सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 111–120

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 111–120

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[ in १८८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) दृष्टिकोण ' पोडशवर्षा पत्नीमावहेत् ' यही पाठ कन्या विवाह विषयमें पूर्व इ स्वामीजी के समय होता, तब स्वा.द.जी स.प्र. वा ' संस्कारविधि ' सम्मत पर वा ऋग्वेदादिभाष्यभू. में, वा अन्यत्र कहीं उस पाठको अपने नीने ग्रन्थमें अवश्य उद्धृत करते । परन्तु उन्होंने उसे कहीं भी उद्धृत नहीं किया । इससे स्पष्ट है कि उन्हें ' षोडशवर्षा पत्नीमयावहेत् ' को स्वं यह पाठ सुश्रुतमें प्राप्त नहीं हुआ; किन्तु ' द्वादशवर्षा ' ही पाठ 7 सुश्रु ओ मिला, उसे अपने पक्ष से विरुद्ध होनेसे उन्होंने नहीं लिया । षोडश जब स्वामीजीने अपना यह नवीन पक्ष १६ वर्षकी लड़की । इससे विवाहका प्रकाशित किया था, तब उन्हें इस प्रकारके प्रमाणों चान की अत्यन्त आवश्यकता थी । तब वे ' षोडशवर्षां पत्नी मावहेत् ' कार पर वाले प्रमाणको कामधेनु मानकर अवश्य उधृत करते, परन्तु उन्होंने उधृत नहीं किया, किंतु गर्भाधान के लोकोद्धरणमात्रसे यून से ही संतोष कर लिया; इससे स्पष्ट है कि - सुश्रुतमें ' द्वादशवर्षा यह लिस्नी मावहेत् ' यही पाठ था, और अपने पक्षकी हानिके भयसे ती उन्होंने उसे उद्धृत नहीं किया । न नहीं ( ख ) अवशिष्ट प्रश्न यह रह जाता है कि सुश्रुतमें स्वामी-को ' द्वादशवर्षा पत्नीमावहेत् ' यह पाठ मिला, ' षोडशवर्षां ' जिससे इ हीं । तो स्वामीजीने फिर यह संस्कारविधि में वैसे लिख डाला न क- ' अब देखिये " विवाह और गर्भाधान का समय न्यून से के विर न १६ वर्षकी कन्या और २५ वर्षका पुरुष अवश्य होवे ', यह खते हैं, ( गर्भाधानप्र. पृष्ठ ३२ ) इस प्रश्न पर हम रहस्य बताते वशतिव यहाँ पर स्वामीजी को गर्भाधानका तो ' ऊनषोडशवर्षांयां ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. सुश्रुतमें कन्या विवाहावस्था [ १८६ पद्य इष्ट था; वह उन्होंने इस वाक्यके पूर्व उद्धृत कर ही दिया । उसमें १६-२५ वर्षके पुरुषका संयोग प्रत्यक्ष ही है । शेष जो स्वामीजीने विवाह के लिए भी स्त्री - पुरुषकी १६-२५ वर्षकी आयु लिखी है, उसके लिए उन्हें ' अथास्मै पञ्चविंशति-वर्षाय षोडशवर्षां पत्नीमावहेत् ' यही सुश्रुतवचन इष्ट है'-यह कल्पना ठीक नहीं । ' अव देखिये कि सुश्रुतकार... विवाह और गर्भाधानका समय न्यूनसे न्यून १६ वर्षकी कन्या और २५ वर्षका पुरुष अवश्य होवे यह लिखते हैं । स्वा. दयानन्दजी के ' अब देखिये ' इस वाक्यसे सिद्ध हो रहा है कि उन्होंने इसी स्थानमें १६–२५ वर्षमें विवाह और गर्भाधान बतानेवाले सुश्रुतके वचन उद्धृत कर दिये हैं । सो सोलह - पच्चीस वर्षमें गर्भाधान बताने वाला वचन तो उन्होंने सुश्रुतका ' ऊनपोडशवर्षायाम् ' दिया है, शेष विवाहका १६-२५ वर्ष बतानेवाला सुश्रुत - वचन स्वामीजीने यहाँ पर कौन - सां दिया है- यह द्रष्टव्य है । वह है-इससे पूर्वका ' पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ' यह सुश्रुत-वचन । इसीको स्वामीजीने १६-२५ वर्षके स्त्री - पुरुषोंका विवाह बतानेमें यहाँ प्रयुक्त किया है । केवल यहाँ क्या; अपनी सभी पुस्तकोंमें स्वामीजीने जहाँ भी १६-२५ वर्षके स्त्री - पुरुषोंका विवाह प्रस्तुत किया है; वहीं सर्वत्र ' पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ' यही सुश्रुत-वचन उधृत किया है । शारीरस्थानके ' ऊनषोडशवर्षायां ' इस गर्भाधान प्रतिपादक पद्यको उद्धृत करके १६-२५ वर्षके स्त्री-An eGangotri Initiative

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१६० ] श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) पुरुषोंके विवाहके साधनार्थ उसके साथके शारीरस्थानके वचनको उद्धृत न करके उससे बहुत दूरके सूत्रस्थान के ' पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ' ( ३५।१३ ) इस वचनको वार - बार उधृत करना, उसमें विवाह - प्रकरण न होने पर भी उसे स्त्री - पुरुषोंके विवाहमें बलात् जोड़ना स्पष्ट सिद्ध कर रहा है कि- स्वामीजी को शारीर - स्थानका स्त्री - पुरुषोंके विवाहका बतानेवाला सुश्रुत-वचन ' अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय द्वादशवर्षा पत्नीमावहेत् ' इस रूप में मिला था । उससे उन्होंने अपने पक्षकी हानि देखकर अपने सव ग्रन्थोंमें ' पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ' उसी सुश्रुतके वचनको ही स्त्री - पुरुषोंके विवाह विषयमें बलात् योजित करके श्रात्म - सन्तोष कर लिया । ( ग ) इसीलिए स.प्र. के प्रथम - संस्करण ५१ पृष्ठमें स्वा. द. जीने इस विषय में बहुत स्पष्टता कर दी है । वहाँ ' पञ्चविशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे । समत्वागतवीर्यौ तौ ' यह सुश्रुत - वचन उद्धृत करके लिखा है- ' यह सुश्रुतका वचन है, इसका यह अर्थ है कि -१६ वर्षंसे न्यून कन्याका विवाह कभी न करना चाहिए, और २५ वर्षसे न्यून पुरुषों का भी विवाह न करना चाहिये ( ३ समु. ) । इसी प्रकार प्रथम संस्कार - विधिमें भी स्वामीजी ने ' पञ्चविंशे ततो वर्षे ' इस पद्यको ही १६-२५ वर्षोंकी विवाहावस्था सिद्ध करने के -लिए उद्धृत किया है । उनके वहाँके यह शब्द हैं— ' न्यून - से न्यून १६ वर्षकी स्त्री और २५ वर्ष तकका पुरुष, इससे शीघ्र विवाह न करना, इसमें सुश्रुतका प्रमाण... ' पञ्चविंशे ततो वर्षे CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत कन्या विवाहावस्था १६ पुमान् नारी तु षोडशे ' ( गृहाश्रम - संस्कार १२० पृष्ठ ) । विवाहावस्था - साधनमें बार - बार जो कि स्वामीनार स्पष्ट ' पञ्चविंशे ततो वर्षे ' इस सूत्रस्थानके वचनको दिया है- स्था पञ्चविंशतिवर्षाय षोडशवर्षा पत्नी मावहेत् ' शारीर ' अव स्थानका पेट वचन स्वामीजीने कही भी उद्धृत नहीं किया, इससे तो इस चलन ' पि ही स्पष्ट हो जाता है कि - वामीजी के समय में ' अथारमै पञ्चविशी वर्षाय द्वादशवर्षां पत्नीमावहेत् ' यही सुश्रुतका शारीर - स्थानः ' ' बो पाठ था । तब उनके पीछे के स्वा. विश्वेश्वरानन्दजी ने जो कि जा ‘ षोडशवर्षां पत्नीमावहेत् ' यह पाठ दिया है, इससे स्पष्ट है कि स्वा. विश्वे. जीने ही यही पाठ स्वयं प्रक्षिप्त किया है । वत ( घ ) शारीर - स्थानमें ' अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षांय द्वादशक हो पत्नीमावहेत् ' यही पाठ था, इसमें वृद्ध - वाग्भटकी भी साई है है । वृद्ध वाग्भटके समय सुश्रुतसं. में २५ वर्षके पुरुषका १२ धर वाली स्त्री के साथ विवाह तथा ' ऊनषोडशवर्षायाम प्राप्तः प सो विंशतिम् ' इस वचनमें १६ वर्षकी स्त्री तथा २५ वर्षके पुरुष कर गर्भाधान वर्णित था । वृद्ध - वाग्भटने इसके समीकरण केल दि ' पुमानेक - विंशतिवर्षः कन्यां द्वादशवर्षदेशीय मुद्वहेत् ' इस वि वचनमें २१ वर्षके पुरुषका १२ वर्षीया लड़की के साथ विक आदिष्ट किया । फिर ' तस्यां षोडशवर्षायां पञ्चविंशतिवर्षः पुरु पुत्रार्थं यतेत, तदा हि तौ प्राप्तवीर्यौ वीर्यान्वितमपत्यं जनवड दे उस अपने वचनमें उन्होंने १२ - २१ वर्षके स्त्री - पुरुषोंका ४ साल मा बाद १६ - २५ वर्षमें गर्भाधान के लिए आदेश दिया है । इस क Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) to १ ९ २ ] कि वृद्ध वाग्भटके समय में भी ' सुश्रुत संहिता ' के शारीर-स्वामी क स्पष्ट है वचनमें ' द्वादशवर्षां पत्नी मावहेत् ' यही पाठ था । स्थानस्थ उक्त है- ' अवा ( ङ ) जो कि यह कहा जाता है कि - ' अथास्मै- “ पत्नीमावहेत् ’ नका पाठके आगे सुश्रुत - संहितामें विवाहका प्रयोजन ही तो अत्यन ' इस पित्र्यधर्मार्थकामप्रजाः प्राप्स्यति ' यह लिखा है, यह बात पञ्चविंशः ' घोडशवर्षा पत्नी मावहेत् ' इस पाठमें तो सम्वन्धित होती है, -स्थान द्वादशवर्षा पत्नीमावहेत् ' इस पाठ में नहीं । इस पर यह जो कि जानना चाहिये कि – ' पित्र्यधर्मार्थकामप्रजाः प्राप्स्यति ' इस = पष्ट है कि सुश्रुत - वचन में ' प्राप्स्यति ' यह भविष्यत् काल है । तब विवाह के वर्तमानकालमें प्रजाप्राप्ति इष्ट नहीं । १६ वर्षकी लड़कीका विवाह द्वादशक होनेपर भी प्रजा भविष्यत् कालमें होगी, तत्काल कैसे हो सकती भी सा है? ' प्रजायते इति प्रजा ' उत्पन्न हुई सन्तानको ' प्रजा ' कहते हैं । का १२ धर्म तो १२ वर्षकी लड़कीके विवाह में प्रत्यक्ष है, क्योंकि— प्राप्तः प सोलह वर्षकी अवस्था में उसके ऋतुमती होनेसे उसका विवाह के पुरा करनेसे अधर्म ही होता है । शास्त्रोंमें ऋतुकाल वाली लड़कीके के विवाह होने के बहुतसे दोष सूचित किये गये हैं । इसके अतिरिक्त इस विवाह में कन्याका दान हुआ करता है । दान शुद्ध वस्तुका हुआ थ विवाह करता है । ऋतुमती हो जाने पर उसकी शुद्धता नहीं रहती । वर्ष: पु उक्त वाक्यका यह अर्थ है कि - पुरुषको १२ वर्षीय लड़की जनवर देने पर पितृ - ऋणका निर्यातन होगा, धर्म, अर्थ, कामकी १४ साली प्राप्ति होगी और प्रजाकी प्राप्ति होगी । इससे हमारे पक्षकी है । इस कोई हानि नहीं होती । ' प्राप्स्यति ' यह भविष्यत् काल है । CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुतमें कन्या विवाहावस्था [ १६३ १२ वर्षमें भी ऋतुमतीके अनन्तर कामकी इस विषय में हम ' देश - दर्शन ' ' दुखी प्राप्ति हो सकती है । चुके हैं । ऋतुकालमें भारत ' आदिके उद्धरण दे ही ' जायेव पत्ये उशती सुवासाः ' ( ऋ.सं १० | ७१ | ४ ) स्त्रीका कामवती होना वेद तथा है । ' नरकामां... विद्याद् ऋतुमतीमिति आयुर्वेद के अनुकूल ' ( शारीर. ३७१८ ) यह सुश्रुतका ही वचन है- ' स्वायां तनू ऋत्व्ये नाघमानाम् ' ( ऋ.सं. १० | १८३ | २ ) इस वेद - वचनका अर्थ आर्यसमाजी श्रीनरदेवजी शास्त्रीने अपने ' ऋग्वेदालोचन विद्वान् ' के २७० पृष्ठमें ' ऋतुकालमें तूं पतिकी इच्छा करती है, यह किया है । ' ता अब्रु वन - ऋतौ प्रजां विन्दाम है ' ( वसिष्ठघर्मसूत्र श ८ ) कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय - संहिता २/५/१५ ) ' रजस्वला तु या नारी विशुद्धा पन्चमे दिने । पीडिता कामवाणेन ततः पुरुषमीहते ' ( शाक्तानन्द - तरङ्गिणी ) ' यदा भवति संसर्ग ऋतुकाले ' ( चरक-संहिता शारीरस्थान ३ | २ ) ' एतेन धर्मेण ऋतौ तौ सन्निपातयेत् ' ( मानवगृह्यसूत्र १ | १४ | २० ) इन सब प्रमाणों में ऋतुकालमें गमन कहा है । आयुर्वेद में ऋतुकाल ' तद् वर्षाद् द्वादशाद् ऊर्ध्वं याति पञ्चाशतः क्षयम् ' ( सुश्रुत सूत्रस्थान १४।६ ) १२ वर्षके बाद कहा है । तब सुश्रुतका ' अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय द्वादशवर्षां पत्नी-मावहेत् ' ( शारीर. १०/५३ ) इस वचनसे १२ वर्षकी लड़कीका विवाह कहना सब दृष्टियोंसे सङ्गत ही है । ( १६ ) इन निबन्धोंसे वै. सि. मा. में लिखे पथिकके लेखका Gujarat. Aedog Initiative

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१६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) निराकरण हो गया । हमने ' ऊनद्वादशवर्षायां ' तथा ' द्वादशवर्षा पत्नीमावहेत् ' इन सुश्रुतके पाठोंकी युक्तता ऊहापोहके साथ बता दी है । यह ऊहापोह वादीको श्रीमिश्रजी, वा श्रीशास्त्रीजी तथा श्रीकविरत्नजीकी पुस्तकोंमें नहीं मिलेगा । हमारा इस विषयमें शास्त्रार्थ एक सिद्धान्तालङ्कारसे ' श्री ' ( सन् १ ९ ३५ ) में हो चुका है । हमने सुश्रुत चरक दोनों अच्छी तरह देख रखे हैं । ' आयुर्वेदे सनातनधर्मः ' आदि हमारे बहुतसे लेख २५-३० वर्ष पूर्व ' संस्कृतम् ' पत्रमें निकल चुके हैं; उस समय पथिक कदाचित् अपनी वाल्यावस्था बिता रहा हो; तब उस पर चोरीका दोषारोपण करना प्रतिपक्षी अपनी स्वयं चोरीकी प्रकृतिको प्रमाणित कर रहा है । सुश्रुतसंहिता ( निर्णयसागर प्रेस बम्बई मुद्रित, श्रीयादवजी त्रिकम सम्पादित प्रथम - द्वितीय ) संस्करणकी टिप्पणीमें भी यही पाठ था, और वैवाहिकसूत्रके तो मूलमें ही सब संस्करणोंमें ' द्वादशवर्षा ' वाला ही पाठ था । तृतीय संस्करणमें किसीने प्रक्षेप करके वहाँ ' द्वादश ' के स्थान ' षोडश ' पाठ कर डाला । " चोर चोरी करते हुए मोरी भी साथ छोड़ जाता है । " यह कहावत यहाँ पर भी घटी । ' द्वादश ' के स्थान ' षोडश ' पाठ नवीन संशोधकने कर तो डाला, पर उसकी साक्षीरूपमें ' दश ' शब्द बना रहा, जिसे वहींसे ‘ षोडशदशवर्षा पत्नीमावहेत् ' ( पृ. ३६ ) पथिकने भी वही उधृत कर दिया । ' द्वादश ' के ' द्वा ' के स्थान ' षोडश ' कर दिया; CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत में कन्या विवाहावस्था [ ११ १ I I और ' द्वादश ' का शेष ' दश ' शब्द हत्यासे वच गया । श्रमते का चतुर्थ संस्करण में अर्वाचीनसंस्कर्ता उस ' दश ' शब्दकी था भी ' क हत्या कर डालेगा । अव वहीं ' दशवर्षा ' भी लिखा है, तो: क्या अब पथिक अपनी प्रमाणित पुस्तकसे दशवर्षचाली लड़कीका १६ भी विवाह मानेगा या नहीं? स्व जब उक्त प्रतिसंस्कर्ताने भी टिप्पणी में बहुत - सी हस्तलिि " ताव पुस्तकोंका पाठ ‘ ऊनद्वादशवर्षायां ' माना है, चौखम्भा वालेमें में गया बाल ‘ ऊनद्वादशवर्षायां ’ पाठान्तर दिखलाया है, यह स्वयं वादी अपने अर्थ दिये उद्धरण ( वै.सि.मा. ) में देख ले; तव हमारा पक्ष सिद्ध हो है । गया । जब कि स्वयं सुश्रुत ' तस्माद् अत्यन्त बालायां गर्भाधार जिन न कारयेत् ' यह कहकर ' ऊनद्वादशवर्षाया ' पाठकी साक्षी देख पाठा है, क्योंकि - ' ऊनद्वादशवर्षा ' केलिए तो ' अत्यन्त - वाला ' कहाजा न्तर सकता है, ' ऊनषोडशवर्षां ' के लिए ' अत्यन्त - वाला ' कभी नहीं कहा बा लड़क सकता । इसका प्रत्युत्तर न तो प्रतिवादीने वै. सि. मा. में दिग श्रीस हो और न अब कभी दे सकता है । अन्य कारण भी हमने लिखनहीं ही दिये हैं; तब उसे वाणीमात्रसे ' अमान्य ' कह देना पथिकसी छोटी ' साम्प्रदायिक परवशता ' बता रहा है । संयो वैवाहिक सूत्र में तो ' द्वादशवर्षा ' ही पाठ था । यदि उस आयु ' षोडशवर्षां ' पाठ होता, तो अपने पक्षकी सिद्धिके लिए स्वा. द. जी से विधि जाये उद्धृत करते । पर नहीं किया । अतः स्पष्ट है कि आजकल, ' चतुर्थ नवीन मत वाले लोग अपने मतानुसार परिवर्तन एवं प्रदे जाता करनेमें लगे हुए हैं । ' ऊनषोडशवर्षायां ' वाला पाठ अवश Gujarat. An eGangotri Initiative

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१६६ ] श्री सनातनधर्मालोक ( e ) काफी समय से परिवर्तित हुआ हुआ है; पर मूलमें ऐसा नहीं अगले था, ऐसा हम पूर्वं लेखमें ऊहापोह पूर्वक सिद्ध कर ही चुके हैं । ' कामं च यौवने ' यह वात्स्यायनकामसूत्र भी हमसे विरुद्ध नहीं क्या है; यह तो प्रतिपक्षी के विरुद्ध है, क्योंकि - प्रतिपक्षी ( ३८ पृष्ठमें ) ड़की १६ वर्षकी कन्याका सम्भोगकाल वताता है, और ( ४२ पृष्ठमें ) स्वप्रमाणित हारीत सं. ( शारीर ) से ' षोडशवार्षिकं यावत् बाल्यं -तावत् प्रवर्तते ' वचनसे १६ वर्षको बाल्यावस्था बताता है, वाल्यावस्था में सम्भोग कराता हुआ वह स्वयं भी खण्डित हो लैमें भी गया । ' कामसूत्र ' में ' राकां वर्जयेत् ' यह लिखा है । ' राकां ' का अपने अर्थ उसकी टीकामें ' जातरजसं, रजसा क्षतयोनित्वात् ' लिखा सिद्ध है । तव ' कामसूत्र ' में भी वैवाहिक आयु हमसे कही स्पष्ट है । गर्भाधार हम अग्रिम निवन्धमें बतानेवाले हैं कि - छोटी आयु में जिनका विवाह हुआ; उनकी संतानोंमें क्या लाभ - हानि पहुँची । दे रहा पाठक उस निबन्धको मनोयोगसे देखें । ' प्रत्यक्षे किं प्रमाणा-कहाजा न्तरेण ' इस न्यायको याद रखें । इससे यह सिद्ध होगया कि-कहा लड़कीका ऋतुकालसे पूर्व वारहवें वर्ष में विवाह शास्त्रीय है । दिया श्रीसीताका विवाह अवश्य छः वर्षमें हुआ; पर वह अमैथुनयोनि लिख होने से १२ वर्ष जैसी थी । गर्भाधानका वहाँ कोई प्रसङ्ग नहीं; नहीं तो वह वनवाससे पूर्वही कई बच्चोंकी माँ बन बैठती । थिक छोटी आयु में विवाहिताका यदि शारीरिक योग्यता होने पर संयोग हो; इसमें हमारा कोई ' ननु नच ' नहीं । न संयोगकी आयु निश्चित की जा सकती है । मैथुन राग - प्राप्त होनेसे उसमें जी विधि कभी नहीं वन सकती, इस विषय में कभी फिर लिखा ज जायेगा । अव कथित निबन्ध शुरू करनेसे पूर्व वादीकी ' चतुर्थी - कर्म ' विषयक आपत्तियोंका समाधान प्रसङ्गवश किया जाता है । अवघ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ( ७ ) चतुर्थीकर्म गर्भाधानका ग्रङ्ग है या विवाहका? ( आपत्तियों का निरास ) ( १ ) प्रौढ़ा - विवाहके प्रमाण देते हुए वादीने लिखा था-‘ यदि आपके मतमें बालविवाह उचित है, तो प्रश्न उठता है कि-कन्याके साथ चतुर्थीकर्म कैसे होगा, विवाहके बाद ही चतुर्थीकर्मकी विधि है ' ( नी. क्षी.वि. ) । इसपर हम ७ म पुष्पमें लिख चुके हैं कि - चतुर्थीकर्म में कहीं भी गर्भाधानका विधान नहीं है; वह कर्म तो स्नानादि करके ब्राह्ममुहूर्त में करना पड़ता है । उसमें हवनमात्र होता है, गर्भाधान नहीं । वाढ़ी के स्वा.द.जोने अपनी संस्कारविधि पारस्करगृह्यसूत्रके श्राश्रय-से लिखी है; उसी वादिप्रतिवादिमान्य पा.गु. में चतुर्थीकर्मके विषय में लिखा है - ' चतुर्थ्यामपररात्रे अभ्यन्तरोऽग्निमुपसमाधाय ' इत्यादि ( १ | ११ | १ ) में चतुर्थीकर्म ' अपररात्र ' में करना लिखा है । ' अपररात्रे'-का विग्रह है - ‘ रात्रेः अपरः ' यहाँपर ' पूर्वापराधरोत्तर ' ( पा.२ / २ / १ ) इस सूत्र से एकदेशी षष्ठी तत्पुरुष होता है, और ' अहः सर्वैकदेश ' ( पा. ५४८७ ) इससे एकदेशमें ' अच् ' प्रत्यय करनेपर ' अपररात्र ' शब्द बनता है, इसका अर्थ है- ' रात्रिका पिछला पहरे । रात्रिका पिछला पहर ' ब्राह्ममुहूर्त ' होता है । इसी ' अपररात्रे ' का हरिहरने ' रात्रेः पश्चिमे यामे ' अर्थ किया है; और गदाधरने तथा श्री-वेणीरामजी गौड़ने ' अन्तिम प्रहरे ' अर्थ लिखकर अन्य भी स्पष्ट कर दिया है । श्रीविश्वनाथने भी ' चतुर्थ्यां रात्रौ रात्रेरपरभागे, यद्वा चतुर्थीतिथिसम्बन्धिरात्र्यपरभागे ' लिखकर यही भाव रखा An eGangotri Initiative

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१६८ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( १ ) है, बल्कि उसने चौथे दिनकी बात हटाकर चतुर्थी तिथिका नाम ' ( वह जब भी हो ) लिखा है । ' आपस्तम्बगृ ' में भी ' तं ( दण्डं ) चतुर्थ्यापररात्रे उत्तराभ्यामुत्थाप्य ' ( ६।३।१० ) ' अपररात्र ' शब्द ही है, जिसका अर्थ हम बता चुके हैं । चतुर्थीकर्म उस समय करना पड़ता है, तो क्या उस प्रातःके समय स्नानादि करके मैथुन करना शास्त्रीय हो सकता है? कभी नहीं । वह तो दिनका भाग होता है । ( २ ) वादी के स्वा. द. जी प्रथम संस्कारविधि में १० पृष्ठमें लिखते हैं- ' जब - जब गर्भाधान करें; तब - तब इसी रीतिसे और रात्रिके मध्यभागमें करें, अर्थात् रात्रीके दश बजेके पीछे; जब तक दो बजे, यही गर्भस्थापनका समय है ' । अव वही गर्भाधान प्रातः के चार - पाँच बजेके चतुर्थीकर्म में कैसे हो सकता है? आजकलकी सं.वि. में भी गर्भाधानमें स्वामीने टिप्पणी दी है-' दिनमें ऋतुदानका निषेध है ' ( पृ. ३५ ) ' गर्भाधान क्रियाका समय प्रहर रात्रिके गये पश्चात् प्रहर रात्रि रहे तक है ' ( ४४ ) यहाँ भी यही भाव हैं; क्योंकि -स्वामी के अनुसार गर्भाधानमें पिछला पहर तो छोड़ देना पड़ता है, यही ' प्रहर रात्रि रहे तक ' का तात्पर्य है । पिछला पहर दिनका अङ्ग होता है, इसलिए संस्कृत - कोषोंमें रात्रिको ' त्रियामा ' कहते हैं, पिछला पहर रात्रिका अङ्ग नहीं होता, किन्तु दिनका ही । सो यह चतुर्थीकर्म तो प्रातः चार - पाँच बजे शुरू होता है । उसमें स्नानादि करके अग्निके उपसमाधानसे शुरू करके आज्यभाग पर्यन्त करके फिर जया - होमादि परिषे-CC - 0. Ankur Joshi Collection चतुर्थीकर्म गर्भावानका अङ्ग है? [ १५ २०० चनान्त करके उस समयकी विशेष आहुतियाँ देनी पड़ती हैं प्रातःकाल तैयार होता है । उस समय ' प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति, कहै । इ दिवा रत्या संयुज्यन्ते ' ( प्रश्नोप, १ | १३ ) ' परस्त्रीपु दिवा तथ यावज्जीवं [ ब्रह्मचर्यम् ] ' ( बोधायनगृह्यपरि. १ | ११ | १ ) इन शास्त्र, मैथुन स्वाद वचनोंसे रतिका निषेध है । निरुक्तमें भी ' उषा उच्छतीति शके उसके अपरः कालः ' ( २।१८।४ ) । रात्रिके अपर ( पश्चिम ) भागको उपाकात जाकर माना है । आपस्तम्बधर्मसूत्रकी व्याख्या में श्रीहरदत्त मिश्रनेमें किया ' पश्चिमे यामे ' यही अर्थ किया है । सकता ( ३ ) चतुर्थीकर्ममें तो स्नानादि करके ' अग्ने! प्राय शाख वायो! प्रायश्चित्ते ' आदि आहुतियाँ देनी पड़ती हैं । गर्भाधार है, विक उस समय नहीं होता । चतुर्थीकर्म तो विवाहका श्रङ्ग होता है र्भाधा गर्भाधानका नहीं यह अवश्य याद रख लेना चाहिये । इसलिगादि आपस्तम्बधर्मसूत्र ( २ | १ | १ ) के भाष्य में श्री हरदत्तने कहा है न गृह ‘ चतुर्थीकर्मान्तो विवाहः ’ । इसीलिए पारस्करगृह्य में भी ' चतुषहोता ह। कर्म'को श्रीकर्काचार्यने ' विवाहशेषोऽयमुच्यते ' ( १ | ११ | १ ) | हीं सो विवाहका शेष भाग कहा है । श्री जयरामने भी यहीं ' अथ विहोगा ( शेषः कथ्यते ' यही कहा है । श्रीगदाधरने भी ' चतुर्थीकर्मणे गभ विवाहाङ्गत्वाद् ' यही कहा है । सो यह चतुर्थीकर्म पारस्करगृहेतुकाल १ । ११ । १ ९ से शुरू होकर १ । ११ । ५ तक समाप्त हो जाता है । इसीलि तुर्थ र १ । ११ । ६ में श्रीगदाधरने लिखा है- ' समाप्तं चतुर्थीकर्म ' । पदार्थमाप्ति क्रममें उसने ‘ चतुर्थीकर्म करिष्ये ' का संकल्प भी लिखा है; क्रिया गर्भाधान उसने कहीं नहीं लिखा; किन्तु इसके बाद पृथक् ही नितुकास्त Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) [ १ ९ ५२०० ] है, तर है इसी प्रकार विश्वनाथने भी १ | ११ | ५ तक लिखा है- ' इति दन्तिरे चर्थीकर्म । ' । सो स्नान करके एवं हवन करके भला उषाकाल में दिवान कैसे शास्त्रीय हो सकता है, यह वादी कभी नहीं सोचते । नशास्त्र, वा. द. जीने गर्भाधान संस्कारमें जो हवनादि कर्त्तव्य बताया है, ति उसके बाद गर्भाधान नहीं बताया, किन्तु वह कार्य करके रात्रिमें उपाका जाकर गर्भाधान बताया है । इस तरह चतुर्थीकर्म जो उषाकालमें मने किया जाता है, उसके हवनादिके सकता है; क्या वादियोंको इतना भी यति शास्त्र - निषिद्ध है । चतुर्थीकर्म तो नामधार है, विवाहकी पूर्ति उसीमें होती है होता गर्भाधानका विधान कहीं भी सिद्ध इसलिए होगा कि - पाठकोंके सामने गृह्यसूत्र कहा है न गृह्यसूत्रोंके नामसे लिख दूँगा बाद गर्भाधान कैसे हो ज्ञान नहीं है? प्रातः मैथुन स्त्रीके भार्यात्वकेलिए होता । तब विवाह के चौथे दिन न हुआ । वादीने समझा तो पड़े होंगे नहीं, तब मैं कि चतुर्थीकर्म में गर्भाधान ' चतुषहोता है, अतः मूर्खोंमें मेरा कथन मान्य हो जायगा । उसने यह १११ ) हीं सोचा कि इसकी पोल खुलने पर विद्वानों में कितना उपहास विवेगा ( ' त्वदीयं वस्तु... तुभ्यमेव ' ) । चकर्म गर्भाधान अथवा स्त्रीगमनका विधान तो गृह्यसूत्रोंमें स्कर टतुकालके चौथे - पाँचवें दिन की किसी रात्रिको होता है; विवाहकी इसीलिए तुर्थं रात्रिको नहीं । तभी उसी पारस्करगृह्यसूत्र में जब चतुर्थीकर्मकी | पदार्थमाप्ति ११११५ तक होगई; तब १ | ११ | ६-७ से गर्भाधान की है; क्रिया बताई गई है । उसे चतुर्थीकर्मवाले दिन न बताकर ही कालके नियत दिन में बताया गया है । CC - 0. Ankur Joshi चतुर्थी कर्म गर्भाधानका प्रङ्ग है? [ २०१ ( ४ ) जो कि वादी कहता है कि- ' तामुदुह्य यथर्तु प्रवेशनम् ' ( १ | ११ | ७ ) में ' चतुर्थीकर्मकी चर्चा ' है ' यह कहना जनताको ठगना है । यह तो चतुर्थी कर्मकी समाप्ति के बादका सूत्र है, इसका अर्थ यह है कि - ' तां वधूम् उदुह्य - विवाद्दाङ्गेन चतुर्थीकर्मणा भार्यां सम्पाद्य तत ऋतुकाले स्त्रीगमनं कुर्यात् ' । इसपर कर्कने लिखा है-' सा अनेन प्रकारेण ऊढा भवति ' ( वह चतुर्थीकर्मसे ' पूर्ण विवाहिता ' हो जाती है । ) ' ताम् ऊढवा ऋतो ऋतौ अभिगमनं ' कुर्यात् ' । इससे स्पष्ट हो गया कि - स्त्रीका अभिगमन चतुर्थीकर्म में सर्वथा नहीं होता; किन्तु चतुर्थीकर्मसे तो स्त्रीका विवाह पूर्ण होता है । अभिगमन उसका ऋतुकालमें होता है । बात भी ठीक है । शास्त्रकार रजखलाका विवाह तो बताते नहीं कि - विवाह के चौथे दिन स्त्रीका ऋतु स्नान करने पर ऋतु-काल हो जाये; और इसीलिए उसका अभिगमन हो जाए, बल्कि - ' ऋतुकालाभिगामी स्यात् ' ( मनु. ३।४५ ) कहकर शास्त्र-कार स्त्रीका ऋतुकाल में गमन बताते हैं; और ' निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् । ब्रह्मचार्येव भवति यत्र - तत्राश्रमे वसन् ' ( मनु. ३ | ५० ) इस वचनमें मनु आदि प्रमुख शास्त्रकारोंने ऋतुकी चार प्रारम्भिक रातें, तथा ११ वीं - १३ वीं, और पर्वकी अष्टमी - चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि रात्रियोंको छोड़कर शेष ऋतुकालकी रात्रियोंमें गमन करने वालेको ब्रह्मचारी कहकर ऋतुकालसे भिन्न रात्रियोंमें गमन करने वालेको व्यभिचारी सूचित किया गया है । शास्त्रोंमें ऋतुमती - स्त्रीका विवाह निषिद्ध Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२०२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) होनेसे विवाह के चौथे ही दिन ऋतुकाल आ जावे --- यह सम्भव नहीं; तब विना ऋतुकालके विवाहके चौथे दिन चतुर्थीकर्म में शास्त्रकार आरम्भमें ही पतिको स्त्री गमनकी श्राज्ञा देकर क्या आरम्भ - आरम्भमें ही पतिको व्यभिचारका पाठ पढ़ाने शुरू हो जाते हैं? ऐसा सम्भव नहीं, और फिर चौथे दिन ही यदि अष्टमी वा चतुर्दशी तिथि आ पड़े, अथवा वादियोंके ऋतुमती स्त्री के विवाहके पक्षमें विवाहके चौथे दिन स्त्रीके ऋतु-कालकी ११ वीं वा १३ वीं रात्रि आ पड़े; अथवा उसके विशिष्ट अङ्गमें पीड़ा हो जावे; तब भला चतुर्थी -कर्म में स्त्रीका अभि-गमन कैसे हो सकेगा? इससे स्पष्ट हो गया कि चौथे दिन चतुर्थीकर्म में स्त्रीका अभिगमन कभी नियत नहीं हो सकता । जब नहीं हो सकता; तब चतुर्थीकर्म में मैथुनकी अनिवार्यता भी खण्डित हो गई । बल्कि - चतुर्थी कर्म में गर्भाधान किसी शास्त्रमें लिखा ही नहीं - यह भी सिद्ध हो गया । गर्भाधान तो सर्वत्र ऋतुकालमें लिखा होता है, विवाहके चौथे दिन नहीं । इसमें पारस्करगृ.के एक टीकाकारकी सम्मति हम बता चुके; अब शेष टीकाकारोंकी सम्मति भी प्रतिपक्षीको देखनी चाहिये । ( ५ ) श्रीजयरामने भी ' तामुदुह्य यथर्तु प्रवेशनम् ' इस प्रति-पक्षी से दिये पूर्व सूत्र पर भाष्य किया है- ' सा अनेन प्रकारेण [ चतुर्थीकर्म - हवनादिविधिना ] ऊढा [ पूर्ण - विवाहिता ] भवति । ताम् एवम् [ चतुर्थीकर्मणा ] ऊवा ( विवाह्य ) ऋतौ - ऋतौ अभि-गमनं कुर्यात् ' । अर्थात् चतुर्थीकर्मसे जब स्त्री पूर्ण विवाहित हो CC - 0. Ankur Joshi Collection चतुर्थीकर्म गर्भाधानका प्रङ्ग है? [ २०३ २० जावे; उसके बाद स्त्रीका जब - जब ऋतुकाल आवे; तब - तब चतु स्त्री गमन करें । इससे प्रतिपक्षी के मतका स्पष्ट ही निराकरण तस्य हो गया । यह ( ख ) इसी प्रकार श्रीहरिहरने भी उक्तसूत्रपर भाष्य किया कम है, और उसे प्रतिपक्षीने उद्धृत किया भी है । वह यह है — ' एवं अ पूर्वोक्तेन प्रकारेण [ चतुर्थीकर्म - हवनेन ] तां वधूं विवाहयित्वा भी विवाहकर्मणा भार्यात्वं सम्पाद्य ऋतुकालम् ऋतुकालं गमनम् ' समा इससे श्रीहरिहरने भी सिद्ध किया कि - वधू चतुर्थीकर्मके इवनसे धान पूर्ण विवाहिता होकर भार्या वनती है – ' भार्या चातुर्थकर्मणि ' । गया यह प्रसिद्ध वचन है- ' आ प्रदानाद् भवेत् कन्या, प्रदानान्तरं भाय वधूः । पाणिग्रहे तु पत्नी स्याद् भार्या चातुर्थकर्मणि । चतुर्थीक कहा विवाह - संस्कारका अङ्ग होता है, गर्भाधान - संस्कारका अङ्ग मनु नहीं । वह तो विवाहकी पूर्णताका निष्पादक है । जैसे आच ११८ | २१ पारस्कर सूत्रके भाष्य में श्रीकर्काचार्यने भी लिखा है— अब्रह ' संवत्सरादिपक्षाऽशक्तौ त्रिरात्रपक्षाश्रयणेपि चतुर्थीकर्मानन्तरं ऋतुम पंचम्यादिरात्रौ अभिगमनम् । चतुर्थीकर्मणः प्राक् तस्या भार्यात्वमेव विवा नोत्पन्नम्, विवाहैकदेशत्वात् चतुर्थीकर्मणः ' अर्थात् चतुर्थीकर्म तो चतुर्थी विवाहका अङ्ग है, वह भार्यात्वको करने वाला है; स्त्री - अभिगमन भिगम तो चतुर्थीकर्म हो चुकनेपर फिर उसके बाद पांचवीं वा अन्य समाप्त रात्रियों में होना चाहिये, पूर्व नहीं । इससे प्रतिपक्षिसम्मत चतुर्थी- [ चतुर्थी कर्म में मैथुन खण्डित हो गया । इसलि ( ग ) श्रीहरिहरने भी यही लिखा है - ' त्रिरात्रपक्षाश्रयणेपि Gujarat. An eGangotri Initiative

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२०३ २०४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) तव चतुर्थीकर्मानन्तरं पञ्चम्यादिरात्रौ अभिगमनम्, चतुर्थीकर्मणः प्राकू रण तस्या भार्यात्वमेव न संवृत्तम्, विवाहैकदेशत्वात् चतुर्थीकर्मणः ' । यहाँ भी वही हमारी बात सिद्ध हुई है । श्रीगदाधरने भी ' चतुर्थी-कया कर्मणो विवाहाङ्गत्वात् ' ( ११११ ) में चतुर्थीकर्मको विवाहका ही ' एवं श्रङ्ग माना है, गर्भाधानका नहीं । सो पूर्वोक्त प्रकारसे हरिहरने वा- श्री चतुर्थीकर्मके प्रयोगको दिखलाकर और उस चतुर्थीकर्मको नम् समाप्त करके लिखा है— ' अथ ऋतुकाले रजोदर्शने संजाते गर्भा-नसे धाननिमित्तं रात्रौ अभिगमनं कुर्यात् ' इससे अत्यन्त स्पष्ट हो गया कि - चतुर्थीकर्म में मैथुन सर्वथा नहीं होता, किन्तु उसमें ' तरं ' । भार्यात्व सम्पन्न होता है; फिर उसका अभिगमन ऋतुकालमें ही कर्म कहा है । बात भी ठीक है । ऋतुकालमें स्त्रीगमन करना तो मनु आदिके मत में ( मनु. ३।४५,५० ) ब्रह्मचारित्व ( वेदानुसार कि आचरण ) हैं, इससे, विना ऋतुकालके स्त्री - गमन तो उनके मत में अब्रह्मचर्य ( वैदिक आचरण, व्यभिचार ) है, विवाहका कहीं न्तरं ऋतुमतीत्व में विधान नहीं, वल्कि निषेध है, तब ऋतुमतीत्वमें मेव विवाह न होनेसे चतुर्थ दिन ऋतुकालके अनिवार्य न होनेसे नं तो चतुर्थीकर्म में वादी से अभिमत मैथुन खण्डित हो गया । मन ( घ ) श्रीगदाधरने ' समाप्तं चतुर्थीकर्म ' लिखकर ' स्वभार्या-अन्य भिगमनमाह - ' तामुदुह्य ' इस वचनसे इस सूत्रको चतुर्थी कर्म की समाप्तिके वाद गर्भाधानका सूत्र बताया है- ' तां वधूं पूर्वोक्तविधिना तुर्थी- [ चतुर्थीकर्म - हवनेन ] विवाहयित्वा ऋतौ ऋतौ अभिगमनं कुर्यात् ' । इसलिए श्रीगदाधरने पदार्थक्रम में चतुर्थीकर्मकी समाप्तिके बाद-रोपि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. चतुर्थीकर्म गर्भाधानका ग्रङ्ग है? [ २०५ के इसी १ | ११ | ७ सूत्रमें ' गर्भाधानाख्यं कर्म करिष्ये ' यह लिखकर चतुर्थीकर्मके संकल्पसे पृथक गर्भाधानका संकल्प कराया है । और इस वादिदत्तसूत्रसे पूर्व ११११११ सूत्रमें ' विवाहाङ्गं चतुर्थीकर्म करिष्ये ' यह संकल्प कराया है, इससे सर्वथा स्पष्ट हो गया कि-चतुर्थी कर्म विवाहका अङ्ग है; और वह १११११५ सूत्रमें समाप्त हो गया है; उसमें तो मैथुन दिखलाया भी नहीं गया, क्योंकि उसकी समाप्तिसे पूर्व तक विवाह पूर्ण नहीं हुआ; तब विवाहके पूर्ण न होनेसे अनधिकृत स्त्रीमें भला अभिगमन कैसे हो सकता है? चतुर्थीकर्मकी समाप्तिमें प्रातःकाल हो जाता है, उस समय में स्त्रीगमन कैसे? वह ( चतुर्थीकर्म ) विवाहका अङ्ग है, गर्भाधान-का अङ्ग नहीं । स्त्रीगमन तो १।११।६-७ सूत्रसे स्त्रीके ऋतुकालमें दिखलाया है । सो यह ७ वां सूत्र चतुर्थीकर्मकी समाप्ति के बाद गर्भाधानका सिद्ध हुआ; चतुर्थीकर्मका नहीं; यह अत्यन्त स्पष्ट हो गया । इसलिए ' संस्कारदीपक ' पृ ० ४०-४३ में ' अथ चतुर्थी-कर्मसूत्र व्याख्या ' लिखकर पारस्करका चतुर्थ्यामपररात्रे ' ' आदि ५ सूत्र तक पाठ उद्धृत करके और उसे व्याख्यात करके, फिर छठे सूत्र के अन्तमें लिखा है- ' समाप्तं चतुर्थीकर्म ' ( पृ. ४३ ) । फिर पृ. ४३ से ' अथ गर्भाघानसूत्र - व्याख्या ' शीर्षक देकर ‘ तामुदुह्य ' इत्यादि प्रतिपक्षीसे उद्धृत सूत्र लिखकर उसे व्याख्यात किया है ' ( पृ. ४४ ) । इससे स्पष्ट सूचित किया गया है कि - चतुर्थी-कर्म के समाप्त हो जाने पर जब ऋतुकाल आवे; तव गर्भाधान करना पड़ता है । इससे ' तामुदुह्य यथर्तु प्रवेशनम् ' यह पारस्कर-An eGangotri Initiative

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२०६ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) का सूत्र गर्भाधान - विषयक है, चतुर्थीकर्म - विषयक नहीं - यह सम्यक्तया सिद्ध हो गया । तब इसे चतुर्थीकर्मका सूत्र बताते हुए वादीका पक्ष बिल्कुल कट गया; अब वह इसमें फड़फड़ा नहीं सकता । ( ङ ) इसी प्रकार भाष्यकार श्रीविश्वनाथने भी ' इति चतुर्थी-कर्म ' ५ सूत्र तक समाप्त करके आगे ' एवं निष्पन्ते भार्यात्वे ' लिख-कर ७ वें सूत्रमें - ' अभिगमनमाह - ' तामुदुह्य ' एवं तामुद्वाह्य यथ अभिगमनं कुर्यात् ' । इत्यादि लिखकर अन्त में लिखा है- ' इति गर्भाधानम् ' । इससे स्पष्ट हो गया कि विवाह संस्कार तथा गर्भा-धान संस्कार भिन्न - भिन्न हैं, और भिन्न - भिन्न कालके हैं । ( च ) श्रीवेणीसम जी गौड ने भी ' तामुदुह्य ' ( १ | ११ | ७ ) इस सूत्रपर लिखा है- ' गर्भाधान माह ' - और इस सूत्रसे पूर्व छठें सूत्रके अन्तमें लिखा है - ' समाप्तं चतुर्थीक मं ' । इससे अत्यन्त स्पष्ट हो गया कि - चतुर्थीक में गर्भाधानकी कुछ भी चर्चा वा गन्ध नहीं है, किन्तु चतुर्थीकर्म समाप्त हो जाने पर जब स्त्रीका ऋतुकाल आवे; तव उस ऋतुकालकी ४ र्थ वा पञ्चम रात्रिमें मैथुन हु करता हैं । सो ' तामुदुह्य ' यह सूत्र गर्भाधानका है, चतुर्थीकर्मका नहीं - यह सम्यक् सिद्ध हो गया । इससे पथिकके पक्षकी रीढकी हड्डी टूट गई है, अब वह उठने योग्य नहीं रहा । स्मृतियोंमें इसकी स्पष्टता की है- ' आ प्रदानाद् भवेत् कन्या ( प्रदान संकल्प तक लड़की कन्या कही जाती है ) प्रदानानन्तरं वधूः ( फिर वही कन्या प्रदानके बाद पाणिग्रहण - सप्तपदीसे पूर्व तक वधू की CC - 0. Ankur Joshi Collection चतुर्थीकर्म गर्भाधानका अङ्ग है? [ २०७ जाती है ) । पाणिग्रहे तु पत्नी स्याद् ( पाणिग्रहण- सप्तपदी हो जानेपर वह पत्नी हो जाती है ) भार्या चातुर्थकर्मणि( चतुर्थी-कर्म में वह भार्या हो जाती है ) । लिखित - स्मृति ( २५ ) यमस्मृति ( ८६ ) में भी लिखा है- ' विवाहे चैव निर्वृत्ते चतुर्थेऽहनि तथा । रात्रिषु । एकत्वं सा गता भर्तुः पिण्डे गोत्रे च सूतके ' । ( अर्थात् चतुर्थीक में, विवाह पूर्ण हो जानेपर स्त्री पतिके गोत्र पिण्ड -, और सूतक आदि अधिकारको पा लेती हैं ) ( छ ) इससे अत्यन्त स्पष्ट हो गया कि - चतुर्थीकर्म में हवन होता है, मैथुन नहीं । मैथुन तो ऋतुकालमें होता है, इतना भी वादी नहीं जानता - यह आश्चर्य है । इसलिए द्राह्यायणगृह्यसूत्रमें भी कहा है- ' त्रिरात्रात् चतसृभिराज्यं जुहुयात् ' ( १ | ४ | १२ ) इस प्रकार चौथे दिन होम दिखलाकर ' ऋतुकाले दक्षिणेन पाणिना ' प ( १ । ४ । १५ ) ऋतुकालमें गर्भाधान कहा है । यही खादिरगृह्यसूत्र 1 ( १ | ४ | १२-१५ ) में भी लिखा है । ( ६ ) अब वादी अपने सम्प्रदायाचार्यका मी मत देख ले । 5 स्वा. द. जीने अपनी सं.वि. गर्भाधान - संस्कार में - ' गर्भाधान ं स्त्रियाः व पुष्पवत्याः चतुरहादूर्ध्व ' ( पृ. ३६ ) यह वचन पारस्करका माना है; घ और ऐसा ही विधान गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्रोंमें भी ख नने माना है, और स्वयं भी उसका अनुमोदन किया है कि- ग्र ' जब स्त्री रजस्वला होकर चौथे दिनके उपरान्त ५ वें दिन f स्नान कर रजरोगरहित हो, उसी दिन जिस रात्रिमें गर्भस्थापन र G करने की इच्छा हो, उससे पूर्व दिनमें हवन करें ' । इससे स्वामीने Gujarat. An eGangotri Initiative