सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 121–130
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 121–130
पृष्ठ 121
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ २०७ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २०८ दी भी स्पष्ट कर दिवा कि - चतुर्थीकर्म में गर्भाधान नहीं होता; किन्तु चतुर्थी ऋतुकालके पञ्चमादि दिनोंमें होता है । उससे पूर्व तो दिन में तथा हवन होता है । येऽहनि ( ख ) अव श्रीगोभिलका मत भी देख लीजिये - वहाँ अर्थात् अथातश्चतुर्थीकर्म ' ( २ | ५ | १ ) कहकर उसे २१५२६ तक समाप्त कर दिया गया है । इसमें भी अन्य गृह्यसूत्रोंकी तरह श्रीगोभिलने भी होम ही बताया है । गर्भाधान तो ' यदर्तुमती भवति उपरत-हवन शोणिता, तदा सम्भवकाल: ' ( २५८ ) अन्य गृह्यसूत्रोंकी तरह ना भी ऋतकालमें ही कराया है । ‘ ऊर्ध्वं त्रिरात्रात् सम्भवः ' ( ७ ) का तो वसूत्र में गोभिलने खण्डन ही कर दिया है । यह गोभिलने कहकर वादीका भी खण्डन कर डाला है । तभी तो रजस्वलात्वके चौथे-) णिना इस ' पांचवें दिन गर्भाधान कराते हुए स्वा. द. जीने सं.वि. पृ. ३६ में ह्यसूत्र गोभिलीयगृह्यसूत्रका नाम भी लिखा है- यह हम पूर्व लिख चुके हैं । " विवाह रात्रि से तीन रात्रि व्यतीत कर चौथी रात्रिमें स्त्री-ले । प्रसङ्ग करे ” यह कई एक आचार्यों का मत है... किन्तु गोभिलाचार्य स्त्रियाः का यह स्वकीय मत नहीं हैं " वादीसे मान्य ठा ० उदयनारायण सिंह की इस भाषा से भी गोभिल द्वारा उक्त मत अननुमत एवं ना है;भी खण्डित हो गया । तब पथिकका पक्ष भी गोभिल आदि सभी कि- गृह्यसूत्रों द्वारा खण्डित हो गया । सामश्रमीजीका यहांका अर्थ निर्मूल है । इस विषय में हमने बहुत विस्तीर्ण मीमांसा कर दिन रखी है, उसे अन्यत्र बताया जायगा । श्रीसामश्रमीने यहाँ थापन मीने ' पुनः ऋतुमती भवति ' यह लिखकर यहाँ ' पुनः ' शब्दका स्पष्ट प्रक्षेप CC - 0. Ankur Joshi Collection: चतुर्थीकर्म गर्भाधानका ग्रङ्ग है? [ २०६ कर दिया है । वादी प्रमाण उनसे मांगे, जो उनने ' पुनः ' शब्द प्रक्षिप्त कर दिया । हमने बिना प्रमाण सामश्रमी तो प्रमाण दे दिये हैं । सनातनधर्मी नहीं थे । वे तो पौने आर्यसमाजी सुधारक थे । ' अनग्निका ' वा ' नग्निका ' पर धागे लिखा जायगा । ( ७ ) अव वादी आगे चले । यदि उसके अनुसार चौथे दिन ही गर्भाधानकी अनिवार्य विवाह के श्राज्ञा होती, तो गृह्यसूत्रकार छः रात, १२ रात, कई महीने वा एक वर्ष ब्रह्मचर्य रखनेकेलिए कैसे कहते? देखिये श्रीपारस्करने लिखा है- ' संवत्सरं न मिथुन-मुपेयाताम् ' ( १८२१ ) अपने वै. सि. मा. में वादी पथिकने पृ.३५ की पं. ८ में ' संवत्सर ' शब्दको बिन्दुओंमें छिपाकर आगे' न मिथुन-मुपेयातां द्वादशरात्र ' आदि लिख दिया । ' अर्थात् ' लिखकर अर्थ करते हुए भी पथिकने उसमें भी ' वारह रात्रि ' से पूर्व ' एक साल ' शब्द जान - बूझकर छिपा दिया, यह कितना छल है; और परस्पर-विरोध भी? वह लिखता है - ' शास्त्रीजीने पार. गृ. ११८२१ जो प्रमाण देकर ‘ वर्ष भर तक संयम करना ' लिखा है, परन्तु उसी कण्डिकासे यह बात खण्डित हो जाती है, यह कहकर उसने ‘ संवत्सर ' शब्द छिपाकर ‘ न मिथुनमुपेयातां आदि ' आगेका पाठ लिख दिया । जव उसी कण्डिकामें ' संवत्सरं न मिथुनमुपेयाताम् ' पारस्करने लिखा है; तव उसी कण्डिकामें ' सालके संयम ' का खण्डन कैसे हो गया? यहाँ तो पथिक ' वर्ष ' शब्द छिपा गया, पर फिर आगे अपने लेखमें उसे न छिपा सका । लिखता है-ujarat. An स eGangotri ० otri Initiative gi
पृष्ठ 122
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( C ) ' सूत्रकार १ वर्ष, १२ रात्रि, छः रात्रि अन्तमें ३ रात्रि तक संग न करनेका आदेश देता है ' । जब ऐसा पथिकका कथन है, तो ' वर्ष भर तक संयम करनेका खण्डन कैसे हो गया? बल्कि इससे बहुत स्पष्ट हो गया कि -विवाह के चौथे दिन गर्भाधान अनिवार्य पक्ष नहीं है, वल्कि उसमें गर्भाधान है ही नहीं । ( ख ) केवल पारस्करने ही नहीं, ' संवत्सरं वा एक ऋषिजयते ' ( ११८ । १२ ) यह आश्वलायनने भी वर्षका संयम लिखा है । कातीयगृह्यसूत्रकारने भी ' संवत्सरं न मिथुनमुपेयाताम् ' यही माना है? केवल इन तीनोंने ही नहीं, मानवगृह्यसूत्रकारने भी ‘ सवत्सरं ब्रह्मचर्यं चरतः ' ( १।१४ । १४ ) लिखकर यह माना है । ' अत ऊर्ध्व त्रिरात्रं तु द्वादशाह मथापि वा । शक्तिं वीक्ष्य तथाऽब्दं वा चरतां दम्पती व्रतम् ' यह संस्कारकौस्तुभमें शौनकने भी वर्षका व्रत माना है । इसी प्रकार वाराहगृह्यसूत्र में ' संवत्सरं ब्रह्मचर्यं चरतः ' ( १८ खंड ) यह सालके संयमका पक्ष माना है । विष्णुस्मृति में भी लिखा है- ' परिणीय तु षण्मासान् वत्सरं वा न संविशेत् ' ( १।२७ ) ' ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते पुत्रार्थी संविशेत् तदा ' ( १ । २८ ) यहां भी विवाह के बाद साल - छ: महीने संयम तथा फिर ऋऋतुकालमें स्त्रीगमन माना है । यही ' ऋतौ च संनिपातो द्वारेणानुव्रतम् ' ( २ | १ | १७ ) यह आपस्तम्बध. सू. तथा ' इति ऋतौ एकमेव संवेशने ' ( ११२२ ) यह जैमिनिग्र. में भी ऋतुकालमें ही संयोग माना है । वेद में भी ' ऋत्व्ये नाधमानाम् ' ( ऋ. १०।१८३ / २ ) कहकर स्त्रीको ऋतुकालमें पुरुषकी कामना कही है, चतुर्थीकर्म में CC - 0. Ankur Joshi Collection " चतुर्थीकर्म गर्भाधानका अङ्ग है? कहीं नहीं । जब ऐसा है, तो अनिवार्यता तो पीसी गई । ( ८ ) नी. ती. वि. ( पृ. ४२-४३ ) हिमाचलके गृहमें ही पार्वतीका ' चतु दिवसे प्राप्ते चतुर्थीकर्म विना खण्डित एव सः ' ( शिवपु. २१ वादीकी चतुर्थीक मेंमैथुन विव में पथिकने लिखा था- चतु ' शिवा ' गर्भाधान संस्कार किया स्वय था शुद्धितः । वभूव विधिवद् विवा के ) ( अर्थ - चतुर्थीकर्मकी गभ चौथा दिन आने पर विधिपूर्वक शिवने पार्वतीसे समागम किया शुद्धि । चौथे यहाँ वादीने ' चतुर्थीकर्म ' जो प्रथमान्त था, और ' शुद्धि खखि पृथक् था, दोनोंको षष्ठी - समास मानकर ' चतुर्थीकर्म की शुद्धि चतु यह अर्थ कर दिया । यह उसके संस्कृतका आचार्यत्व है, इसर उसे आगरा विश्वविद्यालयने दिया है । जब हमने ज्म पुणो नहीं इसपर लिखा कि- ' शिवपुराण के प्रतिपक्षि दत्त प्रमाण में हो चतुर्थीकर्म में समागम नहीं लिखा; वहाँ तो चौथा दिन प्र होने पर शुद्धतापूर्वक चतुर्थीकर्म विधिसे करना लिखा है, ए अश समागमका कुछ भी वर्णन नहीं, उसका तो कुमारखण्ड ( १ अ. ) पर वरन आया है, यहाँ नहीं; अतः यहां उसका उल्लेख प्रतिपक्षीक प्रतिप छल है, यह प्रतिप्रक्षीका पुराणकी उक्तिसे वलात्कार है, देता प्रमाण ' उष्ट्रलगुड ' न्याय से प्रतिपक्षी के मतके खण्डक है । चतुर्थी वर्णन ( पृ. ८६४ ) । तब हमारी इस बातसे लज्जित होकर पथिकने वै. सि.मा. ५३ है, इ ' चतुर्थे दिवसे प्राप्ते ' इस पुराणके पद्यका ठीक अर्थ किया किलिख ' चौथे दिन आने पर विधिपूर्वक चतुर्थीकर्म हुआ; जिसके न हो Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 123
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) [ २ २१२ ] खण्डित रहता है ' इसमें तो वादीके किये अर्थके अनुसार मैथुनक विवाह चतुर्थीकमको विवाहका अङ्ग बताया गया है, गर्भाधानका अङ्ग - शिवजीर नहीं । विवाह और गर्भाधान भिन्न - भिन्न संस्कार होते हैं । वादीने स्वयं लिखा है- ' चौथे दिन चतुर्थीकर्म हुआ, जिसके न होनेसे या वा घेवद् विवाह खण्डित रहता है ' । यह बिल्कुल ठीक है । यदि चतुर्थीकर्म की गर्भाधान - संस्कारका अङ्ग होता, तो वादी लिखता कि -विवाह के म शुदि चौथे दिन चतुर्थी कर्म हुआ, जिसके न होनेसे गर्भाधान संस्कार किया. खण्डित रहता है, पर ऐसा न लिखकर जो कि अर्थमें स्वयं उसने शुद्धिक की शुद्धि ' चतुर्थीकर्मके अभाव में विवाहका खण्डित होना ' माना है, इससे स्पष्ट सिद्ध हो गया कि - चतुर्थीकर्म में कहीं भी गर्भाधान नहीं होता, चतुर्थीकर्म तो विवाहका पूरक है, उससे स्त्री ' भार्या ' म पुत्रे में जाती है । दिन ( ख ) जो कि वादीने वहीं ' तत्रातिरमणीये च रत्नपर्यङ्क उत्तमे । न है व | श्रशयिष्ट मुद्दा युक्त: ' ( ५२/२५ ) यह पद्य देकर शिवजी का पलंग पर आनन्दपूर्वक शयन बताया है ', यह श्लोक तथा अर्थ ( १ अ. ) तिपक्षीक प्रतिपक्षीने अपनी पुस्तकके पाठकोंको धोखा देनेकेलिए रखा मालूम देता है कि- पाठक शिवजीका पलंग पर सोना देखकर यहाँ हैप चतुर्थी कर्म में शिवजी का समागम मान लें । यह पूर्व के अध्याय में वर्णन तो विवाहमे दूसरे दिनका है । तीसरे दिनका वर्णन अगले .सि.मा. ५३ श्रध्याय में २० वें पद्यमें है । चतुर्थे दिनका वर्णन ५३।२१ में किया कि है, इसमें कहीं भी समागम नहीं दिखलाया - यह हम पहले नहाँ • लिख चुके हैं । शिवजीका पाँचवें दिन रहनेका २३ वें पद्य में, फिर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. चतुर्थी कर्म गर्भाधानका श्रङ्ग है? [ २१३ बहुत दिन रहनेका ( ५३।२५ में ) वर्णन है, इनमें कहीं समागमकी गन्धमात्र भी नहीं है । देखिये यह पुराणकी उक्तिसे वादीका कितना वलात्कार है? ( ग ) जो कि वह प्यागे लिखता है-' सूत्रग्रन्थोंसे चतुर्थीकर्म में वर - वधूके साथ ससुरालमें ही संभोग करता है, अतः शिवजीने भी वही किया । चतुर्थीकर्म में समागमका स्पष्ट वर्णन हो गया, फिर शास्त्रीजीका ' यहाँ समागमका कुछ भी वर्णन नहीं ' यह लिखना अशुद्ध है ' । इस वाटीके कथनका स्वतः खण्डन होगया । हम पूर्व सिद्ध कर चुके हैं कि - चतुर्थीकर्म में तो उषाकालमें स्नान आदि करके हवन करना पड़ता है, जोकि विवाहकी पूर्त्यर्थ होता है । तो क्या मैथुन उषाकालमें स्नान करके होता है? यह है इन लोगोंके छलका हाल!!! पुराणमें भी शिवजीका समागम चतुर्थीकर्म में कहीं नहीं लिखा । वादी प्रत्यक्षमें भी अननुसन्धात्री जनताकी आँखों में धूल झोंक रहा है; उसको चेलेख है कि- शिवपुराण में चतुर्थीकर्ममें शिवजीका समागम दिखलावे! चतुर्थीकम गर्भ वा मैथुनका पर्यायवाचक नहीं; किन्तु वह विवाहका पूरक एक विशेष कम है । ( घ ) अव जो कि - वादीने आपस्तम्बगृ. का ' त्रिरात्रमुभयोरधः शय्या. शेषं समावेशने जपेत् ' यह प्रमाण दिया है, और उसमें पं ० भीमसेनशर्मा जीका अर्थ दिया है, कि- ' इत्यादि ऋचाओं-का समागमकालमें जप करे अर्थात् समागमसे पूर्व जपे ' । जब ऐसा है; तो यह समागमकालसे पूर्वका जप हुआ । इससे An eGangotri Initiative
पृष्ठ 124
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वादीकी क्या इष्ट - सिद्धि हुई? जो कि आगे उसने उनका यह वाक्य लिखा है ' दोनों का समागम इसी चतुर्थ रात्रिको अवश्य होना चाहिये, यह सूत्रकारके मूलपाठके किन शब्दों का अर्थ है-यह उन्हें प्रमाण मानने वाले वादीको बताना चाहिये । समागमका उनका भाव यह है कि दोनोंको सुलानेका नाटक खेलें । यहाँ सम्भोग नहीं बताया गया । स्वा. द. जीने रमाबाई को लिखा था- ' आपका प्रेमास्पद, धानन्दप्रद पत्र मिला । यदि प्राप इस समयके बीचमें आवेंगी, तो मेरा समागम होगा ' यहाँ स्वा.द. जीका रमावाईसे ' समागम ' वादी क्या मैथुन मान लेगा? यदि ऐसा है; तो वह स्वीकृति दे; तव हम भी स्वा. द. जीके तथाकथित शिष्य पं ० भीमसेनजी के वचनमें ' समागम ' में मैथुन अर्थ मान लेंगे । ( ङ ) महाशय! यह एक रस्मविशेष है, आजकल भी कहीं-कहीं विवाहों में सबके सामने यह रस्म पूरी की जाती हैं- यह मैथुन नहीं होता । ब्रह्मचारी रहकर आये हुए दम्पतियोंको जिनको इन विषयोंका ज्ञान सर्वथा नहीं होता, उन्हें इन बातों का ज्ञान करानेकेलिए यह नाटक उनसे कराये जाते हैं; खट्वा आदि पर सोना, तथा ' आरोह ऊरुम् ' आदि मौखिक बातें भी कहीं जाती हैं - यह रहस्य है । आपस्तम्बगृ. में ही वहीं लिखा है-' अन्यो वैनामभिमन्त्रयेत् ' ( ३ | ८ | ११ ) अर्थात् इस समावेशनमें दूसरा आदमी मन्त्र बोले । यदि यहाँ मैथुन होता, तो वधूके अभिमन्त्रणकेलिए दूसरेकी वधूके समीप कैसे स्थिति होती? क्या चतुर्थीकर्म गर्भाधानका प्रङ्ग है? २ के यहाँ मैथुन सबके सामने होता है? इससे आापस्तम्व मुनिको यहाँ पर दम्पतीका मैथुन इष्ट नहीं स्पष्ट, | वच पड़े हुए डण्डेको हटाना, तथा सुलानेका नाटक नह कराना यही इष्ट है । जैसे कि काठकगृ.सू. में लिखा मन्त्र कह है- 4 विशतः ' ( ३० | २ ) यहाँ देवपालने टीकाकी है - ' तो आ एकस्मिन् शयने भवतः ' । आदित्यशरणने भी लिखा है शयितौ भवतः । इस सुलानेके विवाहिता लड़की एक लड़का देते एषः ' ( अ. १४ | २ | नाटक खेला जाता घरसे हो पुत्रको वच नाटक में प्रबल प्रमाण यह है कि कब पतिके घरमें पहुँचती है, तब उसकी ' यदा हैं, और उस वधूको कहा जाता है-. २४ ) ( यह तेरा पुत्र है ); सो यह पुत्र ऋत है । तव क्या वादी इस लिंगको देखकर १३ ऋ पैदा करके लाने वाली लड़की का कि ( ३८ मानेगा? यदि ऐसा है, तब उसे वधाई है । वस्तुतः पूर्वोक्त व.. काल दिये हुए वचनमें ‘ समावेशन ' का अर्थ ' इकट्ठा लिटाना ' मा ' ऋतु ' मैथुन नहीं । जैसे कि - मरे हुएके साथ सती होने के लिए एवं ऋतुक विहित लिया जाता है, वहाँ ' बोधायनगृह्य पितृमेधसूत्र ' में लिखा," अनुस ‘ अथास्य [ मृतकस्य ] भार्याम् उपसंवेशयति ' इयं नारीति ' ( ' चतुर्थर १ । ८ । १ ) । अथर्व. सायणभाष्यमें भी कौशिकसूत्रके लिखा है - ' भार्यां प्रेतेन ( मृतेन ) यह संवेशयेत् ' ( १८ । ३ । १ ) । प्राष गृ.सू. में भी लिखा है - ' प्रेतं संवेशयन्ति उत्तरेण, उत्तर दिश संवेशयन्ति, ( ४ / २ / १५-१६ ) इन सभी स्थानों पर ' संवैशर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 125
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) से ' लिटाना ' अर्थ है, मैथुन नहीं । इस प्रकार पूर्वोक्त आपस्तम्ब-स्पष्ट वचनमें भी ‘ समावेशन’का अर्थ इकट्ठा लिटानामात्र है, मैथुन नहीं, नहीं, क्योंकि - मैथुन तो शास्त्रानुसार ऋतुकाल के चतुर्थ दिन रात्रिमें मन्त्र कहा है, विवाहके चतुर्थमें नहीं । विवाहमें ' राता ' ( ऋतुमती खा है- आगृ.सू. १/३/१२ ) का निषेध है । ' तौ ( च ) तब फिर प्रश्न है कि यदि आपस्तम्ब मुनिको पूर्वोक्त खा वचनमें गर्भाधान इष्ट नहीं; तब वे मुनि विवाहिताका गर्भाधान कि कब कराने हैं; इसपर उत्तर यह है - उसीके आगे यह पाठ है-उसकी ' यदा मलवद्वासाः स्यात् ' ( जब उस लड़कीका ऋतुकाल आवे ) ... ( ३ | ८ | १२ ) ' रजसः प्रादुर्भावात् स्नाताम् ( और ऋतुस्नान कर ले ) ता है-? ऋतुसमावेशने उत्तराभिः ( ' विष्णुर्योनिं कल्पयति- इत्यादिभिः देखकर द पुत्र १३ ऋग्भिः ) अभिमन्त्रयते ' ( तव निम्न मन्त्रोंसे ऋतु - गमन करे ) की काि ( ३८१३ ) इससे स्पष्ट है कि - आपस्तम्बमुनिको भी विवाह ऋतु-कालसे पूर्व ही इष्ट है; और जब अपने समयमें विवाहिताका र्वो ऋतु आवे; तभी मैथुन इष्ट है, तब लड़की का विवाह स्पष्ट ही नाम ऋतुकालसे पूर्व सिद्ध हुआ । सो मैथुन विवाहकी चतुर्थरात्रिमें एप विहित न होकर चतुर्थी कर्म में तो हवनमात्र तथा आपस्तम्बके में लिखा ', अनुसार दोनोंका शयनका अभिनयमात्र, और मैथुन ऋतुकालके ति ' ( चतुर्थरात्रिके पश्चात् जैसा कि - आपस्तम्बने अपने केशर - ' यदा च मलवद् - वासाः स्यात् ( ३ | ८ | १२ ) गृह्यसूत्रमें ' चतुर्थीप्रभृति कहा ३१ ) | प्रा षोडशोमुत्तरामुत्तरां युग्मां प्रजानिःश्रेयसम् उत्तरतः प्रदिशन्ति ( ३ | ६ | १ ) स्त्री की योग्यतामें सिद्ध हुआ ऋतुगमने इत्यु-' संवेशर । इससे वादी-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. चतुर्थी कर्म गर्भाधानका प्रद्ध है? [ २१० का पक्ष छिन्न - भिन्न हो गया । श्रापस्तम्बगृह्यसूत्र कृष्णयजुर्वेदका है । वादीका सम्प्रदाय कृष्णयजुर्वेदको वेद नहीं मानता उसके गृह्यसूत्रको वह वैदिक कैसे मानता है? हमने तो यहाँकी ; तव वास्तविकता बता दी है । ( ६ ) अव ' त्रिरात्रमन्ततः ' का भाव बताया जाता है, वह यह है कि- पारस्करमुनि कहते हैं कि दम्पति साल तक ब्रह्मचारी रहें । यदि न रह सकें; तो बारह रात तक रहें, फिर भी सम्भव न हो, तो छः रात ब्रह्मचारी रहें । यदि छः रात तक भी ब्रह्मचारी न रह सकें, तो अन्तमें तीन रात्रि तक तो अवश्य ब्रह्मचारी रहें । क्योंकि - चतुर्थीकर्म से पूर्व तक वह पूर्ण भार्या ही नही होती । तब उसमें पतिका अधिकार नहीं हो सकता । ब्रह्मचारीका भाव यह है कि - ब्रह्मचर्यमें खाट पर सोना नहीं पड़ता, संयम रखना पड़ता है, इत्यादि नियम होते हैं । फिर चतुर्थीकम करके पांचवें दिनसे दोनों खाट पर सोया करें । इसीकी स्पष्टता भाष्यकारोंने की है । उसमें जयरामने लिखा है- ' संवत्सरादिपक्षाऽशक्तौ त्रिरात्रपक्षाश्रयणेपि चतुर्थीकर्मानन्तरं पञ्चम्यादिरात्रौ अभिगमनम् । चतुर्थीकर्मणः प्राक् तस्या भार्यात्वमेव नोत्पन्नम् । विवाहैकदेशत्वा-चतुर्थीकर्मणः ' ( १ | ८ | २१ ) अर्थात् चतुर्थीकर्म विवाहका अङ्ग है । चतुर्थी कर्म से पूर्व तो वह पूरी स्त्री ( भार्या ) भी नहीं होती; अतः उसमें पुरुषका कोई अधिकार नहीं होता । जब त्रिरात्र पक्ष ब्रह्मचर्यका माना जावे; तो चौथे दिन उषाकालमें चतुर्थीकर्म करके फिर उसके बाद पाँचवीं रात्रिसे पतिका उसपर अधिकार An eGangotri Initiative
पृष्ठ 126
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१८ ] श्रीसनातनधर्मालक ( १ ) चतुर्थी कर्म गर्भाधानका अङ्ग है? [ t २ हो जाता है । कितना स्पष्ट है? ( ख ) यही हरिहरने लिखा है- ' संवत्सरं वर्षे यावद् मिथुनम् अभिगमनं नो गच्छे ताम् । अथवा द्वादशरात्रम्, अथवा षड्रात्रं, यद्वा त्रिरात्रम्, अन्ततः सवत्सरादि - पक्षारणामन्ते त्रिरात्रम् ।... संवत्सरादिपक्षाऽशक्तौ त्रिरात्रपक्षाश्रयणेपि चतुर्थीकर्मान्तरं पञ्चम्यादिरात्रौ अभिगमनं, चतुर्थीकरण. प्राक् तस्या भार्यात्वमेव न संवृत्तम्, विवाहैकदेशत्वाच्चतुर्थीकर्मणः ' । इससे चतुर्थीकर्म में वादी से इष्ट गर्भाधान पारस्कर, गोभिल आदि स्वा. द. के मान्य गृह्यसूत्रोंसे ही खण्डित हो गया । सो वह चतुर्थीकर्मके बाद जब स्त्रीका ऋतुकाल आवे, तब उसकी योग्यता एवं इच्छा तथा स्वास्थ्यादि देखकर ऋतुकाल देना पड़ता है; अतः अनिवार्य नहीं होता । तब इससे वादीके पक्षकी कुछ भी सिद्धि नहीं । राग - प्राप्तकी विधि कभी हो भी नहीं सकती । तभी तो वादी के स्वामीने भी लिखा है- ' यदि चौथे दिवस कोई अड़चल आवे; तो अधिक दिन ब्रह्मचयं ब्रामें दृढ रहकर जिस दिन दोनोंकी इच्छा हो, और गर्भाधानकी रात्रि [ ऋतुका चतुर्थदिन ] भी हो; उसी रात्रिमें यथाविधि गर्भाधान करें ( सं.वि.प्र. १६६ ) इससे विवाहके चतुर्थ दिन गर्भाधानकी वादिसम्मत अनिवार्यता खण्डित हो गई । नग्निका अनग्निका । ( १० ) अव नग्निका अनग्निका विषय पर विचार दिया जाता है । हमने गोभिलगृह्यका ' नग्निका तु श्रेष्ठा ' यह पाठ दिया CC - 0. Ankur Joshi Collection था; वादी इस पर हमारा छल - कपट यह कहकर लिखता है २ ‘ आापने यहाँ पाठभेद कर दिया है । इन्होंने यह समझा होगा यह कि – पाठकोंके सामने तो मूलग्रन्थ होगा नहीं; अतः मूर्खोणं ५१ मेरा प्रमाण मान्य हो जायगा ' । पर वादीने इस विषय काल ऊहापोहपूर्वक अनुसन्धान नहीं किया मालूम होता, केवल उस सामश्रमीवाले गोभिलगृह्यपर विश्वास करके ' अनग्निका तु श्रेष्ठा ' पाठ यह पाठ उसने लिख दिया, और हम पर आक्षेप भी कर दिया । १६० पर यह उस बेचारेको पता नहीं कि - सामश्रमीजीने ही गाँ उध पाठ वदल दिया । वे एशियाटिक सोसायटीमें काम करते थे, श्री कुत उन पाश्र्चात्योंके अनुसार ही विवाह विषयक विचार - धारा रखने पं. ६ ) थे, उन्होंने ' नग्निका'के साथ ' अ ' जोड़कर जघन्य पाप किया है ' नग्निव । जो अक्षम्य है । अन्य स्थान भी उनने परिवर्तन किया है । व्याख्य उनने पहले ‘ यदर्तुमती भवति ' इस गोभिलपाठके अर्थ के अवसर ( ३४६ पर मूलमें ' पुनः ' शब्द न होनेपर भी प्रथमें ' पुनः ' शब्दका १७ प्रक्षेप कर दिया - यह हम पहले कह चुके हैं । इससे सामश्रमी - लेखा M जीकी उनके विना कोष्टक लगाये प्रक्षेप करनेकी तथा पाठ हकर २० प बदलनेकी प्रकृति स्पष्ट हो रही हैं । उन्हीका अन्धाधुन रजाम अनुसरण करनेवाला वादी भी अन्धेरेमें है । इस विषयमें हर कर्मक उपपत्तियाँ देते हैं- वाक १ ठा. उदयनारायण वाले गोभिलगृ. प्र. ८४ की टिप्पणीमें गोभि ‘ मातुरसपिण्डनग्निका तु श्रेष्ठा ' यहाँ ' नग्निका ' पाठ है; यह नग्निक प्रत्यक्ष है | सामश्रमीजीने उसे ही ' अनग्निका श्रेष्ठा ' कर दिया! Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 127
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ २१६ २२० । श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २ श्री चन्द्रकान्ततर्कालङ्कारके भाष्य वाले गोभिलगृहह्मसूत्रमें त्र हो यदी पाठ है- वग्निका तु श्रेष्ठा ' ( ३ | ४ | ६ ) देखो उक्त पुस्तकका भी ५११ वाँ पृष्ठ । ३ ' बिबाहकालविमर्श ' ( जो मैलापुर संस्कृत-विषय कालेजसे प्रकाशित है, जो आर्यसमाजी ध. दे. जीसे भी मान्य है ) केवल उसकी प्रमाणपट्टिकामें भी ' नग्निका तु श्रेष्ठा ' गोभिलका यही तुपाठ है । ४ ' प्रिंसिपल आफ हिन्दु ला ' ( जी. सी. घोष कलकत्ता - दिया । - १६०३ ) की पुस्तक में भी ' नग्निका तु श्रेष्ठा ' यही गोभिलका पाठ यहाँ उधृत किया गया है । ५ ' श्री ' पत्रिका के सम्पादक आर्यसमाजी करते थे, श्री कुलभूषणजी डी. पी. एच. ( लण्डन ) ने भी ' श्री ' ( १।३ पृ. ६ रा रखते पं. ६ ) में ' श्रुतिस्मृत्योर्वैभवम् ' इस अपने लेखमें गोभिलका कया है ' नग्निका तु श्रेष्ठा ' यही पाठ दिया है । ६ म. म. श्रीमुकुन्दशर्मासे कया है । व्याख्यात काशीमुद्रित ' गोभिलगृ. ' में भी ' नम्निका तु श्रेष्ठा ' अवसर ( ३ । ४ । ६ ) यही पाठ है । ७ गोभिलपुत्रकृत ' गृह्यासंग्रह ७ लो. ) की अवतरणिका में ' ( २ प्रपा. शब्दका श्रीचन्द्रकान्त तर्कालङ्कार भट्टाचार्यने मश्रमी - M लेखा है- ' नग्निका तु श्रेष्ठा ' इति सूत्रोक्तां नग्निकां व्याकुरुते " हकर वहां ' नग्निका ' यही पाठ ' यह या पाठ माना है । गृह्यासंग्रह के * २० पद्य के भाष्य में भी श्रीचन्द्रकान्त तकालङ्कारने न्धाधुन्य लिखा है— रजाम् - अरजस्काम् । तद् ईदृशीं कन्यामभिप्रेत्य यह कर्मकादपि भावे तिङ् छान्दसः प्रशस्यते वाक्यशेषः ) प्रशंसा क्रियते, ' श्राचार्येण '. टिप्पणी । तथा च गोभिलसूत्रम् -'नग्निका तु श्रेष्ठा गोभिलग्र के उक्त सूत्र पर श्रीचन्द्रकान्तका ' इति । यह नग्निका इति अनागतार्तवा भाष्य इस प्रकार र दिया । उच्यते, सा तु श्रेष्ठा, अतस्ता-CC - 0. Ankur Joshi + Collection Gujarat. चतुर्थीकर्म गर्भाधानका प्रङ्ग है? [ २२१ मुद्वहेत् ।... ' तस्मान्नग्निका दातव्या इति वसिष्ठः । १० गोभिलकी अन्तः साक्षी भी ' नग्निका ' पाठ में है; तभी तो उसने ' ऊर्ध्वं त्रिरात्रात् सम्भवः ' इत्येके ' ( २५७ ) इस मतका ' यदा ऋतुमती भवति, तदा सम्भवकालः ' ( गो. २८ ) यह कहकर खण्डन कर दिया । यदि गोभिलके मतमें ' आगतार्तवा ' ( अनग्निका ) का विवाह होता; तब ' ऊर्ध्वं त्रिरात्रात् ' इस मतके खण्डनकी तथा ' यदा ऋतुमती भवति ' यहाँ ' यदा ' लिखनेकी आवश्यकता भी नहीं थी ॥ इसलिए इस सूत्रकी व्याख्यामें मूल में न कहा हुआ भी ' पुनः ' शब्द सामश्रमी जी ने उस व्याख्यामें अपनी कपोल-कल्पनासे प्रक्षिप्त कर दिया । उस मतका खण्डन सिद्ध कर रहा है कि - गोभिलको ' अनागतार्तवा ' का विवाह इष्ट है, इसलिए वहाँ ' नग्निका ' यही पाठ गोभिलका है । ११ इस प्रकार ( मानवगृह्यसूत्र ( ११७/८ ) में भी लिखा है-' बन्धुमतीं कन्यामस्पृष्टमैथुनामुपयच्छेत नग्निका श्रेष्ठाम् ' यहां भी अनागतार्तवाका विवाह बताया है । १२-१३ प्रदानं प्राग्ऋतोः ' ( २।६।२१ ) यहाँ पर गौतम - धर्मसूत्रमें भी ऋतुकालसे पूर्व ही विवाह माना है । यहाँ पर मिताक्षरा टीकामें भी हरदत्त लिखते हैं— ' ऋतुदर्शनात् प्रागेव देया कन्या ' । ' अप्रयच्छन दोषी ' ( २२ ) यहाँ मिताक्षरामें लिखा है- ' तस्मिन् काले [ ऋतुकालात् प्राग् ] अप्रयच्छन् पित्रादिर्दोषवान् भवति । अत्र याज्ञवल्क्यः-‘ अप्रयच्छन् समाप्नोति भ्रूणहत्यामृतौ ऋतौ ' । १४ इसलिए हिरण्य-केशी. में भी ' भार्यामुपयच्छेत सजातां नग्निकां ' ( १६ | ६ | १ ) यहाँ An eGangotri Initiative
पृष्ठ 128
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) २२२ ] विवाह माना है । १५ वैखानसगृह्यसूत्रमें भी यही नग्निकाका.. नग्निकां कन्यां वरयित्वा ' ( ३ । २ ) । कहा है - ' मातुरसपिण्डां ' यह ' उद्वाहृतत्त्व ' में स्थित निर्णय-१६ ‘ भार्यां विन्देत नग्निकाम् सिन्धु, धर्मसिन्धुसे उद्धृ त महाभारतके वचनमें भी नग्निकाका बताया है । १७ महाभारतमें भी लिखा है - त्रिंशद्वर्षो विवाह भार्या विन्देत नग्निवाम् ' ( अनुशासनपर्व ४४ | १४ ) यहां दशवर्षा भी ‘ नग्निकाम् ' है । वसिष्ठधर्मसूत्रमें भी लिखा है- ' प्रयच्छेन्नग्निकां पिता । ऋतुमत्यां हि तिष्ठन्त्यां दोषः पितर-कन्यामृतुकालभयात् मृच्छति ' ( १७ | ६२-६१-६३ ) । १६ वोधायन धर्मसूत्रमें भी कहा है-गुणवते कन्यां नग्निकां ब्रह्मचारिणे ' ( ४ | १ | १२ ) । २० यदि ' दद्याद् ' अनग्निका ' ही पाठ होता; और उसका अर्थ गोभिलमें ' ऋऋतुमती ' होता, तो गोभिलका वचन भी समय - समय पर देनेवाले वादी के स्वामी दयानन्द जी ' अनग्निका तु श्रेष्ठा ' यह गोभिलका पाठ अवश्य उद्धृत करते; पर स्वामीने गोभिलका ' नग्निका ' पाठ देखा; उसमें अपने पक्षकी हानि देखकर उस भयसे उसे छिपा लिया । यह तो हमारे पक्षमें प्रबल उपपत्ति है, जो पथिकके पक्ष को कभी उठने नहीं दे सकती । इन वीस प्रबल उपपत्तियोंसे यह स्पष्ट हो गया कि गोभिलगृह्यसूत्रमें ' नग्निका तु श्रेष्ठा ' पाठ था । किसी भी शास्त्रकारने ऋतुमती के विवाहको श्रेष्ठ प्रमाणित नहीं किया; अतः ' नग्निका तु श्रेष्ठा ' यह पाठ कभी अन्य शास्त्रोंसे विरुद्ध हो ही नहीं सकता । प्रमाण इस विषयमें इतने हैं कि उनको देखते - देखते CC - 0. Ankur Joshi Collection चतुर्थीकर्म गर्भाधानका अङ्ग है? [ २ ९ ' पथिक ' चक्कर खाकर अपना दयानन्दी रास्ता भी: भूल इसलिए स्पष्ट है कि - संशोधन के बहानेसे ऋतुमती जायपा विवादों अथ पक्षपाती श्रीसामश्रमीजीने ही ' मातुरसपिण्डानग्निका इस पाठको बदलकर ' अनग्निका ' यह पाठ कर तु श्रेष्ठ वह डाला वस्तुतः पाठका परिवर्तन ठीक नहीं; उन्हें अपनी स्वतन्त्र सम्म हो देनी चाहिये थी । इससे सिद्ध है कि - गोभिलगृ. में प्राचीन है । ' नग्निका ' ही है, जो पारिभाषिक है । यदि कहीं ' अनग्निका ' लिख भी मिले, तो वहां यह व्यवस्था है कि यहाँ ' अनग्निका ' सर के यौगिक है । ' नग्निका ' वस्त्रपरिधानाभावेपि लज्जाशुत लड़क ( बो.ध.सू. ४ | १ | १२ ) की व्याख्या में गोविन्द स्वामीने लिसा किसी ' योन्यादीन् नावगूहेत तावद् भवति नग्निका ' ( वायुपुराण ) अवस प्रकार की अवस्था जन्मसे लेकर ७-८ वर्ष तक होती है । शान्त बाद उसे लज्जा शुरू हो जाती है, और १२ वें वर्ष में तो उसे न रहने पर बड़ी लज्जा हो जाती है; यह काम सञ्चारका चिह्नाथ. में होता है । वही यौगिकरूपमें अनग्निका होती है । इसलिए अनुस वाससः प्रतिपत्तेरित्येके ' ( २/६/२३ ) इस गौतमधर्मसूत्र में मिताई लड़कि में लिखा है- ‘ एके मन्यन्ते - यदा कन्या वासः प्रतिपद्यते, श्राप्त ह गई लज्जते, तावदेव प्रदेया ' । इसलिए जहाँ ' अनग्निका ' आवे कार जैमिनिगृह्यसूत्र के व्याख्याकार श्रीनिवासाध्वरीके ' अनमि " यस्मिन् वयसि स्वयमेव लज्जया वासः परिदधाति, तद्वव कि ( १।२० ) इस कथनके अनुसार ऋतुकालसे पूर्वकी अवस्था यासि फलित होती है । श्रीसामश्रमी ने भी दवी लेखनीसे यह Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 129
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) जायगा है - ' यावच्च नग्ना उलङ्गापि विचरितुं शक्नुयात् सा नग्निका ' यह विवाह अर्थ किया है । इसका अर्थ वादीने भी किया है कि- जब ' तक का तु श्रेष्ट वह उल्लंग भावसे नंगी खेल करनेमें लज्जित न होवे उसे , कर डाला नग्निका कहते हैं, ( पृ. ३३ ) सो उससे भिन्न ' अनग्निका ' त्रसम्म हो जावेगी । सो वैसी अवस्था ११-१२ वर्षकी प्रतिफलित होती नाचीन है । जो कि श्रीसामश्रमीजी ने अनग्निकाका ऋतुमती भी अर्थ उनका लिखा है ' सो ऋतुमतीत्व १२ सालके वाद कन्याका सुश्रुत आदि निकाह के अनुसार शुरू होता है; तो फिर उन्हें भी १२-१३ वर्षकी नब्जाशून लड़कीका विवाह मानना पड़ेगा; क्योंकि ऋतुकाल १७-२४ वर्षमें लिखा किसी भी देशमें शुरू नहीं होता । और वही ऋतुकालकी राण ) अवस्था उन्हें यौवन की माननी पड़ेगी । ' भक्षितेषि लशुने न है । शान्तो व्याधिः ' – इससे वादीको कुछ भी लाभ नहीं पड़ा । उसे ( ११ ) ला. लाजपतराय -प्रणीत ' दुखी भारत ' पुस्तकके २३५ वि. में अमेरिकाके जज लिण्डसेकी बनाई हुई पुस्तकके ४१ पृ. के लिए अनुसार लिखा है कि ' हमने अनुसन्धान किया है कि -३१३ मिता २६५ लड़कियां ११-१२ वर्षकी श्रायुमें यौवनावस्थाको न्धते, प्राप्त हो गई थीं । इनमें भी अधिकांश १२ वर्षकी आधुमैं ही युवति आवे; गई । ३१३ बालिकाओंको यदि दो दलों में वांटें; तो २८५ इस अनमित्र कार की होंगी, जो ११-१२ - ९ ३ वर्षकी श्रायुमें ही योवना हो गई तद्ववस केवल २८ ऐसी होंगी, जिन्होंने १४-१५ वर्षोंमें ही यौवन चस्था • प्त किया ' । जब यह शीतल देशका हाल है; तो यहांके उष्णदेशमें यह म या सिनेमा के प्रचार वाले देशमें तो लड़कियोंका यौवनइससे CC - 0. Ankur Joshi Collection darat. चतुर्थी कर्म गर्भाधानका अङ्ग है? [ º भी पहले होगा; तव यौवनविवाह - पक्षपाती सामश्रमी तथा उसकी बात माननेवाले वादीको भी अपनी प्रतिज्ञानुसार ११-१२ वर्षकी लड़कियोंका विवाह मानना पड़ेगा; तब ' भक्षिनेपि लशुने न शान्तो व्याधिः ' के अनुसार वादीका पक्ष विच्छिन्न हो गया । हमने तो यह विषय ५०० पृष्ठोंमें लिख रखा है । पर विस्तारवश यहां सव नहीं लिख सकते । वेदमें भी यही संकेत उपलब्ध होता है ' ऋत्व्ये नावमानाम् ' ( ऋ. १०११८३२ ) इत्यादि । शेष रहे वादीके ऋतुमती विवाहके संस्कार- कौस्तुभके तथाकथित दो श्लोक, अब उसपर भी लिखकर हम यह चर्चा समाप्त करेंगे । ( १२ ) ' ऋतुमती कन्याके विवाह में कुछ अन्य प्रमाण ' शीर्षक देकर वादी संस्कार- कौस्तुभका ' पिता ॠतून स्वपुत्र्याश्चि गरणयेद् ऋादितः सुधीः । दिनावधिगृहे यत्नात् पालयेच्च रजोवतीम् ' ( प्र.२१ ) यह वचन लिखकर अर्थ लिखता है - ' पिता अपनी कन्या के ऋतुको आदिसे ही गिने । जितने ऋतुपर्यन्त कन्याको घरमें पालने का विधान है - उतनी वार जब कन्या ऋतुमती होजाय, फिर कन्या का विवाह करे । ' वादियोंको जन्मसे ही छलकी घुट्टी उनके सम्प्रदायके स्वामीने पिला दी है । यह लोग जिस पुस्तकका प्रमाण देते हैं; उसका पूर्वापर छिपाते हुए भी लज्जित नहीं होते । इन्होंने यही समझ रखा होगा कि पाठकोंके सामने मूल पुस्तक ' संस्कार - कौस्तुभ ' तो होगा नहीं; श्रतः मूर्खोमें हमारा प्रमाण मान्य हो जावेगा । पथिक नहीं सोचता दि-इसकी पोल खुलने पर विद्वानोंमें हमारा कितना उपहास होगा ' An eGangotri Initiative
पृष्ठ 130
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ( वै.सि.मा.पृ.३३ ) पर इनको लज्जा कहाँ? यह प्रमाण वादीने कट्टर आर्यसमाजी स्वा ० विश्वेश्वरानन्दजी के बनाये ' पुरुषार्थप्रकाश ' के पृ. १४५ - १४६ से उनपर विश्वास करके लिया है । जब उन स्वामीने इस श्लोकका पूर्वापर छिपाया; सुश्रुतके कन्याविवाहविषयक पाठको बदला; तब यह उनका अनुयायी भी क्यों न छिपावे? वादीसे पूछना चाहिये कि - ' जितने ऋतुपर्यन्त कन्याको घरमें पालनेका विधान है, उतनी वार जब कन्या ऋतुमती होजाय, फिर कन्याका विवाह करे ' यह वादीने ' संस्कार कौस्तुभ ' के उक्त पद्यके किन पदोंका अर्थ किया है? हम उसे चैलेंज करते हैं; वह उक्त लोकके वे पद इस पद्यमें दिखलावे । यदि वादी कहे कि उक्त पद्यके अग्रिम श्लाकमें है; तो वादी उसे भी उद्धृत करे; पर वादी ऐसा नहीं कर सकेगा । अब हम इस पद्यकी व्यवस्था तथा अग्रिम लोक घताते हैं, पाठक उसे देखें । यह आश्वलायनका वचन है, यह वहां विवाहसे पूर्व आपत्कालादि परिस्थितिवश कन्याके रजो-दर्शन होजानेपर प्रायश्चित्तका वचन कहा है कि पिता जब विशेष परिस्थितिवश ऋतुकालसे पूर्व कन्यादान न कर सके, तो उसके विवाहतक जितने ऋतु होजावें, तो उनकी संख्या गिनता चला जावे, और उस रजोवतीका पूरा संरक्षण करे कि कहीं किसीसे जुड़ न जावे । क्योंकि - रजस्वलात्वमें ' उशती ' हो जानेसे वैसा सम्भव हो जाता है; फिर जव योग्य वर मिल जावे; तब उससे विवाह करे; और उस रजस्वलाके घर में रखनेके प्रायश्चित्तस्वरूप CC - 0. Ankur Joshi Collection चतुर्थीकर्म गर्भाधानका श्रङ्ग है? [ २ उतनी संख्या की गौत्रोंका दान करे । इस बातका प्रतिपाद वहांका आगेका पद्य ' यह है— ' दद्यात् तदृतुसंख्या गाः शक्तः कन्यापिता यदि । दातव् ग कापि च यत्नेन दाने तस्या यथाविधि । यदि पितामें प्रायश्चित्त a उतने ( ऋतुकाल - इतने ) गोदानकी शक्ति न हो, तो आश्वलाय उसके लिए अनुकल्प बताते हैं कि यदि वह उतनी गौ व दान न कर सके, तो एक ही गायका दान प्रयत्न से करे । अ क यदि अतिनिर्धन व्यक्ति हो, तो उसके अनुपातके अनुसा प रुपयेका एवं अन्नादिका ब्राह्मणोंको दान देकर वरको कन्या दे श जैसे कि - ' दद्याद् वा ब्राह्मणेष्वन्नम् अतिनिःस्वः ( अतिनिर्धर सदक्षिणम् । तदतीतर्तुसंख्येषु वराय प्रतिपादयेत् ' । श्रव कन्या क लिए तीन दिनका प्रायश्चित्तस्वरूप उपवास बताते हैं, ' उपोष त्रिदिनं कन्या रात्रौ पीत्वा गवां पयः ' । प्रायश्चित्तस्वरूप लड़की व भी रत्नभूषण दिलाते हैं - ' अदृष्टरजसे दद्यात् कन्यायै रू ति भूषणम् ' । अब पतिका भी प्रायश्चित्त बताते हैं- ' तामु वरश्चापि कूष्माण्डैर्जुहुयाद् घृतम् ' । इससे पूर्व पिता ह पर प्रायश्चित्तका संकल्प करता है -... जनितप्रत्यवायपरिहार वि श्रीपरमेश्वर - प्रीत्यर्थं प्रतिसंस्कारमर्द्धकृच्छ्रप्रायश्चित्तं तत्प्रत्याम व यगोनिष्क्रयीभूतयथाशक्तिरजतदानेन अहमाचरिष्यामि ' । अ पाठकोंने देख लिया कि यह लोग पूर्वापर छिपा पा अनुसन्धान न करनेवालोंकी आंखों में धूल झोंका करते ' क सो सनातनधर्म में कोई पिता यदि विशेष परिस्थितिवश ( गुण अ Gujarat. An eGangotri Initiative