सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 151–160

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 151–160

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[ २६७ २६८ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 1 ) . से प्रपनी करने वाले ही दिन विवाह - संस्कार माना है; पर फिर सं.वि. के को या तो विवाह संस्कार के अन्त ( पृ. १६६ ) में गर्भाधान चौथे दिवसमें बनाना लिखा है, कितना स्पष्ट यह उनके अनुयायियों का प्रक्षेप है; जब भी कि.स्वा. जी चतुर्थीकर्मकः कोई भी कर्मविशेष नहीं मानते । सप्र पति श्रीर तथापि यह हम अवश्य कहेंगे कि स्वा. जी स्त्रियों का बड़ा ध्यान " देवाकी- रखते थे; उन्हें कई - कई पति देने को बड़े उत्सुक रहते थे । हो तव वर तथा कन्याके यह पिता दोनों ही मुझे कहने लगे कि क्या ऐसा कोई उनका अन्य भी सबूत दे सकते हो, जिससे वरको में हम समझ लें कि वे स्त्रियोंको बहुत पति दिलानेको उत्सुक रहते थे । मैंने कहा - सुनिये - सं. वि. के अनुसार विवाहित हो रही तव यदि वधूको उपदेशक भी, राजा भी तथा अन्य सभ्य मनुष्य भी देवरको सन्तान से बढ़ाते हैं । देखिये सं.वि. ( पृ. १५४ ) में ' इन्द्रानी " सेवि बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' ( अ. को १४ | १ | ५४ ) का अथ उनने यह लिखा है - वर कहता है- ' हे मेरे - ) का भा सम्बन्धी लोगो " जैसे सद्वैद्य और सत्योपदेशक'‘प्रजाका वाच पालन करने हारा राजा, सभ्य मनुष्य इस मेरी स्त्रीको प्रजासे कोही बढ़ाया करते हैं, वैसे तुम [ सम्बन्धी लोग ] भी [ मेरी स्त्रीको [ भचारा प्रजासे ] बढ़ाया करो ' । न्होंने उ दोनों वर - कन्याके पिता बोल उठे, यह तो बहुत बुरी बात मेरा का हुई । स्वामी तो औरों को भी वरकी स्त्रीमें प्रजा पैदा करनेका विचाई सङ्केत दे रहे हैं । हमारी श्रद्धा तो अब उनसे क्षीण होती जा जीने रही है । पण्डित! यह तो बताओ कि स्वा. जी तो बधूका एक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. एक वैदिक विवाहका रहस्य | [ २६१ पुरुषसे व्याह कराते हैं, एक पुरुषसे ही फेरा कराते हैं; फिर उस स्त्रीमें दूसरेका भाग कैसे रखाते हैं? मैंने कहा- ऐसी बात नहीं महाशयो! स्वा.जी एक स्त्रीका दो आदमियोंसे फेरा कराते हैं । ' इसपर सबूत दो ' ऐसा कहने पर मैंने कहा - सं.वि. पृ. १४२ में उन्होंने वरके पक्षके दूसरे पुरुपको जलपूर्णकलश डण्डा लेके उत्तराभिमुख बैठनेकेलिए कहा है । पृ. १५६ में ' वही पुरुष वर - वधूके साथ - साथ कलश ले चले ' यहाँ दूसरा पुरुष शायद द्वितीय - वर देवरका स्थानापन्न हो । उसको भी वधूके साथ फेरे में लिया गया । तभी तो वरकी घोड़ीके पीछे देवरं भी चढ़कर आता है, उसे श्रीब्रह्ममुनि ( प्रि.र.आ. ) जी ' पतिके समकक्ष तथा सहवर ' बताते हैं । ( १० ) यही क्या, इस सं.वि. के अनुसार पुरुष अपनी बहनसे भी विवाह कर सकता है ' । यह सुनते ही दोनों महाशय फिर चिल्ला उठे, गलत! गलत!! गलत कहते हो तुम इतना तो स्वा. जी कभी नहीं लिख सकते । इसका सबूत दो । यदि यह साबित हो गया, तो हम इस सं. वि. से विवाह करवाना बन्द कर देंगे । मैंने कहा- तो सुनिये सावधान होकर । सं.वि. ( पृ. १२८ ) में यह प्रश्नोत्तर लिखा है । ( प्रश्न ) अपने गोत्र वा भाई - बहनोंका परस्पर विवाह क्यों नहीं होता? ( उत्तर ) इनके विवाह होने में प्रीति कभी नहीं होती; क्योंकि जितनी प्रीति परोक्ष, पदार्थ में होती है, उतनी प्रत्यक्षमें नहीं, और बाल्यावस्थाके गुण - दोष भी विदित रहते हैं; तथा भयादि भी अधिक नहीं रहते । यह स्वा. जीके An eGangotri Initiative

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२७० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) शब्द हैं । अब आप इस पर स्वयं सोचिये कि - गुरुकुलमें गये हुए भ्राताके परोक्षमें बहिन पैदा हो; तो उसके प्रत्यक्षमें न रहने से और बाल्यावस्थाके गुण - दोष भी विदित न रहनेसे स्वा. जीके अनुसार प्रीतिमें कोई बाधा नहीं रहेगी? अब सिद्ध हो गया-न भगिनी - विवाह!! वस्तुत: यह बातें ( बहिन से विवाह न करना ) अदृष्टमूलक रखनी चाहियें, तर्कमूलक नहीं । ऐसे थोथे तर्कों से हिन्दुजातिका पतन ही होगा । फिर खा.जी लिखते हैं- ' जब तक, दूरस्थ एक दूसरे कुलके साथ सम्बन्ध नहीं होता, तब तक शरीर आदिकी पुष्टि भी पूर्ण नहीं होती ' । [ यह दूसरा तर्क भी निस्सार है । फिर तो मुसलमानोंके शरीरकी पुष्टि भी नहीं होनी चाहिये, जो एक ही कुलमें चाचेकी लड़की से विवाह करते हैं ] तीसरा दूर सम्बन्ध होनेसे परस्पर नीति, उन्नति, ऐश्वर्य बढ़ता है, निकटसे नहीं । [ फिर तो - वर विवाह कर लेनेपर अपनी स्त्रीको भी अपने समीप नहीं रखेगा, किन्तु उसके मायके में ही रखेगा, वा मित्र वा देवरके घरमें, क्योंकि - दूरमें ही वे प्रीति: मानते हैं, निकटमें नहीं इस प्रकार यह सिद्ध हो गया कि - सं.वि. से विवाह कराने-वाला पिता अपनी पुत्रीको या तो दूसरोंसे भी काम - सम्बन्ध-रखनेवाली बनाना चाहता है, वा उसे विधवा बनाना चाहता है, और १७४ पृ. के अनुसार उस विधवाके दस सन्तान: भिन्न-CC - 0. Ankur Joshi Collection एक वैदिक विवाहका रहस्य । [ २०१ २ भिन्न दस पुरुषोंसे प्राप्त करना चाहता है । अपनी पुत्रोका हुए भ्राताके साथ विवाह कराना चाहता है, और गुरुरुक कन्याको विवाह करानेवाले श्राचार्यसे अश्लील बातें करवाना अपनी म ४ पुछवाना चाहता है । व यह भी सिद्ध हो गया कि स्वा. जीकी सं.वि. से विवाह करने वाला वर अपनी स्त्री में अपने छोटे भाईका भीभाव इ रखना चाहता है, अथवा अपनी मृत्युको चाहनेवाला होता है । ह उस वरकी मृत्यु होनेपर ही तो उस स्त्रीका ' देवृकामा ' होत ली चरितार्थ होगा । अपनी स्त्रीमें वर अपने सम्बन्धी वैद्य द उपदेशक द्वारा भी सन्तान बढ़ाना चाहता है । यदि ऐसा वि आप लोगोंको पसन्द हो; और १४४ बार रजस्वला हुई हुई विवाह पसन्द हो; जिसकी पृष्ठभूमि दूसरे सुन्दर - सुन्दर पुरुषों देखकर प्रायः मलिन हो चुकी होती है, तो फिर यह विवाद कराइये । उनमें भला पातिव्रत्यकी क्या सम्भावना हो सकेगी ॥ जब किसी मकानकी नींव ही खोखली हो; कमजोर हो; उस पूर खड़ा होनेवाला भवन अवश्य ही धराशायी होगा । ऐसा दिवा दय दुस्सम्भावनाओं को व्यक्त करनेवाला होता है । कर उस समय कन्या तथा वर दोनोंके पिता वोल उठे - य ' दे तो ' वैदिक - विवाह ' नाम से प्रसिद्ध है; तभी तो हम इसके षड्यन स्व में जा फँसे । तब मैंने कहा कि आप लोग ॠ.सं. यदि म पोथियोंको ही वेद कहते हैं । उनके अनुसार संवि. के विवाह अ व संस्कारमें मन्त्रगणना कीजिये । १३४. पू. से विवाहविधि Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ श्री सनातनधर्मालोक ( ९ ) २० / २७२ ] गुरुक होती है; और १७६ पृष्ठ तक समाप्त होती है । तदनुसार ४७ र अपनी तो ४ संहिताओंके हैं । शेष १४३ मन्त्र आपके अनुसार मन्त्र रवाना ४७ के दुगनेसे भी अधिक हैं- अवैदिक हैं; अब आप ही बतलाइये कि - यह विवाह वैदिक हुआ या आपके अनुसार विवाद अवैदिक? अथवा फिर आप ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' भीम इस प्राचीन घोषको स्वीकार कर लीजिये । अथवा यदि आपको होता है । हमारी बात माननेकी इच्छा न हो; तो ' होलीका हुलास ' मान मा ' होल लीजिये । ( ११ ) जब यह वातें हो रही थीं; तो वरका छोटा भाई, साविक लड़कीका देवर पिताजीको कहने लगा कि जब आप भी हुई स्वा.जी. सम्प्रदायके हैं; और लड़कीकें पिता भी; तभी आप - पुरुष दोनोंने संवि. से विवाह कराया है; और विवाह पढ़नेवाले पं.जी इ भी स्वा. जीके प्रन्थोंके रसिक हैं; तव श्राप सभी मिलकर स्वा.जी - सकेगी! की प्रकारान्तरसे निन्दा क्यों कर - करा रहे हैं । आप उनकी बात 7; उस पूरी कीजिये । वे दयाके सागर थे; वे दीन स्त्री - पुरुषोंपर पूरी साविक दया करते थे । उन्होंने जो ' देवृकामा ' का अर्थ ' देवरकी कामना ' करती हुई ' लिखा था, तो यह सर्वथा ठीक है । यदि सं. में उठेद ' देवकामा ' है, ' देवृकामा ' नहीं; तब अथर्ववेद भी तो अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखता है, उसमें ' देवकामा ' पाठ है, हम अथर्वस के आदि मन्त्रसे ही विवाह कर लेंगे; क्योंकि वहाँ भी विवाहसूक्त है । चिवा अब मेरा भी इस लड़की में भाग है । अब आप इस विवाहको विधि बदलिये नहीं । नहीं तो फिर यदि मेरा भाग इसमें नहीं रहेगा; CC - 0. Ankur Joshi Collection एक वैदिक विवाहका रहस्य | [ २७३ तो यह मेरी हत्या - सी होगी । क्या मैं अपने भाईके पीछे घोड़ी पर चढ़कर नहीं आया था? मैं इस लड़की का जिसे मैं भाभी कहूँगा; ' दूसरा वर हूँ, सहवर हूँ, पतिके समकक्ष हूँ । हमारे वैदिक नेता अभिनव - नैरुक्त देहलवीजी ' भाभी ' का अर्थ करते हैं - ' भावी पत्नी ' ( देखिये स.ध. सभाके साथ उनका पत्र - व्यवहार सो मेरी यह ' भाभी ' जब मेरी ' भावी पत्नी ' है, तो मैं भाभी ) । देवीका अधिकारी सिद्ध हो गया । • आप क्या वैदिकधर्मी अपनेको नामसे कहते हैं? वैदिक-धर्मका रहस्य जाननेवाले श्रीप्रियरत्न जी आपने ( सं. १६६६ में ) ' देवृकामा या देवकामा ' इस निबन्धमें यह रहस्य प्रकट .किया है - ‘ देवरः कस्माद् द्वितीयो वर उच्यते ' ( निरुक्त ३।१५ ) । उनके अनुसार देवर ' दूसरा वर ' अर्थात् दूसरा दूल्हा होता है । इसपर आजीने पृ. ११ में बड़ी भारी दलील दी है कि - निरुक्तने देवरको द्वितीय वर बतलाया है, तभी तो विवाहके अवसर पर घोड़ी के ऊपर वरके पीछे उसके छोटे भाईको साथ विठलाने आदिकी प्रथा भी इसी वातकी साक्षी हैं, तथा उसे सहवर ( सहायक वर ) नामसे भी पुकारा जाता है । यह लिख कर वे कहते हैं- ' देवृध्नि! अपतिघ्नि! ' ( अथवं. २४२1१८ ) यहाँ वधूको देवरका घात न करनेवाली, पतिका घात न करनेवाली वहीं विवाहप्रकरणमें कहा है, यह कहकर आजीने वहां एक मार्केकी बात लिख डाली है कि- ' इस मन्त्रमें देवरको पतिके समकक्ष रखा है ॥ पृ. ६ की २ री पंक्ति में, तथा पृ. ११ की स ० ध ० १८ Gujarat. An eGangotri Initiative

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२७४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) १५ वीं पंक्तिमें आर्षजी ने यह दो बार लिखा है - । सो ' द्विबद्ध सुबद्धं भवति ' यह बात पक्की हो गई । इसलिए मैं भी इस लड़कीका पति न सही. उपपति तो हूँ ही । मन्त्री नहीं, तो उपमन्त्री सही । जिस दिन मन्त्री सभामें न हो; तो उपमन्त्री सभा कामका निर्वाह करता है । अतः जिस दिन हमारी ' भाभीजीके पति - मेरे ज्येष्ठ भ्राताजी यहाँ घरमें नहीं होंगे; उस दिन मैं ही अपनी भाभी ( देहलवीजीके अनुसार भावी पत्नी ) का रात्रिका निर्वाहक बनूंगा । ' देवृकामा ' वाले मन्त्रमें पतिके मरने - जीनेकी बात थोड़े ही लिखी है । यदि इसका पति परलोक - यात्रा करेगा; तब तो यह लड़की विधवा होगी ही; तब इसकी कामपूर्ति करनेवाला देवर, दूसरा वर, उपपति, दूसरा खसम मैं ही बनूँगा । जब इसका पति परलोक न सही; परदेसमें गया होगा; महायात्रामें न सही, यात्रामें होगा; तब भी यह लड़की विधवा होगी- विगतः - बहिर्गतः धवः-पतिर्यस्याः सा । तव भी रात्रिमें इसकी शय्याका सहचर मैं ही रहूँगा । जब इस लड़की का पति नपुंसक सिद्ध होगा; तब भी यह लड़की विधवा होगी, क्योंकि तब यह पति इसका ' धव ' ( भर्ता ) न रहकर इसका भ्राता ही हो जायगा; देखिये- इसपर श्र.स. के विद्वान् श्रीजयदेवजी विद्यालङ्कारका भाष्य यमयमीसूक्तमें; तब भी देवर दूसरा खसम मैं ही होऊँगा; क्योंकि - श्री प्रियरत्नजी श्रार्षके अनुसार वेदने पति और देवरको समकक्ष रखा है । तभी CC - 0. Ankur Joshi Collection एक वैदिक विवाहका रहस्य । तो देवर भी बरकी घोड़ी के पीछे बैठकर, लड़की का २७६ बनकर आता है, उसे आर्षजी के शब्दों में ' सहवर दूसरा ' दूर अतः इस ' वैदिक - विवाह का परिवर्तन न करें; नहीं तो कहा है । ' अदेवृ - इस वेदमन्त्रके विरुद्ध इस लड़की द्वारा मुझ देवरका नही जावेगा । घात माद यदि कहो कि - श्री प्रियरत्नजी आपने ' देवृकामा ' होत में • लिङ्गका निर्देश किया है, इसलिए स्त्री तो देवरकी कामना ' विद्य है, देवर उसकी कामना नहीं कर सकता; यह भी करते होती बात टी नहीं होगी । हमारे स्वा. जी स्त्री - पुरुषका वरावर बड़े मानते हैं । वेदमें ही लिखा है - ' एयमान् पतिकामा जनिका अधि!! पति हमागमम् ' ( अथर्व. २ | ३० | ५ ) श्रीप्रियरत्नजी के अनुसार देना. भार द्वितीय वर, सहवर होता है; अतः यह मन्त्र वरकी भांति देव अम भी चरितार्थ होता है । इसपर भी आर्षजी लिखते हैं- ' यहाँ स्त्री उसी ' पतिकामा ' कहा है, इसके साथ ' देवकामा ' शब्द तुलना योग्य है ' । इसी प्रकार ' अदेवृध्नि! अपतिघ्नि! में देवत्र अम और पतिके समकक्ष रखा है ' ( पृ. ११ पं. १०-१५ ) ( M तब इस मन्त्रका यह अर्थ हुआ - यह लड़की ‘ पतिकाश पंति के समकक्ष मुझ देवरको चाहती हुई आई है, नही ' जनिकामः ' इस स्त्रीका कामी मैं देवर भी आगया हूँ । इसलि ( पू. वेदानुसार देवर - भाभीकी परस्पर कामुकता तुल्य एवं वैदि श्री सिद्ध हुई । हमारे वृद्ध नेता, शास्त्रार्थ महारथी, अभिनवनेरु श्रीदेहलवीजीका ' भाभी ' का ' भावी पत्नी ' अर्थ भी परिवतो Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 155

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श्री सनातनधर्मालोक ( 1 ) २७६ / सरा दूता हुआ; देखो उनका स.ध. सभा हापुड़से पत्र - व्यवहार ) । अब कहा है । मेरी भाभी ( भावी पत्नी ) जीके उपपतित्वसे कभी हट ' प्रदेश मैं इस घात माद नहीं स्वा सकता . जी लिख | गये हैं कि -देवताओंको परोक्ष वस्तुसे प्रीति होती हैं, मैं भी पढ़ा - लिखा विद्वान हूँ, इसलिए मैं भी ' देव ' हूँ, ' विद्वांसो हि देवाः ' । यह सीधी मेरी स्त्री होती; तो परोक्ष न नाकर होती; अतः मुझे उतना आनन्द न आता । अब चूँकि यह मेरे वात टीड बड़े भाईकी स्त्री है; अतः यह मुझसे कुछ परोक्ष है; अतः इसके अधिक पति बाहर किसी यात्रा वा महायात्रा पर हों, तो मुझे इस काम भाभीसे बड़ा आनन्द आवेगा । अव आप बदलिये नहीं; इसमें देव अमाङ्गलिकता वा असभ्यता भी न समझिये । ति देवखे उसी पुस्तिका ( के ६ पृष्ठ ) में लिख गये हैं-' कोई अमङ्गल कहे, [ कोई असभ्यता कहे ], इतना करे श्रमङ्गल शकुनोंको प्रथाओंको वेद नहीं मानता । देवर और लोकनीतिका भी प्रतिपादक है । वेद यहाँ ( Marriage Act ) को बतलाता है ' ( पं.५-६ ) पतिकामां ' इसी प्रकार ' वीरसूर्देवृकामा ' में कोई अमङ्गल है, नहीं है, किन्तु कानूनको पूरा करना मिसलका इसलिए ( पृ. १० पं. ६-११ ) अब बताइये पं.जी! आप वं वैदिक श्रीब्रह्ममुनिजीकी बात न मानेंगे? श्रीब्रह्ममुनिजी इन दुनियावी वेद राजनीति शादी के कानून [ वा असभ्यता ] पेट भरना है ' आ.स.के नेता नवने ( १२ ) इतनेमें वरके पिताजी वोल उठे कि - श्रीब्रह्ममुनिजीको रातो समाजसे निकाल दिया गया था, ऐसा सुना गया है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. एक वदिक विवाहका रहस्य | [ २७७ श्रीब्रह्ममुनिजीने यह स्वयं ' वैदिक धर्म ' में लिखा भी था । ऋग्वेद में ' देवृकामा ' नहीं है, ' देवकामा ' है । अथर्ववेद पैप्पलाद-सं.मैं भी ' देवृकामा ' नहीं है, ' देवकामा ' है । इसी पैप्प.सं. को स्वा.जी अथर्ववेद मानते हैं, क्योंकि ऋभाभू. में इसीका ' शं नो देवी ' प्रथममन्त्र - प्रतीक देकर वे इसे वास्तविक अथर्ववेदसं. बता गये हैं । इस प्रकार ' वेदसंज्ञाविमर्श ' ( पृ. ८६ ) में आर्य-समाज - मेस्टन रोडके संयुक्तमन्त्री श्रीविद्याधरजीने मी पैप्पलाद-सं. को अथववेद माना है, अजमेरकी छपी अथर्ववेद शौनकी संहिताक़ो उनने खण्डित प्रतिलिपियोंके अनुसार होनेसे हेरफेर -वाली माना है । तब उसमें यदि ' देवकामा ' पाठ हैं, तो वह वैदिक न हुआ । जिस सैन्टपीटर्सवर्गकी डिक्शनरियोंकी ऋसं. में ' देवृकामा ' की साक्षी दी जाती है; वे अथर्ववेदसं. में ' देवकामा ' मानते हैं, इसलिए सब वेदोंमें ' देवकामा ' ही है । कहीं ' देवृकामा ' भी हो; तो उसका अर्थ ' पुत्रकामा ' की तरह अच्छा ही है, बुरा नहीं । यदि अपनी हठीली प्रकृतिके अनुसार तुम लोग इस लड़की में ' देवृकामा ' का वैदिक अर्थ ' देवरका अधिकार ' मानते हो, तब तो मुझ ससुरका अधिकार भी इस लड़की पर रहेगा । श्रीब्रह्ममुनिजीका यह लिखना कि- ' अदेवृध्नि! अपतिघ्नि! ' यह वेदका. कहना भी रहस्य रखता है । देवरको वेदने पतिके समकक्ष रखा ज्येष्ठ वा श्वसुरको नहीं ( पृ. ६. पं. १-२-३ ) यह आर्षजीका कथन वेदविरुद्ध होनेसे गलत है । देखिये वेदमें- ' प्रती-An eGangotri Initiative

पृष्ठ 156

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२७८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) क्षन्ते श्वशुरो देवरश्च ' ( अथर्व. १४/१/३६ ) यहांपुर जैसे वेदने देवर-को वधूकी प्रतीक्षा करना कहा है, वहाँ ससुरको भी उक्त वधूकी प्रतीक्षा करना कहा है । यहाँपर श्रीश्रार्षजीकी नीतिसे वेदने ' देवर और ससुर को समकक्ष रखा है । यदि देवर वधूकी इसलिए प्रतीक्षा करता है कि- ' देवृकामा ' इस लड़की से जाकर मिले; और उसे अपनी प्रीतिका दान दे, वैसे मुझ ससुर को भी प्रीतिका दान दे - यह भी तो वेदानुसार है । देखिये वेद में लिखा है - ' स्योना भव श्वशुरेभ्यः स्योना पत्ये ' ( श्र. १४/२/२७ ); इस मन्त्रमें वधूका ससुरको भी सुख देना कहा है; यहाँ आजी ध्यान दें यहाँ श्वसुर और पतिको वेदने समकक्ष कहा है । हमारे वैदिक महर्षिजीने इसका अर्थ यह लिखा है- ' वर कहता है- ' हे वरानने! तू मेरा पिता जो तेरा श्वसुर है; उसमें प्रीति करके... मेरे भाई [ चाहे छोटे, चाहे बड़े ] जो तेरे देवर हैं, उनमें प्रीतिसे अधिकार - युक्त हो ' ( संवि. पृ. १७४ ) यहाँ भी वधूकी ससुर और देवरोंसे समान प्रीति कही है; तो यह वधू जैसे तुम देवरको अपनी प्रीतिका दान करेगी; वैसी प्रीतिका दान मुझे भी करेगी- इनमें कुछ भी अन्तर नहीं लिखा है - यह वैदिक व्यवहार हैं । और सुनो- ' सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी अघि देवृषु ' ( ऋ. १०/८५/४६ ) इस वेद के मन्त्रमें भी इस वधूका ' सम्राज्ञी '. रानी बनना ससुर और देवर दोनोंकेलिए समान कहा है ।..... इतने में बीचमें बात काटकर लड़की का जेठ बोल उठा - श्री ब्रह्म-CC - 0. Ankur Joshi Collection एक वैदिक विवाहका रहस्य २७६ २८ मुनिजीने मुझे ( जेठको ) इसमें ' ज्येष्ठको या श्वसुरको पहि समकक्ष नहीं रखा गया है ' ( पृ. ६ ) इन अपने शब्दोंमें ि हार क्यों किया है? ' सम्राज्ञी अधि देवषु ' में ' देवृषु ' यह बहुवचन सस इसलिए छोटे - बड़े दोनों जेठ वा देवर सभीकी रानी बनाना है, शुभ वेदको दृष्ट है; तभी बहुवचनकी सार्थकता है । इसलिए श्रार्षे जी. मुक की उक्त बात ठीक नहीं कि - ' ज्येष्टको या श्वसुरको पतिके सम. कक्ष नहीं रखा गया है ' । हमारे स्वा. जीने ' दस पति ' स्त्रीके रसे! सक हैं; उसका भी रहस्य यही है कि- वेद में ' दशास्यां पुत्रानाचेहि ' ( ऋ. १०/८५ । ४५ ) इस मन्त्र के अनुसार स्वा. जी दरा सन्ताने । भीं उत्पन्न करना वैदिक मानते हैं; इसलिए हम देवर भी दस हुए । ( घ सो. उन सभीका पहला अधिकार इस लड़की पर है, बादमे | ( अ. ' पतिमेकादशं कृधि ' ११ वाँ पति इस लड़की में अधिकृत रहता | देवर हैं । पिताजी, बीचमें टोकनेकी क्षमा करें, अपनी बात लीजि • उसके वाद फिर लड़कीके श्वशुर जी बीचमें काटी हुई बात वाह स्पेश को पूर्ण करते हुए कहने लगे कि उक्त मन्त्र में ससुर भी सारे लिए देवरोंके साथ उस वधूका भागीदार माना गया है । इसलिए कहीं जाट जो कि पहले एक लड़की के साथ होनेपर सब भाइयोंका उस लड़की से विवाह और सब अपना भाग उससे लेते थे । कि वे वेदके इसी प्रकारके अर्थोंको अपनी हुए थे । उन्हींसे खा. जी ने भी यह वैदिक अर्थ Gujarat. An eGangotri Initiative मेरे एकके विवाहित लोग समझ लेते थे; लड़क इसलिए स्पष्ट है इसके परम्परासे समझे सभ्य लिये । अस्तु ।

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) २७ ९ ] २८० ] उक्त मन्त्रोंके अनुसार इस वधू में जैसे तुम देवरोंका व्यव-नि वैसे उक्त मन्त्रोंमें श्वशुरके भी सहचारी होनेसे मुझ में वचन हार होगा, भी इस वधू में वैसा ही व्यवहार वैदिक रहेगा । यदि वचन है, मुझे ससुरका यह अधिकार नहीं दोगे; तो मैं भी ' वैदिक अदालत ' में बनाना चलाऊँगा । फिर ' द्वितीयो वरः ' इस निरुक्तके स्वा. जी श्री. मुकदमा से प्रदर्शित अर्थके अनुसार मैं भी यौगिक देवर बन ही सम. श्री के रखे! सकता हूँ · उसी नाि भी इसमें सन्ताने ( अ. १४ | दस हुए । ( अ. १४ | बाद देवरको । समय ससुरका भाई भी बोल उठा कि अजी, मेरा साथ अधिकार होगा; क्योंकि ' स्योना भव श्वशुरेभ्यः ' २ | २७ ) ' सम्राज्ञी एधि श्वशुरेषु सम्राज्ञीं उत देवृषु ' १ | ४४ ) यहां पर ' श्वशुर ' में बहुवचन है, और वशुर एवं समकक्ष भी रखा गया है, सो मेरा भी ध्यान रख रहता लीजियेगा । त अव ( १३ ) यह सब सुनता हुआ घबड़ा कर वर कहने लगा हुई बात- वाह! तुम लोगोंने मेरी इस स्त्रीको सभी तुम पुरुषोंके चढ़ने की नीसारे स्पेशल ट्रेन समझ रखा है क्या? और सव इस मेरी स्त्रीके इसलिए लिए जीते रहना चाहते हो; केवल मुझे ही मारना चाहते हो? विवाहित मेरे जीते होनेपर तुम लोगोंका यह हाल है, मेरे मरने पर तुम लेते थे; लोग इस मेरी पत्नीकी क्या दुर्दशा नहीं करोगे! यह मेरा इस लड़की के साथ विवाह न हुआ, तुम सब लोगोंका भी मानो स्पष्ट है इसके साथ विवाह हो गया! क्या यह तुम लोगोंकी ‘ वैदिक ’ सम सभ्यता है? क्या वेदके ऐसे गन्दे अर्थ करनेकेलिए ही तुम लोग अस्तु । CC - 0. Ankur Joshi 15 Collection Gujarat. एक वैदिक - विवाहका रहस्य | [ २८१ अपने आपको ' वैदिक ' कहते हो? क्या यही पतिव्रत धर्म है? तुम लोगोंने पता नहीं, किस अर्वाचीन गन्दे सम्प्रदायकी कुसङ्गति प्राप्त की है कि ऐसे - ऐसे गन्दे अर्थ निकाल रहे हो! याद रखो तुम सबके यह गलत अर्थ हैं । स्त्रीको पतिव्रता कहा जाता है, श्वसुरव्रता वा देवरव्रता नहीं कहा जाता । तुम लोग समूह हो गये हो; और मुझे अकेला कर दिया है । मैं ऐसी बातें कभी नहीं सहूँगा | क्या ब्रह्ममुनि भी पूर्वाश्रममें अपनी भाभीके ' सहवर ' बने थे? वस्तुतः इन पण्डितम्मन्योंने अपने सम्प्रदाय के चस्केमें पड़कर इस बंधू में देवरका भाग भी बलात् निकाल दिया; तब उसी हिसावसे इसमें ससुरका भी भाग फिर वैदिक हो जायगा । यदि वे लोग ससुरका भाग वेद - विरुद्ध मानते हैं, वैसे देवरका भी इसमें अधिकार वेद- विरुद्ध है । याद रखो कि- ' जीवन्ं वापि मृतो वापि पतिरेव प्रभुः स्त्रियाम् ' ( बृह-त्पराशर. ४।४८ ) इसमें जीने अथवा मरनेपर केवल मेरा ही अधिकार है, अन्य किसीका भी नहीं, यह सूचित किया गया है । हाँ, वे इसके भाई वा पिता - जैसे बन सकते हैं, पति कभी नहीं । पति सदा एक ही होता है । आप लोगोंकी उक्त साम्प्र-दायिक बातें वेदके नामसे जनताके चरित्रको बिगाड़ने वाली हैं; उनका कोई भी सदाचारी समर्थन नहीं कर सकता । वैसा अर्थ उन ' देवकामा ' आदि मन्त्रोंका है भी नहीं । इस विषय में । ' आलोक ' ग्रन्थमाला अष्टम - पुष्प देखो । यह तो ऐयाशः लोग. ' मक्खी को मलमल कर भैंसा ' बना रहे हैं । बन्द करो इस तथा An eGangotri Initiative

पृष्ठ 158

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२८२ । श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कथित वैदिक वस्तुतः अवैदिक विवाह को । ( १४ ) उस समय वह विवाहित हो रही लड़की भी बोल उठी कि तुम सब लोग वेदके नामसे यह व्यभिचार - प्रसार क्या कर रहे हो? तुम लोग योनि - कीट हो । वेदको ' देवृकामा ' मैं कुछ भी बुरे विचारका अर्थ इष्ट नहीं । वेदमें ‘ अन्नकामः, क्षेमकामः, देवकामा, पुत्रकामा, सोमकामः आदि ' काम'-शब्दवाले बहुतसे मन्त्र आये हैं: तब क्या इन सब स्थलों में आप लोग ' कामना ' का अर्थ ' मैथुन ' लोगे? ऐसा सोचनेवाले तुम लोगोंको सहस्रों बार धिक्कार है । कामी लोग विधवाओं को उत्तेजना देकर उनका सत् बिगाड़ा चाहते हैं । महाशय लोग वेदका नाम लेकर विधवाओंको वा सघवाओंको कुपथ में ले आकर उनसे गुलछर्रे उड़ाते या उड़वाते हैं । वस्तुतः वेदके यह बुरे भाव नहीं हैं । यदि विवाहके समय ही वधूको ऐसे गलत उपदेश वेदके नामसे आप लोग दे रहे हैं; तो स्पष्ट हैं कि आप लोग स्त्रियोंमें पतिव्रतधर्म उड़ाना चाहते हैं, और उसमें मनमाना नियोग - जो आप लोगोंके मतानुसार ' मैथुन'का पर्यायवाचक है - प्रवृत्त करना चाहते हैं । स्त्रियाँ बिगड़ी नहीं होतीं, उनका पुरुष - समाज ही बिगाड़नेवाला होता है । कइयोंने उन्हें गुप्तरूपसे बिगाड़ा; और कइयोंने उन्हें वेदका नाम लेकर बिगाड़ा है, वात तो एक ही हुई । यह सव पुरुष-समाजका ही दोष है । सभी वातें तुम्हीं लोग करते रहो; और हम वेचारियां गूँगी - बहरी बनकर बैठी रहें; और तुम लोग एक वैदिक विवाहका हम पर अत्याचार करते रहो । ऐसा ज़माना बदल गया है, साम्यवादवश बराबर हैं, बल्कि उनसे बढ़ कर हैं ' । और यह आ वनाम ब्रह्ममुनिजी कहकर उसका अर्थ गलत करते हैं । पतिक़ी मृत्युमें उसका देवरसे विवाह रहस्य [ २ ९ १ २८ नहीं हो सकता । हम स्त्रियां भी पुरुशेरि ' देवर: ' का ' द्वितीयो दश कर यह तो वाग्दता लड़की यह विवक्षित है, इसकेलि होत श्राप लोग ‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाका एम पुष्प प ब्रह्ममुनिजी अपना अर्थ सिद्ध करने के लिए कहते हैं कि - पर्म ही छोटे भाई का नाम देवर है, निरुक्तने उसको द्वितीय वर बतला वर ' है; तभी विवाहके अवसर पर घोड़ी के ऊपर वरसे पीछे उसके पतिक छोटे भाईको साथ विठलानेकी प्रथा भी इस बातकी सायनक दिखलाती है, तथा उसे सहवरके नामसे भी पुकारा जाता है मतल ( पृ. ११ ) यह कहना कितनी नासमझी है । २५ वर्षका वर घोड़ उस पर चढ़ा होता है, तब क्या उसके साथ घोड़ी पर कभी २२-२१ समय वर्षके छोटे भाईको बैठाते हैं? कभी नहीं; किन्तु छोटे लड़के हैं । य साथ बैठाते हैं । नहीं तो घोड़ी ही बैठ जाए । चल न सके । किया वह भला छोटा लड़का दूसरा वर कैसे हो सकता है? क्या इसलि छोटा लड़का उस स्त्रीसे कामसम्बन्ध वा नियोग करेगा । यह मा और फिर छोटे भाईको अधिकार देते हो; वह तो उस स्त्री अ योग युके बराबर भी हो सकता है, बल्कि कुछ कम होगा; सक्ति तुम लोग़ गर्भाधानमें सुश्रुतके नौ वर्षोंके अनुसन्धानका स्त्र थुन ' खण्डन करते हो! CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ह ) २८४ ] कता भले मनुष्यों से पूछो कि स्वा. जी तो पतिके छोटे भाई को नी । श्र इन ' नहीं कहते, किन्तु दूसरे पतिमात्रको । तब क्या दूसरे पुरुष दश ' देवर पति भी उसी की घोड़ी के पीछे सभी मिलकर चढ़ कर तीयो आते हैं? क्या वे पहले से निर्णीत कर लिये जाते हैं? धन्य हैं-ना लड़की कर स्वा जीके . अनुयायी! ' सहवर ' नाम तो वरके साथ होने से यह इसकेकि होता है, यह नहीं कि वह भी दूसरा वर उसके साथ वेदीमें पुष्प विवाहार्थ बैठता हो । यदि ऐसा होता; तो उसे भी वरके साथ कि - ' पति ' ही दूसरे आसन पर बैठाया जाता । निरुक्तका ' देवर'का ‘ दूसरे र. चतनाश वर ' कहनेका अन्य रहस्य था । वाग्दत्ता कन्याके वाग्दानकालीन नीछे उससे पतिकी - यदि मृत्यु हो जाती थी; तब उसी पुरुषका भाई वर नकी साधनकर उसे विवाहने जाता था । यहाँपर नैयोगिक पुरुषका कोई जाता है मतलव नहीं । क्योंकि न तो वह नियोगी कभी दूल्हा बनकर वो उस लड़की से विवाह करने जाता है, न पति ही बनकर । न उस मी २२२ समय कोई वेदमन्त्र से संस्कार होता है । न नियोग कोई संस्कार लड़के है । यह तो सीधा व्यभिचार है, नहीं तो विवाह ही क्यों मन्त्रोंसे नसके किया जाता है? नियोगको क्यों वेदमन्त्रोंसे नहीं किया जाता; - क्या वह इसलिए कि वेद नियोगका हामी नहीं है, यह कितना स्पष्ट है । = करेगा! ग्छ महाशय लोग उन मन्त्रोंका जिन्हें यह नियोगका मानते स्त्री अर्थ ही गलत करते हैं । प्राचीन समयमें ऋषि - मुनियोंके होगा; म योग में मैथुन नहीं होता था; इसलिए वहाँ व्यंभिचारकी नका स्व सक्ति ही नहीं थी । इसके लिए ' आलोक ' ( ८ ) में ' नियोग और ( थुन ' ( १ ) देखिये, सब शङ्काओं का समाधान हो जायगा । CC - 0. Ankur Joshi एक वैदिक विवाहका रहस्य । [ २८५ अ.स. के नियोगमें कोई भी मन्त्र - संस्कार नहीं होता; और उस पुरुषको वर वा पति भी कभी नहीं कहा जाता । उसे तो ' व्यभिचारी ' कहा जाना अधिक उपयोगी होगा । केवल उन व्यभिचारको उस सम्प्रदायके नेताओंके द्वारा ' वेदका लेबिल ' लगा दिया जाता है । दूधकी बोतलमें शराव भर कर दिया जाता है । जैसे अपनी संस्थाका नाम लेकर उसके प्राप्त रुपयोंको उस संस्थाके लोग बड़ी खूबसूरतीसे अपने ही लोगोंकी पेटशालाका चन्दा वना लिया करते हैं, वैसे ही नियोगमें भी यह विषय-• कामुक लोग वेदका नाम लेकर अपना काम बना लिया करते हैं । हम लोगोंका विवाह २४ वर्षमें वैदिक कहकर, कर दिया जाता है, उस समय लड़की १४४ बार रजस्वला हो चुकती है । रजस्वलात्वमें स्नानके बाद स्त्रियोंको पुरुषकी प्रबल इच्छा हो जाती है, पर वे वेचारियाँ इनके गलत प्रचारसे मन मसोस कर रह जाती हैं । कई फिर गुप्त भ्रूणहत्यायें कराती हैं । कई उससे डरकर लैदरोंका उपयोग करती हैं । कई अंगुलि - प्रयोग करती हैं । इस प्रकार स्त्री - पुरुष दोनोंकी हानि हो रही है, और हानिके उत्पादक हैं यह लोग; जो वेदके नामसे इन अपने मनमाने यूरोपीय सिद्धान्तोंको यहाँ चालू कर रहे हैं । इन नासममोंको इतनी समझ नहीं कि यूरोप जो शीतल-देश है, जहाँ रजस्वलात्व देरी से होता है, उनके नियम इस उष्णदेशमें लाना चाह रहे हैं । वहांके उपयुक्त कुनाइनको इस गर्म मुल्क में चालू कर रहे होते हैं । इसलिए कन्या- विवाहकी Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) अवस्था भी यह लोग यूरोपकी रख रहे हैं । चाहते हैं- जैसे वहाँ तलाक हो रहे हैं, नये - नयीका आस्वाद प्राप्त हो रहा है, और वे सभ्यदेश माने जाते हैं; वैसे यहां भी व्यवहार चालू हो । विवाहसे पूर्व कोई भी लड़की अक्षतयोनि रहकर न आवे, जिससे कठिनता न रहे । यह इनका आन्तरिक विचार रहता है । कितना यह देशका सत्यानाश कर रहे हैं! मैं बाज आई इस वैदिक कहे जाते हुए विवाहसे । पिताजी, आश्चर्य है कि आप इस वैदिक - षड्यन्त्रमें फँस गये! क्या अभी तक आपको अनुभव नहीं हुआ? युवावस्था-वाली मुझको युवक - पुरुषोंके पास पढ़ने भेज दिया करते थे; इसलिए मेरी पृष्ठभूमिको कलुषित करके आपने अपने सम्प्रदाय में अन्धे होकर मुझे क्या - क्या हानि नहीं पहुँचाई 1 । यह सुनकर वरका पिता, चाचा, तथा भाई आदि कहने लगे कि- स्वा. जीने ' देवकामा ' का बड़ा कुत्सित अर्थ किया था । स्वा. ब्र. मु. भी ऐसा करते हैं; उसी नीतिसे हमने भी इस कन्यामें अपना अधिकार बताया था; पर अब वर तथा उसकी वधूका किया वास्तविक अर्थ समझ कर हमें अनुभव हुआ कि - वास्तवमें देवर श्वशुर आदिका विवाहित हो रही हुई इस लड़की में वेदा-नुसार बुरा भाव कुछ भी नहीं है । उक्त अर्थ करके स्वा, जीने कामुकोंको अपने कुत्सित अर्थ करनेका अवसर दे दिया । अब हम कभी भी ऐसे कुत्सित अर्थोंका विचार भी मनमें नहीं लावेंगे, और न वेद में वे कुत्सित अर्थ हैं ही । में एक वैदिक विवाहका रहस्य । २८. ( १५ ) तब प्रभावित होकर लड़की के पिता कहने लगे-आज मुझ लड़कियों का कभी नहीं बढ़ाएँगे । विवाह -अन्धेकी आँख खुलीं । अब तो हम अपने हा! यह नाममात्रसे ' वैदिक ' वस्तुतः अवैदिक लड़के. विवाद करेंगे और न ही लड़कियोंकी वाहिक संस्कारमें एक अन्य दर्शक भी बैठा हुआ था ।.. वह कहने लगा कि - देखिये । उक्त विधिमें ' देवकामा ' शब्द विधवा होनेपर देवरसे कामना यह लोग बताते हैं पर , वह लड़की विवाहकी समाप्ति पर सं. वि. के आदेश से दो पर वाद ' क्षतयोनि ' हो जायगी । फिर विधवा होनेपर पूर्व क्षतयोनि होनेसे स.प्र. के अनुसार द्विज यह विधवा - विवाह कर सकेगी । शेष रहा नियोग, तो इस सम्प्रदायने नियोग • कई शास्त्रार्थ करते हुए भी कभी अपने यहां उसको असभ्यतावस चालू नहीं किया, तब इसका नियोग भी नहीं हो सकेगा । तब १० पतियों का वैदिक पाठ पढ़ी हुई यह लड़की उन पुरुषों को क्या व्यभिचारसे लेंगी? तभी क्या ' वैदिक - धर्म ' प होगा? वस्तुतः यह सब कामुकोंके अपने ही दुरभिप्राय है । • वेदका इसमें कुछ भी कुत्सित अभिप्राय नहीं । तव कन्याका पिता कहने लगा कि इस ' वैदिक ' विवाह वो कि एक व्यभिचारका षड्यन्त्र है - के इन दुष्परिणामोंका मुने पता नहीं था, नहीं तो मैं कभी इधर प्रवृत्त न होता; पर अब मेरा सर्वनाश उपस्थित हुआ. चाहता है, अब मैं क्या करूँ! CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative