सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 141–150

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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य २४८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) । इसंस्कार ( १२१ पृष्ठकी टिप्पणी ) में नक्षत्रादिका विवाह में विचार कल्पना-युक्त 5 एवं प्रमाण माना है । उनने १२२ पृष्ठके अनुसार दोनोंकी सका हो प्रसन्नताके दिन और १३४ पृष्ठ के अनुसार ' जब कन्या रजस्वला चव होकर शुद्ध होजाय ' इस प्रकार ऋतुके ४ वा ५ वें दिन ' जिंस पिताको दिन दिन गर्भाधानकी रात्रि निश्चित की हो ' ( पृ. १३४ ) ऐसे समय बलात्ख विवाहार्थ कहा है । सो यह नक्षत्रका विचार तो उस टिप्पणीके अनुसार ' पोपगणकल्पित ' है । कन्याकेर तब जब यह लड़की रजस्वला होकर सं. वि. ( पृ.३५ ) तथा विवाह स.प्र. ( ४ पृ.५६ ) के अनुसार चतुर्थदिन स्नान करके शुद्ध होवे, तब ५ वें दिनसे १६ वें दिनतक ११ वीं और १३ वीं रात्रि छोड़कर से कुछ जब संयोगकी इच्छा हो; तब यदि इसे पुत्रकी इच्छा हो; तो + पराशर ६, ८, १०, १२, १४, १६ वीं रात्रि, अथवा यदि इसकी कन्या ६ वें पाल पैदा होनेकी इच्छा हो, तो ५, ७, ६, १५ वीं रात्रिको एक घण्टा रात्रि बीतने पर विवाहसंस्कार शुरू कर देना चाहिये । यही नते हैं । ' वैदिक विवाह मुहूर्त ' है । नहीं तो सं. वि. की विधिका भक्त यादिष्ट हो ड़कीकी सकता है । लड़की को इसीलिए विशेषकर कहा जा रहा है कि-इस सम्प्रदाय में स्वयंवर श्रेष्ठ समझा जाता है, और लड़की की ही रजखला । इच्छा मुख्य रखी जाती है । ( ३ ) तब लड़की की माता और उसके यह पिताजी: चिल्ला उसने छां उठे कि यह तो कहनेमात्रकी बातें होती हैं, सब विधि भला 7 साम पूरी कैसे हो सकती हैं? दूसरा हमारे सम्प्रदाय के प्रवर्तकथे-ऋतुमती संन्यासी । उन्हें इन बातोंका भला क्या पता लग सकता विवाह था? CC - 0. Ankur Joshi Collection एक वैदिक विवाहका रहस्य । [ २४ ९ उन्हें इस पचड़े में हाथ नहीं डालना चाहिये था, जिससे हमलोगों बड़ी हानि होती है । ऋतुस्नान करनेपर उनसे कहा हुआ ' वैदिक विवाह मुहूर्त ' न तो माता - पिता के अधिकार में है, और न संस्कार कराने वाले आर्योपदेशकके; न यह स्वयं कन्याके हाथमें है । प्रकृतिकी प्रेरणा से ही रजस्वलात्व होता है । उसका दिन यथावत् निश्चित नहीं किया जा सकता । कभी माससे एक - दो दिन पूर्व भी हो सकता है, कभी दो - चार दिन बाद भी । किसीका तो एक मासका भी अन्तर पड़ जाता है । तब हम कन्याका विवाह - दिन पहले तो कभी निर्णीत कर ही न सकेंगे । विवाहकी तिथि कई मास पूर्व ही निश्चित कर देनी पड़ती है; क्योंकि - हमारे स्वा.जी उसी देशके वरसे तो विवाहार्थ आज्ञा देते नहीं; चे दूर देशके वरके साथ ही विवाह करनेकी आज्ञा देते हैं ( स.प्र. पू. ४७, सं.वि. पृ. १२८ ) । दोनों पक्ष वालोंने तैयारी करनी होती है । तब यदि स्वा.जीका कहा यही विवाह-मुहूर्त माना जावे; तो डेट फिक्स नहीं की जा सकती । तब ' सम्बन्धियोंको निमन्त्रण - पत्र भी नहीं भेजे जा सकते । जब ऋतुमतीत्वका दिन ही निश्चित नहीं; बल्कि कन्याको भी स्वयं यह • निश्चित ज्ञान नहीं हो सकता; तव यह विधि यदि पूरी की जाय; तो मिश्चित दिन कैसे लिखा जा सकता है? थवा यदि अनुमान करके ही कोई विवाहतिथि नियत कर दी जावे, तब उसके लिए सम्बन्धियों एवं वरपक्ष वालोंको सूचना दी जावे; और वे उस तिथिको आ जावें, पर ऋतुका Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 142

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२५० ] श्रीसनातनधर्मालांक ( ६ ) पहले ही निकल जावे; तो चतुर्थीकर्म न हो सकनेके चतुर्थदिन विवाह मुहूर्त टल जानेसे आई हुई बातो कारण वह वैदिक प्रार्थना करनी पड़ेगी कि--वापिस करना पड़ेगा; और उन्हें ' महाशयो! विवाहका मुहूर्त तो टल गया है, आप लोग कृपा करना । ' बरात श्रनेके ही दिन ऋतु न आई हुई हो; और अथवा सप्ताह के अन्दर आनेकी आशा हो; तो बरात एवं एक अपने घर ही हमें ठहराना पड़ जावेगा; और सम्बन्धियोंको उनके लिए भोजन आदिका प्रबन्ध भी करना पड़ जावेगा । इस प्रकार करनेसे तो हमारा एक वर्षका वेतन भी समाप्त हो जावेगा । दूर देशका विवाह स्वा. जीसे अभिमत होनेसे हमें यह खेल खेलना पड़ेगा । विवाहकालसूचक निमन्त्रण - पत्र यथा-समय भेजे ही नहीं जा सकेंगे ।. वास्तवमें इस अव्यवस्थाका कारण यह है कि स्वा. जी थे-संन्यासी; उनका भला विवाहोंसे क्या परिचय हो सकता था? ऋतुमतीत्व से पूर्व विवाहके जो शास्त्रीय वचन मिलते हैं; उनको उन्होंने या तो छिपा लिया, या नहीं माना । यद्यपि गुणवान् वरके अन्वेषणमें ‘ कामम् आमरणात् विष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि । नचैचैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ( ६८६ ) आदिम धर्मशास्त्री इस मनुके वचनानुसार कन्याका ऋतुमतीत्व भीं अपवादरूपसे सह्य कर लेना लिखा है; पर ऋतुमतीत्व ४ दिनका मुहूर्त किसी भी शास्त्रमें लिखा नहीं मिला । अस्तु, CC - 0. Ankur Joshi Collection एक वैदिक विवाहका रहस्य । [ २२ पं. जी, आप इसे छोड़ो, अव आगे चलो, विवाह शुरू करो । ( ४ ) तब मैंने कहा कि बात तो आपने कही, पर मुझे गलत हो गया- इस विषय में आप जाने । अब यह बतान आ पता चाहिये कि आज तक यह लड़की १४४ वार या १३२ बार रजख सिद्ध हो चुकी है, वा नहीं? क्योंकि - स्वा. जीने २४ वर्षमें कुमारी कुछ विवाह उत्तम माना है । स.प्र. ( ४६ पृ. ) में ३६ वार रजस्कर लेन होने पर १५-१६ वर्षमें विवाह होना स्वा. जीने अधम पर पतन है । ऊपर तब यह सुधारक - साहब कहने लगे कि - इन बातोंको परस छोड़ते क्यों नहीं? क्या यहाँ कोई रजिस्टर रखा हुआ है ि जिसमें ' रजस्वलापनका हिसाब - किताब लिखा हो । यह तो से नहीं ही बातें लिखी होती हैं । भी मैंने कहा - तो फिर मैं विवाह कैसे पढ़ सकता हूँ, विधि वा प्र पूरी होनी ही चाहिये । अस्तु । अब यह बताइये कि यदि लड़की ने संवि. ( पृ. १३४ ) तथा स. प्र. ( पृ. ५६ ) के अनुस आवे अपने अभिलषित ( मन चाहे ) वरसे ' गुप्त - व्यवहार ' तो लिख धराश पूछ लिया है न? ( स.प्र. पू. ५६ ) । नहीं तो विधिव्यवियां बातों पाप हो सकता है । और कन्याने स्वयं ही इस वरको ए हुए व पसन्द कर रखा होगा । क्योंकि तभी विवाह सफल हो सब तभी । है । अमुक तब यहु सुधारक भी कहने लगे कि तुम यह निर्लज्जता वेद में बातें क्यों करते हो? इन बातोंके केवल लिखानेसे क्या शंसन्त Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 143

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[ २ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २५२ करो । चलेगा? यह तो विवाहसे पहले एकान्तमें अमेरिका - इङ्गलैड परम आदिकी भांति दोनोंको मिलने का अवसर दिया जावे; तव पूरा बसार पता लग सकता है । मैने कहा- यह आपकी बात ठीक है । इस रजक सिद्धान्तके अनुसार तो एकान्त सेवनका अवसर दिलानेमें हानि कुमारी कुछ नहीं । पहले वर - कन्याको एक - दूसरेकी पूरी परीक्षा रजस्र लेनी होगी; कि श्राकर्षण - विकर्षण ठीक है, वा नहीं? शीघ्र-मम पतनादि दोष तो नहीं? केवल पूछने वा लिखने- लिखानेसे, वा ऊपर - ऊपर से देखने में ठीक पता लग भी नहीं सकेगा । तब ही तो चको परस्पराभिलषित विवाह सम्पन्न होगा । तभी प्रीति होगी । तब यह सुधारक जी गर्म हो उठे कि तुम्हें यह कहते लज्जा यह तो नहीं आती? तुम आगे क्यों नहीं चलते? यह सब बातें सम्भव भी नहीं हो सकतीं । परस्पराभिलषितता उस थोड़े समय में विधि वा प्रश्नोत्तरसे पूर्ण नहीं हो सकती । आगेका भी क्या पता? कि यदि आगे दोनोंमें किसी एकको बड़ी शीतला ( चेचक ) निकल = अ यावे; तो रूपादिमात्र पर बना हुआ दोनोंका प्रेमका प्रासाद नो लिखा धराशायी हो जाया करेगा । अतः माता - पिता को ही इन सव यति वातोंका पता स्वयं कर लेना पड़ता है; और माता- पितासे दिये नरको हुए वरको ही लड़की को स्वीकार करना पड़ता है । क्योंकि-न हो तभी तो पिता संकल्प करता है - ' ओम् अमुकगोत्रोत्पन्नाम् इमाम् अमुकनाम्नीमलङ् कृतां कन्यां प्रतिगृह्णातु भवान् ' ( संवि. पृ. १४० ) निर्लज्जता वेद में भी पिता द्वारा कन्या- दान सुना जाता है – ' सूर्या यत् पत्ये क्याशंसन्तीं सविता मनसाददात् ( ऋ. १०/८५२६ ) । यदि केवल CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. एक वैदिक विवाहका रहस्य । [ २५३ परस्पराभिलषितता ही होती; तो वर - वधू दोनों चापसमें हिल-मिल जाया करते, जैसे कि आजकल सरकारी रजिस्टरोंमें विवाह रजिस्टर्ड किये जा रहे हैं । फिर पिता आदि द्वारा यह विवाहका नाटक करनेकी कोई आवश्यकता भी न होती । तब पिताको दहेज देना भी बच जाया करता । अस्तु, अब तुम आगे चलो । ( ५ ) मैंने कहा- आपकी जैसी मरजी । पर मैं विवाह कैसे पढ़ ू? अस्तु । अब इन वर - वधूको उठवाइये । यदि ( सं.वि. पृ. १३४ के अनुसार ) कन्याका सिर पुरुषके कन्धे तक आवे; तो दोनोंका विवाह हो सकेगा; नहीं तो फिर सं.वि.से विरोध होगा । यह सुधारक जी बोले, इन बातोंमें क्या रखा हैं, श्रथवा ऐसा न होने पर हानि ही क्या है? तुम आगे चलो । मैंने कहा कि - ऐसा न कहिये । इसमें एक बड़ी ' वैदिक - हानि ' है । वह यह है कि - तब ' मुखके सामने मुख, नासिकाके सामने नासिका आदि ( सं.वि. पृ. ४४ ) नेत्रके सामने नेत्र ' ( स.प्र. पृ. ५६ ) सूघे नहीं हो सकेंगे । अच्छा, अब बताइये कि आपकी लड़की की तथा वरं महाशयकी आयु कितनी है? यदि ( सं.वि.के पृ. १२२ के अनुसार ) स्त्रीकी आयुकी अपेक्षा वस्की आयु कमसे कम डेढ़ गुनी और अधिक से अधिक दुगुनी न हो; अथवा स.प्र. ( १४ समुः पृ ३७५ ) के अनुसार ढाई गुना न हो; तब तक दोनोंका विवाह नहीं करना पड़ेगा; क्योंकि उसमें विधि - व्यतिक्रम होगा । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 144

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) २५४ ] कहने लगे कि यह भी बात बहुत तब यह सुधारक जी, १७-३०, १८-३६, २०-४०, आवश्यक नहीं है । स्वा. द. जी १६-२५ गुना यह आयु - भेद लिख गये हैं । ढाई २२-४४, २४-४८ नहीं दिखलाया है । पर यह तो आयु - भेद इनमें उन्होंने कहीं ६० वर्षका हो नहीं सकता । फिर तो २४ वर्षवाली लड़कीको पुरुष । मिलना चाहिये ॥ और १६ वर्षवालीको ४० वर्षका पुरुष बाद शुरू होगा; और ब्राह्मण, क्षत्रिय, पुरुषका ब्रह्मचर्य ८ वर्षके उपनयन होगा । तो वैश्यका ८-११-१२ वर्षमें स्वा. के अनुसार आयु रहेगी २४, और ब्राह्मण वरकी आयु ८-११-१२ लड़कीकी अनुसार स्वा. जीसे प्रोक्त ४८ वर्षके ब्रह्मचर्यके वर्षमें उपनयनके ५६ वर्षकी, और वैश्य वरकी, ६० अनुकूल ५६ वर्षकी, क्षत्रियकी गुने- दुगुने से भी अधिक वर्षकी रखनी पड़ेगी; फिर यह तो डेढ़ ; और फिर स्वा. जी ४० वर्ष में स्वप्नदोष आदि श्रयु हो जायगी यह परिहाणि ( क्षीणता ): प्रारम्भ हो जाना लिखते हैं; तब क्या विवाह उचित हो सकता है? तब स्वप्नदोषादिकी के समयमें होजानेसे भरपूर २४ वर्षकी युवति-अवस्थामें शीघ्रपतन प्रारम्भ यह बहुत बुरा लगेगा । अथवा फिर शीघ्र ही उसे कन्याको सुभगे! पतिं मत् ' इस ' वैदिक श्राज्ञा ' को चरितार्थं ' अन्यमिच्छस्व निमन्त्रणपत्र भेजना पड़ेगा; क्या करनेकेलिए किसी ' युवा'को पिता यह सहन कर सकेगा? फिर तो यह कोई लड़कीका पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ' ( कीचड़ लगाकर हाथ ' प्रक्षालनाद्धि हाथसे न छूना ही अच्छा होता है ) न्याय धोनेसे कीचड़को CC - 0. Ankur Joshi , Collection Gujarat. An एक वैदिक विवाहका रहस्य । [ २ ] २५ चरितार्थ हो जायगा, अतः आयुका प्रेश्न तो पण्डित! ही दो । इतने समय तक कोई पूर्ण ब्रह्मचारी तुम छोर कर सकता । हमारे नेता श्रीदेहलवीजी के अनुसार रह ( देखो भी: नहीं कि हापुड़ स.ध. सभासे पत्र - व्यवहार ) उसमें दुस्सम्भावना उनका आच रहती है । कोई लड़का - लड़की श्रीदेहलवीजी के बनी है को अनुसार पूरे पड़ ब्रह्मचारी नहीं रह सकते । तब ब्रह्मचर्य क्षत होजानेसे विवाह ही नहीं हो सकेगा । अब तुम आगे चलो । उम्र हैं । विव : ' - उसके बाद मैंने कहा कि स्वयंवर वाली इस लड़कीने दूसरे कमरे में ( स.प्र. पू. ५६ संवि. पू. ४४ के अनुसार ) गर्भाधानकी यह सामग्री और गर्भाधानके बाद किये जानेवाले स्नानकेलिए जब कोई सोंठ, असगन्ध, छोटी इलायची, कस्तूरी, जायफल, जावित्री वह और सालममिश्री डालकर औटा कर रखा हुआ दूध - इत्यादि: प्रबन्ध कर रखा है न? क्योंकि आधी रात तक विवाह [ तुम होते ही इसे सबके सामने ही गर्भाधान के लिए जाना पड़ेगा । नेत्र स्वा, जीने श्रीमुखसे स्वयं फरमाया है कि- जिस दिन तुदान रहन देना योग्य समझें, उसी दिन संवि. पुस्तकस्थ विधिके अनुसार [ तुम सब कर्म करके मध्यरात्रि वा दश बजे अति प्रसन्नता से सबके फिर सामने पाणिग्रहणपूर्वक विवाहकी विधिको पूरा करके एकान्त - सेकस शय करें ' ( स.प्र. ४ पृ. ५६ ) ।: नुस्र तब यह महाशय कहने लगे कि यह लड़की भी स.प्र. और संवि, की परीक्षा देकर पास हो चुकी है; और इन कार्यों किं-ट्रेण्ड होनेका सर्टिफिकेट भी ले चुकी है । इसने यह: प्रबन्य हूँ । eGangotri Initiative

पृष्ठ 145

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[ श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) २१ २५६ ] तुम कर ही रखा होगा; आपको पूछनेकी क्या जरूरत? | मैंने कहा छोर मी. नहीं कि यदि यह सब काम स्वयं ही कर ले; तब फिर विवाहके श्रो उना आचार्यकी आवश्यकता ही क्या पड़े? फिर भी जब हम लोगों-7 बनी को बुलाया जाता है; तब हमें सारी सामग्री की जाँच करनी ही सार पड़ती है; और वे वे बातें श्राचार्यत्वके नाते समझानी ही पड़ती से न हैं । श्रव यह लड़की को समझ लेना चाहिये कि इसका पति विवाहविधिके फौरन बाद ही सप्र. ( पृ. ५६ ) के अनुसार''का ने दूसरे श्राधान करेगा, यह भी उसका आकर्षण यथावधि धानकी यह ' वैदिक - गर्भाधानविधि ' इसे याद रख लेनी चाहिये, जिससे लिए जर कोई त्रुटि न रहने पावे, जिससे सन्तानमें त्रुटि न रह जावे । जावित्री वह विधि यह है— त्यादि: ' जब..... का गर्भाशय में गिरनेका समय हो; उस समय वाहन [ तुम दोनों ] स्त्री - पुरुष स्थिर और नासिकाके सामने नासिका, -पड़ेगा । नेत्रके सामने नेत्र अर्थात् सुधा शरीर और अत्यन्त प्रसन्नचित्त ऋतुदार रहना, डिगना नहीं । पुरुष अपने शरीरको ढीला छोड़ेगा, और अनुसार [ तुम ] स्त्री प्राप्ति समय अपान वायुको ऊपर खींचना ।. सबके फिरको संकोच कर " को ऊपर आकर्षण करके गर्भा-न्त - सेवा शयमें स्थिति करना ' । फिर स्नान करके ' सालम मिश्री ' के पवित्र नुस्खेका प्रयोग करना । ' प्र. और यह सुनकर यह महाशय फिर गर्म हो उठे; तो मैंने कहा काम किं - मैं अपनी ओरसे न तो कुछ कह रहा हूँ, और न कर रहा न्य हूँ । फिर गरमानेकी क्या जरूरत है? आपने ही तो कहा था CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. एक वैदिक विवाहका रहस्य [ २५७ कि - ठीक सं. वि. स.प्र. के अनुसार ही कार्य ही तो कार्य कर रहा करना है । मैं वैसा हूँ । अस्तु । ( ६ ) फिर मैंने वरको कहा कि महाशय! उठिये वधूको स्नान कराइये और स्वयं भी स्नान । अपनी मन्त्र उसमें बोलने हैं, श्राप कीजिये । यह तीन यह सम्बोधित पहले कामको, फिर अपनी वधूको करके कहेंगे - यों काम! वेद ते नाम, मदो नाम असि, समान श्रमु ं सुरा ते अभवत् । परमत्र अग्ने! तपसो - निर्मितोसि स्वाहा ' ( १ ) ओम् इमं जन्म स ँ सृजामि, प्रजापतेर्मुखमेतद् ते उपस्थं मघुना द्वितीयम् । तेन पुंसः अभि-भवासि सर्वान् अवशान वशिनी असि राज्ञी स्वाहा ' ( २ ) । ओम् अग्निं क्रव्यादमकृण्वन् गुहानाः स्त्रीणाम् उपस्थम् पुराणाः । तेनाज्यम् अकृण्वन् त्रैशृङ्गं त्वाष्ट्रं ऋषयः त्वयि तद् दधातु स्वाहा ' ( मंन्त्रब्राह्मण १ | १ | १-३ ) इसका अर्थ एक प्रा.स. के प्रकाशक ( गोविन्दराम हासानन्द कलकत्ता ) से प्रकाशित तथा एक आ.स. के विद्वान् ( श्रीरामगोपालं वेदालंकार - गुरुकुल कांगड़ी से बनाये हुए ' संस्कार - प्रकाश ' ( पृ. १२३ ) में यह लिखा है- ) पहले आप ( वर ) कामदेवको कहेंगे- ' हे काम! तेरा नाम सब जग जानता है । तू जगमें मदकारी प्रसिद्ध है । यह कन्या ( अपनी स्त्रीका निर्देश करके कहना ) तेरे मद करनेका एक साधन हैं । इसकी तू प्रतिष्ठा कर । [ फिर आप कामाग्निको कहियेगा- ] है कॉमाग्नि! तेरा उत्कृष्ट जन्म इसी स्त्री - जातिमें हुआ है । तेरा निर्माण गृहस्थाश्रमरूप तपकेलिए ही किया गया Argo Initiative

पृष्ठ 146

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२५८ । श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) है? ' [ इसके बाद दूसरा मन्त्र आप अपनी स्त्री तथा उसके उपस्थ अङ्गको हाथ लगाकर कहियेगा - ] ' हे स्त्री, मैं तेरे उपस्थेन्द्रियको प्रेम [ मधु ] से युक्त करता हूँ । सन्तानोत्पत्ति ( प्रजापति ) का यही [ तेरा उपस्थ ] द्वितीय द्वाररूप है । तू इसी [ उपस्थेन्द्रिय ] के द्वारा वशमें न होने वाले पुरुषोंको भी नीचा दिखाती है । हे घरकी स्वामिनी, तू [ इसी अपने अङ्गसे ] सबको वशमें करनेवाली है । २ । तत्त्वकी खोज करनेवाले पुराने अनुभवी ऋषियोंने स्त्रियोंके उपस्थेन्द्रियको मांस खानेवाले अग्नि के समान बतलाया है । उसमें साथ ही पुरुषके उपस्थेन्द्रिय-से उत्पन्न सन्तानोत्पादनमें समर्थ वीर्यको घृतके समान बताया है । हे स्त्री, वह वीर्य तेरे शरीरमें धारण होकर पुष्ट हो ' । यह कहकर दोनों वर - वधू एक - दूसरेकी उपस्थेन्द्रियको अथवा पुरुष ही वधूकी इन्द्रियको से युक्त कर दे । इसे सुन कर फिर यही सुधारकजी गर्मा उठे । मैंने कहा कि— यह मन्त्र मैंने तो वनाया नहीं; स्वा. जी मन्त्र - ब्राह्मणका मन्त्र लाये हैं, और भी मेरा किया नहीं है, किन्तु प्रा.स. के विद्वानने किया है, प्रकाशक भी आ.स. के हैं । मालूम होता है । कि आप संस्कृत पढ़े हुए नहीं हैं । इस अर्थ करने वालेने तो अर्थको कुछ नर्म कर दिया है । यहाँ तो स्त्री के उपस्थका वर द्वारा मधुसे लिपटाना लिखा है । स्वा.जी इस अवसर पर जातिपक्ष मानकर स्त्री - पुरुष दोनोंका अर्थ कर दिया करते हैं । इस प्रकार स्त्रीको पुरुषके अङ्गको मधुसे युक्त करना चाहिये । CC - 0. Ankur Joshi Collection एक वैदिक विवाहका रहस्य । यह सब स्नानागार में एकान्तस्थलमें ही तो होगा एक - दूसरेका पता भी लग जा सकेगा । अन्तिम: । इससे अ इसी बातका संकेत कर रहा है । मन्त्रका श्री पि यह सुनकर तो यह सुधारक जी आपसे तु बाहर हो ख बड़ी मुश्किलसे इन्हें शान्त कराया गया कि श्राप सं भाषाका ज्ञान स्वयं कर लीजिये, फिर आपको स्वयं पता लग जावेगा । अच्छा, अब हम आगे विवाहकी श्र पि क्रियापर आते हैं - यह कहकर मैने वर - पूजन कराना २४ शुरू कि तब यह सुधारकजी जाकर कुछ शान्त हुए । वघ ( ७ ) फिर मैंने कहा कि -- वर - महाशय! अब संवि. ( १.१६ के अनुसार आपको एक क्रिया करनी पड़ेगी । वह कीजिये बैठ मधुपर्कको उठा लीजिये, उसे तीन बार अंगूठे और अनामि बिलो दीजिये । फिर ' बसवस्त्वा गायत्रेण छन्दसा भक्षयन्तु ' प जात मन्त्र पढ़कर पूर्वदिशामें एक मधुपर्कका छींटा दे दीजि छींट जिससे वसु नामक पितर तृप्त हो जावें । फिर ' रुद्रास्त्वा त्रैष्टु ब्रह्म छन्दसा, भक्षयन्तु ' मन्त्र से दक्षिणदिशामें मधुपर्कका ब्राह्म दीजिये, जिससे रुद्र नामक पितर तृप्त हो जावें । ' आदित्यास्त ब्राह्म जागतेन छन्दसा भक्षयन्तु ' मन्त्रसे पश्चिम दिशामें मधुपर्क के गाय जिसे आदित्य नामक पितर खावें । फिर ' विश्वे त्वा देव वाद श्रानुष्टुभेन छन्दसा भक्षयन्तु ' मन्त्रसे उत्तर दिशामें थोड़ा- ब्राह्म मधुपर्कका. अंश डालिये; जिससे उसे विश्वेदेवता खावें । इस आप श्रीदे बाद ( भूतेभ्यस्त्वा परिगृह्णामि ' इस मन्त्रसे ऊपरं आकाश Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 147

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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) २६० ] 17 चोर तीन मधुपर्कके छींटे दें, जिससे आकाशके भूत उसे नावें । मन्त्रका इससे कु फिर उनका उच्छिष्ट मधुपर्क तुम ( वर ) को खाना पड़ेगा । जो जूठा मधुपर्क वच जावे; उसे अपने सेवक ( नौकर ) को तुम्हारा खानेकेलिए देना । हो नरे तब यह सुधारकजी कहने लगे कि आपने यह क्या ' पोप-प ' लीला ' लगा रखी है, यह तो आपने मृत्तकश्राद्ध कर दिया दिव्य-स्वयं अर्थ पितरोंका नाम कहकर । यह तो ब्रह्मचारियोंके नाम हैं । हकी २४ वर्षका वसु ब्रह्मचारी, ४४ वर्षका रुद्र ब्रह्मचारी और ४८ वर्षका आदित्य ब्रह्मचारी । मैंने कहा कि ऐसा नहीं है । यदि वे स्थूल ब्रह्मचारी वहां . ( पृ.१. बैठे होते, तो क्या वर दूरसे उनके मुँह पर छींटे देता; तो क्या कीजिये अनामिक वे तृप्त हो जाते? यह तो उन वेचारोंकी हँसी वा बेइज्जती हो जाती, और वरकी असभ्यता हो जाती कि उनके मुँह थोड़े तयन्तु प छींटे देकर शेष आप गटक जाता । दीि ब्रह्मचारी भी नहीं मिल सकते, चा ब्राह्मण होते हैं । गायत्रीका १ पाद का ब्राह्मणों का भी ८ वर्षमें जनेऊ एवं दित्यास्त | गायत्री छन्द के पूर्ण अक्षर २४ होनेसे पर्क आपको जब वसु नामक क्योंकि - गायत्री छन्दवाले ८ अक्षरोंवाला होने से उन ब्रह्मचर्य शुरू होता है । वह ब्रह्मचर्य भी ८ वर्षके वाद २४ वर्ष तक करना पड़ता है; तब वे ३२ सालके अखण्ड त्वादेव थोड़ा- ब्राह्मण ब्रह्मचारी जिनकी आयु १५०-२०० वर्षकी होगी; आपको कहां मिलेंगे । आप लोगोंके नेता शास्त्रार्थ - महारथी । श्रीदेहलवीजीने हापुड़ स.ध. सभाके साथ किये हुए पत्रव्यवहारमें आकाश CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. लिखा था कि सकता । ४४ वर्षके त्रिष्टुप् छन्दसे उस छन्दके १ ब्रह्मचर्य ११ वें एक वैदिक विवाहका रहस्य | [ २६१ कोई स्त्री वा पुरुष चुरी भावनासे बच नहीं रुद्र ब्रह्मचारी भी श्रापको कहाँ मिलेंगे । इनका योग है । त्रिष्टुप् छन्द वाले क्षत्रिय होते हैं । पादके ११ अक्षर होनेसे उनका उपनयन तथा वर्षमें शुरू होता है । उस छन्दके सारे ४४ वर्ष होनेसे पूर्ण ४४ वर्ष ब्रह्मचर्य होनेपर वे ५५ वर्षके हो जाते हैं । यह ५५ वर्षके श्रखण्ड ब्रह्मचारी क्षत्रिय आपको कहां मिलेंगे, उनकी आयु स्वा.द. जीके अनुसार ३०० वर्षकी होगी । हैं क्या कोई ऐसे प्रा.स. में? ४८ वर्षके ब्रह्मचारियोंका जगती छन्दसे सम्बन्ध कहा गया है । जगती छन्द वैश्योंका होता है । जगती छन्दके १ पादके १२ अक्षर होनेसे वैश्योंका यज्ञोपवीत तथा ब्रह्मचर्य भी १२ वर्षमें शुरू होता है, उस छन्दके सारे ४८ अक्षर होनेसे उनका ब्रह्मचर्य भी ४८ रह कर वह ६० वर्षका ब्रह्मचारी होता है । उनकी आयु स्वा. जीने सप्र. ( पृ. २६ ) में चार सौ वर्षकी लिखी है । है कोई ऐसा तथा इतनी ( ४०० वर्ष ) श्रायु वाला वैश्य ब्रह्मचारी प्रा.स. में? ... शास्त्रों में लिखा है- ' गायत्र्या छन्दसा त्राह्मणमसृजत्, विष्टुभा राजन्यम्, जगत्या वैश्यम् ' ( वसिष्ठध.सू. ४/३ ) । यही चांत पारस्करादि गृह्यसूत्रों में भी सूचित की गई है । उन सब ब्रह्मचारियोंकी मधुपर्कके एक छींटेसे तृप्ति होनी तो दूर, वह उनके An eGangotri Initiative

पृष्ठ 148

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 148 का मूल पृष्ठ
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२६२ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 1 ) गले तक भी नहीं पहुँच सकेगा । क्या ऐसे ब्रह्मचारियों को सं.वि.से संस्कार करानेवाले, उनके मुँह पर मधुपर्क के छींटे डालनेकेलिए कभी बुलाया करते हैं? ऐसे अखण्ड ब्रह्मचारियोंका उनकी १००, ३००, ४०० वर्षकी आयुसे स्वयं बोध हो जावेगा! क्या ऐसे और इतनी आयुके ब्रह्मचारी प्रा.स. में हैं? वस्तुतः यह सूक्ष्म दिव्य पितर हैं, जिनको स्वा. जीने अमी, एकादशी, अमावस्या आदि तिथियोंका, तथा धनिष्ठा, आर्द्रा, मघां आदि नक्षत्रोंका देवता माना है । उनके नाम से वे नामकरणमें, अग्निमें एक आहुति भी दिलवाते हैं । यदि वे स्थूल होते, तो उनकी हवि तथा मधुपर्कका छींटा उनके मुखमें डाला जाता, अग्निमें न डाला जाता, वा दिशाओं में न उडाया जाता, और केवल थोड़ासा छींटा वा थोड़ी - सी इंवि उनके गले तक पहुँच भी न पाती; परन्तु दिव्य नित्य पितरोंके देवता होने के कारण सूक्ष्मतावश उस स्थूल हविको सूक्ष्म करनेकेलिए उस हविको अग्निमें डाला जाता है, वे उसे गृहीत कर लेते हैं; और उस मधुपर्कके छींटेसे वे पुष्पसे मधुमक्षिकाकी भांति स्वयं सूक्ष्म होने से सूक्ष्म अंश ग्रहण कर लेते हैं । यही उनका भक्षण एवं तृप्त होना है । और ऊपर श्राकाशमें भूत भला मनुष्य कहां लटके हो सकते हैं? क्या राकेट पर चढ़ कर आकाशमें चढ़नेवाले भूत इष्ट हैं? क्या वे मुख पर मधुपर्कके छींटे डालनेकी प्रतीक्षा में अधरमें लटके रहेंगे? यदि नहीं, तो वहाँ भी सूक्ष्म भूत - प्रेतादि इष्ट हैं । अस्तु! एक वैदिक विवाहका रहस्य [ २११ २६ तब यह सुधारकजी कहने लगे - आप कैसे विवाह संस्का श्राचार्य हैं; जो स्वा जीकी . विधियोंका पोपों वाला अर्थ बना बैठ गये । अव आगेकी विधि शुरू करो । मैंने कहा कि देव लोग अपनी पुस्तकोंको रहस्य- ज्ञानके विचारसे नहीं श्री होता केवल सनातनधर्मियोंकी भांति ' बाबा- वाक्यं प्रमाणम् ' पड़ते । श्रात माना वैव वैसी रस्म पूरी कर लेनेकेलिए कमर कसे रहते हैं; फिर आपक काम ' पोपों ' से क्या भेद है? वस्तुतः आपके सम्प्रदाय के लोग श्रयं को ग्रन्थ मनोयोगसे नहीं पढ़ते, किन्तु पुराणोंके ही पढ़ने में के रहते हैं, वह भी दोष - दृष्टिसे । अस्तु; श्राव हम आगे चलते है! क्या ( ८ ) फिर कुछ विधि कराकर क्रमागत एक मन्त्र वर हे वात मैंने कन्याके प्रति कहलवाया- ' ओम् अघोरचक्षुरपतिघ्न्या तुम-··· वीरसूर्देवृकामा ' ( पृ. १४४ ) इसका अर्थ भी समझाया -1 बुला वरानने! तू वीरोंकी उत्पादिनी हो । तू देवृकामा - अपने देश मेरे भाईसे मैथुनकी कामना करती हुई ( नियोगकी भी इस हो, करने हारी ) सुखयुक्त हो ' । ङ्गल उस समय यह सुधारक जी फिर बिगड़ कर कहने से कोई कि- यह आपने असभ्य शब्द क्या कहा? मेरी लड़की को वह हो रहे हुए विवाह में आप पतिव्रतधर्मका पाठ पढ़ा रहे हैं, पण्डि व्यभिचारका? कितने तुम्हारे असभ्य शब्द हैं? इसका एक गये ह विवाह हो रहा है, या दोसे? ' मैंने कहा कि यह बात श्रमं लिखा सम्प्रदाय के अनुसार गलत नहीं है । आ. स. के स्वा. ब्रह्म मेरी जीने एक ' देवृकामा या देवकामा ' ट्रैक्ट अपने पूर्व से पढ़ान CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ २६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २६४ ] संस्कारले था । उसमें बड़े संरम्भसे लिखा है कि - वैदिक पाठ छार्थ करे बनाया ' ' है । यह भी उसमें सिद्ध किया है कि- ' देवर दूसरा वर देवकामा I कि श्रम होता है; तभी वह वरकी घोड़ी पर बरके पीछे साथ चढ़कर श्राता है, वर और देवरको वेदमें समकक्षरूपमें रखा गया है । ' विध-• मानस देव देवरम् ' इस वेद मन्त्रकी साक्षी से यह आजसे देवरकी आप कामना नहीं कही जा रही है, किन्तु जब इसका यह पति मृत्यु-लोग को प्राप्त हो जावेगा; यह तबके लिए है । बढ़ने में से इतने में वहाँ बैठा हुआ वरका पिता चिल्ला उठा कि - यह चलते है! क्या असभ्यता करते हो? इस मङ्गलके समयमें अमङ्गलकी र बात क्या कर रहे हो? क्या मेरे पुत्रको मारना चाहते हो? या तुम पागलको यहाँ किस पागलने विवाह - संस्कार करानेकेलिए माया- 1: बुलाया है? देश यह सुधारकजी भी बोल उठे किं - तुम सचमुच पागल पण्डित भी इच हो, तुम मेरी लड़की को विधवा करना चाहते हो । मङ्गलमें अम ङ्गल करना चाहते हो, ऐसे व्याहसे तो हम वाज़ आये । बाकी कहने से कोई आ.स.का पण्डित विवाहमें ऐसा अर्थ नहीं सुनाता । केवल की को वह ' देवकामा ' वाला मन्त्र ही पढ़ देता है । तुम्हीं पहले मुंहफट हे हैं पण्डित मिले हो । विना देश - कालका विचार किये वकने लग नका एवं गये हो । और फिर ' देवकामा ' इस पदमें मरनेका शब्द ही नहीं ता लिखा है । तब इसका मतलब तो यह हुआ कि तुम आजसे बा. ब्रह्म मेरी लड़की को ' देवर- कामुकी ' बताकर उसे व्यभिचारका पाठ आप पढ़ाने आये हो । क्या इसीसे भारतका मुख उज्ज्वल होगा? CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. एक वैदिक विवाहका रहस्य ॥ २६५ ‘ विधवेव देवरं ' जैसे वचन तो वाग्दत्ता - लड़की के वैधव्य होनेपर देवरके विवाहसे ग्रहण करनेके हैं, विवाहित - विधवार्थ यह वचन नहीं । इसकेलिए ' आलोक ' ग्रन्थमालाका वां सुमन प्र. ५६८ की पं ० १७ से पृ. ५७५ की ३ पंक्ति तक देखो, ऐसा मैंने किसी से सुन रखा है । पर तुम अपना ही अंट - संद अर्थ करके मेरी लड़कीके ही बुरे विचार करना चाहते हो । अथवा दूसरे वरकी कामना वाली ' कहने से स्पष्ट होगा कि वह हृदयसे अपने पतिकी मृत्युको चाहती है; क्योंकि दूसरे वरकी कामना तो पहले वरकी मृत्यु होनेपर ही सं.वि. के अनुसार वह चाहेगी, श्रन्यथा व्यभिचारिणी होगी । मैंने कहा कि यह बातें आपकी ठीक हैं । आपने स्वा. जीके श्रभिप्रायके अनुसार मुझे व्याह पढ़ने के लिए कहा था; वैसा ही कर रहा हूँ । मैं भी इस अर्थको नहीं मानता । मैं भी समझता हूँ कि जैसे- ' पुत्रकामा ' शब्दका अर्थ यह है कि - ' मेरा पुत्र होवे ' ऐसी इच्छा वाली; वैसे ' देवृकामा ' का भी यही अर्थ मैं समझता हूँ कि मेरा देवर अर्थात् पतिका भ्राता भी रहे, इस इच्छा ' वाली ' । सो इसमें कोई बुरा भाव भी नहीं । ( ६ ) और भी एक रहस्यकी बात यह है कि यह मन्त्र ऋ. सं. का है पर किसी भी ॠसं. में ' देवृकामा ' पाठ भी नहीं है । सर्वत्र ' देवकामा ' है, हाँ, एक - आध अंग्रेजकी पुस्तकमें ऐसा पाठ है; पर वह निर्मूल है । हमने अंग्रेजोंकी बात थोड़े ही माननी है । सभी गृह्यसूत्रों में भी ' देवकामा ' पाठ है । यदि कहीं An eGangotri Initiative

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२६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ऋसं.में ' देवृकामा ' पाठ भी है तब उसका भी बुरा अर्थ नहीं है । ' पुत्रकामा ' की तरह ही ' देवृकामा ' का अर्थ है, जैसे कि हम पहले बता चुके हैं । इसी प्रकार अथर्ववेद में भी यदि ' देवृकामा ' पाठ है; तब उसमें भी ' पुत्रकामा ' की भांति ही अर्थ है । अन्य रहस्यकी बात यह भी है कि - सं. वि. के प्रथम-संस्करण में भी वैवाहिक मन्त्रों में ' देवृकामा ' यह पाठ नहीं था, किन्तु ' देवकामा ' था । पीछे शुद्धि - पत्र में प्रक्षिप्त कर दिया गया । ऐसा श्री सातवलेकर जीने लिखा था । तभी तो सं.वि. के द्वितीय सस्करणमें भी ' देवकामा ' ही था; ' देवृकामा ' नहीं । यद्यपि श्री ब्रह्ममुनिजीने इसका प्रत्युत्तर लिखा था; तथापि ' श्रीसातवलेकरजी तथा श्रीरामकौशिकने उसका प्रतिखण्डन किया था । जब खा. जीने आरम्भमें मैक्समूलरके वेद मंगवाकर छपवाये थे, उनमें ऋसं.में भी ' देवकामा ' पाठ था, ' देवकामा ' नहीं । तब यह कारिस्तानी नियोगके लोभी स्वा.के पण्डितोंकी मालूम होती है, जो कि उन्होंने वेदमें भी ' देवकामा ' कर डाला । सं.वि. में भी वैसा ही पाठ कर दिया । सं.वि. में भी पीछे पाठ परिवर्तन करके नियोगका अर्थ स्थायी कर दिया गया । अथवा अविवाहित तथा नियोग-के लोभी स्वा. जीकी भी यह कार्यवाही हो सकती है, जिन्होंने अपने यहांके भारतीय शाखाध्यायी पण्डितों तथा वेदादि-ग्रन्थोंपर विश्वास न करके एक अंग्रेजके कोषपर विश्वास करके ' देवृकामा ' ऐसा पाठ कर डाला । पर यदि आप ( सुधारक जी ) इससे विगड़ते हैं; तो फिर एक वैदिक विवाहका रहस्य । [ २१७ २६ इस सं.वि.से विवाह कराना बन्द कराइये । जो इस सं.वि.से अपनी लड़कीका विवाह कराना चाहते हैं; वे अपनी लड़की को विकर या व्यभिचारिणी बनाना पसन्द करते हैं; अथवा उसे विधवा लि बनाना पसन्द करते हैं; यह मैं पूर्व ही कह चुका हूँ । स्वा. जो भी ' कि सत्र, ४ र्थं समु.में ' शूरवीर पुत्रोंको जनने वाली स्त्रीको भी ' हे पति तथ देवरको दुःख न देने वाली स्त्री, तू इस गृहाश्रम में " देवा.. रख कांमना करने वाली और सुख देनेवाली पति वा देवरको प्राप्त होते ( पृ. ७१ ) यह लिख गये हैं । कि-इससे स्वा. जीके अनुसार सन्तान वाली स्त्री देवरको हम चाहने वाली हो, पतिसे भी विवाह करे; तभी तो स्वा. जीने में रहत उसे कहा - ' देवर और पतिको दुःख न देने वाली ' । तव यी वधूव वह ' पतिकामा ' तो हो, और ' देवृकामा ' न हो; तब देवरको सन्त दुःख देनेवाली सिद्ध होगी । ऐसा होना स्वा. जीके वेदसे वि बृहस होगा । इसलिए स्वा. जीने लिखा कि – ' पति वा देवरको प्र I १४ २ होके ' यहाँ भी स्वा. जीने स्त्री में दोनों ( पति और देवर ) का भार सम्व लिखा है । स्वा. जीके अनुयायी भी कदाचित् अन्य सव वा पालन खण्डन, पर नियोगका जोरदार मण्डन करके नियोगको हूँ ॥ बढ़ाय आ, स.का मुख्य उद्द ेश्य - सा मानते हैं, और उस व्यभिचारस प्रजास नियोगसे ही अपने सम्प्रदाय की प्रतिष्ठा समझ कर उन्होंने क हुई । शब्द और अर्थ सं. वि. में प्रक्षिप्त कर दिये हैं, इसमें मेरा का कसूर है? प्रक्षेपका एक प्रमाण लीजिये - सं.वि. के विवाह सङ्केत आरम्भ में तथा स.प्र. के ४ समु ( पू. ५६ ) में स्वा, जीने रही ह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative