनि से आये हुए विशेष शक्तिशाली, तथा मनुष्यों - जैसे व्यवहार करने वाले रूपमात्रमें वानर थे, जैसा कि प्रहस्तका हनुमान्को कहा हुआ वचन आगे उद्धृत किया जावेगा; और अन्तमें इसपर स्पष्टता भी की जाएगी । यदि यह सन्देह हो कि - वानर होकर हनुमानादि मनुष्य-की वाणी कैसे बोल सके; तो इसपर जानना चाहिये कि उक्त वचनमें पर्वतकी भी मनुष्यवाणी दिखलाई गई है; तव अप्राकृत ( दिव्य ) वानरमें यह असम्भव कैसे? वस्तुतः देवयोनि से सीधा वानरयोनिमें आने से उनमें अपनी देववाणी ( संस्कृत ) विस्मृत नहीं हो सकती थी । यदि कोई नट स्त्रीवेष बनाकर आ जावे; तो क्या उसकी पुरुषोंवाली शक्ति वा वाणी नष्ट हो जावेगी? विशेष प्रकाश इसपर अन्तमें डाला जावेगा । ( २३ ) जब हनुमान्ने रामके आनेका समाचार भरतको सुनाया; तव भरतने उसे कहा - ' कच्चिन्न खलु कापेयी सेव्यते चलचित्तता ' ( ६।१२६।२३ ) यहाँ पर भरतने भी हनुमान्की वानर-प्रकृति चल - चित्तता दिखलाकर उसे वन्दर बताया है । ' अहो! शाखामृगत्वं ते व्यक्तमेव प्लवङ्गम! लघुचित्ततयाऽऽत्मानं न स्थापयसि यो मतौ ' ( ४/२/१७ ) यहां पर रामको बाली समभ CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ १ कर उससे डरे हुए सुप्रीवको हनुमान् ' बन्दर ' बता रहा है । रावणने शुक्रको कहा था - ' कच्चिन्नाने कचित्तानां तेषां त्वं वशमागतः । ( ६।२४।२६ ) कि – तुम चञ्चलचित्त वालों ( बन्दरों ) से तो कहीं नहीं पकड़े गये? यहां स्वाभाविक प्रकृति बताकर रामके सैनिकोंको बन्दर बताया गया है 1 । मनुष्योंमें ऐसी स्वाभाविक प्रकृति नहीं होती कि उन्हें इस शब्दसे कहा जाय । प्रतिपक्षी कहां - कहां प्रक्षिप्तता मानेंगे? ( २४ ) ' मत्कृते हरिभिर्वीरैर्वृतो दन्तनखायुधैः ' ( सुन्दर. ३५।२५ ) सीता कह रही है । ' ऋक्ष - वानर- शार्दूलैर्न खदंष्ट्रायुधैरपि । कराग्र-श्चरणाग्रैश्च वानरैरुद्धतं रजः ' ( ६ | ४ | ५६ ) कवि कह रहा है । ' ई-ग्विधैस्तु हरिभिर्वृतो दन्तनखायुधः ' ( ५ | ४३ | २४ ) यह हनुमानकी वानरोंकेलिए उक्ति है । इन पद्योंमें वानरोंको नखायुध तथा दंष्ट्रायुध और फिर उन्हें वीर कहा है । ' नखैस्तुदन्तो दशनेंदंशन्तः तलैश्च पादैश्च समापयन्तः । मदात् कपिं ते कपयः ' ( ५ । ६११२४ ) । मनुष्य युद्धमें किसीको नाखूनोंसे नोच दें, वा दाढ़ोंसे फाड़ दें; और फिर वीर कहें जावें, यह सम्भव नहीं हो सकता । इससे उनकी निन्दा ही हो सकती है, प्रशंसा नहीं । युद्धके अवसर पर नाखूनोंसे किसीको नोचने और दाढ़ोंसे फाड़नेसे मनुष्य वीर नहीं कहे जाते । परन्तु पूर्व कहे पद्यमें तथा ' नखदंष्ट्रायुधान् वीरान्... वानरान् ' ( ५ | ३६ | ४६ ) यहांपर भी उन बन्दरोंको नखायुध, दंष्ट्रायुध कहकर वीर ( बहादुर ) बताया गया है । मनुष्यभिन्न वानरयोनि स्वीकार करनेपर तो उनका नख - दंष्ट्रायुधत्व स्वाभाविक Gujarat. An eGangotri Initiative